भाग - 2 से आगे
आइए ! आगे बढ़ते हैं, अनासक्त होने के एक और सूत्र की ओर । एक संत घने जंगल में कुटिया बनाकर अपने शिष्य के साथ साधना किया करते थे । पास में स्थित गाँव वाले अपनी-अपनी श्रद्धानुसार उनके खाने-पीने आदि का प्रबंध कर दिया करते थे । संत बड़े ही आत्म-रत प्रवृति के थे, उन्हें अपने शरीर, दीन-दुनिया आदि की कोई चिंता नहीं रहती थी । परन्तु शिष्य कई बार भोजन, कपड़ों और आजीविका आदि की चिन्ता कर लिया करता था । संत उसे बहुत समझाते, परन्तु शिष्य फिर भी कभी-कभी उनसे मिले ज्ञान को विस्मृत कर देता था ।
एक बार गाँव का एक व्यक्ति एक दुधारू गाय को लेकर संत की कुटिया में आया । संत को गाय सौंपते हुए संत उसने कहा कि ‘मैं गाँव छोड़कर जा रहा हूँ । न जाने वापिस लौटकर कभी आ पाऊंगा अथवा नहीं । इस गाय को आपके सिवाय किसी अन्य के पास छोड़ना मेरे को उचित नहीं लगा । अतः यह गाय आपको देकर जा रहा हूँ । आप इसकी सुगमता से देखभाल भी कर सकते हैं ।’ संत ने उस व्यक्ति को कुटिया के खुले भाग में गाय को बांधने का कह दिया । व्यक्ति ने संत को प्रणाम किया और दूसरे गाँव जाने के लिए यात्रा पर निकल गया ।
उसके चले जाने के बाद शिष्य ने अपने गुरु से पूछा - ‘गाय को रखना भी बड़े झंझट का कार्य है । इस गाय का हम क्या करेंगे ? इस के चारा-पानी की व्यवस्था कहाँ से होगी ?’ संत ने निर्विकार भाव से कहा - ‘पुत्र, इस जंगल में परमात्मा ने सभी प्राणियों के भोजन की व्यवस्था की है । जब हमारे खाने-पीने की व्यवस्था भी होती है, तो फिर इस मूक प्राणी की व्यवस्था भी परमात्मा करेगा । अच्छा है, हमें भी इस गाय का दूध पीने को मिलेगा । परमात्मा सब-कुछ अच्छा ही करते हैं ।’
गुरु-शिष्य दोनों मिलकर गाय की सेवा करते और जंगल में चरने के लिए छोड़ देते । सुबह-शाम गाय के दूध- दही का सेवन कर लिया करते । अब शिष्य को गाय बोझ नहीं लग रही थी । वह बड़े मन से गाय को जंगल में जाकर चरा लाता । सुबह शाम उसको दुह लेता, दूध से दही और मक्खन आदि बना लेता और अपने गुरु के साथ सुखपूर्वक उनका सेवन करता ।
कुछ दिनों बाद वही व्यक्ति जो गाय को आश्रम में छोड़ कर गया था, वापिस लौट आया । उसने आते ही संत से अपनी गाय वापिस मांगी । संत ने निर्विकार भाव से कहा कि ‘जहां बांधकर गए थे, वहीं से खोलकर वापिस ले जाओ ।’ वह व्यक्ति गाय को खोलकर वापिस ले गया । यह सब देख-सुनकर शिष्य बड़ा उद्वेलित हुआ । उस व्यक्ति के जाने के बाद पीछे से शिष्य उसको भला-बुरा कहने लगा । संत ने उसे समझाया कि ‘परमात्मा सब कुछ अच्छा ही करते हैं । अच्छा हुआ वह व्यक्ति गाय को वापिस ले गया । इससे हमें उस गाय को चराने, उसका गोबर उठाने आदि के झंझट से मुक्ति मिली ।’ गुरु की बात सुनकर कुछ समय बाद शिष्य शांत हो गया ।
इस दृष्टान्त के अनुसार शिष्य गाय से मिलने वाले दूध आदि से जो सुख अनुभव कर रहा था, उसके अब न मिलने पर उसका वह सुख ही दुःख में परिवर्तित हो रहा था । वह सोचता था कि गाय से हमें अब तक दूध आदि मिलता था, वह अब नहीं मिल पायेगा । यह शिष्य की दुग्ध-भोग (रस) के प्रति आसक्ति थी, जो उसे उस व्यक्ति के प्रति उद्वेलित कर रही थी । जबकि दूसरी तरफ संत के मन में गाय के आने और वापिस लौट जाने, दोनों अवस्थाओं के कारण विचार तक पैदा नहीं हुआ था क्योंकि वे अनासक्त थे । उनके इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा था कि सदैव मिलने वाला दूध-दही अब नहीं मिल पायेगा । गाय आई है तो अच्छा है; दूध-दही खाने को मिलेगा, चली गई तो भी अच्छा हुआ, गोबर उठाने से मुक्ति मिली । उनमें ऐसी अनासक्ति आई है, साक्षी-भाव के कारण ।
शिष्य गाय में सुख देख रहा था अर्थात किसी अन्य से स्वयं को सुख मिलता देख रहा था जबकि संत जानते थे कि वास्तविक सुख तो स्वयं के भीतर है, स्वयं से बाहर तो केवल परमात्मा की लीला है । संसार का दृश्य हमें अपने में लीन करने का प्रयास करता है, अपने साथ लपेट लेना चाहता है । हमें अपनी क्षमता इस प्रकार विकसित करनी होगी कि संसार की कोई बात/वस्तु हमें प्रभावित न कर सके । हमें केवल उस लीला का साक्षी बने रहना है ।
इसके लिए आवश्यक है कि हम संसार को देखें तो अवश्य परन्तु उसमें हस्तक्षेप न करें । देखने को हम रोक नहीं सकते क्योंकि नेत्र नामक ज्ञानेन्द्रिय का यह स्वाभाविक कार्य है । परन्तु संसार में लिप्त होना अथवा न होना हमारी क्षमता के भीतर है । हम चाहें तो संसार में डूब सकते हैं और चाहें तो संसार में रहते हुए उससे निर्लिप्त भी रह सकते हैं । अतः संसार में केवल साक्षी बनकर परमात्मा की लीला को देखते रहना ही उचित है ।
इस प्रकार इस दृष्टान्त से हमें अनासक्त होने का अंतिम और महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लगता है - ‘साक्षी-भाव’ । संसार में जो कुछ भी घटित हो रहा है, उन सब का केवल साक्षी होना । यहाँ सन्त का साक्षी-भाव है और शिष्य का आसक्ति-भाव । न्यायालय में साक्षी अर्थात गवाह का बड़ा महत्त्व है । जो किसी भी घटना में हस्तक्षेप नहीं करता वही वास्तव में सही साक्षी हो सकता है । जो कोई व्यक्ति एक पक्ष का साथ देता है वह भला साक्षी कैसे हो सकता है ?
