सम्भवामि युगे युगे -53
कैकेई ने आगे कहा - ‘राम ! कोई भी पत्नी अपने पति का अपमान सहन नहीं कर सकती । मैं भी उस अपमान को सहन नहीं कर सकी । दिन-रात उस मुकुट की वापसी के लिए उपाय खोजती रहती । जब तुम्हारे राजतिलक का समय आया तो मेरी दशरथजी के साथ उसी मुकुट को लेकर चर्चा हुई । यह बात हम दो ही जानते थे । उसी समय मैंने तुरंत ही तुम्हें वन में भेजने का निर्णय कर लिया क्योंकि मैं जानती थी कि वन में रहने वाले वानरराज बाली से यदि मुकुट कोई वापस ला सकता है तो वह है, केवल राम । इस प्रकार तुम्हें वनवास देने का कलंक मैंने अपने सिर पर ले लिया ।’
आंखों में उतर आए आंसुओं को छिपाते हुए बोली कि मैं यह नहीं जानती थी कि तुम्हारे मोह में जकड़े महाराज हमें छोड़ जाएंगे । पता होता तो संभवतः मैं अपने प्रतिशोध का कोई दूसरा रास्ता खोजती । इस प्रकार कैकेई ने अपनी बात पूरी की और रोने लगी । भगवान ने कैकेई को सांत्वना दी और आश्वासन दिया कि शीघ्र ही वे राजमुकुट लेकर अयोध्या लौटेंगे ।
चित्रकूट में तो भगवान सबसे अन्त कैकेई से मिले थे परंतु जब वनवास की अवधि पूरी कर राम लौटे तो सबसे पहले माता कैकेई से मिले और उनके चरणों में रघुवंश का राजमुकुट रख दिया । कैकेई ने राम को आशीर्वाद देते हुए हृदय से लगा लिया और राजमुकुट उनके सिर पर रखते हुए उसी समय अवध का राजा घोषित कर दिया । बाद में वशिष्ठ मुनि ने विधि विधान से राजतिलक किया ।
कैकेई को आज जिस दृष्टि से देखा जा रहा है, वह उसके साथ अन्याय है । उन जैसी सुंदर, विदुषी, बहादुर स्त्री तत्कालीन समय कोई दूसरी नहीं थी । भगवान राम ने सदैव उनको प्राथमिकता दी है वह उनकी उदारता हो सकती है फिर भी कैकेई में भी तो कोई न कोई विशेषता रही होगी । हमें भी उसकी उपेक्षा करने का कोई कारण नहीं की मिलता फिर भी कैकई आज तक को हेय दृष्टि से देखा जाता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।