Wednesday, August 12, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -भाग -3

भाग - 2 से आगे

        आइए ! आगे बढ़ते हैं, अनासक्त होने के एक और सूत्र की ओर । एक संत घने जंगल में कुटिया बनाकर अपने शिष्य के साथ साधना किया करते थे । पास में स्थित गाँव वाले अपनी-अपनी श्रद्धानुसार उनके खाने-पीने आदि का प्रबंध कर दिया करते थे । संत बड़े ही आत्म-रत प्रवृति के थे, उन्हें अपने शरीर, दीन-दुनिया आदि की कोई चिंता नहीं रहती थी । परन्तु शिष्य कई बार भोजन, कपड़ों और आजीविका आदि की चिन्ता कर लिया करता था । संत उसे बहुत समझाते, परन्तु शिष्य फिर भी कभी-कभी उनसे मिले ज्ञान को विस्मृत कर देता था ।

         एक बार गाँव का एक व्यक्ति एक दुधारू गाय को लेकर संत की कुटिया में आया । संत को गाय सौंपते हुए संत उसने कहा कि ‘मैं गाँव छोड़कर जा रहा हूँ । न जाने वापिस लौटकर कभी आ पाऊंगा अथवा नहीं । इस गाय को आपके सिवाय किसी अन्य के पास छोड़ना मेरे को उचित नहीं लगा । अतः यह गाय आपको देकर जा रहा हूँ । आप इसकी सुगमता से देखभाल भी कर सकते हैं ।’ संत ने उस व्यक्ति को कुटिया के खुले भाग में गाय को बांधने का कह दिया । व्यक्ति ने संत को प्रणाम किया और दूसरे गाँव जाने के लिए यात्रा पर निकल गया ।

      उसके चले जाने के बाद शिष्य ने अपने गुरु से पूछा - ‘गाय को रखना भी बड़े झंझट का कार्य है । इस गाय का हम क्या करेंगे ? इस के चारा-पानी की व्यवस्था कहाँ से होगी ?’ संत ने निर्विकार भाव से कहा - ‘पुत्र, इस जंगल में परमात्मा ने सभी प्राणियों के भोजन की व्यवस्था की है । जब हमारे खाने-पीने की व्यवस्था भी होती है, तो फिर इस मूक प्राणी की व्यवस्था भी परमात्मा करेगा । अच्छा है, हमें भी इस गाय का दूध पीने को मिलेगा । परमात्मा सब-कुछ अच्छा ही करते हैं ।’ 

         गुरु-शिष्य दोनों मिलकर गाय की सेवा करते और जंगल में चरने के लिए छोड़ देते । सुबह-शाम गाय के दूध- दही का सेवन कर लिया करते । अब शिष्य को गाय बोझ नहीं लग रही थी । वह बड़े मन से गाय को जंगल में जाकर चरा लाता । सुबह शाम उसको दुह लेता, दूध से दही और मक्खन आदि बना लेता और अपने गुरु के साथ सुखपूर्वक उनका सेवन करता ।

         कुछ दिनों बाद वही व्यक्ति जो गाय को आश्रम में छोड़ कर गया था, वापिस लौट आया । उसने आते ही संत से अपनी गाय वापिस मांगी । संत ने निर्विकार भाव से कहा कि ‘जहां बांधकर गए थे, वहीं से खोलकर वापिस ले जाओ ।’ वह व्यक्ति गाय को खोलकर वापिस ले गया । यह सब देख-सुनकर शिष्य बड़ा उद्वेलित हुआ । उस व्यक्ति के जाने के बाद पीछे से शिष्य उसको भला-बुरा कहने लगा । संत ने उसे समझाया कि ‘परमात्मा सब कुछ अच्छा ही करते हैं । अच्छा हुआ वह व्यक्ति गाय को वापिस ले गया । इससे हमें उस गाय को चराने, उसका गोबर उठाने आदि के झंझट से मुक्ति मिली ।’ गुरु की बात सुनकर कुछ समय बाद शिष्य शांत हो गया ।

     इस दृष्टान्त के अनुसार शिष्य गाय से मिलने वाले दूध आदि से जो सुख अनुभव कर रहा था, उसके अब न मिलने पर उसका वह सुख ही दुःख में परिवर्तित हो रहा था । वह सोचता था कि गाय से हमें अब तक दूध आदि मिलता था, वह अब नहीं मिल पायेगा । यह शिष्य की दुग्ध-भोग (रस) के प्रति आसक्ति थी, जो उसे उस व्यक्ति के प्रति उद्वेलित कर रही थी । जबकि दूसरी तरफ संत के मन में गाय के आने और वापिस लौट जाने, दोनों अवस्थाओं के कारण विचार तक पैदा नहीं हुआ था क्योंकि वे अनासक्त थे । उनके इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा था कि सदैव मिलने वाला दूध-दही अब नहीं मिल पायेगा । गाय आई है तो अच्छा है; दूध-दही खाने को मिलेगा, चली गई तो भी अच्छा हुआ, गोबर उठाने से मुक्ति मिली । उनमें ऐसी अनासक्ति आई है, साक्षी-भाव के कारण ।

             शिष्य गाय में सुख देख रहा था अर्थात किसी अन्य से स्वयं को सुख मिलता देख रहा था जबकि संत जानते थे कि वास्तविक सुख तो स्वयं के भीतर है, स्वयं से बाहर तो केवल परमात्मा की लीला है । संसार का दृश्य हमें अपने में लीन करने का प्रयास करता है, अपने साथ लपेट लेना चाहता है । हमें अपनी क्षमता इस प्रकार विकसित करनी होगी कि संसार की कोई बात/वस्तु हमें प्रभावित न कर सके ।  हमें केवल उस लीला का साक्षी बने रहना है ।

               इसके लिए आवश्यक है कि हम संसार को देखें तो अवश्य परन्तु उसमें हस्तक्षेप न करें । देखने को हम रोक नहीं सकते क्योंकि नेत्र नामक ज्ञानेन्द्रिय का यह स्वाभाविक कार्य है । परन्तु संसार में लिप्त होना अथवा न होना हमारी क्षमता के भीतर है । हम चाहें तो संसार में डूब सकते हैं और चाहें तो संसार में रहते हुए उससे निर्लिप्त भी रह सकते हैं । अतः संसार में केवल साक्षी बनकर परमात्मा की लीला को देखते रहना ही उचित है । 

         इस प्रकार इस दृष्टान्त से हमें अनासक्त होने का अंतिम और महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लगता है - ‘साक्षी-भाव’ । संसार में जो कुछ भी घटित हो रहा है, उन सब का केवल साक्षी होना । यहाँ सन्त का साक्षी-भाव है और शिष्य का आसक्ति-भाव । न्यायालय में साक्षी अर्थात गवाह का बड़ा महत्त्व है । जो किसी भी घटना में हस्तक्षेप नहीं करता वही वास्तव में सही साक्षी हो सकता है । जो कोई व्यक्ति एक पक्ष का साथ देता है वह भला साक्षी कैसे हो सकता है ?

       साक्षी होने का अर्थ है, निर्विकार भाव से घटित हो रहे को देखते रहना, प्रत्येक घटना को परमात्मा की लीला मात्र समझना, उसमें स्वयं को नहीं उलझाना । इस शरीर को मन सहित 11 इन्द्रियां परमात्मा ने दी है । पाँच ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग न करना परमात्मा के आशीर्वाद और उनकी आज्ञा का उल्लंघन है परन्तु पाँच कर्मेन्द्रियों और एक मन को नियंत्रण में रखना प्रत्येक व्यक्ति का निजी दायित्व है ।

                    ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग करते हुए कर्मेन्द्रियों और मन को नियंत्रण में रखना ही साक्षी-भाव है । नेत्रों से न देखना, कानों से न सुनना, घ्राण शक्ति को दबा देना, रसनेन्द्रिय से स्वाद को न लेना तथा त्वचा से स्पर्श के अनुभव करने को नकार देना स्पष्ट रूप से परमात्मा की आज्ञा का उल्लंघन है । परमात्मा ने ज्ञानेन्द्रियाँ दी ही ज्ञान प्राप्त करने के लिए और हम इन इन्द्रियों के कार्य से स्वयं को विमुख कर ले तो फिर ज्ञान कैसे प्राप्त करेंगे ? हमें मानव जीवन मिला ही इसीलिए है कि हम आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हो और आत्म-ज्ञान तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब ज्ञानेन्द्रियों का समुचित उपयोग किया जाये ।

         हम लोग प्रायः साक्षी और द्रष्टा होने को समानार्थी समझ लेते हैं । साक्षी होना द्रष्टा होने से पूर्व की अवस्था का नाम है । साक्षी होने पर आप इस भौतिक संसार में बने तो रहते हैं परन्तु इसकी गतिविधियों में रत (Involve) नहीं होते हैं, किसी प्रकार का कोई हस्तक्षेप नहीं करते हैं । साक्षी होने का अर्थ संसार से पलायन कर जाना कतई नहीं है बल्कि संसार में रहते हुए उसकी प्रत्येक गतिविधि को बिना किसी भेद-भाव के देखते रहना है; जैसे कि आप किसी सिनेमा हाल में एक चलचित्र देख रहे होते हो । चलचित्र को हम इसके निर्माण-कर्ता की कृति और कलाकारों का अभिनय समझकर उसमें रत नहीं होते हैं, उसी प्रकार संसार में हो रहे प्रत्येक घटनाक्रम को उसके निर्माण-कर्ता की कृति, उस परम पिता की लीला समझना ही साक्षी होना है । 

                    जब हम चलचित्र के किसी एक पात्र में स्वयं को देखने लगते हैं, तब हम उस चलचित्र में रत हो जाते हैं । ऐसे में हमें चलचित्र में घटित होने वाली प्रत्येक घटना निश्चित ही प्रभावित करेगी । वास्तविकता में वहां कोई सत्य घटना घटित न होकर कलाकार का अभिनय मात्र होता है और कलाकार भी अभिनय, उस चलचित्र के निर्माता/निर्देशक की योजना के अनुसार ही करता है ।

             इस संसार में हम जितनी भी घटनाएँ घटित होती देख रहे हैं, वे सभी परमात्मा की एक निश्चित योजना के अनुसार ही घटित हो रही है और उसी परमपिता की योजना के अनुसार ही हम सब को अभिनय करने के लिए हमारे प्रत्येक जीवन में एक नए पात्र की भूमिका मिलती है । हमें केवल स्वयं को मिली उस भूमिका को ही निभाना होता है और वह भी बड़ी संजीदगी के साथ । हमें इस संसार में घटित होने वाली घटनाएँ तभी प्रभावित कर सकती हैं जब हम उन घटनाओं को लीला न मानकर वास्तविकता समझ बैठते हैं । ऐसा तभी होता है जब हम किसी घटना को एक पक्षीय होकर देखते हैं । इस प्रकार कहा जा सकता है कि एक पक्षीय होने से हम कभी भी साक्षी नहीं हो सकते । साक्षी होने के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक  घटना को निरपेक्ष-भाव से देखा जाय और उसको परमात्मा की लीला मात्र समझा जाय ।

      अष्टावक्र महाराज राजा जनक को कह रहे हैं –

न त्वं विप्रादिको वर्णों नाश्रमी नाक्षगोचरः ।

असंगोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव ।। अष्टावक्र गीता - 1/5 ।।

    अर्थात हे जनक, तुम ब्राह्मण आदि जातियों वाले नहीं हो । न तुम वर्णाश्रम आदि धर्मों वाले हो । न तुम चक्षु आदि इन्द्रियों के विषय हो, किन्तु तुम इन सबके साक्षी और असंग हो एवं तुम आकार से रहित हो और सम्पूर्ण विश्व के साक्षी हो । ऐसा अपने को जानकर सुखी और संसार रुपी ताप से रहित हो जाओ ।

               अष्टावक्र जी का यह कहना कि तुम किसी विशेष जाति अथवा वर्ण के नहीं हो और न ही तुम नेत्र आदि इन्द्रियों के विषय हो, न तुम किसी विशेष आकार के हो; इसका अर्थ है कि जाति, वर्ण, इन्द्रिय-विषय और आकार ये सभी शरीर के साथी है । आत्मा इन सबसे अलग है, असंग है । हमें मिलने वाला शरीर प्रत्येक नए जीवन में बदलता रहता है । आज मेरा यह भौतिक शरीर एक ब्राह्मण का है, अगले जन्म में ब्राह्मण के शरीर की तो बात ही क्या, यह भी पता नहीं है कि मनुष्य का भी शरीर मिल पायेगा अथवा नहीं । अतः स्वयं को शरीर न समझकर आत्मा समझो । आत्मा केवल साक्षी है । आत्मा शरीर, उसकी जाति, उसके वर्ण और आकार आदि को साक्षी भाव से देखती अवश्य है परन्तु शरीर से सदैव असंग बनी रहती है । 

                 जब आप स्वयं को शरीर समझने लगते हो, समस्या तभी पैदा होती है अन्यथा आत्मा को इन सब से क्या प्रयोजन ? आप आत्मा हैं, शरीर नहीं हैं, इस बात को स्वीकार कर लेने से ही व्यक्ति में साक्षी-भाव आ सकता है अन्यथा नहीं । साक्षी-भाव के कारण न तो आप किसी भोग-कर्म के प्रति आसक्त हो सकते हो और न ही उससे विरक्त । जो न आसक्ति है और न ही विरक्ति, बल्कि इन दोनों के मध्य जो है, वही अनासक्ति है ।