साक्षी होने का अर्थ है, निर्विकार भाव से घटित हो रहे को देखते रहना, प्रत्येक घटना को परमात्मा की लीला मात्र समझना, उसमें स्वयं को नहीं उलझाना । इस शरीर को मन सहित 11 इन्द्रियां परमात्मा ने दी है । पाँच ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग न करना परमात्मा के आशीर्वाद और उनकी आज्ञा का उल्लंघन है परन्तु पाँच कर्मेन्द्रियों और एक मन को नियंत्रण में रखना प्रत्येक व्यक्ति का निजी दायित्व है ।
ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग करते हुए कर्मेन्द्रियों और मन को नियंत्रण में रखना ही साक्षी-भाव है । नेत्रों से न देखना, कानों से न सुनना, घ्राण शक्ति को दबा देना, रसनेन्द्रिय से स्वाद को न लेना तथा त्वचा से स्पर्श के अनुभव करने को नकार देना स्पष्ट रूप से परमात्मा की आज्ञा का उल्लंघन है । परमात्मा ने ज्ञानेन्द्रियाँ दी ही ज्ञान प्राप्त करने के लिए और हम इन इन्द्रियों के कार्य से स्वयं को विमुख कर ले तो फिर ज्ञान कैसे प्राप्त करेंगे ? हमें मानव जीवन मिला ही इसीलिए है कि हम आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हो और आत्म-ज्ञान तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब ज्ञानेन्द्रियों का समुचित उपयोग किया जाये ।
हम लोग प्रायः साक्षी और द्रष्टा होने को समानार्थी समझ लेते हैं । साक्षी होना द्रष्टा होने से पूर्व की अवस्था का नाम है । साक्षी होने पर आप इस भौतिक संसार में बने तो रहते हैं परन्तु इसकी गतिविधियों में रत (Involve) नहीं होते हैं, किसी प्रकार का कोई हस्तक्षेप नहीं करते हैं । साक्षी होने का अर्थ संसार से पलायन कर जाना कतई नहीं है बल्कि संसार में रहते हुए उसकी प्रत्येक गतिविधि को बिना किसी भेद-भाव के देखते रहना है; जैसे कि आप किसी सिनेमा हाल में एक चलचित्र देख रहे होते हो । चलचित्र को हम इसके निर्माण-कर्ता की कृति और कलाकारों का अभिनय समझकर उसमें रत नहीं होते हैं, उसी प्रकार संसार में हो रहे प्रत्येक घटनाक्रम को उसके निर्माण-कर्ता की कृति, उस परम पिता की लीला समझना ही साक्षी होना है ।
जब हम चलचित्र के किसी एक पात्र में स्वयं को देखने लगते हैं, तब हम उस चलचित्र में रत हो जाते हैं । ऐसे में हमें चलचित्र में घटित होने वाली प्रत्येक घटना निश्चित ही प्रभावित करेगी । वास्तविकता में वहां कोई सत्य घटना घटित न होकर कलाकार का अभिनय मात्र होता है और कलाकार भी अभिनय, उस चलचित्र के निर्माता/निर्देशक की योजना के अनुसार ही करता है ।
इस संसार में हम जितनी भी घटनाएँ घटित होती देख रहे हैं, वे सभी परमात्मा की एक निश्चित योजना के अनुसार ही घटित हो रही है और उसी परमपिता की योजना के अनुसार ही हम सब को अभिनय करने के लिए हमारे प्रत्येक जीवन में एक नए पात्र की भूमिका मिलती है । हमें केवल स्वयं को मिली उस भूमिका को ही निभाना होता है और वह भी बड़ी संजीदगी के साथ । हमें इस संसार में घटित होने वाली घटनाएँ तभी प्रभावित कर सकती हैं जब हम उन घटनाओं को लीला न मानकर वास्तविकता समझ बैठते हैं । ऐसा तभी होता है जब हम किसी घटना को एक पक्षीय होकर देखते हैं । इस प्रकार कहा जा सकता है कि एक पक्षीय होने से हम कभी भी साक्षी नहीं हो सकते । साक्षी होने के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक घटना को निरपेक्ष-भाव से देखा जाय और उसको परमात्मा की लीला मात्र समझा जाय ।
अष्टावक्र महाराज राजा जनक को कह रहे हैं –
न त्वं विप्रादिको वर्णों नाश्रमी नाक्षगोचरः ।
असंगोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव ।। अष्टावक्र गीता - 1/5 ।।
अर्थात हे जनक, तुम ब्राह्मण आदि जातियों वाले नहीं हो । न तुम वर्णाश्रम आदि धर्मों वाले हो । न तुम चक्षु आदि इन्द्रियों के विषय हो, किन्तु तुम इन सबके साक्षी और असंग हो एवं तुम आकार से रहित हो और सम्पूर्ण विश्व के साक्षी हो । ऐसा अपने को जानकर सुखी और संसार रुपी ताप से रहित हो जाओ ।
अष्टावक्र जी का यह कहना कि तुम किसी विशेष जाति अथवा वर्ण के नहीं हो और न ही तुम नेत्र आदि इन्द्रियों के विषय हो, न तुम किसी विशेष आकार के हो; इसका अर्थ है कि जाति, वर्ण, इन्द्रिय-विषय और आकार ये सभी शरीर के साथी है । आत्मा इन सबसे अलग है, असंग है । हमें मिलने वाला शरीर प्रत्येक नए जीवन में बदलता रहता है । आज मेरा यह भौतिक शरीर एक ब्राह्मण का है, अगले जन्म में ब्राह्मण के शरीर की तो बात ही क्या, यह भी पता नहीं है कि मनुष्य का भी शरीर मिल पायेगा अथवा नहीं । अतः स्वयं को शरीर न समझकर आत्मा समझो । आत्मा केवल साक्षी है । आत्मा शरीर, उसकी जाति, उसके वर्ण और आकार आदि को साक्षी भाव से देखती अवश्य है परन्तु शरीर से सदैव असंग बनी रहती है ।
जब आप स्वयं को शरीर समझने लगते हो, समस्या तभी पैदा होती है अन्यथा आत्मा को इन सब से क्या प्रयोजन ? आप आत्मा हैं, शरीर नहीं हैं, इस बात को स्वीकार कर लेने से ही व्यक्ति में साक्षी-भाव आ सकता है अन्यथा नहीं । साक्षी-भाव के कारण न तो आप किसी भोग-कर्म के प्रति आसक्त हो सकते हो और न ही उससे विरक्त । जो न आसक्ति है और न ही विरक्ति, बल्कि इन दोनों के मध्य जो है, वही अनासक्ति है ।
