Sunday, April 12, 2026

मुक्ति अथवा भक्ति -12

 मुक्ति अथवा भक्ति -12 

       अब तक हुए विवेचन से आपको भी अनुभव हुआ होगा कि ज्ञान मार्ग से ज्ञान की उच्चावस्था (परमात्मा) तक पहुंचने के लिए कितना तामझाम करना पड़ता है । ज्ञान-मार्ग सुगम नहीं है । यही कारण है कि साधक की बीच रास्ते ही इससे विमुख होने की सम्भावना रहती है । मानस में काकभुशुण्डिजी गरुड़ज़ी को कहते हैं - 

           ग्यान पंथ कृपान कै धारा । परत खगेस होइ नहीं बारा ।।

           जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई । सो कैवल्य परम पद लहई ।। मानस -7/119/1।।

        ज्ञान-मार्ग कृपाण की धार पर चलने के समान है । इससे गिरते देर नहीं लगती । जो इस पंथ को बिना किसी बाधा के निभा ले जाता है वही कैवल्य पद को प्राप्त कर लेता है । प्रायः इस मार्ग में बाधाएँ आती ही हैं क्योंकि जन्म-जन्मों के संस्कारों से मुक्त होना इतना सरल नहीं है । ज्ञान का अहंकार, देहाभिमान और संसार से पूर्ण रूप से विमुख न हो पाना इसमें सबसे बड़ी बाधायें हैं ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Saturday, April 11, 2026

मुक्ति अथवा भक्ति -11

 मुक्ति अथवा भक्ति -11

         जो पुरुष सातवीं अवस्था तक पहुँच जाता है, वह स्वयं ही ब्रह्म स्वरूप जो जाता है । भगवान गीता में अर्जुन को इस सोपान तक पहुँचे हुए पुरुष के बारे में कहते हैं -

         ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति ।

         सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ।। 18/54 ।।

           वह ब्रह्मभूत बना हुआ प्रसन्न मन वाला न तो किसी के लिए शोक करता है और न ही किसी की इच्छा करता है । ऐसा सम्पूर्ण प्राणियों में समभाव वाला साधक मेरी पराभक्ति को प्राप्त हो जाता है ।

          ब्रह्मभूत होने का अर्थ है, ब्रह्म के साथ तात्त्विक सम्बन्ध हो जाना । ब्रह्मभूत ब्रह्म तो नहीं होता परन्तु ब्रह्म के समान हो जाता है । ज्ञान की यह सर्वोच्च अवस्था है, जोकि मुक्ति की अवस्था भी है । भगवान गीता के सातवें अध्याय में ज्ञानी भक्त को सर्वश्रेष्ठ बताते हुए कहते हैं कि ‘ज्ञानीत्वात्मैव मे मतम्’ अर्थात् मेरे मत में ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Friday, April 10, 2026

मुक्ति अथवा भक्ति -10

 मुक्ति अथवा भक्ति -10

       सातवीं अवस्था है - तुर्यातीत अवस्था । यह विदेह-मुक्ति रूप अवस्था है । इस सोपान पर पहुंचकर पुरुष स्वयं अपनी देह को भी भूल जाता है । यह अवस्था समता, स्वच्छता और सौम्यतारूप है । इस भूमिका में स्थित योगी को ‘ब्रह्मविद् वरिष्ठ’ कहते हैं । यह गाढ सुषुप्ति की अवस्था है । इसमें संसार का अत्यन्त अभाव हो जाता है । छठी अवस्था (तुर्यावस्था) में तो योगी को दूसरे द्वारा जगाये जाने पर प्रबोध होता है किन्तु इस सातवीं भूमिका (तुर्यातीत/तुर्यगा) में स्थित योगी दूसरे के द्वारा जगाये जाने पर भी नहीं जागता क्योंकि वह जीता हुआ भी शव के समान है अर्थात् विदेह की अवस्था को उपलब्ध हो चुका है ।

           प्रथम तीन अवस्थाएं ज्ञान प्राप्ति से पूर्व की अवस्थाएं है, इसलिए जगत् रूप ही है । चौथी अवस्था स्वप्नावस्था है क्योंकि उसमें जगत् स्वप्नवत् प्रतीत होता है । पांचवी अवस्था अर्ध-सुषुप्ति की अवस्था है । इस अवस्था में आनन्द के साथ एकात्मभाव रहता है । अन्य पदार्थों के ज्ञान से सर्वथा रहित हो जाने से छठी भूमिका को ‘तुर्य’ कहा जाता है । इससे आगे की अंतिम अवस्था (तुर्यातीत) है । यह अवस्था मन और वाणी से परे है तथा स्वप्रकाश परब्रह्मरूप ही है ।

      सातवें सोपान तक पहुंचा पुरुष वासनारहित हो जाता है । वासनारहित बुद्धि से जो भी कर्म किए जाते हैं, वे कर्म भूने हुए बीज के सदृश होते हैं । वे फिर अंकुरित नहीं होते अर्थात् भावी जन्म देने वाले नहीं होते ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Thursday, April 9, 2026

मुक्ति अथवा भक्ति -9

 मुक्ति अथवा भक्ति -9 

     ज्ञान प्राप्त होने की निम्न चार अवस्थाएं (चौथी से सातवीं) हैं -

      चौथी अवस्था है - सत्वापत्ति अर्थात् सत्व की प्राप्ति । इसको ‘विलापनी’ भी कहा जाता है । इस सोपान पर आते-आते वासना का अत्यन्त अभाव हो जाता है । इस चौथी भूमिका में ब्रह्म-साक्षात्कार से अज्ञान आदि सांसारिक प्रपञ्च की निवृत्ति हो जाती है ।

      पांचवी अवस्था है - असंसक्ति अर्थात् आसक्ति रहित होना । आसक्ति रहित होने से पुरुष को समस्त संसार स्वप्नवत् प्रतीत होता है । इस अवस्था में जीवन्मुक्त पुरुष अर्द्धनिद्रा अर्थात् ‘आधा सोया और आधा जागा’ की अवस्था में रहता है । अर्धसुप्त पुरुष को संसार की जैसी प्रतीति होती है वैसी ही प्रतीति इस ‘ब्रह्मवित’ पुरुष को होती है । यह विशुद्ध चिन्मय आनन्दस्वरूप प्राप्ति की पांचवी भूमिका है ।

      छठी अवस्था है - पदार्थ अभावना अर्थात् पदार्थों (संसार) का अभाव । इस सोपान पर पहुँचने पर पुरुष को एक विज्ञानानन्दघन परमात्मा का ही अनुभव रहता है, संसार का कुछ भी अनुभव नहीं रहता । इस अवस्था को ‘तुर्यावस्था’ भी कहा जाता है । यह शान्तिमय अवस्था है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, April 8, 2026

मुक्ति अथवा भक्ति -8

 मुक्ति अथवा भक्ति -8

       ज्ञान की जो सात भूमिकाएँ (शुभेच्छा, विचारणा, तनुमानसा, सत्वापत्ति, असंसक्ति, पदार्थाभावना और तुर्यगा) बताई गई हैं, वे ज्ञान प्राप्ति की सात अवस्थाएं अर्थात् सात सोपान है । प्रथम सोपान से उत्तरोत्तर आगे बढ़ता हुआ मनुष्य पूर्ण ज्ञान को प्राप्त होना होता है । आइए ! जानते हैं कि प्रत्येक अवस्था अपनी संपन्नता को कैसे प्राप्त होती है ?

       प्रथम अवस्था है - शुभेच्छा अर्थात् सद्भावना । इस अवस्था को उपलब्ध होने के लिए ‘श्रवण’ महत्वपूर्ण है । इस सोपान पर खड़े व्यक्ति को सबसे पहले शास्त्रों और संतों की संगति से अपनी बुद्धि शुद्ध और तीक्ष्ण करनी होती है । यह योगी के योग की पहली भूमिका है ।

      दूसरी अवस्था है - विचारणा अर्थात् सही विचार । इस अवस्था को उपलब्ध होने के लिए सुने/पढ़े हुए पर ‘मनन’ करना होता है । इससे सच्चिदानन्द ब्रह्म के स्वरूप का निरंतर चिंतन होगा । संतों और शास्त्रों के सानिध्य से जो कुछ सुना है/पढ़ा है, उस पर मनन करना । 

      तीसरी अवस्था है -तनुमानसा अर्थात् सूक्ष्म मन । इस अवस्था को उपलब्ध होने में ‘निदिध्यासन’ की भूमिका है । निदिध्यासन का अर्थ है - संसार से असंग होकर परमात्मा के ध्यान में नित्य स्थित रहना ।

     उपरोक्त तीनों ज्ञान प्राप्ति से पूर्व की तैयारी की अवस्थाएं हैं । मनुष्य स्वयं को ज्ञान मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए तैयार कर रहा है । आगे की चार अवस्थाएं ज्ञान प्राप्ति में उत्तरोत्तर हो रही प्रगति को व्यक्त करती है । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Tuesday, April 7, 2026

मुक्ति अथवा भक्ति -7

 मुक्ति अथवा भक्ति -7 

          जिस प्रकार योगवासिष्ठ के उत्पत्ति-प्रकरण में अज्ञान की सात भूमिकाएं बताई गई है उसी प्रकार निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) में ज्ञान की भी सात भूमिकाएं बतलाई गई हैं । ये सात भूमिकाएं है - शुभेच्छा, विचारणा, तनुमानसा, सत्वापत्ति, असंसक्ति, पदार्थाभावना और तुर्यगा । इनमें पहले की तीन भूमिकाएँ (शुभेच्छा, विचारणा और तनुमानसा) ज्ञान प्राप्ति से पहले की है जबकि अगली चार (सत्वापत्ति, असंसक्ति, पदार्थाभावना और तुर्यगा) जीवन्मुक्ति की अवस्थाएं हैं ।

          योगवासिष्ठ में वसिष्ठ मुनि भगवान श्रीराम को उपदेश देते हुए कह रहे हैं - 

शास्त्रसज्जनसम्पर्कै: प्रज्ञामादौ विवर्धयेत् ।

 प्रथमा भूमिकैषोक्ता योगस्यैव च योगिन: ।।

विचारणाद्वितीया स्यातृतीयाऽसंगभावना । 

विलापनी चतुर्थी स्याद्वासनाविलयात्मिका ।।

शुद्धसंविन्मयानन्दरूपा भवति पञ्चमी । 

अर्धसुप्तप्रबुद्धाभो जीवनमुक्तोऽत्र तिष्ठति ।।

स्वसंवेदनरूपा च षष्ठी भवति भूमिका । 

आनन्दैकघनाकारा सुषुप्तसदृशस्थिति: ।।

तूर्यावस्थोपशान्ताथ मुक्तिरेवेह केवलम् । 

समता स्वच्छता सौम्या सप्तमी भूमिका भवेत् ।।

(योगवासिष्ठ - निर्वाण प्रकरण पूर्वार्ध - सर्ग 120/1-5 )

ज्ञान की ये सात भूमिकाएं (अवस्थाएं) आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग हैं, जो शुभेच्छा से प्रारंभ होकर तुर्यगा अर्थात् परम आनन्द की स्थिति तक जाती है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Monday, April 6, 2026

मुक्ति अथवा भक्ति -6

 मुक्ति अथवा भक्ति -6

          नींद के समय जो स्वप्न देखा गया है, जागने के पश्चात् अनुभव में आई हुई बातों के विषय में जो प्रतीति होती है, वह अज्ञान की ‘स्वप्न’ अवस्था है । स्वप्न को ही सत्य समझ लेना, हमारा अज्ञान नहीं तो और क्या है ? चिरकाल तक स्वप्न में डूबे रहने के बाद सुदृढ़ अभिनिवेश (मृत्यु से भय) या चिरस्थायित्व की कल्पना से पुष्ट हो जगत् भाव को प्राप्त हुआ स्वप्न महाजाग्रत की समता प्राप्त कर लेता है । प्रत्येक मनुष्य (जीव) अपने शरीर के मोह में इतना अधिक बंधा हुआ है कि वह शरीर के मरने को ही अपना मरना मानने लगता है । यही कारण है कि उसे सदैव मृत्यु का भय सताता रहता है । छोटे से छोटा जीव भी अपने शरीर की मृत्यु से बचना चाहता है । 

          यह शरीर मरणधर्मा है । जिसने इस धरा पर शरीर धारण किया है, उसे एक न एक दिन यह शरीर छोड़ना ही होगा । मृत्यु का भय (अभिनिवेश) इस शरीर को बचाने की जुगत मात्र है । इस अवस्था को प्राप्त हुआ स्वप्न ‘स्वप्न- जाग्रत’ माना गया है । यह अज्ञान की छठी अवस्था है । अज्ञान की इन छः अवस्थाओं का परित्याग करने पर जीव की जो जड़ अवस्था (अपने आपको संसार का मान लेना) है, वही दुःखों का बोध कराने वाली अज्ञान से संपन्न ‘सुषुप्ति’ अवस्था कही गई है । इस अवस्था से मुक्त होने के लिए ज्ञान ही एकमात्र साधन है । अज्ञान की इन अवस्थाओं का विस्तार से वर्णन योगवासिष्ठ में मिलता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।