Thursday, September 17, 2026

सम्भवामि युगे युगे -15

 सम्भवामि युगे युगे -15

            हिरण्याक्ष तो बल के मद में चूर था । ललकार कर भिड़ पड़ा भगवान से । भगवान से शत्रुता करने का परिणाम हम सब जानते ही हैं । कोई भी कितना ही बड़ा वरदान पाकर मद में चूर होकर दहाड़ता फिरे, भगवान के समक्ष कोई भी वरदान मायने नहीं रखता, वरदान का भी कोई न कोई तोड़ निकाल ही लेते हैं वे । हाँ, फिर भी भगवान वरदाई का मान अवश्य रखते हैं । अन्ततः वही हुआ जो होना था, असुर हिरण्याक्ष मारा गया और वराह भगवान पृथ्वी को जल से बाहर निकाल लाए ।

           हिरण्यकश्यप ने भी ब्रह्माजी से वरदान ले लिया । चाहा था अमरता का वरदान परंतु ऐसा वरदान देना किसी के भी बलबूते से बाहर है । ऐसे में असुर को अमरता के लिए कोई न कोई तो राह निकालनी ही थी । असुर बुद्धि में देवताओं की तुलना में बड़े तेज होते हैं । उनमें तो बस एक ही कमी है कि वरदान में शक्तियां पाकर अहंकारी हो जाते हैं । अहंकार भी ऐसा कि परमात्मा तक को ललकारने लगते हैं । असुरों की तुलना में देवता कम से कम अहंकार को तो नहीं पालते । देवताओं की बुद्धि को तो भोगों में रत रहने के कारण जंग लग जाता है । यही हाल सांसारिक भोगों में रत मनुष्यों का है । देवताओं को विपत्ति के समय कोई दूसरी राह नहीं दिखती, बस केवल एक ही राह दिखती है कि सहायता के लिए ब्रह्माजी को साथ लेकर भगवान के पास चले जाओ । 

           हाँ, तो बात चल रही थी कि हिरण्यकश्यप को अमरत्व तो नहीं मिला परन्तु उसने अपनी बुद्धि के अनुसार मृत्यु के सभी दरवाज़े बंद करने के लिए कई वरदान एक साथ मांग लिए । वह भूल गया था कि मृत्यु को आने के लिए किसी दरवाजे की आवश्यकता नहीं होती । न दिन में मरूँ न रात को, न घर में मरूँ न बाहर, न आसमान में मरूँ न धरती पर, न मनुष्य मुझे मार सके न ही कोई पशु आदि । प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने भी दे दिए सभी वरदान । ‘प्रभु ! मैंने तो वरदान दे दिए, अब इस समस्या को आप ही सम्भालो ।’ ब्रह्माजी और कर भी क्या सकते हैं ? 

 क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, September 16, 2026

सम्भवामि युगे युगे -14

 सम्भवामि युगे युगे -14

         कथित ज्ञानी कह रहे हैं कि जब पृथ्वी नहीं थी तो मनु-शतरूपा कहां रहते थे ? अरे भाई ! सूक्ष्म शरीर को रहने के लिए किसी आधार की आवश्यकता नहीं होती । हाँ, भविष्य में होने जा रहे सृष्टि के विस्तार के लिए स्थूल शरीर और उसके टिके रहने के लिए आधार की आवश्यकता होगी । विज्ञान भी कहता है कि पृथ्वी पहले जल में डूबी थी फिर उसका स्थल भाग उभरा और जल भाग समुद्र बन गया । शास्त्र और विज्ञान दोनों ही कहते हैं कि आकाश से वायु का प्रादुर्भाव हुआ, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और सबसे अन्त में पृथ्वी अस्तित्व में आई । कहीं कोई मत भिन्नता नहीं है, अल्प ज्ञान से भिन्नता दिखाई पड़ती है । 

           आज के विज्ञान और शास्त्रों में वर्णित ज्ञान, दोनों की तुलना करना बेमानी है क्योंकि आधुनिक विज्ञान को शास्त्रों के ज्ञान तक पहुँचने के लिये अभी लंबा समय लगेगा । एरण, ज़िला सागर मध्य प्रदेश में पांचवीं छठी शताब्दी (490 से 510 के मध्य) की तेरह फीट लंबी एक मूर्ति मिली है, जिसमें वराह भगवान अपने दांतों पर भूदेवी को उठाए हुए है । इस मूर्ति में पृथ्वी का आकार गोल दिखाया गया है । वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के गोल होने को स्वीकार सोलहवीं शताब्दी में जाकर किया है । है न आश्चर्य की जो बात, वैज्ञानिकों ने पांच सौ साल पहले पृथ्वी को गोल बताया है, वह हमें पंद्रह सौ वर्षों से पूर्व भी पता थी ।

              विज्ञान केवल विस्मृत हुए ज्ञान की पुनः स्मृति कराता है, जिसको खोज करना कहते हैं । विज्ञान कोई नया निर्माण नहीं कर सकता, कोई नई वस्तु नहीं बना सकता । वह तो केवल पहले से बने को खोज कर ला सकता है । विज्ञान केवल परमात्मा द्वारा प्रकृति को प्रदत्त की गई शक्तियों को खोजने में लगा है और उस खोज को अपनी सुख-सुविधा के लिए उपयोगी बनाता है । विषयांतर न हो जाए, इसलिए विज्ञान को यहीं छोड़ हिरण्याक्ष और वराह भगवान के मध्य हो रहे युद्ध की तरफ़ चलते हैं ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

 ।।

Tuesday, September 15, 2026

सम्भवामि युगे युगे -13

 सम्भवामि युगे युगे -13

        हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को जल में नहीं डूबोया था । पृथ्वी को तो प्रलय के बाद कल्पान्त में वैसे ही श्री हरि के उदर में जाना था । पृथ्वी को वहां से बाहर निकालना आवश्यक था क्योंकि ब्रह्माजी ने मन्वन्तर के प्रारम्भ में ही मनु और शतरूपा को सृष्टि का विस्तार करने का आदेश दे दिया था । पृथ्वी के बिना भावी सन्ततियां (जीव) कहां रहेंगी ? पृथ्वी को जल से बाहर निकालना किसी साधारण व्यक्ति के वश की बात भी नहीं थी । भगवान को ही आना पड़ा । मूल में वराह अवतार का यही उद्देश्य था । हिरण्याक्ष को तो ब्रह्माजी से वरदान स्वरूप अतुलित बल मिला था । वह बल का प्रदर्शन समुद्र की अथाह जल राशि को मुक्के पर मुक्के मारते हुए कर रहा था । व्यथित समुद्र ने उसे कह दिया कि मुझसे क्यों लड़ रहे हो ? बल ही दिखाना है तो किसी और पर हाथ चलाओ । 

            हिरण्याक्ष ढूंढ़ रहा है किसी को, जिस पर वह अपने बल का प्रदर्शन कर सके । देवयोग से पृथ्वी को अपनी दाढ़ों पर उठाए वराह भगवान से उसका सामना हो गया । जिसे हम देवयोग कहते हैं, वास्तव में वही भगवान की माया है । भगवान की माया ही भगवान के रास्ते में किसी असुर को ला सकती है क्योंकि यही भगवान की इच्छा है । भगवान को हिरण्याक्ष का उद्धार जो करना है क्योंकि उसकी माता दिति भी तो यही चाहती थी । माया के प्रभाव में आकर हिरण्याक्ष आ गया वराह भगवान के सामने, बोला - ‘मेरे साथ युद्ध करो नहीं तो पृथ्वी को जल से बाहर नहीं ले जाने दूंगा ।’