आत्मा साक्षी है अर्थात् आप स्वयं जिसे ‘मैं’ कहते हैं, वह साक्षी है । साक्षी समस्त संसार और उसके कार्यकलापों को निरपेक्ष भाव से देखता है । साक्षी केवल स्वयं को नहीं देखता । जिस दिन वह स्वयं को भी देखने लग जायेगा उसे साक्षी से द्रष्टा होने में तनिक भी देर नहीं लगेगी । आत्मा साक्षी है, परमात्मा दृष्टा है । साक्षी वह कलाकार है, जो अभिनय तो करता है परन्तु अभिनीत पात्र से उसका कोई सरोकार नहीं रहता । दृष्टा रंगमंच का निर्माण करने वाला है । उसने रंगमंच का निर्माण कर दिया और उस पर स्वयं ही विभिन्न रूप धर कलाकार बन कर अभिनय करने हेतु प्रस्तुत हो गया है, एकाकी अभिनय करने के लिए । कहने का अर्थ है कि वह स्वयं ही रंगमंच बन गया है और स्वयं ही कलाकार । इस प्रकार वह स्वयं को ही देख रहा है क्योंकि रंगमंच भी स्वयं का है और अभिनय करने वाला कलाकार भी वह स्वयं ही है । इसी कारण से उसे साक्षी न कहकर दृष्टा कहा जाता है अर्थात स्वयं को देखने वाला । अंततः मनुष्य का शरीर प्राप्त करने का हमारा उद्देश्य भी तो साक्षी से दृष्टा बनना है ।
द्रष्टा बनने का प्रयास करने से पूर्व साक्षी बनना होगा । इस मनुष्य शरीर के रहते-रहते साक्षी बन गए तो भी बहुत बड़ी उपलब्धि होगी । परन्तु साक्षी होना अनासक्त होने के एक-एक सूत्र को समझकर अपनाने से ही संभव होगा । जिस दिन आप साक्षी-भाव में आ गए, समझ लो आप में अनासक्ति आ गयी और आप अनासक्त हो गए ।
एक बार के लिए विरक्त हो जाना सबसे सरल है परन्तु सदैव के लिए विरक्त बने रहना सबसे कठिन है । आसक्ति की जब अति हो जाती है, तब व्यक्ति विरक्ति की तरफ मुड़ जाता है परन्तु यह विरक्ति इसलिए अस्थायी रहती है क्योंकि इन्द्रियों को बल पूर्वक दबाया गया है, सोच-समझ कर नियंत्रित नहीं किया गया है । अति आसक्ति जब दुखदायी हो जाती है, तब व्यक्ति अस्थायी रूप से विरक्ति की तरफ चला जाता है । प्रत्येक भोग प्रारम्भ में अमृत तुल्य प्रतीत होता है परन्तु अंत में दुःख देने वाला ही होता है । यह बात हम अल्प समय के लिए तो समझ लेते हैं परन्तु उसी भोग के पुनः सामने आते ही इस बात को विस्मृत कर बैठते हैं ।
भीतर काम-भोग का भाव जीवित है और ऊपर से दिखावा कर रहे हैं, काम को जीत लेने का । देव ऋषि नारद ने भी एक बार काम को जीत लिया था परन्तु उस काम विजय का उन्हें अभिमान हो गया था । परमात्मा की इच्छा नहीं थी कि उनका भक्त पतन की राह पर अग्रसर हो । उन्होंने देवर्षि को पतन से बचाने के लिए कुछ लीला की । देवर्षि नारद के समक्ष काम-भोग की परिस्थितियाँ बनते ही भीतर दबा काम-भाव पुनः सतह पर आ गया । हम तो साधारण मानव है, हमें कौन रोकेगा ? इस पतन से । हमारे समक्ष एक ही रास्ता है, आसक्ति से बचें और अनासक्त हो जाएँ । इसलिए अनासक्ति के प्रत्येक सूत्र पर चलते हुए बिना किसी अहंकार के साक्षी-भाव को उपलब्ध हो जाएँगे, तभी अनासक्त हो पाएंगे अन्यथा नहीं ।
अब प्रश्न यही उठता है कि अनासक्ति और विरक्ति दोनों में से कौन सी स्थिति अधिक महत्वपूर्ण है अर्थात हमें विरक्त होना चाहिए अथवा अनासक्त ? विरक्ति और अनासक्ति दोनों ही महत्वपूर्ण है और दोनों ही आपके उत्थान में सहायक हैं । अगर मुझे इन दोनों में से किसी एक को चुनने का कहा जाये तो मैं अनासक्ति का चुनाव करूँगा । क्यों ? क्योंकि ……,। आगे बढ़ने से पहले चलिए ! एक कहानी सुनिए । इस कहानी से इस ‘क्यों’ का उत्तर मिल जाएगा ।
विरक्ति और अनासक्ति दोनों में से अनासक्ति को ही क्यों चुनें ? स्पष्ट करने के लिए पहले एक कहानी सुनाता हूँ । एक विरक्त तपस्वी ने कई वर्षों तक तप किया, मोक्ष प्राप्ति के लिए । आखिर एक दिन उसका भौतिक शरीर छूटा और जीवात्मा पहुँच गया धर्मराज के यहाँ । धर्मराज ने उसके कर्मों का लेखा-जोखा देखकर उसे स्वर्ग ले जाने का आदेश दिया । जीवात्मा तो मोक्ष चाहता था अतः उसने प्रतिवाद किया । जीवात्मा ने कहा कि ‘मैंने बहुत काल तक तप किया है, मैं तो मोक्ष का अधिकारी हूँ । मुझे स्वर्ग ही क्यों ?’
धर्मराज ने कहा, ‘बिलकुल सत्य है कि आपने कठोर तप किया है परन्तु केवल कठोर तप आपको मोक्ष नहीं दिलवा सकता । इन्द्रियों से ज्ञान प्राप्त करने और कर्म करने के स्थान पर आपने उनको दबाकर, उनका दमन करते हुए तप किया है । आपने स्वयं के लिए इतना सब कुछ किया है, जबकि यह शरीर परमात्मा ने आपको संसार की सेवा करने के लिए, परमार्थ के लिए दिया है, न कि केवल स्वयं की स्वार्थ-सिद्धि के लिए । अगर आपको मोक्ष ही प्राप्त करना है तो इसके लिए सर्वप्रथम आप स्वर्ग को भोगिये और फिर मनुष्य योनि प्राप्त कर संसार की सेवा कीजिये, तभी आप मोक्ष प्राप्त करने के अधिकारी बन पायेंगे ।’
अध्यात्म-पथ पर अग्रसर प्रत्येक व्यक्ति की ऐसी ही स्थिति है । संसार की सेवा करने का विचार त्यागकर केवल इन्द्रियों को दबाने में लगे हुए हैं और इन्द्रियां है कि दबती ही नहीं है । ब्रह्मलीन स्वामी श्री रामसुखदासजी महाराज साफ़-साफ़ कहा करते थे ‘संसार की सेवा करो और पिंड छुडाओ ।’ सुनने में बड़ी साधारण सी बात लगती है परन्तु बड़ा गूढ़ सार है उनकी कही इस बात में ।
इन्द्रियां दबती नहीं है । इनको चाहे जितना दबा लो, हमसे ये दबेगी भी नहीं । ऐसे में विरक्त होना छोड़ कर इन्द्रियों का समुचित उपयोग (कर्म) करते हुए संसार की नि:स्वार्थ भाव से सेवा करने में लग जाओ, अनासक्ति स्वयं ही आ जाएगी । भगवान श्री कृष्ण भी गीता में यही बात कहते हैं कि कर्म न करने से; कर्म करना उचित है (गीता-3/8) । एक मनुष्य के लिए विरक्त होने से अच्छा है कि वह संसार की सेवा करने के लिए अनासक्त होकर कर्म करे ।
