ज्ञान उदय जब होत है …..27
कर्म और ज्ञानयोग दोनों में ही त्याग होता है । कर्मयोग में अहम् का त्याग होता है जबकि ज्ञानयोगी संसार के मोह का त्याग करता है । सेवा कर्म करते हुए यदि भीतर ‘मैं कर्ता हूँ’ का भाव है तो वह कर्मयोग नहीं है, इसी प्रकार यदि ज्ञान अर्जित करके भी संसार के मोहजाल में जकड़े हुए हैं तो आप ज्ञानयोगी नहीं हो सकते । ज्ञानपूर्वक कर्म करने से अहम् और सांसारिक मोह, दोनों का त्याग सुगम हो जाता है । इसलिए कर्म और ज्ञान, इन दोनों में महत्वपूर्ण हुआ - त्याग ।
श्रुति कहती है -
न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशु: ।
(कैवल्य उपनिषद् - 2 तथा महानारायणोपनिषद् - 10/5)
अर्थात् न धन से, न कर्म से और न संतान के उत्पादन से ही मोक्ष प्राप्त होता है । प्रमुख यतियों ने एक मात्र त्याग से ही मोक्ष को अनुभव किया है ।
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि कर्मयोग के बिना ज्ञानयोग सिद्ध होना कठिन है । मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है । (गीता - 5/6 ) कर्मयोग के द्वारा करने का राग मिट जाता है । रागरहित होने से सांसारिक मोह से छूटना सुगम हो जाता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।