सम्भवामि युगे युगे -10
असुर भी तीक्ष्ण बुद्धि रखते है, शुक्राचार्य जैसे महान गुरु मिले हैं उन्हें । वह बात और है कि वे अपनी बुद्धि का उपयोग दूसरों को सताने में करते हैं । ज्ञान केवल बोलने और लिखने की बात नहीं है । ज्ञान को आचरण में लाए बिना वह एक भार के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है - ‘ज्ञानं भार: क्रियां विना’ । असुर और देव में यही अन्तर है । ज्ञान को जीवन में उतारने वाला देव और आचरण में न लाकर अथवा उसके ठीक विपरीत आचरण करने वाला असुर ।
त्रेता के रावण की तरह ही द्वापर का जरासंध भी तो यही कर रहा है । श्रीकृष्ण से युद्ध करते हुए सत्रह बार हार चुका है, फिर भी भगवान को पहचान नहीं सका । शिशुपाल को वैसे ही सांत्वना दे रहा है, जैसे रावण अपनी रानियों को दे रहा था । चेदिराज शिशुपाल का विवाह रुक्मिणीजी से होना था । बीच में ही कृष्ण उनका हरण कर लाए । जरासन्ध और उसकी सेना ने रुक्मिणीजी को छुड़ाने के लिए बहुत संघर्ष किया परन्तु वे पराजित हुए । तब जरासन्ध शिशुपाल को सांत्वना देते हुए कहता है -
यथा दारुमयी योषिन्नृत्यते कुहकेच्छया ।
एवमीश्वरतन्त्रोंऽयमीहते सुखदुःखयो: ।। भागवत -10/54/12 ।।
जैसे कठपुतली बाज़ीगर की इच्छानुसार नाचती है, वैसे ही यह जीव भी भगवद् इच्छा के अधीन रहकर सुख और दुःख के सम्बन्ध में यथाशक्ति चेष्टा करता रहता है ।
हिरण्यकश्यप हो, रावण हो चाहे शिशुपाल, सब ईश्वर की माया की इच्छानुसार नाच रहे हैं । चेदि नरेश शिशुपाल, कृष्ण की बुआ श्रुतश्रवा का पुत्र था अर्थात् रिश्ते में भाई । दन्तवक्त्र करुष देश का राजा था । दोनों का ही श्रीकृष्ण से वैर था । दोनों ही नहीं पहचान सके, श्रीकृष्ण रूप में परमात्मा को । राजसूय यज्ञ में गालियों पर गालियाँ देता जा रहा है, शिशुपाल । शापित को मुक्त करना भी तो है । माया के प्रभाव ने शिशुपाल को गालियाँ देने को विवश कर दिया । फिर भगवान को समता में बने रहकर आदर्श भी तो प्रस्तुत करना है । सौ गालियों के पूरा होने तक प्रतीक्षा की । शिशुपाल और दन्तवक्त्र का अन्त तो होना ही था । इस प्रकार जय-विजय के तीसरे राक्षस रूप का भी अन्त हुआ ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।