         हिरण्याक्ष और वराह, असुर और भगवान; दोनों आमने-सामने । अब निश्चित है कि युद्ध तो होगा ही । देवासुर संग्राम सदैव चलता रहता है जगत् में भी और शरीर में भी अर्थात् बाहर और भीतर, दोनों ओर। कौन जीतेगा ? प्रश्न यह है ही नहीं, प्रश्न है कि एक बार विनाश कर दिए जाने के पश्चात् भी असुरता बार-बार सिर कैसे उठाने लगती है ? इस प्रश्न का उत्तर इस संसार के रहते नहीं मिलने वाला क्योंकि देव और असुर सम्पदा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

Monday, September 14, 2026

सम्भवामि युगे युगे -12

 सम्भवामि युगे युगे -12

                 हिरण्याक्ष का जन्म भी तो भगवान की माया से ही प्रेरित था । प्रजापति दक्ष की पुत्रियों में एक पुत्री थी दिति । उनका विवाह ऋषि कश्यप के साथ हुआ था । कश्यप ऋषि, शरीर से स्वरूप की यात्रा पर थे । आदर्श दंपति बनकर दोनों सामान्य गृहस्थ जीवन बीता रहे थे - कश्यप और दिति । परन्तु परमात्मा को तो कुछ और ही मंज़ूर था । परमात्मा का संकेत समझ माया ने करवट ली । माया ने कामदेव को संदेश भेजा । सायंकाल में जब कश्यपजी यज्ञ कर रहे थे, कामदेव ने चुपके से उनकी कुटिया में प्रवेश किया । कामदेव के प्रभाव से दिति कामातुर हो उठी । कश्यपजी ने बहुत प्रकार से समझाया परंतु नहीं मानी । कामान्ध को काम-वासना के अतिरिक्त कुछ भी नहीं सुझता ।

           दिति को ईर्ष्या थी कि उसकी दूसरी सौतों के तो संतानें है और वह अभी भी संतान सुख से वंचित है । कामातुर व्यक्ति लज्जा, स्थान और समय नहीं देखता । दिति भी ज़िद्द कर बैठी, या तो अभी, नहीं तो फिर कभी नहीं । बेचारे कश्यपजी त्रिया हठ के सामने बेबस थे । परिणाम - दो पुत्रों का जन्म, हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप ।

         जब अनुकूल वातावरण में समागम होता है तो दैव स्वरूप संतान उत्पन्न होती है । इधर थीं प्रजापति दक्ष की कन्या दिति जिसे प्रतिकूल वातावरण में किए गए समागम से संतान के रूप में मिले दो असुर पुत्र । बाद में बहुत पछताई परंतु अब पछताने से क्या होगा, कुछ नहीं हो सकता । उधर देखिए ! संतान चाहिए देवहूति को भी । देवहूति थी मनु-शतरूपा की पुत्री । अनुकूल वातावरण में साथ मिला पति कर्दम ऋषि का और पुत्र रूप में मिले स्वयं भगवान, कपिल के रूप में । भगवान कपिल ने माता देवहूति को ज्ञान दिया जिसका विस्तार से वर्णन भागवतजी में मिलता है । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, September 13, 2026

सम्भवामि युगे युगे -11

 सम्भवामि युगे युगे -11

            चलिए ! माया के इस खेल पर चल रही चर्चा को थोड़ा और विस्तार देते हैं ।

        जय-विजय शापित हैं । तीन मनुष्य जन्मों तक आसुरी संपदा धारण करनी ही होगी । ब्रह्माजी की आज्ञा हुई, मनु-शतरूपा को संतान पैदा कर सृष्टि का विस्तार करना है । संतानें तो पैदा कर लेंगे परंतु वे रहेगी कहाँ ? पृथ्वी तो जल में डूबी पड़ी है । पृथ्वी को निकालना ही होगा जल से बाहर । जल में गहराई तक उतरकर पृथ्वी को बाहर निकालना बड़ा दुष्कर कार्य है, भगवान के सिवाय कोई इस कार्य के योग्य है ही नहीं । 

             ब्रह्माजी की नासिका से वराह अवतार हुआ । ब्रह्माजी की नासिका से ही क्यों, उनकी पत्नी के गर्भ से क्यों नहीं ? पश्चिम का अंधानुकरण करने वाले हमारे शास्त्रों का मज़ाक़ उड़ाते हैं और हम चुप रहकर अपने ही शास्त्रों पर प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं । थोड़ा गंभीरता से शास्त्रों को पढ़ेंगे तो ऐसे प्रश्न उठेंगे ही नहीं और यदि प्रश्न उठे भी तो उत्तर दिया जा सकता है ।

          केवल पृथ्वी में ही पांचों भूत तत्व की उपस्थिति रहती है और प्रत्येक शरीर की रचना में ये पांच भौतिक तत्त्व ही आवश्यक होते है । पांच ज्ञानेंद्रियों में केवल नाक (घ्राण इंद्रिय) ही पृथ्वी का प्रतिनिधित्व करती है । ज्यों ही मिलेंगे पांचों तत्व एक साथ, एक स्थूल शरीर बनकर तैयार हो जाएगा । ब्रह्माजी ने नासिका से वराह बनाकर यही तो किया था । 

           सूअर की सूंघने की क्षमता बड़ी तीव्र होती है, गन्दगी में से अन्न का एक-एक दाना तक खोज निकाल लेता है । वराह बने परमात्मा अपनी नासिका के बल से रसातल में जाकर जल में डूबी पृथ्वी को खोजकर अपने दोनों दांतों के मध्य उठाकर बाहर निकाल लाए । रास्ते में हिरण्याक्ष ने गदा से उनपर आक्रमण किया । परन्तु वराह भगवान के सामने उसकी एक न चली । अंततः हिरण्याक्ष का वध हुआ ।

 क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, September 2, 2026

अनुभव की बात

 अनुभव की बात 

         गत सौ दिनों में दो विषयों पर लेखन हुआ, ‘आसक्ति से अनुरक्ति की ओर’ तथा ‘मौन’ । पता नहीं, विषय कौन सुझाता है ? मैं जो सोचता हूँ, वह विषय तो कहीं बहुत पीछे छूट जाता है और अचानक मस्तिष्क में एक बिजली सी कौंधती है और बिलकुल नया विषय सामने आ जाता है । फिर उस विषय पर चिंतन कहाँ से शुरू होता है, कैसे आगे बढ़ता है और लेखनी कैसे चल पड़ती है, कुछ भी अनुभव में नहीं आता । जब संपादन करने के लिए अवलोकन करता हूँ तो आश्चर्य होता है कि क्या ये शब्द मेरे हैं ? नहीं, शब्द मेरे नहीं है बल्कि किसी ने मेरे माध्यम से इनको कैनवास पर उतारा है । बहुत कुछ बदलाव करने की सोचता हूँ परंतु बदलाव भी मेरे चाहे अनुसार नहीं होता । जब संपादित करने के पश्चात् पढ़ता हूँ तो आत्मिक संतुष्टि और सुख का अनुभव अवश्य होता है । गोस्वामीजी ने मानस में जिसे ‘स्वान्तः सुखाय’ कहा है, क्या यह लगभग वैसा ही है ?

            मेरे चाहने से कुछ नहीं होता, चाहता वही है, मुझे तो उसकी चाह के अनुसार भूमिका निभानी है । अब देखिए, ‘मौन’ पर लिखने के पश्चात् सोचा था कि मैं अब लेखनी को विश्राम देकर ‘न किंचिदपि चिन्तयेत्’ की अवस्था की तरफ़ बढ़ चलूं क्योंकि अंततः उसी लक्ष्य को प्राप्त करना है । मस्तिष्क तंद्रा की अवस्था में था कि यकायक बिजली सी कौंधी और एक प्रश्न उठा  - ‘‘अनुरक्ति” का क्या हुआ ? 