         आत्मा साक्षी है अर्थात् आप स्वयं जिसे ‘मैं’ कहते हैं, वह साक्षी है । साक्षी समस्त संसार और उसके कार्यकलापों को निरपेक्ष भाव से देखता है । साक्षी केवल स्वयं को नहीं देखता । जिस दिन वह स्वयं को भी देखने लग जायेगा उसे साक्षी से द्रष्टा होने में तनिक भी देर नहीं लगेगी । आत्मा साक्षी है, परमात्मा दृष्टा है । साक्षी वह कलाकार है, जो अभिनय तो करता है परन्तु अभिनीत पात्र से उसका कोई सरोकार नहीं रहता । दृष्टा रंगमंच का निर्माण करने वाला है । उसने रंगमंच का निर्माण कर दिया और उस पर स्वयं ही विभिन्न रूप धर कलाकार बन कर अभिनय करने हेतु प्रस्तुत हो गया है, एकाकी अभिनय करने के लिए । कहने का अर्थ है कि वह स्वयं ही रंगमंच बन गया है और स्वयं ही कलाकार । इस प्रकार वह स्वयं को ही देख रहा है क्योंकि रंगमंच भी स्वयं का है और अभिनय करने वाला कलाकार भी वह स्वयं ही है । इसी कारण से उसे साक्षी न कहकर दृष्टा कहा जाता है अर्थात स्वयं को देखने वाला । अंततः मनुष्य का शरीर प्राप्त करने का हमारा उद्देश्य भी तो साक्षी से दृष्टा बनना है ।

           द्रष्टा बनने का प्रयास करने से पूर्व साक्षी बनना होगा । इस मनुष्य शरीर के रहते-रहते साक्षी  बन गए तो भी बहुत बड़ी उपलब्धि होगी । परन्तु साक्षी होना अनासक्त होने के एक-एक सूत्र को समझकर अपनाने से ही संभव होगा । जिस दिन आप साक्षी-भाव में आ गए, समझ लो आप में अनासक्ति आ गयी और आप अनासक्त हो गए । 

             एक बार के लिए विरक्त हो जाना सबसे सरल है परन्तु सदैव के लिए विरक्त बने रहना सबसे कठिन है । आसक्ति की जब अति हो जाती है, तब व्यक्ति विरक्ति की तरफ मुड़ जाता है परन्तु यह विरक्ति इसलिए अस्थायी रहती है क्योंकि इन्द्रियों को बल पूर्वक दबाया गया है, सोच-समझ कर नियंत्रित नहीं किया गया है । अति आसक्ति जब दुखदायी हो जाती है, तब व्यक्ति अस्थायी रूप से विरक्ति की तरफ चला जाता है । प्रत्येक भोग प्रारम्भ में अमृत तुल्य प्रतीत होता है परन्तु अंत में दुःख देने वाला ही होता है । यह बात हम अल्प समय के लिए तो समझ लेते हैं परन्तु उसी भोग के पुनः सामने आते ही इस बात को विस्मृत कर बैठते हैं ।

भीतर काम-भोग का भाव जीवित है और ऊपर से दिखावा कर रहे हैं, काम को जीत लेने का । देव ऋषि नारद ने भी एक बार काम को जीत लिया था परन्तु उस काम विजय का उन्हें अभिमान हो गया था । परमात्मा की इच्छा नहीं थी कि उनका भक्त पतन की राह पर अग्रसर हो । उन्होंने देवर्षि को पतन से बचाने के लिए कुछ लीला की । देवर्षि नारद के समक्ष काम-भोग की परिस्थितियाँ बनते ही भीतर दबा काम-भाव पुनः सतह पर आ गया । हम तो साधारण मानव है, हमें कौन रोकेगा ? इस पतन से । हमारे समक्ष एक ही रास्ता है, आसक्ति से बचें और अनासक्त हो जाएँ । इसलिए अनासक्ति के प्रत्येक सूत्र पर चलते हुए बिना किसी अहंकार के साक्षी-भाव को उपलब्ध हो जाएँगे, तभी अनासक्त हो पाएंगे अन्यथा नहीं ।

अब प्रश्न यही उठता है कि अनासक्ति और विरक्ति दोनों में से कौन सी स्थिति अधिक महत्वपूर्ण है अर्थात हमें विरक्त होना चाहिए अथवा अनासक्त ? विरक्ति और अनासक्ति दोनों ही महत्वपूर्ण है और दोनों ही आपके उत्थान में सहायक हैं । अगर मुझे इन दोनों में से किसी एक को चुनने का कहा जाये तो मैं अनासक्ति का चुनाव करूँगा । क्यों ? क्योंकि ……,। आगे बढ़ने से पहले चलिए ! एक कहानी सुनिए । इस कहानी से इस ‘क्यों’ का उत्तर मिल जाएगा ।

          विरक्ति और अनासक्ति दोनों में से अनासक्ति को ही क्यों चुनें ?  स्पष्ट करने के लिए पहले एक कहानी सुनाता हूँ । एक विरक्त तपस्वी ने कई वर्षों तक तप किया, मोक्ष प्राप्ति के लिए । आखिर एक दिन उसका भौतिक शरीर छूटा और जीवात्मा पहुँच गया धर्मराज के यहाँ । धर्मराज ने उसके कर्मों का लेखा-जोखा देखकर उसे स्वर्ग ले जाने का आदेश दिया । जीवात्मा तो मोक्ष चाहता था अतः उसने प्रतिवाद किया । जीवात्मा ने कहा कि ‘मैंने बहुत काल तक तप किया है, मैं तो मोक्ष का अधिकारी हूँ । मुझे स्वर्ग ही क्यों ?’ 

           धर्मराज ने कहा, ‘बिलकुल सत्य है कि आपने कठोर तप किया है परन्तु केवल कठोर तप आपको मोक्ष नहीं दिलवा सकता । इन्द्रियों से ज्ञान प्राप्त करने और कर्म करने के स्थान पर आपने उनको दबाकर, उनका दमन करते हुए तप किया है । आपने स्वयं  के लिए इतना सब कुछ किया है, जबकि यह शरीर परमात्मा ने आपको संसार की सेवा करने के लिए, परमार्थ के लिए दिया है, न कि केवल स्वयं की स्वार्थ-सिद्धि के लिए । अगर आपको मोक्ष ही प्राप्त करना है तो इसके लिए सर्वप्रथम आप स्वर्ग को भोगिये और फिर मनुष्य योनि प्राप्त कर संसार की सेवा कीजिये, तभी आप मोक्ष प्राप्त करने के अधिकारी बन पायेंगे ।’

         अध्यात्म-पथ पर अग्रसर प्रत्येक व्यक्ति की ऐसी ही स्थिति है । संसार की सेवा करने का विचार त्यागकर केवल इन्द्रियों को दबाने में लगे हुए हैं और इन्द्रियां है कि दबती ही नहीं है । ब्रह्मलीन स्वामी श्री रामसुखदासजी महाराज साफ़-साफ़ कहा करते थे ‘संसार की सेवा करो और पिंड छुडाओ ।’ सुनने में बड़ी साधारण सी बात लगती है परन्तु बड़ा गूढ़ सार है उनकी कही इस बात में । 

               इन्द्रियां दबती नहीं है । इनको चाहे जितना दबा लो, हमसे ये दबेगी भी नहीं । ऐसे में विरक्त होना छोड़ कर इन्द्रियों का समुचित उपयोग (कर्म) करते हुए संसार की नि:स्वार्थ भाव से सेवा करने में लग जाओ, अनासक्ति स्वयं ही आ जाएगी । भगवान श्री कृष्ण भी गीता में यही बात कहते हैं कि कर्म न करने से; कर्म करना उचित है (गीता-3/8) । एक मनुष्य के लिए विरक्त होने से अच्छा है कि वह संसार की सेवा करने के लिए अनासक्त होकर कर्म करे ।

           आसक्ति का कैसा प्रभाव होता है, यह आप स्वयं ही देख लीजिये । ‘आसक्ति से अनुरक्ति’ की राह में चलते हुए ‘अनासक्ति’ विषय पर ही आकर अटक गया हूँ । लिखने की मेरी आसक्ति इतनी अधिक प्रबल हो गयी है, जो एक छोटे से लेकिन महत्वपूर्ण विषय को स्पष्ट करने के लिए इतना अधिक विस्तार दे दिया है । इसी प्रकार जब हम किसी भोग को एक बार भोग लेते हैं, तब उसको बार-बार भोगने की इच्छा जाग्रत होकर बढ़ती जाती है । यह बार-बार भोग प्राप्त करने के लिए मनुष्य का कर्म करने को विवश होना ही आसक्ति है । एक बार त्याग पूर्वक भोगना अर्थात मन में बार-बार भोगने की इच्छा नहीं रखना ही हमें आसक्ति से दूर रख सकता है ।

         इस श्रृंखला में आगे बढ़ने  से पहले मैं आपको पुनः उसी दृष्टान्त की ओर लिये चलता हूँ, जिसमें तीन बौद्ध भिक्षुक भिक्षा प्राप्त करने के लिए एक गाँव की ओर जा रहे होते हैं । गाँव में प्रवेश करने से पहले एक नदी को पैदल ही पार करना पड़ता है क्योंकि पार जाने के लिए नदी के इस किनारे पर नाव आदि की कोई व्यवस्था नहीं है । नदी के किनारे पर बैठी सुकुमारी की हिम्मत नहीं हो रही है, बिना किसी सहारे के नदी को पार करने की । वह एक-एक कर प्रत्येक बौद्ध भिक्षु से हाथ पकड़ कर नदी पार करने का आग्रह करती है । 

         पहला भिक्षुक विरक्त है, उस पर उस कन्या की अनुनय-विनय का कोई प्रभाव नहीं पड़ता और वह उसको अनदेखा कर अपने मार्ग पर आगे बढ़ जाता है । दूसरा भिक्षुक उस कन्या की बात को सुनता और समझता तो है परन्तु वह साधना-पथ पर है और मानता है कि एक लड़की का हाथ पकड़ने से उसके भीतर काम-भाव जाग्रत हो सकता है । वह तो इन्द्रियों का दमन करने में लगा हुआ है । वह इस कन्या के आग्रह को साधना-मार्ग से विचलित करने का एक प्रलोभन समझता है और वह उस प्रलोभन के जाल में फंसना नहीं चाहता है । वह उस कन्या की विनती को ठुकरा देता है । तीसरा भिक्षुक उस कन्या की विनती को स्वीकार करता है और उसका हाथ पकड़ कर उसे भी नदी पार करवा देता है । नदी के उस पार जाकर वह उसका हाथ छोड़ अपने रास्ते चल देता है और उस घटना को पुनः याद ही नहीं करता है, परन्तु दूसरा भिक्षुक वह दृश्य भूला नहीं पाता है । उस भिक्षुक को वह दृश्य बार-बार याद आता है और वह उस दृश्य में तीसरे भिक्षुक का पतन देखता है ।

      प्रश्न यह उठता है कि इन तीनों भिक्षुओं में कौन सा भिक्षु सही मार्ग पर है । सतही तौर से देखा जाये तो तीनों भिक्षुक ही सही हैं परन्तु आसक्त भिक्षु अर्थात दूसरे भिक्षु को इन्द्रियों का दमन करने के स्थान पर उनका उचित उपयोग करना चाहिए अथवा प्रथम भिक्षुक की तरह विरक्त हो जाना चाहिए । प्रथम भिक्षु का विरक्त होना उचित है परन्तु यह विरक्ति स्वयं के स्वार्थ के लिए है । स्वयं की स्वार्थ-पूर्ति के लिए किया गया कार्य केवल कर्म-योग से विमुख होना ही प्रदर्शित करता है । कर्म-योग से विमुख होना परमात्मा के द्वारा दिए गए मानव शरीर का अपमान करना है । मनुष्य को यह भौतिक शरीर कर्म करने के लिए ही दिया गया है । साथ ही साथ यह आवश्यक है कि इस शरीर से कर्म भी निस्वार्थ भाव से केवल संसार की सेवा के लिए ही किये जाएँ ।

             इतने विवेचन के बाद हम पाते हैं कि केवल तीसरे और अंतिम भिक्षुक ने ही भगवान बुद्ध का सही मार्ग अपनाया है – ‘मंझिम निकाय’, इन्द्रियों का समुचित उपयोग करते हुए कर्म करना । न आसक्ति और न ही विरक्ति बल्कि अनासक्त होकर कर्म करना । भगवान श्री कृष्ण भी गीता में अर्जुन को यही बात कह रहे हैं -

  यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेSर्जुन ।

   कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ।। गीता-3/7 ।।

अर्थात हे अर्जुन ! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है ।

           हम आसक्ति को पीछे छोड़कर अनासक्ति की ओर आते हुए संक्षेप में अब तक हुए विवेचन से निकले सार को बताते चलते हैं । जितनी अधिक आसक्ति होती है, व्यक्ति व्यथित होकर उतनी ही अधिक विरक्ति की और चला जाता है । परन्तु यही विरक्ति जब व्यक्ति को स्वयं के अकेले पड़ जाने के रूप में खलती है, तब वह पुनः उतनी ही अधिक आसक्ति की ओर चला जाता है । यही मनुष्य के सुख-दुःख का कारण है । एक गृहस्थ जीवन भी इसी प्रकार आसक्ति और विरक्ति के मध्य एक दोलक की भांति दोलन करता रहता है, मध्य में रूक नहीं पाता । मध्य में रुकने के सूत्र जो इस श्रृंखला में मंथन के उपरांत निकल कर सामने आये हैं, वे हैं -  

