ज्ञान उदय जब होत है …..30
अर्जुन भी तो इसी प्रकार क्या करूँ, क्या न करूँ के द्वन्द्व में फँसकर युद्ध से पलायन करने चला था । सन्त ने तो बाहर बैठना तक छोड़ दिया था । कुटिया के भीतर रहकर भी कौनसा वह द्वन्द्व से मुक्त हो गया था ? भीतर बैठे बैठे विचारों की श्रृंखला में डूबता-उतराता सन्त शीघ्र ही किसी निर्णय पर पहुँचने वाला है ।
अचानक सन्त के भीतर एक बिजली सी कौंधी । विचार से विवेक जाग्रत हुआ, ज्ञान का उदय हुआ । केवल एक ही बात बुद्धि में उपजी - “मैं करने वाला कौन होता हूँ ?” सन्त का विवेक कहता है - ‘जिसने संसार बनाया, तालाब बनाया, तालाब में मछलियाँ पैदा की, उनको बगुले का भोजन बनाया - इन सब क्रियाओं में बाधा डालने वाला मैं कौन होता हूँ ?’ इस प्रकार उन्हें अपने सभी प्रश्नों के उत्तर मिल गए और शान्ति को प्राप्त होकर वे ध्यानावस्था में चले गए ।
आज पूर्व की भांति वे कुटिया से बाहर निकलकर तालाब के किनारे बैठे । बगुले को आना ही था, मछली मारकर पेट भरना ही था । सन्त निर्लिप्त भाव से बैठे रहे । न तो बगुले को उड़ाने का सोचा और न ही न उड़ाने का । सब कुछ प्रकृति की क्रिया मानते हुए परमात्मा के ध्यान में लीन हो गए । ठीक वैसे ही जैसे सती के कर्मों के फल को उसके प्रारब्ध पर छोड़कर शंकर समाधिस्थ हो गए थे ।
सन्त को ज्ञान हो गया और ज्ञान का सम्बन्ध कर्म से जुड़ गया । इतना होते ही द्वन्द्व-मुक्त होकर उन्होंने शान्ति को पा लिया ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।