         आचार्य जी श्री गोविन्द राम शर्मा कहते हैं - ‘प्रकाश ! तू ज्ञान मार्गी है । ज्ञान से भक्ति विलक्षण है । जब भीतर भक्ति जगेगी और परमात्मा से प्रेम होगा तब समस्त ज्ञान स्वयं में ही पा लेगा ।’  आज ज्ञान और भक्ति के दोराहे पर खड़ा मैं सोच रहा हूँ कि ‘अनुरक्ति’ की ओर बढ़ने का संकेत क्या आदरणीय भाईजी (आचार्यजी) की परमात्मा से की गई अनुशंसा का परिणाम है ? क्योंकि लेखन हेतु मुझे जो भी संकेत मिलता है, उसे मैं उन्हीं का आशीर्वाद और परमात्मा की कृपा समझता हूँ ।

         खपती मस्तिष्क की खपत तब तक नहीं मिटती जब तक आप भीतर से ख़ाली नहीं हो जाते । अब इसी खपत को परमात्मा की ‘अनुरक्ति’ में परिवर्तित कर दिया है । अब जिस दिन गुरु और परमात्म-कृपा होगी भीतर से रिक्त होता चला जाऊँगा, फिर एक दिन ‘मौन’…… , पास में कुछ न होते हुए भी सब कुछ पा लेना  । तब तक लेखनी भगवान भरोसे, वह जैसा और जब तक लिखवाना चाहता है, तब तक वैसा लिखता रहूँगा । ‘अनुरक्ति‘ की प्रथम सीढ़ी और संभवतः अंतिम भी अर्थात् एकमात्र सीढ़ी है - उसकी लीला का गुणगान करना और उसकी लीला में डूब जाना । परन्तु प्रत्येक लीला तो माया के अन्तर्गत है, मायापति की माया के । कोई बात नहीं, उसकी माया का गुणगान करना भी तो परोक्ष रूप से उसी का गुणगान करना है । बिना माया की सहायता के सीधे वह भी अवतरित नहीं हो सकता । प्रकृति को अपने अधीन करके अपनी माया से ही तो वह प्रकट होता है - ‘धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे’ ।

गोस्वामीजी मानस में कहते हैं - रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि॥ अर्थात् भगवान श्री राम का स्मरण करना, उनके नामों का गुणगान करना और निरंतर उनके यश व गुणों के समूहों को सुनना ही सबसे बड़ा और सुलभ साधन है।

कल से माया और मायापति का गुणगान करेंगे - “ सम्भवामि युगे युगे” में ।

।। हरिः शरणम् ।।

डॉ. प्रकाश काछवाल

Thursday, August 13, 2026

मौन साधना/मूक-सत्संग

 मौन-साधना / मूक-सत्संग 

          अभी कुछ दिनों पहले एक मौनी बाबा से मिलने का अवसर मिला । सुना था कि बाबा पिछले 20 वर्षों से मौन साधना कर रहे हैं, उत्सुकता बढ़ी तो मिलने पहुंच गया । बाबा अपने शिष्यों और अनुयायियों से घिरे बैठे थे । शिष्य भी ऐसे कि मौनी बाबा की प्रत्येक हरकत पर दृष्टि गड़ाए रहते । बाबा की तनिक सी हरकत से ही शिष्य समझ जाता और बाबा के आदेश की अनुपालना में दौड़ पड़ता । 

          मैंने भी बाबा को प्रणाम किया और अन्य अनुयाइयों के साथ उनके सामने बैठ गया । मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे कोई कार्यक्रम शीघ्र ही शुरू होने वाला है । क्या कार्यक्रम में बाबा भाग लेंगे ? भाग लेंगे तो बाबा बोलेंगे कैसे, वो 20 वर्षों से मौन जो हैं ? फिर क्या बाबा मूक दर्शक बने बैठे रहेंगे ? ऐसे अनगिनत प्रश्न मन में उमड़ने लगे । तभी एक शिष्य ने कार्यक्रम प्रारम्भ होने की सूचना देते हुए सामने उपस्थित लोगों को बाबाजी से प्रश्न करने का कहा । मैं सोच रहा था कि प्रश्न तो कर लेंगे पर बाबा तो बोलते नहीं हैं, फिर उत्तर कैसे देंगे ? 

          तभी बाबाजी ने एक शिष्य की ओर देखा । शिष्य समझ गया कि बाबाजी क्या चाहते हैं ? तत्काल ही उस शिष्य ने एक स्लेट और चाक लाकर बाबाजी के सम्मुख रख दी । बाबाजी अब अनुयाइयों के प्रश्न सुनते और उसका चाक से स्लेट पर उत्तर लिखकर प्रश्नकर्ता को दिखा देते । इतना सब होते देखकर मैं प्रश्न करना ही भूल गया और उसके स्थान पर मन में दूसरा प्रश्न उठ खड़ा हुआ । क्या इस प्रकार के मौन को ही मौन-साधना कहा जाता है ? प्रश्न का उत्तर जानने की उत्सुकता ने अचिन्तनीय विषय ‘मौन’ पर चिंतन करने को विवश कर दिया ।

           अध्यात्म की भूख भी बड़ी विचित्र है । जहां से कुछ ज्ञान मिलने की तनिक सी भी सम्भावना नज़र आती है, पागल मन उसी ओर जाने को उत्सुक हो जाता है । न जाने यह भूख कब मिटेगी ? जो पहले जान लिया था, वह तत्काल ही फिर से न जाना हुआ हो जाता है क्योंकि जितना जानने का प्रयास करते हैं, उतना ही उलझते जाते हैं । ज्ञान असीम है, इसकी पूर्ण अवस्था को पा लेना बड़ा ही दुष्कर है क्योंकि थोड़ा कुछ जानते ही अनुभव में आता है कि अभी भी बहुत कुछ जानना शेष है ।

           पश्चिम के एक दार्शनिक ने बड़े काम की बात कही है । वे कहते हैं - “50 वर्ष पहले मैं सब कुछ जानता था । आज जीवन के इस मोड़ पर आकर समझ में आया कि मैं अब भी कुछ नहीं जानता ।” ज्ञान असीम है, इसको जितना समेटने की कोशिश करेंगे उतने ही हम उलझते जाएंगे । इसीलिए कहा जाता है कि जीवन में जितना जान लिया है, वह पर्याप्त है । 

             हरिः शरणम् आश्रम के आचार्य श्री गोविंद राम शर्मा कहते हैं कि सीखे हुए ज्ञान की क़ीमत दो कौड़ी की नहीं है । सीखे हुए ज्ञान से हमें शब्दों का जाल बुनना आ सकता है जिसको प्रवचन और लेखन के माध्यम से व्यक्त कर सकते हैं ।  ज्ञान को जब तक आचरण में नहीं लाया जाता तब तक इसकी कोई क़ीमत नहीं है । जब ज्ञान भीतर उतरता है तब मनुष्य मौन और निःशब्दता को पा लेता है क्योंकि तब यह ज्ञान आत्म-स्वरूप का अनुभव करा देता है । इस अनुभव को व्यक्त करने के लिए कोई शब्द नहीं होते । इस निःशब्दता और मौन पर कबीर कहते हैं - ‘गूंगे केरी सरकरा, खाय और मुस्काय ।’ परमात्मा का अनुभव होते ही शब्द खो जाते हैं और ‘मौन’ घटित हो जाता है ।

           चलिए ! ‘मौन’ क्या है, इसको जानने और समझने का प्रयास करते हैं । सबसे पहले शरीर-विज्ञान के आधार पर मौन को समझते हैं ।

            ‘मौन’ का शाब्दिक अर्थ है - वाक् शक्ति का उपयोग न करना । परमात्मा ने प्रकृति के माध्यम से जीवों को बोलने की शक्ति प्रदान की है । पांच कर्मेन्द्रियों में ‘वाणी’ भी एक कर्मेन्द्रिय के माध्यम से दी जाने वाली अभिव्यक्ति है । इसे वाक्-इन्द्रिय कहा जाता है । सभी जीवों में एक मात्र मनुष्य ही ऐसा जीव है जो शब्दों के माध्यम से अपने भीतर के भावों को स्पष्ट रूप से व्यक्त कर सकता है । मनुष्य के गले में स्थित दो स्वर-यन्त्रों (vocal chords) के मध्य से जब वायु का प्रवाह होता है तो उससे ध्वनि की तरंगें निकलती है । इन ध्वनि-तरंगों को व्यक्ति अपनी जिह्वा से भिन्न-भिन्न आवृतियों (frequencies) का निर्माण करते हुए शब्द बनाता है । ये शब्द ही उसके भावों को सबके समक्ष प्रस्तुत करते हैं । इस प्रकार ये शब्द एक दूसरे से सम्पर्क और संदेश-संचार का साधन बनते हैं ।

          प्रश्न उठता है कि शब्द-अभिव्यक्ति में ज्ञान की भूमिका किस प्रकार है ? मनुष्य ज्ञान तो प्राप्त करता है - पांच ज्ञानेंद्रियों से और फिर शब्दों के माध्यम से उस ज्ञान को बोलकर अभिव्यक्त करता है वाक्-इंद्रिय के माध्यम से । मनुष्य की शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्ति में भूमिका एकमात्र श्रवणेन्द्रिय की ही है । जिसमें श्रवण क्षमता का जन्मजात अभाव होता है उसकी वाक्-इंद्रिय भी कुछ नहीं कर सकती । कान से सुने जाने वाले शब्द ही बाल्यावस्था में शब्द-कोष (vocabulary) का निर्माण करते हैं । जन्मजात बहरा (deaf) बालक कुछ भी नहीं सुन सकता तब उसमें शब्द-कोष कैसे बनेगा ? इसीलिए जन्मजात बहरा व्यक्ति गूँगा (dumb) भी होगा, यह निश्चित है ।

           यह बात हुई जन्म-जात गूंगे की । कई बार सिर पर घातक चोट लग जाने से मस्तिष्क का वह भाग प्रभावित हो जाता है जो स्वर-यन्त्र तक शब्दों को उच्चारित करने के संकेत भेजता है । अपनी गर्दन के आगे के भाग में जहां थायरॉयड ग्रंथि स्थित होती है, वहाँ से एक नाड़ी (nerve, recurrent laryngeal) गुजरती है । इस नाड़ी के क्षतिग्रस्त हो जाने से भी स्वर-यन्त्र काम करना बन्द कर देते हैं । ऐसा होने से मनुष्य चाहकर भी बोल नहीं होता । 

         जिन लोगों को ज़ोर से बोलने की आदत होती है अथवा जो प्रत्येक बात पर क्रोधकर चिल्लाने लगते हैं, उनके स्वर-यन्त्र क्षतिग्रस्त हो जाते हैं । उन्हें प्रारंभ में तो बोलने में कठिनाई होती है, फिर धीरे-धीरे वहाँ से शब्द उच्चारित नहीं होते । ऐसा व्यक्ति भी मौन हो जाता है क्योंकि वह चाहकर भी बोल नहीं पाता ।

            कई बार स्वर-यन्त्र स्वयं ही रोगग्रस्त हो जाता है जिसके कारण प्रारम्भ में तो आवाज़ भारी होने लगती है जिसे hoarseness of voice होना भी कहते हैं और अंततः वाणी निकलनी असंभव हो जाती है । स्वर-यंत्र की बीमारियों में इसका कैंसरग्रस्त हो जाना मुख्य है ।

            इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि शारीरिक बीमारियों से भी वाणी का मौन हो जाना हो सकता है । यह सब बाहर के मौन है परंतु इन सब प्रकार के मौन में भी भीतर वार्तालाप चलता रहता है । जब तक भीतर से चुप नहीं हुआ जाता तब तक सब मौन व्यर्थ हैं ।

            इतना विज्ञान समझ लेने से ‘मौन’ को समझना आसान हो जाएगा । हम ‘मौन’ को जानने की यात्रा पर अग्रसर हैं । गूँगे का भी मौन होता है, बीमार व्यक्ति का भी मौन होता है परन्तु उसे मौन नहीं कहा जा सकता । उसका मौन शारीरिक विकलांगता के कारण है न कि किसी उद्देश्य को लेकर । वह भले ही शब्दों को बोलकर अपनी अभिव्यक्ति नहीं दे सकता परन्तु मुस्कुरा कर, दुःखी होकर, रोकर, हाथ-पैर पटककर अपनी शेष चार ज्ञानेंद्रियों से मिले ज्ञान की अभिव्यक्ति दे सकता है । 

           चलिए ! जन्मजात मूक व्यक्ति के मौन से आगे बढ़ते हैं । स्वर-यन्त्र के स्वस्थ होने के बाद भी यदि आप अपनी इच्छा से शब्द उच्चारित नहीं कर रहे हैं तो यह आपका ‘मौन’ है । इसमें सबसे महत्वपूर्ण यह जानना है कि आप मौन क्यों हुए अर्थात् आपके मौन होने के पीछे क्या उद्देश्य है ? संसार की चिंता से ग्रस्त व्यक्ति भी मौन धारण कर लेता है और आध्यात्मिक चिंतक भी । परन्तु दोनों के मौन में बड़ा अन्तर है । आध्यात्मिक चिंतक जब चिंतन की सर्वोच्च अवस्था का भी अतिक्रमण कर जाता है तब चिंतन कहीं पीछे छूट जाता है तब जो मौन घटित होता है वह वास्तव में मौन है ।

          शास्त्रों में मौनी बाबा को मुनि कहा जाता है । सनातन धर्म-शास्त्रों में ऋषि और मुनि, इन दो प्रकार के आध्यात्मिक चिंतकों का वर्णन आता है । शास्त्रों में आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर व्यक्ति को दो शब्दों के माध्यम से सम्बोधित किया गया है - ऋषि और मुनि । दोनों ही आत्म-बोध की यात्रा पर हैं । फिर भी इनकी दो संज्ञाएँ क्यों है ? 

               जो ज्ञान मार्ग पर अग्रसर है और शरीर तथा स्वयं (आत्मा) के एक दूसरे से भिन्न होने के रहस्य को जानने के लिए शोध रत है, उसे ऋषि कहा गया है । आज विज्ञान के युग में ऐसे व्यक्ति को वैज्ञानिक कहा जाता है । दूसरा जो आत्म-बोध के लिए मौन रहकर अध्यात्म पथ पर तपस्या में लीन है, उसे मुनि कहा जाता है । मुनि को शरीर और संसार की चिंता नहीं सताती वह तो सदैव अपने भीतर ही प्रवेश किए रहता है । ऐसा मुनि सदैव मौन रहकर परमात्म-चिंतन में लीन रहता है । इन्हें दार्शनिक कहा जाता है । वे एक दर्शन का अनुगमन करते हुए अध्यात्म-पथ पर आगे बढ़ते हैं । ऋषि और मुनि में तनिक सी भिन्नता होने का अर्थ यह नहीं है कि मुनि में ज्ञान नहीं है, वह भी ज्ञानी है । 