प्रथम सूत्र - निष्ठा पूर्वक कर्तव्य कर्म को करते रहना ।

दूसरा सूत्र - किसी में भी दोष न देखना ।

तीसरा सूत्र - ‘मैं और मेरा’ की भावना का त्याग ।

चौथा सूत्र - संतुष्टि पूर्ण जीवन ।

पांचवां सूत्र - सहिष्णुता, विरोध को सहन करना ।

छठा सूत्र - कामनाओं पर नियंत्रण रखना ।

सातवाँ सूत्र - किसी से कोई आशा/अपेक्षा न रखना ।

आठवाँ सूत्र -साक्षी-भाव ।

           अनासक्ति के इन आठ सूत्रों से एक ही अभिप्राय है, मन पर नियंत्रण । केवल आठ ही क्यों, अगर हम अधिक गहराई से और सूक्ष्म रूप से विश्लेषण करें तो कुछ और भी सूत्र निकल कर हमारे सामने आ सकते हैं । इनमें से किसी एक सूत्र को आत्म-सात करते हुए आसक्ति से स्वयं को दूर रखा जा सकता है । सभी सूत्र आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए हैं । किसी भी एक सूत्र को पकड़ लेने से समस्त आठों सूत्र सध जाते हैं, ऐसा मेरा मानना है । 

        एक गृहस्थ को न तो आसक्त होना चाहिए और न ही विरक्त । उसके लिए मध्यम मार्ग ही उपयुक्त है । अनासक्ति अर्थात पूर्व जन्म के संस्कारों से मिलने वाले इन्द्रियों के सुख को त्याग-पूर्वक भोगना, उन भोगों के प्रति आसक्त नहीं होना और न ही उन भोगों से डर कर दूर भाग कर विरक्त होना । समस्त इन्द्रियों का समुचित उपयोग करते हुए संसार की सेवा करें और आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हों, वास्तविक अनासक्ति यही है ।

          एक गृहस्थ के लिए विरक्त होने के स्थान पर अनासक्त होना सरल है । अनासक्ति से ही अनुरक्ति की राह निकलती है । अपने बनाए संसार के घेरे को तोड़कर बाहर निकलना ही ‘आसक्ति से अनुरक्ति की ओर’ चलना है ।

           आसक्ति से अनासक्त हो जाना इतना सरल नहीं है परन्तु अनासक्ति से अनुरक्ति तक पहुँचना तुलनात्मक दृष्टि से सुगम है । मनुष्य के जीवन में आ रही समस्त समस्याओं की जड़ में आसक्ति ही है । आसक्ति का त्याग कर या तो विरक्ति में जाया जा सकता है अथवा फिर अनासक्त होकर मन की चंचलता को नियंत्रित कर लिया जाता है । मन की चंचलता ही प्रायः आसक्ति को विरक्ति में ले जाती है परंतु ऐसी विरक्ति आसक्ति का ही दूसरा रूप होती है । मन की चंचलता के कारण ऐसी विरक्ति भी आसक्ति के त्याग का प्रदर्शन मात्र बन कर रह जाती है । ऐसी विरक्ति कब आसक्ति में पुनः परिवर्तित हो जाती है, पता ही नहीं चलता । 

              मन की चंचलता ही मनुष्य को विपरीत परिस्थिति में अस्थाई रूप से विरक्त तो कर देती है परन्तु थोड़ी सी अनुकूलता मिलते ही व्यक्ति विरक्ति का चोला उतारकर पुनः संसार में आसक्त हो जाता है । इसलिए कहा जा सकता है कि ऐसी विरक्ति आत्मिक स्तर पर नहीं हुई है बल्कि यह केवल मन की उठापटक मात्र ही है । संसार में रहते हुए (जहां पर आसक्त होने के अनगिनत साधन हैं) विरक्ति में जाना लगभग असम्भव है । यदि संसार के एक स्थान को छोड़कर अन्यत्र जैसे वन आदि में चले भी जाएंगे तो भी सांसारिक आसक्तियां पीछा छोड़ने वाली नहीं है । संसार बाहर से छोड़ने पर विरक्ति नहीं आती बल्कि स्थायी विरक्ति के लिए तो संसार को भीतर से त्यागना पड़ता है । फिर संसार में रहते हुए भी कमल के पत्ते के जल में तैरते हुए भी जल से निर्लिप्त बने रहने की तरह हम भी संसार में रहते हुए भी उसमें लिप्त नहीं होंगे ।

             अनासक्ति भी ऐसी ही अवस्था का नाम है, जिसमें मनुष्य संसार में रहते हुए भी निर्लिप्त रहता है । अनासक्त जीवन आपको संसार से मुक्त भले ही करदे परन्तु परमात्मा की तरफ़ जाना है तो वह इससे भी आगे की यात्रा है । हम अनासक्त होकर सांसारिक आसक्ति को बहुत पीछे छोड़ आए हैं । अब हमें अपने भीतर परमात्मा के प्रति आसक्ति पैदा करनी होगी । परमात्मा के प्रति आसक्ति को ही अनुरक्ति कहा जाता है । आसक्ति से अनुरक्ति की ओर जाने के लिए अनासक्ति तो मध्य का एक पड़ाव मात्र है । इसलिए अनासक्त होकर ही सन्तुष्ट नहीं होना है बल्कि पूर्व की सांसारिक आसक्ति को भविष्य की अनुरक्ति में बदलना होगा । प्रश्न है कि अनासक्ति अनुरक्ति में कैसे परिवर्तित होगी ?

               मन की चंचलता पर नियंत्रण होते ही व्यक्ति आसक्त से अनासक्त हो जाता है । मन की चंचलता नियंत्रित होती है, बुद्धि में उपजे ज्ञान से । इस ज्ञान (विवेक) का सदुपयोग कर सांसारिक आसक्ति की दिशा बदल कर उसे परमात्मा की ओर मोड़ा जा सकता है । इसके लिए सांसारिक आसक्ति का अत्यंत अभाव होना आवश्यक है । समस्या यही है कि अनासक्त जब परमात्मा के प्रति आसक्त होने का प्रयास करता है तब न जाने कब वह पुनः संसार में आसक्त हो जाता है, इसका पता ही नहीं चलता । इसका कारण है, मन का बुद्धि पर पुनः प्रभावी हो जाना । इसलिए अनुरक्ति के लिए सांसारिक आसक्ति का पूर्ण रूप से मिट जाना आवश्यक है ।

        स्वामी शरणानंदजी महाराज कहते हैं - “आसक्ति का अत्यन्त अभाव हुए बिना अनुरक्ति के साम्राज्य में प्रवेश ही नहीं होता ।” आसक्ति का अत्यन्त अभाव होगा, विवेक का सदुपयोग करने से । हमें विचार करना होगा कि हमने संसार में आसक्त होकर दुःख के अतिरिक्त पाया ही क्या है ? विचार से ही विवेक पैदा होता है और विवेक से ही अनासक्त हुआ जा सकता है अन्यथा तो अज्ञान के अंधकार तले अनासक्ति की राह मिलनी असंभव है । 

                स्वामी शरणानंदजी महाराज जिस अनुरक्ति की बात करते हैं स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज ने उसको परमात्मा से ‘अपनापन’ कहा है । हम धन-सम्पति, पत्नी, पुत्र-पुत्री को ‘अपना’ कहते हैं, यह हमारा सांसारिक मोह है, आसक्ति है । जब यही आसक्ति परमात्मा के प्रति हो जाती है, तब परमात्मा ही अपने लगने लगते हैं । यही परमात्मा के प्रति ‘अपनापन’ रखना है । इस प्रकार हमें केवल आसक्ति की दिशा बदलनी है । आसक्ति हट जाने का नाम अनासक्ति है और उसकी दिशा परिवर्तन का नाम अनुरक्ति अथवा परमात्मा से अपनापन है । इस प्रकार स्पष्ट है कि संसार के प्रति आसक्ति का अत्यन्त अभाव ही हमें परमात्मा के प्रति अनुरक्त होने की ओर ले जाता है ।

           प्रायः प्रश्न उठता है कि परमात्मा से अपनापन कैसे हो ? जब तक हम स्वनिर्मित संसार को अपना कहते रहेंगे तब तक परमात्मा से अपनापन नहीं हो सकता । दो नावों में पैर रखकर नदी के पार नहीं हुआ जा सकता । सहारा/आश्रय तो एक का ही लेना पड़ेगा, चाहे संसार का लें अथवा परमात्मा का । सीधा परमात्मा का आश्रय ले लें तो सर्वोत्तम है, जोकि भक्ति-मार्ग है परन्तु एक गृहस्थ के लिए सीधा परमात्मा का आश्रय लेना जरा असम्भव सा है । उसके लिए तो संसार में रहते हुए, अपना कर्तव्य निभाते हुए अनासक्त होना ही सम्भव है । इसलिए एक गृहस्थ के लिए अनासक्ति तक पहुंचने के लिए ज्ञान-कर्म मार्ग ही उचित मार्ग है । अनासक्ति से फिर अनुरक्ति की राह निकलती है और परमात्मा में ‘अपनापन’ होना सम्भव हो जाता है ।

          आसक्त व्यक्ति को जब तत्वज्ञान हो जाता है तब वह संसार से विमुख होकर विरक्त हो जाता है । इसी प्रकार अनासक्त होकर संसार में रहने वाला व्यक्ति भक्ति की राह पकड़कर परमात्मा के प्रति अनुरक्त हो जाता है । सबसे बड़ी समस्या तो संसार से आसक्ति समाप्त करने की है । भक्ति-मार्ग से इस आसक्ति की दिशा परिवर्तित की जा सकती है और परमात्मा से अपनापन होना सम्भव हो जाता है । 

           लंका में रहते हुए भी विभीषण भगवान श्रीराम की भक्ति में लीन थे । जब भाई से ममत्व समाप्त हुआ तब वे भगवान के शरणागत हुए । मानस में गोस्वामीजी ने इसका वर्णन बड़े ही सुंदर ढंग से किया है । भगवान से अपनापन करने के लिए क्या किया जाना चाहिए, इसको स्वयं भगवान ने स्पष्ट किया है ।

                भगवान श्रीराम मानस में कहते हैं -

 जननी जनक बंधु सुत दारा । तनु धनु भवन सुहृद परिवारा ।।

  सबके ममता ताग बटोरी । मम पद मनहि बाँध बरि डोरी ।।

  समदर्शी इच्छा कछु नाहीं । हरष सोक भय नहिं मन माहीं ।।

 अस सज्जन मम उर बस कैसें । लोभी हृदयं बसइ धनु जैसें ।।

                        -सुन्दरकाण्ड - 48/4-7

          माता, पिता, भाई, पुत्र, पत्नी, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार - इन सबके ममत्व रूपी तागों को बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बनाकर उसके द्वारा जो अपने मन को मेरे चरणों में बांध देता है अर्थात् सारे सांसारिक सम्बंधों का केंद्र मुझे बना लेता है, जो समदर्शी है, जिसकी कोई इच्छा नहीं है और जिसके मन में हर्ष, शोक और भय नहीं है । ऐसा सज्जन मेरे हृदय में कैसे बसता है ? जैसे लोभी के हृदय में धन बसता है ।

         ‘चमड़ी जाय पर दमड़ी न जाय’ एक प्रसिद्ध कहावत है । धन को अपना मानने वाले लोभी व्यक्ति की यही स्थिति है । जैसे लोभी के मन में धन बसता है वैसे ही परमात्मा को अपना कहने वाला परमात्मा में बसता है । तुलसी मानस के समापन में कहते है - ‘……लोभी प्रिय जिमि दाम ।…’ जैसे लोभी व्यक्ति को धन प्रिय लगता है, वैसे ही हे राम ! आप मुझे प्रिय लगें । 

            भगवान कहते है कि संसार में जिनको आप अपना कहते हैं, उन सबको अपने मन सहित मेरे चरणों में डाल दो । हम जब अपने केंद्र में परमात्मा को रखेंगे तब सब कुछ परमात्मा का ही होगा । फिर एक परमात्मा ही अपने होंगे, दूसरा कोई अपना नहीं होगा । यही परमात्मा से अपनापन है ।

           स्वामीजी ‘परमात्मा से अपनापन’ को स्पष्ट करते हुए प्रत्येक बार मीरा बाई का उदाहरण देते हैं । मीरा बाई कहती है - ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’ । यहाँ तो दूसरों को भी अपना माने बैठे हैं, फिर मीरा बाई की स्थिति में कैसे पहुंचेंगे ? हम तो इस  संसार के बने बैठे हैं । हम यह नहीं जानते कि संसार में हो रहे परिवर्तन को देखने वाला स्वयं अपरिवर्तनीय है । न बदलने वाला ही बदलाव का अनुभव कर सकता है, ऐसे में हम संसार के कैसे हुए ? हम शरीर के बदलने का अनुभव कर रहे हैं, इसका अर्थ है कि हम शरीर नहीं हैं । फिर इस शरीर और शरीर से संबंधित व्यक्ति, विषयों और पदार्थों को अपना क्यों कहते हैं ? इस बात का ज्ञान होते ही परिवर्तित हो रहे संसार से तो आसक्ति की समाप्ति और अविनाशी परमात्मा में अनुरक्ति हो जाएगी ।

            केवल एक परमात्मा ही अपरिवर्तनशील है इसलिए हम परमात्मा से एक हैं और प्रतिपल बदलने वाले संसार से भिन्न हैं । जिस प्रकार हम संसार के मोह में फँसकर आसक्त हुए बैठे थे, इस बात का ज्ञान होते ही संसार से अनासक्त होकर परमात्मा से प्रेम करने लगेंगे । परमात्मा से प्रेम करना, उन्हें अपना मानना और उनसे अपनापन होना ही अनुरक्ति है ।

           आसक्ति होती है, ‘नहीं’ को ‘है’ मान लेने के कारण । इसका अर्थ यह नहीं है कि ‘नहीं’ अलग है और ‘है’ अलग है । ‘नहीं’ भी ‘है’ है परन्तु जिस रूप में हम ‘नहीं’ को ‘है’ मान बैठे हैं, उस रूप में वह ‘है’ नहीं है । हम संसार के बदलाव और चमक दमक को ‘है’ मान बैठे हैं, वास्तव में वह चमक दमक संसार की नहीं है, इसीलिए इसको ‘नहीं’ कहा गया है । इस ‘नहीं’ में जो चमक दमक है, वह ‘है’ के कारण है । इस प्रकार यदि ‘नहीं’ की चमक दमक में आसक्त न होकर उसमें ‘है’ को देखेंगे तो ‘नहीं’ भी ‘है’ हो जाएगा ।

          शरीर और जगत् ‘नहीं’ है क्योंकि जैसे आज हैं, वैसे कल नहीं रहेंगे । परमात्मा और हम जैसे आज हैं वैसे ही कल रहेंगे इसलिए ये ‘है’ हैं । शरीर में इंद्रियाँ है । सभी इंद्रियां भी शरीर की तरह ‘नहीं’ के अन्तर्गत ही है ।‘नहीं’ से नहीं ही दिखलाई देगा परन्तु उस दिखलाई पड़ने वाले को ‘है’ मान लेने के कारण ही हम उस दृश्य में आसक्त हो जाते हैं । दृश्य जो देखा गया है वह सत्य नहीं है, यहाँ तक कि जब दृश्य पर दृष्टि पड़ी और उस दृश्य को मस्तिष्क द्वारा देखा गया, तब तक वह दृश्य वैसा नहीं रहा, जब उस पर दृष्टि पड़ी थी । ऐसे में उसे ‘है’ कैसे कहा जा सकता है ?

