आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -13
मन का एक निश्चित कर्म फल (भोग) और कर्म (भोग प्राप्ति के लिए) की तरफ झुक जाना ही आसक्ति है । कर्म फल में आसक्त होने से हमारी कामनाएं और अधिक बढ़ती हैं, कामनाएं अपेक्षा (Expectations) को जन्म देती है और फिर अपेक्षा आप से अथवा आपकी कामनाओं की पूर्ति जिनसे होनी है, उन सभी के प्रति आपको आसक्त (Attach) कर देती है । अगर हम किसी भी प्रकार के कर्म के फल (भोग) की आशा मन में न संजोयें, तो हमारा मन न तो किसी कर्म फल (भोग) में आसक्त होगा और न ही इस शरीर को किसी विशेष कर्म को करने के लिए प्रेरित करेगा ।
बार-बार मन के अनुसार कर्म के लिए प्रेरित करने से शरीर भी मन के अनुसार अपने आपको ढाल लेता है । जब एक बार मन के अनुसार शरीर ढल जाता है तो फिर बुद्धि द्वारा मन को नियंत्रित करना लगभग असंभव हो जाता है । इसलिए प्रारम्भिक स्तर पर ही बुद्धि से मन को नियंत्रित कर लेना अधिक सुगम रहता है । प्रारम्भिक अवस्था में बुद्धि आत्मा (आप स्वयं) के अनुसार कार्य करती है और मन को अपने अधीन बनाये रख सकती है परन्तु जब शरीर एक बार मन के अनुसार स्वयं को ढाल लेता है, तो फिर बुद्धि का मन पर से नियंत्रण लगभग समाप्त हो जाता है । मन के अनुसार कर्म करना आसक्ति पैदा करता है जबकि बुद्धि के अनुसार कर्म करना आपको अनासक्ति की ओर ले जाता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।