सम्भवामि युगे युगे -19
प्रह्लाद को बड़े कष्ट सहने पड़े तब जाकर माया ने वैसी ही परिस्थितियों का निर्माण कर दिया जैसी हिरण्यकश्यप की मृत्यु के लिए आवश्यक थी । वरदाई ब्रह्माजी का वरदान भी निष्फल नहीं हुआ और प्रकृति का शाश्वत सत्य अर्थात् भौतिक शरीर की निश्चित मृत्यु भी फलित हो गई । भगवान और भक्त के मध्य कोई दूरी नहीं रहती क्योंकि भक्त सदैव और सर्वत्र उसी की उपस्थिति को अनुभव करता है । भगवान और स्वयं के मध्य दूरी वही अनुभव करता है जो भगवान को कहीं दूर स्थित मानता है ।
भक्त प्रह्लाद को उसके पिता ने यही तो पूछा था कि तुम्हारा भगवान कहां है ? प्रत्युत्तर में भक्त का भी प्रश्न था कि भगवान कहां नहीं है ? ‘कहां नहीं है और कहाँ है’, ऐसे प्रश्न करने से भगवान अनुभव में नहीं आते । उनको अनुभव करना है तो हमारे पास श्रद्धा और विश्वास भरा हृदय होना चाहिए । श्रद्धा परमात्मा के प्रति समर्पण कराती है और विश्वास अन्यनता । जहां श्रद्धा और विश्वास नहीं रहते, परमात्मा का अनुभव हो ही नहीं सकता । हमारे पास आधी-अधूरी श्रद्धा रहती है जिससे हम न तो संसार के रह पाते हैं और न ही परमात्मा के हो पाते हैं । परमात्मा श्रद्धा से मिलते हैं और ज़रूर मिलते हैं, ऐसा विश्वास प्रह्लाद जैसे भक्त का ही हो सकता है, हमारे जैसे सांसारिक व्यक्तियों का नहीं ।
प्रह्लाद की श्रद्धा ने परमात्मा को प्रकट होने के लिए विवश कर दिया । ‘सब जगह भगवान है’ एक भक्त के इस कथन को चुनौती देते हुए अन्ततः हिरण्यकश्यप पूछ ही बैठा - ‘प्रह्लाद ! तुम कहते हो कि भगवान सब जगह है तो क्या इस खम्भे में भी है ?’ प्रह्लाद ने कहा कि जी हाँ, इसमें भी वे ही हैं ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।