Tuesday, September 8, 2026

सम्भवामि युगे युगे -6

 सम्भवामि युगे युगे -6

               परमात्मा यदि माया के माध्यम से अपना खेल नहीं खेले तो उनको अवतरित होना ही नहीं पड़े । हां, सत्य है क्योंकि माया ही मनुष्य को दिग्भ्रमित कर उससे उल्टे सीधे कर्म करवा देती है, जिनके परिणाम उसे भोगने पड़ते हैं । ये कर्म ही धर्म-अधर्म को बढ़ाते घटाते रहते हैं । यदि धरा पर अधर्म बढ़ रहा है तो क्या वह कभी परमात्मा की दृष्टि से छिपा रह सकता है ? उनकी दृष्टि से कुछ भी छिपा हुआ नहीं है । वे चाहते तो बिना अवतरित हुए भी अधर्म को नष्ट कर सकते हैं परंतु नहीं करते क्योंकि उन्हीं का बनाया एक नियम यह भी है कि जब-जब धर्म निष्प्रभावी होगा और अधर्म का प्रभाव बढ़ेगा, प्रकृति को अधीन करके मैं स्वयं अवतरित होऊंगा । 

         उनकी दृष्टि जब अधर्म के बढ़ते प्रभाव पर पड़ती है तब माया के माध्यम से ऐसा खेल रचते हैं कि उनके अवतरित होने की राह आसान हो जाती है । जय-विजय, उन्हीं के दो पार्षद, उन्हीं की आज्ञा से, उन्हीं के निवास की पहरेदारी कर रहे थे । माया के माध्यम से उन्होंने ऐसा खेल रचा कि न जाने कहां से सनाकादिक ऋषि हरिः शरणम्, हरिः शरणम् जपते हुए वहां आ पहुँचते हैं और श्रीहरि के दर्शन को उत्सुक हो जाते हैं । अपने कर्तव्य-पथ पर डटे हुए जय-विजय उनको प्रवेश करने से रोक देते हैं । 

            सनकादिक ऋषि, जिनको बिना किसी रोक-टोक के सर्वत्र आने-जाने की अनुमति मिली हुई है, वे आज श्रीहरिः के यहां प्रवेश से रोके जाने पर जय-विजय को श्राप दे देते हैं - “जाओ पृथ्वी पर तीन बार राक्षस के रूप में जन्म लो, तीन जन्मों बाद श्रीहरि: ही तुम्हें मुक्त करेंगे ।” इस प्रकार अपने तीन अवतार लेने के लिए आधारशिला रख दी भगवान ने । राक्षस होने का अर्थ ही है, अधर्म में रत होना । अब तीन बार राक्षस रूप में जन्म लेकर जय-विजय पृथ्वी पर उत्पात करेंगे और धर्म को दबायेंगे ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।। 

Monday, September 7, 2026

सम्भवामि युगे युगे -5

 सम्भवामि युगे युगे -5

           तो बात चल रही थी, माया के खेल की । माया और पुरुष, दोनों के अलग-अलग क्षेत्र, कहीं कोई एक दूसरे से प्रभावित होने अथवा प्रभावित करने का कारण नहीं । माया प्रभावित नहीं करती बल्कि पुरुष ही उससे प्रभावित होता है । कोई कारण न होते हुए भी पुरुष कैसे प्रभावित हो जाता है ? माया में तीन गुण रहते हैं - सत्व, रजस और तमस । इन तीन गुणों के कारण ही माया में विभिन्न क्रियाएं सम्पन्न होती है । ये क्रियाएं माया में एक प्रकार का आकर्षण उत्पन्न करती हैं । क्रियाओं की चकाचौंध से प्रकृतिस्थ पुरुष प्रभावित हो जाता है ।

           माया से प्रभावित होकर पुरुष उसे अपने अनुसार उपयोग में लाने का प्रयास करता है । परमात्मा की माया सरलता से पुरुष के वश में आती नहीं है । जिसका परिणाम होता है कि पुरुष माया पर अपना अधिकार जमाने के लिए माया के गुणों का ही सहारा लेता है । परन्तु गुण माया के अन्तर्गत होने के कारण वे माया की आज्ञानुसार चलते हुए पुरुष को नचाना प्रारम्भ कर देते हैं । पुरुष को यह भ्रम होता है कि वह माया को नचा रहा है, जबकि वास्तव में पुरुष ही माया के परवश हुआ नाचता है ।

          जो व्यक्ति अपने जीवन में स्वयं कर्ता बनता है और परिणाम मिलने पर ईश्वर को दोष देता है तो वह सबसे बड़ा झूठा है । माया और मायापति कुछ नहीं करते परन्तु माया में गुणों के कारण हो रही क्रियाओं को देखकर आप उनमें उलझ जाते हैं । क्रियाओं में उलझ जाने से अर्थ है, क्रियाओं को अपने स्वार्थ अनुसार चलाने का प्रयास करना । सभी क्रियाएं पूर्वनिर्धारित होती हैं, वे उसी अनुसार ही होंगी । केवल आप ही भ्रम पाल लेते हैं कि ये क्रियाएं मैं अपनी इच्छानुसार कर रहा हूँ । यही कर्ताभाव है । कर्ता होने पर भोक्ता भी होना पड़ेगा । प्रश्न उठता है कि परमात्मा बिना उलझे इस खेल को माया से कैसे खेल लेते हैं, जबकि हम इसमें उलझ जाते हैं ?  

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, September 6, 2026

सम्भवामि युगे युगे -4

 सम्भवामि युगे युगे -4

         धर्म को दबाकर अधर्म बढ़ेगा तभी तो परमात्मा अवतार लेंगे । ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब चारों ओर धर्म का ही बोलबाला है तो फिर अधर्म बढ़ कैसे जाता है ? अधर्म का बढ़ना भी परमात्मा का माया के माध्यम से खेले जाने वाला एक खेल है । भगवान ने प्रकृति बनाई, उसके नियम बनाए और साथ ही नियम तोड़ने पर मिलने वाले परिणाम भी बना दिए । इनमें एक नियम यह भी है कि जब-जब धर्म की हानि होगी और धर्म निष्प्रभावी होगा, तब-तब परमात्मा धर्म की पुनर्स्थापना के लिए अवतरित होंगे, चाहे युग कोई सा भी हो । 

          हम सोचते हैं कि सतयुग बहुत महान युग रहा होगा, जबकि सत्यता यह है कि भगवान को सबसे अधिक अवतार भी सतयुग में ही लेने पड़े । अभी कलियुग चल रहा है और एक बार परमात्मा को फिर अवतार (कल्कि) लेना है । चारों ओर अधर्म बढ़ता दिख रहा है, धर्म का नाम केवल शास्त्रों में रह गया है । न जाने उनके अवतरित होने की कब तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी ? सतयुग में धर्म और अधर्म के मध्य संघर्ष प्रायः कम देखने को मिलता था, जबकि कलियुग में संघर्ष तुलनात्मक रूप से अधिक हो रहा है । जहां संघर्ष न के बराबर होता है अथवा बिलकुल नहीं होता, वहां परमात्मा को दौड़ कर शीघ्र आना पड़ता है । ऋषि-मुनि अपनी साधना में लीन रहते थे, बेचारे लड़ नहीं पाते थे तो भगवान को अवतार लेना पड़ता था ।

            हिरण्याक्ष पृथ्वी को जल से बाहर निकालने में बाधा बन कर खड़ा था, किस मनुष्य ने उसके साथ संघर्ष किया ? एक ने भी नहीं, आना पड़ा परमात्मा को, शूकर का शरीर लेकर । हिरण्यकशिपु से संघर्ष केवल एक बालक ने किया वह भी केवल वाणी के स्तर पर । कितने प्रयास किए गए थे प्रह्लाद को मारने के । अंततः नरसिंह रूप लेकर स्वयं परमात्मा को आना पड़ा । प्रह्लाद भी असुर कुल में पैदा हुआ था, परंतु था बड़ा ईश्वर-भक्त । इनके ही कुल में (पौत्र) पैदा हुए थे राजा बलि । जिसके अहंकार ( दानवीर होने का) को तोड़ने के लिए परमात्मा को वामन अवतार लेकर तीन कदम धरती माँगनी पड़ी । ये सब सतयुग की ही तो कथाएं हैं ।

 क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Saturday, September 5, 2026

सम्भवामि युगे युगे -3

 सम्भवामि युगे युगे -3

          केवल मनुष्य ही आनन्दित हो सकता है, अन्य जीव नहीं । मनुष्य और अन्य जीवों में इतना बड़ा भारी अन्तर, फिर भी मनुष्य आनन्द प्राप्ति का मूलभूत उद्देश्य भूलकर सुख-दुःख में उलझ गया । कारण - प्रकृति ने सृष्टि का निर्माण किया और मनुष्य ने स्वयं को सृष्टि का अंग मान लिया । केवल उसका शरीर ही सृष्टि का अंग है न कि वह स्वयं । मनुष्य नहीं जानता कि उसके शरीर में उपस्थित पुरुष जोकि वह स्वयं है, वास्तव में आनन्द को अनुभव करने के लिए ही है । परमात्मा भी मनुष्य रूप में अवतरित होते हैं परन्तु वे अपना मूल स्वरूप नहीं भूलते क्योंकि वे प्रकृति(माया) को अपने अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होते हैं - ‘प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया’ (गीता-4/6) । हां, आनन्द के लिए माया का सहारा लेकर लीला अवश्य करते हैं । कैसी-कैसी लीला की है उन्होंने, माया को अपने अधीन करके ? उनकी लीला का हम माया की दृष्टि से देखते हुए और माया में लिप्त हुए बिना आनन्द लेंगे ।

          परमात्मा ने प्रकृति से इस जगत् की रचना की और इसमें अपनी माया डाल दी । माया, जिसमें एक साथ दो सदैव उपस्थित रहते हैं, बस उनकी मात्रा में अंतर चलता रहता है, जैसे भला-बुरा, जन्म-मरण, हानि-लाभ, खट्टा-मीठा आदि । इन्हीं दो के अंर्तगत धर्म-अधर्म भी आ जाते हैं ।

        धर्म और अधर्म एक ही सिक्के के दो पहलू की तरह है । सिक्का उछालोगे तो वह एक पहलू ऊपर रखते हुए गिरेगा । इसी प्रकार इस जगत् में धर्म और अधर्म, दोनों बराबर एक साथ चलते रहते हैं । कभी धर्म का पक्ष ऊपर (प्रभावी) रहता है और कभी अधर्म का । जब अधर्म का प्रभाव अत्यधिक होने लगता है और धर्म को सदैव के लिए निष्प्रभावी करने का प्रयास करता है, तब भगवान को मनुष्य रूप धारण करना पड़ता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Friday, September 4, 2026

सम्भवामि युगे युगे -2

 सम्भवामि युगे युगे - 2

         पुरुष और सक्रिय प्रकृति के गठजोड़ की एक विशेषता है - ‘अभी नहीं मिला तो आगे मिलेगा’, इस आश्वासन के साथ माया पुरुष को अपने में उलझाए रखती है । आश्वासन - कि सुख आज नहीं मिला, कोई बात नहीं कल मिल जाएगा । और पुरुष उस सुख की प्रतीक्षा करने लगता है जिसे भविष्य में कभी मिलना भी नहीं है । माया का असत्य आश्वासन, तभी माया को असत् कहा जाता है । सत् सदैव साथ रहता है, असत् का साथ केवल मृगमारीचिका है । भगवान कहते हैं - नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत: (गीता-2/16) । असत् परिवर्तनशील है, वह प्राप्त होता दिखते हुए भी सदैव अप्राप्त ही रहेगा । सत् प्राप्त ही है परन्तु माया के कारण अप्राप्त दिखता है । इस प्रकार असत् का संग कर एक भला पुरुष, जो स्वरूप से अजन्मा है और जिसे सक्रियता से कोई मतलब नहीं होता, वह भी प्रकृति की मायारूपी बैलगाड़ी में सवार होकर अनन्त यात्रा पर निकल पड़ता है । 

          परमात्मा ने स्वयं के आनंद के लिए प्रकृति बनाई । आनन्द की अनुभूति के लिए एक से दो होना आवश्यक था । आनन्द को अनुभव करने के लिए वह स्वयं पुरुष बना और प्रकृति को अपने आनन्द का स्रोत बनाया । परमात्मा ने प्रकृति को सृष्टि रचने का आदेश दिया - ‘मयाध्यक्षेण प्रकृतिं सूयते सचराचरम्’ (गीता-9/10) । सृष्टि में प्रकृति स्वयं जगत् बनी और उस जगत् के माध्यम से आनन्द अनुभव करने के लिए परमात्मा ने पुरुष (आत्मा) रूप से उसमें प्रवेश किया । पुरुष को अनुभव करना था आनन्द को परन्तु अनुभव करने लगा सुख-दुःख को । इस प्रकार सुख-दुःख को अनुभव करने के कारण वह अपना मूल स्वरूप भूल बैठा । इसी भूल ने उसको जीव बना दिया और उसे मुक्त न रखकर विभिन्न शरीरों की यात्रा पर धकेल दिया । जिसके वशीभूत होकर वह अनन्त यात्रा पर निकल पड़ा है, यही परमात्मा की माया है ।

             प्रकृति (माया) ने पुरुष को नहीं उलझाया है बल्कि माया के साथ गठजोड़ कर वह स्वयं जीव बन उसमें उलझा है । इसी माया को संसार कहा जाता है । सब जीवों के शरीर समान है, पांच भौतिक तत्वों से बने हैं । इसी प्रकार आत्मा सबकी एक ही है और वह सर्वत्र है, केवल माया के कारण वह (जीव बना पुरुष) मेरा-तेरा में उलझ गया है । एक कोशिकीय जीव से लेकर बहुकोशिकीय जीव तक सब के शरीरों को देख लीजिए । सबमें वही पांच भौतिक तत्त्व, मन, बुद्धि अहम्, (अष्टधा प्रकृति) कहीं पर कोई भिन्नता नहीं । फिर भी मनुष्य और अन्य जीवों में एक बहुत बड़ा मूलभूत अन्तर है । सभी जीव सुख-दुःख की अनुभूति तो कर सकते हैं परन्तु आनन्द की अनुभूति केवल मानव ही कर सकता है । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

         ‘धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे’ - इस धरा पर अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना करने के लिए मानव रूप में अवतरित होने वाले लीलाधर, मायापति, श्यामवर्णी, सबके प्यारे, नटखट नटवरलाल, श्यामसुन्दर, कन्हैया का आज प्रकटोत्सव मनाया जा रहा है । आप सभी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाएं ।

।। हरिः शरणम् ।।

Thursday, September 3, 2026

सम्भवामि युगे युगे -1

 सम्भवामि युगे युगे -1

             परमात्मा के अन्तर्गत दो - पुरुष और प्रकृति । पुरुष : अपरिवर्तनीय, प्रकृति : परिवर्तनशील । इस प्रकार अक्रिय परमात्मा के दो विभाग हुए - एक अक्रिय पुरुष और दूसरा सक्रिय प्रकृति । परमात्मा अक्रिय, न तो कर्ता न भोक्ता । यही स्वरूप पुरुष का भी है । प्रकृति सक्रिय है, फिर भी प्रकृति न तो कर्ता है और न ही भोक्ता, बिलकुल परमात्मा तथा पुरुष की तरह । क्रिया के कारण प्रकृति में होने वाली परिवर्तनशीलता के अतिरिक्त दोनों में कोई अन्तर नहीं है, इसीलिए कहा जाता है कि परमात्मा के साक्षात् दर्शन करने है तो प्रकृति को निहारो । 

         प्रकृति (जगत्) में क्रिया भी होती है और प्रत्येक क्रिया का परिणाम भी मिलता है । यह अटल सिद्धान्त है कि प्रत्येक क्रिया का परिणाम होता है, तभी तो प्रकृति में परिवर्तन होते हैं ; आज जो जैसा दिख रहा है, पल भर बाद वो वैसा नहीं रहेगा । सक्रियता से क्रिया, उस क्रिया की प्रतिक्रिया और परिणाम, फिर भी प्रकृति न कर्ता न भोक्ता । है न आश्चर्य ! प्रश्न उठता है कि फिर कर्ता और भोक्ता कौन है ? कर्ता है, प्रकृति में स्थित पुरुष । जिस कारण से पुरुष प्रकृति में स्थित होकर कर्ता और भोक्ता बनता है, उसी को माया कहते हैं । यह माया प्रकृति का ही स्वरूप है ।

           दो विभाग - प्रकृति और पुरुष । जब पुरुष प्रकृति में स्थित हो जाता है तब प्रत्येक क्रिया का अपने आपको कर्ता मानने लग जाता है । जो कर्ता बनता है उसको भोक्ता बनना ही पड़ता है अर्थात् पुरुष प्रकृति में हो रही प्रत्येक क्रिया का परिणाम स्वयं में अनुभव करता है । इस प्रकार क्रिया होती तो प्रकृति में है, उस क्रिया से वह तो अछूती बनी रहती है परन्तु पुरुष उस क्रिया के साथ होली खेलने लग जाता है । पुरुष को अपने स्वरूप में स्थित रहना चाहिए था साक्षी बनकर, परन्तु प्रकृति की सक्रियता से उपजी चकाचौंध से प्रभावित होकर वह अपनी स्वस्थता छोड़ देता है और जाकर प्रकृति में स्थित हो जाता है । इस प्रकार प्रकृतिस्थ पुरुष ही माया के जाल में उलझ कर कर्ता-भोक्ता बन जाता है । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, September 2, 2026

अनुभव की बात

 अनुभव की बात 

         गत सौ दिनों में दो विषयों पर लेखन हुआ, ‘आसक्ति से अनुरक्ति की ओर’ तथा ‘मौन’ । पता नहीं, विषय कौन सुझाता है ? मैं जो सोचता हूँ, वह विषय तो कहीं बहुत पीछे छूट जाता है और अचानक मस्तिष्क में एक बिजली सी कौंधती है और बिलकुल नया विषय सामने आ जाता है । फिर उस विषय पर चिंतन कहाँ से शुरू होता है, कैसे आगे बढ़ता है और लेखनी कैसे चल पड़ती है, कुछ भी अनुभव में नहीं आता । जब संपादन करने के लिए अवलोकन करता हूँ तो आश्चर्य होता है कि क्या ये शब्द मेरे हैं ? नहीं, शब्द मेरे नहीं है बल्कि किसी ने मेरे माध्यम से इनको कैनवास पर उतारा है । बहुत कुछ बदलाव करने की सोचता हूँ परंतु बदलाव भी मेरे चाहे अनुसार नहीं होता । जब संपादित करने के पश्चात् पढ़ता हूँ तो आत्मिक संतुष्टि और सुख का अनुभव अवश्य होता है । गोस्वामीजी ने मानस में जिसे ‘स्वान्तः सुखाय’ कहा है, क्या यह लगभग वैसा ही है ?

            मेरे चाहने से कुछ नहीं होता, चाहता वही है, मुझे तो उसकी चाह के अनुसार भूमिका निभानी है । अब देखिए, ‘मौन’ पर लिखने के पश्चात् सोचा था कि मैं अब लेखनी को विश्राम देकर ‘न किंचिदपि चिन्तयेत्’ की अवस्था की तरफ़ बढ़ चलूं क्योंकि अंततः उसी लक्ष्य को प्राप्त करना है । मस्तिष्क तंद्रा की अवस्था में था कि यकायक बिजली सी कौंधी और एक प्रश्न उठा  - ‘‘अनुरक्ति” का क्या हुआ ? 

         आचार्य जी श्री गोविन्द राम शर्मा कहते हैं - ‘प्रकाश ! तू ज्ञान मार्गी है । ज्ञान से भक्ति विलक्षण है । जब भीतर भक्ति जगेगी और परमात्मा से प्रेम होगा तब समस्त ज्ञान स्वयं में ही पा लेगा ।’  आज ज्ञान और भक्ति के दोराहे पर खड़ा मैं सोच रहा हूँ कि ‘अनुरक्ति’ की ओर बढ़ने का संकेत क्या आदरणीय भाईजी (आचार्यजी) की परमात्मा से की गई अनुशंसा का परिणाम है ? क्योंकि लेखन हेतु मुझे जो भी संकेत मिलता है, उसे मैं उन्हीं का आशीर्वाद और परमात्मा की कृपा समझता हूँ ।

         खपती मस्तिष्क की खपत तब तक नहीं मिटती जब तक आप भीतर से ख़ाली नहीं हो जाते । अब इसी खपत को परमात्मा की ‘अनुरक्ति’ में परिवर्तित कर दिया है । अब जिस दिन गुरु और परमात्म-कृपा होगी भीतर से रिक्त होता चला जाऊँगा, फिर एक दिन ‘मौन’…… , पास में कुछ न होते हुए भी सब कुछ पा लेना  । तब तक लेखनी भगवान भरोसे, वह जैसा और जब तक लिखवाना चाहता है, तब तक वैसा लिखता रहूँगा । ‘अनुरक्ति‘ की प्रथम सीढ़ी और संभवतः अंतिम भी अर्थात् एकमात्र सीढ़ी है - उसकी लीला का गुणगान करना और उसकी लीला में डूब जाना । परन्तु प्रत्येक लीला तो माया के अन्तर्गत है, मायापति की माया के । कोई बात नहीं, उसकी माया का गुणगान करना भी तो परोक्ष रूप से उसी का गुणगान करना है । बिना माया की सहायता के सीधे वह भी अवतरित नहीं हो सकता । प्रकृति को अपने अधीन करके अपनी माया से ही तो वह प्रकट होता है - ‘धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे’ ।

गोस्वामीजी मानस में कहते हैं - रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि॥ अर्थात् भगवान श्री राम का स्मरण करना, उनके नामों का गुणगान करना और निरंतर उनके यश व गुणों के समूहों को सुनना ही सबसे बड़ा और सुलभ साधन है।

कल से माया और मायापति का गुणगान करेंगे - “ सम्भवामि युगे युगे” में ।

।। हरिः शरणम् ।।

डॉ. प्रकाश काछवाल