आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -59
अष्टावक्र महाराज राजा जनक को कह रहे हैं –
न त्वं विप्रादिको वर्णों नाश्रमी नाक्षगोचरः ।
असंगोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव ।। अष्टावक्र गीता - 1/5 ।।
अर्थात हे जनक, तुम ब्राह्मण आदि जातियों वाले नहीं हो । न तुम वर्णाश्रम आदि धर्मों वाले हो । न तुम चक्षु आदि इन्द्रियों के विषय हो, किन्तु तुम इन सबके साक्षी और असंग हो एवं तुम आकार से रहित हो और सम्पूर्ण विश्व के साक्षी हो । ऐसा अपने को जानकर सुखी और संसार रुपी ताप से रहित हो जाओ ।
अष्टावक्र जी का यह कहना कि तुम किसी विशेष जाति अथवा वर्ण के नहीं हो और न ही तुम नेत्र आदि इन्द्रियों के विषय हो, न तुम किसी विशेष आकार के हो; इसका अर्थ है कि जाति, वर्ण, इन्द्रिय-विषय और आकार ये सभी शरीर के साथी है । आत्मा इन सबसे अलग है, असंग है । हमें मिलने वाला शरीर प्रत्येक नए जीवन में बदलता रहता है । आज मेरा यह भौतिक शरीर एक ब्राह्मण का है, अगले जन्म में ब्राह्मण के शरीर की तो बात ही क्या, यह भी पता नहीं है कि मनुष्य का भी शरीर मिल पायेगा अथवा नहीं । अतः स्वयं को शरीर न समझकर आत्मा समझो । आत्मा केवल साक्षी है । आत्मा शरीर, उसकी जाति, उसके वर्ण और आकार आदि को साक्षी भाव से देखती अवश्य है परन्तु शरीर से सदैव असंग बनी रहती है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
शरणम् ।।