आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -74
भगवान कहते है कि संसार में जिनको आप अपना कहते हैं, उन सबको अपने मन सहित मेरे चरणों में डाल दो । हम जब अपने केंद्र में परमात्मा को रखेंगे तब सब कुछ परमात्मा का ही होगा । फिर एक परमात्मा ही अपने होंगे, दूसरा कोई अपना नहीं होगा । यही परमात्मा से अपनापन है ।
स्वामीजी ‘परमात्मा से अपनापन’ को स्पष्ट करते हुए प्रत्येक बार मीरा बाई का उदाहरण देते हैं । मीरा बाई कहती है - ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’ । यहाँ तो दूसरों को भी अपना माने बैठे हैं, फिर मीरा बाई की स्थिति में कैसे पहुंचेंगे ? हम तो इस संसार के बने बैठे हैं । हम यह नहीं जानते कि संसार में हो रहे परिवर्तन को देखने वाला स्वयं अपरिवर्तनीय है । न बदलने वाला ही बदलाव का अनुभव कर सकता है, ऐसे में हम संसार के कैसे हुए ? हम शरीर के बदलने का अनुभव कर रहे हैं, इसका अर्थ है कि हम शरीर नहीं हैं । फिर इस शरीर और शरीर से संबंधित व्यक्ति, विषयों और पदार्थों को अपना क्यों कहते हैं ? इस बात का ज्ञान होते ही परिवर्तित हो रहे संसार से तो आसक्ति की समाप्ति और अविनाशी परमात्मा में अनुरक्ति हो जाएगी ।
केवल एक परमात्मा ही अपरिवर्तनशील है इसलिए हम परमात्मा से एक हैं और प्रतिपल बदलने वाले संसार से भिन्न हैं । जिस प्रकार हम संसार के मोह में फँसकर आसक्त हुए बैठे थे, इस बात का ज्ञान होते ही संसार से अनासक्त होकर परमात्मा से प्रेम करने लगेंगे । परमात्मा से प्रेम करना, उन्हें अपना मानना और उनसे अपनापन होना ही अनुरक्ति है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।