Saturday, September 19, 2026

सम्भवामि युगे युगे -17

 सम्भवामि युगे युगे -17

             इस असुर का अन्त तो भगवान के हाथों ही होगा और इसके लिए उन्हें अपनी माया से ही कोई रास्ता निकालना होगा । प्रश्न था कि इस कार्य के लिए भगवान को बुलाएगा कौन ? भगवान तो अपने भक्त की एक पुकार के साथ ही आ जाते हैं । इसका अर्थ है कि किसी भक्त की खोज की जाए । असुर वंश में भक्त कहां होंगे ? वहां तो असुर ही असुर होंगे । कयादू का पुत्र भी असुर होगा । साथ ही यह भी सत्य है कि असुर समुदाय से बाहर कोई भक्त यहां आने का साहस भी करेगा, इसमें सन्देह है । नहीं, असुर समुदाय में से किसी को ही भक्त बनना होगा । भक्त बनना भी इतना आसान नहीं है । जहां भोग-विलास के सब साधन हो वहां परमात्म-भक्ति कौन करेगा ?

           असुरों के बीच जन्मे किसी बालक को ही भक्त बनना होगा । ऐसा विधान तो माया के माध्यम से भगवान ही रच सकते हैं । माया से प्रेरित नारद बीच रास्ते ही क़यादू का अपहरण कर ले जा रहे इन्द्र के सामने जा खड़े हुए । एक ओर देवराज तो दूसरी ओर देवर्षि । दोनों ओर देव, तो आपस में संघर्ष होने का प्रश्न ही नहीं है । यही तो दैवी सम्पति की विशेषता है । देवराज की राह रोककर क़यादू को इस आश्वासन के साथ छुड़ा लाए कि इसके गर्भ में भगवान का परम भक्त है और यही भक्त हिरण्यकश्यप की मृत्यु का कारण बनेगा । विश्वास कर इन्द्र ने क़यादू को नारद के सुपुर्द कर दिया । 

            गर्भस्थ शिशु पर वातावरण का प्रभाव पड़ता है, सस्त्राब्दियों से हमारे शास्त्र कहते आ रहे हैं । आज विज्ञान भी उसी बात की पुष्टि कर रहा है । पिता से मिले गुणसूत्र की भूमिका संतान के भौतिक शरीर के निर्माण तक ही सीमित रहती है, उसके स्वभाव निर्माण में उसकी कोई भूमिका नहीं रहती ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Friday, September 18, 2026

सम्भवामि युगे युगे -16

 सम्भवामि युगे युगे -16

         हिरण्यकश्यप संभवतः भूल गया था कि मृत्यु आज तक किसी की टली नहीं है । मृत्यु तो अटल है । जो जन्मा है, उसे एक न एक दिन मरना ही होगा । परन्तु असुर की भी सोच की एक सीमा होती है । इतने वरदान पाकर स्वयं को सुरक्षित समझ लेना भी उसका भ्रम है ।

         ब्रह्माजी तो वरदान देकर भूल गए परन्तु हिरण्यकश्यप का तो मरना निश्चित है । अब कैसे मरेगा यह दुष्ट ? प्रकृति की माया को ही कुछ खेल रचना होगा । हिरण्यकश्यप को मिले वरदान पुष्ट कर रहे थे कि इसको मारने वाला अभी तक तो कोई पैदा ही नहीं हुआ है । इसका अर्थ हुआ कि भगवान के अतिरिक्त कौन इस समस्या का हल निकलेगा । मद में चूर हिरण्यकश्यप भगवान बना घूम रहा है । उसकी पत्नी गर्भ से है । इन्द्र को चिंता हुई । अपने स्तर पर बचने के लिए उपाय सभी करते हैं, इसमें कोई नई बात नहीं है । देवराज भी इसी श्रेणी में है । कैसे हिरण्यकश्यप को घेरा जाए, इन्द्र यही सोच रहे हैं । 

           इंद्र को पता चला कि इस दुष्ट की पत्नी क़यादू गर्भवती है । गर्भ में पल रहा बालक भी आगे बड़ा होकर हिरण्यकश्यप की तरह हमारा जीना हराम कर देगा । ऐसे में देवराज करे तो क्या करे ? उठा लाया क़यादू को एक दिन । इस साँपिन को मारना ही होगा जिससे और संपोले पैदा न हो सके । परन्तु क्या गर्भवती कयादू को मार डालने से हिरण्यकश्यप का अन्त हो जाएगा ? नहीं होगा । ऐसी सोच किसी साधारण मनुष्य की तो हो सकती है, परन्तु इन्द्र जैसे महान राजा की कैसे हो सकती है ?  