आसक्ति का कैसा प्रभाव होता है, यह आप स्वयं ही देख लीजिये । ‘आसक्ति से अनुरक्ति’ की राह में चलते हुए ‘अनासक्ति’ विषय पर ही आकर अटक गया हूँ । लिखने की मेरी आसक्ति इतनी अधिक प्रबल हो गयी है, जो एक छोटे से लेकिन महत्वपूर्ण विषय को स्पष्ट करने के लिए इतना अधिक विस्तार दे दिया है । इसी प्रकार जब हम किसी भोग को एक बार भोग लेते हैं, तब उसको बार-बार भोगने की इच्छा जाग्रत होकर बढ़ती जाती है । यह बार-बार भोग प्राप्त करने के लिए मनुष्य का कर्म करने को विवश होना ही आसक्ति है । एक बार त्याग पूर्वक भोगना अर्थात मन में बार-बार भोगने की इच्छा नहीं रखना ही हमें आसक्ति से दूर रख सकता है ।
इस श्रृंखला में आगे बढ़ने से पहले मैं आपको पुनः उसी दृष्टान्त की ओर लिये चलता हूँ, जिसमें तीन बौद्ध भिक्षुक भिक्षा प्राप्त करने के लिए एक गाँव की ओर जा रहे होते हैं । गाँव में प्रवेश करने से पहले एक नदी को पैदल ही पार करना पड़ता है क्योंकि पार जाने के लिए नदी के इस किनारे पर नाव आदि की कोई व्यवस्था नहीं है । नदी के किनारे पर बैठी सुकुमारी की हिम्मत नहीं हो रही है, बिना किसी सहारे के नदी को पार करने की । वह एक-एक कर प्रत्येक बौद्ध भिक्षु से हाथ पकड़ कर नदी पार करने का आग्रह करती है ।
पहला भिक्षुक विरक्त है, उस पर उस कन्या की अनुनय-विनय का कोई प्रभाव नहीं पड़ता और वह उसको अनदेखा कर अपने मार्ग पर आगे बढ़ जाता है । दूसरा भिक्षुक उस कन्या की बात को सुनता और समझता तो है परन्तु वह साधना-पथ पर है और मानता है कि एक लड़की का हाथ पकड़ने से उसके भीतर काम-भाव जाग्रत हो सकता है । वह तो इन्द्रियों का दमन करने में लगा हुआ है । वह इस कन्या के आग्रह को साधना-मार्ग से विचलित करने का एक प्रलोभन समझता है और वह उस प्रलोभन के जाल में फंसना नहीं चाहता है । वह उस कन्या की विनती को ठुकरा देता है । तीसरा भिक्षुक उस कन्या की विनती को स्वीकार करता है और उसका हाथ पकड़ कर उसे भी नदी पार करवा देता है । नदी के उस पार जाकर वह उसका हाथ छोड़ अपने रास्ते चल देता है और उस घटना को पुनः याद ही नहीं करता है, परन्तु दूसरा भिक्षुक वह दृश्य भूला नहीं पाता है । उस भिक्षुक को वह दृश्य बार-बार याद आता है और वह उस दृश्य में तीसरे भिक्षुक का पतन देखता है ।
प्रश्न यह उठता है कि इन तीनों भिक्षुओं में कौन सा भिक्षु सही मार्ग पर है । सतही तौर से देखा जाये तो तीनों भिक्षुक ही सही हैं परन्तु आसक्त भिक्षु अर्थात दूसरे भिक्षु को इन्द्रियों का दमन करने के स्थान पर उनका उचित उपयोग करना चाहिए अथवा प्रथम भिक्षुक की तरह विरक्त हो जाना चाहिए । प्रथम भिक्षु का विरक्त होना उचित है परन्तु यह विरक्ति स्वयं के स्वार्थ के लिए है । स्वयं की स्वार्थ-पूर्ति के लिए किया गया कार्य केवल कर्म-योग से विमुख होना ही प्रदर्शित करता है । कर्म-योग से विमुख होना परमात्मा के द्वारा दिए गए मानव शरीर का अपमान करना है । मनुष्य को यह भौतिक शरीर कर्म करने के लिए ही दिया गया है । साथ ही साथ यह आवश्यक है कि इस शरीर से कर्म भी निस्वार्थ भाव से केवल संसार की सेवा के लिए ही किये जाएँ ।
इतने विवेचन के बाद हम पाते हैं कि केवल तीसरे और अंतिम भिक्षुक ने ही भगवान बुद्ध का सही मार्ग अपनाया है – ‘मंझिम निकाय’, इन्द्रियों का समुचित उपयोग करते हुए कर्म करना । न आसक्ति और न ही विरक्ति बल्कि अनासक्त होकर कर्म करना । भगवान श्री कृष्ण भी गीता में अर्जुन को यही बात कह रहे हैं -
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेSर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ।। गीता-3/7 ।।
अर्थात हे अर्जुन ! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है ।
हम आसक्ति को पीछे छोड़कर अनासक्ति की ओर आते हुए संक्षेप में अब तक हुए विवेचन से निकले सार को बताते चलते हैं । जितनी अधिक आसक्ति होती है, व्यक्ति व्यथित होकर उतनी ही अधिक विरक्ति की और चला जाता है । परन्तु यही विरक्ति जब व्यक्ति को स्वयं के अकेले पड़ जाने के रूप में खलती है, तब वह पुनः उतनी ही अधिक आसक्ति की ओर चला जाता है । यही मनुष्य के सुख-दुःख का कारण है । एक गृहस्थ जीवन भी इसी प्रकार आसक्ति और विरक्ति के मध्य एक दोलक की भांति दोलन करता रहता है, मध्य में रूक नहीं पाता । मध्य में रुकने के सूत्र जो इस श्रृंखला में मंथन के उपरांत निकल कर सामने आये हैं, वे हैं -
प्रथम सूत्र - निष्ठा पूर्वक कर्तव्य कर्म को करते रहना ।
दूसरा सूत्र - किसी में भी दोष न देखना ।
तीसरा सूत्र - ‘मैं और मेरा’ की भावना का त्याग ।
चौथा सूत्र - संतुष्टि पूर्ण जीवन ।
पांचवां सूत्र - सहिष्णुता, विरोध को सहन करना ।
छठा सूत्र - कामनाओं पर नियंत्रण रखना ।
सातवाँ सूत्र - किसी से कोई आशा/अपेक्षा न रखना ।
आठवाँ सूत्र -साक्षी-भाव ।
अनासक्ति के इन आठ सूत्रों से एक ही अभिप्राय है, मन पर नियंत्रण । केवल आठ ही क्यों, अगर हम अधिक गहराई से और सूक्ष्म रूप से विश्लेषण करें तो कुछ और भी सूत्र निकल कर हमारे सामने आ सकते हैं । इनमें से किसी एक सूत्र को आत्म-सात करते हुए आसक्ति से स्वयं को दूर रखा जा सकता है । सभी सूत्र आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए हैं । किसी भी एक सूत्र को पकड़ लेने से समस्त आठों सूत्र सध जाते हैं, ऐसा मेरा मानना है ।
एक गृहस्थ को न तो आसक्त होना चाहिए और न ही विरक्त । उसके लिए मध्यम मार्ग ही उपयुक्त है । अनासक्ति अर्थात पूर्व जन्म के संस्कारों से मिलने वाले इन्द्रियों के सुख को त्याग-पूर्वक भोगना, उन भोगों के प्रति आसक्त नहीं होना और न ही उन भोगों से डर कर दूर भाग कर विरक्त होना । समस्त इन्द्रियों का समुचित उपयोग करते हुए संसार की सेवा करें और आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हों, वास्तविक अनासक्ति यही है ।
एक गृहस्थ के लिए विरक्त होने के स्थान पर अनासक्त होना सरल है । अनासक्ति से ही अनुरक्ति की राह निकलती है । अपने बनाए संसार के घेरे को तोड़कर बाहर निकलना ही ‘आसक्ति से अनुरक्ति की ओर’ चलना है ।
आसक्ति से अनासक्त हो जाना इतना सरल नहीं है परन्तु अनासक्ति से अनुरक्ति तक पहुँचना तुलनात्मक दृष्टि से सुगम है । मनुष्य के जीवन में आ रही समस्त समस्याओं की जड़ में आसक्ति ही है । आसक्ति का त्याग कर या तो विरक्ति में जाया जा सकता है अथवा फिर अनासक्त होकर मन की चंचलता को नियंत्रित कर लिया जाता है । मन की चंचलता ही प्रायः आसक्ति को विरक्ति में ले जाती है परंतु ऐसी विरक्ति आसक्ति का ही दूसरा रूप होती है । मन की चंचलता के कारण ऐसी विरक्ति भी आसक्ति के त्याग का प्रदर्शन मात्र बन कर रह जाती है । ऐसी विरक्ति कब आसक्ति में पुनः परिवर्तित हो जाती है, पता ही नहीं चलता ।
मन की चंचलता ही मनुष्य को विपरीत परिस्थिति में अस्थाई रूप से विरक्त तो कर देती है परन्तु थोड़ी सी अनुकूलता मिलते ही व्यक्ति विरक्ति का चोला उतारकर पुनः संसार में आसक्त हो जाता है । इसलिए कहा जा सकता है कि ऐसी विरक्ति आत्मिक स्तर पर नहीं हुई है बल्कि यह केवल मन की उठापटक मात्र ही है । संसार में रहते हुए (जहां पर आसक्त होने के अनगिनत साधन हैं) विरक्ति में जाना लगभग असम्भव है । यदि संसार के एक स्थान को छोड़कर अन्यत्र जैसे वन आदि में चले भी जाएंगे तो भी सांसारिक आसक्तियां पीछा छोड़ने वाली नहीं है । संसार बाहर से छोड़ने पर विरक्ति नहीं आती बल्कि स्थायी विरक्ति के लिए तो संसार को भीतर से त्यागना पड़ता है । फिर संसार में रहते हुए भी कमल के पत्ते के जल में तैरते हुए भी जल से निर्लिप्त बने रहने की तरह हम भी संसार में रहते हुए भी उसमें लिप्त नहीं होंगे ।
अनासक्ति भी ऐसी ही अवस्था का नाम है, जिसमें मनुष्य संसार में रहते हुए भी निर्लिप्त रहता है । अनासक्त जीवन आपको संसार से मुक्त भले ही करदे परन्तु परमात्मा की तरफ़ जाना है तो वह इससे भी आगे की यात्रा है । हम अनासक्त होकर सांसारिक आसक्ति को बहुत पीछे छोड़ आए हैं । अब हमें अपने भीतर परमात्मा के प्रति आसक्ति पैदा करनी होगी । परमात्मा के प्रति आसक्ति को ही अनुरक्ति कहा जाता है । आसक्ति से अनुरक्ति की ओर जाने के लिए अनासक्ति तो मध्य का एक पड़ाव मात्र है । इसलिए अनासक्त होकर ही सन्तुष्ट नहीं होना है बल्कि पूर्व की सांसारिक आसक्ति को भविष्य की अनुरक्ति में बदलना होगा । प्रश्न है कि अनासक्ति अनुरक्ति में कैसे परिवर्तित होगी ?
मन की चंचलता पर नियंत्रण होते ही व्यक्ति आसक्त से अनासक्त हो जाता है । मन की चंचलता नियंत्रित होती है, बुद्धि में उपजे ज्ञान से । इस ज्ञान (विवेक) का सदुपयोग कर सांसारिक आसक्ति की दिशा बदल कर उसे परमात्मा की ओर मोड़ा जा सकता है । इसके लिए सांसारिक आसक्ति का अत्यंत अभाव होना आवश्यक है । समस्या यही है कि अनासक्त जब परमात्मा के प्रति आसक्त होने का प्रयास करता है तब न जाने कब वह पुनः संसार में आसक्त हो जाता है, इसका पता ही नहीं चलता । इसका कारण है, मन का बुद्धि पर पुनः प्रभावी हो जाना । इसलिए अनुरक्ति के लिए सांसारिक आसक्ति का पूर्ण रूप से मिट जाना आवश्यक है ।
स्वामी शरणानंदजी महाराज कहते हैं - “आसक्ति का अत्यन्त अभाव हुए बिना अनुरक्ति के साम्राज्य में प्रवेश ही नहीं होता ।” आसक्ति का अत्यन्त अभाव होगा, विवेक का सदुपयोग करने से । हमें विचार करना होगा कि हमने संसार में आसक्त होकर दुःख के अतिरिक्त पाया ही क्या है ? विचार से ही विवेक पैदा होता है और विवेक से ही अनासक्त हुआ जा सकता है अन्यथा तो अज्ञान के अंधकार तले अनासक्ति की राह मिलनी असंभव है ।
स्वामी शरणानंदजी महाराज जिस अनुरक्ति की बात करते हैं स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज ने उसको परमात्मा से ‘अपनापन’ कहा है । हम धन-सम्पति, पत्नी, पुत्र-पुत्री को ‘अपना’ कहते हैं, यह हमारा सांसारिक मोह है, आसक्ति है । जब यही आसक्ति परमात्मा के प्रति हो जाती है, तब परमात्मा ही अपने लगने लगते हैं । यही परमात्मा के प्रति ‘अपनापन’ रखना है । इस प्रकार हमें केवल आसक्ति की दिशा बदलनी है । आसक्ति हट जाने का नाम अनासक्ति है और उसकी दिशा परिवर्तन का नाम अनुरक्ति अथवा परमात्मा से अपनापन है । इस प्रकार स्पष्ट है कि संसार के प्रति आसक्ति का अत्यन्त अभाव ही हमें परमात्मा के प्रति अनुरक्त होने की ओर ले जाता है ।
