Thursday, March 5, 2026

भोग, रोग और योग -14

 भोग, रोग और योग -14

        योग को कैसे उपलब्ध हुआ जा सकता है ? उत्तर है- समता में रहते हुए । समता का दूसरा नाम ही ‘योग’ है ।

         गीता में भगवान श्रीकृष्ण समता को ही योग बताते हैं - 

        योगस्थ: कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय । 

        सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ।। 2/48 ।।

अर्थात् हे धनंजय ! तू आसक्ति का त्याग करके सिद्धि-असिद्धि में सम होकर योग में स्थित हुआ कर्मों को कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है ।

          स्वामीजी कहते हैं कि किसी एक वस्तु/व्यक्ति में राग होगा तो दूसरी वस्तु/व्यक्ति में द्वेष होना स्वाभाविक है । कार्य की सिद्धि अथवा असिद्धि में राग-द्वेष की भूमिका परोक्ष रूप से रहती है क्योंकि इनके रहते समता आनी कठिन है । इसलिए प्रत्येक कर्म राग-द्वेष से रहित होकर करना चाहिए । समता से जीवन में विचलन होना संभव ही नहीं है । फिर प्रत्येक परिस्थिति में मनुष्य समता में रहते हुए सुखी-दुःखी नहीं होता, अशान्त नहीं होता । समता को आचरण में लाने पर व्यक्ति योग के पथ से विचलित नहीं होता । इसीलिए समता को ही ‘योग’ कहा जाता है ।

कल सार-संक्षेप 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, March 4, 2026

भोग, रोग और योग -13

 भोग, रोग और योग -13

       योग को स्पष्ट करते हुए गीता में भगवान कहते हैं - 

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।

स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ।। 6/23 ।।

जिसमें दुःखों के संयोग का ही वियोग है, उसी को ‘योग’ नाम से जानना चाहिए । उस ध्यान योग का अभ्यास न उकताये हुए चित्त से निश्चयपूर्वक करना चाहिए । 

        दुःख के संयोग का वियोग होना ही योग है । जीवन में दु:ख आता ही तभी है जब बहने वाले का संग कर उसके साथ हम भी बहने लगते हैं । इस प्रकार दुःख के साथ हुए संयोग का जब वियोग हो जाता है, तब मनुष्य योग में स्थित हो जाता है । इसलिए दुःख के संयोग का वियोग हो जाना ही योग कहलाता है । 

       संयोग और वियोग प्रकृति में होते हैं अर्थात् संसार और शरीर में होते हैं जबकि योग परमात्मा के साथ होता है । परमात्मा के साथ हुए योग का वियोग होना संभव ही नहीं है । संसार और शरीर अस्थिर हैं । परिवर्तनशील होने के कारण केवल इन्हीं में संयोग और वियोग होते रहते हैं । परमात्मा शाश्वत और अपरिवर्तनशील है । इनके साथ योग होने पर पुनः वियोग होने का प्रश्न ही नहीं उठता । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Tuesday, March 3, 2026

भोग, रोग और योग -12

 भोग, रोग और योग -12

उपनिषद् कहती है -

               नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो 

                        न मेधया न बहुना श्रुतेन ।

               यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- 

                    स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ।। मुण्डक उ.- 3/2/3 और कठ. उ.-1/2/23 ।।

        यह आत्मा (परमात्मा) न तो प्रवचन से, न बुद्धि से और न ही बार-बार सुनने से ही प्राप्त हो सकता है । यह परमात्मा जिसको स्वीकार कर लेता है, उसके द्वारा ही प्राप्त हो सकता है और उसके लिए अपने यथार्थ स्वरूप को प्रकट कर देता है । 

           परमात्मा से योग को उपलब्ध होने के लिए न तो शास्त्रों को पढ़ कर ज्ञानी होने की आवश्यकता है, और न ही बहुत सुनने की आवश्यकता है । योग को उपलब्ध होने के लिए तो समस्त भोगों की इच्छा का त्याग करके परमात्मा का ध्यान करना ही पर्याप्त है । भोगों की इच्छा के त्याग से असंयमित और अनुचित भोग होंगे ही नहीं । भोग संयमित होंगे तो रोगों से भी दूरी बनी रहेगी । स्वस्थ शरीर की परमात्मा के योग में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका है । सारांश है कि आत्मा (परमात्मा) न भोग से मिलता है और न ही संग्रह से - वह तो योगमय जीवन से प्रकट होता ।

          भोग, रोग और योग नामक इस लेख का सारांश है कि आत्मा (परमात्मा) न भोग से मिलता है और न ही संग्रह से - वह तो योगमय जीवन से प्रकट होता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Monday, March 2, 2026

भोग, रोग और योग -11

 भोग, रोग और योग -11

 भगवान गीता में कहते हैं - 

        युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।

        युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ।। (6.17)

अर्थात् दुःखों का नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का तथा यथायोग्य सोने-जागने वाले का ही सिद्ध होता है ।

      योग भोग का विरोध नहीं करता, बल्कि उसे मर्यादा में रखता है । जहां योग है, वहाँ भोग साधन बनता है, साध्य नहीं । योग न तो संसार से पलायन है और न ही भोग का निषेध । योग तो जीवन को अनुशासित करता है, उसे सजग और अर्थपूर्ण बनाता है । योग इंद्रियों का दमन नहीं है बल्कि उनका परिष्कार है । 

         जब मनुष्य भोग को ही जीवन का लक्ष्य बना लेता है, तब रोग अनिवार्य हो जाता है । जब योग जीवन की दृष्टि बन जाता है, तब रोग भी गुरु बनकर विदा हो जाता है । 

          आध्यात्मिक जीवन का सार यही है कि हम सुख की खोज बाहर नहीं, स्वयं के भीतर ही करें । जब भीतर संतुलन (समता) स्थापित हो जाता है, तब न तो भोग बाँधता है और न ही रोग डराता है । तब जीवन सहज, शान्त और सार्थक हो जाता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, March 1, 2026

भोग, रोग और योग -10

 भोग, रोग और योग -10

          योग का अर्थ है - जोड़ अर्थात् शरीर, मन और आत्मा का संतुलन । योग भोग को नकारता नहीं है बल्कि उसे शुद्ध करता है । योग हमें सिखाता है कि कैसे इंद्रियों का उपयोग हो । मनुष्य को चाहिए कि वह इंद्रियों का सदुपयोग करें, न कि उनका दास बन जाए । जब मन जागरूक होता है, तब इंद्रियों का भोजन भी संयमित होता है, विचार भी शान्त होते हैं और जीवन अपने आप सरल, सहज और स्वस्थ होने लगता है ।

       योग केवल आसन और प्राणायाम तक ही सीमित नहीं है । वह एक जीवन-दृष्टि है - सजगता (चैतन्यता), समता और स्वीकार्यता की दृष्टि । जहां योग है वहाँ भोग सीमा में रहता है । भोग सीमा में रहेगा तो रोग प्रथम तो आएगा ही नहीं है और अगर आ भी जाएगा तो धीरे-धीरे विदा होने लगेगा ।

        महर्षि पतञ्जलि के योग-सूत्रों में एक सूत्र कहता है -

योगश्चित्तवृत्तिनिरोध: (1.2)

अर्थात् योग का अर्थ है - चित्त की चंचल वृत्तियों का शमन ।

            इन्द्रियों का संयमित आहार, उनका संतुलित विहार और चैतन्य- जीवन (होशपूर्वक जीवन) - यही योग है और यही दुःखों का नाश करने वाला है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Saturday, February 28, 2026

भोग, रोग और योग -9

 भोग, रोग और योग -9

         आयुर्वेद में रोग को केवल शारीरिक विकार ही नहीं माना गया है बल्कि इसमें अंतःकरण की भूमिका को भी स्वीकार किया गया है । आयुर्वेद कहता है - प्रज्ञापराध एव रोगाणां मूलकारणम् । अर्थात् विवेक का नाश ही रोगों का मूल कारण है । जहां भोगों पर विवेक को वरीयता दी जाती है, वहां रोग टिक ही नहीं सकता । आज चिकित्सालयों में जो रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है उसका अर्थ यह नहीं है कि रोग बढ़े हैं । इसके लिए हमारी जीवन-शैली उत्तरदायी है । हम रोग के निदान की विफलता के लिए चिकित्सक को ज़िम्मेवार ठहरा देते हैं परन्तु हमने जीवन में जो त्रुटि की है उस ओर हमारी दृष्टि कभी नहीं जाती ।

       यह रोग नहीं होकर हमारे लिए चेतावनी है कि हम प्रकृति के मार्ग (धर्म, ऋतु, स्वभाव आदि) से भटक रहे हैं । रोग केवल शारीरिक और मानसिक कमजोरी ही नहीं है बल्कि जीवन-शैली की चेतावनी है । रोग हमें बतलाता है कि हमने कहीं न कहीं प्रकृति के नियमों का उल्लंघन किया है । रोग को दण्ड न माने बल्कि आत्मा (स्वयं के भीतर) की पुकार मानें जो कह रही है - ‘ रुक जाओ, स्वयं की ओर लौट जाओ ।’ इस स्वयं की ओर लौटने की प्रक्रिया का नाम है - योग ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Friday, February 27, 2026

भोग, रोग और योग -8

 भोग, रोग और योग -8

            आवश्यकता की पूर्ति करना प्रकृति का दायित्व है । जब मनुष्य प्रकृति के विरुद्ध चलता है जैसे अति भोजन, अति भोग, अति तनाव, अति सोशल मीडिया आदि, तब शरीर और मन दोनों ही विद्रोह कर देते हैं । जब मनुष्य के जीवन की गति प्रकृति के नियमों के विरुद्ध चलने लगती है, तब शरीर और मन दोनों ही संकेत देने लगते हैं । ये संकेत ही रोग कहलाते हैं । मानसिक संकेत (रोग) आधि और शारीरिक संकेत व्याधि कहलाते हैं । 

     रोग जब आता है तब समझें कि शरीर और मन रोग के माध्यम से हमसे संवाद कर रहे हैं । हमें कम से कम रोग-दशा में तो इनकी बात सुननी ही चाहिए । भोग जब विवेकरहित हो जाता है तब रोग को जन्म देता है । 

       भगवान श्री कृष्ण कहते हैं - 

ध्यायतो विषयान् पुंस: संगस्तेषूपजायते ।

संगात् संजायते काम: कामात् क्रोधोऽभिजायते ।। गीता - 2.62 ।।

विषयों का निरंतर होने वाला चिंतन आसक्ति पैदा करता है, आसक्ति से कामना पैदा होती है । कामना से क्रोध और क्रोध से मनुष्य का पतन आरम्भ होता है ।

 क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।