           दूसरी बात, जो कुछ हम देखना चाहते हैं अथवा सुनना, स्पर्श करना, सूंघना या स्वाद लेना चाहते हैं, हमारी आसक्ति वैसा ही अनुभव करा देती है । इसका अर्थ है कि हम हमारी आसक्ति से संचालित हो रहे हैं, जबकि हम जानते हैं कि अपनी आसक्ति के कारण जिसके पीछे पड़े हैं वह सब भी ‘नहीं’ होता जा रहा है । फिर ऐसे ‘नहीं’ के साथ रहकर क्या हम शान्ति को प्राप्त कर सकते हैं ? इस प्रश्न का उत्तर स्वयं को पहचान लेने से अर्थात अनुभूति होने से पूर्व किसी को नहीं मिलने वाला । 

            हम सब ‘नहीं’ से ही प्रेम करने लगे हैं । वास्तव में यह प्रेम न होकर हमारे स्वार्थ के कारण उनमें हमारी आसक्ति है । आसक्ति को प्रेम का नाम नहीं दिया जा सकता । प्रेम विनाशी और परिवर्तनशील के साथ हो ही नहीं सकता । उनके साथ किया गया प्रेम आज है, कल नहीं रहेगा । हमने संसार, उसके व्यक्तियों, वस्तुओं में मोह/आसक्ति को प्रेम का नाम दे दिया है, यह ग़लत है । सांसारिक मोह के कारण ही हम दूसरों को ‘अपना’ कहने लगे हैं ।  वास्तव में वे अपने न तो पूर्व में कभी थे, न आज हैं और न भविष्य में कभी अपने होंगे । 

           आसक्ति/राग जिसको हमने ‘प्रेम’ नाम दे रखा है, वास्तव में वह अपना स्वार्थ है । जिस समय स्वार्थपूर्ति में बाधा आएगी, यही प्रेम (राग) द्वेष में परिवर्तित हो जाएगा । राग का विलोम द्वेष है क्योंकि दोनों में ही दो का अस्तित्व बना रहता है । प्रेम का कोई विलोम शब्द नहीं है क्योंकि प्रेम में किसी दूसरे का स्थान ही नहीं है । 

       ‘प्रेम गली अति सांकरी, जाँ में दो न समाही ।

        जब ‘मैं’ था तब हरि नहीं, अब हरि है ‘मैं’ नाहीं ।।’

         प्रेम तो अविनाशी है और अविनाशी से किया गया प्रेम ही अनुरक्ति है । इसलिए संसार और शरीर सम्बंधियों को ‘मैं, मेरा और मेरे लिए’ मानना छोड़कर अनासक्त हो जाएं और फिर अपनी ऊर्जा को परमात्मा से अपनापन करने में समर्पित कर दें । ऊर्जा भी परमात्मा की तरह अनादि और अविनाशी है । आसक्ति को छोड़ अनासक्त होकर जो ऊर्जा बचाई है, उसको अनुरक्ति में समर्पित कर दें, जीवन में ऐसा करना ही सर्वोत्तम है ।

             एक-दो पाठकों द्वारा ‘अनुरक्ति’ का  उदाहरण देने का अनुरोध किया गया है । मुझे इस बात का सदैव गर्व रहता है कि मैं उस राज्य से हूँ जहां परमात्मा में अनुरक्त भक्तों का इतिहास रहा है । सबसे बड़ा उदाहरण तो मीरां बाई का है । मेड़ता में जन्म लेकर पली-बढ़ी मीरां का विवाह मेवाड़ के राजकुमार भोजराज के साथ कर दिया गया था । फिर भी वे सदैव कहती रही कि ‘ जिनके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई’ । संसार से अनासक्त मीरां सदैव श्रीकृष्ण भक्ति में लीन रहती थी । परमात्मा के प्रति ऐसी अनुरक्ति का उदाहरण आज इक्कीसवीं शताब्दी में मिलना मुश्किल है ।

          मीरां बाई के अलावा मकराना की बालिका करमा बाई भी परमात्मा के प्रति अनुरक्त थी तभी तो जगन्नाथ को आज भी उसके खीचड़े का भोग रुचता है । पिता द्वारा स्वयं से पूर्व श्रीकृष्ण को ज़ीमाने का आदेश ही उनको परमात्मा के प्रति अनुरक्त कर गया । करमा ने भोजन तब तक नहीं किया जब तक भगवान ने साक्षात् प्रकट होकर उसका बनाया खीचड़ा नहीं खा लिया । ऐसी अबोध अनुरक्ति भी परमात्मा के दर्शन करा सकती है ।

         मांझवास (नागौर) की फूली बाई, राम-भक्ति में इतनी तल्लीन रहती थी कि उसकी थेपड़ियाँ (गोबर के कण्डे) दूसरी स्त्रियाँ चुरा ले जाती थी । जब वह गांव प्रधान से इस चोरी की शिकायत करती तो वे फूली से उसकी थेपड़ियों की पहचान बताने को कहते । तब वे एक ही बात कहती कि मेरी जिस भी थेपड़ी को हाथ लगाओगे, उससे राम-राम की धुन निकलेगी । फूली बाई की भगवान के प्रति अनुरक्ति की कल्पना कीजिए कि केवल उसके रोम-रोम  में ही राम-धुन नहीं बसी थी बल्कि जिसको भी उसने छुआ वह भी राममय हो गया ।

           आसक्ति के पीछे संसार और शरीर से मिलने वाला भोग-सुख है, जबकि परमात्मा से अनुराग होना उनसे प्रेम करना है । आसक्ति राग पैदा करती है जबकि संसार के प्रति वीतरागता से परमात्मा में अनुराग हो जाता है । राग आसक्ति है और अनुराग अनुरक्ति है । 

           परमात्मा में अनुकरणीय अनुरक्ति देखना हो तो सबसे बेहतरीन उदाहरण गोपियों का है । गोपियां घर का काम भी करती थी तो भी ध्यान श्रीकृष्ण में लगा रहता था । भागवतजी में एक अध्याय  गोपिका- गीत का है, जिसमें गोपियां श्रीकृष्ण को कहती हैं कि हम तुम्हारी बिना मोल की दासियां हैं । बिना मोल की दासियां कहने का अर्थ है कि वे कृष्ण से निश्छल और नि:स्वार्थ प्रेम करती थी । इतना प्रेम कि उनको अपने पति, घर के काम-काज, यहाँ तक कि कपड़े-लतों तक की भी सुध नहीं रहती थी । उनका परमात्मा के प्रति कोई शारीरिक और सांसारिक प्रेम नहीं था, उनका प्रेम तो अलौकिक था, दिव्य था । वे रात-दिन प्रेम-रस में भीगी रहती थी । वे स्वयं तक को भूल जाती थी, बस केवल एक कृष्ण …..। तभी कबीर ने प्रेम को इस प्रकार परिभाषित किया है - 

     प्रेम प्रेम सब कोई कहे, प्रेम न जाने कोय ।

     जा मारग साहिब मिले, प्रेम कहावै सोय ।।

     प्रेम की परिपूर्णता सेवा और त्याग में ही है । इन दो (सेवा और त्याग) गुणों के कारण ही गोपियां परमात्मा के प्रति अनुरक्त रही । सेवा और त्याग स्त्रियों में विशेष रूप से होते हैं क्योंकि उनका चित्त स्त्रैण होता है । उनमें श्रद्धा और विश्वास जन्मजात होता है, वे शीघ्र ही किसी पर विश्वास कर लेती हैं जिसके कारण कई दुष्ट व्यक्ति उनका नाजायज़ फ़ायदा उठाते हैं । 

        आज की बालिकाओं में स्त्रैण चित्त का निरन्तर अभाव होता जा रहा है, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण दिल्ली के जन्तर-मंतर पर परिलक्षित हुआ उनका व्यवहार है । इतना बुरा प्रदर्शन तो किसी गए गुजरे पुरुष का भी नहीं देखा गया है । ऐसे में शायद ही भविष्य में कोई परमात्मा में अनुरक्त मीरां देखने को मिले ।

भक्ति में तीन चीजें आवश्यक हैं - श्रद्धा और विश्वास, स्त्रैण चित्त तथा एकांत । स्त्रियों में प्रथम दो स्वाभाविक रूप से होते हैं परंतु उनका दुरुपयोग करने से वे सांसारिक सुखों में डूब जाती हैं । सही उपयोग करने से प्रथम दो को उपलब्ध हुआ साधक अनुरक्त हो जाता है, फिर एकांत उसे काट खाने को नहीं दौड़ता है क्योंकि एकांत में भी भगवान उसके साथ रहते हैं ।  इसलिए मीरा बाई भूतहा महल में भी भयग्रस्त नहीं हुई ।

         भक्ति में तीन चीजें आवश्यक हैं - श्रद्धा-विश्वास, स्त्रैण चित्त और एकांत । स्त्रियों में प्रथम दो स्वाभाविक रूप से होते हैं । महिलाएं स्त्रैण-चित्त होती हैं । उनमें संसार के प्रति अत्यधिक आसक्ति होती है । जब इस आसक्ति की दिशा पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाती है, तब वह परमात्मा में भी अत्यधिक अनुरक्त हो जाती है । स्त्रैण चित्त का दुरुपयोग करने से वे सांसारिक सुखों में डूब जाती हैं । सही उपयोग करने से प्रथम दो को उपलब्ध हुआ प्रत्येक साधक अनुरक्त हो जाता है, फिर एकांत उसे काट खाने को नहीं दौड़ता है । 

         जिस पुरुष भक्त का चित्त भी स्त्रैण हो जाता है, तब वह भी परमात्मा के प्रति गहरा अनुरक्त हो जाता है । वृंदावन में भक्त राधा का रूप धारण किए रखते हैं । बाह्य रूप बदलने से श्रीकृष्ण नहीं मिलने वाले, भीतर से राधा (स्त्रैन चित्त) होना आवश्यक है। चलिए ! चलते-चलते अनुरक्त संत के भी उदाहरण पर दृष्टि डाल लेते हैं । 

          रसखान की अनुरक्ति देखिए कि वे उसी भूमि पर फिर से जन्म लेना चाहते हैं जिस पर अवतरित होकर परमात्मा ने श्रीकृष्ण के रूप में बाल-लीला की । सूरदासजी को भला कौन भूल सकता है । हाथ पकड़ कर भगवान ने उन्हें वृंदावन तक पहुंचा दिया और फिर अन्तर्धान हो गए । तब अनुरक्त सूरदासजी के मुंह से बोल फूट पड़े -

         हाथ छुड़ाए जात हो, निबल जान कर मोय ।

         हिरदै से जब जाओगे, तब जानूँगो तोय ।।

      क्या हम अभी भी अनुरक्ति को समझ नहीं पाए हैं ? अनुरक्ति को समझने के लिए सबसे पहले अपने भीतर श्रद्धा और विश्वास पैदा करें । श्रद्धा समर्पण कराती है और विश्वास अनन्य भक्ति । ऐसे में फिर अनुरक्ति से बंधे परमात्मा कहां जाएंगे, कैसे नहीं आएंगे ? इसलिए सदैव परमात्मा के प्रति श्रद्धा और विश्वास को दृढ़ रखें ।

सार - संक्षेप

        संसार में जीवों की असंख्य प्रजातियाँ है, यहाँ तक कि एक प्रजाति में भी आपको भिन्नता दृष्टिगोचर होगी । प्राणियों की सबसे बुद्धिमान प्रजाति का नाम है - मनुष्य । सभी जीवों में एक मात्र मनुष्य नाम का जीव ही ऐसा है जिसको कर्म करने की स्वतंत्रता है और इस स्वतंत्रता का उपयोग अपनी बुद्धि से करते हुए सर्वोच्च अवस्था तक पहुंच सकता है । वह सर्वोच्च अवस्था है - जहां से यात्रा प्रारम्भ की थी, सब कुछ पीछे छोड़कर वापस वहां तक पहुंच जाए । पर मनुष्य इससे उल्टा चलता है, सिर पर कर्मों की गठरी लादे एक योनि से दूसरी योनि में भटकता हुआ नए नए शरीर लेता जा रहा है परन्तु इनसे मुक्त होने की राह नहीं पकड़ पा रहा है ।

