Friday, February 13, 2026

नाभावो विद्यते सत: -12

 नाभावो विद्यते सतः -12

        प्रश्न उठता है कि दुःख क्यों असत् से जुड़ा है ? ज्ञान से अभाव कैसे मिटता है ? असत् चाहे जितना मिल जाए वह सदैव अपर्याप्त ही रहता है और जो और जैसा मिला है वह भी भला टिकता कहां है ? ऐसे में व्यक्ति दुःखी होगा ही । इस प्रकार दुःख का सीधा संबंध असत् से जुड़ा है । जब ज्ञान हो जाता है कि असत् का स्थाई भाव नहीं है तो व्यक्ति इसमें आसक्त ही नहीं होगा । आसक्ति के न होने पर अभाव स्वतः ही मिट जाता है ।

     लेख का मूल वाक्य है - “अभाव सदैव असत् का ही होता है, सत् में कोई अभाव नहीं है ।” अभाव क्या है ? अभाव है, जीवन में कुछ न कुछ कमी का अनुभव होना । जब मन कहता है: “यह नहीं है”, “और चाहिए”, वहीं अभाव है। 

       असत् क्या है ? असत् है, जो बदलता है, टिकता नहीं । जैसे; शरीर, पैसा, पद, सुख आदि । ये सब आते हैं, जाते हैं, कभी पूरे नहीं लगते । इसलिए इनमें हमेशा कमी महसूस होती है ।

          सत् क्या है ? सत् वह है, जो सदा है, जो पूरा है । जैसे: अस्तित्व, आत्मा, शुद्ध चेतना । यह कभी भी बदलता नहीं है, घटता नहीं है और न ही कभी बढ़ता ही है । जो पूरा है, उसमें कमी हो ही नहीं सकती ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Thursday, February 12, 2026

नाभावो विद्यते सत: -11

 नाभावो विद्यते सतः -11

        अभाव असत् में ही क्यों होता है ? कारण है - जीवन में संतुष्टि का न होना । मान लीजिए — आपके पास 10 हैं । अब आपको 20 चाहिए । 20 मिल गए तो अब आपको 50 चाहिए । क्यों ? क्योंकि जो चीज़ स्थिर नहीं, वह कभी संतोष नहीं दे सकती । इसलिए असत् जितना मिलेगा, उतना ही और नया अभाव पैदा करेगा । एक बहुत साधारण सा उदाहरण देता हूँ - नींद में किसी प्रकार के अभाव का अनुभव नहीं होता है । जब आप गहरी नींद में होते हैं, तब न तो भूख होती है, न डर, न चाह । क्यों ? क्योंकि उस समय आप अपने “सत्” के सबसे क़रीब होते हैं। नीन्द में कोई अभाव नहीं होता, क्योंकि उस समय मन नहीं होता । नींद में मन अविद्या में लीन हो जाता है ।

     मूल बात यह है कि अभाव वस्तु में नहीं है । अभाव तो मन की कल्पना मात्र है । जब मन असत् की ओर भागता है तब अभाव पैदा होता है । जब मन सत् में ठहरता है तब पूर्णता का अनुभव होता है । इस एक पंक्ति में ही पूरा अर्थ स्पष्ट हो जाता है कि जो बदलता है, उसी में सदैव कमी दिखती है और जो स्थिर है, उसमें कमी की संभावना ही नहीं है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, February 11, 2026

नाभावो विद्याते सत: -10

 नाभावो विद्यते सतः -10

     संस्कृत में एक सूत्र है। - ‘अभावोऽपि असतो धर्मः, न सतः।’ अर्थात् अभाव भी असत् का ही धर्म है, सत् का नहीं । एक अन्य सूत्र कहता है - ‘यत्र पूर्णता तत्र न किञ्चिदभावः।’ अर्थात् जहाँ पूर्णता है, वहाँ किसी प्रकार का अभाव नहीं हो सकता ।

        प्रश्न है कि “ज्ञान होने पर अभाव का अनुभव क्यों समाप्त हो जाता है ?” ज्ञान कहता है - ‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत: ।’ असत् की तो सत्ता नहीं है और सत् का अभाव नहीं है । सत् को जानते ही असत् का निषेध हो जाता है और इस प्रकार अभाव का अनुभव समाप्त हो जाता है । आइए ! इसे एकदम सीधी भाषा, बिना कठिन शब्दों के समझते हैं । 

            “अभाव सदैव असत् का ही होता है, सत् में कोई अभाव नहीं है।” सबसे पहले एक सरल प्रश्न - अभाव कब लगता है ? जब हमें ऐसा लगता है कि “कुछ चाहिए, जो मेरे पास नहीं है।” अब ध्यान दें — यह भावना किसमें होती है ? मन में ।

       . “सत्” क्या है — सरल अर्थ में, सत् का अर्थ है - जो हमेशा है, जो अपने-आप में पूरा है, जिसे किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं है । उपनिषद् इसे कहते हैं: पूर्ण । अब सोचिए, जो पूरा है, उसे किस चीज़ की कमी होगी ? किसी की नहीं। इसलिए सत् में कोई अभाव नहीं हो सकता ।

             “असत्” क्या है ? असत् वह है, जो बदलता रहता है, जो टिकता नहीं है, जो आज है, कल चला जाता है । जैसे: पैसा, शरीर, सम्बन्ध, मान-सम्मान आदि । इन सब में एक बात समान है - ये कभी पूरे नहीं लगते, सदैव अपर्याप्त ही लगते हैं । क्यों ? क्योंकि ये अस्थायी हैं ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Tuesday, February 10, 2026

नाभावो विद्यते सत: -9

 नाभावो विद्यते सतः -9

         पूर्णता का मंत्र ‘‘पूर्णमदः पूर्णमिदं…’ (बृहदारण्यक उपनिषद्) स्पष्ट करता है कि जहाँ पूर्णता है, वहाँ न कुछ जोड़ने की आवश्यकता है और न ही घटने का कोई भय । वहाँ अभाव का कोई स्थान ही ही नहीं है ।

        असत् में ही इच्छा रहती है । गीता (3.37) में भगवान कहते हैं - ‘काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।’ यह काम (इच्छा) कहाँ से आता है ? यह आता है, रजोगुण से । रजोगुण अर्थात् संसार यानी असत् और इच्छा (काम) अर्थात् अभाव की अनुभूति ।

     जरा अपने अनुभव से इस बात को समझिए । उदाहरण : नींद । गहरी नींद में न धन चाहिए, न मान-सम्मान चाहिए और न ही कोई संबंध । क्यों ? क्योंकि उस समय आप अपने सत् के समीप होते हैं । दूसरा उदाहरण : जीवन में संतोष । जो व्यक्ति भीतर से शांत है, संतुष्टि के कारण वह कम साधनों में भी पूर्णता देखता है । वस्तुएँ वही हैं, केवल दृष्टि बदल गई है ।

          इसलिए शास्त्र निष्कर्ष देता है - ‘अभावो न वस्तुनि, किन्तु अविद्यायाम् ।’ अभाव वस्तु में नहीं, अज्ञान में है । जब हम असत् को सत् मान लेते हैं (अज्ञान), तभी अभाव जन्म लेता है । सार यह है कि सत् पूर्ण है, इसलिए उसमें अभाव असम्भव है । असत् अपूर्ण है, इसलिए वही अभाव का कारण है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Monday, February 9, 2026

नाभावो विद्यते सत: -8

 नाभावो विद्यते सतः -8  

            इतने विवेचन से स्पष्ट है कि अभाव वस्तु में नहीं, हमारी दृष्टि में है । दृष्टि सत् में स्थिर होते ही अभाव स्वतः समाप्त हो जाता है ।

“अभाव सदैव असत् का ही होता है, सत् में कोई अभाव नहीं है ।”

    आइए ! पहले “सत्” और “असत्” को समझते हैं । सत् क्या है ? सत् वह है जो नित्य (हमेशा रहने वाला) है । सत् पूर्ण, अपरिवर्तनीय और स्वयं में पर्याप्त है । उपनिषद् कहता है — ‘सदेव सोम्य इदमग्र आसीत् ।’ (छान्दोग्य उपनिषद्) अर्थात् आरम्भ में और वास्तव में सिर्फ सत् ही है । जो सदा है, जो पूर्ण है, उसे भला किस चीज़ की कमी होगी ?

          असत् क्या है ? असत् वह है जो बदलता रहता है, नश्वर है, आज है, कल नहीं रहेगा, सदैव अपूर्ण ही रहेगा । शरीर, धन, पद, संबंध, भोग सब असत् हैं । जहाँ परिवर्तन है, वहीं कमी/अभाव का अनुभव होता है ।

         अभाव किसे कहते हैं ? अभाव का अर्थ है —“जो होना चाहिए, वह नहीं हो रहा है।” अब जरा सोचिए - जो पूर्ण है, उसमें “होना चाहिए” जैसा कुछ बचता है क्या ? नहीं बचता । जो अपूर्ण है, वही कहता है - मुझे और चाहिए, बहुत कुछ चाहिए । इसलिए अभाव केवल असत् में ही सम्भव है।

 क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, February 8, 2026

नाभावो विद्यते सत: -7

 नाभावो विद्यते सतः -7

         अभाव का सम्बन्ध असत् से है । यहाँ सत् और असत् का भेद स्पष्ट है।असत् का अर्थ है — जो स्थिर नहीं, जो परिवर्तनशील है । परिवर्तनशील वस्तु में ही “कमी-पूर्ति” का चक्र चलता रहता है । इसलिए अभाव असत् का लक्षण है न कि सत् का । सत् में अभाव असम्भव है । बृहदारण्यक उपनिषद् (1.4.2) का प्रसिद्ध मन्त्र है -

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।। 

अर्थात् वह भी पूर्ण है, यह भी पूर्ण है । पूर्ण से पूर्ण उत्पन्न होता है, पूर्ण में से पूर्ण निकालने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है । जहाँ पूर्णता है, वहाँ न कमी है, न आवश्यकता है और न ही कोई अभाव ।

   अभाव, अज्ञान का परिणाम है । आदिशंकराचार्य अपने ग्रंथ ब्रह्म ज्ञानावली माला में कहते हैं -

“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।” अर्थात् ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या है । जीव और ब्रह्म में कोई अन्तर नहीं है। 

       जगत् (असत्) को सत्य मानने से ही इच्छा, अभाव और दुःख उत्पन्न होता है । सत् का अज्ञान ही अभाव की अनुभूति कराता है जबकि सत् का ज्ञान अभाव का लय करा देता है । इसी बात को उन्होंने विवेकचूड़ामणि ग्रंथ के 20 वें श्लोक में फिर से स्पष्ट किया है ।

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्येत्येवंरूपो विनिश्चय ।

सोऽयं नित्यानित्यवस्तुविवेक: समुदाहृत : ।।

अर्थात् ‘ब्रह्म सत्य है और जगत् मिथ्या है‘ ऐसा निश्चय है, यही ‘नित्यानित्यवस्तु-विवेक‘ कहलाता है।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Saturday, February 7, 2026

नाभावो विद्यते सत: -6

 नाभावो विद्यते सत: -6

           ‘अभाव का नाम ही काम है’, यह कथन दार्शनिक दृष्टि से बहुत गहरा है । “अभाव सदैव असत् का ही होता है, सत् में कोई अभाव नहीं है।” सत् वह है - जो वास्तव में है, नित्य है, पूर्ण है । असत् वह है जो अस्थायी है, अपूर्ण है, नश्वर है । इसलिए कहा गया है कि जहाँ पूर्णता है (सत् है), वहाँ किसी कमी अर्थात् अभाव की कल्पना ही नहीं की जा सकती ।

           अभाव हमेशा उसी का होता है जो अपूर्ण (असत्) है ।

दार्शनिक व्याख्या (विशेषकर वेदांत में):

आत्मा/ब्रह्म = सत् → पूर्ण, अखंड, शाश्वत → कोई अभाव नहीं । 

शरीर, भोग, संसार = असत् → परिवर्तनशील → हमेशा कुछ न कुछ का अभाव ।

          जो व्यक्ति भीतर से संतुष्ट है, उसे बाहर की कमी कभी परेशान नहीं करती । जो अस्थायी वस्तुओं पर निर्भर रहता है, वह हमेशा अभाव अनुभव करता है । कहने का अर्थ है कि अभाव मन (असत्) की अवस्था है, स्वरूप (सत्) की नहीं । सत् में स्थित होने पर अभाव स्वयं विलीन हो जाता है ।

         सत् की परिभाषा — पूर्णता । सदेव सोम्य इदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् (छान्दोग्य उपनिषद् (6.2.1)

अर्थात् हे सोम्य ! प्रारम्भ में यह जगत् केवल सत् था — एक, अद्वितीय । यहाँ सत् को एक, अखंड और पूर्ण कहा गया है । जहाँ अद्वैत है, वहाँ किसी अन्य वस्तु का अभाव कैसे हो सकता है ?

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।