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Thursday, September 17, 2026

सम्भवामि युगे युगे -15

 सम्भवामि युगे युगे -15

            हिरण्याक्ष तो बल के मद में चूर था । ललकार कर भिड़ पड़ा भगवान से । भगवान से शत्रुता करने का परिणाम हम सब जानते ही हैं । कोई भी कितना ही बड़ा वरदान पाकर मद में चूर होकर दहाड़ता फिरे, भगवान के समक्ष कोई भी वरदान मायने नहीं रखता, वरदान का भी कोई न कोई तोड़ निकाल ही लेते हैं वे । हाँ, फिर भी भगवान वरदाई का मान अवश्य रखते हैं । अन्ततः वही हुआ जो होना था, असुर हिरण्याक्ष मारा गया और वराह भगवान पृथ्वी को जल से बाहर निकाल लाए ।

           हिरण्यकश्यप ने भी ब्रह्माजी से वरदान ले लिया । चाहा था अमरता का वरदान परंतु ऐसा वरदान देना किसी के भी बलबूते से बाहर है । ऐसे में असुर को अमरता के लिए कोई न कोई तो राह निकालनी ही थी । असुर बुद्धि में देवताओं की तुलना में बड़े तेज होते हैं । उनमें तो बस एक ही कमी है कि वरदान में शक्तियां पाकर अहंकारी हो जाते हैं । अहंकार भी ऐसा कि परमात्मा तक को ललकारने लगते हैं । असुरों की तुलना में देवता कम से कम अहंकार को तो नहीं पालते । देवताओं की बुद्धि को तो भोगों में रत रहने के कारण जंग लग जाता है । यही हाल सांसारिक भोगों में रत मनुष्यों का है । देवताओं को विपत्ति के समय कोई दूसरी राह नहीं दिखती, बस केवल एक ही राह दिखती है कि सहायता के लिए ब्रह्माजी को साथ लेकर भगवान के पास चले जाओ । 

           हाँ, तो बात चल रही थी कि हिरण्यकश्यप को अमरत्व तो नहीं मिला परन्तु उसने अपनी बुद्धि के अनुसार मृत्यु के सभी दरवाज़े बंद करने के लिए कई वरदान एक साथ मांग लिए । वह भूल गया था कि मृत्यु को आने के लिए किसी दरवाजे की आवश्यकता नहीं होती । न दिन में मरूँ न रात को, न घर में मरूँ न बाहर, न आसमान में मरूँ न धरती पर, न मनुष्य मुझे मार सके न ही कोई पशु आदि । प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने भी दे दिए सभी वरदान । ‘प्रभु ! मैंने तो वरदान दे दिए, अब इस समस्या को आप ही सम्भालो ।’ ब्रह्माजी और कर भी क्या सकते हैं ? 

 क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, September 16, 2026

सम्भवामि युगे युगे -14

 सम्भवामि युगे युगे -14

         कथित ज्ञानी कह रहे हैं कि जब पृथ्वी नहीं थी तो मनु-शतरूपा कहां रहते थे ? अरे भाई ! सूक्ष्म शरीर को रहने के लिए किसी आधार की आवश्यकता नहीं होती । हाँ, भविष्य में होने जा रहे सृष्टि के विस्तार के लिए स्थूल शरीर और उसके टिके रहने के लिए आधार की आवश्यकता होगी । विज्ञान भी कहता है कि पृथ्वी पहले जल में डूबी थी फिर उसका स्थल भाग उभरा और जल भाग समुद्र बन गया । शास्त्र और विज्ञान दोनों ही कहते हैं कि आकाश से वायु का प्रादुर्भाव हुआ, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और सबसे अन्त में पृथ्वी अस्तित्व में आई । कहीं कोई मत भिन्नता नहीं है, अल्प ज्ञान से भिन्नता दिखाई पड़ती है । 

           आज के विज्ञान और शास्त्रों में वर्णित ज्ञान, दोनों की तुलना करना बेमानी है क्योंकि आधुनिक विज्ञान को शास्त्रों के ज्ञान तक पहुँचने के लिये अभी लंबा समय लगेगा । एरण, ज़िला सागर मध्य प्रदेश में पांचवीं छठी शताब्दी (490 से 510 के मध्य) की तेरह फीट लंबी एक मूर्ति मिली है, जिसमें वराह भगवान अपने दांतों पर भूदेवी को उठाए हुए है । इस मूर्ति में पृथ्वी का आकार गोल दिखाया गया है । वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के गोल होने को स्वीकार सोलहवीं शताब्दी में जाकर किया है । है न आश्चर्य की जो बात, वैज्ञानिकों ने पांच सौ साल पहले पृथ्वी को गोल बताया है, वह हमें पंद्रह सौ वर्षों से पूर्व भी पता थी ।

              विज्ञान केवल विस्मृत हुए ज्ञान की पुनः स्मृति कराता है, जिसको खोज करना कहते हैं । विज्ञान कोई नया निर्माण नहीं कर सकता, कोई नई वस्तु नहीं बना सकता । वह तो केवल पहले से बने को खोज कर ला सकता है । विज्ञान केवल परमात्मा द्वारा प्रकृति को प्रदत्त की गई शक्तियों को खोजने में लगा है और उस खोज को अपनी सुख-सुविधा के लिए उपयोगी बनाता है । विषयांतर न हो जाए, इसलिए विज्ञान को यहीं छोड़ हिरण्याक्ष और वराह भगवान के मध्य हो रहे युद्ध की तरफ़ चलते हैं ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

 ।।

Tuesday, September 15, 2026

सम्भवामि युगे युगे -13

 सम्भवामि युगे युगे -13

        हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को जल में नहीं डूबोया था । पृथ्वी को तो प्रलय के बाद कल्पान्त में वैसे ही श्री हरि के उदर में जाना था । पृथ्वी को वहां से बाहर निकालना आवश्यक था क्योंकि ब्रह्माजी ने मन्वन्तर के प्रारम्भ में ही मनु और शतरूपा को सृष्टि का विस्तार करने का आदेश दे दिया था । पृथ्वी के बिना भावी सन्ततियां (जीव) कहां रहेंगी ? पृथ्वी को जल से बाहर निकालना किसी साधारण व्यक्ति के वश की बात भी नहीं थी । भगवान को ही आना पड़ा । मूल में वराह अवतार का यही उद्देश्य था । हिरण्याक्ष को तो ब्रह्माजी से वरदान स्वरूप अतुलित बल मिला था । वह बल का प्रदर्शन समुद्र की अथाह जल राशि को मुक्के पर मुक्के मारते हुए कर रहा था । व्यथित समुद्र ने उसे कह दिया कि मुझसे क्यों लड़ रहे हो ? बल ही दिखाना है तो किसी और पर हाथ चलाओ । 

            हिरण्याक्ष ढूंढ़ रहा है किसी को, जिस पर वह अपने बल का प्रदर्शन कर सके । देवयोग से पृथ्वी को अपनी दाढ़ों पर उठाए वराह भगवान से उसका सामना हो गया । जिसे हम देवयोग कहते हैं, वास्तव में वही भगवान की माया है । भगवान की माया ही भगवान के रास्ते में किसी असुर को ला सकती है क्योंकि यही भगवान की इच्छा है । भगवान को हिरण्याक्ष का उद्धार जो करना है क्योंकि उसकी माता दिति भी तो यही चाहती थी । माया के प्रभाव में आकर हिरण्याक्ष आ गया वराह भगवान के सामने, बोला - ‘मेरे साथ युद्ध करो नहीं तो पृथ्वी को जल से बाहर नहीं ले जाने दूंगा ।’

         हिरण्याक्ष और वराह, असुर और भगवान; दोनों आमने-सामने । अब निश्चित है कि युद्ध तो होगा ही । देवासुर संग्राम सदैव चलता रहता है जगत् में भी और शरीर में भी अर्थात् बाहर और भीतर, दोनों ओर। कौन जीतेगा ? प्रश्न यह है ही नहीं, प्रश्न है कि एक बार विनाश कर दिए जाने के पश्चात् भी असुरता बार-बार सिर कैसे उठाने लगती है ? इस प्रश्न का उत्तर इस संसार के रहते नहीं मिलने वाला क्योंकि देव और असुर सम्पदा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

Monday, September 14, 2026

सम्भवामि युगे युगे -12

 सम्भवामि युगे युगे -12

                 हिरण्याक्ष का जन्म भी तो भगवान की माया से ही प्रेरित था । प्रजापति दक्ष की पुत्रियों में एक पुत्री थी दिति । उनका विवाह ऋषि कश्यप के साथ हुआ था । कश्यप ऋषि, शरीर से स्वरूप की यात्रा पर थे । आदर्श दंपति बनकर दोनों सामान्य गृहस्थ जीवन बीता रहे थे - कश्यप और दिति । परन्तु परमात्मा को तो कुछ और ही मंज़ूर था । परमात्मा का संकेत समझ माया ने करवट ली । माया ने कामदेव को संदेश भेजा । सायंकाल में जब कश्यपजी यज्ञ कर रहे थे, कामदेव ने चुपके से उनकी कुटिया में प्रवेश किया । कामदेव के प्रभाव से दिति कामातुर हो उठी । कश्यपजी ने बहुत प्रकार से समझाया परंतु नहीं मानी । कामान्ध को काम-वासना के अतिरिक्त कुछ भी नहीं सुझता ।

