Wednesday, July 22, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -59

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -59

      अष्टावक्र महाराज राजा जनक को कह रहे हैं –

न त्वं विप्रादिको वर्णों नाश्रमी नाक्षगोचरः ।

असंगोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव ।। अष्टावक्र गीता - 1/5 ।।

    अर्थात हे जनक, तुम ब्राह्मण आदि जातियों वाले नहीं हो । न तुम वर्णाश्रम आदि धर्मों वाले हो । न तुम चक्षु आदि इन्द्रियों के विषय हो, किन्तु तुम इन सबके साक्षी और असंग हो एवं तुम आकार से रहित हो और सम्पूर्ण विश्व के साक्षी हो । ऐसा अपने को जानकर सुखी और संसार रुपी ताप से रहित हो जाओ ।

               अष्टावक्र जी का यह कहना कि तुम किसी विशेष जाति अथवा वर्ण के नहीं हो और न ही तुम नेत्र आदि इन्द्रियों के विषय हो, न तुम किसी विशेष आकार के हो; इसका अर्थ है कि जाति, वर्ण, इन्द्रिय-विषय और आकार ये सभी शरीर के साथी है । आत्मा इन सबसे अलग है, असंग है । हमें मिलने वाला शरीर प्रत्येक नए जीवन में बदलता रहता है । आज मेरा यह भौतिक शरीर एक ब्राह्मण का है, अगले जन्म में ब्राह्मण के शरीर की तो बात ही क्या, यह भी पता नहीं है कि मनुष्य का भी शरीर मिल पायेगा अथवा नहीं । अतः स्वयं को शरीर न समझकर आत्मा समझो । आत्मा केवल साक्षी है । आत्मा शरीर, उसकी जाति, उसके वर्ण और आकार आदि को साक्षी भाव से देखती अवश्य है परन्तु शरीर से सदैव असंग बनी रहती है । 

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

शरणम् ।।

Tuesday, July 21, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -58

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -58

                    जब हम चलचित्र के किसी एक पात्र में स्वयं को देखने लगते हैं, तब हम उस चलचित्र में रत हो जाते हैं । ऐसे में हमें चलचित्र में घटित होने वाली प्रत्येक घटना निश्चित ही प्रभावित करेगी । वास्तविकता में वहां कोई सत्य घटना घटित न होकर कलाकार का अभिनय मात्र होता है और कलाकार भी अभिनय, उस चलचित्र के निर्माता/निर्देशक की योजना के अनुसार ही करता है ।

             इस संसार में हम जितनी भी घटनाएँ घटित होती देख रहे हैं, वे सभी परमात्मा की एक निश्चित योजना के अनुसार ही घटित हो रही है और उसी परमपिता की योजना के अनुसार ही हम सब को अभिनय करने के लिए हमारे प्रत्येक जीवन में एक नए पात्र की भूमिका मिलती है । हमें केवल स्वयं को मिली उस भूमिका को ही निभाना होता है और वह भी बड़ी संजीदगी के साथ । हमें इस संसार में घटित होने वाली घटनाएँ तभी प्रभावित कर सकती हैं जब हम उन घटनाओं को लीला न मानकर वास्तविकता समझ बैठते हैं । ऐसा तभी होता है जब हम किसी घटना को एक पक्षीय होकर देखते हैं । इस प्रकार कहा जा सकता है कि एक पक्षीय होने से हम कभी भी साक्षी नहीं हो सकते । साक्षी होने के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक घटना को निरपेक्ष-भाव से देखा जाय और उसको परमात्मा की लीला मात्र समझा जाय ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Monday, July 20, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -57

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -57

                    ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग करते हुए कर्मेन्द्रियों और मन को नियंत्रण में रखना ही साक्षी-भाव है । नेत्रों से न देखना, कानों से न सुनना, घ्राण शक्ति को दबा देना, रसनेन्द्रिय से स्वाद को न लेना तथा त्वचा से स्पर्श के अनुभव करने को नकार देना स्पष्ट रूप से परमात्मा की आज्ञा का उल्लंघन है । परमात्मा ने ज्ञानेन्द्रियाँ दी ही ज्ञान प्राप्त करने के लिए और हम इन इन्द्रियों के कार्य से स्वयं को विमुख कर ले तो फिर ज्ञान कैसे प्राप्त करेंगे ? हमें मानव जीवन मिला ही इसीलिए है कि हम आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हो और आत्म-ज्ञान तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब ज्ञानेन्द्रियों का समुचित उपयोग किया जाये ।

         हम लोग प्रायः साक्षी और द्रष्टा होने को समानार्थी समझ लेते हैं । साक्षी होना द्रष्टा होने से पूर्व की अवस्था का नाम है । साक्षी होने पर आप इस भौतिक संसार में बने तो रहते हैं परन्तु इसकी गतिविधियों में रत (Involve) नहीं होते हैं, किसी प्रकार का कोई हस्तक्षेप नहीं करते हैं । साक्षी होने का अर्थ संसार से पलायन कर जाना कतई नहीं है बल्कि संसार में रहते हुए उसकी प्रत्येक गतिविधि को बिना किसी भेद-भाव के देखते रहना है; जैसे कि आप किसी सिनेमा हाल में एक चलचित्र देख रहे होते हो । चलचित्र को हम इसके निर्माण-कर्ता की कृति और कलाकारों का अभिनय समझकर उसमें रत नहीं होते हैं, उसी प्रकार संसार में हो रहे प्रत्येक घटनाक्रम को उसके निर्माण-कर्ता की कृति, उस परम पिता की लीला समझना ही साक्षी होना है । 

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, July 19, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -56

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -56 

               इसके लिए आवश्यक है कि हम संसार को देखें तो अवश्य परन्तु उसमें हस्तक्षेप न करें । देखने को हम रोक नहीं सकते क्योंकि नेत्र नामक ज्ञानेन्द्रिय का यह स्वाभाविक कार्य है । परन्तु संसार में लिप्त होना अथवा न होना हमारी क्षमता के भीतर है । हम चाहें तो संसार में डूब सकते हैं और चाहें तो संसार में रहते हुए उससे निर्लिप्त भी रह सकते हैं । अतः संसार में केवल साक्षी बनकर परमात्मा की लीला को देखते रहना ही उचित है । 

         इस प्रकार इस दृष्टान्त से हमें अनासक्त होने का अंतिम और महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लगता है - ‘साक्षी-भाव’ । संसार में जो कुछ भी घटित हो रहा है, उन सब का केवल साक्षी होना । यहाँ सन्त का साक्षी-भाव है और शिष्य का आसक्ति-भाव । न्यायालय में साक्षी अर्थात गवाह का बड़ा महत्त्व है । जो किसी भी घटना में हस्तक्षेप नहीं करता वही वास्तव में सही साक्षी हो सकता है । जो कोई व्यक्ति एक पक्ष का साथ देता है वह भला साक्षी कैसे हो सकता है ?

       साक्षी होने का अर्थ है, निर्विकार भाव से घटित हो रहे को देखते रहना, प्रत्येक घटना को परमात्मा की लीला मात्र समझना, उसमें स्वयं को नहीं उलझाना । इस शरीर को मन सहित 11 इन्द्रियां परमात्मा ने दी है । पाँच ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग न करना परमात्मा के आशीर्वाद और उनकी आज्ञा का उल्लंघन है परन्तु पाँच कर्मेन्द्रियों और एक मन को नियंत्रण में रखना प्रत्येक व्यक्ति का निजी दायित्व है ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।





णम् ।।

Saturday, July 18, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -55

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -55

     इस दृष्टान्त के अनुसार शिष्य गाय से मिलने वाले दूध आदि से जो सुख अनुभव कर रहा था, उसके अब न मिलने पर उसका वह सुख ही दुःख में परिवर्तित हो रहा था । वह सोचता था कि गाय से हमें अब तक दूध आदि मिलता था, वह अब नहीं मिल पायेगा । यह शिष्य की दुग्ध-भोग (रस) के प्रति आसक्ति थी, जो उसे उस व्यक्ति के प्रति उद्वेलित कर रही थी । जबकि दूसरी तरफ संत के मन में गाय के आने और वापिस लौट जाने, दोनों अवस्थाओं के कारण विचार तक पैदा नहीं हुआ था क्योंकि वे अनासक्त थे । उनके इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा था कि सदैव मिलने वाला दूध-दही अब नहीं मिल पायेगा । गाय आई है तो अच्छा है; दूध-दही खाने को मिलेगा, चली गई तो भी अच्छा हुआ, गोबर उठाने से मुक्ति मिली । उनमें ऐसी अनासक्ति आई है, साक्षी-भाव के कारण ।

             शिष्य गाय में सुख देख रहा था अर्थात किसी अन्य से स्वयं को सुख मिलता देख रहा था जबकि संत जानते थे कि वास्तविक सुख तो स्वयं के भीतर है, स्वयं से बाहर तो केवल परमात्मा की लीला है । संसार का दृश्य हमें अपने में लीन करने का प्रयास करता है, अपने साथ लपेट लेना चाहता है । हमें अपनी क्षमता इस प्रकार विकसित करनी होगी कि संसार की कोई बात/वस्तु हमें प्रभावित न कर सके । हमें केवल उस लीला का साक्षी बने रहना है ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Friday, July 17, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -54

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -54 

      उसके चले जाने के बाद शिष्य ने अपने गुरु से पूछा - ‘गाय को रखना भी बड़े झंझट का कार्य है । इस गाय का हम क्या करेंगे ? इस के चारा-पानी की व्यवस्था कहाँ से होगी ?’ संत ने निर्विकार भाव से कहा - ‘पुत्र, इस जंगल में परमात्मा ने सभी प्राणियों के भोजन की व्यवस्था की है । जब हमारे खाने-पीने की व्यवस्था भी होती है, तो फिर इस मूक प्राणी की व्यवस्था भी परमात्मा करेगा । अच्छा है, हमें भी इस गाय का दूध पीने को मिलेगा । परमात्मा सब-कुछ अच्छा ही करते हैं ।’ 

         गुरु-शिष्य दोनों मिलकर गाय की सेवा करते और जंगल में चरने के लिए छोड़ देते । सुबह-शाम गाय के दूध- दही का सेवन कर लिया करते । अब शिष्य को गाय बोझ नहीं लग रही थी । वह बड़े मन से गाय को जंगल में जाकर चरा लाता । सुबह शाम उसको दुह लेता, दूध से दही और मक्खन आदि बना लेता और अपने गुरु के साथ सुखपूर्वक उनका सेवन करता ।

         कुछ दिनों बाद वही व्यक्ति जो गाय को आश्रम में छोड़ कर गया था, वापिस लौट आया । उसने आते ही संत से अपनी गाय वापिस मांगी । संत ने निर्विकार भाव से कहा कि ‘जहां बांधकर गए थे, वहीं से खोलकर वापिस ले जाओ ।’ वह व्यक्ति गाय को खोलकर वापिस ले गया । यह सब देख-सुनकर शिष्य बड़ा उद्वेलित हुआ । उस व्यक्ति के जाने के बाद पीछे से शिष्य उसको भला-बुरा कहने लगा । संत ने उसे समझाया कि ‘परमात्मा सब कुछ अच्छा ही करते हैं । अच्छा हुआ वह व्यक्ति गाय को वापिस ले गया । इससे हमें उस गाय को चराने, उसका गोबर उठाने आदि के झंझट से मुक्ति मिली ।’ गुरु की बात सुनकर कुछ समय बाद शिष्य शांत हो गया ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Thursday, July 16, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर - 53

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -53

           आइए ! आगे बढ़ते हैं, अनासक्त होने के एक और सूत्र की ओर । एक संत घने जंगल में कुटिया बनाकर अपने शिष्य के साथ साधना किया करते थे । पास में स्थित गाँव वाले अपनी-अपनी श्रद्धानुसार उनके खाने-पीने आदि का प्रबंध कर दिया करते थे । संत बड़े ही आत्म-रत प्रवृति के थे, उन्हें अपने शरीर, दीन-दुनिया आदि की कोई चिंता नहीं रहती थी । परन्तु शिष्य कई बार भोजन, कपड़ों और आजीविका आदि की चिन्ता कर लिया करता था । संत उसे बहुत समझाते, परन्तु शिष्य फिर भी कभी-कभी उनसे मिले ज्ञान को विस्मृत कर देता था ।

         एक बार गाँव का एक व्यक्ति एक दुधारू गाय को लेकर संत की कुटिया में आया । संत को गाय सौंपते हुए संत उसने कहा कि ‘मैं गाँव छोड़कर जा रहा हूँ । न जाने वापिस लौटकर कभी आ पाऊंगा अथवा नहीं । इस गाय को आपके सिवाय किसी अन्य के पास छोड़ना मेरे को उचित नहीं लगा । अतः यह गाय आपको देकर जा रहा हूँ । आप इसकी सुगमता से देखभाल भी कर सकते हैं ।’ संत ने उस व्यक्ति को कुटिया के खुले भाग में गाय को बांधने का कह दिया । व्यक्ति ने संत को प्रणाम किया और दूसरे गाँव जाने के लिए यात्रा पर निकल गया ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।