आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -7
हमारा मन ही दोलन करता रहता है और आसक्ति और विरक्ति के मध्य झुलाता रहता है । मन पर नियंत्रण स्थापित कर लेना ही अनासक्त हो जाना है । दोलक गति करता है क्योंकि गति उसे आप स्वयं देते हो अन्यथा दोलक तो मध्य में ठहरा हुआ ही था । दोलक में दोलन उसके एक तरफ ऊपर ले जाने से होता है और फिर उसको छोड़ देने से वह स्वतः ही एक से दूसरी तरफ और दूसरी से पहली तरफ, दोलन करता रहता है । उसका यह दोलन करना तभी रुकता है, जब गुरुत्वाकर्षण बल के कारण उसकी गति निरंतर और धीरे-धीरे कम होती जाती है और एक अवस्था ऐसी आती है जब वह मध्य में आकर ठहर जाता है ।
हमारी जिंदगी में भी इस दोलन की तरह गति होती रहती है, कभी इधर कभी उधर । मध्य में ठहराव कहीं और कभी भी दिखलाई नहीं पड़ता । जब अवस्था ढल रही होती है, हम असहाय नज़र आने लगते हैं, तब मजबूरी में बाहर से लगभग ठहर से जाते हैं परन्तु भीतर मन का दोलन करना नहीं रुकता । इस प्रकार जीवन भर हम आसक्ति और विरक्ति के मध्य सदैव झूलते ही रहते हैं, अनासक्त कभी हो ही नहीं पाते ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।