Sunday, October 25, 2026

सम्भवामि युगे युगे -53

 सम्भवामि युगे युगे -53

                   कैकेई ने आगे कहा - ‘राम ! कोई भी पत्नी अपने पति का अपमान सहन नहीं कर सकती । मैं भी उस अपमान को सहन नहीं कर सकी । दिन-रात उस मुकुट की वापसी के लिए उपाय खोजती रहती । जब तुम्हारे राजतिलक का समय आया तो मेरी दशरथजी के साथ उसी मुकुट को लेकर चर्चा हुई । यह बात हम दो ही जानते थे । उसी समय मैंने तुरंत ही तुम्हें वन में भेजने का निर्णय कर लिया क्योंकि मैं जानती थी कि वन में रहने वाले वानरराज बाली से यदि मुकुट कोई वापस ला सकता है तो वह है, केवल राम । इस प्रकार तुम्हें वनवास देने का कलंक मैंने अपने सिर पर ले लिया ।’  

       आंखों में उतर आए आंसुओं को छिपाते हुए बोली कि मैं यह नहीं जानती थी कि तुम्हारे मोह में जकड़े महाराज हमें छोड़ जाएंगे । पता होता तो संभवतः मैं अपने प्रतिशोध का कोई दूसरा रास्ता खोजती । इस प्रकार कैकेई ने अपनी बात पूरी की और रोने लगी । भगवान ने कैकेई को सांत्वना दी और आश्वासन दिया कि शीघ्र ही वे राजमुकुट लेकर अयोध्या लौटेंगे । 

        चित्रकूट में तो भगवान सबसे अन्त कैकेई से मिले थे परंतु जब वनवास की अवधि पूरी कर राम लौटे तो सबसे पहले माता कैकेई से मिले और उनके चरणों में रघुवंश का राजमुकुट रख दिया । कैकेई ने राम को आशीर्वाद देते हुए हृदय से लगा लिया और राजमुकुट उनके सिर पर रखते हुए उसी समय अवध का राजा घोषित कर दिया । बाद में वशिष्ठ मुनि ने विधि विधान से राजतिलक किया ।

          कैकेई को आज जिस दृष्टि से देखा जा रहा है, वह उसके साथ अन्याय है । उन जैसी सुंदर, विदुषी, बहादुर स्त्री तत्कालीन समय कोई दूसरी नहीं थी । भगवान राम ने सदैव उनको प्राथमिकता दी है वह उनकी उदारता हो सकती है फिर भी कैकेई में भी तो कोई न कोई विशेषता रही होगी । हमें भी उसकी उपेक्षा करने का कोई कारण नहीं की मिलता फिर भी कैकई आज तक को हेय दृष्टि से देखा जाता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

Saturday, October 24, 2026

सम्भवामि युगे युगे -52

 सम्भवामि युगे युगे -52

         राम बोले - ‘वह कैसे मां ? आप अपने आपको इतने वर्षों तक अपमान का दुःख क्यों सहन करती रही ? आपका पुत्र राम आपके मन की  शांति के लिए कुछ भी कर सकता है, आप आदेश तो करें ।’ 

             कैकेई -  ‘जब राजतिलक का मुहूर्त निश्चित हो गया तब मैं और महाराज बड़े प्रसन्न थे । इधर राजतिलक होना है और उधर रघुवंश का मूल राजमुकुट तो बाली के पास है । बिना उस मुकुट के राजतिलक होना कैसे सम्भव है ?’ मैंने उसी समय निश्चित कर लिया था कि राजमुकुट को वापस लाने का उपयुक्त समय आ गया है । मंथरा की ईर्ष्या ने मेरे मन की इस उलझन को सुलझाने सहायता की । महाराज के पास मेरे पूर्व के दो वरदान सुरक्षित रखे थे । मेरे मन में भरत को राजा बनाना कभी था ही नहीं । इसलिए मैंने प्रथम वर के रूप में भरत के लिए राज्य माँगा क्योंकि मैं जानती थी कि वह तुम्हारे होते इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा । दूसरे वरदान के रूप में मैंने राम के लिए वनवास इस कारण से माँगा कि एक तो तुम स्वयं यही चाहते थे और दूसरा, मैं जानती थी कि उस मुकुट को लाना केवल राम के ही वश की बात है ।’

             कैकेई ने आगे कहा - ‘अब वन में आगे वानर राज बाली से तुम्हारा सामना होगा । तेरे पिताजी का मुकुट उनके पास है । तुम्हें वह मुकुट उसे पराजित करके लाना है ।’ ‘परंतु माते ! पिताजी का मुकुट उसके पास पहुँचा कैसे ?’ राम ने उत्सुक होकर पूछा । तब कैकेई ने बाली तक मुकुट पहुँचने की कथा विस्तार से बताई - 

         ‘तुम्हारे जन्म से भी बहुत पहले की बात है । एक बार अयोध्या के राजा दशरथ का मृगया के लिए वन में गए थे । रास्ते में उनका बाली से सामना हो गया । उस समय मैं (महारानी कैकेई) उनके साथ थी । मेरी सुंदरता पर बाली पहले से ही मुग्ध था । मुझे महाराज के साथ देखकर वह मुझे प्राप्त करने की जुगत लगाने लगा । इसके लिए उसे महाराज को परास्त करना आवश्यक था । बाली ने राजा दशरथ को युद्ध के लिए ललकारा क्योंकि वह जानता था कि उसे यह वरदान प्राप्त है कि उसकी दृष्टि जिस किसी पर भी पड़ेगी उसका आधा बल उसमें आ जाएगा ।  इस कारण से युद्ध में दशरथजी के सामने बाली भारी पड़ने लगा । युद्ध का परिणाम आने से पहले ही निश्चित हो गया था कि पराजय राजा दशरथ की ही होगी । पराजित राजा दशरथ के सामने बाली ने शर्त रखी कि या तो वे मुझे (कैकेई को) उसको सौंप दे अथवा अपना मुकुट यहाँ छोड़कर मुझे लेकर अयोध्या लौट जाए । मजबूर राजा को मुकुट बाली के पास छोड़ना पड़ा ।’

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

Friday, October 23, 2026

सम्भवामि युगे युगे -51

 सम्भवामि युगे युगे -51

             चित्रकूट में भरत का भगवान से मिलन होता है । भक्त-भगवान का मिलन । यह मिलन कोई साधारण मिलन नहीं है । भरत का चरित्र अनुकरणीय है, जिसमें प्रेम कूट कूट कर भरा है । कहा भी जाता है कि भाइयों में प्रेम हो तो भरत जैसा । भरत के चरित्र का वर्णन करना हो तो शब्द भी कम पड़ जाते हैं । 

           वसिष्ठजी, अयोध्यावासियों और माताओं के साथ भरतजी और रिपुदमन कुछ दिन चित्रकूट में रूकते हैं । जनकजी भी अपनी पत्नी सुनयनाजी के साथ वहाँ आ जाते हैं । सभी बैठकर कुछ वैकल्पिक रास्ता निकालने का प्रयास करते हैं परंतु विधाता ने जो निर्धारित कर दिया है, उसको परमात्मा भी टाल नहीं सकते । राम ने भी पिता के दिए दोनों वचनों की अनुपालना यथावत रखी । भरत ने राजसिंहासन के वास्तविक उत्तराधिकारी से उनकी चरण पादुका मांगी । पादुका को सिंहासन पर सम्मान के साथ रख कर ही वे शासन चलाएंगे । भरतजी ने तब तक ही राज्य सम्भालने की हामी भरी, जब तक राम अयोध्या लौट नहीं आते । 

           चरण पादुका लेकर अयोध्या के लिए प्रस्थान करने की तैयारी होने लगती है । राम एक एक कर सबको विदा करते हैं । सबसे अन्त में वे कैकेयी के पास पहुँचते हैं और उन्हें प्रणाम करते हैं । अपराध बोध से ग्रस्त होकर पश्चाताप की अग्नि में जल रही कैकेई पुत्र के सामने सिर झुका लेती है । राम उन्हें बड़े प्रेम से कहते हैं - ‘ माते ! किसी प्रकार का शोक करने की आवश्यकता नहीं है । आपने वनवास देकर मुझे ही उपकृत किया है । जीवन में मुझे जो काम करने है, वे सब कैसे होंगे, इसी सोच में डूबा मैं कोई राह तलाश रहा था । आपने पिताजी से मेरे लिए वन का राज्य माँगकर मेरी सारी दुविधा मिटा दी । माँ, आप दुःख नहीं करें, मैं आपका वही बालपन वाला प्रिय राम हूँ ।’ 

             कैकेई बोली - ‘पुत्र, मैं दुःखी नहीं हूँ । सांसारिक दृष्टि से मैं बहुत बुरी हूँ परन्तु सत्य क्या है, यह या तो मैं जानती हूँ अथवा तुम । आज मैं तुमसे अपने भीतर छिपा दर्द कह रही हूँ । यह मत समझना कि तुम्हें वनवास देने में केवल मन्थरा की भूमिका रही है अथवा तुम्हारी इच्छा थी । जब मुझे मंथरा बरगला रही थी उसी समय मेरे मन में तेरी कही बात जीवन्त हो उठी थी । मैं कई वर्षों से इसी अवसर की प्रतीक्षा कर रही थी । तेरे लिए महाराज से वनवास मांगने में मेरा भी एक स्वार्थ छिपा था । मेरे मन में कई दिनों से एक प्रतिशोध की आग जल रही है, पुत्र । उस आग को शान्त करने की कामना भी तुम्हारे वनवास की मांग के साथ जुड़ी है । मेरे अन्तर्मन में कई वर्षों से जल रही उस अग्नि को केवल तुम ही ठण्डा कर सकते हो ।’  

 क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Thursday, October 22, 2026

सम्भवामि युगे युगे -50

 सम्भवामि युगे युगे -50

            इधर गंगा पार आकर निषादराज देखते हैं कि जहां से सुमंत्रजी को विदा किया था, वे वहीं के वहीं खड़े विषाद में डूबे हुए हैं । समझाबुझाकर अपने चार व्यक्तियों को उनके साथ कर अयोध्या के लिए विदा करते हैं । सुमंत्र के अवध लौटने पर उनके साथ में राम को आया न देखकर दशरथ प्राण त्याग देते हैं । वसिष्ठ मुनि भरत शत्रुघ्न को ननिहाल से बुलवा लेते हैं और पिता का अंतिम संस्कार कराते हैं । परिवार की दशा देखकर बड़े दुःखी हैं, भरत । जब सभा जुड़ती है तब वशिष्ठजी भरत को विविध भांति समझाते हैं ।

        वसिष्ठजी भरत को समझाते हुए कह रहे हैं कि - ‘ संसार में हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश सब विधाता के हाथ में है । इसलिए तुम्हें इस संबद्ध में शोक करने की कोई आवश्यकता नहीं है । 

सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेउ मुनिनाथ ।

हानि लाभु जीवनु मरनु, जसु अपजसु बिधि हाथ ।। अयोध्याकाण्ड - 171 ।।

         राजा दशरथ ने अपना जीवन आदर्श स्थापित करते हुए जीया है और अपने वचनों को सत्य सिद्ध किया है, इसलिए उनके चले जाने पर तुम्हारा शोक करने का कोई कारण नहीं बनता । अब तुम अपने पिता द्वारा दिए गए वचन का मान रखते हुए अयोध्या का राज्य सम्भालो ।’

        भरत ने कहा - ‘गुरुवर ! आपने मुझे उचित सलाह दी है । परंतु कुछ भी करने से पूर्व मैं वन में जाकर भैया से मिलना चाहता हूँ । वे जैसा कहेंगे, फिर मैं वैसा ही करने को तैयार हूँ ।’ गुरु वसिष्ठजी ने मंत्रणा करते हुए दूसरे दिन राम से मिलने के लिए वन में चलने की आज्ञा दे दी । अयोध्या की ज़िम्मेवारी विश्वस्त अधीनस्थों को सौंपकर गुरु, माताओं और अयोध्यावासियों के साथ दोनों भाई वन की ओर चल पड़े ।

             निषादराज गुह को जब भरत के सेना सहित चित्रकूट की ओर जाने की सूचना मिली तो व्यथित हो गए । वे सोचने लगे कि कहीं भरत निष्कंटक राज्य की चाह में राम को राह से हटाने के लिए तो नहीं आ रहे हैं ? एक बुजुर्ग वनवासी ने सगुन देखकर निषादराज को भाइयों के होने वाले मिलन की वास्तविकता बताते हुए भरत का विरोध करने से रोक दिया । जब भरत से मिलना हुआ तब उनकी दशा देखकर गुह को बड़ा पश्चाताप हुआ । निषादराज साथ हो लेते हैं और चित्रकूट पहुंच जाते हैं । दूर से ही राम को देखकर भरत दण्डवत प्रणाम करते हैं । द्रवित हुए राम आगे बढ़ते हुए भरत को उठाकर हृदय से लगा लेते हैं ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, October 21, 2026

सम्भवामि युगे युगे -49

 सम्भवामि युगे युगे -49

         केवट, जिसे जन्मजन्मातरों तक प्रभु के चरणों की आस रही हो, उस आस से ही वह त्रेता में नाविक बना । जब आस पूरी हो चुकी है तो नाविक का व्यवसाय भी अब उसके लिए अर्थहीन हो चुका है । जिस नाव में साक्षात् परमात्मा-प्रकृति दोनों के एक साथ पांव पड़ चुके हैं, फिर किसी और के पांव पड़ने की आवश्यकता ही कहां रह जाती है ? केवट को अब किसी को पार नहीं ले जाना है । जो स्वयं पार हो चुका है वह तो पार कराने वाले की स्मृतियों के सहारे शेष रहे शारीरिक जीवन को भी बिता देगा । उसको विश्वास है राम के दिए गए उस आश्वासन पर कि वापसी में वे केवट से मिलने अवश्य आएंगे । जिसने एक बार उनके दर्शन का स्वाद चख लिया है, वह चाहकर भी उनको अपने से दूर नहीं कर सकता । अब राम आए अथवा नहीं, जीवन में कोई फ़र्क़ पड़ने वाला नहीं है ।

            केवट को विदा कर भगवान गुह को भी लौट जाने का कहते हैं परन्तु वह कुछ और दूरी तक साथ चलना चाहता है । यात्रा आगे बढ़ती है, संगम (प्रयागराज) के पास भारद्वाजजी से भेंट होती है । भारद्वाजजी, श्रीरामचरित मानस के एक श्रोता, जिनको याज्ञवल्क्यजी ने राम-कथा सुनाई । राम से बार-बार भेंट होती है फिर भी उस भेंट से अधिक रस भारद्वाजजी को राम-कथा सुनने में मिलता है । इसी का नाम भक्ति है । आगे चलते हुए यमुनाजी को पार कर वाल्मीकीजी के आश्रम में प्रवेश करते हैं । रहने के लिए उचित स्थान बताने की प्रार्थना करते हैं । वाल्मीकीजी को हंसी आ जाती है । वे कहाँ नहीं है अर्थात् सब स्थानों पर है, फिर भी मानव स्वभाववश अपने रहने के लिए स्थान पूछ रहे हैं, इससे अधिक आश्चर्य की बात क्या होगी ? फिर भी उत्तर दिया जाएगा क्योंकि प्रत्येक प्रश्न का उत्तर देना आवश्यक होता है । चित्रकूट नामक स्थान पर कुटिया बना कर निवास करने की सलाह दी जाती है ।

         चित्रकूट पहुँचकर निषादराज गुह ने पर्णकुटीर बना दिया है, यहाँ अब रामजी बारह वर्षों तक अपने भाई और भार्या के साथ निवास करेंगे । भगवान निषादराज को यहां से विदा कर देते हैं । रामजी के आने से पूर्व चित्रकूट के आसपास जब भी तपस्वी यज्ञादि करते थे उनके यज्ञ में बाधा डालने असुर आ जाते थे । भगवान ने उन्हें उनसे मुक्ति दिला दी है । अब सभी ऋषि-मुनि निर्भय होकर तपस्या, यज्ञादि कर्म करने लगे हैं ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Tuesday, October 20, 2026

सम्भवामि युगे युगे -48

 सम्भवामि युगे युगे -48

            कल्पना कीजिए, भगवान खड़े हैं, भक्त के सिर पर हाथ रखकर और भक्त उनके पैर पकड़े द्रवित हो रहा है । पतित होने से बचाने वाला आज स्वयं गिरने से बचने के लिए किसी का सहारा ले रहा है । केवट के दोनों हाथों में लड्डू हैं, सिर पर भगवान का हाथ और पकड़ने को उनके चरण । केवट की युग-युगों की चाह आज पूरी हो गई । अब उसे कुछ भी नहीं चाहिए । जिसने प्रभु के पांव पकड़ लिए, समझलो जीवन भर उनका हाथ उसके सिर पर आ गया । मां गंगा भी मुस्कुरा रही है क्योंकि जिनके पद-नख से उसका जन्म हुआ है, आज उसे उन्हीं के पद-दर्शन का अवसर जो मिला है ।

            जिसे समुद्र मिल जाए उसे फिर छोटे सरोवर आकर्षित नहीं करते । नदी से पार कराने की उतराई भी तो बनती है परन्तु तपस्वी वेश धारी परमात्मा के पास क्या है, देने के लिए ? कुछ नहीं क्योंकि परमात्मा के पास सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं होता । जिसके पास सब कुछ रहता है, वह भी स्वयं अपने स्तर पर किसी को कुछ दे नहीं सकता क्योंकि देने के लिए भी व्यवस्था भी परमात्मा के विधान के अनुसार ही होती है । यह विधान न तो टूटता है और न ही तोड़ा जा सकता है ।

                  हां, तो सांसारिक व्यवस्था के अनुसार केवट की उतराई तो बनती है परन्तु राम (परमात्मा) तो ख़ाली हाथ है । समझ जाती है, सीता (प्रकृति) । अवध से चलते समय सभी आभूषण उतार दिए थे परन्तु भूलवश एक अंगूठी साथ रह गई थी । नहीं, प्रकृति से कोई भूल नहीं होती, इसे तो दैवयोग ही कहा जा सकता है । इस अंगूठी की भी भविष्य में कोई न कोई भूमिका रहेगी, यह निश्चित है । तभी तो कहता हूँ कि प्रकृति ने सब कुछ पूर्वनियोजित कर रखा है । सब मायातीत की माया है । इसको समझने के लिए इसमें उलझना नहीं है बल्कि उसकी लीला देखकर प्रसन्न होते रहना है, फिर माया स्वतः ही धीरे-धीरे समझ में आती चली जाएगी ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Monday, October 19, 2026

सम्भवामि युगे युगे -47

 सम्भवामि युगे युगे -47

         हमारे में और केवट में कोई अंतर नहीं है । हम कभी धन में उलझ जाते हैं, कभी प्रियजनों की ममता में । उलझ गए हो तो भी सुलझने का प्रयास करते रहो, इस कछुए की तरह । सतयुग का कछुआ प्रभु चरणों के स्पर्श की चाह में आज त्रेता में गंगा तट पर केवट बनकर खड़ा है ।

          प्रभु की चाह भीतर हो तो प्रभु भी आपके पास चले आते हैं । तभी तो मैंने कहा है कि राम का वन गमन निरुद्देश्य नहीं है । किसी न किसी की चाह ने उनको वन में आने को विवश कर दिया है । प्रभु के चरणों की चाह अकेले केवट को ही नहीं है, इस यात्रा की राह में उनको ऐसे अनेक जन मिलेंगे जो जन्मजन्मांतरों से प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं । आज एक भक्त की चाह पूरी हो रही है, कल किसी ओर की होगी, ऐसे होते होते एक दिन अपना भी नंबर आ जाएगा । इसलिए चाह को बढ़ाते रहो, व्याकुलता के साथ । फिर देर होने का प्रश्न ही नहीं है । 

          प्रभु को तट पर आया देखकर आज केवट भी अकड़ रहा है । संसार सागर से पार जाना है, उससे पहले प्रभु को नदी पार करानी होगी । ‘प्रभु ! आपने आने में बहुत देर कर दी । अब थोड़ी प्रतीक्षा आपको मैं भी करवाऊँगा । बिना पैर धोए गंगा पार नहीं ले जाऊंगा ।’ बहाना भी कैसा, बिलकुल बाल सुलभ बहाना । ‘आपके पैरों की रज से पत्थर भी सुंदर स्त्री (अहिल्या) बन जाती है, मेरे पास तो जीवनयापन का सहारा एक मात्र यह नाव ही तो है, इसको किसी भी क़ीमत पर नारी बनाकर खोना नहीं चाहता । पैरों को पूर्ण रूप से रज-मुक्त किए बिना नाव में नहीं चढ़ाने वाला । आज चाहे रमा (सीता) बाधा बने, चाहे शेषजी (लखन) मुझ पर क्रोधित हों ।’

          लक्ष्मण बहुत कुछ बोलना चाहते हैं परन्तु भैया के सामने विवश हैं । सीता भी क्या करती जब पति ही केवट की बाल सुलभ हठ में रस ले रहे हों । भक्त की बात सुनकर भगवान भी भाव विभोर हो जाते हैं । केवट की बात सुनकर राम मुस्कुरा उठे । आज भक्त की ज़िद्द के आगे भगवान को झुकना पड़ रहा है । सूरज की बढ़ती तपिश को देखकर भगवान केवट को चरण धोने की आज्ञा दे देते हैं । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।