            परमात्मा ने मनुष्य को तीन विशेषताएं प्रदान की है - क्रिया, बोध और भाव । क्रिया से अर्थ है, कर्म स्वातंत्र्य । क्रिया को अपने स्वार्थपूर्ति में उपयोग कर वह उनमें आसक्त हो जाता है । यही उसके विभिन्न शरीरों में जन्मने-मरने का कारण है । इस कर्म-आसक्ति को वह बोध के माध्यम से अनासक्ति अथवा विरक्ति में परिवर्तित किया जा सकता है । एक गृहस्थ के लिए अनासक्त होना सरल है, जिससे वह बोध अर्थात् विवेक का उपयोग कर बिना लिप्त हुए अपने कर्तव्य कर्म कर सकता है ।

        अनासक्त होकर भी संतुष्ट नहीं होना है । क्रिया और बोध के साथ मिली भाव-शक्ति का उपयोग करते हुए परमात्मा से प्रेम करना है, उनसे अपनापन करना है । आसक्ति से राग-द्वेष पैदा होते हैं जबकि भाव से प्रेम । यह प्रेम ही संसार को अपना मानना छुड़ा देता है और परमात्मा से अपनापन करा देता है । इस प्रकार क्रिया, बोध और भाव की शक्तियों का सदुपयोग कर मनुष्य आसक्ति से अनुरक्ति की ओर आगे बढ़ सकता है । सब कुछ मुख्य रूप से हमारे बोध (विवेक) पर निर्भर करता है ।

        इसी के साथ ही ‘आसक्ति से अनुरक्ति की ओर’ की यात्रा का समापन होता है । श्रृंखला में अन्त तक साथ बने रहने के लिए आप सभी का हृदय से आभार ।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

Wednesday, July 15, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर - भाग - 2

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -27 से आगे

             इस प्रकार हम कह सकते हैं कि ऐसी स्थिति आने पर उस समय ‘मेरा’ से भी अधिक ‘मैं’ बड़ा और महत्वपूर्ण हो जायेगा क्योंकि आसक्ति सदैव ‘मेरा’ से ‘मैं’ में अधिक होती है। इसलिए अनासक्त होने के लिए यह आवश्यक है कि हम ‘मैं और मेरा’ की सम्पूर्ण भावना का ही परित्याग कर दें । जब हमारे लिए ‘तेरा’ से ‘मेरा’ और ‘मेरा’ से ‘मैं’ अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, तब हम अनासक्त होने की कल्पना तक नहीं कर सकते । यह ‘मैं’ ही हमारा अहं (अहंकार) है । ‘मैं’ नहीं रहेगा तो ‘मेरा’ भी नहीं होगा । अतः ‘मैं-मेरा’ की भावना का त्याग करना है तो ‘मैं’ (अहं अर्थात् अहंकार) को छोड़ दें फिर ‘मेरा’ का भी  त्याग हो जाएगा ।

         इस प्रकार हमने आसक्ति से अनासक्त होने के तीन सूत्रों पर अभी तक विचार किया है  । आइये ! अब चौथे सूत्र की ओर चलते हैं ।

        एक बहुत बड़ा व्यापारी था । वह व्यापार में इतना अधिक व्यस्त रहता था कि उसके पास सदैव समय का अभाव बना रहता था । व्यस्त इतना जैसे कि कहते हैं न कि उसके पास इतना भी समय नहीं है कि वह साँस भी आराम के साथ ले सके । उसने अपने जीवन में एक ही उद्देश्य बना रखा था, धन कमाना, और अधिक, और अधिक धन कमाना । आखिर एक दिन उसको कुछ फुर्सत के क्षण मिल ही गए । दोपहर का समय था । दुकान पर ग्राहक भी नहीं थे । गर्मी की दोपहर वैसे भी उनींदा सी होती है । सेठ को कर्मचारी का ठाले बैठे रहना वैसे ही पसंद नहीं था । सेठ ने समय काटने के उद्देश्य से ऐसे ही मुनीम को पूछ लिया कि ‘मुनीम जी, जरा बही-खाते देखकर बताएं कि मेरे पास कितना धन है ।’ इधर मुनीम ने बही-खाते खंगालना प्रारम्भ किया और उधर सेठजी को झपकी आने लगी । 

               कोई आधा घंटा लगा होगा मुनीम को हिसाब-किताब लगाने में । भली-भांति निरीक्षण कर मुनीम ने झपकी लेते सेठ को जरा ऊँची आवाज में कहा कि ‘सेठजी, आपके पास इतना धन जमा हो गया है कि आपकी सात पीढ़ियां बिना कुछ कमाए अपने जीवन में मौज कर सकती है ।’

       सेठ को एक झटका सा लगा और उसकी नींद उड़ गयी । वह उठ बैठा और सोचने लगा कि सात पीढ़ी तक तो ठीक है परन्तु आठवीं पीढ़ी क्या खाएगी ? उसने विचार किया कि मुझे और अधिक धन कमाना चाहिए, अपने खर्चों में और अधिक कटौती करनी चाहिए । अब उसने अपने और पत्नी के खर्चों में कटौती करना प्रारम्भ कर दिया । एक गरीब व्यक्ति की तरह रहने लगा । सदैव इसी बात की चिंता करता रहता कि अधिक से अधिक धन कैसे इकट्ठा किया जाये ? इस प्रकार उस सेठ की धन में गहरी आसक्ति हो गयी । उसकी पत्नी और मुनीम उसे बहुत प्रकार से समझाते, परन्तु सेठ पर किसी बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ता ।

  कुछ समय बाद एक संत पुरुष ने उस नगर में प्रवेश किया । एक दिन सेठ के घर पर भी वह आया । सेठ को चिंता मग्न देखकर उसने कारण पूछा । सेठ ने अपनी व्यथा बताई कि उसने सात पीढ़ियों के खाने का इंतजाम कर दिया है परन्तु उसके बाद की पीढ़ियां क्या खाएगी ? संत सब कुछ समझ गए । उन्होंने कहा कि शहर के बाहर एक ब्राह्मण परिवार रहता है, केवल वह ही इस बात का उत्तर दे सकता है, वहाँ जाकर उससे इस प्रश्न का उत्तर पूछे ।

          दूसरे दिन सेठ ने एक बैलगाड़ी पर ब्राह्मण को दान में देने के लिए बहुत सी खाद्य सामग्री को लादा और अपने प्रश्न का उत्तर जानने के लिए ब्राह्मण के घर की ओर प्रस्थान किया । सेठजी ज्योंही ब्राह्मण के घर पहुंचे ब्राह्मण आँगन में ही खड़ा मिल गया । सेठ ने खाद्य सामग्री उतरवाना प्रारम्भ किया तो ब्राह्मण पूछ बैठा - ‘सेठजी, यह सब क्या है ?’ सेठ ने कहा कि आपके लिए एक महीने का राशन-पानी है । ब्राह्मण ने ऊँची आवाज़ में अपनी पत्नी को पूछा - ‘भाग्यवान, सायं के भोजन के लिए घर में खाद्य सामग्री है या नहीं ।’ पत्नी ने उत्तर दिया - ‘शाम के भोजन के लिए खाद्य सामग्री तो घर में पर्याप्त है ।’  ब्राह्मण ने विनयपूर्वक सेठ से कहा- ‘सेठजी, हमें आज कोई सामग्री नहीं चाहिए । कल की मैं चिंता नहीं करता । कल की कल देखेंगे । अतः यह सब खाद्य सामग्री लेकर आप लौट जाएँ ।’ 

           ब्राह्मण के वचन सुनकर सेठ सुन्न होकर रह गया । वह सोचने लगा कि कहाँ यह साधारण ब्राह्मण जो कल के भोजन तक की चिंता नहीं कर रहा और कहाँ मैं एक सेठ, जो अपनी आठवीं पीढ़ी की चिंता अभी से कर रहा हूँ ।

          इस दृष्टान्त से अनासक्त होने का चौथा सूत्र निकल कर हमारे सामने आता है - “संतुष्टि पूर्ण जीवन।” हमारा जीवन संतुष्टि पूर्ण होना चाहिए । हमारी समस्या यही है कि हम अपने जीवन में कभी भी संतुष्ट नहीं होते । सोशल मीडिया पर आपमें से बहुतों ने पढ़ा होगा - ‘जो प्राप्त है वह पर्याप्त है’ । परन्तु क्या हमने इस वाक्य को अपने जीवन में उतारा है अथवा उतारने का प्रयास भी किया है ? नहीं, बिलकुल भी प्रयास नहीं किया है । अगर हम इस वाक्य को आत्मसात करने का प्रयास भी करते तो कम से कम 50 प्रतिशत लोगों के जीवन से आपाधापी समाप्त हो गयी होती ।

                 ‘जो प्राप्त है, वह पर्याप्त है’ इस वाक्य को स्वीकार करते तो संग्रह करने में नहीं लगते और जो कुछ प्राप्त हुआ, उसमें ही सन्तुष्ट रहते । हम जीवन में कभी संतुष्ट हो ही नहीं सकते, अपनी इच्छा अनुरूप सब कुछ प्राप्त करके भी । अधिक से अधिक प्राप्त कर संग्रहित करने की चाहना ने हमें असंतुष्ट ही पैदा किया है और जीवन भर असंतुष्ट रहते हुए असंतुष्टि के साथ ही इस देह को त्याग देंगे, फिर से एक नए जीवन में असंतुष्टि के साथ पैदा होने के लिए ।

        अब प्रश्न पैदा होता है कि जीवन में संतुष्टि आये कैसे ? संतुष्टि प्राप्त करने के लिए हमें संतुष्ट होने का गणित समझना होगा । संतुष्टि सदैव रुचिकर प्रभाव वाली वस्तु की मात्रा के विलोमानुपाती (Indirectly proportional) होती है और विपरीत प्रभाव वाली वस्तु की मात्रा के समानुपाती (Directly proportional) होती है । दूसरे शब्दों में कहूँ तो कह सकता हूँ कि जिस वस्तु अथवा भोग को प्राप्त करने में आपको सुख मिलता है, वह सदैव आपको अपर्याप्त लगता है और आप उस प्राप्त भोग से संतुष्ट नहीं होते । जिस वस्तु/भोग को प्राप्त करने से आप दुःख को प्राप्त होते हैं उसकी कम मात्रा से भी आप दुःखी होकर दुबारा उसे प्राप्त करने की कामना तक नहीं करते हैं । इस गणित के आधार पर ही हम संतुष्टि का स्तर निश्चित करते हैं ।  क्या कारण है कि फिर भी हम प्रत्येक भोग को बार-बार प्राप्त करने की कामना रखते हैं ?

         इस संसार को दुःख का सागर कहा जाता है और साथी ही इसे अशाश्वत भी कहा गया है । सब कुछ जानते हुए भी कोई भी मनुष्य इससे निवृत्ति नहीं चाहता । सत्यता तो यह है कि प्रतिपल इससे स्वतः ही निवृत्ति हो रही है । संसार का प्रत्येक भोग प्रारंभ में सुख का कारण बनता है और अंत में वह दुःख ही प्रदान करता है । इसी कारण से संसार को दुःख का सागर कहा जाता है । हम सब कुछ जानते हैं फिर भी इस आशा में प्रत्येक भोग के साथ चिपके रहते हैं कि कभी न कभी तो इनकी प्राप्ति के लिए कर्म करने से हमें वह भोग बार-बार मिलेगा और हमें शाश्वत सुख का अनुभव होगा । सारे प्रयासों के बाद भी कुछ हाथ नहीं लगता, हाथ रीते ही रह जाते हैं और अंततः हम दुःख को ही प्राप्त होते हैं । 

          संतुष्टि है - जो कुछ मिला है, उसमें खुश रहना । असंतुष्टि है - जो मिला है वह पर्याप्त नहीं है और यह आशा करना कि थोडा और अधिक मिले । यहीं आकर मनुष्य गलती कर बैठता है । ‘और अधिक मिलने’ की कामना करना ही ‘मिले हुए’ से असंतुष्ट होना है । ‘और अधिक प्राप्त करने की कामना’  का कभी अंत नहीं आ सकता । जितना कामनाओं को पूरा करने का  प्रयास किया जाता है उतनी ही और नई कामनाओं का जन्म होता है । जब तक हम स्वयं अपने मन को नियंत्रित नहीं करेंगे, कामनाओं का जन्म नहीं रुकने वाला । मन को नियंत्रित करने का एक ही उपाय है : वास्तविकता अर्थात सत्य को स्वीकार करना ।

     सत्य का अनुभव हमें ज्ञान प्राप्त करने से ही हो सकता है । केवल ज्ञान प्राप्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उस ज्ञान को जीवन में उतारना भी आवश्यक है । हमें इस जन्म में जो कुछ भी प्राप्त होना है, वह हमारे जन्म लेने से पूर्व ही निश्चित किया जा चूका है । उससे न तो रत्ती भर कम मिलना है और न ही अधिक । हमारे प्रत्येक शास्त्र में इसका स्पष्ट रूप से उल्लेख है । इस बात का ज्ञान हम सभी को है परन्तु जब तक इस ज्ञान को क्रियान्वित नहीं करेंगे, इस ज्ञान का जीवन में उपयोग नहीं करेंगे तब तक यह ज्ञान एक बोझ से अधिक कुछ भी नहीं है । इतने चिंतन के बाद यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि संतुष्ट जीवन तभी हो सकता है, जब हमें इस जीवन में जो कुछ भी हमारी सोच से अधिक या कम मिला है उसको ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार करें और अपने मन को नियंत्रण में रखते हुए जीवन में संतुष्ट होने का प्रयास करें ।

              बहुत समय पहले एक दरवेश (घुमक्कड़ मुसलिम फ़क़ीर) आरिफ सुभानी हुए थे । उन्हें संसार की मोह-माया छू तक नहीं गयी थी, इतने विरक्त महापुरुष थे । तन पर पहने हुए कपड़ों के अतिरिक्त उनके पास कुछ भी नहीं था । शांतिप्रिय और सादगी पूर्ण जीवन जीने वाले इस संत का स्वभाव दूसरों से मेल नहीं खाता था । आरिफ सुभानी मंदिर, मस्जिद और गिरिजा घर (Church) में भेद तक नहीं करते थे । अल्लाह के बन्दों को एक ही सीख देते थे कि मजहब के भेदभाव से ऊपर उठो ।

                       आरिफ सुभानी से प्रभावित होकर एक दिन एक व्यक्ति उनके पास आया । उसने कहा कि ‘मैं आपसे से प्रभावित होकर आया हूँ और आपके साथ रहकर अल्लाह की बंदगी करना चाहता हूँ ।’ सुभानी ने पूछा-“क्या ऐसा करने के लिए तुम्हें मेरे अतिरिक्त अन्य कोई नहीं मिला ?” उसने उत्तर दिया-‘नहीं, वैसे तो अल्लाह की बंदगी करने वाले बहुत से हैं परन्तु मैं आपके व्यवहार से प्रभावित होकर आपके पास वह सब कुछ सीखने आया हूँ, जो किसी अन्य के पास नहीं है । मैं आपके पास रहकर बहुत कुछ सीखना चाहता हूँ ।’ दरवेश स्वयं में मस्त था, उसे किसी अन्य की उपस्थिति बहुत खलती थी । इसलिए उन्होंने स्पष्टतः आगन्तुक अपने पास रखने से मना कर दिया ।

                वह व्यक्ति उनके सामने गिडगिडाते हुए कहने लगा कि ‘जब आप ही मुझे अपने पास नहीं रख रहे हैं तो आप ही बताइए मैं क्या करूँ, आप में जो कुछ है, उसे पाने के लिए किसके पास और कहाँ जाऊं ? मैं कैसे अपने आपको आपकी तरह का इंसान बना सकता हूँ ?’ सुभानी ने कहा कि ‘तुम जिस धर्म को मानते हो, उसके अतिरिक्त किसी अन्य धर्म को मानने वाले के पास चले जाओ । तुम इस्लाम में विश्वास करते हो तो किसी एक ईसाई धर्म में विश्वास करने वाले के पास चले जाओ । उसके पास बैठो, उसकी सब कुछ सुनो परन्तु ध्यान रखना, प्रत्युतर में उसे भला-बुरा कुछ भी नहीं कहना है ।’

सुभानी की बात सुनकर वह व्यक्ति हैरान रह गया । उसने पूछा - ‘आप यह क्या कह रहे हैं, इससे क्या होगा ?’ दरवेश ने कहा कि ‘तुम जिस धर्म को मानते हो, उससे दूर जो उस धर्म को नहीं मानता है, उसके पास चले जाओ । उससे भी ऐसा ही आग्रह करना, जैसा तुमने मुझसे किया था । वह तुम्हारे धर्म की निंदा अवश्य ही करेगा । तुम केवल सुनते रहना, अपने धर्म के बारे में कुछ भी नहीं कहना । धीरे-धीरे तुम्हारे भीतर इतनी सहिष्णुता आ जाएगी कि विरोधियों की बातों का बुरा नहीं लगेगा और तुम्हें क्रोध पैदा नहीं होगा । ऐसी सहनशीलता आने पर ही तुम्हें सच्ची शान्ति मिलेगी और तुम खुदा के बन्दों में अपना स्थान बना लोगे ।’ बात तो सत्य कही थी, उस आरिफ सुभानी नामक दरवेश ने । हम किसी भी एक विचारधारा, व्यक्ति अथवा संप्रदाय आदि के प्रति इतने अधिक आसक्त हो जाते हैं कि उसके विरोध में उठता एक स्वर तक सुनना पसंद नहीं करते । यही कारण है कि आज ‘सर तन से जुदा’ जैसे आतंकित करने वाले नारे लगते हैं । खेल के मैदान तक में एक टीम के समर्थक दूसरी टीम के समर्थकों से खूनी संघर्ष तक कर लेते हैं, जबकि खेल में हार-जीत से उनका कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता । सहनशीलता हमें आसक्ति से मुक्त करती है और अनासक्त बनाती है । ऐसे में हम चाहे जिस टीम का समर्थन कर रहे हों, जो भी टीम जीते-हारे, हमारे ऊपर इस हार-जीत का प्रभाव नहीं होगा । अनासक्त रहकर टीमों का संघर्ष देखने से ही आपको उस खेल में आनंद आएगा ।

          दरवेश आरिफ सुभानी के इस दृष्टान्त से अनासक्त होने का एक और सूत्र हमारे हाथ लगता है - ‘सहिष्णु बनो, विरोध को भी सहना सीखो ।’  आरिफ सुभानी दरवेश ने उस व्यक्ति को यही सीख दी थी कि किसी भी एक धर्म का पालन करने वाला किसी दूसरे धर्म के पालन करने वाले के मध्य कभी भी बाधक नहीं बन सकता । सभी धर्मों की एक समान शिक्षा है । 

           कुटिलता तो हमारे भीतर (मन में) होती है कि हम अपने धर्म को श्रेष्ठ और दूसरे धर्म को तुच्छ समझते हैं । संसार के समस्त धर्म अच्छे हैं परन्तु जब हम एक धर्म के प्रति आसक्त हो जाते हैं, तब दूसरा धर्म हमें निम्न स्तर का प्रतीत होने लगता है । वास्तविकता यह है कि सभी धर्म हमें परमात्मा की ओर ले जाते हैं और आपस में प्रेम करने और प्रेम से रहने की शिक्षा देते हैं । एक धर्म के प्रति हमारी आसक्ति ही साम्प्रदायिक तनाव का कारण बनती है । धर्म में आसक्ति और धर्म से विरक्ति, दोनों ही अनुचित है । अतः अनासक्त होकर प्रत्येक को स्व-धर्म का पालन करते रहना चाहिए ।

          यही नियम इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति, समूह और समाज पर लागू होता है । हम अलग-अलग समाज और जातियों में इस प्रकार बंटे हुए हैं कि हमें हमारा देश, देश में भी हमारा प्रान्त, प्रान्त में भी हमारा क्षेत्र, फिर समाज, अपनी जाति और अंत में परिवार ही सर्वोच्च नज़र आता है । जिस दिन हमारे भीतर अनासक्ति पैदा हो जाएगी ‘वसुधेव कुटुम्बकम्’ की भावना को स्वीकार कर लेने में तनिक सी भी देर नहीं लगेगी । 

               सनातन धर्म की सोच सदैव ही इसी प्रकार की रही है । सनातन धर्म अर्थात् वह धर्म, जो पहले भी था, आज भी है और भविष्य में भी रहेगा क्योंकि इस धर्म में सभी विचारधाराओं का समावेश किया गया है । जो भी परमात्मा की ओर जाने का रास्ता दिखलाता है, वही हमारे लिए पूजनीय बन जाता है । 

             हम सगुण साकार की भी उपासना करते हैं, साथ ही निर्गुण निराकार में भी विश्वास रखते हैं । और तो और हमने नास्तिकता को भी कभी महत्वहीन नहीं कहा है । सहिष्णुता की भावना तो हमें विरासत में मिली है । यही एक मात्र कारण है जो सदियों से यहाँ इस देश में हम सभी धर्मों और उनके अनुयाइयों के आगमन का सम्मान करते आए हैं । हमारी दृष्टि में यहाँ कोई पराया नहीं है, सभी अपने हैं । यहाँ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘ मूलमंत्र ही सबके जीवन में रचा - बसा है। सभी एक दूसरे के पूरक हैं, कहीं किसी प्रकार का कोई भेद नहीं ।

             केवल एक सहिष्णु व्यक्ति ही मध्य में रह सकता है । न तो आसक्त और न ही विरक्त, बस केवल अनासक्त । कबीर ने सहनशील बनने का उपाय बताते हुए बहुत ही सुन्दर बात कही है -

निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छुवाय ।

बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय ।।

    स्वभाव को निर्मल बना लेना ही आसक्त से अनासक्त होना है ।

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -37 अनासक्ति के अगले सूत्र के लिए अब आगे बढ़ते हैं । एक विरक्त संत हुआ करते थे । बचपन से ही उनका अध्यात्म के प्रति बड़ा गहरा रुझान था । उन्हें कामना और क्रोध छू कर तक नहीं गये थे । जब तक मन में किसी भी प्रकार की कामना जन्म नहीं लेती है, तब तक भला क्रोध किस पर करे ? कामना ही क्रोध की जननी है, क्रोध पैदा ही तब होता है जब कामना पूरी नहीं होती । साथ ही साथ कामना लोभ की जननी भी है । जब एक कामना पूरी हो जाती है तब वह मन में लोभ उत्पन्न करती है और फिर एक नई कामना का जन्म हो जाता है । हाँ, तो बात हो रही थी एक विरक्त संत की । संत घने जंगल में बैठकर कठोर तप करते हुए आत्म-बोध को उपलब्ध होने का प्रयास कर रहे थे । इसके लिए विरक्त संत तपस्या में लीन होकर तपस्वी बन गए थे । पास के ही एक गाँव की काली-कलूटी बहुत ही बदसूरत लड़की उस जंगल में बने तालाब से जल भरने के लिए नियमित रूप से आती थी । वह प्रतिदिन देखती कि वह तपस्वी तप में सदैव लीन रहता था । उसके लिए खाने-पीने की क्या व्यवस्था है, वह इस पर सोच-विचार किया करती । उसको वहाँ कोई व्यवस्था नज़र नहीं आयी । अंततः उसको उस तपस्वी पर दया आ गयी । वह घर से खाना बनाकर लाती, तालाब से जल का घड़ा भरती और दोनों को तपस्वी की कुटिया में रख देती ।

           तपस्वी की कठोर तपस्या को देखकर इंद्र विचलित हो गया । वह सोचने लगा कि आख़िर यह तपस्वी इतना कठोर तप क्यों कर रहा है, कहीं मेरे सिंहासन पर तो इसकी दृष्टि नहीं है ? इंद्र, देव-लोक का शासन-कर्ता । देव लोक अर्थात स्वर्ग, जहाँ देवताओं की प्रत्येक इच्छा पूरी होती है, काम से लेकर समस्त सुख प्राप्त करने की । आप यह न समझें कि स्वर्ग में कोई कामना नहीं होती । अगर कामना नहीं होती तो स्वर्ग की कल्पना तक नहीं होती । हमारी कामनाएं ही हमारे लिए स्वर्ग और नरक का निर्माण करती है । 

         हाँ, तो इंद्र बड़ा चिंता मग्न था कि हो न हो; यह तपस्वी मेरा पद छिनने के लिए ही इतना कठोर तप कर रहा है । इंद्र ने एक उपाय सोचा और उसको क्रियान्वित किया भी । उसने उस गाँव की बदसूरत सी काली-कलूटी लड़की को अप्रतिम सौन्दर्य की मल्लिका बना दिया । उस लड़की का सौन्दर्य इतना अधिक प्रभावशाली हो गया था कि उस समय तो उसके सामने स्वर्ग की अप्सराएँ (उर्वशी, मेनका आदि) भी पानी भरती दिखलाई पड़ रही थी ।

                अप्रतिम सौन्दर्य (Outstanding beauty) पाने के बाद भी गाँव की उस लड़की का तो प्रतिदिन का यही नियम कि तपस्वी की कुटिया में खाना-पानी रखे । एक दिन तपस्वी ध्यान के बाद यूँ ही बैठा हुआ था कि उसी कुमारी कन्या ने खाना-पानी रखने के लिए कुटिया में प्रवेश किया । तपस्वी की दृष्टि उस बालिका पर पड़ी । उसका अप्रतिम सौन्दर्य देखकर वह स्वयं तक को भुला बैठा । उसने तत्काल ही अपनी तपस्या को अनवरत जारी रखने का विचार त्याग दिया । उसने बिना सोचे-समझे उस लड़की के समक्ष विवाह करने का प्रस्ताव रख दिया; एकदम आधुनिक युग में एक लडके द्वारा लड़की को किए जाने वाले ‘प्रपोज’ की तरह । 

तपस्वी से विवाह-प्रस्ताव सुनकर वह कुमारी कन्या शर्म से लाल हो गयी । उसने अपने जीवन में कल्पना तक नहीं की थी कि किसी दिन एक तपस्वी उसके समक्ष विवाह का प्रस्ताव भी रख सकता है । गाँव की इस बाला को और क्या चाहिए था, उसने तत्काल ही विवाह के लिए स्वीकृति देते हुए ‘हाँ’ कर दी और अपने घर लौट गयी । उस कन्या के द्वारा विवाह प्रस्ताव पर ‘हाँ’ कहते ही स्वर्ग लोक में बैठा इंद्र प्रसन्न हो गया और साथ ही साथ आश्वस्त भी कि अब निकट भविष्य में उसके सिंहासन को कोई खतरा नहीं है । काम-वासना से ग्रस्त तपस्वी अपने स्तर से नीचे गिरने लगा था । दिन-रात परमात्मा का ध्यान करने वाला तपस्वी आज तप करना भूलकर गाँव की एक साधारण सी कन्या के सौन्दर्य-जाल में उलझ कर रह गया था । उस तपस्वी से हम जरा से भी अलग नहीं है । हमारा भी यही हाल है, जहाँ कोई कामना पूरी होती नज़र आती है, जीवन का उद्देश्य तक भूला बैठते हैं । इधर जंगल में स्थित उस कुटिया में तपस्वी को नींद नहीं आ रही है, रह-रह कर करवटें बदल रहा है और निकट भविष्य में होने जा रहे विवाह की मधुर कल्पना में खोया हुआ है । उधर गाँव में लड़की का भी यही हाल है, उसे भी नींद नहीं आ रही है परन्तु लड़की को नींद न आने का कारण तपस्वी को नींद न आने के कारण से एकदम भिन्न है । लड़की यह सोचकर व्यथित है कि मेरे कारण उस तपस्वी के तप में बाधा आ गयी है । मुझे विवाह का प्रस्ताव तत्काल ही अस्वीकार कर देना चाहिए था परन्तु अब क्या हो सकता है ? उसने रात भर विचार किया और तत्काल ही एक महत्वपूर्ण निर्णय पर पहुँच गयी ।

          सुबह होते ही उसने खाना बनाया और जंगल में स्थित उस तपस्वी की कुटिया की ओर चल पड़ी । जल्दी ही वह उस तपस्वी की कुटिया में प्रवेश पा गयी । तपस्वी ने सर्वप्रथम तो उसे जी भर कर देखा और फिर इतनी सुबह आने का प्रयोजन पूछा । युवती ने क्षमा मांगते हुए कहा कि आज ही वह किसी आवश्यक कार्य-वश कहीं बाहर जा रही है । उसने तपस्वी को उसके और स्वयं के स्तर की तुलना करते हुए कहा कि इस प्रकार विवाह करना उपयुक्त नहीं है । एक तपस्वी को अपने तप में, अपनी साधना में आगे प्रगति करनी चाहिए और गृहस्थी बसाने का निर्णय त्याग देना चाहिए । 

          यकायक यह सुनकर तपस्वी को एक झटका सा लगा । उसकी विवाहोपरांत की सभी कल्पनाएँ एक क्षण में ही मटियामेट हो चुकी थी । उसने बड़े ही दुःखी मन से युवती को अपनी कुटिया से विदा किया और पुनः तपस्या में लीन हो गया । परिस्थितियाँ अचानक ही एकदम बदल गयी थी । अब पुनः चिंताग्रस्त होने की बारी इंद्र की थी ।

         गाँव लौटकर उस युवती ने फिर कभी उस जंगल की ओर, उस तपस्वी की कुटिया का रुख नहीं किया । तपस्वी कठोर तप में लीन था । अब इंद्र ने इस तपस्वी को देव-लोक का सिंहासन सौंप कर उसका सहायक बनने में ही अपना भला समझा । यह सोचकर इंद्र भूलोक पर उतर आया और उसने तपस्वी की कुटिया में प्रवेश किया । 

      तपस्वी की आँख खुली, अपने सामने साक्षात् देवराज इंद्र को खड़ा पाया । इंद्र ने तपस्वी को दंडवत प्रणाम किया और बड़े ही प्रेम से बोला - ‘हे तपस्वी ! आपने बड़ा कठोर तप किया है । केवल आप ही देव-लोक के पद पर आसीन होने के अधिकारी हैं । मैं आपका सहायक बनकर आपकी सेवा में रहूँगा । श्रीमन्, मैं आपको देव-लोक का कार्यभार संभालने के लिए आमंत्रित करने आया हूँ ।’ 

             इस प्रकार इंद्र के मुख से स्वर्ग का राज्य मिलने की बात सुनकर भी तपस्वी प्रसन्न नहीं हुआ । उसने स्वर्ग लोक का शासन संभालने से इनकार कर दिया । अब एक बार फिर से चौंकने की बारी देवराज की थी । वे अपने शासन काल में स्वयं के समक्ष खड़ा एक ऐसा मनुष्य देख रहे थे, जिसके मन में स्वर्ग का राजा बनने तक की कामना भी नहीं है, छोटी-मोटी कामनाओं के तो मन में बने रहने का प्रश्न ही कहाँ पैदा होगा । इंद्र सोचने लगा कि यह तपस्वी तो निश्चित ही ब्रह्म-लोक जाने का अधिकारी है । उसने तपस्वी को कहा – ‘मैं, सब कुछ समझ गया हूँ । आप ब्रह्म-लोक को प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं और निश्चय ही वहां जाने के अधिकारी भी हैं । ब्रह्म-लोक के सामने भला देव-लोक की क्या बिसात । परमात्मा आपकी यह इच्छा भी पूरी करे ।’ 

             इतना कहकर इंद्र वापिस अपने लोक जाने को मुड़ा ही था कि अनायास ही उसके मन में एक बात आई । वह सोच रहा था कि ऐसा कैसे हो सकता है कि इस भूलोक के किसी एक मनुष्य की सभी कामनाओं का अंत हो गया हो । कम से कम मुझे इस तपस्वी को पूछना तो चाहिए कि क्या जीवन में उसकी कोई और कामना अभी भी शेष है ?

         इंद्र तत्काल ही उस तपस्वी की ओर उन्मुख हुआ और बोला - ‘श्रीमान ! मेरे योग्य और कोई सेवा हो तो बताएं । आपके मन में और कोई इच्छा हो तो बताएं, आपका यह सेवक तुरंत ही आपकी वह इच्छा पूरी कर देगा ।’ इतना सुनते ही उस तपस्वी का चेहरा ख़ुशी से चमक उठा ।’  तपस्वी करबद्ध होकर इंद्र के सामने खड़ा हो गया और बोला - ‘ अगर आप मेरी इच्छा को जानना और पूरी करना ही चाहते हैं तो गाँव वाली उस रूपवती कन्या को मेरे समक्ष ला कर खड़ा कर दीजिये, मैं उसके साथ विवाह कर अपनी गृहस्थी बसाना चाहता हूँ ।’ 

          इंद्र इतना सुनकर समझ गया कि इस भूलोक में मनुष्य के जीवन से कभी भी कामना समाप्त नहीं हो सकती । इंद्र ने आगे उस तपस्वी की इच्छा पूरी करने के लिए क्या किया, उसको जानना हमारे लिए आवश्यक भी नहीं है । आवश्यक इसलिए नहीं है क्योंकि अगर इंद्र ने उसकी यह एक कामना पूरी भी कर दी होगी, तो वह तपस्वी पुनः कई नई कामनाओं के जंजाल में और अधिक उलझ गया होगा ।

           इस दृष्टान्त से अनासक्त होने का एक और सूत्र निकल कर हमारे सामने आता है - “कामनाओं पर नियंत्रण रखना ।” 

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -43

                कामना रखने से व्यक्ति कर्म के प्रति आसक्त होता है । जब कामना पूरी हो जाती है, लोभ पैदा हो जाता है । लोभ पुनः नई कामनाओं को जन्म देता है और फिर से व्यक्ति कर्म में आसक्त हो जाता है । इस प्रकार कामनाएं आसक्ति को जन्म देती है और आसक्ति कामनाओं को । यह दुष्चक्र कभी भी टूट नहीं पाता और मनुष्य इस संसार के आवागमन से मुक्त नहीं हो पाता । जब हम कामनाओं को नियंत्रित कर लेंगे तो शीघ्र ही अनासक्त-भाव को प्राप्त हो जायेंगे । आइये ! अब जानने का प्रयास करते हैं कि कामनाएं नियंत्रित कैसे हो सकती है ?

        कामनाओं को नियंत्रित करने के लिए हमें कामनाओं के विज्ञान को समझना होगा । कामनाएं तभी उत्पन्न होती है, जब इन्द्रियां किसी भोग के प्रति आसक्त हो जाती है । परन्तु इन्द्रियां अकेले भोग प्राप्त नहीं कर सकती, उसके लिए मन का इन्द्रियों के साथ रहना आवश्यक है । मन इन्द्रियों के साथ रहकर कर्म करवाता है, तभी इस शरीर से भोग प्राप्त हो सकते हैं । मन पर प्रभाव बुद्धि का होता है क्योंकि बुद्धि मन से पर अर्थात सूक्ष्म और श्रेष्ठ है । अगर बुद्धि को मन अपने वश में कर लेता है तभी वह इन्द्रियों से कर्म करवाकर भोग उपलब्ध करवा सकता है अन्यथा नहीं । कोई भी भोग कभी भी मनुष्य को संतुष्ट नहीं कर सकता । असंतुष्टि फिर नई कामनाओं को जन्म देती है और नयी कामनाओं को पूरा करने के लिए फिर से मन और इन्द्रियां कर्म करने में जुट जाती है । इस प्रकार यह कामनाओं और कर्म का एक अटूट चक्र बन जाता है जिसका टूट पाना लगभग असंभव हो जाता है । 

           भगवान श्री कृष्ण गीता में अर्जुन को कहते हैं -

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।

मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ।। गीता-3/42 ।।

अर्थात इन्द्रियों को शरीर से पर अर्थात श्रेष्ठ और सूक्ष्म कहते हैं, इन्द्रियों से पर मन है; मन से भी पर बुद्धि है और बुद्धि से भी पर अर्थात सूक्ष्म वह (आत्मा) अर्थात् आप स्वयं है ।

          काम रहता है इस बुद्धि और आत्मा के सन्धि स्थान पर । उस सन्धि को ‘अहं’ कहा जाता है । वास्तव में ऐसी किसी सन्धि का अस्तित्व है नहीं, केवल अज्ञान के कारण हमें प्रतीत होती है । ज्ञान होते ही जब आत्मा और बुद्धि का काल्पनिक सन्धि-भंग हो जाता है, तह अहं शुद्ध होकर अहम् (मूल स्वरूप) हो जाता है । इस अहम् को ही आत्मा कहा जाता है और उस अहं को अहंकार ।

         बुद्धि से पर अर्थात सूक्ष्म अर्थात् पर भी एक और है, जिसको आत्मा कहा जाता है और जो कि जड़ तत्वों में केवल बुद्धि के निकट है । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि बुद्धि और आत्मा को हमारा अहं (अहंकार) ही जोड़ता है । अहं के अस्तित्व में आते ही आत्मा अक्रियता में चली जाती है अर्थात् फिर उसकी शरीर की सक्रियता में कोई भूमिका नहीं रहती । आत्मा के अक्रिय हो जाने को ही आत्मा का मरना अथवा देशी भाषा में राम निकल जाना कहते हैं । फिर सारा खेल शरीरों (स्थूल और सूक्ष्म) के स्तर पर ही खेला जाने लगता है, आत्मा से उसका कोई सम्बन्ध नहीं रहता । चलिए ! अपनी इस बात को और अधिक स्पष्ट करने का प्रयास करता हूँ ।  

           आत्मा जब शरीर को ही अपना स्वरूप मान लेती है, वह आत्मा का सक्रिय रूप है, जिसे अहं कहा जाता है । वास्तव में आत्मा का स्वरूप अक्रिय है और समझने की दृष्टि से उसे मूल अहम् कहा जा सकता है । सक्रिय स्वरूप अर्थात् अहं, सूक्ष्म शरीर के माध्यम से संसार में विचरण करता है और उसमें आसक्त होकर कर्ता-भोक्ता बन जाता है । आत्मा का अक्रिय स्वरूप अर्थात् जो मूल अहम् है, वह शरीर से भिन्न है और परमात्मा से अभिन्न है । वह न कर्ता है और न ही भोक्ता । सक्रिय अहं को ऊर्जा मिलती है अक्रिय मूल अहम् (आत्मा) से । इसी ऊर्जा को पाकर वह शरीर और संसार में आसक्त हो जाता है, जिस कारण से जीव में कर्ता-भोक्ता भाव पैदा हो जाता है ।

         मन से आत्मा का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता । हाँ, केवल बुद्धि के कारण ही उसे मन के साथ जुड़कर जीवात्मा बनना पड़ता है । अगर बुद्धि सदैव आत्मा के अनुसार चले तो इस ‘अहं’ का लोप हो जाता है और फिर अहम् (आत्मा) को स्वतन्त्र माना जा सकता है । कहने का अर्थ है कि मन ही बंधन का कारण है लेकिन ऐसा होना तभी संभव हो सकता है जब मन बुद्धि पर प्रभावी हो जाये । प्रत्येक व्यक्ति अपने अधीन के साथ सम्बन्ध न रख कर अपने से उच्च के साथ सम्बन्ध बनाये रखना चाहता है । जब हम अपने अधीन के प्रभाव में आकर उसका कहा मानने लगते हैं तो हम अपने स्तर से नीचे गिर रहे होते हैं । इसी प्रकार जब हम अपने से उच्च के साथ रहते हुए उसके कहे अनुसार चलते हैं तो हम प्रगति-पथ पर अग्रसर हो रहे होते हैं । 

            आत्मा सर्वोच्च है, उसके बाद बुद्धि का स्थान है और अंत में मन का । बुद्धि के अधीन मन है और आत्मा के अधीन बुद्धि । बुद्धि का कार्य है, ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त हुए ज्ञान का उपयोग करना । बुद्धि को अपने अधीनस्थ मन के साथ हो जाने के बजाय, अपने से उच्च, आत्मा के साथ ही बने रहना चाहिए । जब व्यक्ति की बुद्धि आत्मा के साथ रहती है और उसके अनुसार चलती है, तब उसका ज्ञान विवेक में परिवर्तित हो जाता है और जब बुद्धि अपने से निम्न, मन के साथ हो जाती है तब वही ज्ञान, अज्ञान बन जाता है ।

             अज्ञान वह कथित ज्ञान है, जिसे मनुष्य मन के कहे अनुसार सत्य समझ लेता है जबकि विवेक वह ज्ञान है जो मनुष्य बुद्धि को आत्मा के साथ रखकर उसका अनुसरण करता है । शास्त्रों में इसी प्रक्रिया को ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ कहा गया है अर्थात हमें परमात्मा अज्ञान की तरफ नहीं बल्कि ज्ञान की तरफ ले जाए । अतः कामनाओं को नियंत्रित करने का यही एक मात्र उपाय है कि मनुष्य अपनी बुद्धि को आत्मा के साथ संलग्न कर ज्ञान का उपयोग करे न कि मन को बुद्धि पर प्रभावी बना कर अपने मन का कहना मानता रहे । इसी बात को स्पष्ट करते हुए गीता में श्री कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं -

एवं बुद्धेः परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।

जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ।। गीता-3/43 ।।

अर्थात बुद्धि से पर यानि सूक्ष्म, बलवान और अत्यंत श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो ! तू इस कामना रुपी शत्रु अर्थात इस दुर्जय शत्रु काम को मार डाल ।

          अर्जुन को युद्धभूमि में मिले इस ज्ञान को हमें भी समझना चाहिए और कामनाओं को नियंत्रित करने के लिए मन को बुद्धि के अधीन रखते हुए अपने विवेकानुसार निर्णय करना चाहिए । बुद्धि से ज्ञान का समुचित उपयोग करके ही कामनाओं को बढ़ने से रोका जा सकता है अन्यथा मन के अनुसार चलने से तो कामनाओं का अंत आना असंभव ही है ।

       पूर्व में वर्णित दृष्टान्त पर एक प्रबुद्ध पाठक ने कुछ शंकाएं प्रकट की है, उसका स्पष्टीकरण श्रृंखला के मध्य में ही कर देना चाहता हूँ । वे पूछते हैं कि वह कन्या उन तपस्वी की तपस्या में विघ्न नहीं हुई, अतः कृपया स्पष्ट करें कि दोनों में तुलना करनी हो तो हम कैसे करें ?

            संत की तुलना में कन्या कामनाओं से बहुत दूर है । संत के मन में कामनाएं अभी भी शेष हैं । कन्या ने अपने जीवन में किसी तपस्वी से विवाह करने की कल्पना तक नहीं की थी । मन में भोग की कल्पनाएँ ही विभिन्न कामनाओं की जननी है । जब तपस्वी ने उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा था, तब वह चौंक गयी थी और जल्दबाजी में उसने विवाह के लिए हाँ कर दी थी । परन्तु घर जाकर उसने विचार किया तब उसे लगा कि वह तपस्वी के तप में बाधक बन रही है । वह तपस्वी के तप में बाधक बनना नहीं चाहती थी । इसीलिए दूसरे दिन उसने विवाह करने से मना कर दिया था । अगर उसके मन में पहले से ही उस तपस्वी के साथ विवाह करने की कल्पना के कारण तीव्र कामना रही होती तो विवाह करने से इनकार कर ही नहीं सकती थी ।

           दूसरी शंका-  ‘इस लेख के माध्यम से आप क्या संदेश देने की चेष्टा कर रहे है मेरी समझ से बहुत दूर हैं, क्योंकि तपस्वी ने जब तप प्रारंभ किया तब जो उद्देश्य था उस उद्देश्य से उस गांव की रूपवती कन्या के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखने और कन्या द्वारा स्वीकार करना पुनः अगले दिन अस्वीकार कर देना । क्या आगे की तपस्या उस कन्या के साथ विवाह कर गृहस्थी बसाने के लिए थी, जो ब्रह्म लोक की भी कामना नहीं रखी ?’  

            लेख का सन्देश स्पष्ट है- कामनाओं को नियंत्रण में रखना आसान कार्य नहीं है । तपस्वी ब्रह्म-लोक की प्राप्ति के लिए ही तप कर रहा था । तप में समस्त सांसारिक कामनाओं को नष्ट किया जाता है और परमात्मा की प्राप्ति की कामना को सर्वोपरि रखा जाता है । जितनी अधिक तीव्र आसक्ति होती है, मन भर जाने पर उस वस्तु/व्यक्ति/भोग से उतनी ही अधिक तीव्र विरक्ति भी हो जाती है । तपस्वी विरक्त तो था परन्तु काम से पूर्णतया मुक्त नहीं हुआ था । तभी उसने कन्या को सर्वप्रथम देखते ही विवाह का प्रस्ताव रख दिया क्योंकि इतने कठोर तप के बाद भी वैवाहिक सुख के प्रति उसकी कामना नष्ट नहीं हुई थी । उसकी आसक्ति एक स्त्री और काम-भोग के प्रति बनी रही । जब दूसरे दिन कन्या ने विवाह के लिए ना कर दी तब वही तीव्र आसक्ति, पुनः तीव्र विरक्ति में परिणत हो गयी, एक दोलक के दोलन की तरह; जो दोनों तरफ दोलन करता हुआ सर्वोच्च ऊँचाई को छूता है । विवाह न होने से आहत होकर वह पुनः तीव्र विरक्ति में चला गया और ब्रह्म-प्राप्ति के लिए तप में लग गया । जब इंद्र उसके सामने आया और मन में अन्य कोई इच्छा शेष रहने का पूछा तो उसका भीतर दबा हुआ काम-भाव पुनः सतह पर आ गया और उसने उसी कन्या को मांग लिया । 

          कहने का अर्थ है कि मनुष्य की कामनाएं इतनी सुगमता से नष्ट नहीं हो सकती । तपस्वी के तप के बाद भी उसके भीतर काम-भाव ऐसी स्थिति में बना रहा, जैसे राख के ढेर में दबी एक चिंगारी । जरा सा इंद्र ने उसे क्या कुरेदा कि राख हटते ही चिंगारी भभक उठी । इसीलिए सदैव यही कहा जाता है कि कामनाओं को नष्ट करना आसान नहीं है । इन्हें तो अनासक्त होकर ही नियंत्रण में रखा जा सकता है । 

            हरिः शरणम् आश्रम के आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा एक संत की बात बताते हैं कि वे (उन संत का नाम मुझे अभी याद नहीं आ रहा है) कहा करते हैं कि अगर हरिद्वार से लाहौर तक के मार्ग को स्वर्ण मुद्राओं से पाट भी दिया जाये और उस मार्ग पर मुझे चलने को कहा जाये तो मेरा मन उस स्वर्ण मुद्राओं को देखकर जरा सा भी विचलित नहीं होगा । परन्तु मेरे सामने एक सुन्दर स्त्री के आ जाने पर मैं यह नहीं कह सकता कि मेरा मन उसकी उपस्थिति से तनिक सा भी विचलित नहीं होगा । हम सब के जीवन की यह एक कटु वास्तविकता है कि कामनाओं पर हमारा सदैव के लिए नियंत्रण नहीं रह पाता । उनको नष्ट करने के स्थान पर नियंत्रण करना अधिक उचित है अर्थात न आसक्ति, न विरक्ति; बल्कि अनासक्ति ।

           भागवतजी में भगवान श्रीकृष्ण उद्धवजी को ज्ञान देते हुए वे अपने पूर्वज राजा यदु और दत्तात्रेयजी के मध्य हुए संवाद का वर्णन करते हैं । यह कथा भागवतजी के ग्यारहवें स्कन्ध के सातवें अध्याय से अवधूतोपाख्यान नाम से प्रारम्भ होती है । इसमें दत्तात्रेय जी कहते हैं कि हम प्रत्येक जीव से कुछ न कुछ सीख सकते हैं । जिस किसी से भी सीख के रूप में हमें ज्ञान मिलता है, वह हमारा गुरु है । दत्तात्रेय जी ने इस प्रकार अपने चौबीस गुरु बतलाए हैं । इनमें उनकी एक गुरु थी पिंगला नाम की वेश्या । एक वेश्या और गुरु ? सुनने में बड़ा अटपटा लग सकता है और स्वीकार करने में उतना ही कठिन । 

             कोई भी व्यक्ति सदैव के लिए बुरा नहीं हो सकता, उसमें भी कोई न कोई एक अच्छाई अवश्य ही छिपी रहती है । वह अच्छाई जब भी प्रकट होती है तब हमारा मार्गदर्शन कर देती है । हाँ, तो बात चल रही थी, पिंगला वेश्या की । जिस शहर में वह थी, वहां अपना शरीर बेचकर जीवनयापन कर रही थी । समय जब बीतता है तब केवल उम्र ही नहीं बीतती, साथ ही साथ शरीर भी बीतता जाता है । यह जीवन का स्याह पक्ष है क्योंकि कोई नहीं चाहता कि एक दिन उसका शरीर भी बीत जाय ।

                पिंगला का जीवन और शरीर भी बीतता जा रहा था । प्रतिदिन की तरह वह आज भी शाम होते ही सजधजकर अटारी पर आ खड़ी हुई और अपनी भाव-भंगिमाओं से राह चलते लोगों को आकर्षित करने का प्रयास करने लगी । आज भी उसे आशा थी कि कोई न कोई मालदार व्यक्ति उसके आकर्षण में फँसेगा । इंतज़ार की घड़ियाँ बढ़ती जा रही थी और रात भी धीरे-धीरे गहराने लगी थी ।

            हाय रे दुर्भाग्य ! आज तो पिंगला को मालदार तो क्या छोटा-मोटा ग्राहक तक भी नसीब नहीं हुआ । उसके नयन दुःख से झरने लगे । वह एक दृष्टि सूनी गली में डालती और दूसरी दृष्टि अपने बुढ़ाते जा रहे शरीर पर । वह समझ गई कि उसके शरीर की आकर्षण क्षमता चूक चुकी है । उसकी आशा की अंतिम किरण तब बुझ गई जब दूर कहीं पहरेदार की ‘जागते रहो’ की ध्वनि उसके कानों में पड़ी । पहरेदार की आवाज़ अर्धरात्रि हो जाने का संकेत दे रही थी ।

             पिंगला ने अब सब आशाएं छोड़ दी और अटारी से उठ खड़ी हुई । अपने कमरे में जाकर दर्पण के सामने खड़ी हो गई । कहाँ गया वह रूप-लावण्य, जिसके कभी हज़ारों दीवाने हुआ करते थे ? कहाँ हैं वे ग्राहक जो उसके शरीर की केवल एक झलक पाने को अटारी के नीचे दोपहर से ही खड़े रहते थे ? आज दर्पण भी उसे चिढ़ा रहा था । 

          दुःख में डूबी पिंगला ने सत्य को स्वीकार किया  । उसने जीवन में आगे अब और ग्राहक मिलने की आशा छोड़ दी और जाकर पलंग पर सो गई । सदैव रात भर जागने वाली को आज पलंग पर सोते ही नींद आ गई । उसकी इस सुखद नींद का कारण था - ‘समस्त आशाओं का त्याग’ । दत्तात्रेय महाराज कह रहे हैं - “राजन यदु ! आशा हि परमं दुःख़ं नैराश्यं परमं सुखम् ।”  (11/8/44) आशा ही समस्त दुःखों का कारण है और आशा का त्याग कर देना परम सुख प्रदान करता है ।

              पिंगला वेश्या के इस दृष्टांत से अनासक्ति का एक और सूत्र निकल कर आया है - समस्त आशाओं और अपेक्षाओं का त्याग । किसी से कोई अपेक्षा/आशा न रखें । हम जितनी अपेक्षाएं रखेंगे, जीवन में उतने ही अधिक दुःखी होंगे । प्रायः हम आशा और कामना को समान समझ लेते हैं । ये समान नहीं है । कामना होती है किसी वस्तु अथवा पदार्थ को प्राप्त करने की जिससे शारीरिक सुख मिल सके जबकि अपेक्षा/आशा होती है, किसी व्यक्ति से । हम आशा करते हैं किसी ऐसे व्यक्ति से जिससे हमें प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से सुख मिलने की संभावना नज़र आती है । हम चाहते हैं कि वह हमारे कहे अनुसार कार्य कर देगा और जब ऐसा नहीं होता तो हम दुःखी हो जाते हैं ।  

             दुःख का कारण वह व्यक्ति न होकर उससे रखी गई हमारी आशा है, अपेक्षा है । जब हम प्रत्येक व्यक्ति से अपेक्षा/आशा का त्याग कर देंगे तो फिर हम जीवन में कभी दुःखी नहीं हो सकते । भगवान बुद्ध का कहना है कि संसार ही दुःख का कारण है, इस दुःख का निवारण किया जा सकता है और ऐसे दुःख के निवारण का एक निश्चित मार्ग भी है अर्थात् प्रत्येक दुःख के निवारण का उपाय है । वह उपाय है - सत्य को स्वीकार करना । बुद्ध कहते हैं - ‘दुःख को समझो, उसके कारण को पहचानो और दुःख के अंत तक पहुंचने वाले मार्ग पर चलो ।’ उनके अनुसार दुःख से भागना समाधान नहीं है; उसे सही रूप से समझना और आसक्ति से मुक्त होना ही शांति का मार्ग है । वास्तविकता यह है कि दुःख का कारण संसार नहीं है बल्कि हमारी उसके प्रति आसक्ति है । इस आसक्ति का एक कारण हमारा उससे आशा और अपेक्षा रखना भी है । अतः प्रत्येक आशा का त्याग कर देना ही दुःख निवारण में सहायक सिद्ध होगा ।

क्रमशः भाग 3