प्रायः प्रश्न उठता है कि परमात्मा से अपनापन कैसे हो ? जब तक हम स्वनिर्मित संसार को अपना कहते रहेंगे तब तक परमात्मा से अपनापन नहीं हो सकता । दो नावों में पैर रखकर नदी के पार नहीं हुआ जा सकता । सहारा/आश्रय तो एक का ही लेना पड़ेगा, चाहे संसार का लें अथवा परमात्मा का । सीधा परमात्मा का आश्रय ले लें तो सर्वोत्तम है, जोकि भक्ति-मार्ग है परन्तु एक गृहस्थ के लिए सीधा परमात्मा का आश्रय लेना जरा असम्भव सा है । उसके लिए तो संसार में रहते हुए, अपना कर्तव्य निभाते हुए अनासक्त होना ही सम्भव है । इसलिए एक गृहस्थ के लिए अनासक्ति तक पहुंचने के लिए ज्ञान-कर्म मार्ग ही उचित मार्ग है । अनासक्ति से फिर अनुरक्ति की राह निकलती है और परमात्मा में ‘अपनापन’ होना सम्भव हो जाता है ।
आसक्त व्यक्ति को जब तत्वज्ञान हो जाता है तब वह संसार से विमुख होकर विरक्त हो जाता है । इसी प्रकार अनासक्त होकर संसार में रहने वाला व्यक्ति भक्ति की राह पकड़कर परमात्मा के प्रति अनुरक्त हो जाता है । सबसे बड़ी समस्या तो संसार से आसक्ति समाप्त करने की है । भक्ति-मार्ग से इस आसक्ति की दिशा परिवर्तित की जा सकती है और परमात्मा से अपनापन होना सम्भव हो जाता है ।
लंका में रहते हुए भी विभीषण भगवान श्रीराम की भक्ति में लीन थे । जब भाई से ममत्व समाप्त हुआ तब वे भगवान के शरणागत हुए । मानस में गोस्वामीजी ने इसका वर्णन बड़े ही सुंदर ढंग से किया है । भगवान से अपनापन करने के लिए क्या किया जाना चाहिए, इसको स्वयं भगवान ने स्पष्ट किया है ।
भगवान श्रीराम मानस में कहते हैं -
जननी जनक बंधु सुत दारा । तनु धनु भवन सुहृद परिवारा ।।
सबके ममता ताग बटोरी । मम पद मनहि बाँध बरि डोरी ।।
समदर्शी इच्छा कछु नाहीं । हरष सोक भय नहिं मन माहीं ।।
अस सज्जन मम उर बस कैसें । लोभी हृदयं बसइ धनु जैसें ।।
-सुन्दरकाण्ड - 48/4-7
माता, पिता, भाई, पुत्र, पत्नी, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार - इन सबके ममत्व रूपी तागों को बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बनाकर उसके द्वारा जो अपने मन को मेरे चरणों में बांध देता है अर्थात् सारे सांसारिक सम्बंधों का केंद्र मुझे बना लेता है, जो समदर्शी है, जिसकी कोई इच्छा नहीं है और जिसके मन में हर्ष, शोक और भय नहीं है । ऐसा सज्जन मेरे हृदय में कैसे बसता है ? जैसे लोभी के हृदय में धन बसता है ।
‘चमड़ी जाय पर दमड़ी न जाय’ एक प्रसिद्ध कहावत है । धन को अपना मानने वाले लोभी व्यक्ति की यही स्थिति है । जैसे लोभी के मन में धन बसता है वैसे ही परमात्मा को अपना कहने वाला परमात्मा में बसता है । तुलसी मानस के समापन में कहते है - ‘……लोभी प्रिय जिमि दाम ।…’ जैसे लोभी व्यक्ति को धन प्रिय लगता है, वैसे ही हे राम ! आप मुझे प्रिय लगें ।
भगवान कहते है कि संसार में जिनको आप अपना कहते हैं, उन सबको अपने मन सहित मेरे चरणों में डाल दो । हम जब अपने केंद्र में परमात्मा को रखेंगे तब सब कुछ परमात्मा का ही होगा । फिर एक परमात्मा ही अपने होंगे, दूसरा कोई अपना नहीं होगा । यही परमात्मा से अपनापन है ।
स्वामीजी ‘परमात्मा से अपनापन’ को स्पष्ट करते हुए प्रत्येक बार मीरा बाई का उदाहरण देते हैं । मीरा बाई कहती है - ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’ । यहाँ तो दूसरों को भी अपना माने बैठे हैं, फिर मीरा बाई की स्थिति में कैसे पहुंचेंगे ? हम तो इस संसार के बने बैठे हैं । हम यह नहीं जानते कि संसार में हो रहे परिवर्तन को देखने वाला स्वयं अपरिवर्तनीय है । न बदलने वाला ही बदलाव का अनुभव कर सकता है, ऐसे में हम संसार के कैसे हुए ? हम शरीर के बदलने का अनुभव कर रहे हैं, इसका अर्थ है कि हम शरीर नहीं हैं । फिर इस शरीर और शरीर से संबंधित व्यक्ति, विषयों और पदार्थों को अपना क्यों कहते हैं ? इस बात का ज्ञान होते ही परिवर्तित हो रहे संसार से तो आसक्ति की समाप्ति और अविनाशी परमात्मा में अनुरक्ति हो जाएगी ।
केवल एक परमात्मा ही अपरिवर्तनशील है इसलिए हम परमात्मा से एक हैं और प्रतिपल बदलने वाले संसार से भिन्न हैं । जिस प्रकार हम संसार के मोह में फँसकर आसक्त हुए बैठे थे, इस बात का ज्ञान होते ही संसार से अनासक्त होकर परमात्मा से प्रेम करने लगेंगे । परमात्मा से प्रेम करना, उन्हें अपना मानना और उनसे अपनापन होना ही अनुरक्ति है ।
आसक्ति होती है, ‘नहीं’ को ‘है’ मान लेने के कारण । इसका अर्थ यह नहीं है कि ‘नहीं’ अलग है और ‘है’ अलग है । ‘नहीं’ भी ‘है’ है परन्तु जिस रूप में हम ‘नहीं’ को ‘है’ मान बैठे हैं, उस रूप में वह ‘है’ नहीं है । हम संसार के बदलाव और चमक दमक को ‘है’ मान बैठे हैं, वास्तव में वह चमक दमक संसार की नहीं है, इसीलिए इसको ‘नहीं’ कहा गया है । इस ‘नहीं’ में जो चमक दमक है, वह ‘है’ के कारण है । इस प्रकार यदि ‘नहीं’ की चमक दमक में आसक्त न होकर उसमें ‘है’ को देखेंगे तो ‘नहीं’ भी ‘है’ हो जाएगा ।
शरीर और जगत् ‘नहीं’ है क्योंकि जैसे आज हैं, वैसे कल नहीं रहेंगे । परमात्मा और हम जैसे आज हैं वैसे ही कल रहेंगे इसलिए ये ‘है’ हैं । शरीर में इंद्रियाँ है । सभी इंद्रियां भी शरीर की तरह ‘नहीं’ के अन्तर्गत ही है ।‘नहीं’ से नहीं ही दिखलाई देगा परन्तु उस दिखलाई पड़ने वाले को ‘है’ मान लेने के कारण ही हम उस दृश्य में आसक्त हो जाते हैं । दृश्य जो देखा गया है वह सत्य नहीं है, यहाँ तक कि जब दृश्य पर दृष्टि पड़ी और उस दृश्य को मस्तिष्क द्वारा देखा गया, तब तक वह दृश्य वैसा नहीं रहा, जब उस पर दृष्टि पड़ी थी । ऐसे में उसे ‘है’ कैसे कहा जा सकता है ?
दूसरी बात, जो कुछ हम देखना चाहते हैं अथवा सुनना, स्पर्श करना, सूंघना या स्वाद लेना चाहते हैं, हमारी आसक्ति वैसा ही अनुभव करा देती है । इसका अर्थ है कि हम हमारी आसक्ति से संचालित हो रहे हैं, जबकि हम जानते हैं कि अपनी आसक्ति के कारण जिसके पीछे पड़े हैं वह सब भी ‘नहीं’ होता जा रहा है । फिर ऐसे ‘नहीं’ के साथ रहकर क्या हम शान्ति को प्राप्त कर सकते हैं ? इस प्रश्न का उत्तर स्वयं को पहचान लेने से अर्थात अनुभूति होने से पूर्व किसी को नहीं मिलने वाला ।
हम सब ‘नहीं’ से ही प्रेम करने लगे हैं । वास्तव में यह प्रेम न होकर हमारे स्वार्थ के कारण उनमें हमारी आसक्ति है । आसक्ति को प्रेम का नाम नहीं दिया जा सकता । प्रेम विनाशी और परिवर्तनशील के साथ हो ही नहीं सकता । उनके साथ किया गया प्रेम आज है, कल नहीं रहेगा । हमने संसार, उसके व्यक्तियों, वस्तुओं में मोह/आसक्ति को प्रेम का नाम दे दिया है, यह ग़लत है । सांसारिक मोह के कारण ही हम दूसरों को ‘अपना’ कहने लगे हैं । वास्तव में वे अपने न तो पूर्व में कभी थे, न आज हैं और न भविष्य में कभी अपने होंगे ।
आसक्ति/राग जिसको हमने ‘प्रेम’ नाम दे रखा है, वास्तव में वह अपना स्वार्थ है । जिस समय स्वार्थपूर्ति में बाधा आएगी, यही प्रेम (राग) द्वेष में परिवर्तित हो जाएगा । राग का विलोम द्वेष है क्योंकि दोनों में ही दो का अस्तित्व बना रहता है । प्रेम का कोई विलोम शब्द नहीं है क्योंकि प्रेम में किसी दूसरे का स्थान ही नहीं है ।
‘प्रेम गली अति सांकरी, जाँ में दो न समाही ।
जब ‘मैं’ था तब हरि नहीं, अब हरि है ‘मैं’ नाहीं ।।’
प्रेम तो अविनाशी है और अविनाशी से किया गया प्रेम ही अनुरक्ति है । इसलिए संसार और शरीर सम्बंधियों को ‘मैं, मेरा और मेरे लिए’ मानना छोड़कर अनासक्त हो जाएं और फिर अपनी ऊर्जा को परमात्मा से अपनापन करने में समर्पित कर दें । ऊर्जा भी परमात्मा की तरह अनादि और अविनाशी है । आसक्ति को छोड़ अनासक्त होकर जो ऊर्जा बचाई है, उसको अनुरक्ति में समर्पित कर दें, जीवन में ऐसा करना ही सर्वोत्तम है ।
एक-दो पाठकों द्वारा ‘अनुरक्ति’ का उदाहरण देने का अनुरोध किया गया है । मुझे इस बात का सदैव गर्व रहता है कि मैं उस राज्य से हूँ जहां परमात्मा में अनुरक्त भक्तों का इतिहास रहा है । सबसे बड़ा उदाहरण तो मीरां बाई का है । मेड़ता में जन्म लेकर पली-बढ़ी मीरां का विवाह मेवाड़ के राजकुमार भोजराज के साथ कर दिया गया था । फिर भी वे सदैव कहती रही कि ‘ जिनके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई’ । संसार से अनासक्त मीरां सदैव श्रीकृष्ण भक्ति में लीन रहती थी । परमात्मा के प्रति ऐसी अनुरक्ति का उदाहरण आज इक्कीसवीं शताब्दी में मिलना मुश्किल है ।
मीरां बाई के अलावा मकराना की बालिका करमा बाई भी परमात्मा के प्रति अनुरक्त थी तभी तो जगन्नाथ को आज भी उसके खीचड़े का भोग रुचता है । पिता द्वारा स्वयं से पूर्व श्रीकृष्ण को ज़ीमाने का आदेश ही उनको परमात्मा के प्रति अनुरक्त कर गया । करमा ने भोजन तब तक नहीं किया जब तक भगवान ने साक्षात् प्रकट होकर उसका बनाया खीचड़ा नहीं खा लिया । ऐसी अबोध अनुरक्ति भी परमात्मा के दर्शन करा सकती है ।
मांझवास (नागौर) की फूली बाई, राम-भक्ति में इतनी तल्लीन रहती थी कि उसकी थेपड़ियाँ (गोबर के कण्डे) दूसरी स्त्रियाँ चुरा ले जाती थी । जब वह गांव प्रधान से इस चोरी की शिकायत करती तो वे फूली से उसकी थेपड़ियों की पहचान बताने को कहते । तब वे एक ही बात कहती कि मेरी जिस भी थेपड़ी को हाथ लगाओगे, उससे राम-राम की धुन निकलेगी । फूली बाई की भगवान के प्रति अनुरक्ति की कल्पना कीजिए कि केवल उसके रोम-रोम में ही राम-धुन नहीं बसी थी बल्कि जिसको भी उसने छुआ वह भी राममय हो गया ।
आसक्ति के पीछे संसार और शरीर से मिलने वाला भोग-सुख है, जबकि परमात्मा से अनुराग होना उनसे प्रेम करना है । आसक्ति राग पैदा करती है जबकि संसार के प्रति वीतरागता से परमात्मा में अनुराग हो जाता है । राग आसक्ति है और अनुराग अनुरक्ति है ।
परमात्मा में अनुकरणीय अनुरक्ति देखना हो तो सबसे बेहतरीन उदाहरण गोपियों का है । गोपियां घर का काम भी करती थी तो भी ध्यान श्रीकृष्ण में लगा रहता था । भागवतजी में एक अध्याय गोपिका- गीत का है, जिसमें गोपियां श्रीकृष्ण को कहती हैं कि हम तुम्हारी बिना मोल की दासियां हैं । बिना मोल की दासियां कहने का अर्थ है कि वे कृष्ण से निश्छल और नि:स्वार्थ प्रेम करती थी । इतना प्रेम कि उनको अपने पति, घर के काम-काज, यहाँ तक कि कपड़े-लतों तक की भी सुध नहीं रहती थी । उनका परमात्मा के प्रति कोई शारीरिक और सांसारिक प्रेम नहीं था, उनका प्रेम तो अलौकिक था, दिव्य था । वे रात-दिन प्रेम-रस में भीगी रहती थी । वे स्वयं तक को भूल जाती थी, बस केवल एक कृष्ण …..। तभी कबीर ने प्रेम को इस प्रकार परिभाषित किया है -
प्रेम प्रेम सब कोई कहे, प्रेम न जाने कोय ।
जा मारग साहिब मिले, प्रेम कहावै सोय ।।
