Friday, March 13, 2026

ज्ञान -6

 ज्ञान -6

            उपस्थित सभी सभासदों की सहमति मिलते ही गार्गी ने ऋषि याज्ञवल्क्य जी को संबोधित करते हुए प्रश्न पूछने प्रारंभ किए । गार्गी का प्रश्न: 'हे ऋषिवर ! जल के बारे में कहा जाता है कि हर पदार्थ इसमें घुलमिल जाता है तो यह जल स्वयं अंततः किसमें जाकर मिल जाता है ?’ गार्गी का यह पहला प्रश्न बहुत ही सरल था । याज्ञवल्क्यजी जैसे ज्ञानी से इतना सरल प्रश्न करना उनकी गरिमा के अनुकूल भी नहीं था फिर भी उन्होंने इसका उत्तर देते हुए कह दिया कि जल अन्तत: वायु में ओतप्रोत हो जाता है । तभी गार्गी ने पूछ लिया कि फिर वायु किसमें जाकर मिल जाती है और याज्ञवल्क्य का उत्तर था कि अंतरिक्ष लोक में ।

              गार्गी यहीं पर ही नहीं रूकी । वह याज्ञवल्क्य के द्वारा दिए गए प्रत्येक उत्तर को फिर से एक नए प्रश्न में बदलती गई और इस तरह गंधर्व लोक, आदित्य लोक, चन्द्रलोक, नक्षत्र लोक, देवलोक, इन्द्रलोक, प्रजापति लोक और यहाँ तक कि ब्रह्मलोक तक भी जा पहुंची और अन्त में गार्गी ने अति महत्वपूर्ण प्रश्न पूछ ही लिया कि यह ब्रह्मलोक किसमें जाकर मिल जाता है ?

            ब्रह्मलोक का न आदि है और न ही अन्त । ऐसा प्रश्न करना गार्गी की प्रतिभा के अनुसार उचित भी नहीं था । गार्गी पर क्रोधित होकर याज्ञवक्ल्य ने कहा, 'गार्गी, माति प्राक्षीर्मा ते मूर्धा व्यापप्त्त्’ अर्थात् गार्गी, इतने प्रश्न मत करो, कहीं ऐसा न हो कि इससे तुम्हारा मस्तक फट जाए । अच्छा वक्ता वही होता है जिसे पता होता है कि कब बोलना और कब चुप रहना है और गार्गी अच्छी वक्ता थी इसीलिए क्रोधित याज्ञवल्क्य की फटकार भी चुपचाप सुनती रही ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Thursday, March 12, 2026

ज्ञान -5

 ज्ञान -5

          याज्ञवल्क्य की बात का प्रतिकार करने के लिए विदुषी गार्गी सामने आई । उसने उपस्थित सभी लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि मैं याज्ञवल्क्य जी से कुछ प्रश्न करूँगी । यदि उन्होंने उन प्रश्नों के उत्तर दे दिए तो फिर इस सभा में उपस्थित कोई भी इनको नहीं हरा सकेगा और वे इन गायों को लेने के अधिकारी होंगे ।

            तत्पश्चात् गार्गी ने याज्ञवल्क्यजी से कई प्रश्न किए । इन प्रश्नोत्तरों का विस्तार से वर्णन बृहदारण्यक उपनिषद् में मिलता है । याज्ञवल्क्यजी से शास्त्रार्थ प्रारम्भ करते हुए गार्गी ने पूछा कि हे ऋषिवर ! क्या आप अपने को सबसे बड़ा ज्ञानी मानते हैं, जो आपने गायों को हांकने के लिए अपने शिष्यों को आदेश दे दिया ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर देते हुए कहा कि मां ! मैं स्वयं को ज्ञानी नहीं मानता क्योंकि ‘‘मैं सबसे बड़ा ज्ञानी हूँ” ऐसा कोई अज्ञानी ही कह सकता है । ये गौएँ सुबह से यहाँ खड़ी-खड़ी थककर परेशान हो गई हैं, इस कारण इन गायों को देखकर मेरे मन में मोह उत्पन्न हो गया है । उत्तर सुनकर गार्गी ने कहा कि आपको मोह हुआ, लेकिन इस पुरस्कार को प्राप्त करने के लिए यह तो कोई योग्य कारण नहीं है । सभी सभासदों की आज्ञा हो तो मैं आपसे कुछ प्रश्न पूछना चाहूंगी । यदि आप इनके संतोषजनक जवाब दे पाएंगे तो आप इन गायों को निश्चित ही ले जा सकते हैं । 