          ऋषि प्रकृति के रहस्य खोलने में लगा हुआ है । वह इन रहस्यों के माध्यम से शरीर और संसार से विमुख होने का प्रयास करते हुए अंततः आत्म-बोध को उपलब्ध होता है । मुनि प्रकृति के ज्ञान का अतिक्रमण कर जाता है और मौन रहकर सदैव परमात्मा के चिन्तन में लगा रहता है । वह ज्ञान से चिन्तन की अवस्था में चला गया है जबकि ऋषि सदैव आत्म-बोध के सुगम रास्तों की खोज में रत रहता है । 

              महर्षि पतञ्जलि अष्टांग-योग के माध्यम से आत्म-बोध को उपलब्ध हुए । उन्होंने यम, नियम, आसान, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि, इन आठ मार्गों की खोज की, जिससे कोई भी व्यक्ति आत्म-बोध को उपलब्ध हो सकता है । इसी अष्टांग-योग की खोज करने के कारण उन्हें ऋषि माना जाता है । इसी प्रकार चरक और सुश्रुत भी ऋषि के श्रेणी में आते हैं जिन्होंने रोगग्रस्त शरीर की शल्य और भेषज-चिकित्सा के माध्यम से व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य से स्वस्थ अर्थात् ‘स्व’ में स्थित होने के मार्ग की खोज की थी । उन्होंने सिद्ध किया कि एक स्वस्थ शरीर ही आत्म-बोध को उपलब्ध हो सकता है । 

          ऋषि भी आगे बढ़ते हुए मुनि हो जाता है और मुनि भी ऋषि हो सकता है । नारदजी देवर्षि भी हैं और मुनि भी ।  विश्वामित्र ऋषि भी हैं और मुनि भी । वशिष्ठजी मुनि कहलाते हैं । जो व्यक्ति ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था तक पहुंच जाता है, फिर उसके पास उस ज्ञान को व्यक्त करने के लिए शब्दों का अभाव हो जाता है ।  ‘शब्दों के अभाव’ से अर्थ है कि उसके शब्दकोश में कोई ऐसा शब्द नहीं है जिससे उस ज्ञान को व्यक्त किया जा सके अर्थात् किसी दूसरे तक पूर्ण रूप से संप्रेषित कर सके । ऐसा मुनि निःशब्द हो जाता है । यह निःशब्दता की अवस्था ही वास्तविक मौन है ।

       इतने विवेचन से मुनि के मौन को सुगमता से समझा जा सकता है । ‘योगवासिष्ठ’ में दो प्रकार के मुनि कहे गए हैं - काष्ठ तपस्वी और जीवन्मुक्त । शब्दों के फेर में न पड़ते हुए आगे बढ़ते हैं और मुनि के मौन को समझने का प्रयास करते हैं ।

           मौन हुआ पुरुष ही मुनि कहलाता है । परमात्मा की भावना से रहित शुष्क क्रियाओं में बद्ध, निश्चय और हठपूर्वक इंद्रियों को जीतने वाला मुनि काष्ठ मुनि कहलाता है । मौन की सर्वोच्च अवस्था व्यक्ति को जीवन्मुक्त कर देती है । इस विनाशशील संसार के स्वरूप को जानकर जो विशुद्धात्मा और परमात्मा में स्थित ज्ञानी महात्मा बाहर से लौकिक व्यवहार करता हुआ भी भीतर विज्ञानानन्द परमात्मा में तृप्त रहता है, ऐसे व्यक्ति को जीवन्मुक्त मुनि कहा जाता है । जीवन्मुक्त वह है जो स्थूल शरीर के रहते हुए भी समस्त शरीरों से मुक्त हो गया है । फिर उसके मनुष्य होने और परमात्मा होने के मध्य केवल स्थूल शरीर ही रहता है अन्यथा वह परमात्मा ही है । स्थूल शरीर के गिरते ही वह संसार के आवागमन चक्र से मुक्त होकर परमात्मा के साथ एकाकार हो जाता है ।

        मौन एक तपस्या है । मौन होना इतना सुगम नहीं है, जितना सुगम इसको समझा जाता है । मनुष्य की विशेषता है कि वह एकान्त में भी मौन होकर मौन नहीं रह पाता । वह बाहर से भले ही किसी से बतिया न रहा हो परंतु भीतर ही भीतर वह बड़बड़ाता रहता है । प्रश्न है कि फिर ‘मौन’ क्या है ? उत्तर जानने के लिए सबसे पहले यह जानते हैं कि मौन कितने प्रकार के हैं और उनमें कौन सा मौन वास्तव में ‘मौन’ की श्रेणी में आता है ।

         योगवासिष्ठ में मौन के चार भेद बताए गए हैं - वाक्, इंद्रिय, काष्ठ और सुषुप्ति मौन । पहले तीन प्रकार के मौन वास्तव में काष्ठ मौन ही हैं और ऐसे मौन का अनुपालन करने वाला काष्ठ मुनि कहलाता है । काष्ठ मौन मन की स्फुरणा है, चित्त का चलन है । अतः ये तीनों मौन ही उपादेय (useful) नहीं है वरन् त्याज्य है ।

        वाक् मौन में केवल शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्ति नहीं दी जाती । यह केवल ऊपरा-ऊपरी का मौन है अर्थात् दिखावटी मौन है । जानबूझकर न बोलना ही इसका आधार है । आजकल मौन-व्रत की एक परम्परा चल निकली है । आसपास के वातावरण में होने वाली प्रत्येक घटना पर दृष्टि और कान लगे रहते हैं और भीतर ही भीतर उन घटनाओं का विवेचन भी चलता रहता है । विवेचन से जो प्रतिक्रिया निकलनी चाहिए वह नहीं निकाल सकते क्योंकि मौन-व्रत जो है । इस प्रकार मन मसोसकर शब्दों के माध्यम से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जाती है । वाक् मौन में मन सहित सभी ज्ञानेद्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ पूर्ण रूप से सजग रहती है । वाक् मौन केवल वाक् कर्मेन्द्रिय को बलपूर्वक दबाने का प्रयास भर है अर्थात् बहुत कुछ बोलना चाहते हुए भी कुछ नहीं बोलना है ।

          ‘बोलना चाहते हुए भी बोलना नहीं है’, केवल यह वाक् मौन नहीं है । वाक् मौन का उद्देश्य होना चाहिए कि अनावश्यक न बोला जाय, असत्य न बोलें, कटु और कठोर वचन किसी को न कहें तथा मन को शान्त और एकाग्र करने का प्रयास करें । ऐसा करने से आत्म-चिन्तन और साधना में प्रगति होगी । स्मरण रहे कि केवल मुंह बंद रखना ही वाक् मौन नहीं है । यदि मन के भीतर विचारों की उठापटक चलती रहेगी तो वाक् मौन अधूरा है । 

           वाक् मौन को सुषुप्ति मौन तक पहुँचने का पहला सोपान कहा जा सकता है । वाक् मौन का व्रत लेते समय ध्यान रखें कि वाणी पर संयम रखना है, सत्य और सर्व हितकारी वचन बोलने हैं तथा अनावश्यक भाषण नहीं करना है । जब इसमें सफलता मिल जाये तो इसी पर नहीं रुकना है बल्कि इंद्रिय मौन की ओर आगे बढ़ना है ।

          इंद्रिय मौन में ज्ञानेंद्रियों को विषय उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं हालांकि इन्द्रियाँ विषय-भोग चाहती हैं । इस मौन के केन्द्र में इंद्रियों का संयम होना चाहिए । भीतर ही भीतर मनुष्य भोगों की भूख को अनुभव तो करता हैं परन्तु मौन रहकर वह उस भूख को सहन करने का प्रयास करता है । जो मनुष्य स्वयं को वास्तविक मूक अवस्था तक ले जाना चाहता है, उसके लिए इंद्रिय मौन एक सीढ़ी है । इंद्रिय मौन का उद्देश्य है - इंद्रियों को विषयों का दास होने से बचाना, मन को शान्त रखना, और कामनाओं को नियंत्रण में रखना ।

