Friday, June 12, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -19

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -19

         अपने पुत्र के मुंह से दूसरे की निंदा सुनकर संत बड़े आहत हुए । सूफी संत ने अपने पुत्र से कहा -“ बेटा, इन सोये हुए लोगों की इस प्रकार आलोचना करने से बेहतर था कि तुम भी इनकी तरह सोये हुए ही रहते, कम से कम तुम्हें किसी का दोष तो दिखलाई नहीं पड़ता ।” इतना कहकर वे चुप हो गए और परमात्मा के नाम का स्मरण करते हुए मस्जिद की तरफ बढ़ने लगे । सूफी संत ने अपने पुत्र से सत्य ही कहा था । अगर उनका पुत्र भी नींद में सोया रहता तो कम से कम उसे किसी व्यक्ति में दोष तो दिखलाई नहीं पड़ता । 

          हम चाहे कितनी भी ईश्वर से प्रार्थना कर लें, अगर हमारा मन निर्मल नहीं है तो हमारी वह प्रार्थना ईश्वर तक पहुँच ही नहीं सकती । हम ईश्वर की प्रार्थना करते हुए स्वयं को अन्य लोगों से ऊँचा समझने लगते हैं और दूसरे व्यक्तियों में दोष ढूँढने लगते हैं । वास्तव में किसी भी व्यक्ति में केवल दोष ही दोष नहीं होते बल्कि साथ में कुछ गुण भी होते हैं । भाईजी श्री हनुमान प्रसादजी पोद्दार कहते हैं कि किसी को बुरा न समझें । दूसरे को बुरा समझेंगे तो आप में वह बुराई पहले ही आ जाएगी ।

          आध्यात्मिक पथ पर चल रहे व्यक्ति भी अपने आपको दूसरे से आगे होने का भ्रम पाले रहते हैं । दूसरों से स्वयं को श्रेष्ठ समझना भी एक विकार है । इस विकार को साथ रखकर परमात्मा के मार्ग पर आगे बढ़ते रहने के स्थान पर आप भटक सकते हैं, इस बात को सदैव स्मृति में रखना होगा ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Thursday, June 11, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर - 18

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -18 

      विरक्ति में तो मनुष्य कर्तव्य कर्म का भी त्याग कर देता है । ऐसे में शरीर निर्वाह होना भी कैसे संभव होगा ? एक गृहस्थ का इस प्रकार सोचना उचित ही है । अतः एक गृहस्थ के लिए कर्तव्य कर्म के त्याग के साथ - साथ नियत कर्म करते रहना अधिक उचित है । इस प्रकार यह समझा जा सकता है कि एक गृहस्थ के लिए विरक्त होने के स्थान पर अनासक्त होना अधिक सहज है । 

          प्राचीन समय की बात है । एक सूफी संत नित्य सुबह की नमाज अता करने के लिए घर से थोड़ी दूर स्थित एक मस्जिद में जाया करते थे । उनका प्रतिदिन का यह एक नियम बन गया था । उनको प्रतिदिन इस प्रकार मस्जिद जाते हुए देखकर उनका छोटा पुत्र भी कभी- कभी उनके साथ हो जाया करता था । धीरे-धीरे उनके पुत्र की भी यह एक आदत हो गयी । संत उसे अपने साथ ले जाते और रास्ते में चलते हुए अपने पुत्र को ज्ञान की बातें बताते रहते । पुत्र भी उनकी बातें सुनकर बड़ा प्रसन्न होता और प्रदत्त ज्ञान को आत्मसात करने का प्रयास करता । 

            सर्दियों के दिन थे । जब संत और उनका पुत्र, दोनों प्रतिदिन सुबह की नमाज के लिए मस्जिद जा रहे होते तब प्रायः देखते कि लोग उस समय तक गहरी नींद में ही सोये रहते । उनके पुत्र को यह बड़ा बुरा लगता । आखिर एक दिन उनके पुत्र से रहा नहीं गया । वह अपने पिता से बोल पड़ा - ‘कितने काफ़िर हैं ये लोग, जो सुबह उठकर नमाज तक नहीं पढ़ सकते । खुदा अवश्य ही उन्हें दोजख में भेजेगा ।’

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, June 10, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -17

