Saturday, March 21, 2026

ज्ञान -14

 ज्ञान -14

                      विवेकपूर्ण गृहस्थ जीवन कोई बन्धन नहीं है । हमारे ऋषियों ने जीवन के जो चार भाग किए हैं, उन्हें आश्रम कहा जाता है - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास । यदि हम अपना जीवन इन्हीं चार आश्रम की अवस्थाओं को ध्यान में रखकर जिएँ तो फिर कोई भी अवस्था हमें बांध नहीं सकती । समस्या तो तब पैदा होती है, जब हम गृहस्थ जीवन से मुक्त ही नहीं होना चाहते । गृहस्थ जीवन के प्रति ऐसी आसक्ति के कारण ही गृहस्थ जीवन को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है अन्यथा यह जीवन मुक्ति के लिए सबसे श्रेष्ठ माना गया है ।

          एक आश्रम से दूसरे आश्रम में प्रवेश करने के लिए द्वार को भीतर की ओर खोलना होता है । इसका अर्थ है, बाहर के संसार से भीतर की (आत्मा की) ओर गति करना । गृहस्थ से वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करने के लिए हम इसके विपरीत, द्वार को बाहर की ओर खोलने का प्रयास करते हैं अर्थात् पुनः संसार की ओर गति करना चाहते हैं । यही हमारे जीवन की सबसे बड़ी भूल है ।

         गृहस्थ जीवन सदैव के लिए नहीं है, यह स्वीकार कर लेना सबसे महत्वपूर्ण है । इसमें ज्ञान की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है जो हमें यह सिखलाता है कि गृहस्थी में रहते हुए कैसे जीना है ? प्रत्येक स्वार्थ से ऊपर उठकर, वास्तविक प्रेम के साथ, एक दूसरे के प्रति समर्पण भाव रखते हुए । यही नहीं, जब गृहस्थ जीवन त्यागने की अवस्था आए तब बिना किसी झिझक के मुक्त होकर वानप्रस्थ अवस्था में आ जाएं । इसके लिए कहीं घर छोड़ कर जाना ही आवश्यक नहीं है बल्कि घर में रहते हुए अनासक्त हो जाना है ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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