         मनुष्य की पांच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं । इंद्रिय मौन में इन पाँचों का संयम आवश्यक है । आँखों के मौन से अर्थ है अनावश्यक दृश्यों से बचना, जिससे विकार जन्म न लें । श्रवणेन्द्रिय का मौन है, चुग़ली, निंदा आदि व्यर्थ की बातें न सुनना । जिह्वा का मौन है स्वाद की आसक्ति न रखना । त्वचा के मौन से आशय है कि भोग विलास से बचें और स्पर्श सुख के आकर्षण और आसक्ति से मुक्त हों । नासिका का मौन है, गन्ध के प्रति न तो आकर्षण हो और न ही प्रतिकर्षण । 

         प्रत्येक मौन की शुरुआत तो वाक् मौन से होती है परन्तु वाक् मौन को ही मौन समझ लेना साधक की भूल है । उसे वाक् मौन से आगे बढ़ते हुए इंद्रिय मौन को अपनाना चाहिए । परंतु इंद्रिय मौन पर भी अटकना नहीं है, इससे भी आगे बढ़ना है । यह मौन भी वाक् मौन की तरह त्याज्य है अर्थात् इससे भी आगे की यात्रा पर बढ़ना है ।

           काष्ठ मौन, यह मौन का तीसरा भेद है । काष्ठ का अर्थ है, लकड़ी अर्थात् इस मौन में लकड़ी के समान पूर्णतः स्थिर हो जाना, निश्चल हो जाना । इस प्रकार के मौन में शरीर और इंद्रियों के माध्यम से जो भी प्रतिक्रिया दी जा सकती है, उनसे मुक्त हो जाना है । संसार में चारों ओर ऐसे अनेकों विषय बिखरे पड़े हैं, जो आपको विचलित करने का प्रयास करेंगे परन्तु प्रतिक्रिया न देते हुए शारीरिक (स्थूल शरीर) स्तर पर काष्ठ की तरह बने रहना है । इस प्रकार शरीर और इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण हो जाता है ।

           शरीर और इंद्रियों पर जब पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो जाता है तब मन को शान्त और निर्मल करने की ओर आगे बढ़ना चाहिए । काष्ठ मौन की अवस्था तक पहुंच जाने के बाद भी अभी तक मौन की पूर्णता तक नहीं पहुंचा गया है । उससे भी आगे मन को शान्त करते हुए उसे अमन बनाना है, तभी वास्तविक मौन घटित होगा ।

        वाक्, इंद्रिय और काष्ठ, तीनों ही काष्ठ मौन हैं क्योंकि अभी तक मन की उठापटक नहीं मिट सकी है । बाह्य रूप से संयमित जीवन प्रतीत तो अवश्य होता है परंतु भीतर ही भीतर कुछ खटक रहा होता है । वाक् मौन में स्वर-यन्त्र काष्ठ हो जाता है और इंद्रिय मौन में इंद्रियाँ । जब सम्पूर्ण स्थूल शरीर ही मौन अवस्था को प्राप्त हो जाता है, तब यह पूर्ण काष्ठ मौन है । परन्तु अभी भी सूक्ष्म शरीर कमोबेश सक्रिय बना हुआ है । इस सक्रिय सूक्ष्म शरीर को भी शान्त करके सुषुप्ति अवस्था में ले जाना है । जब सूक्ष्म शरीर भी सो जाता है, तब इस अवस्था को सुषुप्ति मौन कहा जाता है ।

        सुषुप्ति मौन से तात्पर्य है, गहरी निद्रावस्था जैसी शान्ति, लेकिन पूर्ण जागरूकता के साथ । यह जाग्रत सुषुप्ति अवस्था है । सुषुप्ति मौन में मन, बुद्धि और अहंकार शान्त हो जाते हैं । फिर इस अवस्था में न तो विषयों की ओर दृष्टि जाती है और न ही उनका अनुभव होता है ।

              सुषुप्ति मौन में मन के सभी संकल्प-विकल्प शान्त हो जाते हैं, इंद्रियाँ विषयों की ओर नहीं दौड़ती और भीतर गहरी शान्ति और स्थिरता रहती है । इसे ध्यान और आत्मचिन्तन की सर्वोच्च अवस्था कहा जाता है । सुषुप्ति मौन में साधक सदैव जाग्रत रहता है, सोता नहीं है । भगवान गीता में कहते हैं - 

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने: ।। गीता -2/69 )

संपूर्ण प्राणियों की जो रात (परमात्मा से विमुखता)  होती है, उसमें संयमी मनुष्य जागता है और जिसमें सब प्राणी जागते है (भोग और संग्रह में लगे रहते हैं), वह (तत्व को जानने वाले) मुनि की दृष्टि में रात है ।

           मनुष्य का बाहर से मौन होना अपेक्षाकृत सरल है । बाहर से मौन हो जाने से अर्थ है - वाक् मौन । मन की उठापटक वाक् मौन को भी दीर्घ अवधि तक स्थिर नहीं रहने देती । मन को मौन करना बड़ा कठिन है । जिसने मन पर विजय पा ली है उसके तीनों काष्ठ मौन (वाक्, इंद्रिय और काष्ठ) स्वतः सध जाते हैं । परन्तु मन को साधना बड़ा ही दुष्कर है । 

         मन की उठापटक का कारण उसकी चंचलता है । मैं यह करूँ, वह करूँ; ऐसा करूँ वैसा न करूँ ; ऐसे संकल्प-विकल्प मन में सदैव चलते रहते हैं । मन की इस चंचलता के कारण ही व्यक्ति के जीवन में कभी शांति नहीं आ सकती । आप सब कुछ कर सकते हैं परंतु शांत नहीं हो सकते क्योंकि आपने मन को छूट दे रखी है । मन की चंचलता को आपने शह दी है, मन स्वतः कुछ नहीं कर सकता । इस प्रकार मन को खुला छोड़कर आप उसके वश में हो गए हैं ।

         मन बड़ा चंचल है । अर्जुन कहते हैं कि इसको रोकना तेज वायु-प्रवाह को बाँधने की तरह ही बड़ा कठिन है । तब भगवान ने मन की चंचलता के निग्रह के दो उपाय बताए हैं - अभ्यास और वैराग्य । अभ्यास से आशय है कि मन जिन विषयों की ओर दौड़ता है, उसको बलपूर्वक वहाँ से हटाना । वैराग्य से आशय है, राग न रखना । मन के विषयों की ओर दौड़ने का प्रमुख कारण है - राग । किसी के प्रति मोह और आसक्ति का नाम ही राग है । राग मन के भीतर कामना को जन्म देता है और उस कामना को पूरा करने के लिए मन विषयों की और दौड़ पड़ता है ।

          वैराग्यवान होने के लिए अनासक्त होना पड़ता है । अनासक्त व्यक्ति का मन अमन हो जाता है । इस प्रकार मन की चंचलता स्वतः ही मिट जाती है । फिर मन विषयों के बीच रहते हुए भी उदासीन बना रहता है । इससे मन मौन अवस्था में चला जाता है । इस स्थिति को मानस-मौन भी कहा जाता है । मानस-मौन की अवस्था ही सुषुप्ति-मौन की अवस्था है । भगवान ने (गीता -2/69) में स्पष्ट किया कि संसार में आसक्त मनुष्य की जब रात होती है, तब उस रात में भी संयमी मनुष्य जागता है । सांसारिक मनुष्य सोते हुए स्वप्नावस्था में भी संसार में रमण करता रहता है और परमात्मा से विमुख बना रहता है । संयमी मनुष्य (जिसने इंद्रिय-मौन को साध लिया है) रात को निद्रावस्था में भी अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में रखता है । संयमी मनुष्य सोते हुए भी होश खोता नहीं है बल्कि भीतर से जाग्रत बना रहता है ।