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -17

           किसी भी क्षेत्र में कर्म करने के प्रारम्भिक काल में हमारी निष्ठा में कभी कोई कमी नहीं रहती है परन्तु प्रारब्ध (Destiny) के फलस्वरूप मिलने वाले कर्म-भोग के प्रति बनता हुआ आसक्ति भाव हमारी निष्ठा को धीरे-धीरे कमजोर करता जाता है । जब यह निष्ठा, लोभ (Greed) में परिवर्तित हो जाती है तब अनासक्ति आसक्ति में परिवर्तित हो जाती है । एक चिकित्सक की आसक्ति कई क्षेत्रों में हो सकती है जिसमें धन, मान-सम्मान की चाहना आदि प्रमुख हैं । हमें इन सब बातों को एक ओर रखकर अपने क्षेत्र के कार्य को कर्तव्य कर्म समझकर सम्पादित करना होगा तभी हम स्वयं को प्रत्येक प्रकार की आसक्ति से मुक्त रख पाएंगे । 

            विरक्ति में तो कर्तव्य-कर्म का भी त्याग करना पड़ता है जबकि अनासक्ति में केवल आसक्ति को त्यागना होता है, कर्तव्य-कर्म को नहीं । अतः निष्ठा पूर्वक कर्तव्य कर्म करते रहना ही अनासक्त होना है । भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते भी हैं कि-

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण: ।

शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मण: ।। गीता – 3/8 ।।

अर्थात हे अर्जुन, तू नियत कर्तव्य कर्म कर; क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी संभव नहीं होगा ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Tuesday, June 9, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -16

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -16

             तुलाधार वैश्य के इस दृष्टान्त से अनासक्त होने का प्रथम सूत्र निकलकर सामने आता है – ‘निष्ठा पूर्वक कर्तव्य कर्म करना’ । निष्ठा पूर्वक कर्म करते रहना ही अनासक्ति है । हमारा कर्म क्या है, यह पूर्वजन्म के पुरुषार्थ (प्रारब्ध) के द्वारा पहले से ही निश्चित किया जा चुका है । उसी के अनुसार हम अपना जीवन प्रारम्भ करते है और जीवन में कर्मों का प्रारम्भ भी इसी प्रारब्ध को अभिव्यक्त करने के लिए होता है । पूर्वजन्म के पुरुषार्थ के कारण ही आज मैं एक चिकित्सक हूँ, इसका अर्थ यह है कि रुग्ण व्यक्तियों की चिकित्सा करना मेरा कर्तव्य कर्म है । मुझे अपना निर्धारित कर्तव्य कर्म निष्ठा पूर्वक करते रहना चाहिए, तभी मैं अनासक्त हो सकता हूँ । 

            मेरी निष्ठा (Loyalty) में रही कोई कमी, धन, जन, मान-सम्मान आदि के प्रति मेरी आसक्ति को ही प्रदर्शित करेगी । जब आप निष्ठा पूर्वक कर्म करेंगे तो फिर न तो आप अपने कर्म के प्रति आसक्त हो सकते हैं और न ही उस कर्म से विरक्त । फिर प्रत्येक रुग्ण व्यक्ति का मन लगाकर उपचार करना ही जीवन का एक मात्र उद्देश्य बन जायेगा और प्रत्येक स्थिति में मैं अपने आपको खुश रख सकूंगा ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Monday, June 8, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -15

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -15 

           तुरंत ही वह व्यक्ति वहां से निकलकर सीधा तुलाधार के पास जा पहुंचा । तुलाधार एक व्यवसायी था । वह बड़ा ही प्रसन्न नज़र आ रहा था और अपने पास आये ग्राहकों को तौल-तौल कर सामान दे रहा था । उस व्यक्ति ने तुलाधार को अपने आने का प्रयोजन बताया और कहा कि तथागत ने आपसे वह सूत्र प्राप्त करने को कहा है, जिसको पाकर आप आनंदित अवस्था को उपलब्ध हुए हैं । तुलाधार ने उसे प्रेम पूर्वक अपने पास बैठाया और एक ग्राहक के लिए सामान तौलते हुए कहा कि ‘इस तराजू के कांटे की ओर देखो । इसे सदैव मध्य में बनाये रखने से ही ग्राहक और व्यवसायी के मध्य सामंजस्य बैठ पाता है और दोनों खुश रह सकते हैं अन्यथा नहीं । मैंने तो तराजू के इसी कांटे से सीख ली है कि सदैव मध्य में रहने से ही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सामंजस्य बिठाया जा सकता है । इस प्रकार मध्य में रहने से ही हम परम आनंद की अवस्था को उपलब्ध हो सकते हैं ।’

           तुलाधार की बातों का उस व्यक्ति पर कितना प्रभाव पड़ा, कह नहीं सकता परन्तु बड़ी मार्मिक बात कही थी, तुलाधार ने । तराजू का कांटा सामान और उसको तौलने वाले बाट के मध्य एक प्रकार की साम्यता निश्चित करता है । न कम और न ही अधिक, यही समता है । जहां न तो आसक्ति है और न ही विरक्ति, वहीं समता है । समता ही अनासक्ति है । तुलाधार के मन में धन के प्रति आसक्ति भाव होता तो तराजू का कांटा कभी भी मध्य में नहीं रहता, कांटा सदैव एक ओर ही झुका रहता ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, June 7, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -14

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -14

             इतने विवेचन से यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि मन की ही ये तीन अवस्थाएं है, आसक्ति, अनासक्ति और विरक्ति । मन को नियंत्रित करना अर्थात आसक्त मन को अनासक्त अथवा विरक्त मन में परिवर्तित करना कैसे संभव हो सकता है, यह मुख्य प्रश्न है । मन को हमारा शरीर (इंद्रियाँ) नियंत्रण में तभी ले पाता है, जब हम कोई कर्म इस शरीर से करते हैं । अतः मन को नियंत्रण में लेने के लिए कर्म के स्वरूप को परिवर्तित करना होगा । 

           आइये, एक बार पुनः तथागत की ओर चलते हैं । एक बार भगवान बुद्ध के पास एक व्यथित व्यक्ति आया । अपने वर्तमान जीवन से वह बड़ा ही क्षुब्ध था । कभी वह अपनी पत्नी की शिकायत कर रहा था और कभी वह अपने पुत्रों के द्वारा आदेश की अवहेलना करने की बात कह रहा था ।    

                 आस-पास के लोगों और रिश्तेदारों से उसका सम्बन्ध मधुर नहीं है, जिससे वह बड़ा व्यथित था । उसने अपने मन की व्यथा भगवान बुद्ध के सामने प्रकट की और कहा कि वह जीवन में कुछ भी निश्चित नहीं कर पा रहा है । वह चाहता था कि भगवान बुद्ध उसे कोई ऐसा सूत्र दे जिसको जीवन में उतार कर वह इस दुविधा से बाहर निकल सके । भगवान बुद्ध ने कहा - “मेरे पास तो ऐसा कोई सूत्र नहीं है । हाँ, पास में ही एक वैश्य है - तुलाधार; उसके पास इसका एक सूत्र अवश्य है । आप चाहें तो उसके पास जाकर वह सूत्र प्राप्त कर सकते है और अपने जीवन में खुशियां भर सकते हैं ।”

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Saturday, June 6, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -13

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -13

             मन का एक निश्चित कर्म फल (भोग) और कर्म (भोग प्राप्ति के लिए) की तरफ झुक जाना ही आसक्ति है । कर्म फल में आसक्त होने से हमारी कामनाएं और अधिक बढ़ती हैं, कामनाएं अपेक्षा (Expectations) को जन्म देती है और फिर अपेक्षा आप से अथवा आपकी कामनाओं की पूर्ति जिनसे होनी है, उन सभी के प्रति आपको आसक्त (Attach) कर देती है । अगर हम किसी भी प्रकार के कर्म के फल (भोग) की आशा मन में न संजोयें, तो हमारा मन न तो किसी कर्म फल (भोग) में आसक्त होगा और न ही इस शरीर को किसी विशेष कर्म को करने के लिए प्रेरित करेगा ।

         बार-बार मन के अनुसार कर्म के लिए प्रेरित करने से शरीर भी मन के अनुसार अपने आपको ढाल लेता है । जब एक बार मन के अनुसार शरीर ढल जाता है तो फिर बुद्धि द्वारा मन को नियंत्रित करना लगभग असंभव हो जाता है । इसलिए प्रारम्भिक स्तर पर ही बुद्धि से मन को नियंत्रित कर लेना अधिक सुगम रहता है । प्रारम्भिक अवस्था में बुद्धि आत्मा (आप स्वयं) के अनुसार कार्य करती है और मन को अपने अधीन बनाये रख सकती है परन्तु जब शरीर एक बार मन के अनुसार स्वयं को ढाल लेता है, तो फिर बुद्धि का मन पर से नियंत्रण लगभग समाप्त हो जाता है । मन के अनुसार कर्म करना आसक्ति पैदा करता है जबकि बुद्धि के अनुसार कर्म करना आपको अनासक्ति की ओर ले जाता है ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।