Saturday, October 3, 2026

सम्भवामि युगे युगे -31

 सम्भवामि युगे युगे -31

       एक नारी जिसे अबला कहा जाता है किसी पुरुष के सामने कैसे विवश हो जाती है, अहिल्या के साथ हुआ अत्याचार इसका प्रमाण है । पाप इन्द्र ने किया परन्तु परिणाम अहिल्या को भी भोगना पड़ा । सूने आश्रम में केवल पाषाण बनी अहिल्या रह गई, पशु-पक्षियों तक ने वह स्थान छोड़ दिया । पाषाण बनी अहिल्या भगवान के आगमन की प्रतीक्षा करते हुए केवल राम-राम रटने लगी । 

           भगवान अंतर्यामी भी है और सर्वत्र भी । उधर मिथिला में श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा कर रही है सीता । प्रकृति के बिना पुरुष अधूरा है । जब प्रकृति साथ होती है पुरुष के, तब कहीं जाकर वह पूर्णता को प्राप्त होता है । जाना तो है जनकपुरी परन्तु इधर उठ रही भक्त की पुकार को भगवान अनसुना भी तो नहीं कर सकते । विस्वामित्रजी की आज्ञा से राह बदल ली और पहुंच गये निर्जीव निःशब्द पड़े गौतम ऋषि के आश्रम में । पत्थर हो गई नारी को देखकर पूछ बैठे राम । विस्वामित्रजी ने सारी कथा सुना दी और बोले - ‘हे राम ! आपकी चरण-रज चाहती है, यह शापित नारी ।’ 

           जिनका जन्म ही समाज में मर्यादा स्थापित करने के लिए हुआ हो, वह अपने पैरों से भला किसी नारी-मूर्ति को भी छूने की कल्पना कैसे कर सकता है ? ‘नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकता । हे माते ! इस कठिन समय में मेरी सहायता करो ।’ भला मायापति के आग्रह को माया कैसे ठुकरा सकती है ? कहा जाता है कि उसी समय वायु तीव्र गति से भगवान राम से शापित अहिल्या की तरफ़ बहने लगी । भूमि की विरल रज उड़ी और पाषाण हुई नारी को छू गई । तत्काल ही पाषाण हुई नारी में हलचल हुई और सुन्दर अहिल्या प्रकट हो गई । मर्यादा पुरुषोत्तम राम अपने अनुज सहित आगे बढ़े और दोनों ने नारी शक्ति को प्रणाम किया । बिना अपराध के मिली सजा से आज जाकर नारी मुक्त हुई है परन्तु इस मुक्ति के लिए भगवान को स्वयं आना पड़ा ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

Friday, October 2, 2026

सम्भवामि युगे युगे -30

 सम्भवामि युगे युगे -30

              इस प्रकार अहिल्या का विवाह तो हो गया परन्तु इससे इन्द्र की उसे भोगने की इच्छा कम होने के स्थान पर बढ़ती ही गई । ऋषि अपनी पत्नी के साथ एक कुटिया में अपना वैवाहिक जीवन बिता रहे हैं और इधर इन्द्र उनकी कुटिया में प्रवेश करने का प्रयास कर रहा है । चन्द्रमा से साथ मांगा । दोनों ऋषि के आश्रम तक पहुंच भी गए । मध्य रात्रि का समय, पति-पत्नी कुटिया में गहरी नींद में । कैसे भी हो ऋषि को कुटिया से बाहर निकाल कर कहीं दूर भेजा जाए । माया का सहारा लिया गया । चन्द्रमा बन गए मुर्ग़ा और मध्य रात्रि को ही बांग दे डाली । ऋषि ने ब्रह्ममुहूर्त हुआ जान शैया त्याग दी और चल पड़े गंगा-स्नान को ।

               इन्द्र ने गौत्तम ऋषि का रूप धरकर कुटिया में प्रवेश किया और चन्द्रमा बाहर पहरा देने लगे । इस प्रकार फिर एक नारी कामवासना से छली गई । इधर ऋषि स्नान करने गंगा में उतरने वाले ही थे कि मां प्रकट हो गई । गंगा मां ने ऋषि को इन्द्र की सारी मायावी चाल समझा दी । ऋषि आश्रम की ओर दौड़ पड़े । विवाहोपरांत नारी की सुरक्षा की ज़िम्मेवारी उसके पति पर होती है । ऋषि को आया देखकर चन्द्रमा भागने लगा । ऋषि ने उस पर अपना कमण्डल दे मारा । धक्का देकर कुटिया का द्वार खोला तो गौतम का रूप धरे इन्द्र को देखा । ऋषि को देखकर इन्द्र बाहर की ओर दौड़ पड़ा । क्रोधित ऋषि ने उसे नपुंसक हो जाने का श्राप दे डाला ।

             ऋषि का क्रोध अभी भी कम नहीं हुआ था । क्रोध जब सीमा पार कर जाता है तो उसका शिकार बनती है बेचारी अबला । लाख क्षमा मांग ले नारी, आज तक पुरुष ने कभी उसको क्षमा नहीं किया है । पाषाण होने का श्राप दे दिया अहिल्या को । क्रोधित ऋषि भी अपने स्तर से गिर चुके थे । उनका तप नष्ट हो चुका था । शान्त होकर हिमालय की ओर चल पड़े और जाते-जाते पाषाण बनी अहिल्या को कहते गए कि त्रेता में भगवान राम की चरण रज के स्पर्श से ही तुम इस श्राप से मुक्त हो सकोगी ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

Thursday, October 1, 2026

सम्भवामि युगे युगे -29

 सम्भवामि युगे युगे -29

              माया ने भूमिका तैयार की । असुरों के भय ने विश्वामित्र ऋषि को विवश कर दिया कि राजा के सामने भगवान को मांगने की याचना करे । पुत्रासक्ति ने मना कर दिया । गुरु वशिष्ठ ने धर्म को, पिता और कर्तव्य के मध्य लाकर खड़ा कर दिया । गुरु की यही भूमिका होती है कि वह राजा से उसके धर्म का पालन करवाता रहे । राजा का धर्म है - प्रजा की रक्षा करना । राम-लखन चले गए विश्वामित्र के साथ । असुरों को मारते हुए आगे बढ़ते हुए वन में सूनी पड़ी कुटिया में पाषाण बनी अहिल्या का उद्धार किया ।

              अहिल्या ब्रह्माजी की मानस पुत्री थी, बहुत सुंदर थी वह । पिता को पुत्री के विवाह की चिन्ता होती ही है परन्तु किसी ऐरे-ग़ैरे को तो नहीं सौंपी जा सकती । वर के लिए एक आवश्यक योग्यता तय कर दी गई - ‘समस्त त्रिलोकी की परिक्रमा कर सबसे पहले पहुंचने वाले के साथ ही अहिल्या का विवाह होगा ।’ इधर स्वर्ग का राजा इन्द्र अहिल्या की सुन्दरता पर मुग्ध था । देवराज हुआ तो क्या हुआ, भोगों के बीच रहने वाले की भोगों के प्रति आसक्ति क्या कभी समाप्त हो सकती है ? दौड़ पड़े इन्द्र त्रिलोकी का चक्कर लगाने और पहुंच भी गए सबसे पहले, फिर भी अहिल्या के साथ विवाह नहीं हो सका । अहिल्या का विवाह हुआ गौतम ऋषि के साथ ।

          अहिल्या और इन्द्र के बीच नारद आ गए । इन्द्राणी में क्या कमी है जो अहिल्या के पीछे पड़े हो । नारदजी भी ब्रह्माजी के मानस पुत्र हैं । अपनी बहन अहिल्या को एक भोगी को जानबूझकर क्यों दे ? पिता को स्पष्ट कह दिया - ‘गौतम ऋषि ने त्रिलोकी की परिक्रमा सबसे पहले पूरी की है, इसलिए अहिल्या का विवाह गौतम से होना चाहिए ‘। प्रश्न उठा कि गौतम ऋषि ने त्रिलोकी की परिक्रमा सबसे पहले कैसे पूरी की ? नारद ने कहा - ‘अपने आश्रम में ऋषि गौतम ने प्रसव करती एक गाय की परिक्रमा की है और प्रसव करती गाय की परिक्रमा करना त्रिलोकी की परिक्रमा करने के समान है । आज भी वे उस गाय की बछड़े सहित प्रतिदिन परिक्रमा करते हैं । इसलिए अहिल्या के लिए योग्य वर ऋषि गौतम है न कि इन्द्र ।’

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, September 30, 2026

सभवामि युगे युगे -28

 सम्भवामि युगे युगे -28

           उधर जय-विजय को सनकादिक ऋषियों का शाप और इधर मनु-शतरूपा को दिया वरदान, मानव देह प्राप्त करने के लिए इससे अनुकूल स्थिति क्या हो सकती है ? निर्णय हो गया कि पृथ्वी पर चलते हैं, राम बनकर । मायापति ने माया को कह दिया, जनकपुर जाओ । वहां जाकर शरीर लिया और पृथ्वी से प्रकट होकर बन गई जनकसुता जानकी । भला, प्रकृति के बिना परमात्मा लीला कैसे कर सकते हैं ? लीला तो प्रकृति के माध्यम से ही हो सकती है । लंका विजय के पश्चात् सीता कहती भी है कि सब जगह नाम तो राम का हो रहा है परन्तु उनके जन्म से लेकर सब कार्य (लीलाएँ) मेरे द्वारा ही की जा रही है । सत्य है, राम तो करने और पाने से भी परे हैं । गीता में परमात्मा स्वयं कहते हैं - शरीरस्थोपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ।

            मनु-शतरूपा को दिया वरदान केवल प्रसन्न होकर दिया गया वरदान नहीं था । परमात्मा जानते थे कि जय-विजय का त्रेता में भी असुरोद्धार करना है । मनु हुए अवध के राजा दशरथ और शतरूपा वहां की पटरानी कौशल्या । राजा को चाहिए पुत्र । पुत्रेष्टि यज्ञ सम्पन्न कराया, वशिष्ठजी के आग्रह पर शृंगी ऋषि ने । यज्ञ भगवान की कृपा से तीन रानियों के चार पुत्र हुए - कौशल्या से राम, कैकेयी से भरत तथा सुमित्रा से लखन और रिपुदमन । सभी का बड़े लाड़-प्यार से लालन-पालन होने लगा । बड़े हो रहे हैं परंतु राम को राजमहल कुछ रूच नहीं रहा है । 

         परमात्मा के अवतरण का उद्देश्य तो भूमि को असुरों के भार से मुक्त करना है, राजमहल का सुख भोगना नहीं है । धर्मशील जन बाहर संसार में बैठे भगवान को सहायता के लिए पुकार रहे हैं, ऋषि लोग यज्ञ नहीं कर पा रहे हैं । असुरों ने तांडव मचा रखा है । अधर्म बढ़ते हुए ऐसी स्थिति में आ गया है कि वह धर्म को दबाने लगा है । ऐसे में भला राम कब तक राजमहल में रुक सकते हैं ? भक्त पुकारे और भगवान हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें, क्या ऐसा भी कभी हो सकता है ? निकलना होगा राजमहल से बाहर परंतु कैसे ? इसमें भी माया ही कुछ सहायता करेगी ।

 क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

Tuesday, September 29, 2026

सम्भवामि युगे युगे -27

 सम्भवामि युगे युगे -27

            कुबेर का पैतृक स्थान उसके हाथ से निकल गया जबकि लंका का वास्तविक उत्तराधिकारी वही था । उसका पुष्पक विमान छीन लिया गया, उसकी सारी सम्पति हड़प ली गई । भागकर कुबेर अपने आराध्य के चरणों में जा बैठा । कैलाश की तलहटी में स्थित मानसरोवर झील में अपना महल बना लिया । विभीषण तो रावण का सगा भाई है । उसका लंका में रहना पारिवारिक दृष्टि से उचित ही था, इसलिए उसकी उपस्थिति को सहन भी करना पड़ा । असुर और भक्त के मध्य सदैव ही छत्तीस का आँकड़ा रहता है । एक न एक दिन दोनों में दुराव होना निश्चित ही था । एक दिन रावण ने विभीषण को लंका से लात मारकर निष्कासित कर दिया । भक्त का एक ही आश्रय होता है - भगवान का । लंका से निकलकर पहुंच गया उनकी शरण में । यही विभीषण दैवयोग से रावण का काल बना ।

              रावण का अहंकार उसके सर चढ़कर बोल रहा था । उसके आतंक से पृथ्वी व्यथित हो गई । पृथ्वी और सभी देवताओं को साथ लेकर ब्रह्माजी पहुँच गए, श्रीहरि के यहां । आश्वासन मिल गया - आ रहा हूँ, भूमि का भार उतारने । मैंने पूर्व में भी कहा है कि परमात्मा को धर्म की पुनः स्थापना करने के लिए पंच भौतिक देह लेकर ही आना पड़ता है । वे भी बैकुण्ठ में बैठे-बैठे ही करने को सब कुछ कर सकते हैं, पर नहीं करते । वहीं बैठे-बैठे करने में उनका बनाया विधान ही बाधक बन जाता है । विधान बनाने वाला विधान को तोड़ भी सकता है परन्तु वे नहीं तोड़ते । वे हम जैसे मनुष्यों के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते हैं । 

       उनके विधान को लागू करने का कार्य माया (प्रकृति) करती है । प्रकृति ही सृष्टि रचती है, उसका संचालन करती है और समय आने पर वह सृष्टि को समेट भी लेती है । जब भी अवतरित होने के लिए परमात्मा को देह चाहिए होती है, वे प्रकृति को अपने अधीन कर देह प्राप्त कर लेते हैं ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Monday, September 28, 2026

सम्भावामि युगे युगे -26

 सम्भवामि युगे युगे -26 

      कैकसी ने भी दिति की तरह ही विश्रवा से सायं के समय संयोग की कामना की क्योंकि उसके मन में राक्षस पुत्र प्राप्ति की कामना थी । असमय किए गए कार्य के परिणाम कभी अच्छे नहीं होते । असमय के इस संयोग से रावण और कुम्भकर्ण पैदा हुए ।      

          पुत्र को पिता के गुणसूत्र विरासत में मिलते हैं । विश्रवा का कैकसी से उत्पन्न हुआ ज्येष्ठ पुत्र रावण बड़ा ज्ञानी था । रावण ने अपने भाइयों के साथ ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की । परिणामस्वरूप वरदान तो मिलने ही थे । रावण ने देवताओं, दानवों और यक्षों से अजेय होने का वर मांगा । पूर्वजीवन में प्रतापभानु ने जैसी एक चूक की थी वैसी ही एक चूक इस जीवन में रावण भी कर बैठा । मनुष्यों और वानरों को उसने तुच्छ समझ लिया । अंततः वे ही उसकी मृत्यु का कारण बने । कुंभकर्ण मांगना तो चाहता था इंद्रासन परन्तु बुद्धि के फेर से मांग बैठा निद्रासन, छः माह तक सोना और एक दिन के लिए जागना । इस वरदान के पीछे भी माया का हाथ रहा । माया के आग्रह पर ही सरस्वतीजी ने उसकी बुद्धि फेर दी थी । विभीषण ने भक्ति का वरदान मांगा ।

              सब कुछ माया का खेल है । विभीषण परमात्मा की भक्ति नहीं मांगता तो क्या होता ? प्रश्न कितने ही कर लो, परमात्मा की रची माया को कोई नहीं जान सकता । अहंकारी असुर को भक्ति से नफ़रत होती है । ऐसे में रावण कब तक विभीषण को लंका में बर्दाश्त करता । उसने अपने सौतेले भाई कुबेर तक को तो लंका में नहीं रहने दिया । उसका सब कुछ छीन लिया, यहाँ तक कि उसका पुष्पक विमान भी । भागकर कुबेर को शंकर की शरण में जाना पड़ा । अंततः उसको शिव ने अपने चरणों में स्थान दिया । शंकर के निवास स्थान पर्वत कैलाश की तलहटी में बनी मानसरोवर झील के मध्य, अथाह जल की गहराई में कुबेर का महल है, ऐसी मान्यता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, September 27, 2026

सम्भवामि युगे युगे -25

 सम्भवामि युगे युगे -25

          इस प्रकार हमने कथा के अन्तर्गत देखा कि प्रतापभानु स्वयं रावण हुआ, उसके भाई ने कुम्भकर्ण के रूप में जन्म लिया और जो सात्विक गुणों से युक्त प्रतापभानु का एक मन्त्री था, वह बना उसका छोटा भाई विभीषण । विभीषण ने राक्षस राज में रहते हुए भी अपने पूर्व जीवन की शुचिता को बनाए रखा । सदैव उस परमात्मा का स्मरण करता रहता था, जिसका नाम लेना भी रावण-राज में अपराध माना जाता था, यहां तक कि स्वयं रावण भी उन्हें वनवासी कहता था । विभीषण को भक्ति के कारण भगवान भी मिले और लंका का राज भी ।

               पुनः स्मरण करा दूँ कि परमात्मा ने ही प्रकृति और उसके विधान बनाए हैं । इसके बाद जो कुछ भी करती है अथवा जो कुछ भी होता है, सब प्रकृति के माध्यम से ही होता है , परमात्मा की भूमिका केवल एक साक्षी होने तक ही सीमित रहती है । परमात्मा तभी अवतरित होते हैं, जब धर्म की हानि और अधर्म की अनियंत्रित रूप से वृद्धि होने लगती है । परमात्मा भी अपने प्रकटीकरण में प्रकृति को अधीन करते हुए उसकी सहायता लेते हैं । प्रकृति ने ही मनुष्य को कर्म स्वतंत्रता दी है । मनुष्य के द्वारा किए जाने वाले कर्मों के परिणाम देने के लिए प्रकृति ही उसे विभिन्न शरीरों में घुमाती रहती है ।

            चलें, आगे बढ़ते हैं और प्रवेश करते हैं, जय-विजय के दूसरे राक्षस जीवन की कथा में । ऋषि विश्रवा (ऋषि पुलस्त्य के पुत्र) का दैव योग से राक्षसी कैकसी के साथ विवाह हो जाता है । संतान के रूप में दसग्रीव पैदा होते हैं । दसग्रीव के दो सगे भाई भी हैं - कुम्भकर्ण और विभीषण । एक बहिन भी है - सूपनखा । एक सौतेला भाई कुबेर भी हैं जो विश्रवा की पहली पत्नी इलविला के पुत्र हैं । इस प्रकार पुलस्त्य कुल में राज्य का उत्तराधिकारी कुबेर को होना चाहिए था परन्तु हो गया, रावण ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।