नाभावो विद्यते सतः -14
अब “सत्” और “असत्” को इस प्रकार समझिए । सत् जो पूरा, स्थिर और अपने आप में पर्याप्त है । इसलिए इसमें कोई अभाव नहीं है । असत् अधूरा, बदलने वाला और टिकने वाला नहीं है, इसलिए इसमें सदैव अभाव बना रहेगा।
दैनिक जीवन के उदाहरण से इस बात को समझते हैं । सबसे सटीक उदाहरण है - पैसा । थोड़ा पैसा और चाहिए । ज़्यादा पैसा आ गया फिर भी कहेंगे, और चाहिए । कभी ‘और चाहिए’ कहना क्यों नहीं रुकता ? क्योंकि पैसा असत् है । इसके लिए उत्तरदायी है, हमारा मन । मन कहता है: यह नहीं, वह चाहिए । वह मिल गया तो उसे वह और चाहिए । मन हमेशा असत् से जुड़ा है, इसलिए उसमें सदैव अभाव रहेगा ।
प्रश्न है कि सत् में कैसे स्थित हुआ जा सकता है ? असत् का निषेध होते ही जीव सत् में स्थित हो जाता है । इसलिए संसार से विमुखता ही सत् का अनुभव करा देती है । बहुत सीधा नियम है : जहाँ “चाहिए, और चाहिए” है, वहाँ असत् है । जहाँ “नहीं चाहिए” है, वहाँ सत् है । अभाव चीज़ों की वजह से नहीं होता, अभाव अधूरेपन की वजह से होता है । सत् पूरा है, इसलिए उसमें अभाव नहीं है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।