आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -14
इतने विवेचन से यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि मन की ही ये तीन अवस्थाएं है, आसक्ति, अनासक्ति और विरक्ति । मन को नियंत्रित करना अर्थात आसक्त मन को अनासक्त अथवा विरक्त मन में परिवर्तित करना कैसे संभव हो सकता है, यह मुख्य प्रश्न है । मन को हमारा शरीर (इंद्रियाँ) नियंत्रण में तभी ले पाता है, जब हम कोई कर्म इस शरीर से करते हैं । अतः मन को नियंत्रण में लेने के लिए कर्म के स्वरूप को परिवर्तित करना होगा ।
आइये, एक बार पुनः तथागत की ओर चलते हैं । एक बार भगवान बुद्ध के पास एक व्यथित व्यक्ति आया । अपने वर्तमान जीवन से वह बड़ा ही क्षुब्ध था । कभी वह अपनी पत्नी की शिकायत कर रहा था और कभी वह अपने पुत्रों के द्वारा आदेश की अवहेलना करने की बात कह रहा था ।
आस-पास के लोगों और रिश्तेदारों से उसका सम्बन्ध मधुर नहीं है, जिससे वह बड़ा व्यथित था । उसने अपने मन की व्यथा भगवान बुद्ध के सामने प्रकट की और कहा कि वह जीवन में कुछ भी निश्चित नहीं कर पा रहा है । वह चाहता था कि भगवान बुद्ध उसे कोई ऐसा सूत्र दे जिसको जीवन में उतार कर वह इस दुविधा से बाहर निकल सके । भगवान बुद्ध ने कहा - “मेरे पास तो ऐसा कोई सूत्र नहीं है । हाँ, पास में ही एक वैश्य है - तुलाधार; उसके पास इसका एक सूत्र अवश्य है । आप चाहें तो उसके पास जाकर वह सूत्र प्राप्त कर सकते है और अपने जीवन में खुशियां भर सकते हैं ।”
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।