           दिति को ईर्ष्या थी कि उसकी दूसरी सौतों के तो संतानें है और वह अभी भी संतान सुख से वंचित है । कामातुर व्यक्ति लज्जा, स्थान और समय नहीं देखता । दिति भी ज़िद्द कर बैठी, या तो अभी, नहीं तो फिर कभी नहीं । बेचारे कश्यपजी त्रिया हठ के सामने बेबस थे । परिणाम - दो पुत्रों का जन्म, हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप ।

         जब अनुकूल वातावरण में समागम होता है तो दैव स्वरूप संतान उत्पन्न होती है । इधर थीं प्रजापति दक्ष की कन्या दिति जिसे प्रतिकूल वातावरण में किए गए समागम से संतान के रूप में मिले दो असुर पुत्र । बाद में बहुत पछताई परंतु अब पछताने से क्या होगा, कुछ नहीं हो सकता । उधर देखिए ! संतान चाहिए देवहूति को भी । देवहूति थी मनु-शतरूपा की पुत्री । अनुकूल वातावरण में साथ मिला पति कर्दम ऋषि का और पुत्र रूप में मिले स्वयं भगवान, कपिल के रूप में । भगवान कपिल ने माता देवहूति को ज्ञान दिया जिसका विस्तार से वर्णन भागवतजी में मिलता है । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, September 13, 2026

सम्भवामि युगे युगे -11

 सम्भवामि युगे युगे -11

            चलिए ! माया के इस खेल पर चल रही चर्चा को थोड़ा और विस्तार देते हैं ।

        जय-विजय शापित हैं । तीन मनुष्य जन्मों तक आसुरी संपदा धारण करनी ही होगी । ब्रह्माजी की आज्ञा हुई, मनु-शतरूपा को संतान पैदा कर सृष्टि का विस्तार करना है । संतानें तो पैदा कर लेंगे परंतु वे रहेगी कहाँ ? पृथ्वी तो जल में डूबी पड़ी है । पृथ्वी को निकालना ही होगा जल से बाहर । जल में गहराई तक उतरकर पृथ्वी को बाहर निकालना बड़ा दुष्कर कार्य है, भगवान के सिवाय कोई इस कार्य के योग्य है ही नहीं । 

             ब्रह्माजी की नासिका से वराह अवतार हुआ । ब्रह्माजी की नासिका से ही क्यों, उनकी पत्नी के गर्भ से क्यों नहीं ? पश्चिम का अंधानुकरण करने वाले हमारे शास्त्रों का मज़ाक़ उड़ाते हैं और हम चुप रहकर अपने ही शास्त्रों पर प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं । थोड़ा गंभीरता से शास्त्रों को पढ़ेंगे तो ऐसे प्रश्न उठेंगे ही नहीं और यदि प्रश्न उठे भी तो उत्तर दिया जा सकता है ।

          केवल पृथ्वी में ही पांचों भूत तत्व की उपस्थिति रहती है और प्रत्येक शरीर की रचना में ये पांच भौतिक तत्त्व ही आवश्यक होते है । पांच ज्ञानेंद्रियों में केवल नाक (घ्राण इंद्रिय) ही पृथ्वी का प्रतिनिधित्व करती है । ज्यों ही मिलेंगे पांचों तत्व एक साथ, एक स्थूल शरीर बनकर तैयार हो जाएगा । ब्रह्माजी ने नासिका से वराह बनाकर यही तो किया था । 

           सूअर की सूंघने की क्षमता बड़ी तीव्र होती है, गन्दगी में से अन्न का एक-एक दाना तक खोज निकाल लेता है । वराह बने परमात्मा अपनी नासिका के बल से रसातल में जाकर जल में डूबी पृथ्वी को खोजकर अपने दोनों दांतों के मध्य उठाकर बाहर निकाल लाए । रास्ते में हिरण्याक्ष ने गदा से उनपर आक्रमण किया । परन्तु वराह भगवान के सामने उसकी एक न चली । अंततः हिरण्याक्ष का वध हुआ ।

 क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।