      भगवान कहते हैं कि सांसारिक मनुष्य सूर्योदय होने पर जागता है और दिन भर सांसारिक भोगों में रत तथा भविष्य को सुरक्षित करने के लिए संग्रह करने में लगा रहता है, एक मुनि की दृष्टि में ऐसा दिन भी रात के समान है । भोग और संग्रह की कामना मन में उत्पन्न होती है । मुनि के मन में ऐसी कोई कामना नहीं उठती । उसका मन सदैव उसके वश में रहता है । मुनि के लिए मन की चंचलता कोई महत्व नहीं रखती । 

          जब आप चंचल मन की चंचलता के साथ चंचल नहीं होंगे तो मन की चंचलता स्वतः ही शान्त हो जाएगी । हमें मन को न तो एकाग्र करना है और न ही मन को मारने का प्रयास करना है बल्कि मन की चंचलता की ओर से उदासीन हो जाना है । मन में चंचलता के कारण उसमें विचार आयेंगे ही, यह निश्चित है । अतः इनको रोकने का प्रयास न करें । विचारों को आने से रोकने का जितना प्रयास करेंगे, उतनी ही उनकी तीव्रता बढ़ती जाएगी । 

          स्वामीजी कहते हैं कि ये मन में उठ रहे विचार गली के कुत्ते की तरह हैं । ज़रा सी खिड़की खुली हुई दिखी कि तत्काल ही कुत्ता  घर में घुस आता है । भीतर आए कुत्ते की तरफ़ ध्यान नहीं देंगे तो वह घूम फिर कर अपने आप उसी खिड़की से बाहर चला जाएगा । जितना उस कुत्ते को भगाने का प्रयास करेंगे, वह घर के एक कोने से दूसरे कोने में दौड़ता रहेगा, बाहर नहीं निकलेगा । यही हाल मन में उठने वाले विचारों का है । जितना विचारों को बाहर निकालने का प्रयास करेंगे उतनी ही उनकी तादाद और तीव्रता बढ़ती जाएगी । यदि हम उन विचारों पर ध्यान नहीं देंगे तो स्वतः ही वे धीरे-धीरे कम होते जाएँगे । अंततः एक स्थिति ऐसी आयेगी जब मन विचार-शून्य हो जाएगा । यही ध्यान की सर्वोच्च अवस्था है जिसे विचारशून्यता (thoughtlessness) की अवस्था भी कहा जाता है ।

          जब विचारशून्यता की अवस्था को उपलब्ध हो जाएंगे, तब वास्तविक मौन घटित होता है अर्थात् बाहर और भीतर, दोनों तरफ़ से मौन हो जाना । यही सुषुप्ति मौन है, जिसमें आत्म-स्वरूप का अनुभव हो जाता है । यह अनुभव बड़ा विलक्षण है, जिसमें परमात्मा की अनुभूति होती है । मौन की अवस्था की राह पकड़ कर आत्मस्वरूप तक पहुंचने का प्रयास ही मौन-साधना है, चुप-साधन है और मौन की अवस्था में परमात्मा के संग का अनुभव करना मूक-सत्संग है ।

           मौन-साधना से हम मौन की अवस्था को उपलब्ध हो जाते हैं । यह साधना वाक्-मौन से प्रारम्भ होती है और अंततः सुषुप्ति मौन तक पहुँच जाती है । सुषुप्ति-मौन का अर्थ है- संसार की ओर से पूर्ण रूप से विमुख हो जाना । स्वामीजी कहते हैं कि संसार से विमुख हो जाएं अथवा परमात्मा के सम्मुख हो जाएं, दोनों एक ही बात है । संसार से विमुखता स्वतः ही आत्म-ज्ञान करा देती है ।

             इस प्रकार मौन साधना के तीन स्तर माने जा सकते हैं - वाचिक मौन, मानसिक मौन और आत्मिक मौन । वाचिक मौन में अनावश्यक बोलना का त्याग करना है । मानसिक मौन में इंद्रियों और उनके विषयों से उदासीन बने रहकर मन में उठने वाले विचारों का केवल साक्षी बनना है । धीरे-धीरे विचार स्वतः ही उठने बंद हो जाते है और मानसिक मौन घटित हो जाता है ।  आत्मिक- मौन में मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को अनुभव करता है । ऐसा अनुभव करना ही मौन-साधना का लक्ष्य है ।

        भारतीय दर्शन में मौन को एक गहन साधना माना गया है । उपनिषदों में मौन के बारे में कहा गया है कि सत्य का अनुभव साधक को मौन और निःशब्द कर देता है । सत्य का अनुभव कभी शब्दों के माध्यम से न तो किया जा सकता है और न ही व्यक्त किया जा सकता है । जितना उसे व्यक्त करने का प्रयास किया है, वह केवल उस सत्य की ओर किया गया संकेत मात्र है, सत्य का वर्णन नहीं है । सत्य तो अनुभवगम्य और अवर्णनीय है । सत्य का अनुभव तो केवल मौन और प्रत्यक्ष अनुभूति से होता है । फिर जो वाक् मौन जैसा घटित होता है, वह वास्तव में सुषुप्ति मौन ही है । 

             अब बात करते हैं, मूक सत्संग की । मूक सत्संग का अर्थ है, मौन के माध्यम से सत्य का संग । ऐसा सत्संग जिसमें शब्दों की अपेक्षा मौन को अधिक महत्व दिया जाता है । भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में कई संतों ने मौन को ही सर्वोच्च साधना माना है । रमण महर्षि ने अपने जीवन में मूक-सत्संग को विशेष महत्व दिया था । उनके अनुसार मौन अपने आप में सबसे गहरा उपदेश है क्योंकि सत्य का अनुभव शब्दों से परे है ।

            सनातन धर्म में माना जाता है कि जब मन पूर्णतया शान्त होता है, तब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव करने के सर्वाधिक निकट होता है । इसे गीता में ध्यान-योग कहा गया है । ध्यान में व्यक्ति अपने भीतर की ओर केन्द्रित होता है । 

       गीता में भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं - 

                   शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।

                   आत्मसंस्थं मन: कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ।। 6/25 ।।

            धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे (संसार से) उपराम हो जाय और मन-बुद्धि को परमात्मस्वरूप में सम्यक् प्रकार से स्थापन करके फिर कुछ भी चिंतन न करे ।

              संसार परिवर्तनशील है । इसमें स्थिरता का न होना ही मनुष्य को दुःखी-सुखी करता है । मनुष्य चाहता है कि उसके जीवन में जो सुख आया है, वह टिके । वह यह भी जानता है कि सतत परिवर्तित होने वाला सदैव एक ही दशा में कैसे रह सकता है, फिर भी मनुष्य उसको पकड़े रखने का प्रयास करता है । ऐसे में संसार से उपराम कैसे हुआ जा सकता है ? भगवान कहते हैं - उपराम होने के लिए धैर्ययुक्त बुद्धि का होना आवश्यक है । बुद्धि को एक परमात्मा में बार-बार लगाते रहने से एक अवस्था ऐसी आती है, जब मनुष्य संसार से उपराम हो जाता है ।

        संसार से उपराम हो जाने पर मन-बुद्धि को परमात्मस्वरूप में सही रूप से स्थापित करना सरल हो जाता है । इस अवस्था में एक परमात्मा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, इस बात का ज्ञान हो जाता है । इस अवस्था को प्राप्त करने के पश्चात् कुछ भी चिन्तन नहीं करना है । यह मौन की अवस्था है । फिर परमात्मा का चिन्तन भी नहीं होता । इसका अर्थ यह है कि फिर परमात्मा का चिन्तन करना नहीं पड़ता बल्कि सतत और स्वतः होता है, जिसका भान साधक को भी नहीं होता ।