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, March 11, 2026

ज्ञान -4

 ज्ञान -4

         प्राचीन काल में शास्त्रार्थ हुआ करते थे । ये शास्त्रार्थ ज्ञान में अनुभवसिद्ध पुरुषों के मध्य हुआ करते थे । इसका लाभ यह होता था कि शास्त्रार्थ में भाग लेने वालों के साथ-साथ श्रोताओं को भी इसका लाभ मिलता था । भारत में पुरुषों के साथ ही महिला दार्शनिकों तथा साध्वियों की भी एक लम्बी परंपरा रही है । गार्गी, मैत्रेयी, वाक्, घोषा, अपाला आदि इसके उदाहरण है । आज ज्ञान के प्रसंग में हम गार्गी और मैत्रेयी की बात करेंगे । गार्गी का पूरा नाम गार्गी वाचकन्वी है, वे गर्गवंशी ऋषि वचकन्व की पुत्री थी । इसी प्रकार मैत्रेयी ऋषि ‘मित्र’ की पुत्री और ऋषि याज्ञवल्क की पत्नी थी । दोनों ही ब्रह्मज्ञानी थी ।

          एक बार राजा जनक ने अपने यहाँ शास्त्रार्थ का आयोजन किया । उन्होंने राजद्वार पर सोने की मोहरों से मढ़े सींगों वाली एक सहस्र गाएं खड़ी कर दी और घोषणा कर दी कि जो भी शास्त्रार्थ में जीतेगा, वह इन गौओं को पाने का अधिकारी होगा । शास्त्रार्थ चल रहा था परन्तु अभी तक कोई निर्णय न हो सका था । सुबह से राजद्वार पर खड़ी गाएँ भूख-प्यास से थकने लगी थी । तभी ऋषि याज्ञवल्क्य जी का वहाँ आना हुआ । गौओं को ले जाने की शर्त सुनकर उन्होंने अपने शिष्यों को उन थकीहारी गौओं को हांककर अपने आश्रम ले जाने का आदेश दिया । इस बात का शास्त्रार्थ में उपस्थित कई लोगों ने विरोध किया । 

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Tuesday, March 10, 2026

ज्ञान -3

 ज्ञान -3

          ज्ञान कहीं से उधार नहीं लेना पड़ता । हमारे भीतर ज्ञान पर्याप्त मात्रा में है जो अज्ञान से ढककर भीतर कहीं गहरे दबा पड़ा है । हम ज्ञान के नाम पर अज्ञान में जी रहे हैं । उस अज्ञान को ज्ञान कह देने से वह ज्ञान नहीं हो जाता । जब तक हम सीखे और सुने हुए ज्ञान को केवल किताबी बातें मानते रहेंगे, तब तक हमारा कल्याण नहीं हो सकता । उस ज्ञान के भीतर डुबकी लगाने से ही हमारा जीवन सुधरेगा अन्यथा केवल लच्छेदार बातें लिखते, कहते और सुनते ही रहेंगे ।

           कबीर कहते हैं -

               ब्राह्मण है गुरु जगत का, साधु का गुरु नाहीं ।

               उलझ उलझ कर मरि रह्या, चारिउ वेदा माहीं ।।

          ब्राह्मण ने चारों वेदों को पढ़ा है, उन्हें रट भी लिया हैं परंतु उन अनुसार उसने अपना जीवन नहीं बनाया है । वह अपने ज्ञान से संसार को प्रभावित कर सकता है परन्तु किसी साधु को नहीं । साधु ने भले ही वेद नहीं पढ़े हों, फिर भी उसका सहज जीवन ब्राह्मण के ज्ञान से भी बहुत ऊँचा है । इसलिए ज्ञान को केवल पढ़ने और रट लेने से कुछ नहीं होना है । यह केवल शास्त्रों में उलझ कर रह जाना है, इससे तो मुक्त नहीं हुआ जा सकता । मुक्त होने के लिए तो ज्ञान को जीना होता है ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Monday, March 9, 2026

ज्ञान -2

 ज्ञान -2 

          आधुनिक विज्ञान की कई पुस्तकें हैं फिर भी शिष्य को शिक्षक के मार्गदर्शन में प्रयोगशाला में उन पुस्तकों में समाहित ज्ञान को सिद्ध करना होता है । उदाहरणार्थ - रसायन विज्ञान में हाइड्रोजन गैस बनाने की विधि लिखी है कि जस्ते ( Zinc) के टुकड़े पर जब कोई भी अम्ल (Acid) डाला जाता है तो हाइड्रोजन गैस बनती है । जिस विद्यार्थी ने प्रयोगशाला में अपने हाथों से इस ज्ञान को सिद्ध कर लिया वास्तव में केवल उसी ने उस विधिक ज्ञान को अनुभव किया है । 

            पूर्वकाल में हमारे गुरुकुल शास्त्रीय ज्ञान को अनुभव कराने की प्रयोगशाला हुआ करते थे जहां हमारे ऋषिगण अपने शिष्यों को ज्ञान का अनुभव कराते थे । दुर्भाग्य से आज गुरुकुल लगभग समाप्त हो गए हैं । इसका परिणाम यह हुआ कि शास्त्रों को कथा बनाकर कहने वालों की तो भीड़ बढ़ गई और उन शास्त्रों में समाहित ज्ञान को अनुभव करा सकने वाले ऋषियों का अकाल पड़ गया । 

       सत्य की खोज में सबसे बड़ी बाधा यह भ्रम है कि हम पहले से ही सबकुछ जानते हैं । सीखने और जानने में बड़ा अन्तर है । सीखना मात्र ज्ञान है और उस ज्ञान का अनुभव कर लेना जानना है । हरिः शरणम् आश्रम के आचार्य श्री गोविन्दराम जी शर्मा कहते हैं - “सीखे हुए ज्ञान में ही अनुभव छिपा हुआ है । खोज करें ।” यह खोज तभी होगी, जब उस सीखे हुए ज्ञान का जीवन में प्रयोग करेंगे । प्रयोग से ही उस ज्ञान की उपयोगिता सिद्ध होगी । सबके पास ज्ञान पर्याप्त है । उस ज्ञान को उपयोग में जो कोई ले लेता है, उसको आत्म-ज्ञान हो जाता है, वह सत्य तक पहुँच जाता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, March 8, 2026

ज्ञान -1

 ज्ञान -1

        ज्ञान और विवेक, दोनों पर्यायवाची शब्द कहे जाते हैं, जिनको समान अर्थ के रूप में लिया जाता है । सत्य तो यह है कि दो शब्द समान अर्थ से प्रतीत होते हुए भी समान नहीं हैं । शब्दों का एक समान अर्थ होते हुए भी स्थानानुसार अलग-अलग शब्द उपयोग में लिए जाते हैं । उदाहरणार्थ - पानी और जल समानार्थी हैं परंतु स्थान के अनुसार इनका अलग अलग उपयोग किया जाता है । जैसे पानी पिया जाता है और जल शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है । ज्ञान और विवेक भी ऐसे ही दो शब्द हैं । ज्ञान प्रत्येक को है परंतु विवेक किसी किसी में होता है । ज्ञान शास्त्र पढ़कर, उन्हें कंठस्थ कर व्यक्त किया जा सकता है परंतु उपयोग में लिए बिना ऐसा ज्ञान केवल तोता-रटन्त के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । ज्ञान का सदुपयोग करना विवेक कहलाता है । ज्ञान यदि कोरा और किताबी है तो वह बँधनकारी है । जो ज्ञान व्यक्ति को मुक्त करदे वही वास्तविक ज्ञान (विवेक) है ।

“सा विद्या या विमुक्तये - ज्ञान वही है जो मनुष्य को मुक्त कर दे ।” (विष्णु पुराण - 1/19/41)

            जिसने ज्ञान का उपयोग नहीं किया वह बद्धज्ञानी है और जिसने इसका सदुपयोग कर लिया वह मुक्तज्ञानी है । बद्धज्ञानी बातें तो लम्बी लंबी करेगा लेकिन उसका मुक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं होगा । मुक्तज्ञानी अव्वल तो बोलेगा ही नहीं और यदि बोला भी तो उसकी वाणी ब्रह्मज्ञान तक ले जाने वाली होगी क्योंकि उसने ज्ञान को जीया है, रटा नहीं । 

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Saturday, March 7, 2026

ज्ञान - बन्धन या मुक्ति

 ज्ञान - बंधन या मुक्ति 

        ज्ञान एक ऐसा शब्द है जो अपनी उपस्थिति, अभिव्यक्ति तथा आचरण के अनुसार अपना अर्थ बदलता रहता है । यही कारण है कि अज्ञान का अर्थ ज्ञान की अनुपस्थिति नहीं है बल्कि विपरीत ज्ञान होने को अज्ञान कहा जाता है । अज्ञान का अस्तित्व ज्ञान पर ही टिका है अन्यथा अज्ञान का स्वयं का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है । यह ठीक ऐसे ही है जैसे अंधकार स्वयं का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है बल्कि उसका अस्तित्व प्रकाश पर टिका होता है ।

        वास्तविक ज्ञान वह है, जो मुक्ति का साधन बनता है और वह साधन तभी बनता है जब उसको आचरण में लाते हुए जीवन को उसी अनुरूप बनाया जाए । आचरण में लाया ज्ञान स्वयं बोलता है, व्यक्ति को बोलने की ज़रूरत नहीं होती । बिना उपयोग में लाए ज्ञान को बोझ कहा गया है । उपयोग में लाया ज्ञान कहें अथवा ज्ञान का सदुपयोग करना कहें, दोनों एक ही बात है । ऐसा सदुपयोग किया ज्ञान ही विवेक कहलाता है ।

   ज्ञान सभी जीवों में जन्मजात होता है फिर भी कुछ जीवनभर अज्ञानी बने रह जाते हैं और कोई कोई एक ज्ञानी हो जाता है । कल से इसी “ज्ञान” विषय पर चर्चा को आगे बढ़ाते हुए जानेंगे कि ज्ञान बंधन नहीं है बल्कि मुक्ति का साधन है । हम इस ज्ञान को विवेक बनाकर कैसे उपयोग में ले सकते हैं, यह हमारे ऊपर निर्भर है ।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल