Tuesday, March 17, 2026

ज्ञान -10

 ज्ञान -10

          याज्ञवल्क्यजी ने कुछ देर सोचा और गार्गी से फिर एक प्रश्न किया । ‘किसी की चिंता करना बन्धन है या प्रेम ?’ गार्गी को ऐसे प्रश्न की अपेक्षा नहीं थी । वह बोली - ‘प्रेम भी तो एक बन्धन है, महर्षि ।’ महर्षि ने कहा - ‘नहीं गार्गी, सच्चा प्रेम हो तो मुक्त कर देता है । जब प्रेम में स्वार्थ प्रबल हो जाता है तो वह बंधन बन जाता है । इसलिए समस्या प्रेम नहीं है बल्कि स्वार्थ पर आधारित प्रेम है ।” गार्गी ने कहा - ‘प्रेम सदा स्वार्थ पर ही आधारित होता है, महर्षि ।’

        “नहीं, ऐसी बात नहीं है, गार्गी । प्रेम से जब आकांक्षाएँ जुड़ने लगती है, तब स्वार्थ का जन्म होता है । जिस प्रेम में अपेक्षाएं न हो, जो प्रेम केवल देना जानता हो, केवल वही प्रेम मुक्त करता है ।” याज्ञवल्क्य ने गार्गी को स्पष्ट किया । गार्गी ने कहा - ‘सुनने में आपके शब्द प्रभावित अवश्य करते हैं महर्षि, परंतु क्या आप ऐसे निःस्वार्थ प्रेम का कोई उदाहरण दे सकते हैं ?’

     याज्ञवल्क्यजी कह रहे हैं, “आँखें खोलो गार्गी और देखो, यह सारा जगत् निःस्वार्थ प्रेम का जीता जागता प्रमाण ही तो है । सूर्य से किरणों के माध्यम से मिल रही ऊर्जा पृथ्वी पर जीवन उत्पन्न करती है । यह पृथ्वी सूर्य से कुछ माँगती है क्या ? यह तो सूर्य के प्रेम में खिलना जानती है । न ही सूर्य पृथ्वी पर अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास करता है और न ही बदले में पृथ्वी से कुछ चाहता है । सूर्य तो स्वयं को जलाकर समस्त संसार को जीवन देता है । यही निःस्वार्थ प्रेम है गार्गी ।” 

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Monday, March 16, 2026

ज्ञान -9

 ज्ञान -9

          प्रस्तुत है गार्गी और याज्ञवल्क्य के मध्य हुए कुछ अन्य प्रश्न और उत्तर, संवाद रूप में, जिनका वर्णन बृहदारण्यक उपनिषद् में विस्तार से किया गया है । ये प्रश्न आत्म-बोध की यात्रा में एक गृहस्थ का मार्गदर्शन करते हैं । गार्गी पूछ रही है कि महात्मन् ! ऐसा माना जाता है, स्वयं को जानने के लिए, आत्म-बोध के लिए ब्रह्मचर्य अनिवार्य है परन्तु आप तो ब्रह्मचारी नहीं हैं । आप स्वयं के दो दो पत्नियां हैं । क्या ऐसा नहीं लगता कि आप एक अनुचित उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं ?

           प्रश्न का उत्तर देने के स्थान पर याज्ञवल्क्य जी गार्गी से ही प्रतिप्रश्न करते हैं, ‘गार्गी ! ब्रह्मचारी कौन होता है ?’ गार्गी कहती है कि ब्रह्मचारी वह है, जो परम सत्य की खोज में लगा है । ‘फिर तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि एक गृहस्थ परम सत्य तक नहीं पहुँच सकता ।’ याज्ञवल्क्य ने पूछा । गार्गी कहती है कि ब्रह्मचारी स्वतंत्र होता है और गृहस्थ बंधन में । केवल स्वतन्त्र ही परमसत्य की खोज कर सकता है । विवाह को तो बन्धन कहा जाता है । याज्ञवल्क्य फिर प्रश्न करते हैं, ‘ क्या विवाह बन्धन है ?’ गार्गी ने कहा -‘निःसंदेह’ क्योंकि वैवाहिक जीवन में व्यक्ति को औरों का भी ध्यान रखना पड़ता है । पहले पत्नी की चिंता, फिर संतान की चिंता । इस प्रकार सांसारिक चिंताओं से घिरे व्यक्ति को आत्म-चिंतन के लिए समय ही कहाँ मिल पाता है ऐसे में वह मुक्त कैसे हो पाएगा ?’ 

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, March 15, 2026

ज्ञान -8

 ज्ञान -8

        याज्ञवल्क्य ने कहा- ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गी।’ अर्थात् हे गार्गी ! कोई अक्षर, अविनाशी तत्व है जिसके प्रशासन में, अनुशासन में सभी कुछ ओतप्रोत है । गार्गी ने पूछा कि यह सारा ब्रह्माण्ड किसके अधीन है तो याज्ञवल्क्य का उत्तर था- अक्षर तत्व के । इस बार याज्ञवल्क्य ने उपस्थित सभासदों को अक्षरतत्व के बारे में विस्तार से समझाया ।

          इस बार गार्गी अपने प्रश्नों के जवाब से इतनी प्रभावित हुई कि जनक की राजसभा में उसने याज्ञवल्क्य को परम ब्रह्मिष्ठ मान लिया । इसके बाद गार्गी ने याज्ञवल्क्य की प्रशंसा कर अपनी बात खत्म की तो सभी ने माना कि गार्गी में जरा भी अहंकार नहीं है । गार्गी ने याज्ञवल्क्य को प्रणाम किया और सभा से विदा ली । गार्गी का उद्‍येश्य ऋषि याज्ञवल्क्य को हराना नहीं था बल्कि अपने ज्ञान में अभिवृद्धि करना था ।

         जैसे कि पहले ही कहा गया है कि गार्गी वेदज्ञ और ब्रह्मज्ञानी थी, वे सभी प्रश्नों के जवाब जानती थी । यहां इस कहानी को बताने का तात्पर्य यह है कि अर्जुन के प्रश्नों से जैसे श्रीमदभगवद्गीता अस्तित्व में आई वैसे ही गार्गी के प्रश्नों के कारण 'बृहदारण्यक उपनिषद्' के मंत्रों का निर्माण हुआ ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Saturday, March 14, 2026

ज्ञान -7

 ज्ञान -7

       गार्गी को अपने प्रतिद्वन्द्वी यानी याज्ञवल्क्य से अब आगे केवल दो ही प्रश्न पूछने हैं । इस प्रकार उपरोक्त प्रश्न पूछते हुए गार्गी ने अगले प्रश्न के लिए बड़ी ही अच्छी भूमिका बांधी है ।

           गार्गी अब अपने दो प्रश्न पूछ रही है । 'ऋषिवर सुनो ! जिस प्रकार काशी या मिथिला का नरेश एक साथ दो अचूक बाणों को धनुष पर चढ़ाकर अपने दुश्मन पर लक्ष्य साधता है, वैसे ही मैं भी आपसे केवल दो ही प्रश्न पूछती हूँ ।’ गार्गी बड़ी ही आक्रामक मुद्रा में आ गई । याज्ञवल्क्य ने कहा- ‘हे गार्गी, जितने भी प्रश्न पूछने हैं, सब पूछ डालो ।’

           गार्गी ने एक साथ दो प्रश्न पूछ डाले - 'स्वर्गलोक से ऊपर जो कुछ भी है और पृथ्वी से नीचे जो कुछ भी है और इन दोनों के मध्य जो कुछ भी है - वह, तथा जो हो चुका है और जो अभी होना है, ये दोनों किसमें ओतप्रोत हैं ?'

           गार्गी का पहला प्रश्न 'स्पेस' (अंतरिक्ष) और दूसरा 'टाइम' (समय) के बारे था । स्पेस और टाइम के बाहर भी कुछ है क्या ? नहीं है, इसलिए गार्गी ने बाण की तरह पैने इन दो प्रश्नों के जरिए यह पूछ लिया कि सारा ब्रह्माण्ड किसके अधीन है ?

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Friday, March 13, 2026

ज्ञान -6

 ज्ञान -6

            उपस्थित सभी सभासदों की सहमति मिलते ही गार्गी ने ऋषि याज्ञवल्क्य जी को संबोधित करते हुए प्रश्न पूछने प्रारंभ किए । गार्गी का प्रश्न: 'हे ऋषिवर ! जल के बारे में कहा जाता है कि हर पदार्थ इसमें घुलमिल जाता है तो यह जल स्वयं अंततः किसमें जाकर मिल जाता है ?’ गार्गी का यह पहला प्रश्न बहुत ही सरल था । याज्ञवल्क्यजी जैसे ज्ञानी से इतना सरल प्रश्न करना उनकी गरिमा के अनुकूल भी नहीं था फिर भी उन्होंने इसका उत्तर देते हुए कह दिया कि जल अन्तत: वायु में ओतप्रोत हो जाता है । तभी गार्गी ने पूछ लिया कि फिर वायु किसमें जाकर मिल जाती है और याज्ञवल्क्य का उत्तर था कि अंतरिक्ष लोक में ।

              गार्गी यहीं पर ही नहीं रूकी । वह याज्ञवल्क्य के द्वारा दिए गए प्रत्येक उत्तर को फिर से एक नए प्रश्न में बदलती गई और इस तरह गंधर्व लोक, आदित्य लोक, चन्द्रलोक, नक्षत्र लोक, देवलोक, इन्द्रलोक, प्रजापति लोक और यहाँ तक कि ब्रह्मलोक तक भी जा पहुंची और अन्त में गार्गी ने अति महत्वपूर्ण प्रश्न पूछ ही लिया कि यह ब्रह्मलोक किसमें जाकर मिल जाता है ?

            ब्रह्मलोक का न आदि है और न ही अन्त । ऐसा प्रश्न करना गार्गी की प्रतिभा के अनुसार उचित भी नहीं था । गार्गी पर क्रोधित होकर याज्ञवक्ल्य ने कहा, 'गार्गी, माति प्राक्षीर्मा ते मूर्धा व्यापप्त्त्’ अर्थात् गार्गी, इतने प्रश्न मत करो, कहीं ऐसा न हो कि इससे तुम्हारा मस्तक फट जाए । अच्छा वक्ता वही होता है जिसे पता होता है कि कब बोलना और कब चुप रहना है और गार्गी अच्छी वक्ता थी इसीलिए क्रोधित याज्ञवल्क्य की फटकार भी चुपचाप सुनती रही ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Thursday, March 12, 2026

ज्ञान -5

 ज्ञान -5

          याज्ञवल्क्य की बात का प्रतिकार करने के लिए विदुषी गार्गी सामने आई । उसने उपस्थित सभी लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि मैं याज्ञवल्क्य जी से कुछ प्रश्न करूँगी । यदि उन्होंने उन प्रश्नों के उत्तर दे दिए तो फिर इस सभा में उपस्थित कोई भी इनको नहीं हरा सकेगा और वे इन गायों को लेने के अधिकारी होंगे ।

            तत्पश्चात् गार्गी ने याज्ञवल्क्यजी से कई प्रश्न किए । इन प्रश्नोत्तरों का विस्तार से वर्णन बृहदारण्यक उपनिषद् में मिलता है । याज्ञवल्क्यजी से शास्त्रार्थ प्रारम्भ करते हुए गार्गी ने पूछा कि हे ऋषिवर ! क्या आप अपने को सबसे बड़ा ज्ञानी मानते हैं, जो आपने गायों को हांकने के लिए अपने शिष्यों को आदेश दे दिया ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर देते हुए कहा कि मां ! मैं स्वयं को ज्ञानी नहीं मानता क्योंकि ‘‘मैं सबसे बड़ा ज्ञानी हूँ” ऐसा कोई अज्ञानी ही कह सकता है । ये गौएँ सुबह से यहाँ खड़ी-खड़ी थककर परेशान हो गई हैं, इस कारण इन गायों को देखकर मेरे मन में मोह उत्पन्न हो गया है । उत्तर सुनकर गार्गी ने कहा कि आपको मोह हुआ, लेकिन इस पुरस्कार को प्राप्त करने के लिए यह तो कोई योग्य कारण नहीं है । सभी सभासदों की आज्ञा हो तो मैं आपसे कुछ प्रश्न पूछना चाहूंगी । यदि आप इनके संतोषजनक जवाब दे पाएंगे तो आप इन गायों को निश्चित ही ले जा सकते हैं । 

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, March 11, 2026

ज्ञान -4

 ज्ञान -4

         प्राचीन काल में शास्त्रार्थ हुआ करते थे । ये शास्त्रार्थ ज्ञान में अनुभवसिद्ध पुरुषों के मध्य हुआ करते थे । इसका लाभ यह होता था कि शास्त्रार्थ में भाग लेने वालों के साथ-साथ श्रोताओं को भी इसका लाभ मिलता था । भारत में पुरुषों के साथ ही महिला दार्शनिकों तथा साध्वियों की भी एक लम्बी परंपरा रही है । गार्गी, मैत्रेयी, वाक्, घोषा, अपाला आदि इसके उदाहरण है । आज ज्ञान के प्रसंग में हम गार्गी और मैत्रेयी की बात करेंगे । गार्गी का पूरा नाम गार्गी वाचकन्वी है, वे गर्गवंशी ऋषि वचकन्व की पुत्री थी । इसी प्रकार मैत्रेयी ऋषि ‘मित्र’ की पुत्री और ऋषि याज्ञवल्क की पत्नी थी । दोनों ही ब्रह्मज्ञानी थी ।

          एक बार राजा जनक ने अपने यहाँ शास्त्रार्थ का आयोजन किया । उन्होंने राजद्वार पर सोने की मोहरों से मढ़े सींगों वाली एक सहस्र गाएं खड़ी कर दी और घोषणा कर दी कि जो भी शास्त्रार्थ में जीतेगा, वह इन गौओं को पाने का अधिकारी होगा । शास्त्रार्थ चल रहा था परन्तु अभी तक कोई निर्णय न हो सका था । सुबह से राजद्वार पर खड़ी गाएँ भूख-प्यास से थकने लगी थी । तभी ऋषि याज्ञवल्क्य जी का वहाँ आना हुआ । गौओं को ले जाने की शर्त सुनकर उन्होंने अपने शिष्यों को उन थकीहारी गौओं को हांककर अपने आश्रम ले जाने का आदेश दिया । इस बात का शास्त्रार्थ में उपस्थित कई लोगों ने विरोध किया । 

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।