Saturday, May 16, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....27

 ज्ञान उदय जब होत है …..27

          कर्म और ज्ञानयोग दोनों में ही त्याग होता है । कर्मयोग में अहम् का त्याग होता है जबकि ज्ञानयोगी संसार के मोह का त्याग करता है । सेवा कर्म करते हुए यदि भीतर ‘मैं कर्ता हूँ’ का भाव है तो वह कर्मयोग नहीं है, इसी प्रकार यदि ज्ञान अर्जित करके भी संसार के मोहजाल में जकड़े हुए हैं तो आप ज्ञानयोगी नहीं हो सकते । ज्ञानपूर्वक कर्म करने से अहम् और सांसारिक मोह, दोनों का त्याग सुगम हो जाता है । इसलिए कर्म और ज्ञान, इन दोनों में महत्वपूर्ण हुआ - त्याग ।

     श्रुति कहती है -

   न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशु: । 

  (कैवल्य उपनिषद् - 2 तथा महानारायणोपनिषद् - 10/5)

अर्थात् न धन से, न कर्म से और न संतान के उत्पादन से ही मोक्ष प्राप्त होता है । प्रमुख यतियों ने एक मात्र त्याग से ही मोक्ष को अनुभव किया है ।

              भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि कर्मयोग के बिना ज्ञानयोग सिद्ध होना कठिन है । मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है । (गीता - 5/6 ) कर्मयोग के द्वारा करने का राग मिट जाता है । रागरहित होने से सांसारिक मोह से छूटना सुगम हो जाता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Friday, May 15, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....26

 ज्ञान उदय जब होत है …..26

        ज्ञान और कर्म, दोनों का सामंजस्य हो तो आत्म-बोध की अवस्था को शीघ्र ही प्राप्त किया जा सकता है । कर्म और ज्ञान एक दूसरे के पूरक हैं न कि विरोधी । प्रायः लोग दोनों साधनों को अलग अलग मानते हैं परंतु ऐसा कहना सत्य नहीं है । हां, यह सत्य है कि मनुष्य इन दोनों में से एक को अपने स्वभावानुसार वरीयता देता है । जिसकी कुछ न कुछ करते रहने में रुचि होती है, वह कर्म मार्ग पर आगे बढ़ता है और जिसकी जानने में रुचि होती है वह ज्ञान को प्रमुखता देता है । 

     भगवान कर्म और ज्ञानयोग, दोनों का फल एक ही बता रहे हैं -    

सांख्ययोगौ पृथग्बाला: प्रवदन्ति न पण्डिता: ।

एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ।। गीता - 5/4 ।।

    बेसमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोग को अलग अलग कहते हैं, न कि पण्डितजन ; क्योंकि इन दोनों में से एक साधन में भी अच्छी तरह से स्थित मनुष्य दोनों के फल (परमात्मा) को प्राप्त कर लेता है अर्थात् आत्म-साक्षात्कार कर लेता है ।   

           दोनों (ज्ञान और कर्म) का परिणाम एक ही है - आत्म-बोध को उपलब्ध होना । इसका अर्थ है कि कर्मयोग और ज्ञान योग दोनों समकक्ष हैं । दोनों के समकक्ष होने और एक दूसरे के पूरक होने के कारण शीघ्र ही सिद्धि मिल जाती है ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Thursday, May 14, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....25

 ज्ञान उदय जब होत है …..25

         स्पष्ट है कि न तो अकेले कर्म से मोक्ष मिलना सम्भव है और न ही अकेले ज्ञान से । दोनों का संतुलन और आपसी तालमेल ही मनुष्य को परमात्मा के द्वार तक सुगमता पूर्वक ले जाते हैं । इसलिए न तो कर्म का त्याग करना चाहिए और न ही ज्ञान को हेय दृष्टि से देखना चाहिए ।

        गीता में भगवान श्रीकृष्ण सम्पूर्ण यज्ञों को स्पष्ट करने के पश्चात् कहते हैं कि द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है क्योंकि सम्पूर्ण कर्म और पदार्थ ज्ञान (तत्त्वज्ञान) में लीन हो जाते हैं । (4/33) । स्वामीजी कहते हैं कि ज्ञान होने से सम्पूर्ण कर्मों और पदार्थों से सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है, जिससे स्वार्थवश सकाम कर्म नहीं होते । द्रव्यमय यज्ञ में क्रिया और पदार्थ की मुख्यता है जबकि ज्ञानयज्ञ में विवेक-विचार की मुख्यता है ।

         ज्ञानपूर्वक किए जाने वाले कर्मों से तत्त्वज्ञान की प्राप्ति होना सरल है । गीता में भगवान कहते हैं कि -

    न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।

    तत्स्वयं योगसंसिद्ध: कलेनात्मनि विन्दति ।। गीता - 4/38 ।।

      इस मनुष्य लोक में ज्ञान के समान पवित्र करनेवाला नि:सन्देह दूसरा कोई साधन नहीं है । जिसका योग भलीभाँति सिद्ध हो गया है, वह (कर्मयोगी) उस तत्त्वज्ञान को अवश्य ही अपने में पा लेता है ।

       इस प्रकार कर्मयोग और तत्त्व-ज्ञान प्राप्ति में ज्ञान की भूमिका सिद्ध होती है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, May 13, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....24

 ज्ञान उदय जब होत है …..24

         सुतीक्ष्ण नाम का एक ब्राह्मण था । एक बार उसके मन में संशय हुआ कि कर्म महत्वपूर्ण है अथवा ज्ञान । वे अपनी शंका का समाधान करने के लिए ऋषि अगस्त्य के आश्रम गए । उन्होंने ऋषि अगस्त्यजी को पूछा - ‘भगवन ! आप धर्म के तत्त्व को जानते हैं । आपको समस्त शास्त्रों और धर्म के सिद्धांतों का सुनिश्चित ज्ञान है । मेरे मन में एक संशय है, उसका समाधान कीजिए । मैं जानना चाहता हूँ कि मोक्ष का साधन कर्म है, ज्ञान है अथवा दोनों ही हैं ? इन तीन पक्षों में से जो वास्तव में मोक्ष का कारण हो, उसको स्पष्ट कीजिए ।’

        महर्षि अगस्त्यजी ने कहा - ‘इनमें तीसरा पक्ष सही है अर्थात् निष्काम कर्म और ज्ञान दोनों के एक साथ होने से ही परमपद की प्राप्ति होती है ।’ वे कहते हैं -

              उभाभ्यामेव पक्षाभ्यां यथा खे पक्षिणां गतिः।

              तथैव ज्ञानकर्माभ्यां जायते परमं पदम्।। योगवासिष्ठ -1/1/7।।

        जैसे पक्षी आकाश में दोनों पंखों से ही उड़ते हैं, वैसे ही ज्ञान और कर्म दोनों के योग से ही परम पद की प्राप्ति होती है ।

          जिस प्रकार पक्षी एक पंख से उड़ नहीं सकता वैसे ही अकेले ज्ञान अथवा कर्म से आध्यात्मिक राह कठिन हो जाती है । कर्म और ज्ञान एक दूसरे के सहयोगी है । अतः परमपद तक पहुंचने के लिए दोनों को एक दूसरे का सहयोग लेना ही उचित है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Tuesday, May 12, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....23

 ज्ञान उदय जब होत है …..23

          ज्ञान होने पर मनुष्य की फल में आसक्ति मिट जाती है जिससे उसे कर्मफल से मुक्ति मिल जाती है । इस प्रकार उसका संसार से आवागमन मिट जाता है । कर्म और फल में आसक्ति ही उसे पुनर्जन्म की ओर ले जाती है ।

         प्रश्न उठता है कि जब कर्मों में आसक्ति को ही मिटाना है तो कर्मों में सुधार करके भी तो यह काम हो सकता है । हाँ, बिलकुल हो सकता है, क्यों नहीं हो सकता परन्तु कर्मों में सुधार के लिए भी तो थोड़ा बहुत ज्ञान होना आवश्यक है । बिना ज्ञान के तो सब मनुष्य कर्मों की भेड़-चाल में उलझकर एक दूसरे का अनुसरण कर रहे हैं ।

           दैनिक क्रियाओं को औपचारिकतावश पूरी कर देना, न तो परमात्मा का स्मरण है और न ही निष्काम कर्म । होशपूर्वक की जाने वाली प्रत्येक क्रिया ही भीतर भाव उत्पन्न कर सकती है अन्यथा भजन तो कैसेट प्लेयर भी सुनाता है और तोता भी राम-राम बोलता है । होशपूर्वक कर्म करने से आशय है, ज्ञानपूर्वक कर्म करना । इस प्रकार ज्ञान और कर्म का सीधा सम्बन्ध है, यह सिद्ध होता है ।

             केवल कर्म में रत रहना कर्मयोग नहीं है बल्कि ज्ञानपूर्वक निष्काम होकर कर्म करना ही कर्मयोग है, जहां अपने लिए कुछ भी नहीं किया जाता है और न ही किए जाने की स्मृति ही रहती है । केवल कर्म के बारे में ज्ञान होने से ही ऐसा सम्भव हो सकता है । कर्म और ज्ञान एक दूसरे के सहयोगी होते हैं, तभी कर्मयोग होता है । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Monday, May 11, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....22

 ज्ञान उदय जब होत है …..22

           इतने विवेचन से स्पष्ट है कि कर्म-रहस्य को स्पष्ट करने में ज्ञान की भूमिका महत्वपूर्ण है । कर्म के माध्यम से मनुष्य का जीवन सुखद और शान्तिमय बनता है । प्रत्येक जीव में जन्मजात ज्ञान होता है परन्तु ये ज्ञान उसके आहार, निद्रा, भय और मैथुन तक ही सीमित है । मनुष्य में इससे आगे भी कुछ करने का ज्ञान है परन्तु उसका यह ज्ञान अज्ञान के अन्धकार तले दबा हुआ रहता है । प्रश्न उठता है कि उस ज्ञान को प्रकाशित कैसे किया जा सकता है ? इसका उत्तर श्रीकृष्ण के इस कथन से स्पष्ट होता है - 

 श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: ।

ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ।। गीता - 4/39 ।।

     जो जितेन्द्रिय तथा साधन-परायण है, ऐसा श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है और ज्ञान को प्राप्त होकर वह तत्काल परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है ।

           इस श्लोक में भगवान ने ज्ञान प्राप्ति के तीन मुख्य आधार बताए हैं - जिसने अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर लिया है, जो साधन-पारायण है अर्थात् जो ज्ञान प्राप्त करने के प्रति गंभीर है तथा जो श्रद्धापूर्वक अपने गुरु से ज्ञान प्राप्त करने का इच्छुक है । ऐसे तीन गुणों से युक्त मनुष्य ही ज्ञान प्राप्त करने का अधिकारी है ।

        ज्ञान प्राप्त होते ही मनुष्य तत्काल ही परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है । मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या उसका जीवनभर अशान्त बने रहना है । इस अशान्ति का कारण है, उसकी फल और कर्म के प्रति आसक्ति । ज्ञान ही उन आसक्तियों को हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, May 10, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....21

 ज्ञान उदय जब होत है …..21

           ज्ञान को उपलब्ध हुए मनुष्य के सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं फिर प्रारब्ध की ओर उसकी दृष्टि जाएगी ही नहीं । दृष्टि न जाने से आशय है कि फिर वह पूर्व के कर्मों से बने प्रारब्ध को भोगने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहता है, उनसे व्यथित नहीं होता । 

          कर्म के मूल में कामना है और कामना का कारण मनुष्य का संकल्प करना है । ‘मुझे जो चाहिए, उसको मैं कैसे प्राप्त कर सकता हूँ’?’ इसकी जो योजना मस्तिष्क में बनती है उसका नाम ही संकल्प है । इस योजना को क्रियान्वित करने के लिए मन में कामना पैदा होती है । जब तक व्यक्ति किसी वस्तु/व्यक्ति को प्राप्त करने का संकल्प नहीं करेगा, तब तक उसमें कामना पैदा नहीं होगी ।

            संकल्प और कामना रहित मनुष्य से कर्म तो होंगे परन्तु वे कर्म भूने हुए बीज के समान होते हैं जो कोई परिणाम नहीं देते । परमात्मा ने ऐसे व्यक्तियों को बुद्धिमान कहा है ।

           गीता में भगवान कहते हैं - 

         यस्य सर्वे समारम्भा: कामसंकल्पवर्जिता: ।

         ज्ञानाग्निद्ग्धकर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधा: ।। 4/19 ।।

अर्थात् जिसके सम्पूर्ण कर्मों के आरम्भ संकल्प और कामना से रहित हैं तथा जिसके सम्पूर्ण कर्म ज्ञानरूपी अग्नि से जल गए हैं, उसको ज्ञानीज़न भी पण्डित अर्थात् बुद्धिमान कहते हैं ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।