            स्वामीजी ने मौन को परमात्मा तक पहुंचने का साधन बताया है । वे कहते हैं कि प्रतिदिन थोड़ी-थोड़ी देर चुप होकर बैठने का अभ्यास करें । चाहे कुछ समय के लिए ही सही पर दिन में तीन चार बार बैठेंगे तो धीरे-धीरे समय बढ़ता जाएगा । चुप होकर बैठने का अर्थ है कि कुछ भी चिन्तन न करें, न तो परमात्मा का और न ही संसार का । कितना ही चिन्तन न करने का आग्रह रखें, चिंतन तो फिर भी होगा । ऐसे चिंतन से तटस्थ बने रहना है, न तो उसके साथ होना है और न ही उसके होने का विरोध करना है । अपनी ओर से चिंतन के साथ किसी प्रकार का सम्बन्ध न बनाएं; न तो अच्छा और न ही बुरा ।

           साधक को अपनी बुद्धि में यह पक्का निश्चय कर लेना चाहिए कि संपूर्ण संसार, समय, क्रिया, वस्तु, व्यक्ति आदि में एक परमात्म-तत्व ही सत्तारूप से परिपूर्ण है । जब भी चुप होकर बैठें, संसार का चिंतन छोड़ परमात्मा का ऐसे चिंतन करें कि एक परमात्मा के सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं है । अन्ततः इस चिंतन को भी छोड़ देना है । इस प्रकार आप बाहर के साथ-साथ भीतर से भी चुप/मौन हो जाएंगे । चिंतन छूट जाने से अक्रियता का अनुभव होगा, जोकि परमात्म-तत्व की विशेषता है । अक्रियता से ही सक्रियता जन्म लेती है । समस्त शक्तियां अक्रियता की उपज है । स्वामीजी कहते हैं कि इस प्रकार व्यक्ति को चुप रहने से जो शक्ति प्राप्त होती है, उससे वह संसार से ऊंचा उठ सकता है ।

           सोते समय जब कुछ भी चिंतन नहीं होता तो अच्छी नीन्द आती है और थके-मांदे व्यक्ति में नई ऊर्जा का संचार होता है । इसी प्रकार चुप होने से साधक को नई ऊर्जा मिलती है, जिससे वह परमात्मा के अधिक निकट होता जाता है । वास्तव में देखा जाए तो बाहर-भीतर से चुप हो जाना ही सहजावस्था है ।

मौन -18

            स्वामीजी ने चुप-साधन बताया है जिसकी परिणति सहजावस्था है । सहजावस्था मौन का परिणाम है । चुप-साधन को कई संतों ने चिद्योग (चित्+योग) नाम दिया है । इसे आध्यात्मिक यात्रा का पूर्वार्ध कहा गया है । चिद्योग का लक्ष्य साक्षित्व है अर्थात् साक्षी बनना है । साक्षी का अर्थ है जो कुछ भी हो रहा है उससे सम्बन्ध नहीं रखना, न अच्छा और न बुरा । साक्षित्व ही सहजावस्था है । सहजावस्था आपको परमात्मा तक ले जाती है ।

          कई दार्शनिकों ने सहजावस्था को सहज- योग नाम से कहा है । जिस प्रकार चिद्योग को आध्यात्मिक यात्रा का पूर्वार्ध है, उसी प्रकार सहज-योग इस यात्रा का उत्तरार्ध है । सहज-योग के दो भाग हैं - सुमिरन योग और लय योग ।सुमिरन योग में परमात्मा का सतत सुमिरन चलता रहता है जबकि लय योग में आप सीधे परमात्मा से जुड़ते हैं । सहज योग, भोग और दमन; दोनों के पार जाकर सहजता की बात करता है । 

        स्वामीजी इसी बात को बड़ी सरल भाषा में कहते हैं । वे कहते हैं कि साधक को चुप होकर निर्विकल्प होने का, क्रियारहित होने का स्वभाव बना लेना चाहिए क्योंकि वास्तव में आप क्रिया रहित ही हैं । क्रिया के साथ सम्बन्ध जोड़ लेने से प्रकृति के साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है और कुछ भी न करने से भी प्रकृति के साथ सम्बन्ध जुड़ता है । करना और न करना दोनों सापेक्ष हैं जबकि परमात्म-तत्व निरपेक्ष है । अपने आप को क्रियारहित अनुभव करने से परमात्म-तत्व में स्थिति का अनुभव हो जाता है और अंततः आप परमात्मा में स्थित हो जाते हैं ।

         इस प्रकार मौन को समझने का यह तुच्छ सा प्रयास है । मौन-साधना, चुप साधन, मूक-सत्संग, अचिन्त्य का ध्यान अथवा और कोई भी नाम दे दें, सब में मुख्य बात एक ही है कि आप बाहर-भीतर से मौन होकर ‘स्व’ में स्थित हो जाएं ।

सार-संक्षेप 

     मनुष्य जीवन का लक्ष्य है- आत्म-स्वरूप तक पहुंचना जिसे सन्त परमात्मा को प्राप्त करना भी कहते हैं । सभी दार्शनिकों और सन्तजनों ने परमात्मा तक पहुँचने के भिन्न-भिन्न साधन बताए हैं । सभी साधन कुछ न कुछ करने पर आधारित हैं । करने के साथ सम्बन्ध जोड़े रखने पर ‘ न करना’ भी करने के अन्तर्गत आ जाता है । चुप साधन/मौन-साधना/मूक-सत्संग अक्रिय हो जाने पर आधारित है अर्थात् करने और न करने, दोनों को छोड़ना है । इसीलिए इस साधन को ध्यान-योग के अन्तर्गत लिया गया है ।

         योगवासिष्ठ में मौन-साधना के अन्तर्गत मौन के चार भेद बतलाए गए हैं । इन्हें पूर्ण मौन की अवस्था तक पहुंचने के सोपान भी कहे जा सकते हैं । संक्षेप में - वाक् मौन में वाणी का संयम किया जाता है । इंद्रिय मौन इंद्रियों का संयम है और काष्ठ मौन भौतिक शरीर की स्थिरता को व्यक्त करता है । अंतिम मौन है, सुषुप्ति मौन । सुषुप्ति मौन उस अवस्था का नाम है जिसमें जागृत रहते हुए गहरी निद्रा जैसी मानसिक शान्ति का अनुभव होता है । यह अवस्था साधक को आत्मस्वरूप की अनुभूति की ओर ले जाने वाली साधना का महत्वपूर्ण सोपान मानी जाती है ।

           सुषुप्ति मौन की अवस्था घटित हो जाने के पश्चात् व्यक्ति पूर्णतया मौन और निःशब्द हो जाता है ।  फिर न तो संसार का चिंतन रहता है और न ही परमात्मा का । मौन में हुई आत्मस्वरूप की अनुभूति उसे गहरे मौन में उतार देती है । इस अवस्था का वर्णन करने के लिए साधक के पास शब्दों का अभाव हो जाता है । भला वर्णनातीत का वर्णन भी कोई कर सकता है ! मौन साधना/मूक सत्संग का लक्ष्य आत्मस्वरूप की अनुभूति करना ही है, जो साधक को मौन और नि:शब्दता की अवस्था में ले जाता है ।

       संक्षेप में, चुप साधन/मूक सत्संग/मौन साधना वह साधन है, जिसमें बिना बोले, मौन की शक्ति से आत्मचिंतन करते हुए सत्य का अनुभव करने का प्रयास किया जाता है । अन्ततः सब चिंतन मिट जाते हैं और अचिन्त्य का अनुभव हो जाता है ।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल