आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -27 से आगे
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि ऐसी स्थिति आने पर उस समय ‘मेरा’ से भी अधिक ‘मैं’ बड़ा और महत्वपूर्ण हो जायेगा क्योंकि आसक्ति सदैव ‘मेरा’ से ‘मैं’ में अधिक होती है। इसलिए अनासक्त होने के लिए यह आवश्यक है कि हम ‘मैं और मेरा’ की सम्पूर्ण भावना का ही परित्याग कर दें । जब हमारे लिए ‘तेरा’ से ‘मेरा’ और ‘मेरा’ से ‘मैं’ अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, तब हम अनासक्त होने की कल्पना तक नहीं कर सकते । यह ‘मैं’ ही हमारा अहं (अहंकार) है । ‘मैं’ नहीं रहेगा तो ‘मेरा’ भी नहीं होगा । अतः ‘मैं-मेरा’ की भावना का त्याग करना है तो ‘मैं’ (अहं अर्थात् अहंकार) को छोड़ दें फिर ‘मेरा’ का भी त्याग हो जाएगा ।
इस प्रकार हमने आसक्ति से अनासक्त होने के तीन सूत्रों पर अभी तक विचार किया है । आइये ! अब चौथे सूत्र की ओर चलते हैं ।
एक बहुत बड़ा व्यापारी था । वह व्यापार में इतना अधिक व्यस्त रहता था कि उसके पास सदैव समय का अभाव बना रहता था । व्यस्त इतना जैसे कि कहते हैं न कि उसके पास इतना भी समय नहीं है कि वह साँस भी आराम के साथ ले सके । उसने अपने जीवन में एक ही उद्देश्य बना रखा था, धन कमाना, और अधिक, और अधिक धन कमाना । आखिर एक दिन उसको कुछ फुर्सत के क्षण मिल ही गए । दोपहर का समय था । दुकान पर ग्राहक भी नहीं थे । गर्मी की दोपहर वैसे भी उनींदा सी होती है । सेठ को कर्मचारी का ठाले बैठे रहना वैसे ही पसंद नहीं था । सेठ ने समय काटने के उद्देश्य से ऐसे ही मुनीम को पूछ लिया कि ‘मुनीम जी, जरा बही-खाते देखकर बताएं कि मेरे पास कितना धन है ।’ इधर मुनीम ने बही-खाते खंगालना प्रारम्भ किया और उधर सेठजी को झपकी आने लगी ।
कोई आधा घंटा लगा होगा मुनीम को हिसाब-किताब लगाने में । भली-भांति निरीक्षण कर मुनीम ने झपकी लेते सेठ को जरा ऊँची आवाज में कहा कि ‘सेठजी, आपके पास इतना धन जमा हो गया है कि आपकी सात पीढ़ियां बिना कुछ कमाए अपने जीवन में मौज कर सकती है ।’
सेठ को एक झटका सा लगा और उसकी नींद उड़ गयी । वह उठ बैठा और सोचने लगा कि सात पीढ़ी तक तो ठीक है परन्तु आठवीं पीढ़ी क्या खाएगी ? उसने विचार किया कि मुझे और अधिक धन कमाना चाहिए, अपने खर्चों में और अधिक कटौती करनी चाहिए । अब उसने अपने और पत्नी के खर्चों में कटौती करना प्रारम्भ कर दिया । एक गरीब व्यक्ति की तरह रहने लगा । सदैव इसी बात की चिंता करता रहता कि अधिक से अधिक धन कैसे इकट्ठा किया जाये ? इस प्रकार उस सेठ की धन में गहरी आसक्ति हो गयी । उसकी पत्नी और मुनीम उसे बहुत प्रकार से समझाते, परन्तु सेठ पर किसी बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ता ।
कुछ समय बाद एक संत पुरुष ने उस नगर में प्रवेश किया । एक दिन सेठ के घर पर भी वह आया । सेठ को चिंता मग्न देखकर उसने कारण पूछा । सेठ ने अपनी व्यथा बताई कि उसने सात पीढ़ियों के खाने का इंतजाम कर दिया है परन्तु उसके बाद की पीढ़ियां क्या खाएगी ? संत सब कुछ समझ गए । उन्होंने कहा कि शहर के बाहर एक ब्राह्मण परिवार रहता है, केवल वह ही इस बात का उत्तर दे सकता है, वहाँ जाकर उससे इस प्रश्न का उत्तर पूछे ।
दूसरे दिन सेठ ने एक बैलगाड़ी पर ब्राह्मण को दान में देने के लिए बहुत सी खाद्य सामग्री को लादा और अपने प्रश्न का उत्तर जानने के लिए ब्राह्मण के घर की ओर प्रस्थान किया । सेठजी ज्योंही ब्राह्मण के घर पहुंचे ब्राह्मण आँगन में ही खड़ा मिल गया । सेठ ने खाद्य सामग्री उतरवाना प्रारम्भ किया तो ब्राह्मण पूछ बैठा - ‘सेठजी, यह सब क्या है ?’ सेठ ने कहा कि आपके लिए एक महीने का राशन-पानी है । ब्राह्मण ने ऊँची आवाज़ में अपनी पत्नी को पूछा - ‘भाग्यवान, सायं के भोजन के लिए घर में खाद्य सामग्री है या नहीं ।’ पत्नी ने उत्तर दिया - ‘शाम के भोजन के लिए खाद्य सामग्री तो घर में पर्याप्त है ।’ ब्राह्मण ने विनयपूर्वक सेठ से कहा- ‘सेठजी, हमें आज कोई सामग्री नहीं चाहिए । कल की मैं चिंता नहीं करता । कल की कल देखेंगे । अतः यह सब खाद्य सामग्री लेकर आप लौट जाएँ ।’
ब्राह्मण के वचन सुनकर सेठ सुन्न होकर रह गया । वह सोचने लगा कि कहाँ यह साधारण ब्राह्मण जो कल के भोजन तक की चिंता नहीं कर रहा और कहाँ मैं एक सेठ, जो अपनी आठवीं पीढ़ी की चिंता अभी से कर रहा हूँ ।
इस दृष्टान्त से अनासक्त होने का चौथा सूत्र निकल कर हमारे सामने आता है - “संतुष्टि पूर्ण जीवन।” हमारा जीवन संतुष्टि पूर्ण होना चाहिए । हमारी समस्या यही है कि हम अपने जीवन में कभी भी संतुष्ट नहीं होते । सोशल मीडिया पर आपमें से बहुतों ने पढ़ा होगा - ‘जो प्राप्त है वह पर्याप्त है’ । परन्तु क्या हमने इस वाक्य को अपने जीवन में उतारा है अथवा उतारने का प्रयास भी किया है ? नहीं, बिलकुल भी प्रयास नहीं किया है । अगर हम इस वाक्य को आत्मसात करने का प्रयास भी करते तो कम से कम 50 प्रतिशत लोगों के जीवन से आपाधापी समाप्त हो गयी होती ।
‘जो प्राप्त है, वह पर्याप्त है’ इस वाक्य को स्वीकार करते तो संग्रह करने में नहीं लगते और जो कुछ प्राप्त हुआ, उसमें ही सन्तुष्ट रहते । हम जीवन में कभी संतुष्ट हो ही नहीं सकते, अपनी इच्छा अनुरूप सब कुछ प्राप्त करके भी । अधिक से अधिक प्राप्त कर संग्रहित करने की चाहना ने हमें असंतुष्ट ही पैदा किया है और जीवन भर असंतुष्ट रहते हुए असंतुष्टि के साथ ही इस देह को त्याग देंगे, फिर से एक नए जीवन में असंतुष्टि के साथ पैदा होने के लिए ।
अब प्रश्न पैदा होता है कि जीवन में संतुष्टि आये कैसे ? संतुष्टि प्राप्त करने के लिए हमें संतुष्ट होने का गणित समझना होगा । संतुष्टि सदैव रुचिकर प्रभाव वाली वस्तु की मात्रा के विलोमानुपाती (Indirectly proportional) होती है और विपरीत प्रभाव वाली वस्तु की मात्रा के समानुपाती (Directly proportional) होती है । दूसरे शब्दों में कहूँ तो कह सकता हूँ कि जिस वस्तु अथवा भोग को प्राप्त करने में आपको सुख मिलता है, वह सदैव आपको अपर्याप्त लगता है और आप उस प्राप्त भोग से संतुष्ट नहीं होते । जिस वस्तु/भोग को प्राप्त करने से आप दुःख को प्राप्त होते हैं उसकी कम मात्रा से भी आप दुःखी होकर दुबारा उसे प्राप्त करने की कामना तक नहीं करते हैं । इस गणित के आधार पर ही हम संतुष्टि का स्तर निश्चित करते हैं । क्या कारण है कि फिर भी हम प्रत्येक भोग को बार-बार प्राप्त करने की कामना रखते हैं ?
इस संसार को दुःख का सागर कहा जाता है और साथी ही इसे अशाश्वत भी कहा गया है । सब कुछ जानते हुए भी कोई भी मनुष्य इससे निवृत्ति नहीं चाहता । सत्यता तो यह है कि प्रतिपल इससे स्वतः ही निवृत्ति हो रही है । संसार का प्रत्येक भोग प्रारंभ में सुख का कारण बनता है और अंत में वह दुःख ही प्रदान करता है । इसी कारण से संसार को दुःख का सागर कहा जाता है । हम सब कुछ जानते हैं फिर भी इस आशा में प्रत्येक भोग के साथ चिपके रहते हैं कि कभी न कभी तो इनकी प्राप्ति के लिए कर्म करने से हमें वह भोग बार-बार मिलेगा और हमें शाश्वत सुख का अनुभव होगा । सारे प्रयासों के बाद भी कुछ हाथ नहीं लगता, हाथ रीते ही रह जाते हैं और अंततः हम दुःख को ही प्राप्त होते हैं ।
संतुष्टि है - जो कुछ मिला है, उसमें खुश रहना । असंतुष्टि है - जो मिला है वह पर्याप्त नहीं है और यह आशा करना कि थोडा और अधिक मिले । यहीं आकर मनुष्य गलती कर बैठता है । ‘और अधिक मिलने’ की कामना करना ही ‘मिले हुए’ से असंतुष्ट होना है । ‘और अधिक प्राप्त करने की कामना’ का कभी अंत नहीं आ सकता । जितना कामनाओं को पूरा करने का प्रयास किया जाता है उतनी ही और नई कामनाओं का जन्म होता है । जब तक हम स्वयं अपने मन को नियंत्रित नहीं करेंगे, कामनाओं का जन्म नहीं रुकने वाला । मन को नियंत्रित करने का एक ही उपाय है : वास्तविकता अर्थात सत्य को स्वीकार करना ।
सत्य का अनुभव हमें ज्ञान प्राप्त करने से ही हो सकता है । केवल ज्ञान प्राप्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उस ज्ञान को जीवन में उतारना भी आवश्यक है । हमें इस जन्म में जो कुछ भी प्राप्त होना है, वह हमारे जन्म लेने से पूर्व ही निश्चित किया जा चूका है । उससे न तो रत्ती भर कम मिलना है और न ही अधिक । हमारे प्रत्येक शास्त्र में इसका स्पष्ट रूप से उल्लेख है । इस बात का ज्ञान हम सभी को है परन्तु जब तक इस ज्ञान को क्रियान्वित नहीं करेंगे, इस ज्ञान का जीवन में उपयोग नहीं करेंगे तब तक यह ज्ञान एक बोझ से अधिक कुछ भी नहीं है । इतने चिंतन के बाद यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि संतुष्ट जीवन तभी हो सकता है, जब हमें इस जीवन में जो कुछ भी हमारी सोच से अधिक या कम मिला है उसको ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार करें और अपने मन को नियंत्रण में रखते हुए जीवन में संतुष्ट होने का प्रयास करें ।
बहुत समय पहले एक दरवेश (घुमक्कड़ मुसलिम फ़क़ीर) आरिफ सुभानी हुए थे । उन्हें संसार की मोह-माया छू तक नहीं गयी थी, इतने विरक्त महापुरुष थे । तन पर पहने हुए कपड़ों के अतिरिक्त उनके पास कुछ भी नहीं था । शांतिप्रिय और सादगी पूर्ण जीवन जीने वाले इस संत का स्वभाव दूसरों से मेल नहीं खाता था । आरिफ सुभानी मंदिर, मस्जिद और गिरिजा घर (Church) में भेद तक नहीं करते थे । अल्लाह के बन्दों को एक ही सीख देते थे कि मजहब के भेदभाव से ऊपर उठो ।
आरिफ सुभानी से प्रभावित होकर एक दिन एक व्यक्ति उनके पास आया । उसने कहा कि ‘मैं आपसे से प्रभावित होकर आया हूँ और आपके साथ रहकर अल्लाह की बंदगी करना चाहता हूँ ।’ सुभानी ने पूछा-“क्या ऐसा करने के लिए तुम्हें मेरे अतिरिक्त अन्य कोई नहीं मिला ?” उसने उत्तर दिया-‘नहीं, वैसे तो अल्लाह की बंदगी करने वाले बहुत से हैं परन्तु मैं आपके व्यवहार से प्रभावित होकर आपके पास वह सब कुछ सीखने आया हूँ, जो किसी अन्य के पास नहीं है । मैं आपके पास रहकर बहुत कुछ सीखना चाहता हूँ ।’ दरवेश स्वयं में मस्त था, उसे किसी अन्य की उपस्थिति बहुत खलती थी । इसलिए उन्होंने स्पष्टतः आगन्तुक अपने पास रखने से मना कर दिया ।
वह व्यक्ति उनके सामने गिडगिडाते हुए कहने लगा कि ‘जब आप ही मुझे अपने पास नहीं रख रहे हैं तो आप ही बताइए मैं क्या करूँ, आप में जो कुछ है, उसे पाने के लिए किसके पास और कहाँ जाऊं ? मैं कैसे अपने आपको आपकी तरह का इंसान बना सकता हूँ ?’ सुभानी ने कहा कि ‘तुम जिस धर्म को मानते हो, उसके अतिरिक्त किसी अन्य धर्म को मानने वाले के पास चले जाओ । तुम इस्लाम में विश्वास करते हो तो किसी एक ईसाई धर्म में विश्वास करने वाले के पास चले जाओ । उसके पास बैठो, उसकी सब कुछ सुनो परन्तु ध्यान रखना, प्रत्युतर में उसे भला-बुरा कुछ भी नहीं कहना है ।’
सुभानी की बात सुनकर वह व्यक्ति हैरान रह गया । उसने पूछा - ‘आप यह क्या कह रहे हैं, इससे क्या होगा ?’ दरवेश ने कहा कि ‘तुम जिस धर्म को मानते हो, उससे दूर जो उस धर्म को नहीं मानता है, उसके पास चले जाओ । उससे भी ऐसा ही आग्रह करना, जैसा तुमने मुझसे किया था । वह तुम्हारे धर्म की निंदा अवश्य ही करेगा । तुम केवल सुनते रहना, अपने धर्म के बारे में कुछ भी नहीं कहना । धीरे-धीरे तुम्हारे भीतर इतनी सहिष्णुता आ जाएगी कि विरोधियों की बातों का बुरा नहीं लगेगा और तुम्हें क्रोध पैदा नहीं होगा । ऐसी सहनशीलता आने पर ही तुम्हें सच्ची शान्ति मिलेगी और तुम खुदा के बन्दों में अपना स्थान बना लोगे ।’ बात तो सत्य कही थी, उस आरिफ सुभानी नामक दरवेश ने । हम किसी भी एक विचारधारा, व्यक्ति अथवा संप्रदाय आदि के प्रति इतने अधिक आसक्त हो जाते हैं कि उसके विरोध में उठता एक स्वर तक सुनना पसंद नहीं करते । यही कारण है कि आज ‘सर तन से जुदा’ जैसे आतंकित करने वाले नारे लगते हैं । खेल के मैदान तक में एक टीम के समर्थक दूसरी टीम के समर्थकों से खूनी संघर्ष तक कर लेते हैं, जबकि खेल में हार-जीत से उनका कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता । सहनशीलता हमें आसक्ति से मुक्त करती है और अनासक्त बनाती है । ऐसे में हम चाहे जिस टीम का समर्थन कर रहे हों, जो भी टीम जीते-हारे, हमारे ऊपर इस हार-जीत का प्रभाव नहीं होगा । अनासक्त रहकर टीमों का संघर्ष देखने से ही आपको उस खेल में आनंद आएगा ।
दरवेश आरिफ सुभानी के इस दृष्टान्त से अनासक्त होने का एक और सूत्र हमारे हाथ लगता है - ‘सहिष्णु बनो, विरोध को भी सहना सीखो ।’ आरिफ सुभानी दरवेश ने उस व्यक्ति को यही सीख दी थी कि किसी भी एक धर्म का पालन करने वाला किसी दूसरे धर्म के पालन करने वाले के मध्य कभी भी बाधक नहीं बन सकता । सभी धर्मों की एक समान शिक्षा है ।
कुटिलता तो हमारे भीतर (मन में) होती है कि हम अपने धर्म को श्रेष्ठ और दूसरे धर्म को तुच्छ समझते हैं । संसार के समस्त धर्म अच्छे हैं परन्तु जब हम एक धर्म के प्रति आसक्त हो जाते हैं, तब दूसरा धर्म हमें निम्न स्तर का प्रतीत होने लगता है । वास्तविकता यह है कि सभी धर्म हमें परमात्मा की ओर ले जाते हैं और आपस में प्रेम करने और प्रेम से रहने की शिक्षा देते हैं । एक धर्म के प्रति हमारी आसक्ति ही साम्प्रदायिक तनाव का कारण बनती है । धर्म में आसक्ति और धर्म से विरक्ति, दोनों ही अनुचित है । अतः अनासक्त होकर प्रत्येक को स्व-धर्म का पालन करते रहना चाहिए ।
यही नियम इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति, समूह और समाज पर लागू होता है । हम अलग-अलग समाज और जातियों में इस प्रकार बंटे हुए हैं कि हमें हमारा देश, देश में भी हमारा प्रान्त, प्रान्त में भी हमारा क्षेत्र, फिर समाज, अपनी जाति और अंत में परिवार ही सर्वोच्च नज़र आता है । जिस दिन हमारे भीतर अनासक्ति पैदा हो जाएगी ‘वसुधेव कुटुम्बकम्’ की भावना को स्वीकार कर लेने में तनिक सी भी देर नहीं लगेगी ।
सनातन धर्म की सोच सदैव ही इसी प्रकार की रही है । सनातन धर्म अर्थात् वह धर्म, जो पहले भी था, आज भी है और भविष्य में भी रहेगा क्योंकि इस धर्म में सभी विचारधाराओं का समावेश किया गया है । जो भी परमात्मा की ओर जाने का रास्ता दिखलाता है, वही हमारे लिए पूजनीय बन जाता है ।
हम सगुण साकार की भी उपासना करते हैं, साथ ही निर्गुण निराकार में भी विश्वास रखते हैं । और तो और हमने नास्तिकता को भी कभी महत्वहीन नहीं कहा है । सहिष्णुता की भावना तो हमें विरासत में मिली है । यही एक मात्र कारण है जो सदियों से यहाँ इस देश में हम सभी धर्मों और उनके अनुयाइयों के आगमन का सम्मान करते आए हैं । हमारी दृष्टि में यहाँ कोई पराया नहीं है, सभी अपने हैं । यहाँ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘ मूलमंत्र ही सबके जीवन में रचा - बसा है। सभी एक दूसरे के पूरक हैं, कहीं किसी प्रकार का कोई भेद नहीं ।
केवल एक सहिष्णु व्यक्ति ही मध्य में रह सकता है । न तो आसक्त और न ही विरक्त, बस केवल अनासक्त । कबीर ने सहनशील बनने का उपाय बताते हुए बहुत ही सुन्दर बात कही है -
निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छुवाय ।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय ।।
स्वभाव को निर्मल बना लेना ही आसक्त से अनासक्त होना है ।
आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -37 अनासक्ति के अगले सूत्र के लिए अब आगे बढ़ते हैं । एक विरक्त संत हुआ करते थे । बचपन से ही उनका अध्यात्म के प्रति बड़ा गहरा रुझान था । उन्हें कामना और क्रोध छू कर तक नहीं गये थे । जब तक मन में किसी भी प्रकार की कामना जन्म नहीं लेती है, तब तक भला क्रोध किस पर करे ? कामना ही क्रोध की जननी है, क्रोध पैदा ही तब होता है जब कामना पूरी नहीं होती । साथ ही साथ कामना लोभ की जननी भी है । जब एक कामना पूरी हो जाती है तब वह मन में लोभ उत्पन्न करती है और फिर एक नई कामना का जन्म हो जाता है । हाँ, तो बात हो रही थी एक विरक्त संत की । संत घने जंगल में बैठकर कठोर तप करते हुए आत्म-बोध को उपलब्ध होने का प्रयास कर रहे थे । इसके लिए विरक्त संत तपस्या में लीन होकर तपस्वी बन गए थे । पास के ही एक गाँव की काली-कलूटी बहुत ही बदसूरत लड़की उस जंगल में बने तालाब से जल भरने के लिए नियमित रूप से आती थी । वह प्रतिदिन देखती कि वह तपस्वी तप में सदैव लीन रहता था । उसके लिए खाने-पीने की क्या व्यवस्था है, वह इस पर सोच-विचार किया करती । उसको वहाँ कोई व्यवस्था नज़र नहीं आयी । अंततः उसको उस तपस्वी पर दया आ गयी । वह घर से खाना बनाकर लाती, तालाब से जल का घड़ा भरती और दोनों को तपस्वी की कुटिया में रख देती ।
तपस्वी की कठोर तपस्या को देखकर इंद्र विचलित हो गया । वह सोचने लगा कि आख़िर यह तपस्वी इतना कठोर तप क्यों कर रहा है, कहीं मेरे सिंहासन पर तो इसकी दृष्टि नहीं है ? इंद्र, देव-लोक का शासन-कर्ता । देव लोक अर्थात स्वर्ग, जहाँ देवताओं की प्रत्येक इच्छा पूरी होती है, काम से लेकर समस्त सुख प्राप्त करने की । आप यह न समझें कि स्वर्ग में कोई कामना नहीं होती । अगर कामना नहीं होती तो स्वर्ग की कल्पना तक नहीं होती । हमारी कामनाएं ही हमारे लिए स्वर्ग और नरक का निर्माण करती है ।
हाँ, तो इंद्र बड़ा चिंता मग्न था कि हो न हो; यह तपस्वी मेरा पद छिनने के लिए ही इतना कठोर तप कर रहा है । इंद्र ने एक उपाय सोचा और उसको क्रियान्वित किया भी । उसने उस गाँव की बदसूरत सी काली-कलूटी लड़की को अप्रतिम सौन्दर्य की मल्लिका बना दिया । उस लड़की का सौन्दर्य इतना अधिक प्रभावशाली हो गया था कि उस समय तो उसके सामने स्वर्ग की अप्सराएँ (उर्वशी, मेनका आदि) भी पानी भरती दिखलाई पड़ रही थी ।
अप्रतिम सौन्दर्य (Outstanding beauty) पाने के बाद भी गाँव की उस लड़की का तो प्रतिदिन का यही नियम कि तपस्वी की कुटिया में खाना-पानी रखे । एक दिन तपस्वी ध्यान के बाद यूँ ही बैठा हुआ था कि उसी कुमारी कन्या ने खाना-पानी रखने के लिए कुटिया में प्रवेश किया । तपस्वी की दृष्टि उस बालिका पर पड़ी । उसका अप्रतिम सौन्दर्य देखकर वह स्वयं तक को भुला बैठा । उसने तत्काल ही अपनी तपस्या को अनवरत जारी रखने का विचार त्याग दिया । उसने बिना सोचे-समझे उस लड़की के समक्ष विवाह करने का प्रस्ताव रख दिया; एकदम आधुनिक युग में एक लडके द्वारा लड़की को किए जाने वाले ‘प्रपोज’ की तरह ।
तपस्वी से विवाह-प्रस्ताव सुनकर वह कुमारी कन्या शर्म से लाल हो गयी । उसने अपने जीवन में कल्पना तक नहीं की थी कि किसी दिन एक तपस्वी उसके समक्ष विवाह का प्रस्ताव भी रख सकता है । गाँव की इस बाला को और क्या चाहिए था, उसने तत्काल ही विवाह के लिए स्वीकृति देते हुए ‘हाँ’ कर दी और अपने घर लौट गयी । उस कन्या के द्वारा विवाह प्रस्ताव पर ‘हाँ’ कहते ही स्वर्ग लोक में बैठा इंद्र प्रसन्न हो गया और साथ ही साथ आश्वस्त भी कि अब निकट भविष्य में उसके सिंहासन को कोई खतरा नहीं है । काम-वासना से ग्रस्त तपस्वी अपने स्तर से नीचे गिरने लगा था । दिन-रात परमात्मा का ध्यान करने वाला तपस्वी आज तप करना भूलकर गाँव की एक साधारण सी कन्या के सौन्दर्य-जाल में उलझ कर रह गया था । उस तपस्वी से हम जरा से भी अलग नहीं है । हमारा भी यही हाल है, जहाँ कोई कामना पूरी होती नज़र आती है, जीवन का उद्देश्य तक भूला बैठते हैं । इधर जंगल में स्थित उस कुटिया में तपस्वी को नींद नहीं आ रही है, रह-रह कर करवटें बदल रहा है और निकट भविष्य में होने जा रहे विवाह की मधुर कल्पना में खोया हुआ है । उधर गाँव में लड़की का भी यही हाल है, उसे भी नींद नहीं आ रही है परन्तु लड़की को नींद न आने का कारण तपस्वी को नींद न आने के कारण से एकदम भिन्न है । लड़की यह सोचकर व्यथित है कि मेरे कारण उस तपस्वी के तप में बाधा आ गयी है । मुझे विवाह का प्रस्ताव तत्काल ही अस्वीकार कर देना चाहिए था परन्तु अब क्या हो सकता है ? उसने रात भर विचार किया और तत्काल ही एक महत्वपूर्ण निर्णय पर पहुँच गयी ।
सुबह होते ही उसने खाना बनाया और जंगल में स्थित उस तपस्वी की कुटिया की ओर चल पड़ी । जल्दी ही वह उस तपस्वी की कुटिया में प्रवेश पा गयी । तपस्वी ने सर्वप्रथम तो उसे जी भर कर देखा और फिर इतनी सुबह आने का प्रयोजन पूछा । युवती ने क्षमा मांगते हुए कहा कि आज ही वह किसी आवश्यक कार्य-वश कहीं बाहर जा रही है । उसने तपस्वी को उसके और स्वयं के स्तर की तुलना करते हुए कहा कि इस प्रकार विवाह करना उपयुक्त नहीं है । एक तपस्वी को अपने तप में, अपनी साधना में आगे प्रगति करनी चाहिए और गृहस्थी बसाने का निर्णय त्याग देना चाहिए ।
यकायक यह सुनकर तपस्वी को एक झटका सा लगा । उसकी विवाहोपरांत की सभी कल्पनाएँ एक क्षण में ही मटियामेट हो चुकी थी । उसने बड़े ही दुःखी मन से युवती को अपनी कुटिया से विदा किया और पुनः तपस्या में लीन हो गया । परिस्थितियाँ अचानक ही एकदम बदल गयी थी । अब पुनः चिंताग्रस्त होने की बारी इंद्र की थी ।
गाँव लौटकर उस युवती ने फिर कभी उस जंगल की ओर, उस तपस्वी की कुटिया का रुख नहीं किया । तपस्वी कठोर तप में लीन था । अब इंद्र ने इस तपस्वी को देव-लोक का सिंहासन सौंप कर उसका सहायक बनने में ही अपना भला समझा । यह सोचकर इंद्र भूलोक पर उतर आया और उसने तपस्वी की कुटिया में प्रवेश किया ।
तपस्वी की आँख खुली, अपने सामने साक्षात् देवराज इंद्र को खड़ा पाया । इंद्र ने तपस्वी को दंडवत प्रणाम किया और बड़े ही प्रेम से बोला - ‘हे तपस्वी ! आपने बड़ा कठोर तप किया है । केवल आप ही देव-लोक के पद पर आसीन होने के अधिकारी हैं । मैं आपका सहायक बनकर आपकी सेवा में रहूँगा । श्रीमन्, मैं आपको देव-लोक का कार्यभार संभालने के लिए आमंत्रित करने आया हूँ ।’
इस प्रकार इंद्र के मुख से स्वर्ग का राज्य मिलने की बात सुनकर भी तपस्वी प्रसन्न नहीं हुआ । उसने स्वर्ग लोक का शासन संभालने से इनकार कर दिया । अब एक बार फिर से चौंकने की बारी देवराज की थी । वे अपने शासन काल में स्वयं के समक्ष खड़ा एक ऐसा मनुष्य देख रहे थे, जिसके मन में स्वर्ग का राजा बनने तक की कामना भी नहीं है, छोटी-मोटी कामनाओं के तो मन में बने रहने का प्रश्न ही कहाँ पैदा होगा । इंद्र सोचने लगा कि यह तपस्वी तो निश्चित ही ब्रह्म-लोक जाने का अधिकारी है । उसने तपस्वी को कहा – ‘मैं, सब कुछ समझ गया हूँ । आप ब्रह्म-लोक को प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं और निश्चय ही वहां जाने के अधिकारी भी हैं । ब्रह्म-लोक के सामने भला देव-लोक की क्या बिसात । परमात्मा आपकी यह इच्छा भी पूरी करे ।’
इतना कहकर इंद्र वापिस अपने लोक जाने को मुड़ा ही था कि अनायास ही उसके मन में एक बात आई । वह सोच रहा था कि ऐसा कैसे हो सकता है कि इस भूलोक के किसी एक मनुष्य की सभी कामनाओं का अंत हो गया हो । कम से कम मुझे इस तपस्वी को पूछना तो चाहिए कि क्या जीवन में उसकी कोई और कामना अभी भी शेष है ?
इंद्र तत्काल ही उस तपस्वी की ओर उन्मुख हुआ और बोला - ‘श्रीमान ! मेरे योग्य और कोई सेवा हो तो बताएं । आपके मन में और कोई इच्छा हो तो बताएं, आपका यह सेवक तुरंत ही आपकी वह इच्छा पूरी कर देगा ।’ इतना सुनते ही उस तपस्वी का चेहरा ख़ुशी से चमक उठा ।’ तपस्वी करबद्ध होकर इंद्र के सामने खड़ा हो गया और बोला - ‘ अगर आप मेरी इच्छा को जानना और पूरी करना ही चाहते हैं तो गाँव वाली उस रूपवती कन्या को मेरे समक्ष ला कर खड़ा कर दीजिये, मैं उसके साथ विवाह कर अपनी गृहस्थी बसाना चाहता हूँ ।’
इंद्र इतना सुनकर समझ गया कि इस भूलोक में मनुष्य के जीवन से कभी भी कामना समाप्त नहीं हो सकती । इंद्र ने आगे उस तपस्वी की इच्छा पूरी करने के लिए क्या किया, उसको जानना हमारे लिए आवश्यक भी नहीं है । आवश्यक इसलिए नहीं है क्योंकि अगर इंद्र ने उसकी यह एक कामना पूरी भी कर दी होगी, तो वह तपस्वी पुनः कई नई कामनाओं के जंजाल में और अधिक उलझ गया होगा ।
इस दृष्टान्त से अनासक्त होने का एक और सूत्र निकल कर हमारे सामने आता है - “कामनाओं पर नियंत्रण रखना ।”
आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -43
कामना रखने से व्यक्ति कर्म के प्रति आसक्त होता है । जब कामना पूरी हो जाती है, लोभ पैदा हो जाता है । लोभ पुनः नई कामनाओं को जन्म देता है और फिर से व्यक्ति कर्म में आसक्त हो जाता है । इस प्रकार कामनाएं आसक्ति को जन्म देती है और आसक्ति कामनाओं को । यह दुष्चक्र कभी भी टूट नहीं पाता और मनुष्य इस संसार के आवागमन से मुक्त नहीं हो पाता । जब हम कामनाओं को नियंत्रित कर लेंगे तो शीघ्र ही अनासक्त-भाव को प्राप्त हो जायेंगे । आइये ! अब जानने का प्रयास करते हैं कि कामनाएं नियंत्रित कैसे हो सकती है ?
कामनाओं को नियंत्रित करने के लिए हमें कामनाओं के विज्ञान को समझना होगा । कामनाएं तभी उत्पन्न होती है, जब इन्द्रियां किसी भोग के प्रति आसक्त हो जाती है । परन्तु इन्द्रियां अकेले भोग प्राप्त नहीं कर सकती, उसके लिए मन का इन्द्रियों के साथ रहना आवश्यक है । मन इन्द्रियों के साथ रहकर कर्म करवाता है, तभी इस शरीर से भोग प्राप्त हो सकते हैं । मन पर प्रभाव बुद्धि का होता है क्योंकि बुद्धि मन से पर अर्थात सूक्ष्म और श्रेष्ठ है । अगर बुद्धि को मन अपने वश में कर लेता है तभी वह इन्द्रियों से कर्म करवाकर भोग उपलब्ध करवा सकता है अन्यथा नहीं । कोई भी भोग कभी भी मनुष्य को संतुष्ट नहीं कर सकता । असंतुष्टि फिर नई कामनाओं को जन्म देती है और नयी कामनाओं को पूरा करने के लिए फिर से मन और इन्द्रियां कर्म करने में जुट जाती है । इस प्रकार यह कामनाओं और कर्म का एक अटूट चक्र बन जाता है जिसका टूट पाना लगभग असंभव हो जाता है ।
भगवान श्री कृष्ण गीता में अर्जुन को कहते हैं -
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ।। गीता-3/42 ।।
अर्थात इन्द्रियों को शरीर से पर अर्थात श्रेष्ठ और सूक्ष्म कहते हैं, इन्द्रियों से पर मन है; मन से भी पर बुद्धि है और बुद्धि से भी पर अर्थात सूक्ष्म वह (आत्मा) अर्थात् आप स्वयं है ।
काम रहता है इस बुद्धि और आत्मा के सन्धि स्थान पर । उस सन्धि को ‘अहं’ कहा जाता है । वास्तव में ऐसी किसी सन्धि का अस्तित्व है नहीं, केवल अज्ञान के कारण हमें प्रतीत होती है । ज्ञान होते ही जब आत्मा और बुद्धि का काल्पनिक सन्धि-भंग हो जाता है, तह अहं शुद्ध होकर अहम् (मूल स्वरूप) हो जाता है । इस अहम् को ही आत्मा कहा जाता है और उस अहं को अहंकार ।
बुद्धि से पर अर्थात सूक्ष्म अर्थात् पर भी एक और है, जिसको आत्मा कहा जाता है और जो कि जड़ तत्वों में केवल बुद्धि के निकट है । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि बुद्धि और आत्मा को हमारा अहं (अहंकार) ही जोड़ता है । अहं के अस्तित्व में आते ही आत्मा अक्रियता में चली जाती है अर्थात् फिर उसकी शरीर की सक्रियता में कोई भूमिका नहीं रहती । आत्मा के अक्रिय हो जाने को ही आत्मा का मरना अथवा देशी भाषा में राम निकल जाना कहते हैं । फिर सारा खेल शरीरों (स्थूल और सूक्ष्म) के स्तर पर ही खेला जाने लगता है, आत्मा से उसका कोई सम्बन्ध नहीं रहता । चलिए ! अपनी इस बात को और अधिक स्पष्ट करने का प्रयास करता हूँ ।
आत्मा जब शरीर को ही अपना स्वरूप मान लेती है, वह आत्मा का सक्रिय रूप है, जिसे अहं कहा जाता है । वास्तव में आत्मा का स्वरूप अक्रिय है और समझने की दृष्टि से उसे मूल अहम् कहा जा सकता है । सक्रिय स्वरूप अर्थात् अहं, सूक्ष्म शरीर के माध्यम से संसार में विचरण करता है और उसमें आसक्त होकर कर्ता-भोक्ता बन जाता है । आत्मा का अक्रिय स्वरूप अर्थात् जो मूल अहम् है, वह शरीर से भिन्न है और परमात्मा से अभिन्न है । वह न कर्ता है और न ही भोक्ता । सक्रिय अहं को ऊर्जा मिलती है अक्रिय मूल अहम् (आत्मा) से । इसी ऊर्जा को पाकर वह शरीर और संसार में आसक्त हो जाता है, जिस कारण से जीव में कर्ता-भोक्ता भाव पैदा हो जाता है ।
मन से आत्मा का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता । हाँ, केवल बुद्धि के कारण ही उसे मन के साथ जुड़कर जीवात्मा बनना पड़ता है । अगर बुद्धि सदैव आत्मा के अनुसार चले तो इस ‘अहं’ का लोप हो जाता है और फिर अहम् (आत्मा) को स्वतन्त्र माना जा सकता है । कहने का अर्थ है कि मन ही बंधन का कारण है लेकिन ऐसा होना तभी संभव हो सकता है जब मन बुद्धि पर प्रभावी हो जाये । प्रत्येक व्यक्ति अपने अधीन के साथ सम्बन्ध न रख कर अपने से उच्च के साथ सम्बन्ध बनाये रखना चाहता है । जब हम अपने अधीन के प्रभाव में आकर उसका कहा मानने लगते हैं तो हम अपने स्तर से नीचे गिर रहे होते हैं । इसी प्रकार जब हम अपने से उच्च के साथ रहते हुए उसके कहे अनुसार चलते हैं तो हम प्रगति-पथ पर अग्रसर हो रहे होते हैं ।
आत्मा सर्वोच्च है, उसके बाद बुद्धि का स्थान है और अंत में मन का । बुद्धि के अधीन मन है और आत्मा के अधीन बुद्धि । बुद्धि का कार्य है, ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त हुए ज्ञान का उपयोग करना । बुद्धि को अपने अधीनस्थ मन के साथ हो जाने के बजाय, अपने से उच्च, आत्मा के साथ ही बने रहना चाहिए । जब व्यक्ति की बुद्धि आत्मा के साथ रहती है और उसके अनुसार चलती है, तब उसका ज्ञान विवेक में परिवर्तित हो जाता है और जब बुद्धि अपने से निम्न, मन के साथ हो जाती है तब वही ज्ञान, अज्ञान बन जाता है ।
अज्ञान वह कथित ज्ञान है, जिसे मनुष्य मन के कहे अनुसार सत्य समझ लेता है जबकि विवेक वह ज्ञान है जो मनुष्य बुद्धि को आत्मा के साथ रखकर उसका अनुसरण करता है । शास्त्रों में इसी प्रक्रिया को ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ कहा गया है अर्थात हमें परमात्मा अज्ञान की तरफ नहीं बल्कि ज्ञान की तरफ ले जाए । अतः कामनाओं को नियंत्रित करने का यही एक मात्र उपाय है कि मनुष्य अपनी बुद्धि को आत्मा के साथ संलग्न कर ज्ञान का उपयोग करे न कि मन को बुद्धि पर प्रभावी बना कर अपने मन का कहना मानता रहे । इसी बात को स्पष्ट करते हुए गीता में श्री कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं -
एवं बुद्धेः परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ।। गीता-3/43 ।।
अर्थात बुद्धि से पर यानि सूक्ष्म, बलवान और अत्यंत श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो ! तू इस कामना रुपी शत्रु अर्थात इस दुर्जय शत्रु काम को मार डाल ।
अर्जुन को युद्धभूमि में मिले इस ज्ञान को हमें भी समझना चाहिए और कामनाओं को नियंत्रित करने के लिए मन को बुद्धि के अधीन रखते हुए अपने विवेकानुसार निर्णय करना चाहिए । बुद्धि से ज्ञान का समुचित उपयोग करके ही कामनाओं को बढ़ने से रोका जा सकता है अन्यथा मन के अनुसार चलने से तो कामनाओं का अंत आना असंभव ही है ।
पूर्व में वर्णित दृष्टान्त पर एक प्रबुद्ध पाठक ने कुछ शंकाएं प्रकट की है, उसका स्पष्टीकरण श्रृंखला के मध्य में ही कर देना चाहता हूँ । वे पूछते हैं कि वह कन्या उन तपस्वी की तपस्या में विघ्न नहीं हुई, अतः कृपया स्पष्ट करें कि दोनों में तुलना करनी हो तो हम कैसे करें ?
संत की तुलना में कन्या कामनाओं से बहुत दूर है । संत के मन में कामनाएं अभी भी शेष हैं । कन्या ने अपने जीवन में किसी तपस्वी से विवाह करने की कल्पना तक नहीं की थी । मन में भोग की कल्पनाएँ ही विभिन्न कामनाओं की जननी है । जब तपस्वी ने उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा था, तब वह चौंक गयी थी और जल्दबाजी में उसने विवाह के लिए हाँ कर दी थी । परन्तु घर जाकर उसने विचार किया तब उसे लगा कि वह तपस्वी के तप में बाधक बन रही है । वह तपस्वी के तप में बाधक बनना नहीं चाहती थी । इसीलिए दूसरे दिन उसने विवाह करने से मना कर दिया था । अगर उसके मन में पहले से ही उस तपस्वी के साथ विवाह करने की कल्पना के कारण तीव्र कामना रही होती तो विवाह करने से इनकार कर ही नहीं सकती थी ।
दूसरी शंका- ‘इस लेख के माध्यम से आप क्या संदेश देने की चेष्टा कर रहे है मेरी समझ से बहुत दूर हैं, क्योंकि तपस्वी ने जब तप प्रारंभ किया तब जो उद्देश्य था उस उद्देश्य से उस गांव की रूपवती कन्या के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखने और कन्या द्वारा स्वीकार करना पुनः अगले दिन अस्वीकार कर देना । क्या आगे की तपस्या उस कन्या के साथ विवाह कर गृहस्थी बसाने के लिए थी, जो ब्रह्म लोक की भी कामना नहीं रखी ?’
लेख का सन्देश स्पष्ट है- कामनाओं को नियंत्रण में रखना आसान कार्य नहीं है । तपस्वी ब्रह्म-लोक की प्राप्ति के लिए ही तप कर रहा था । तप में समस्त सांसारिक कामनाओं को नष्ट किया जाता है और परमात्मा की प्राप्ति की कामना को सर्वोपरि रखा जाता है । जितनी अधिक तीव्र आसक्ति होती है, मन भर जाने पर उस वस्तु/व्यक्ति/भोग से उतनी ही अधिक तीव्र विरक्ति भी हो जाती है । तपस्वी विरक्त तो था परन्तु काम से पूर्णतया मुक्त नहीं हुआ था । तभी उसने कन्या को सर्वप्रथम देखते ही विवाह का प्रस्ताव रख दिया क्योंकि इतने कठोर तप के बाद भी वैवाहिक सुख के प्रति उसकी कामना नष्ट नहीं हुई थी । उसकी आसक्ति एक स्त्री और काम-भोग के प्रति बनी रही । जब दूसरे दिन कन्या ने विवाह के लिए ना कर दी तब वही तीव्र आसक्ति, पुनः तीव्र विरक्ति में परिणत हो गयी, एक दोलक के दोलन की तरह; जो दोनों तरफ दोलन करता हुआ सर्वोच्च ऊँचाई को छूता है । विवाह न होने से आहत होकर वह पुनः तीव्र विरक्ति में चला गया और ब्रह्म-प्राप्ति के लिए तप में लग गया । जब इंद्र उसके सामने आया और मन में अन्य कोई इच्छा शेष रहने का पूछा तो उसका भीतर दबा हुआ काम-भाव पुनः सतह पर आ गया और उसने उसी कन्या को मांग लिया ।
कहने का अर्थ है कि मनुष्य की कामनाएं इतनी सुगमता से नष्ट नहीं हो सकती । तपस्वी के तप के बाद भी उसके भीतर काम-भाव ऐसी स्थिति में बना रहा, जैसे राख के ढेर में दबी एक चिंगारी । जरा सा इंद्र ने उसे क्या कुरेदा कि राख हटते ही चिंगारी भभक उठी । इसीलिए सदैव यही कहा जाता है कि कामनाओं को नष्ट करना आसान नहीं है । इन्हें तो अनासक्त होकर ही नियंत्रण में रखा जा सकता है ।
हरिः शरणम् आश्रम के आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा एक संत की बात बताते हैं कि वे (उन संत का नाम मुझे अभी याद नहीं आ रहा है) कहा करते हैं कि अगर हरिद्वार से लाहौर तक के मार्ग को स्वर्ण मुद्राओं से पाट भी दिया जाये और उस मार्ग पर मुझे चलने को कहा जाये तो मेरा मन उस स्वर्ण मुद्राओं को देखकर जरा सा भी विचलित नहीं होगा । परन्तु मेरे सामने एक सुन्दर स्त्री के आ जाने पर मैं यह नहीं कह सकता कि मेरा मन उसकी उपस्थिति से तनिक सा भी विचलित नहीं होगा । हम सब के जीवन की यह एक कटु वास्तविकता है कि कामनाओं पर हमारा सदैव के लिए नियंत्रण नहीं रह पाता । उनको नष्ट करने के स्थान पर नियंत्रण करना अधिक उचित है अर्थात न आसक्ति, न विरक्ति; बल्कि अनासक्ति ।
भागवतजी में भगवान श्रीकृष्ण उद्धवजी को ज्ञान देते हुए वे अपने पूर्वज राजा यदु और दत्तात्रेयजी के मध्य हुए संवाद का वर्णन करते हैं । यह कथा भागवतजी के ग्यारहवें स्कन्ध के सातवें अध्याय से अवधूतोपाख्यान नाम से प्रारम्भ होती है । इसमें दत्तात्रेय जी कहते हैं कि हम प्रत्येक जीव से कुछ न कुछ सीख सकते हैं । जिस किसी से भी सीख के रूप में हमें ज्ञान मिलता है, वह हमारा गुरु है । दत्तात्रेय जी ने इस प्रकार अपने चौबीस गुरु बतलाए हैं । इनमें उनकी एक गुरु थी पिंगला नाम की वेश्या । एक वेश्या और गुरु ? सुनने में बड़ा अटपटा लग सकता है और स्वीकार करने में उतना ही कठिन ।
कोई भी व्यक्ति सदैव के लिए बुरा नहीं हो सकता, उसमें भी कोई न कोई एक अच्छाई अवश्य ही छिपी रहती है । वह अच्छाई जब भी प्रकट होती है तब हमारा मार्गदर्शन कर देती है । हाँ, तो बात चल रही थी, पिंगला वेश्या की । जिस शहर में वह थी, वहां अपना शरीर बेचकर जीवनयापन कर रही थी । समय जब बीतता है तब केवल उम्र ही नहीं बीतती, साथ ही साथ शरीर भी बीतता जाता है । यह जीवन का स्याह पक्ष है क्योंकि कोई नहीं चाहता कि एक दिन उसका शरीर भी बीत जाय ।
पिंगला का जीवन और शरीर भी बीतता जा रहा था । प्रतिदिन की तरह वह आज भी शाम होते ही सजधजकर अटारी पर आ खड़ी हुई और अपनी भाव-भंगिमाओं से राह चलते लोगों को आकर्षित करने का प्रयास करने लगी । आज भी उसे आशा थी कि कोई न कोई मालदार व्यक्ति उसके आकर्षण में फँसेगा । इंतज़ार की घड़ियाँ बढ़ती जा रही थी और रात भी धीरे-धीरे गहराने लगी थी ।
हाय रे दुर्भाग्य ! आज तो पिंगला को मालदार तो क्या छोटा-मोटा ग्राहक तक भी नसीब नहीं हुआ । उसके नयन दुःख से झरने लगे । वह एक दृष्टि सूनी गली में डालती और दूसरी दृष्टि अपने बुढ़ाते जा रहे शरीर पर । वह समझ गई कि उसके शरीर की आकर्षण क्षमता चूक चुकी है । उसकी आशा की अंतिम किरण तब बुझ गई जब दूर कहीं पहरेदार की ‘जागते रहो’ की ध्वनि उसके कानों में पड़ी । पहरेदार की आवाज़ अर्धरात्रि हो जाने का संकेत दे रही थी ।
पिंगला ने अब सब आशाएं छोड़ दी और अटारी से उठ खड़ी हुई । अपने कमरे में जाकर दर्पण के सामने खड़ी हो गई । कहाँ गया वह रूप-लावण्य, जिसके कभी हज़ारों दीवाने हुआ करते थे ? कहाँ हैं वे ग्राहक जो उसके शरीर की केवल एक झलक पाने को अटारी के नीचे दोपहर से ही खड़े रहते थे ? आज दर्पण भी उसे चिढ़ा रहा था ।
दुःख में डूबी पिंगला ने सत्य को स्वीकार किया । उसने जीवन में आगे अब और ग्राहक मिलने की आशा छोड़ दी और जाकर पलंग पर सो गई । सदैव रात भर जागने वाली को आज पलंग पर सोते ही नींद आ गई । उसकी इस सुखद नींद का कारण था - ‘समस्त आशाओं का त्याग’ । दत्तात्रेय महाराज कह रहे हैं - “राजन यदु ! आशा हि परमं दुःख़ं नैराश्यं परमं सुखम् ।” (11/8/44) आशा ही समस्त दुःखों का कारण है और आशा का त्याग कर देना परम सुख प्रदान करता है ।
पिंगला वेश्या के इस दृष्टांत से अनासक्ति का एक और सूत्र निकल कर आया है - समस्त आशाओं और अपेक्षाओं का त्याग । किसी से कोई अपेक्षा/आशा न रखें । हम जितनी अपेक्षाएं रखेंगे, जीवन में उतने ही अधिक दुःखी होंगे । प्रायः हम आशा और कामना को समान समझ लेते हैं । ये समान नहीं है । कामना होती है किसी वस्तु अथवा पदार्थ को प्राप्त करने की जिससे शारीरिक सुख मिल सके जबकि अपेक्षा/आशा होती है, किसी व्यक्ति से । हम आशा करते हैं किसी ऐसे व्यक्ति से जिससे हमें प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से सुख मिलने की संभावना नज़र आती है । हम चाहते हैं कि वह हमारे कहे अनुसार कार्य कर देगा और जब ऐसा नहीं होता तो हम दुःखी हो जाते हैं ।
दुःख का कारण वह व्यक्ति न होकर उससे रखी गई हमारी आशा है, अपेक्षा है । जब हम प्रत्येक व्यक्ति से अपेक्षा/आशा का त्याग कर देंगे तो फिर हम जीवन में कभी दुःखी नहीं हो सकते । भगवान बुद्ध का कहना है कि संसार ही दुःख का कारण है, इस दुःख का निवारण किया जा सकता है और ऐसे दुःख के निवारण का एक निश्चित मार्ग भी है अर्थात् प्रत्येक दुःख के निवारण का उपाय है । वह उपाय है - सत्य को स्वीकार करना । बुद्ध कहते हैं - ‘दुःख को समझो, उसके कारण को पहचानो और दुःख के अंत तक पहुंचने वाले मार्ग पर चलो ।’ उनके अनुसार दुःख से भागना समाधान नहीं है; उसे सही रूप से समझना और आसक्ति से मुक्त होना ही शांति का मार्ग है । वास्तविकता यह है कि दुःख का कारण संसार नहीं है बल्कि हमारी उसके प्रति आसक्ति है । इस आसक्ति का एक कारण हमारा उससे आशा और अपेक्षा रखना भी है । अतः प्रत्येक आशा का त्याग कर देना ही दुःख निवारण में सहायक सिद्ध होगा ।
क्रमशः भाग 3