प्रेम की परिपूर्णता सेवा और त्याग में ही है । इन दो (सेवा और त्याग) गुणों के कारण ही गोपियां परमात्मा के प्रति अनुरक्त रही । सेवा और त्याग स्त्रियों में विशेष रूप से होते हैं क्योंकि उनका चित्त स्त्रैण होता है । उनमें श्रद्धा और विश्वास जन्मजात होता है, वे शीघ्र ही किसी पर विश्वास कर लेती हैं जिसके कारण कई दुष्ट व्यक्ति उनका नाजायज़ फ़ायदा उठाते हैं ।
आज की बालिकाओं में स्त्रैण चित्त का निरन्तर अभाव होता जा रहा है, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण दिल्ली के जन्तर-मंतर पर परिलक्षित हुआ उनका व्यवहार है । इतना बुरा प्रदर्शन तो किसी गए गुजरे पुरुष का भी नहीं देखा गया है । ऐसे में शायद ही भविष्य में कोई परमात्मा में अनुरक्त मीरां देखने को मिले ।
भक्ति में तीन चीजें आवश्यक हैं - श्रद्धा और विश्वास, स्त्रैण चित्त तथा एकांत । स्त्रियों में प्रथम दो स्वाभाविक रूप से होते हैं परंतु उनका दुरुपयोग करने से वे सांसारिक सुखों में डूब जाती हैं । सही उपयोग करने से प्रथम दो को उपलब्ध हुआ साधक अनुरक्त हो जाता है, फिर एकांत उसे काट खाने को नहीं दौड़ता है क्योंकि एकांत में भी भगवान उसके साथ रहते हैं । इसलिए मीरा बाई भूतहा महल में भी भयग्रस्त नहीं हुई ।
भक्ति में तीन चीजें आवश्यक हैं - श्रद्धा-विश्वास, स्त्रैण चित्त और एकांत । स्त्रियों में प्रथम दो स्वाभाविक रूप से होते हैं । महिलाएं स्त्रैण-चित्त होती हैं । उनमें संसार के प्रति अत्यधिक आसक्ति होती है । जब इस आसक्ति की दिशा पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाती है, तब वह परमात्मा में भी अत्यधिक अनुरक्त हो जाती है । स्त्रैण चित्त का दुरुपयोग करने से वे सांसारिक सुखों में डूब जाती हैं । सही उपयोग करने से प्रथम दो को उपलब्ध हुआ प्रत्येक साधक अनुरक्त हो जाता है, फिर एकांत उसे काट खाने को नहीं दौड़ता है ।
जिस पुरुष भक्त का चित्त भी स्त्रैण हो जाता है, तब वह भी परमात्मा के प्रति गहरा अनुरक्त हो जाता है । वृंदावन में भक्त राधा का रूप धारण किए रखते हैं । बाह्य रूप बदलने से श्रीकृष्ण नहीं मिलने वाले, भीतर से राधा (स्त्रैन चित्त) होना आवश्यक है। चलिए ! चलते-चलते अनुरक्त संत के भी उदाहरण पर दृष्टि डाल लेते हैं ।
रसखान की अनुरक्ति देखिए कि वे उसी भूमि पर फिर से जन्म लेना चाहते हैं जिस पर अवतरित होकर परमात्मा ने श्रीकृष्ण के रूप में बाल-लीला की । सूरदासजी को भला कौन भूल सकता है । हाथ पकड़ कर भगवान ने उन्हें वृंदावन तक पहुंचा दिया और फिर अन्तर्धान हो गए । तब अनुरक्त सूरदासजी के मुंह से बोल फूट पड़े -
हाथ छुड़ाए जात हो, निबल जान कर मोय ।
हिरदै से जब जाओगे, तब जानूँगो तोय ।।
क्या हम अभी भी अनुरक्ति को समझ नहीं पाए हैं ? अनुरक्ति को समझने के लिए सबसे पहले अपने भीतर श्रद्धा और विश्वास पैदा करें । श्रद्धा समर्पण कराती है और विश्वास अनन्य भक्ति । ऐसे में फिर अनुरक्ति से बंधे परमात्मा कहां जाएंगे, कैसे नहीं आएंगे ? इसलिए सदैव परमात्मा के प्रति श्रद्धा और विश्वास को दृढ़ रखें ।
सार - संक्षेप
संसार में जीवों की असंख्य प्रजातियाँ है, यहाँ तक कि एक प्रजाति में भी आपको भिन्नता दृष्टिगोचर होगी । प्राणियों की सबसे बुद्धिमान प्रजाति का नाम है - मनुष्य । सभी जीवों में एक मात्र मनुष्य नाम का जीव ही ऐसा है जिसको कर्म करने की स्वतंत्रता है और इस स्वतंत्रता का उपयोग अपनी बुद्धि से करते हुए सर्वोच्च अवस्था तक पहुंच सकता है । वह सर्वोच्च अवस्था है - जहां से यात्रा प्रारम्भ की थी, सब कुछ पीछे छोड़कर वापस वहां तक पहुंच जाए । पर मनुष्य इससे उल्टा चलता है, सिर पर कर्मों की गठरी लादे एक योनि से दूसरी योनि में भटकता हुआ नए नए शरीर लेता जा रहा है परन्तु इनसे मुक्त होने की राह नहीं पकड़ पा रहा है ।
परमात्मा ने मनुष्य को तीन विशेषताएं प्रदान की है - क्रिया, बोध और भाव । क्रिया से अर्थ है, कर्म स्वातंत्र्य । क्रिया को अपने स्वार्थपूर्ति में उपयोग कर वह उनमें आसक्त हो जाता है । यही उसके विभिन्न शरीरों में जन्मने-मरने का कारण है । इस कर्म-आसक्ति को वह बोध के माध्यम से अनासक्ति अथवा विरक्ति में परिवर्तित किया जा सकता है । एक गृहस्थ के लिए अनासक्त होना सरल है, जिससे वह बोध अर्थात् विवेक का उपयोग कर बिना लिप्त हुए अपने कर्तव्य कर्म कर सकता है ।
अनासक्त होकर भी संतुष्ट नहीं होना है । क्रिया और बोध के साथ मिली भाव-शक्ति का उपयोग करते हुए परमात्मा से प्रेम करना है, उनसे अपनापन करना है । आसक्ति से राग-द्वेष पैदा होते हैं जबकि भाव से प्रेम । यह प्रेम ही संसार को अपना मानना छुड़ा देता है और परमात्मा से अपनापन करा देता है । इस प्रकार क्रिया, बोध और भाव की शक्तियों का सदुपयोग कर मनुष्य आसक्ति से अनुरक्ति की ओर आगे बढ़ सकता है । सब कुछ मुख्य रूप से हमारे बोध (विवेक) पर निर्भर करता है ।
इसी के साथ ही ‘आसक्ति से अनुरक्ति की ओर’ की यात्रा का समापन होता है । श्रृंखला में अन्त तक साथ बने रहने के लिए आप सभी का हृदय से आभार ।
।। हरिः शरणम् ।।
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल