Thursday, May 7, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....18

 ज्ञान उदय जब होत है …..18

         प्रारब्ध कर्म बनते हैं, संचित कर्म से और कर्मों का संचय होता है क्रियमाण कर्म से । मनुष्य क्रियमाण कर्म करता है, कामना के वशीभूत होकर । यदि हम अपनी कामनाओं पर अंकुश लगा दें तो न तो क्रियमाण कर्म होंगे, न उनका संचय होगा और न ही प्रारब्ध बनेगा ।

          मुख्य बात है कि कर्म भी होते रहें तथा नया प्रारब्ध भी न बने, क्या ऐसा होना इस जीवन में सम्भव हो सकता है ? प्रश्न का उत्तर है कि हाँ, ऐसा होना सम्भव हो सकता है, यदि हमारे कर्म ज्ञानपूर्वक हों । ज्ञान ही कर्मों के परिणाम से हमें मुक्ति दिला सकता है ।

         जीव में कर्म होते हैं - प्रकृति के गुणों के कारण । चाहे जीव लाख प्रयास कर ले, बिना गुणों के कर्म होने असम्भव है । मनुष्य की भूल यही है कि वह कर्मों को अपने द्वारा किया जाना मानता है जबकि वास्तविकता है कि सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा ही होते हैं । ज्ञान इन कर्मों को ‘करने’ से ‘होने’ में बदल देता है । ‘करना’ कर्म है और ‘होना’ क्रिया । प्रकृति में गुणों के कारण प्रत्येक पदार्थ में क्रिया सतत चलती रहती है परन्तु दुर्बुद्धि मनुष्य उसे अपने द्वारा किए जाने वाले कर्म बना देता है । ज्ञान हो जाने से दुर्बुद्धि सद्बुद्धि में बदल जाती है । इस प्रकार कर्म भी क्रिया हो जाते हैं और हम ‘करना’ से ‘होना’ में स्थानान्तरित हो जाते हैं ।

          ज्ञान से प्रकृति के गुणों और उनसे होने वाली क्रियाओं में कोई परिवर्तन नहीं होता बल्कि उससे केवल हमारी मानसिकता बदल जाती है । ज्ञान हमें हमारे कर्मों के होने की वास्तविकता को प्रकट कर देता है, जिससे हम गुणों से हो रही क्रियाओं में आसक्त नहीं होते । क्रियाओं में आसक्ति ही उन्हें कर्म में बदलती है । आसक्ति हटते ही क्रियाएं तो यथावत चलती रहती है परन्तु कर्म, अकर्म हो जाते हैं । फिर हम सब कुछ करते हुए भी कुछ नहीं करते ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, May 6, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....17

 ज्ञान उदय जब होत है …..17

          प्रारब्ध ही जन्म-मरण अर्थात् जीव द्वारा नए-नए शरीर धारण करने के लिए उत्तरदायी है । शरीरों का मिलना-बिछड़ना ही संसार-चक्र है, जिसमें घूमते हुए जीव सुखी-दुःखी होता रहता है । कोई भी जीव सदैव के लिए सुखी नहीं हो सकता और न ही दुःखी होता है । वैसे संसार में दुःख के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । जिसे सुख कहा जाता है, वह दुःख की अपेक्षा से है अर्थात् दुःख की तीव्रता का कम हो जाना या उसको सहन कर लेने की क्षमता का बढ जाना ही सुख समझ लिया जाता है । 

        संसार परिवर्तनशील है, इसलिए यहां सुख दुःख में और दुःख सुख में परिवर्तित होता रहता है । हम अपने जीवन में कभी दुःखी नहीं होना चाहते परंतु फिर भी होते हैं क्योंकि संसार मिला ही दुःख के कारण है । दुःख का कारण था कामना का पूरा न हो पाना । हमारी सुख की इच्छा इस दुःख के मूल में है । शारीरिक सुख की इच्छा करना ही काम है । 

         काम से कामना उत्पन्न होती है और कामना से कर्म । कर्म से ही प्रारब्ध बनता है और प्रारब्ध के कारण संसार में जीव का आवागमन बना रहता है । जीव को जब मनुष्य शरीर मिलता है तब उसका उद्देश्य इस सांसारिक आवागमन के चक्र से बाहर निकलने का होना चाहिए न कि सांसारिक सुख-दुःख का भोग करने का । इस आवागमन को मिटाने के लिए एक मात्र उपाय है, प्रारब्ध को बनने से रोकना ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Tuesday, May 5, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....16

 ज्ञान उदय जब होत है …..16

        इतने विवेचन में कर्म-रहस्य के आधारभूत सिद्धान्त को प्रकट करने का प्रयास किया गया है । कर्म के आधार पर ही यह संसार चक्र घूमता है । सभी मनुष्य यदि अकर्म की अवस्था को उपलब्ध हो जाए तो संसार-चक्र थम सकता है परन्तु ऐसा होना असम्भव है । अपने जीवन में मनुष्य कहीं न कहीं और कभी न कभी काम के वशीभूत हो ही जाता है, जिसके परिणाम के लिए उसे संसार-चक्र में बने रहना पड़ता है । मानस में तुलसी लिखते हैं - 

करम प्रधान बिस्व करि राखा । जो जस करइ सो तस फलु चाखा ।। 2/219/4 ।।

       सारा विश्व कर्म के कारण ही बना है और कर्म के आधार पर ही गतिमान है । यहां जो भी जीव जैसा कर्म करता है, उसे उसका वैसा ही परिणाम भुगतना पड़ता है । कर्मों के आधार पर ही जीव को भांति-भांति के शरीर मिलते बिछुड़ते रहते हैं । यही संसार-चक्र है ।

         प्रत्येक कर्म (सकाम) कामना के अधीन है । वह कामना वर्तमान जीवन की भी हो सकती है अथवा वह पूर्व जन्म की भी हो सकती है । पूर्वजन्म में अधूरी रह गई कामना इस जीवन में अल्प प्रयास/कर्म से ही परिणाम दे देती है । उस कर्म के परिणाम में आसक्ति पैदा हो जाए तो फिर एक नई कामना पैदा हो जाएगी अन्यथा वह कर्म अपना फल देकर नष्ट हो जाता है । इस प्रकार जीव के प्रारब्ध कर्म बनते और नष्ट होते रहते हैं । यदि सभी प्रारब्ध कर्म फल देकर नष्ट हो जाएं और नया प्रारब्ध न बन सके तो जीव मुक्त हो जाता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Monday, May 4, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....15

 ज्ञान उदय जब होत है …..15

            परिणाम मिलने के समय को लेकर कर्म तीन प्रकार के बताए गए हैं - क्रियमाण, संचित और प्रारब्ध । क्रियमाण कर्म वे कर्म हैं जिनके करते ही तत्काल फल प्रकट हो जाता है । इन कर्मों के होने में तो पूर्व जीवन के प्रारब्ध की भी भूमिका रहती है । इसलिए ये कर्म शरीर के जन्म लेते ही होने प्रारम्भ हो जाते हैं और इनका फल भी तत्काल मिल जाता है । प्रारब्ध से होने वाले क्रियमाण कर्म अल्प प्रयास से ही अधिकतम परिणाम दे देते है क्योंकि उस कर्म का बहुत सा भाग पूर्वजन्म में संपन्न किया जा चुका होता है । इस प्रकार अल्प प्रयास से ही प्रारब्ध कर्म का फल मिल जाने के कारण उस फल और कर्म में आसक्ति पैदा हो जाती है । इन कर्मों के परिणाम में मनुष्य की आसक्ति पैदा होते ही कर्म के साथ कामना जुड़ जाती है और वह सकाम कर्म करने शुरू कर देता है । 

        पूर्व जीवन के प्रारब्ध कर्म इस जीवन में सकाम कर्म बनकर फल देते हैं क्योंकि पूर्व जीवन की अधूरी कामनाएं पूरी जो होनी है । सकाम कर्म ही क्रियमाण कर्म है जिनका परिणाम प्रायः उसी समय मिल जाता है । कभी-कभी कुछ कर्मों का परिणाम तत्काल नहीं मिल पाता, ऐसे कर्म मस्तिष्क में जाकर संचित हो जाते है । ये संचित कर्म समय पाकर परिपक्व होकर अपना परिणाम प्रायः उसी जीवन में भुगता देते हैं । फिर भी कुछ संचित कर्म उस एक शरीर के जीवन में परिणाम नहीं दे पाते, ऐसे संचित कर्म ही मनुष्य का प्रारब्ध बनाते है । फल न दे सकने वाले संचित कर्म प्रारब्ध कर्म बनकर नए शरीर में जाकर अपना परिणाम देते हैं । नए शरीर के जन्म लेते ही प्रारब्ध से क्रियमाण कर्म होने प्रारम्भ हो जाते हैं । इस प्रकार कर्म आधारित संसार-चक्र निर्बाध गति से चलता रहता है ।

           कर्म के साथ जब कामना जुड़ती है तब सकाम कर्म होते हैं और जब कामना नहीं जुड़ती तब वे निष्काम कर्म हैं । निष्काम कर्म से अकर्म की अवस्था को उपलब्ध हुआ जाता है । सकाम कर्म के साथ जब लिप्सा जुड़ जाती है तब व्यक्ति निषिद्ध कर्म (शास्त्र विरुद्ध) करने लगता है, तब वे विकर्म कहलाते हैं ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, May 3, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....14

 ज्ञान उदय जब होत है …..14

           प्रत्येक कर्म एक क्रिया मात्र है और प्रत्येक क्रिया का परिणाम अवश्य होता है । यहां एक बात को ध्यान में रखना आवश्यक है । क्रिया का परिणाम तो मिलता ही है, साथ ही क्रिया की प्रतिक्रिया होती है उसका परिणाम भी मिलता है । प्रत्येक क्रिया का परिणाम तो प्रायः तत्काल ही मिल जाता है परंतु प्रतिक्रिया का परिणाम कब मिलेगा, कहा नहीं जा सकता । इसलिए प्रत्येक कर्म को करने से पूर्व इस बात को स्मृति में रखें कि इस कर्म की प्रतिक्रिया का परिणाम भी हमें ही भुगतना होगा, कब और कहाँ, यह सब प्रकृति के विधान (विधि) पर निर्भर है ।

            भीष्म एक पूर्वजन्म में जब राजा थे और रथ पर बैठकर नगर भ्रमण पर निकले थे तो रास्ते में एक नाग ने उनकी राह रोक ली थी । भीष्म का कर्म केवल इतना सा था कि उन्होंने नाग को रास्ते से हटाने का आदेश दिया था । नाग को रास्ते से हटाते ही उस कर्म का परिणाम तत्काल ही मिल गया । परंतु उस कर्म की प्रतिक्रिया का परिणाम सौ जन्मों बाद शरशैया के रूप में उन्हें भुगतना पड़ा क्योंकि पूर्व कर्म के समय नाग का शरीर काँटों से बिंध गया था ।

           प्रतिक्रिया वह कर्म है, जो प्रारम्भ में तो संचित होता है और उस जीवन में परिणाम न दे पाने पर आपका प्रारब्ध बनता है । अभी जो आश्रम की कथा कही है, उसमें बगुले को उड़ाते ही सन्त को कर्म का परिणाम मिल चुका था परंतु उस कर्म की प्रतिक्रिया का परिणाम उन्हें नरक में भूखे रहकर भुगतना पड़ा । दूसरे सन्त ने बगुले को न उड़ाने का कर्म किया था जिसकी प्रतिक्रिया में उन्हें नरक जाकर घायल मछली की तरह तड़पना पड़ा । इसलिए कर्म का पूर्ण परिणाम (प्रतिक्रिया सहित) जब तक नहीं मिल जाता तब तक कुछ भी कहा नहीं जा सकता । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Saturday, May 2, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....13

 ज्ञान उदय जब होत है …..13

         तीसरी पीढ़ी के सन्त को चिन्तन मुद्रा में ही यहीं छोड़, चलिए इस आश्रम से बाहर निकलते हैं और कर्म-रहस्य को जानने का प्रयास करते हैं । कर्म, अकर्म और विकर्म - तीनों में से अकर्म तो मुक्त कर देते हैं तथा विकर्म पतन की पराकाष्ठा तक ले जाते हैं, जिससे बाहर निकलकर फिर से मनुष्य शरीर का मिलना बड़ा ही कठिन है । कर्म अर्थात् सकाम कर्म में ही अधिकांश लोग उलझे हुए है । मुख्य रूप से ये कर्म ही जगत् को गतिमान बनाए हुए हैं ।

          कर्म के सम्बन्ध में दो बातें मुख्य हैं । एक तो प्रत्येक कर्म का परिणाम मिलना निश्चित होता है और दूसरे प्रत्येक जीव से कर्म होंगे ही । यही कारण है कि कर्मों से दूर भागकर भी कर्म करने ही पड़ते हैं । इसलिए विवेकवान मनुष्य के लिए यही उचित है कि वह कर्म से मुँह न मोड़े । भगवान कहते हैं - 

            सहजं कर्म कौंतेय सदोषमपि न त्यजेत् ।

            सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता: ।। गीता - 18/48 ।।

अर्थात् हे कुन्तीनन्दन ! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँसे अग्नि की तरह किसी न किसी दोष से युक्त है ।

        सहज कर्म प्रत्येक जीव से होते हैं । मनुष्य के ध्यान देने योग्य है कि वह इन कर्मों से अपना आसक्तिपूर्ण सम्बन्ध न जोड़े । जहां अग्नि होगी वहां धुआँ होगा ही वैसे ही प्रत्येक कर्म के साथ उसका परिणाम (अच्छा, बुरा अथवा मिश्रित) जुड़ा रहेगा ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Friday, May 1, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....12

 ज्ञान उदय जब होत है …..12

        एक दिन नए सन्त ने अपने गुरु को स्वप्न में देखा । वे कह रहे थे कि बेटा ! तालाब मे जब भी बगुले आए और मछली मारने लगे तो उसे उड़ाने अथवा न उड़ाने का निर्णय सोच-समझकर करना । मेरे गुरु ने बगुले को उड़ा दिया था, जिससे उस दिन वह भूखा रह गया। इसके कारण मेरे गुरु को नरक जाना पड़ा। मैंने अपने गुरु के कहने से बगुले को नहीं उड़ाया था, जिस कारण से मुझे कुछ समय के लिए नरक में जाकर मरती हुई उस मछली की तरह तड़फना पड़ा था जो कि बगुले को न उड़ाने के कारण मारी गई थी । कारण, उस दिन बगुले ने मछली को क्रीड़ा करते हुए मार डाला था । वह चौंच मारकर मछली को इधर-उधर दौड़ते और तड़फते देखकर ही खुश हो रहा था । 

         मछली को बगुले ने अपना पेट भरने के लिए नहीं मारा था क्योंकि उस दिन वह भूखा नहीं था । केवल अपने मनोरंजन के लिए ही उसने मछली को मार डाला था । उस दिन मेरे द्वारा बगुले को उड़ा देना ही मेरा कर्तव्य था । मैं तो उस दिन उसे उड़ा नहीं पाया था पर तू इस बात का ध्यान अवश्य रखना और ऐसी परिस्थिति आए तो अपने विवेक से सोच-समझकर निर्णय लेना ।

          हमारी स्थिति तो और भी ख़राब है । मनोरंजन और शारीरिक सुख के लिए कुछ भी करते जा रहे हैं और उनको इस आधार पर उचित ठहराते हैं कि ऐसा किए बिना काम कैसे चलेगा, सभी तो यही कर रहे हैं । सभी अनुचित कार्य कर रहे हैं इसका अर्थ यह नहीं है कि आप भी करने लगें । आप अनुचित कार्य नहीं करेंगे तो कम से कम आपको उस कर्म के प्रति ग्लानि तो नहीं होगी । आप उचित अथवा अनुचित जैसा भी कर रहे है तब भी संसार का काम चल रहा है और जिस दिन आप नहीं रहेंगे तब भी संसार यथावत चलता रहेगा । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।