नाभावो विद्यते सतः -13
सीधा सा नियम है - जहाँ परिवर्तन है, वहाँ अभाव है । जहाँ स्थिरता है, वहाँ कोई अभाव नहीं है । इसलिए अभाव असत् का गुण है और पूर्णता सत् का स्वभाव है । गहरी नींद में कुछ चाहिए नहीं, कुछ खोया हुआ नहीं लगता । क्यों ? क्योंकि उस समय आप सत् के पास होते हैं।
मूल बात - अभाव वस्तु में नहीं, अस्थिरता में है । सत् स्थिर है, इसलिए उसमें अभाव होना असंभव है ।
प्रश्न है कि मन असत् की ओर ही क्यों भागता है ? क्योंकि असत् से मिले सुख को ही मनुष्य जीवन का सत्य समझ लेता है और उसी को बार-बार पाने की कामना करता है । इस प्रकार उसका मन सदैव असत् की ओर ही भागता है । मन ही अभाव का अनुभव करता है ।
अभाव केवल उसी चीज़ में लगता है जो पूरी नहीं है । जो पूरी है, उसमें अभाव नहीं हो सकता । एक सरल उदाहरण: गिलास A — पूरा भरा हुआ । क्या आप कहेंगे इसमें कोई कमी है ? नहीं, क्योंकि गिलास पूरा भरा हुआ है । गिलास B — आधा भरा हुआ है । आप क्या कहेंगे ? आप कहेंगे, “इसमें और पानी आ सकता है, इसलिए इसमें और पानी डालना चाहिए ।” इस प्रकार अभाव केवल आधे भरे गिलास में है, पूरे भरे में नहीं । यही अन्तर है सत् और असत् में ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।