Thursday, September 3, 2026

सम्भवामि युगे युगे -1

 सम्भवामि युगे युगे -1

             परमात्मा के अन्तर्गत दो - पुरुष और प्रकृति । पुरुष : अपरिवर्तनीय, प्रकृति : परिवर्तनशील । इस प्रकार अक्रिय परमात्मा के दो विभाग हुए - एक अक्रिय पुरुष और दूसरा सक्रिय प्रकृति । परमात्मा अक्रिय, न तो कर्ता न भोक्ता । यही स्वरूप पुरुष का भी है । प्रकृति सक्रिय है, फिर भी प्रकृति न तो कर्ता है और न ही भोक्ता, बिलकुल परमात्मा तथा पुरुष की तरह । क्रिया के कारण प्रकृति में होने वाली परिवर्तनशीलता के अतिरिक्त दोनों में कोई अन्तर नहीं है, इसीलिए कहा जाता है कि परमात्मा के साक्षात् दर्शन करने है तो प्रकृति को निहारो । 

         प्रकृति (जगत्) में क्रिया भी होती है और प्रत्येक क्रिया का परिणाम भी मिलता है । यह अटल सिद्धान्त है कि प्रत्येक क्रिया का परिणाम होता है, तभी तो प्रकृति में परिवर्तन होते हैं ; आज जो जैसा दिख रहा है, पल भर बाद वो वैसा नहीं रहेगा । सक्रियता से क्रिया, उस क्रिया की प्रतिक्रिया और परिणाम, फिर भी प्रकृति न कर्ता न भोक्ता । है न आश्चर्य ! प्रश्न उठता है कि फिर कर्ता और भोक्ता कौन है ? कर्ता है, प्रकृति में स्थित पुरुष । जिस कारण से पुरुष प्रकृति में स्थित होकर कर्ता और भोक्ता बनता है, उसी को माया कहते हैं । यह माया प्रकृति का ही स्वरूप है ।

           दो विभाग - प्रकृति और पुरुष । जब पुरुष प्रकृति में स्थित हो जाता है तब प्रत्येक क्रिया का अपने आपको कर्ता मानने लग जाता है । जो कर्ता बनता है उसको भोक्ता बनना ही पड़ता है अर्थात् पुरुष प्रकृति में हो रही प्रत्येक क्रिया का परिणाम स्वयं में अनुभव करता है । इस प्रकार क्रिया होती तो प्रकृति में है, उस क्रिया से वह तो अछूती बनी रहती है परन्तु पुरुष उस क्रिया के साथ होली खेलने लग जाता है । पुरुष को अपने स्वरूप में स्थित रहना चाहिए था साक्षी बनकर, परन्तु प्रकृति की सक्रियता से उपजी चकाचौंध से प्रभावित होकर वह अपनी स्वस्थता छोड़ देता है और जाकर प्रकृति में स्थित हो जाता है । इस प्रकार प्रकृतिस्थ पुरुष ही माया के जाल में उलझ कर कर्ता-भोक्ता बन जाता है । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, September 2, 2026

अनुभव की बात

 अनुभव की बात 

         गत सौ दिनों में दो विषयों पर लेखन हुआ, ‘आसक्ति से अनुरक्ति की ओर’ तथा ‘मौन’ । पता नहीं, विषय कौन सुझाता है ? मैं जो सोचता हूँ, वह विषय तो कहीं बहुत पीछे छूट जाता है और अचानक मस्तिष्क में एक बिजली सी कौंधती है और बिलकुल नया विषय सामने आ जाता है । फिर उस विषय पर चिंतन कहाँ से शुरू होता है, कैसे आगे बढ़ता है और लेखनी कैसे चल पड़ती है, कुछ भी अनुभव में नहीं आता । जब संपादन करने के लिए अवलोकन करता हूँ तो आश्चर्य होता है कि क्या ये शब्द मेरे हैं ? नहीं, शब्द मेरे नहीं है बल्कि किसी ने मेरे माध्यम से इनको कैनवास पर उतारा है । बहुत कुछ बदलाव करने की सोचता हूँ परंतु बदलाव भी मेरे चाहे अनुसार नहीं होता । जब संपादित करने के पश्चात् पढ़ता हूँ तो आत्मिक संतुष्टि और सुख का अनुभव अवश्य होता है । गोस्वामीजी ने मानस में जिसे ‘स्वान्तः सुखाय’ कहा है, क्या यह लगभग वैसा ही है ?

            मेरे चाहने से कुछ नहीं होता, चाहता वही है, मुझे तो उसकी चाह के अनुसार भूमिका निभानी है । अब देखिए, ‘मौन’ पर लिखने के पश्चात् सोचा था कि मैं अब लेखनी को विश्राम देकर ‘न किंचिदपि चिन्तयेत्’ की अवस्था की तरफ़ बढ़ चलूं क्योंकि अंततः उसी लक्ष्य को प्राप्त करना है । मस्तिष्क तंद्रा की अवस्था में था कि यकायक बिजली सी कौंधी और एक प्रश्न उठा  - ‘‘अनुरक्ति” का क्या हुआ ? 

         आचार्य जी श्री गोविन्द राम शर्मा कहते हैं - ‘प्रकाश ! तू ज्ञान मार्गी है । ज्ञान से भक्ति विलक्षण है । जब भीतर भक्ति जगेगी और परमात्मा से प्रेम होगा तब समस्त ज्ञान स्वयं में ही पा लेगा ।’  आज ज्ञान और भक्ति के दोराहे पर खड़ा मैं सोच रहा हूँ कि ‘अनुरक्ति’ की ओर बढ़ने का संकेत क्या आदरणीय भाईजी (आचार्यजी) की परमात्मा से की गई अनुशंसा का परिणाम है ? क्योंकि लेखन हेतु मुझे जो भी संकेत मिलता है, उसे मैं उन्हीं का आशीर्वाद और परमात्मा की कृपा समझता हूँ ।

         खपती मस्तिष्क की खपत तब तक नहीं मिटती जब तक आप भीतर से ख़ाली नहीं हो जाते । अब इसी खपत को परमात्मा की ‘अनुरक्ति’ में परिवर्तित कर दिया है । अब जिस दिन गुरु और परमात्म-कृपा होगी भीतर से रिक्त होता चला जाऊँगा, फिर एक दिन ‘मौन’…… , पास में कुछ न होते हुए भी सब कुछ पा लेना  । तब तक लेखनी भगवान भरोसे, वह जैसा और जब तक लिखवाना चाहता है, तब तक वैसा लिखता रहूँगा । ‘अनुरक्ति‘ की प्रथम सीढ़ी और संभवतः अंतिम भी अर्थात् एकमात्र सीढ़ी है - उसकी लीला का गुणगान करना और उसकी लीला में डूब जाना । परन्तु प्रत्येक लीला तो माया के अन्तर्गत है, मायापति की माया के । कोई बात नहीं, उसकी माया का गुणगान करना भी तो परोक्ष रूप से उसी का गुणगान करना है । बिना माया की सहायता के सीधे वह भी अवतरित नहीं हो सकता । प्रकृति को अपने अधीन करके अपनी माया से ही तो वह प्रकट होता है - ‘धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे’ ।

गोस्वामीजी मानस में कहते हैं - रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि॥ अर्थात् भगवान श्री राम का स्मरण करना, उनके नामों का गुणगान करना और निरंतर उनके यश व गुणों के समूहों को सुनना ही सबसे बड़ा और सुलभ साधन है।

कल से माया और मायापति का गुणगान करेंगे - “ सम्भवामि युगे युगे” में ।

।। हरिः शरणम् ।।

डॉ. प्रकाश काछवाल

Thursday, August 13, 2026

मौन साधना/मूक-सत्संग

 मौन-साधना / मूक-सत्संग 

          अभी कुछ दिनों पहले एक मौनी बाबा से मिलने का अवसर मिला । सुना था कि बाबा पिछले 20 वर्षों से मौन साधना कर रहे हैं, उत्सुकता बढ़ी तो मिलने पहुंच गया । बाबा अपने शिष्यों और अनुयायियों से घिरे बैठे थे । शिष्य भी ऐसे कि मौनी बाबा की प्रत्येक हरकत पर दृष्टि गड़ाए रहते । बाबा की तनिक सी हरकत से ही शिष्य समझ जाता और बाबा के आदेश की अनुपालना में दौड़ पड़ता । 

          मैंने भी बाबा को प्रणाम किया और अन्य अनुयाइयों के साथ उनके सामने बैठ गया । मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे कोई कार्यक्रम शीघ्र ही शुरू होने वाला है । क्या कार्यक्रम में बाबा भाग लेंगे ? भाग लेंगे तो बाबा बोलेंगे कैसे, वो 20 वर्षों से मौन जो हैं ? फिर क्या बाबा मूक दर्शक बने बैठे रहेंगे ? ऐसे अनगिनत प्रश्न मन में उमड़ने लगे । तभी एक शिष्य ने कार्यक्रम प्रारम्भ होने की सूचना देते हुए सामने उपस्थित लोगों को बाबाजी से प्रश्न करने का कहा । मैं सोच रहा था कि प्रश्न तो कर लेंगे पर बाबा तो बोलते नहीं हैं, फिर उत्तर कैसे देंगे ? 

          तभी बाबाजी ने एक शिष्य की ओर देखा । शिष्य समझ गया कि बाबाजी क्या चाहते हैं ? तत्काल ही उस शिष्य ने एक स्लेट और चाक लाकर बाबाजी के सम्मुख रख दी । बाबाजी अब अनुयाइयों के प्रश्न सुनते और उसका चाक से स्लेट पर उत्तर लिखकर प्रश्नकर्ता को दिखा देते । इतना सब होते देखकर मैं प्रश्न करना ही भूल गया और उसके स्थान पर मन में दूसरा प्रश्न उठ खड़ा हुआ । क्या इस प्रकार के मौन को ही मौन-साधना कहा जाता है ? प्रश्न का उत्तर जानने की उत्सुकता ने अचिन्तनीय विषय ‘मौन’ पर चिंतन करने को विवश कर दिया ।

           अध्यात्म की भूख भी बड़ी विचित्र है । जहां से कुछ ज्ञान मिलने की तनिक सी भी सम्भावना नज़र आती है, पागल मन उसी ओर जाने को उत्सुक हो जाता है । न जाने यह भूख कब मिटेगी ? जो पहले जान लिया था, वह तत्काल ही फिर से न जाना हुआ हो जाता है क्योंकि जितना जानने का प्रयास करते हैं, उतना ही उलझते जाते हैं । ज्ञान असीम है, इसकी पूर्ण अवस्था को पा लेना बड़ा ही दुष्कर है क्योंकि थोड़ा कुछ जानते ही अनुभव में आता है कि अभी भी बहुत कुछ जानना शेष है ।

           पश्चिम के एक दार्शनिक ने बड़े काम की बात कही है । वे कहते हैं - “50 वर्ष पहले मैं सब कुछ जानता था । आज जीवन के इस मोड़ पर आकर समझ में आया कि मैं अब भी कुछ नहीं जानता ।” ज्ञान असीम है, इसको जितना समेटने की कोशिश करेंगे उतने ही हम उलझते जाएंगे । इसीलिए कहा जाता है कि जीवन में जितना जान लिया है, वह पर्याप्त है । 

             हरिः शरणम् आश्रम के आचार्य श्री गोविंद राम शर्मा कहते हैं कि सीखे हुए ज्ञान की क़ीमत दो कौड़ी की नहीं है । सीखे हुए ज्ञान से हमें शब्दों का जाल बुनना आ सकता है जिसको प्रवचन और लेखन के माध्यम से व्यक्त कर सकते हैं ।  ज्ञान को जब तक आचरण में नहीं लाया जाता तब तक इसकी कोई क़ीमत नहीं है । जब ज्ञान भीतर उतरता है तब मनुष्य मौन और निःशब्दता को पा लेता है क्योंकि तब यह ज्ञान आत्म-स्वरूप का अनुभव करा देता है । इस अनुभव को व्यक्त करने के लिए कोई शब्द नहीं होते । इस निःशब्दता और मौन पर कबीर कहते हैं - ‘गूंगे केरी सरकरा, खाय और मुस्काय ।’ परमात्मा का अनुभव होते ही शब्द खो जाते हैं और ‘मौन’ घटित हो जाता है ।

           चलिए ! ‘मौन’ क्या है, इसको जानने और समझने का प्रयास करते हैं । सबसे पहले शरीर-विज्ञान के आधार पर मौन को समझते हैं ।

            ‘मौन’ का शाब्दिक अर्थ है - वाक् शक्ति का उपयोग न करना । परमात्मा ने प्रकृति के माध्यम से जीवों को बोलने की शक्ति प्रदान की है । पांच कर्मेन्द्रियों में ‘वाणी’ भी एक कर्मेन्द्रिय के माध्यम से दी जाने वाली अभिव्यक्ति है । इसे वाक्-इन्द्रिय कहा जाता है । सभी जीवों में एक मात्र मनुष्य ही ऐसा जीव है जो शब्दों के माध्यम से अपने भीतर के भावों को स्पष्ट रूप से व्यक्त कर सकता है । मनुष्य के गले में स्थित दो स्वर-यन्त्रों (vocal chords) के मध्य से जब वायु का प्रवाह होता है तो उससे ध्वनि की तरंगें निकलती है । इन ध्वनि-तरंगों को व्यक्ति अपनी जिह्वा से भिन्न-भिन्न आवृतियों (frequencies) का निर्माण करते हुए शब्द बनाता है । ये शब्द ही उसके भावों को सबके समक्ष प्रस्तुत करते हैं । इस प्रकार ये शब्द एक दूसरे से सम्पर्क और संदेश-संचार का साधन बनते हैं ।

          प्रश्न उठता है कि शब्द-अभिव्यक्ति में ज्ञान की भूमिका किस प्रकार है ? मनुष्य ज्ञान तो प्राप्त करता है - पांच ज्ञानेंद्रियों से और फिर शब्दों के माध्यम से उस ज्ञान को बोलकर अभिव्यक्त करता है वाक्-इंद्रिय के माध्यम से । मनुष्य की शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्ति में भूमिका एकमात्र श्रवणेन्द्रिय की ही है । जिसमें श्रवण क्षमता का जन्मजात अभाव होता है उसकी वाक्-इंद्रिय भी कुछ नहीं कर सकती । कान से सुने जाने वाले शब्द ही बाल्यावस्था में शब्द-कोष (vocabulary) का निर्माण करते हैं । जन्मजात बहरा (deaf) बालक कुछ भी नहीं सुन सकता तब उसमें शब्द-कोष कैसे बनेगा ? इसीलिए जन्मजात बहरा व्यक्ति गूँगा (dumb) भी होगा, यह निश्चित है ।

           यह बात हुई जन्म-जात गूंगे की । कई बार सिर पर घातक चोट लग जाने से मस्तिष्क का वह भाग प्रभावित हो जाता है जो स्वर-यन्त्र तक शब्दों को उच्चारित करने के संकेत भेजता है । अपनी गर्दन के आगे के भाग में जहां थायरॉयड ग्रंथि स्थित होती है, वहाँ से एक नाड़ी (nerve, recurrent laryngeal) गुजरती है । इस नाड़ी के क्षतिग्रस्त हो जाने से भी स्वर-यन्त्र काम करना बन्द कर देते हैं । ऐसा होने से मनुष्य चाहकर भी बोल नहीं होता । 

         जिन लोगों को ज़ोर से बोलने की आदत होती है अथवा जो प्रत्येक बात पर क्रोधकर चिल्लाने लगते हैं, उनके स्वर-यन्त्र क्षतिग्रस्त हो जाते हैं । उन्हें प्रारंभ में तो बोलने में कठिनाई होती है, फिर धीरे-धीरे वहाँ से शब्द उच्चारित नहीं होते । ऐसा व्यक्ति भी मौन हो जाता है क्योंकि वह चाहकर भी बोल नहीं पाता ।

            कई बार स्वर-यन्त्र स्वयं ही रोगग्रस्त हो जाता है जिसके कारण प्रारम्भ में तो आवाज़ भारी होने लगती है जिसे hoarseness of voice होना भी कहते हैं और अंततः वाणी निकलनी असंभव हो जाती है । स्वर-यंत्र की बीमारियों में इसका कैंसरग्रस्त हो जाना मुख्य है ।

            इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि शारीरिक बीमारियों से भी वाणी का मौन हो जाना हो सकता है । यह सब बाहर के मौन है परंतु इन सब प्रकार के मौन में भी भीतर वार्तालाप चलता रहता है । जब तक भीतर से चुप नहीं हुआ जाता तब तक सब मौन व्यर्थ हैं ।

            इतना विज्ञान समझ लेने से ‘मौन’ को समझना आसान हो जाएगा । हम ‘मौन’ को जानने की यात्रा पर अग्रसर हैं । गूँगे का भी मौन होता है, बीमार व्यक्ति का भी मौन होता है परन्तु उसे मौन नहीं कहा जा सकता । उसका मौन शारीरिक विकलांगता के कारण है न कि किसी उद्देश्य को लेकर । वह भले ही शब्दों को बोलकर अपनी अभिव्यक्ति नहीं दे सकता परन्तु मुस्कुरा कर, दुःखी होकर, रोकर, हाथ-पैर पटककर अपनी शेष चार ज्ञानेंद्रियों से मिले ज्ञान की अभिव्यक्ति दे सकता है । 

           चलिए ! जन्मजात मूक व्यक्ति के मौन से आगे बढ़ते हैं । स्वर-यन्त्र के स्वस्थ होने के बाद भी यदि आप अपनी इच्छा से शब्द उच्चारित नहीं कर रहे हैं तो यह आपका ‘मौन’ है । इसमें सबसे महत्वपूर्ण यह जानना है कि आप मौन क्यों हुए अर्थात् आपके मौन होने के पीछे क्या उद्देश्य है ? संसार की चिंता से ग्रस्त व्यक्ति भी मौन धारण कर लेता है और आध्यात्मिक चिंतक भी । परन्तु दोनों के मौन में बड़ा अन्तर है । आध्यात्मिक चिंतक जब चिंतन की सर्वोच्च अवस्था का भी अतिक्रमण कर जाता है तब चिंतन कहीं पीछे छूट जाता है तब जो मौन घटित होता है वह वास्तव में मौन है ।

          शास्त्रों में मौनी बाबा को मुनि कहा जाता है । सनातन धर्म-शास्त्रों में ऋषि और मुनि, इन दो प्रकार के आध्यात्मिक चिंतकों का वर्णन आता है । शास्त्रों में आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर व्यक्ति को दो शब्दों के माध्यम से सम्बोधित किया गया है - ऋषि और मुनि । दोनों ही आत्म-बोध की यात्रा पर हैं । फिर भी इनकी दो संज्ञाएँ क्यों है ? 

               जो ज्ञान मार्ग पर अग्रसर है और शरीर तथा स्वयं (आत्मा) के एक दूसरे से भिन्न होने के रहस्य को जानने के लिए शोध रत है, उसे ऋषि कहा गया है । आज विज्ञान के युग में ऐसे व्यक्ति को वैज्ञानिक कहा जाता है । दूसरा जो आत्म-बोध के लिए मौन रहकर अध्यात्म पथ पर तपस्या में लीन है, उसे मुनि कहा जाता है । मुनि को शरीर और संसार की चिंता नहीं सताती वह तो सदैव अपने भीतर ही प्रवेश किए रहता है । ऐसा मुनि सदैव मौन रहकर परमात्म-चिंतन में लीन रहता है । इन्हें दार्शनिक कहा जाता है । वे एक दर्शन का अनुगमन करते हुए अध्यात्म-पथ पर आगे बढ़ते हैं । ऋषि और मुनि में तनिक सी भिन्नता होने का अर्थ यह नहीं है कि मुनि में ज्ञान नहीं है, वह भी ज्ञानी है । 

          ऋषि प्रकृति के रहस्य खोलने में लगा हुआ है । वह इन रहस्यों के माध्यम से शरीर और संसार से विमुख होने का प्रयास करते हुए अंततः आत्म-बोध को उपलब्ध होता है । मुनि प्रकृति के ज्ञान का अतिक्रमण कर जाता है और मौन रहकर सदैव परमात्मा के चिन्तन में लगा रहता है । वह ज्ञान से चिन्तन की अवस्था में चला गया है जबकि ऋषि सदैव आत्म-बोध के सुगम रास्तों की खोज में रत रहता है । 

              महर्षि पतञ्जलि अष्टांग-योग के माध्यम से आत्म-बोध को उपलब्ध हुए । उन्होंने यम, नियम, आसान, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि, इन आठ मार्गों की खोज की, जिससे कोई भी व्यक्ति आत्म-बोध को उपलब्ध हो सकता है । इसी अष्टांग-योग की खोज करने के कारण उन्हें ऋषि माना जाता है । इसी प्रकार चरक और सुश्रुत भी ऋषि के श्रेणी में आते हैं जिन्होंने रोगग्रस्त शरीर की शल्य और भेषज-चिकित्सा के माध्यम से व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य से स्वस्थ अर्थात् ‘स्व’ में स्थित होने के मार्ग की खोज की थी । उन्होंने सिद्ध किया कि एक स्वस्थ शरीर ही आत्म-बोध को उपलब्ध हो सकता है । 

          ऋषि भी आगे बढ़ते हुए मुनि हो जाता है और मुनि भी ऋषि हो सकता है । नारदजी देवर्षि भी हैं और मुनि भी ।  विश्वामित्र ऋषि भी हैं और मुनि भी । वशिष्ठजी मुनि कहलाते हैं । जो व्यक्ति ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था तक पहुंच जाता है, फिर उसके पास उस ज्ञान को व्यक्त करने के लिए शब्दों का अभाव हो जाता है ।  ‘शब्दों के अभाव’ से अर्थ है कि उसके शब्दकोश में कोई ऐसा शब्द नहीं है जिससे उस ज्ञान को व्यक्त किया जा सके अर्थात् किसी दूसरे तक पूर्ण रूप से संप्रेषित कर सके । ऐसा मुनि निःशब्द हो जाता है । यह निःशब्दता की अवस्था ही वास्तविक मौन है ।

       इतने विवेचन से मुनि के मौन को सुगमता से समझा जा सकता है । ‘योगवासिष्ठ’ में दो प्रकार के मुनि कहे गए हैं - काष्ठ तपस्वी और जीवन्मुक्त । शब्दों के फेर में न पड़ते हुए आगे बढ़ते हैं और मुनि के मौन को समझने का प्रयास करते हैं ।

           मौन हुआ पुरुष ही मुनि कहलाता है । परमात्मा की भावना से रहित शुष्क क्रियाओं में बद्ध, निश्चय और हठपूर्वक इंद्रियों को जीतने वाला मुनि काष्ठ मुनि कहलाता है । मौन की सर्वोच्च अवस्था व्यक्ति को जीवन्मुक्त कर देती है । इस विनाशशील संसार के स्वरूप को जानकर जो विशुद्धात्मा और परमात्मा में स्थित ज्ञानी महात्मा बाहर से लौकिक व्यवहार करता हुआ भी भीतर विज्ञानानन्द परमात्मा में तृप्त रहता है, ऐसे व्यक्ति को जीवन्मुक्त मुनि कहा जाता है । जीवन्मुक्त वह है जो स्थूल शरीर के रहते हुए भी समस्त शरीरों से मुक्त हो गया है । फिर उसके मनुष्य होने और परमात्मा होने के मध्य केवल स्थूल शरीर ही रहता है अन्यथा वह परमात्मा ही है । स्थूल शरीर के गिरते ही वह संसार के आवागमन चक्र से मुक्त होकर परमात्मा के साथ एकाकार हो जाता है ।

        मौन एक तपस्या है । मौन होना इतना सुगम नहीं है, जितना सुगम इसको समझा जाता है । मनुष्य की विशेषता है कि वह एकान्त में भी मौन होकर मौन नहीं रह पाता । वह बाहर से भले ही किसी से बतिया न रहा हो परंतु भीतर ही भीतर वह बड़बड़ाता रहता है । प्रश्न है कि फिर ‘मौन’ क्या है ? उत्तर जानने के लिए सबसे पहले यह जानते हैं कि मौन कितने प्रकार के हैं और उनमें कौन सा मौन वास्तव में ‘मौन’ की श्रेणी में आता है ।

         योगवासिष्ठ में मौन के चार भेद बताए गए हैं - वाक्, इंद्रिय, काष्ठ और सुषुप्ति मौन । पहले तीन प्रकार के मौन वास्तव में काष्ठ मौन ही हैं और ऐसे मौन का अनुपालन करने वाला काष्ठ मुनि कहलाता है । काष्ठ मौन मन की स्फुरणा है, चित्त का चलन है । अतः ये तीनों मौन ही उपादेय (useful) नहीं है वरन् त्याज्य है ।

        वाक् मौन में केवल शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्ति नहीं दी जाती । यह केवल ऊपरा-ऊपरी का मौन है अर्थात् दिखावटी मौन है । जानबूझकर न बोलना ही इसका आधार है । आजकल मौन-व्रत की एक परम्परा चल निकली है । आसपास के वातावरण में होने वाली प्रत्येक घटना पर दृष्टि और कान लगे रहते हैं और भीतर ही भीतर उन घटनाओं का विवेचन भी चलता रहता है । विवेचन से जो प्रतिक्रिया निकलनी चाहिए वह नहीं निकाल सकते क्योंकि मौन-व्रत जो है । इस प्रकार मन मसोसकर शब्दों के माध्यम से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जाती है । वाक् मौन में मन सहित सभी ज्ञानेद्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ पूर्ण रूप से सजग रहती है । वाक् मौन केवल वाक् कर्मेन्द्रिय को बलपूर्वक दबाने का प्रयास भर है अर्थात् बहुत कुछ बोलना चाहते हुए भी कुछ नहीं बोलना है ।

          ‘बोलना चाहते हुए भी बोलना नहीं है’, केवल यह वाक् मौन नहीं है । वाक् मौन का उद्देश्य होना चाहिए कि अनावश्यक न बोला जाय, असत्य न बोलें, कटु और कठोर वचन किसी को न कहें तथा मन को शान्त और एकाग्र करने का प्रयास करें । ऐसा करने से आत्म-चिन्तन और साधना में प्रगति होगी । स्मरण रहे कि केवल मुंह बंद रखना ही वाक् मौन नहीं है । यदि मन के भीतर विचारों की उठापटक चलती रहेगी तो वाक् मौन अधूरा है । 

           वाक् मौन को सुषुप्ति मौन तक पहुँचने का पहला सोपान कहा जा सकता है । वाक् मौन का व्रत लेते समय ध्यान रखें कि वाणी पर संयम रखना है, सत्य और सर्व हितकारी वचन बोलने हैं तथा अनावश्यक भाषण नहीं करना है । जब इसमें सफलता मिल जाये तो इसी पर नहीं रुकना है बल्कि इंद्रिय मौन की ओर आगे बढ़ना है ।

          इंद्रिय मौन में ज्ञानेंद्रियों को विषय उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं हालांकि इन्द्रियाँ विषय-भोग चाहती हैं । इस मौन के केन्द्र में इंद्रियों का संयम होना चाहिए । भीतर ही भीतर मनुष्य भोगों की भूख को अनुभव तो करता हैं परन्तु मौन रहकर वह उस भूख को सहन करने का प्रयास करता है । जो मनुष्य स्वयं को वास्तविक मूक अवस्था तक ले जाना चाहता है, उसके लिए इंद्रिय मौन एक सीढ़ी है । इंद्रिय मौन का उद्देश्य है - इंद्रियों को विषयों का दास होने से बचाना, मन को शान्त रखना, और कामनाओं को नियंत्रण में रखना ।

         मनुष्य की पांच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं । इंद्रिय मौन में इन पाँचों का संयम आवश्यक है । आँखों के मौन से अर्थ है अनावश्यक दृश्यों से बचना, जिससे विकार जन्म न लें । श्रवणेन्द्रिय का मौन है, चुग़ली, निंदा आदि व्यर्थ की बातें न सुनना । जिह्वा का मौन है स्वाद की आसक्ति न रखना । त्वचा के मौन से आशय है कि भोग विलास से बचें और स्पर्श सुख के आकर्षण और आसक्ति से मुक्त हों । नासिका का मौन है, गन्ध के प्रति न तो आकर्षण हो और न ही प्रतिकर्षण । 

         प्रत्येक मौन की शुरुआत तो वाक् मौन से होती है परन्तु वाक् मौन को ही मौन समझ लेना साधक की भूल है । उसे वाक् मौन से आगे बढ़ते हुए इंद्रिय मौन को अपनाना चाहिए । परंतु इंद्रिय मौन पर भी अटकना नहीं है, इससे भी आगे बढ़ना है । यह मौन भी वाक् मौन की तरह त्याज्य है अर्थात् इससे भी आगे की यात्रा पर बढ़ना है ।

           काष्ठ मौन, यह मौन का तीसरा भेद है । काष्ठ का अर्थ है, लकड़ी अर्थात् इस मौन में लकड़ी के समान पूर्णतः स्थिर हो जाना, निश्चल हो जाना । इस प्रकार के मौन में शरीर और इंद्रियों के माध्यम से जो भी प्रतिक्रिया दी जा सकती है, उनसे मुक्त हो जाना है । संसार में चारों ओर ऐसे अनेकों विषय बिखरे पड़े हैं, जो आपको विचलित करने का प्रयास करेंगे परन्तु प्रतिक्रिया न देते हुए शारीरिक (स्थूल शरीर) स्तर पर काष्ठ की तरह बने रहना है । इस प्रकार शरीर और इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण हो जाता है ।

           शरीर और इंद्रियों पर जब पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो जाता है तब मन को शान्त और निर्मल करने की ओर आगे बढ़ना चाहिए । काष्ठ मौन की अवस्था तक पहुंच जाने के बाद भी अभी तक मौन की पूर्णता तक नहीं पहुंचा गया है । उससे भी आगे मन को शान्त करते हुए उसे अमन बनाना है, तभी वास्तविक मौन घटित होगा ।

        वाक्, इंद्रिय और काष्ठ, तीनों ही काष्ठ मौन हैं क्योंकि अभी तक मन की उठापटक नहीं मिट सकी है । बाह्य रूप से संयमित जीवन प्रतीत तो अवश्य होता है परंतु भीतर ही भीतर कुछ खटक रहा होता है । वाक् मौन में स्वर-यन्त्र काष्ठ हो जाता है और इंद्रिय मौन में इंद्रियाँ । जब सम्पूर्ण स्थूल शरीर ही मौन अवस्था को प्राप्त हो जाता है, तब यह पूर्ण काष्ठ मौन है । परन्तु अभी भी सूक्ष्म शरीर कमोबेश सक्रिय बना हुआ है । इस सक्रिय सूक्ष्म शरीर को भी शान्त करके सुषुप्ति अवस्था में ले जाना है । जब सूक्ष्म शरीर भी सो जाता है, तब इस अवस्था को सुषुप्ति मौन कहा जाता है ।

        सुषुप्ति मौन से तात्पर्य है, गहरी निद्रावस्था जैसी शान्ति, लेकिन पूर्ण जागरूकता के साथ । यह जाग्रत सुषुप्ति अवस्था है । सुषुप्ति मौन में मन, बुद्धि और अहंकार शान्त हो जाते हैं । फिर इस अवस्था में न तो विषयों की ओर दृष्टि जाती है और न ही उनका अनुभव होता है ।

              सुषुप्ति मौन में मन के सभी संकल्प-विकल्प शान्त हो जाते हैं, इंद्रियाँ विषयों की ओर नहीं दौड़ती और भीतर गहरी शान्ति और स्थिरता रहती है । इसे ध्यान और आत्मचिन्तन की सर्वोच्च अवस्था कहा जाता है । सुषुप्ति मौन में साधक सदैव जाग्रत रहता है, सोता नहीं है । भगवान गीता में कहते हैं - 

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने: ।। गीता -2/69 )

संपूर्ण प्राणियों की जो रात (परमात्मा से विमुखता)  होती है, उसमें संयमी मनुष्य जागता है और जिसमें सब प्राणी जागते है (भोग और संग्रह में लगे रहते हैं), वह (तत्व को जानने वाले) मुनि की दृष्टि में रात है ।

           मनुष्य का बाहर से मौन होना अपेक्षाकृत सरल है । बाहर से मौन हो जाने से अर्थ है - वाक् मौन । मन की उठापटक वाक् मौन को भी दीर्घ अवधि तक स्थिर नहीं रहने देती । मन को मौन करना बड़ा कठिन है । जिसने मन पर विजय पा ली है उसके तीनों काष्ठ मौन (वाक्, इंद्रिय और काष्ठ) स्वतः सध जाते हैं । परन्तु मन को साधना बड़ा ही दुष्कर है । 

         मन की उठापटक का कारण उसकी चंचलता है । मैं यह करूँ, वह करूँ; ऐसा करूँ वैसा न करूँ ; ऐसे संकल्प-विकल्प मन में सदैव चलते रहते हैं । मन की इस चंचलता के कारण ही व्यक्ति के जीवन में कभी शांति नहीं आ सकती । आप सब कुछ कर सकते हैं परंतु शांत नहीं हो सकते क्योंकि आपने मन को छूट दे रखी है । मन की चंचलता को आपने शह दी है, मन स्वतः कुछ नहीं कर सकता । इस प्रकार मन को खुला छोड़कर आप उसके वश में हो गए हैं ।

         मन बड़ा चंचल है । अर्जुन कहते हैं कि इसको रोकना तेज वायु-प्रवाह को बाँधने की तरह ही बड़ा कठिन है । तब भगवान ने मन की चंचलता के निग्रह के दो उपाय बताए हैं - अभ्यास और वैराग्य । अभ्यास से आशय है कि मन जिन विषयों की ओर दौड़ता है, उसको बलपूर्वक वहाँ से हटाना । वैराग्य से आशय है, राग न रखना । मन के विषयों की ओर दौड़ने का प्रमुख कारण है - राग । किसी के प्रति मोह और आसक्ति का नाम ही राग है । राग मन के भीतर कामना को जन्म देता है और उस कामना को पूरा करने के लिए मन विषयों की और दौड़ पड़ता है ।

          वैराग्यवान होने के लिए अनासक्त होना पड़ता है । अनासक्त व्यक्ति का मन अमन हो जाता है । इस प्रकार मन की चंचलता स्वतः ही मिट जाती है । फिर मन विषयों के बीच रहते हुए भी उदासीन बना रहता है । इससे मन मौन अवस्था में चला जाता है । इस स्थिति को मानस-मौन भी कहा जाता है । मानस-मौन की अवस्था ही सुषुप्ति-मौन की अवस्था है । भगवान ने (गीता -2/69) में स्पष्ट किया कि संसार में आसक्त मनुष्य की जब रात होती है, तब उस रात में भी संयमी मनुष्य जागता है । सांसारिक मनुष्य सोते हुए स्वप्नावस्था में भी संसार में रमण करता रहता है और परमात्मा से विमुख बना रहता है । संयमी मनुष्य (जिसने इंद्रिय-मौन को साध लिया है) रात को निद्रावस्था में भी अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में रखता है । संयमी मनुष्य सोते हुए भी होश खोता नहीं है बल्कि भीतर से जाग्रत बना रहता है ।

      भगवान कहते हैं कि सांसारिक मनुष्य सूर्योदय होने पर जागता है और दिन भर सांसारिक भोगों में रत तथा भविष्य को सुरक्षित करने के लिए संग्रह करने में लगा रहता है, एक मुनि की दृष्टि में ऐसा दिन भी रात के समान है । भोग और संग्रह की कामना मन में उत्पन्न होती है । मुनि के मन में ऐसी कोई कामना नहीं उठती । उसका मन सदैव उसके वश में रहता है । मुनि के लिए मन की चंचलता कोई महत्व नहीं रखती । 

          जब आप चंचल मन की चंचलता के साथ चंचल नहीं होंगे तो मन की चंचलता स्वतः ही शान्त हो जाएगी । हमें मन को न तो एकाग्र करना है और न ही मन को मारने का प्रयास करना है बल्कि मन की चंचलता की ओर से उदासीन हो जाना है । मन में चंचलता के कारण उसमें विचार आयेंगे ही, यह निश्चित है । अतः इनको रोकने का प्रयास न करें । विचारों को आने से रोकने का जितना प्रयास करेंगे, उतनी ही उनकी तीव्रता बढ़ती जाएगी । 

          स्वामीजी कहते हैं कि ये मन में उठ रहे विचार गली के कुत्ते की तरह हैं । ज़रा सी खिड़की खुली हुई दिखी कि तत्काल ही कुत्ता  घर में घुस आता है । भीतर आए कुत्ते की तरफ़ ध्यान नहीं देंगे तो वह घूम फिर कर अपने आप उसी खिड़की से बाहर चला जाएगा । जितना उस कुत्ते को भगाने का प्रयास करेंगे, वह घर के एक कोने से दूसरे कोने में दौड़ता रहेगा, बाहर नहीं निकलेगा । यही हाल मन में उठने वाले विचारों का है । जितना विचारों को बाहर निकालने का प्रयास करेंगे उतनी ही उनकी तादाद और तीव्रता बढ़ती जाएगी । यदि हम उन विचारों पर ध्यान नहीं देंगे तो स्वतः ही वे धीरे-धीरे कम होते जाएँगे । अंततः एक स्थिति ऐसी आयेगी जब मन विचार-शून्य हो जाएगा । यही ध्यान की सर्वोच्च अवस्था है जिसे विचारशून्यता (thoughtlessness) की अवस्था भी कहा जाता है ।

          जब विचारशून्यता की अवस्था को उपलब्ध हो जाएंगे, तब वास्तविक मौन घटित होता है अर्थात् बाहर और भीतर, दोनों तरफ़ से मौन हो जाना । यही सुषुप्ति मौन है, जिसमें आत्म-स्वरूप का अनुभव हो जाता है । यह अनुभव बड़ा विलक्षण है, जिसमें परमात्मा की अनुभूति होती है । मौन की अवस्था की राह पकड़ कर आत्मस्वरूप तक पहुंचने का प्रयास ही मौन-साधना है, चुप-साधन है और मौन की अवस्था में परमात्मा के संग का अनुभव करना मूक-सत्संग है ।

           मौन-साधना से हम मौन की अवस्था को उपलब्ध हो जाते हैं । यह साधना वाक्-मौन से प्रारम्भ होती है और अंततः सुषुप्ति मौन तक पहुँच जाती है । सुषुप्ति-मौन का अर्थ है- संसार की ओर से पूर्ण रूप से विमुख हो जाना । स्वामीजी कहते हैं कि संसार से विमुख हो जाएं अथवा परमात्मा के सम्मुख हो जाएं, दोनों एक ही बात है । संसार से विमुखता स्वतः ही आत्म-ज्ञान करा देती है ।

             इस प्रकार मौन साधना के तीन स्तर माने जा सकते हैं - वाचिक मौन, मानसिक मौन और आत्मिक मौन । वाचिक मौन में अनावश्यक बोलना का त्याग करना है । मानसिक मौन में इंद्रियों और उनके विषयों से उदासीन बने रहकर मन में उठने वाले विचारों का केवल साक्षी बनना है । धीरे-धीरे विचार स्वतः ही उठने बंद हो जाते है और मानसिक मौन घटित हो जाता है ।  आत्मिक- मौन में मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को अनुभव करता है । ऐसा अनुभव करना ही मौन-साधना का लक्ष्य है ।

        भारतीय दर्शन में मौन को एक गहन साधना माना गया है । उपनिषदों में मौन के बारे में कहा गया है कि सत्य का अनुभव साधक को मौन और निःशब्द कर देता है । सत्य का अनुभव कभी शब्दों के माध्यम से न तो किया जा सकता है और न ही व्यक्त किया जा सकता है । जितना उसे व्यक्त करने का प्रयास किया है, वह केवल उस सत्य की ओर किया गया संकेत मात्र है, सत्य का वर्णन नहीं है । सत्य तो अनुभवगम्य और अवर्णनीय है । सत्य का अनुभव तो केवल मौन और प्रत्यक्ष अनुभूति से होता है । फिर जो वाक् मौन जैसा घटित होता है, वह वास्तव में सुषुप्ति मौन ही है । 

             अब बात करते हैं, मूक सत्संग की । मूक सत्संग का अर्थ है, मौन के माध्यम से सत्य का संग । ऐसा सत्संग जिसमें शब्दों की अपेक्षा मौन को अधिक महत्व दिया जाता है । भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में कई संतों ने मौन को ही सर्वोच्च साधना माना है । रमण महर्षि ने अपने जीवन में मूक-सत्संग को विशेष महत्व दिया था । उनके अनुसार मौन अपने आप में सबसे गहरा उपदेश है क्योंकि सत्य का अनुभव शब्दों से परे है ।

            सनातन धर्म में माना जाता है कि जब मन पूर्णतया शान्त होता है, तब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव करने के सर्वाधिक निकट होता है । इसे गीता में ध्यान-योग कहा गया है । ध्यान में व्यक्ति अपने भीतर की ओर केन्द्रित होता है । 

       गीता में भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं - 

                   शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।

                   आत्मसंस्थं मन: कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ।। 6/25 ।।

            धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे (संसार से) उपराम हो जाय और मन-बुद्धि को परमात्मस्वरूप में सम्यक् प्रकार से स्थापन करके फिर कुछ भी चिंतन न करे ।

              संसार परिवर्तनशील है । इसमें स्थिरता का न होना ही मनुष्य को दुःखी-सुखी करता है । मनुष्य चाहता है कि उसके जीवन में जो सुख आया है, वह टिके । वह यह भी जानता है कि सतत परिवर्तित होने वाला सदैव एक ही दशा में कैसे रह सकता है, फिर भी मनुष्य उसको पकड़े रखने का प्रयास करता है । ऐसे में संसार से उपराम कैसे हुआ जा सकता है ? भगवान कहते हैं - उपराम होने के लिए धैर्ययुक्त बुद्धि का होना आवश्यक है । बुद्धि को एक परमात्मा में बार-बार लगाते रहने से एक अवस्था ऐसी आती है, जब मनुष्य संसार से उपराम हो जाता है ।

        संसार से उपराम हो जाने पर मन-बुद्धि को परमात्मस्वरूप में सही रूप से स्थापित करना सरल हो जाता है । इस अवस्था में एक परमात्मा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, इस बात का ज्ञान हो जाता है । इस अवस्था को प्राप्त करने के पश्चात् कुछ भी चिन्तन नहीं करना है । यह मौन की अवस्था है । फिर परमात्मा का चिन्तन भी नहीं होता । इसका अर्थ यह है कि फिर परमात्मा का चिन्तन करना नहीं पड़ता बल्कि सतत और स्वतः होता है, जिसका भान साधक को भी नहीं होता ।

            स्वामीजी ने मौन को परमात्मा तक पहुंचने का साधन बताया है । वे कहते हैं कि प्रतिदिन थोड़ी-थोड़ी देर चुप होकर बैठने का अभ्यास करें । चाहे कुछ समय के लिए ही सही पर दिन में तीन चार बार बैठेंगे तो धीरे-धीरे समय बढ़ता जाएगा । चुप होकर बैठने का अर्थ है कि कुछ भी चिन्तन न करें, न तो परमात्मा का और न ही संसार का । कितना ही चिन्तन न करने का आग्रह रखें, चिंतन तो फिर भी होगा । ऐसे चिंतन से तटस्थ बने रहना है, न तो उसके साथ होना है और न ही उसके होने का विरोध करना है । अपनी ओर से चिंतन के साथ किसी प्रकार का सम्बन्ध न बनाएं; न तो अच्छा और न ही बुरा ।

           साधक को अपनी बुद्धि में यह पक्का निश्चय कर लेना चाहिए कि संपूर्ण संसार, समय, क्रिया, वस्तु, व्यक्ति आदि में एक परमात्म-तत्व ही सत्तारूप से परिपूर्ण है । जब भी चुप होकर बैठें, संसार का चिंतन छोड़ परमात्मा का ऐसे चिंतन करें कि एक परमात्मा के सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं है । अन्ततः इस चिंतन को भी छोड़ देना है । इस प्रकार आप बाहर के साथ-साथ भीतर से भी चुप/मौन हो जाएंगे । चिंतन छूट जाने से अक्रियता का अनुभव होगा, जोकि परमात्म-तत्व की विशेषता है । अक्रियता से ही सक्रियता जन्म लेती है । समस्त शक्तियां अक्रियता की उपज है । स्वामीजी कहते हैं कि इस प्रकार व्यक्ति को चुप रहने से जो शक्ति प्राप्त होती है, उससे वह संसार से ऊंचा उठ सकता है ।

           सोते समय जब कुछ भी चिंतन नहीं होता तो अच्छी नीन्द आती है और थके-मांदे व्यक्ति में नई ऊर्जा का संचार होता है । इसी प्रकार चुप होने से साधक को नई ऊर्जा मिलती है, जिससे वह परमात्मा के अधिक निकट होता जाता है । वास्तव में देखा जाए तो बाहर-भीतर से चुप हो जाना ही सहजावस्था है ।

मौन -18

            स्वामीजी ने चुप-साधन बताया है जिसकी परिणति सहजावस्था है । सहजावस्था मौन का परिणाम है । चुप-साधन को कई संतों ने चिद्योग (चित्+योग) नाम दिया है । इसे आध्यात्मिक यात्रा का पूर्वार्ध कहा गया है । चिद्योग का लक्ष्य साक्षित्व है अर्थात् साक्षी बनना है । साक्षी का अर्थ है जो कुछ भी हो रहा है उससे सम्बन्ध नहीं रखना, न अच्छा और न बुरा । साक्षित्व ही सहजावस्था है । सहजावस्था आपको परमात्मा तक ले जाती है ।

          कई दार्शनिकों ने सहजावस्था को सहज- योग नाम से कहा है । जिस प्रकार चिद्योग को आध्यात्मिक यात्रा का पूर्वार्ध है, उसी प्रकार सहज-योग इस यात्रा का उत्तरार्ध है । सहज-योग के दो भाग हैं - सुमिरन योग और लय योग ।सुमिरन योग में परमात्मा का सतत सुमिरन चलता रहता है जबकि लय योग में आप सीधे परमात्मा से जुड़ते हैं । सहज योग, भोग और दमन; दोनों के पार जाकर सहजता की बात करता है । 

        स्वामीजी इसी बात को बड़ी सरल भाषा में कहते हैं । वे कहते हैं कि साधक को चुप होकर निर्विकल्प होने का, क्रियारहित होने का स्वभाव बना लेना चाहिए क्योंकि वास्तव में आप क्रिया रहित ही हैं । क्रिया के साथ सम्बन्ध जोड़ लेने से प्रकृति के साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है और कुछ भी न करने से भी प्रकृति के साथ सम्बन्ध जुड़ता है । करना और न करना दोनों सापेक्ष हैं जबकि परमात्म-तत्व निरपेक्ष है । अपने आप को क्रियारहित अनुभव करने से परमात्म-तत्व में स्थिति का अनुभव हो जाता है और अंततः आप परमात्मा में स्थित हो जाते हैं ।

         इस प्रकार मौन को समझने का यह तुच्छ सा प्रयास है । मौन-साधना, चुप साधन, मूक-सत्संग, अचिन्त्य का ध्यान अथवा और कोई भी नाम दे दें, सब में मुख्य बात एक ही है कि आप बाहर-भीतर से मौन होकर ‘स्व’ में स्थित हो जाएं ।

सार-संक्षेप 

     मनुष्य जीवन का लक्ष्य है- आत्म-स्वरूप तक पहुंचना जिसे सन्त परमात्मा को प्राप्त करना भी कहते हैं । सभी दार्शनिकों और सन्तजनों ने परमात्मा तक पहुँचने के भिन्न-भिन्न साधन बताए हैं । सभी साधन कुछ न कुछ करने पर आधारित हैं । करने के साथ सम्बन्ध जोड़े रखने पर ‘ न करना’ भी करने के अन्तर्गत आ जाता है । चुप साधन/मौन-साधना/मूक-सत्संग अक्रिय हो जाने पर आधारित है अर्थात् करने और न करने, दोनों को छोड़ना है । इसीलिए इस साधन को ध्यान-योग के अन्तर्गत लिया गया है ।

         योगवासिष्ठ में मौन-साधना के अन्तर्गत मौन के चार भेद बतलाए गए हैं । इन्हें पूर्ण मौन की अवस्था तक पहुंचने के सोपान भी कहे जा सकते हैं । संक्षेप में - वाक् मौन में वाणी का संयम किया जाता है । इंद्रिय मौन इंद्रियों का संयम है और काष्ठ मौन भौतिक शरीर की स्थिरता को व्यक्त करता है । अंतिम मौन है, सुषुप्ति मौन । सुषुप्ति मौन उस अवस्था का नाम है जिसमें जागृत रहते हुए गहरी निद्रा जैसी मानसिक शान्ति का अनुभव होता है । यह अवस्था साधक को आत्मस्वरूप की अनुभूति की ओर ले जाने वाली साधना का महत्वपूर्ण सोपान मानी जाती है ।

           सुषुप्ति मौन की अवस्था घटित हो जाने के पश्चात् व्यक्ति पूर्णतया मौन और निःशब्द हो जाता है ।  फिर न तो संसार का चिंतन रहता है और न ही परमात्मा का । मौन में हुई आत्मस्वरूप की अनुभूति उसे गहरे मौन में उतार देती है । इस अवस्था का वर्णन करने के लिए साधक के पास शब्दों का अभाव हो जाता है । भला वर्णनातीत का वर्णन भी कोई कर सकता है ! मौन साधना/मूक सत्संग का लक्ष्य आत्मस्वरूप की अनुभूति करना ही है, जो साधक को मौन और नि:शब्दता की अवस्था में ले जाता है ।

       संक्षेप में, चुप साधन/मूक सत्संग/मौन साधना वह साधन है, जिसमें बिना बोले, मौन की शक्ति से आत्मचिंतन करते हुए सत्य का अनुभव करने का प्रयास किया जाता है । अन्ततः सब चिंतन मिट जाते हैं और अचिन्त्य का अनुभव हो जाता है ।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

Wednesday, August 12, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -भाग -3

भाग - 2 से आगे

        आइए ! आगे बढ़ते हैं, अनासक्त होने के एक और सूत्र की ओर । एक संत घने जंगल में कुटिया बनाकर अपने शिष्य के साथ साधना किया करते थे । पास में स्थित गाँव वाले अपनी-अपनी श्रद्धानुसार उनके खाने-पीने आदि का प्रबंध कर दिया करते थे । संत बड़े ही आत्म-रत प्रवृति के थे, उन्हें अपने शरीर, दीन-दुनिया आदि की कोई चिंता नहीं रहती थी । परन्तु शिष्य कई बार भोजन, कपड़ों और आजीविका आदि की चिन्ता कर लिया करता था । संत उसे बहुत समझाते, परन्तु शिष्य फिर भी कभी-कभी उनसे मिले ज्ञान को विस्मृत कर देता था ।

         एक बार गाँव का एक व्यक्ति एक दुधारू गाय को लेकर संत की कुटिया में आया । संत को गाय सौंपते हुए संत उसने कहा कि ‘मैं गाँव छोड़कर जा रहा हूँ । न जाने वापिस लौटकर कभी आ पाऊंगा अथवा नहीं । इस गाय को आपके सिवाय किसी अन्य के पास छोड़ना मेरे को उचित नहीं लगा । अतः यह गाय आपको देकर जा रहा हूँ । आप इसकी सुगमता से देखभाल भी कर सकते हैं ।’ संत ने उस व्यक्ति को कुटिया के खुले भाग में गाय को बांधने का कह दिया । व्यक्ति ने संत को प्रणाम किया और दूसरे गाँव जाने के लिए यात्रा पर निकल गया ।

      उसके चले जाने के बाद शिष्य ने अपने गुरु से पूछा - ‘गाय को रखना भी बड़े झंझट का कार्य है । इस गाय का हम क्या करेंगे ? इस के चारा-पानी की व्यवस्था कहाँ से होगी ?’ संत ने निर्विकार भाव से कहा - ‘पुत्र, इस जंगल में परमात्मा ने सभी प्राणियों के भोजन की व्यवस्था की है । जब हमारे खाने-पीने की व्यवस्था भी होती है, तो फिर इस मूक प्राणी की व्यवस्था भी परमात्मा करेगा । अच्छा है, हमें भी इस गाय का दूध पीने को मिलेगा । परमात्मा सब-कुछ अच्छा ही करते हैं ।’ 

         गुरु-शिष्य दोनों मिलकर गाय की सेवा करते और जंगल में चरने के लिए छोड़ देते । सुबह-शाम गाय के दूध- दही का सेवन कर लिया करते । अब शिष्य को गाय बोझ नहीं लग रही थी । वह बड़े मन से गाय को जंगल में जाकर चरा लाता । सुबह शाम उसको दुह लेता, दूध से दही और मक्खन आदि बना लेता और अपने गुरु के साथ सुखपूर्वक उनका सेवन करता ।

         कुछ दिनों बाद वही व्यक्ति जो गाय को आश्रम में छोड़ कर गया था, वापिस लौट आया । उसने आते ही संत से अपनी गाय वापिस मांगी । संत ने निर्विकार भाव से कहा कि ‘जहां बांधकर गए थे, वहीं से खोलकर वापिस ले जाओ ।’ वह व्यक्ति गाय को खोलकर वापिस ले गया । यह सब देख-सुनकर शिष्य बड़ा उद्वेलित हुआ । उस व्यक्ति के जाने के बाद पीछे से शिष्य उसको भला-बुरा कहने लगा । संत ने उसे समझाया कि ‘परमात्मा सब कुछ अच्छा ही करते हैं । अच्छा हुआ वह व्यक्ति गाय को वापिस ले गया । इससे हमें उस गाय को चराने, उसका गोबर उठाने आदि के झंझट से मुक्ति मिली ।’ गुरु की बात सुनकर कुछ समय बाद शिष्य शांत हो गया ।

     इस दृष्टान्त के अनुसार शिष्य गाय से मिलने वाले दूध आदि से जो सुख अनुभव कर रहा था, उसके अब न मिलने पर उसका वह सुख ही दुःख में परिवर्तित हो रहा था । वह सोचता था कि गाय से हमें अब तक दूध आदि मिलता था, वह अब नहीं मिल पायेगा । यह शिष्य की दुग्ध-भोग (रस) के प्रति आसक्ति थी, जो उसे उस व्यक्ति के प्रति उद्वेलित कर रही थी । जबकि दूसरी तरफ संत के मन में गाय के आने और वापिस लौट जाने, दोनों अवस्थाओं के कारण विचार तक पैदा नहीं हुआ था क्योंकि वे अनासक्त थे । उनके इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा था कि सदैव मिलने वाला दूध-दही अब नहीं मिल पायेगा । गाय आई है तो अच्छा है; दूध-दही खाने को मिलेगा, चली गई तो भी अच्छा हुआ, गोबर उठाने से मुक्ति मिली । उनमें ऐसी अनासक्ति आई है, साक्षी-भाव के कारण ।

             शिष्य गाय में सुख देख रहा था अर्थात किसी अन्य से स्वयं को सुख मिलता देख रहा था जबकि संत जानते थे कि वास्तविक सुख तो स्वयं के भीतर है, स्वयं से बाहर तो केवल परमात्मा की लीला है । संसार का दृश्य हमें अपने में लीन करने का प्रयास करता है, अपने साथ लपेट लेना चाहता है । हमें अपनी क्षमता इस प्रकार विकसित करनी होगी कि संसार की कोई बात/वस्तु हमें प्रभावित न कर सके ।  हमें केवल उस लीला का साक्षी बने रहना है ।

               इसके लिए आवश्यक है कि हम संसार को देखें तो अवश्य परन्तु उसमें हस्तक्षेप न करें । देखने को हम रोक नहीं सकते क्योंकि नेत्र नामक ज्ञानेन्द्रिय का यह स्वाभाविक कार्य है । परन्तु संसार में लिप्त होना अथवा न होना हमारी क्षमता के भीतर है । हम चाहें तो संसार में डूब सकते हैं और चाहें तो संसार में रहते हुए उससे निर्लिप्त भी रह सकते हैं । अतः संसार में केवल साक्षी बनकर परमात्मा की लीला को देखते रहना ही उचित है । 

         इस प्रकार इस दृष्टान्त से हमें अनासक्त होने का अंतिम और महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लगता है - ‘साक्षी-भाव’ । संसार में जो कुछ भी घटित हो रहा है, उन सब का केवल साक्षी होना । यहाँ सन्त का साक्षी-भाव है और शिष्य का आसक्ति-भाव । न्यायालय में साक्षी अर्थात गवाह का बड़ा महत्त्व है । जो किसी भी घटना में हस्तक्षेप नहीं करता वही वास्तव में सही साक्षी हो सकता है । जो कोई व्यक्ति एक पक्ष का साथ देता है वह भला साक्षी कैसे हो सकता है ?

       साक्षी होने का अर्थ है, निर्विकार भाव से घटित हो रहे को देखते रहना, प्रत्येक घटना को परमात्मा की लीला मात्र समझना, उसमें स्वयं को नहीं उलझाना । इस शरीर को मन सहित 11 इन्द्रियां परमात्मा ने दी है । पाँच ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग न करना परमात्मा के आशीर्वाद और उनकी आज्ञा का उल्लंघन है परन्तु पाँच कर्मेन्द्रियों और एक मन को नियंत्रण में रखना प्रत्येक व्यक्ति का निजी दायित्व है ।

                    ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग करते हुए कर्मेन्द्रियों और मन को नियंत्रण में रखना ही साक्षी-भाव है । नेत्रों से न देखना, कानों से न सुनना, घ्राण शक्ति को दबा देना, रसनेन्द्रिय से स्वाद को न लेना तथा त्वचा से स्पर्श के अनुभव करने को नकार देना स्पष्ट रूप से परमात्मा की आज्ञा का उल्लंघन है । परमात्मा ने ज्ञानेन्द्रियाँ दी ही ज्ञान प्राप्त करने के लिए और हम इन इन्द्रियों के कार्य से स्वयं को विमुख कर ले तो फिर ज्ञान कैसे प्राप्त करेंगे ? हमें मानव जीवन मिला ही इसीलिए है कि हम आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हो और आत्म-ज्ञान तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब ज्ञानेन्द्रियों का समुचित उपयोग किया जाये ।

         हम लोग प्रायः साक्षी और द्रष्टा होने को समानार्थी समझ लेते हैं । साक्षी होना द्रष्टा होने से पूर्व की अवस्था का नाम है । साक्षी होने पर आप इस भौतिक संसार में बने तो रहते हैं परन्तु इसकी गतिविधियों में रत (Involve) नहीं होते हैं, किसी प्रकार का कोई हस्तक्षेप नहीं करते हैं । साक्षी होने का अर्थ संसार से पलायन कर जाना कतई नहीं है बल्कि संसार में रहते हुए उसकी प्रत्येक गतिविधि को बिना किसी भेद-भाव के देखते रहना है; जैसे कि आप किसी सिनेमा हाल में एक चलचित्र देख रहे होते हो । चलचित्र को हम इसके निर्माण-कर्ता की कृति और कलाकारों का अभिनय समझकर उसमें रत नहीं होते हैं, उसी प्रकार संसार में हो रहे प्रत्येक घटनाक्रम को उसके निर्माण-कर्ता की कृति, उस परम पिता की लीला समझना ही साक्षी होना है । 

                    जब हम चलचित्र के किसी एक पात्र में स्वयं को देखने लगते हैं, तब हम उस चलचित्र में रत हो जाते हैं । ऐसे में हमें चलचित्र में घटित होने वाली प्रत्येक घटना निश्चित ही प्रभावित करेगी । वास्तविकता में वहां कोई सत्य घटना घटित न होकर कलाकार का अभिनय मात्र होता है और कलाकार भी अभिनय, उस चलचित्र के निर्माता/निर्देशक की योजना के अनुसार ही करता है ।

             इस संसार में हम जितनी भी घटनाएँ घटित होती देख रहे हैं, वे सभी परमात्मा की एक निश्चित योजना के अनुसार ही घटित हो रही है और उसी परमपिता की योजना के अनुसार ही हम सब को अभिनय करने के लिए हमारे प्रत्येक जीवन में एक नए पात्र की भूमिका मिलती है । हमें केवल स्वयं को मिली उस भूमिका को ही निभाना होता है और वह भी बड़ी संजीदगी के साथ । हमें इस संसार में घटित होने वाली घटनाएँ तभी प्रभावित कर सकती हैं जब हम उन घटनाओं को लीला न मानकर वास्तविकता समझ बैठते हैं । ऐसा तभी होता है जब हम किसी घटना को एक पक्षीय होकर देखते हैं । इस प्रकार कहा जा सकता है कि एक पक्षीय होने से हम कभी भी साक्षी नहीं हो सकते । साक्षी होने के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक  घटना को निरपेक्ष-भाव से देखा जाय और उसको परमात्मा की लीला मात्र समझा जाय ।

      अष्टावक्र महाराज राजा जनक को कह रहे हैं –

न त्वं विप्रादिको वर्णों नाश्रमी नाक्षगोचरः ।

असंगोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव ।। अष्टावक्र गीता - 1/5 ।।

    अर्थात हे जनक, तुम ब्राह्मण आदि जातियों वाले नहीं हो । न तुम वर्णाश्रम आदि धर्मों वाले हो । न तुम चक्षु आदि इन्द्रियों के विषय हो, किन्तु तुम इन सबके साक्षी और असंग हो एवं तुम आकार से रहित हो और सम्पूर्ण विश्व के साक्षी हो । ऐसा अपने को जानकर सुखी और संसार रुपी ताप से रहित हो जाओ ।

               अष्टावक्र जी का यह कहना कि तुम किसी विशेष जाति अथवा वर्ण के नहीं हो और न ही तुम नेत्र आदि इन्द्रियों के विषय हो, न तुम किसी विशेष आकार के हो; इसका अर्थ है कि जाति, वर्ण, इन्द्रिय-विषय और आकार ये सभी शरीर के साथी है । आत्मा इन सबसे अलग है, असंग है । हमें मिलने वाला शरीर प्रत्येक नए जीवन में बदलता रहता है । आज मेरा यह भौतिक शरीर एक ब्राह्मण का है, अगले जन्म में ब्राह्मण के शरीर की तो बात ही क्या, यह भी पता नहीं है कि मनुष्य का भी शरीर मिल पायेगा अथवा नहीं । अतः स्वयं को शरीर न समझकर आत्मा समझो । आत्मा केवल साक्षी है । आत्मा शरीर, उसकी जाति, उसके वर्ण और आकार आदि को साक्षी भाव से देखती अवश्य है परन्तु शरीर से सदैव असंग बनी रहती है । 

                 जब आप स्वयं को शरीर समझने लगते हो, समस्या तभी पैदा होती है अन्यथा आत्मा को इन सब से क्या प्रयोजन ? आप आत्मा हैं, शरीर नहीं हैं, इस बात को स्वीकार कर लेने से ही व्यक्ति में साक्षी-भाव आ सकता है अन्यथा नहीं । साक्षी-भाव के कारण न तो आप किसी भोग-कर्म के प्रति आसक्त हो सकते हो और न ही उससे विरक्त । जो न आसक्ति है और न ही विरक्ति, बल्कि इन दोनों के मध्य जो है, वही अनासक्ति है ।

         आत्मा साक्षी है अर्थात् आप स्वयं जिसे ‘मैं’ कहते हैं, वह साक्षी है । साक्षी समस्त संसार और उसके कार्यकलापों को निरपेक्ष भाव से देखता है । साक्षी केवल स्वयं को नहीं देखता । जिस दिन वह स्वयं को भी देखने लग जायेगा उसे साक्षी से द्रष्टा होने में तनिक भी देर नहीं लगेगी । आत्मा साक्षी है, परमात्मा दृष्टा है । साक्षी वह कलाकार है, जो अभिनय तो करता है परन्तु अभिनीत पात्र से उसका कोई सरोकार नहीं रहता । दृष्टा रंगमंच का निर्माण करने वाला है । उसने रंगमंच का निर्माण कर दिया और उस पर स्वयं ही विभिन्न रूप धर कलाकार बन कर अभिनय करने हेतु प्रस्तुत हो गया है, एकाकी अभिनय करने के लिए । कहने का अर्थ है कि वह स्वयं ही रंगमंच बन गया है और स्वयं ही कलाकार । इस प्रकार वह स्वयं को ही देख रहा है क्योंकि रंगमंच भी स्वयं का है और अभिनय करने वाला कलाकार भी वह स्वयं ही है । इसी कारण से उसे साक्षी न कहकर दृष्टा कहा जाता है अर्थात स्वयं को देखने वाला । अंततः मनुष्य का शरीर प्राप्त करने का हमारा उद्देश्य भी तो साक्षी से दृष्टा बनना है ।

           द्रष्टा बनने का प्रयास करने से पूर्व साक्षी बनना होगा । इस मनुष्य शरीर के रहते-रहते साक्षी  बन गए तो भी बहुत बड़ी उपलब्धि होगी । परन्तु साक्षी होना अनासक्त होने के एक-एक सूत्र को समझकर अपनाने से ही संभव होगा । जिस दिन आप साक्षी-भाव में आ गए, समझ लो आप में अनासक्ति आ गयी और आप अनासक्त हो गए । 

             एक बार के लिए विरक्त हो जाना सबसे सरल है परन्तु सदैव के लिए विरक्त बने रहना सबसे कठिन है । आसक्ति की जब अति हो जाती है, तब व्यक्ति विरक्ति की तरफ मुड़ जाता है परन्तु यह विरक्ति इसलिए अस्थायी रहती है क्योंकि इन्द्रियों को बल पूर्वक दबाया गया है, सोच-समझ कर नियंत्रित नहीं किया गया है । अति आसक्ति जब दुखदायी हो जाती है, तब व्यक्ति अस्थायी रूप से विरक्ति की तरफ चला जाता है । प्रत्येक भोग प्रारम्भ में अमृत तुल्य प्रतीत होता है परन्तु अंत में दुःख देने वाला ही होता है । यह बात हम अल्प समय के लिए तो समझ लेते हैं परन्तु उसी भोग के पुनः सामने आते ही इस बात को विस्मृत कर बैठते हैं ।

भीतर काम-भोग का भाव जीवित है और ऊपर से दिखावा कर रहे हैं, काम को जीत लेने का । देव ऋषि नारद ने भी एक बार काम को जीत लिया था परन्तु उस काम विजय का उन्हें अभिमान हो गया था । परमात्मा की इच्छा नहीं थी कि उनका भक्त पतन की राह पर अग्रसर हो । उन्होंने देवर्षि को पतन से बचाने के लिए कुछ लीला की । देवर्षि नारद के समक्ष काम-भोग की परिस्थितियाँ बनते ही भीतर दबा काम-भाव पुनः सतह पर आ गया । हम तो साधारण मानव है, हमें कौन रोकेगा ? इस पतन से । हमारे समक्ष एक ही रास्ता है, आसक्ति से बचें और अनासक्त हो जाएँ । इसलिए अनासक्ति के प्रत्येक सूत्र पर चलते हुए बिना किसी अहंकार के साक्षी-भाव को उपलब्ध हो जाएँगे, तभी अनासक्त हो पाएंगे अन्यथा नहीं ।

अब प्रश्न यही उठता है कि अनासक्ति और विरक्ति दोनों में से कौन सी स्थिति अधिक महत्वपूर्ण है अर्थात हमें विरक्त होना चाहिए अथवा अनासक्त ? विरक्ति और अनासक्ति दोनों ही महत्वपूर्ण है और दोनों ही आपके उत्थान में सहायक हैं । अगर मुझे इन दोनों में से किसी एक को चुनने का कहा जाये तो मैं अनासक्ति का चुनाव करूँगा । क्यों ? क्योंकि ……,। आगे बढ़ने से पहले चलिए ! एक कहानी सुनिए । इस कहानी से इस ‘क्यों’ का उत्तर मिल जाएगा ।

          विरक्ति और अनासक्ति दोनों में से अनासक्ति को ही क्यों चुनें ?  स्पष्ट करने के लिए पहले एक कहानी सुनाता हूँ । एक विरक्त तपस्वी ने कई वर्षों तक तप किया, मोक्ष प्राप्ति के लिए । आखिर एक दिन उसका भौतिक शरीर छूटा और जीवात्मा पहुँच गया धर्मराज के यहाँ । धर्मराज ने उसके कर्मों का लेखा-जोखा देखकर उसे स्वर्ग ले जाने का आदेश दिया । जीवात्मा तो मोक्ष चाहता था अतः उसने प्रतिवाद किया । जीवात्मा ने कहा कि ‘मैंने बहुत काल तक तप किया है, मैं तो मोक्ष का अधिकारी हूँ । मुझे स्वर्ग ही क्यों ?’ 

           धर्मराज ने कहा, ‘बिलकुल सत्य है कि आपने कठोर तप किया है परन्तु केवल कठोर तप आपको मोक्ष नहीं दिलवा सकता । इन्द्रियों से ज्ञान प्राप्त करने और कर्म करने के स्थान पर आपने उनको दबाकर, उनका दमन करते हुए तप किया है । आपने स्वयं  के लिए इतना सब कुछ किया है, जबकि यह शरीर परमात्मा ने आपको संसार की सेवा करने के लिए, परमार्थ के लिए दिया है, न कि केवल स्वयं की स्वार्थ-सिद्धि के लिए । अगर आपको मोक्ष ही प्राप्त करना है तो इसके लिए सर्वप्रथम आप स्वर्ग को भोगिये और फिर मनुष्य योनि प्राप्त कर संसार की सेवा कीजिये, तभी आप मोक्ष प्राप्त करने के अधिकारी बन पायेंगे ।’

         अध्यात्म-पथ पर अग्रसर प्रत्येक व्यक्ति की ऐसी ही स्थिति है । संसार की सेवा करने का विचार त्यागकर केवल इन्द्रियों को दबाने में लगे हुए हैं और इन्द्रियां है कि दबती ही नहीं है । ब्रह्मलीन स्वामी श्री रामसुखदासजी महाराज साफ़-साफ़ कहा करते थे ‘संसार की सेवा करो और पिंड छुडाओ ।’ सुनने में बड़ी साधारण सी बात लगती है परन्तु बड़ा गूढ़ सार है उनकी कही इस बात में । 

               इन्द्रियां दबती नहीं है । इनको चाहे जितना दबा लो, हमसे ये दबेगी भी नहीं । ऐसे में विरक्त होना छोड़ कर इन्द्रियों का समुचित उपयोग (कर्म) करते हुए संसार की नि:स्वार्थ भाव से सेवा करने में लग जाओ, अनासक्ति स्वयं ही आ जाएगी । भगवान श्री कृष्ण भी गीता में यही बात कहते हैं कि कर्म न करने से; कर्म करना उचित है (गीता-3/8) । एक मनुष्य के लिए विरक्त होने से अच्छा है कि वह संसार की सेवा करने के लिए अनासक्त होकर कर्म करे ।

           आसक्ति का कैसा प्रभाव होता है, यह आप स्वयं ही देख लीजिये । ‘आसक्ति से अनुरक्ति’ की राह में चलते हुए ‘अनासक्ति’ विषय पर ही आकर अटक गया हूँ । लिखने की मेरी आसक्ति इतनी अधिक प्रबल हो गयी है, जो एक छोटे से लेकिन महत्वपूर्ण विषय को स्पष्ट करने के लिए इतना अधिक विस्तार दे दिया है । इसी प्रकार जब हम किसी भोग को एक बार भोग लेते हैं, तब उसको बार-बार भोगने की इच्छा जाग्रत होकर बढ़ती जाती है । यह बार-बार भोग प्राप्त करने के लिए मनुष्य का कर्म करने को विवश होना ही आसक्ति है । एक बार त्याग पूर्वक भोगना अर्थात मन में बार-बार भोगने की इच्छा नहीं रखना ही हमें आसक्ति से दूर रख सकता है ।

         इस श्रृंखला में आगे बढ़ने  से पहले मैं आपको पुनः उसी दृष्टान्त की ओर लिये चलता हूँ, जिसमें तीन बौद्ध भिक्षुक भिक्षा प्राप्त करने के लिए एक गाँव की ओर जा रहे होते हैं । गाँव में प्रवेश करने से पहले एक नदी को पैदल ही पार करना पड़ता है क्योंकि पार जाने के लिए नदी के इस किनारे पर नाव आदि की कोई व्यवस्था नहीं है । नदी के किनारे पर बैठी सुकुमारी की हिम्मत नहीं हो रही है, बिना किसी सहारे के नदी को पार करने की । वह एक-एक कर प्रत्येक बौद्ध भिक्षु से हाथ पकड़ कर नदी पार करने का आग्रह करती है । 

         पहला भिक्षुक विरक्त है, उस पर उस कन्या की अनुनय-विनय का कोई प्रभाव नहीं पड़ता और वह उसको अनदेखा कर अपने मार्ग पर आगे बढ़ जाता है । दूसरा भिक्षुक उस कन्या की बात को सुनता और समझता तो है परन्तु वह साधना-पथ पर है और मानता है कि एक लड़की का हाथ पकड़ने से उसके भीतर काम-भाव जाग्रत हो सकता है । वह तो इन्द्रियों का दमन करने में लगा हुआ है । वह इस कन्या के आग्रह को साधना-मार्ग से विचलित करने का एक प्रलोभन समझता है और वह उस प्रलोभन के जाल में फंसना नहीं चाहता है । वह उस कन्या की विनती को ठुकरा देता है । तीसरा भिक्षुक उस कन्या की विनती को स्वीकार करता है और उसका हाथ पकड़ कर उसे भी नदी पार करवा देता है । नदी के उस पार जाकर वह उसका हाथ छोड़ अपने रास्ते चल देता है और उस घटना को पुनः याद ही नहीं करता है, परन्तु दूसरा भिक्षुक वह दृश्य भूला नहीं पाता है । उस भिक्षुक को वह दृश्य बार-बार याद आता है और वह उस दृश्य में तीसरे भिक्षुक का पतन देखता है ।

      प्रश्न यह उठता है कि इन तीनों भिक्षुओं में कौन सा भिक्षु सही मार्ग पर है । सतही तौर से देखा जाये तो तीनों भिक्षुक ही सही हैं परन्तु आसक्त भिक्षु अर्थात दूसरे भिक्षु को इन्द्रियों का दमन करने के स्थान पर उनका उचित उपयोग करना चाहिए अथवा प्रथम भिक्षुक की तरह विरक्त हो जाना चाहिए । प्रथम भिक्षु का विरक्त होना उचित है परन्तु यह विरक्ति स्वयं के स्वार्थ के लिए है । स्वयं की स्वार्थ-पूर्ति के लिए किया गया कार्य केवल कर्म-योग से विमुख होना ही प्रदर्शित करता है । कर्म-योग से विमुख होना परमात्मा के द्वारा दिए गए मानव शरीर का अपमान करना है । मनुष्य को यह भौतिक शरीर कर्म करने के लिए ही दिया गया है । साथ ही साथ यह आवश्यक है कि इस शरीर से कर्म भी निस्वार्थ भाव से केवल संसार की सेवा के लिए ही किये जाएँ ।

             इतने विवेचन के बाद हम पाते हैं कि केवल तीसरे और अंतिम भिक्षुक ने ही भगवान बुद्ध का सही मार्ग अपनाया है – ‘मंझिम निकाय’, इन्द्रियों का समुचित उपयोग करते हुए कर्म करना । न आसक्ति और न ही विरक्ति बल्कि अनासक्त होकर कर्म करना । भगवान श्री कृष्ण भी गीता में अर्जुन को यही बात कह रहे हैं -

  यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेSर्जुन ।

   कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ।। गीता-3/7 ।।

अर्थात हे अर्जुन ! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है ।

           हम आसक्ति को पीछे छोड़कर अनासक्ति की ओर आते हुए संक्षेप में अब तक हुए विवेचन से निकले सार को बताते चलते हैं । जितनी अधिक आसक्ति होती है, व्यक्ति व्यथित होकर उतनी ही अधिक विरक्ति की और चला जाता है । परन्तु यही विरक्ति जब व्यक्ति को स्वयं के अकेले पड़ जाने के रूप में खलती है, तब वह पुनः उतनी ही अधिक आसक्ति की ओर चला जाता है । यही मनुष्य के सुख-दुःख का कारण है । एक गृहस्थ जीवन भी इसी प्रकार आसक्ति और विरक्ति के मध्य एक दोलक की भांति दोलन करता रहता है, मध्य में रूक नहीं पाता । मध्य में रुकने के सूत्र जो इस श्रृंखला में मंथन के उपरांत निकल कर सामने आये हैं, वे हैं -  

प्रथम सूत्र - निष्ठा पूर्वक कर्तव्य कर्म को करते रहना ।

दूसरा सूत्र - किसी में भी दोष न देखना ।

तीसरा सूत्र - ‘मैं और मेरा’ की भावना का त्याग ।

चौथा सूत्र - संतुष्टि पूर्ण जीवन ।

पांचवां सूत्र - सहिष्णुता, विरोध को सहन करना ।

छठा सूत्र - कामनाओं पर नियंत्रण रखना ।

सातवाँ सूत्र - किसी से कोई आशा/अपेक्षा न रखना ।

आठवाँ सूत्र -साक्षी-भाव ।

           अनासक्ति के इन आठ सूत्रों से एक ही अभिप्राय है, मन पर नियंत्रण । केवल आठ ही क्यों, अगर हम अधिक गहराई से और सूक्ष्म रूप से विश्लेषण करें तो कुछ और भी सूत्र निकल कर हमारे सामने आ सकते हैं । इनमें से किसी एक सूत्र को आत्म-सात करते हुए आसक्ति से स्वयं को दूर रखा जा सकता है । सभी सूत्र आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए हैं । किसी भी एक सूत्र को पकड़ लेने से समस्त आठों सूत्र सध जाते हैं, ऐसा मेरा मानना है । 

        एक गृहस्थ को न तो आसक्त होना चाहिए और न ही विरक्त । उसके लिए मध्यम मार्ग ही उपयुक्त है । अनासक्ति अर्थात पूर्व जन्म के संस्कारों से मिलने वाले इन्द्रियों के सुख को त्याग-पूर्वक भोगना, उन भोगों के प्रति आसक्त नहीं होना और न ही उन भोगों से डर कर दूर भाग कर विरक्त होना । समस्त इन्द्रियों का समुचित उपयोग करते हुए संसार की सेवा करें और आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हों, वास्तविक अनासक्ति यही है ।

          एक गृहस्थ के लिए विरक्त होने के स्थान पर अनासक्त होना सरल है । अनासक्ति से ही अनुरक्ति की राह निकलती है । अपने बनाए संसार के घेरे को तोड़कर बाहर निकलना ही ‘आसक्ति से अनुरक्ति की ओर’ चलना है ।

           आसक्ति से अनासक्त हो जाना इतना सरल नहीं है परन्तु अनासक्ति से अनुरक्ति तक पहुँचना तुलनात्मक दृष्टि से सुगम है । मनुष्य के जीवन में आ रही समस्त समस्याओं की जड़ में आसक्ति ही है । आसक्ति का त्याग कर या तो विरक्ति में जाया जा सकता है अथवा फिर अनासक्त होकर मन की चंचलता को नियंत्रित कर लिया जाता है । मन की चंचलता ही प्रायः आसक्ति को विरक्ति में ले जाती है परंतु ऐसी विरक्ति आसक्ति का ही दूसरा रूप होती है । मन की चंचलता के कारण ऐसी विरक्ति भी आसक्ति के त्याग का प्रदर्शन मात्र बन कर रह जाती है । ऐसी विरक्ति कब आसक्ति में पुनः परिवर्तित हो जाती है, पता ही नहीं चलता । 

              मन की चंचलता ही मनुष्य को विपरीत परिस्थिति में अस्थाई रूप से विरक्त तो कर देती है परन्तु थोड़ी सी अनुकूलता मिलते ही व्यक्ति विरक्ति का चोला उतारकर पुनः संसार में आसक्त हो जाता है । इसलिए कहा जा सकता है कि ऐसी विरक्ति आत्मिक स्तर पर नहीं हुई है बल्कि यह केवल मन की उठापटक मात्र ही है । संसार में रहते हुए (जहां पर आसक्त होने के अनगिनत साधन हैं) विरक्ति में जाना लगभग असम्भव है । यदि संसार के एक स्थान को छोड़कर अन्यत्र जैसे वन आदि में चले भी जाएंगे तो भी सांसारिक आसक्तियां पीछा छोड़ने वाली नहीं है । संसार बाहर से छोड़ने पर विरक्ति नहीं आती बल्कि स्थायी विरक्ति के लिए तो संसार को भीतर से त्यागना पड़ता है । फिर संसार में रहते हुए भी कमल के पत्ते के जल में तैरते हुए भी जल से निर्लिप्त बने रहने की तरह हम भी संसार में रहते हुए भी उसमें लिप्त नहीं होंगे ।

             अनासक्ति भी ऐसी ही अवस्था का नाम है, जिसमें मनुष्य संसार में रहते हुए भी निर्लिप्त रहता है । अनासक्त जीवन आपको संसार से मुक्त भले ही करदे परन्तु परमात्मा की तरफ़ जाना है तो वह इससे भी आगे की यात्रा है । हम अनासक्त होकर सांसारिक आसक्ति को बहुत पीछे छोड़ आए हैं । अब हमें अपने भीतर परमात्मा के प्रति आसक्ति पैदा करनी होगी । परमात्मा के प्रति आसक्ति को ही अनुरक्ति कहा जाता है । आसक्ति से अनुरक्ति की ओर जाने के लिए अनासक्ति तो मध्य का एक पड़ाव मात्र है । इसलिए अनासक्त होकर ही सन्तुष्ट नहीं होना है बल्कि पूर्व की सांसारिक आसक्ति को भविष्य की अनुरक्ति में बदलना होगा । प्रश्न है कि अनासक्ति अनुरक्ति में कैसे परिवर्तित होगी ?

               मन की चंचलता पर नियंत्रण होते ही व्यक्ति आसक्त से अनासक्त हो जाता है । मन की चंचलता नियंत्रित होती है, बुद्धि में उपजे ज्ञान से । इस ज्ञान (विवेक) का सदुपयोग कर सांसारिक आसक्ति की दिशा बदल कर उसे परमात्मा की ओर मोड़ा जा सकता है । इसके लिए सांसारिक आसक्ति का अत्यंत अभाव होना आवश्यक है । समस्या यही है कि अनासक्त जब परमात्मा के प्रति आसक्त होने का प्रयास करता है तब न जाने कब वह पुनः संसार में आसक्त हो जाता है, इसका पता ही नहीं चलता । इसका कारण है, मन का बुद्धि पर पुनः प्रभावी हो जाना । इसलिए अनुरक्ति के लिए सांसारिक आसक्ति का पूर्ण रूप से मिट जाना आवश्यक है ।

        स्वामी शरणानंदजी महाराज कहते हैं - “आसक्ति का अत्यन्त अभाव हुए बिना अनुरक्ति के साम्राज्य में प्रवेश ही नहीं होता ।” आसक्ति का अत्यन्त अभाव होगा, विवेक का सदुपयोग करने से । हमें विचार करना होगा कि हमने संसार में आसक्त होकर दुःख के अतिरिक्त पाया ही क्या है ? विचार से ही विवेक पैदा होता है और विवेक से ही अनासक्त हुआ जा सकता है अन्यथा तो अज्ञान के अंधकार तले अनासक्ति की राह मिलनी असंभव है । 

                स्वामी शरणानंदजी महाराज जिस अनुरक्ति की बात करते हैं स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज ने उसको परमात्मा से ‘अपनापन’ कहा है । हम धन-सम्पति, पत्नी, पुत्र-पुत्री को ‘अपना’ कहते हैं, यह हमारा सांसारिक मोह है, आसक्ति है । जब यही आसक्ति परमात्मा के प्रति हो जाती है, तब परमात्मा ही अपने लगने लगते हैं । यही परमात्मा के प्रति ‘अपनापन’ रखना है । इस प्रकार हमें केवल आसक्ति की दिशा बदलनी है । आसक्ति हट जाने का नाम अनासक्ति है और उसकी दिशा परिवर्तन का नाम अनुरक्ति अथवा परमात्मा से अपनापन है । इस प्रकार स्पष्ट है कि संसार के प्रति आसक्ति का अत्यन्त अभाव ही हमें परमात्मा के प्रति अनुरक्त होने की ओर ले जाता है ।

           प्रायः प्रश्न उठता है कि परमात्मा से अपनापन कैसे हो ? जब तक हम स्वनिर्मित संसार को अपना कहते रहेंगे तब तक परमात्मा से अपनापन नहीं हो सकता । दो नावों में पैर रखकर नदी के पार नहीं हुआ जा सकता । सहारा/आश्रय तो एक का ही लेना पड़ेगा, चाहे संसार का लें अथवा परमात्मा का । सीधा परमात्मा का आश्रय ले लें तो सर्वोत्तम है, जोकि भक्ति-मार्ग है परन्तु एक गृहस्थ के लिए सीधा परमात्मा का आश्रय लेना जरा असम्भव सा है । उसके लिए तो संसार में रहते हुए, अपना कर्तव्य निभाते हुए अनासक्त होना ही सम्भव है । इसलिए एक गृहस्थ के लिए अनासक्ति तक पहुंचने के लिए ज्ञान-कर्म मार्ग ही उचित मार्ग है । अनासक्ति से फिर अनुरक्ति की राह निकलती है और परमात्मा में ‘अपनापन’ होना सम्भव हो जाता है ।

          आसक्त व्यक्ति को जब तत्वज्ञान हो जाता है तब वह संसार से विमुख होकर विरक्त हो जाता है । इसी प्रकार अनासक्त होकर संसार में रहने वाला व्यक्ति भक्ति की राह पकड़कर परमात्मा के प्रति अनुरक्त हो जाता है । सबसे बड़ी समस्या तो संसार से आसक्ति समाप्त करने की है । भक्ति-मार्ग से इस आसक्ति की दिशा परिवर्तित की जा सकती है और परमात्मा से अपनापन होना सम्भव हो जाता है । 

           लंका में रहते हुए भी विभीषण भगवान श्रीराम की भक्ति में लीन थे । जब भाई से ममत्व समाप्त हुआ तब वे भगवान के शरणागत हुए । मानस में गोस्वामीजी ने इसका वर्णन बड़े ही सुंदर ढंग से किया है । भगवान से अपनापन करने के लिए क्या किया जाना चाहिए, इसको स्वयं भगवान ने स्पष्ट किया है ।

                भगवान श्रीराम मानस में कहते हैं -

 जननी जनक बंधु सुत दारा । तनु धनु भवन सुहृद परिवारा ।।

  सबके ममता ताग बटोरी । मम पद मनहि बाँध बरि डोरी ।।

  समदर्शी इच्छा कछु नाहीं । हरष सोक भय नहिं मन माहीं ।।

 अस सज्जन मम उर बस कैसें । लोभी हृदयं बसइ धनु जैसें ।।

                        -सुन्दरकाण्ड - 48/4-7

          माता, पिता, भाई, पुत्र, पत्नी, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार - इन सबके ममत्व रूपी तागों को बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बनाकर उसके द्वारा जो अपने मन को मेरे चरणों में बांध देता है अर्थात् सारे सांसारिक सम्बंधों का केंद्र मुझे बना लेता है, जो समदर्शी है, जिसकी कोई इच्छा नहीं है और जिसके मन में हर्ष, शोक और भय नहीं है । ऐसा सज्जन मेरे हृदय में कैसे बसता है ? जैसे लोभी के हृदय में धन बसता है ।

         ‘चमड़ी जाय पर दमड़ी न जाय’ एक प्रसिद्ध कहावत है । धन को अपना मानने वाले लोभी व्यक्ति की यही स्थिति है । जैसे लोभी के मन में धन बसता है वैसे ही परमात्मा को अपना कहने वाला परमात्मा में बसता है । तुलसी मानस के समापन में कहते है - ‘……लोभी प्रिय जिमि दाम ।…’ जैसे लोभी व्यक्ति को धन प्रिय लगता है, वैसे ही हे राम ! आप मुझे प्रिय लगें । 

            भगवान कहते है कि संसार में जिनको आप अपना कहते हैं, उन सबको अपने मन सहित मेरे चरणों में डाल दो । हम जब अपने केंद्र में परमात्मा को रखेंगे तब सब कुछ परमात्मा का ही होगा । फिर एक परमात्मा ही अपने होंगे, दूसरा कोई अपना नहीं होगा । यही परमात्मा से अपनापन है ।

           स्वामीजी ‘परमात्मा से अपनापन’ को स्पष्ट करते हुए प्रत्येक बार मीरा बाई का उदाहरण देते हैं । मीरा बाई कहती है - ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’ । यहाँ तो दूसरों को भी अपना माने बैठे हैं, फिर मीरा बाई की स्थिति में कैसे पहुंचेंगे ? हम तो इस  संसार के बने बैठे हैं । हम यह नहीं जानते कि संसार में हो रहे परिवर्तन को देखने वाला स्वयं अपरिवर्तनीय है । न बदलने वाला ही बदलाव का अनुभव कर सकता है, ऐसे में हम संसार के कैसे हुए ? हम शरीर के बदलने का अनुभव कर रहे हैं, इसका अर्थ है कि हम शरीर नहीं हैं । फिर इस शरीर और शरीर से संबंधित व्यक्ति, विषयों और पदार्थों को अपना क्यों कहते हैं ? इस बात का ज्ञान होते ही परिवर्तित हो रहे संसार से तो आसक्ति की समाप्ति और अविनाशी परमात्मा में अनुरक्ति हो जाएगी ।

            केवल एक परमात्मा ही अपरिवर्तनशील है इसलिए हम परमात्मा से एक हैं और प्रतिपल बदलने वाले संसार से भिन्न हैं । जिस प्रकार हम संसार के मोह में फँसकर आसक्त हुए बैठे थे, इस बात का ज्ञान होते ही संसार से अनासक्त होकर परमात्मा से प्रेम करने लगेंगे । परमात्मा से प्रेम करना, उन्हें अपना मानना और उनसे अपनापन होना ही अनुरक्ति है ।

           आसक्ति होती है, ‘नहीं’ को ‘है’ मान लेने के कारण । इसका अर्थ यह नहीं है कि ‘नहीं’ अलग है और ‘है’ अलग है । ‘नहीं’ भी ‘है’ है परन्तु जिस रूप में हम ‘नहीं’ को ‘है’ मान बैठे हैं, उस रूप में वह ‘है’ नहीं है । हम संसार के बदलाव और चमक दमक को ‘है’ मान बैठे हैं, वास्तव में वह चमक दमक संसार की नहीं है, इसीलिए इसको ‘नहीं’ कहा गया है । इस ‘नहीं’ में जो चमक दमक है, वह ‘है’ के कारण है । इस प्रकार यदि ‘नहीं’ की चमक दमक में आसक्त न होकर उसमें ‘है’ को देखेंगे तो ‘नहीं’ भी ‘है’ हो जाएगा ।

          शरीर और जगत् ‘नहीं’ है क्योंकि जैसे आज हैं, वैसे कल नहीं रहेंगे । परमात्मा और हम जैसे आज हैं वैसे ही कल रहेंगे इसलिए ये ‘है’ हैं । शरीर में इंद्रियाँ है । सभी इंद्रियां भी शरीर की तरह ‘नहीं’ के अन्तर्गत ही है ।‘नहीं’ से नहीं ही दिखलाई देगा परन्तु उस दिखलाई पड़ने वाले को ‘है’ मान लेने के कारण ही हम उस दृश्य में आसक्त हो जाते हैं । दृश्य जो देखा गया है वह सत्य नहीं है, यहाँ तक कि जब दृश्य पर दृष्टि पड़ी और उस दृश्य को मस्तिष्क द्वारा देखा गया, तब तक वह दृश्य वैसा नहीं रहा, जब उस पर दृष्टि पड़ी थी । ऐसे में उसे ‘है’ कैसे कहा जा सकता है ?

           दूसरी बात, जो कुछ हम देखना चाहते हैं अथवा सुनना, स्पर्श करना, सूंघना या स्वाद लेना चाहते हैं, हमारी आसक्ति वैसा ही अनुभव करा देती है । इसका अर्थ है कि हम हमारी आसक्ति से संचालित हो रहे हैं, जबकि हम जानते हैं कि अपनी आसक्ति के कारण जिसके पीछे पड़े हैं वह सब भी ‘नहीं’ होता जा रहा है । फिर ऐसे ‘नहीं’ के साथ रहकर क्या हम शान्ति को प्राप्त कर सकते हैं ? इस प्रश्न का उत्तर स्वयं को पहचान लेने से अर्थात अनुभूति होने से पूर्व किसी को नहीं मिलने वाला । 

            हम सब ‘नहीं’ से ही प्रेम करने लगे हैं । वास्तव में यह प्रेम न होकर हमारे स्वार्थ के कारण उनमें हमारी आसक्ति है । आसक्ति को प्रेम का नाम नहीं दिया जा सकता । प्रेम विनाशी और परिवर्तनशील के साथ हो ही नहीं सकता । उनके साथ किया गया प्रेम आज है, कल नहीं रहेगा । हमने संसार, उसके व्यक्तियों, वस्तुओं में मोह/आसक्ति को प्रेम का नाम दे दिया है, यह ग़लत है । सांसारिक मोह के कारण ही हम दूसरों को ‘अपना’ कहने लगे हैं ।  वास्तव में वे अपने न तो पूर्व में कभी थे, न आज हैं और न भविष्य में कभी अपने होंगे । 

           आसक्ति/राग जिसको हमने ‘प्रेम’ नाम दे रखा है, वास्तव में वह अपना स्वार्थ है । जिस समय स्वार्थपूर्ति में बाधा आएगी, यही प्रेम (राग) द्वेष में परिवर्तित हो जाएगा । राग का विलोम द्वेष है क्योंकि दोनों में ही दो का अस्तित्व बना रहता है । प्रेम का कोई विलोम शब्द नहीं है क्योंकि प्रेम में किसी दूसरे का स्थान ही नहीं है । 

       ‘प्रेम गली अति सांकरी, जाँ में दो न समाही ।

        जब ‘मैं’ था तब हरि नहीं, अब हरि है ‘मैं’ नाहीं ।।’

         प्रेम तो अविनाशी है और अविनाशी से किया गया प्रेम ही अनुरक्ति है । इसलिए संसार और शरीर सम्बंधियों को ‘मैं, मेरा और मेरे लिए’ मानना छोड़कर अनासक्त हो जाएं और फिर अपनी ऊर्जा को परमात्मा से अपनापन करने में समर्पित कर दें । ऊर्जा भी परमात्मा की तरह अनादि और अविनाशी है । आसक्ति को छोड़ अनासक्त होकर जो ऊर्जा बचाई है, उसको अनुरक्ति में समर्पित कर दें, जीवन में ऐसा करना ही सर्वोत्तम है ।

             एक-दो पाठकों द्वारा ‘अनुरक्ति’ का  उदाहरण देने का अनुरोध किया गया है । मुझे इस बात का सदैव गर्व रहता है कि मैं उस राज्य से हूँ जहां परमात्मा में अनुरक्त भक्तों का इतिहास रहा है । सबसे बड़ा उदाहरण तो मीरां बाई का है । मेड़ता में जन्म लेकर पली-बढ़ी मीरां का विवाह मेवाड़ के राजकुमार भोजराज के साथ कर दिया गया था । फिर भी वे सदैव कहती रही कि ‘ जिनके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई’ । संसार से अनासक्त मीरां सदैव श्रीकृष्ण भक्ति में लीन रहती थी । परमात्मा के प्रति ऐसी अनुरक्ति का उदाहरण आज इक्कीसवीं शताब्दी में मिलना मुश्किल है ।

          मीरां बाई के अलावा मकराना की बालिका करमा बाई भी परमात्मा के प्रति अनुरक्त थी तभी तो जगन्नाथ को आज भी उसके खीचड़े का भोग रुचता है । पिता द्वारा स्वयं से पूर्व श्रीकृष्ण को ज़ीमाने का आदेश ही उनको परमात्मा के प्रति अनुरक्त कर गया । करमा ने भोजन तब तक नहीं किया जब तक भगवान ने साक्षात् प्रकट होकर उसका बनाया खीचड़ा नहीं खा लिया । ऐसी अबोध अनुरक्ति भी परमात्मा के दर्शन करा सकती है ।

         मांझवास (नागौर) की फूली बाई, राम-भक्ति में इतनी तल्लीन रहती थी कि उसकी थेपड़ियाँ (गोबर के कण्डे) दूसरी स्त्रियाँ चुरा ले जाती थी । जब वह गांव प्रधान से इस चोरी की शिकायत करती तो वे फूली से उसकी थेपड़ियों की पहचान बताने को कहते । तब वे एक ही बात कहती कि मेरी जिस भी थेपड़ी को हाथ लगाओगे, उससे राम-राम की धुन निकलेगी । फूली बाई की भगवान के प्रति अनुरक्ति की कल्पना कीजिए कि केवल उसके रोम-रोम  में ही राम-धुन नहीं बसी थी बल्कि जिसको भी उसने छुआ वह भी राममय हो गया ।

           आसक्ति के पीछे संसार और शरीर से मिलने वाला भोग-सुख है, जबकि परमात्मा से अनुराग होना उनसे प्रेम करना है । आसक्ति राग पैदा करती है जबकि संसार के प्रति वीतरागता से परमात्मा में अनुराग हो जाता है । राग आसक्ति है और अनुराग अनुरक्ति है । 

           परमात्मा में अनुकरणीय अनुरक्ति देखना हो तो सबसे बेहतरीन उदाहरण गोपियों का है । गोपियां घर का काम भी करती थी तो भी ध्यान श्रीकृष्ण में लगा रहता था । भागवतजी में एक अध्याय  गोपिका- गीत का है, जिसमें गोपियां श्रीकृष्ण को कहती हैं कि हम तुम्हारी बिना मोल की दासियां हैं । बिना मोल की दासियां कहने का अर्थ है कि वे कृष्ण से निश्छल और नि:स्वार्थ प्रेम करती थी । इतना प्रेम कि उनको अपने पति, घर के काम-काज, यहाँ तक कि कपड़े-लतों तक की भी सुध नहीं रहती थी । उनका परमात्मा के प्रति कोई शारीरिक और सांसारिक प्रेम नहीं था, उनका प्रेम तो अलौकिक था, दिव्य था । वे रात-दिन प्रेम-रस में भीगी रहती थी । वे स्वयं तक को भूल जाती थी, बस केवल एक कृष्ण …..। तभी कबीर ने प्रेम को इस प्रकार परिभाषित किया है - 

     प्रेम प्रेम सब कोई कहे, प्रेम न जाने कोय ।

     जा मारग साहिब मिले, प्रेम कहावै सोय ।।

     प्रेम की परिपूर्णता सेवा और त्याग में ही है । इन दो (सेवा और त्याग) गुणों के कारण ही गोपियां परमात्मा के प्रति अनुरक्त रही । सेवा और त्याग स्त्रियों में विशेष रूप से होते हैं क्योंकि उनका चित्त स्त्रैण होता है । उनमें श्रद्धा और विश्वास जन्मजात होता है, वे शीघ्र ही किसी पर विश्वास कर लेती हैं जिसके कारण कई दुष्ट व्यक्ति उनका नाजायज़ फ़ायदा उठाते हैं । 

        आज की बालिकाओं में स्त्रैण चित्त का निरन्तर अभाव होता जा रहा है, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण दिल्ली के जन्तर-मंतर पर परिलक्षित हुआ उनका व्यवहार है । इतना बुरा प्रदर्शन तो किसी गए गुजरे पुरुष का भी नहीं देखा गया है । ऐसे में शायद ही भविष्य में कोई परमात्मा में अनुरक्त मीरां देखने को मिले ।

भक्ति में तीन चीजें आवश्यक हैं - श्रद्धा और विश्वास, स्त्रैण चित्त तथा एकांत । स्त्रियों में प्रथम दो स्वाभाविक रूप से होते हैं परंतु उनका दुरुपयोग करने से वे सांसारिक सुखों में डूब जाती हैं । सही उपयोग करने से प्रथम दो को उपलब्ध हुआ साधक अनुरक्त हो जाता है, फिर एकांत उसे काट खाने को नहीं दौड़ता है क्योंकि एकांत में भी भगवान उसके साथ रहते हैं ।  इसलिए मीरा बाई भूतहा महल में भी भयग्रस्त नहीं हुई ।

         भक्ति में तीन चीजें आवश्यक हैं - श्रद्धा-विश्वास, स्त्रैण चित्त और एकांत । स्त्रियों में प्रथम दो स्वाभाविक रूप से होते हैं । महिलाएं स्त्रैण-चित्त होती हैं । उनमें संसार के प्रति अत्यधिक आसक्ति होती है । जब इस आसक्ति की दिशा पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाती है, तब वह परमात्मा में भी अत्यधिक अनुरक्त हो जाती है । स्त्रैण चित्त का दुरुपयोग करने से वे सांसारिक सुखों में डूब जाती हैं । सही उपयोग करने से प्रथम दो को उपलब्ध हुआ प्रत्येक साधक अनुरक्त हो जाता है, फिर एकांत उसे काट खाने को नहीं दौड़ता है । 

         जिस पुरुष भक्त का चित्त भी स्त्रैण हो जाता है, तब वह भी परमात्मा के प्रति गहरा अनुरक्त हो जाता है । वृंदावन में भक्त राधा का रूप धारण किए रखते हैं । बाह्य रूप बदलने से श्रीकृष्ण नहीं मिलने वाले, भीतर से राधा (स्त्रैन चित्त) होना आवश्यक है। चलिए ! चलते-चलते अनुरक्त संत के भी उदाहरण पर दृष्टि डाल लेते हैं । 

          रसखान की अनुरक्ति देखिए कि वे उसी भूमि पर फिर से जन्म लेना चाहते हैं जिस पर अवतरित होकर परमात्मा ने श्रीकृष्ण के रूप में बाल-लीला की । सूरदासजी को भला कौन भूल सकता है । हाथ पकड़ कर भगवान ने उन्हें वृंदावन तक पहुंचा दिया और फिर अन्तर्धान हो गए । तब अनुरक्त सूरदासजी के मुंह से बोल फूट पड़े -

         हाथ छुड़ाए जात हो, निबल जान कर मोय ।

         हिरदै से जब जाओगे, तब जानूँगो तोय ।।

      क्या हम अभी भी अनुरक्ति को समझ नहीं पाए हैं ? अनुरक्ति को समझने के लिए सबसे पहले अपने भीतर श्रद्धा और विश्वास पैदा करें । श्रद्धा समर्पण कराती है और विश्वास अनन्य भक्ति । ऐसे में फिर अनुरक्ति से बंधे परमात्मा कहां जाएंगे, कैसे नहीं आएंगे ? इसलिए सदैव परमात्मा के प्रति श्रद्धा और विश्वास को दृढ़ रखें ।

सार - संक्षेप

        संसार में जीवों की असंख्य प्रजातियाँ है, यहाँ तक कि एक प्रजाति में भी आपको भिन्नता दृष्टिगोचर होगी । प्राणियों की सबसे बुद्धिमान प्रजाति का नाम है - मनुष्य । सभी जीवों में एक मात्र मनुष्य नाम का जीव ही ऐसा है जिसको कर्म करने की स्वतंत्रता है और इस स्वतंत्रता का उपयोग अपनी बुद्धि से करते हुए सर्वोच्च अवस्था तक पहुंच सकता है । वह सर्वोच्च अवस्था है - जहां से यात्रा प्रारम्भ की थी, सब कुछ पीछे छोड़कर वापस वहां तक पहुंच जाए । पर मनुष्य इससे उल्टा चलता है, सिर पर कर्मों की गठरी लादे एक योनि से दूसरी योनि में भटकता हुआ नए नए शरीर लेता जा रहा है परन्तु इनसे मुक्त होने की राह नहीं पकड़ पा रहा है ।

            परमात्मा ने मनुष्य को तीन विशेषताएं प्रदान की है - क्रिया, बोध और भाव । क्रिया से अर्थ है, कर्म स्वातंत्र्य । क्रिया को अपने स्वार्थपूर्ति में उपयोग कर वह उनमें आसक्त हो जाता है । यही उसके विभिन्न शरीरों में जन्मने-मरने का कारण है । इस कर्म-आसक्ति को वह बोध के माध्यम से अनासक्ति अथवा विरक्ति में परिवर्तित किया जा सकता है । एक गृहस्थ के लिए अनासक्त होना सरल है, जिससे वह बोध अर्थात् विवेक का उपयोग कर बिना लिप्त हुए अपने कर्तव्य कर्म कर सकता है ।

        अनासक्त होकर भी संतुष्ट नहीं होना है । क्रिया और बोध के साथ मिली भाव-शक्ति का उपयोग करते हुए परमात्मा से प्रेम करना है, उनसे अपनापन करना है । आसक्ति से राग-द्वेष पैदा होते हैं जबकि भाव से प्रेम । यह प्रेम ही संसार को अपना मानना छुड़ा देता है और परमात्मा से अपनापन करा देता है । इस प्रकार क्रिया, बोध और भाव की शक्तियों का सदुपयोग कर मनुष्य आसक्ति से अनुरक्ति की ओर आगे बढ़ सकता है । सब कुछ मुख्य रूप से हमारे बोध (विवेक) पर निर्भर करता है ।

        इसी के साथ ही ‘आसक्ति से अनुरक्ति की ओर’ की यात्रा का समापन होता है । श्रृंखला में अन्त तक साथ बने रहने के लिए आप सभी का हृदय से आभार ।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल