Thursday, August 6, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -74

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -74

            भगवान कहते है कि संसार में जिनको आप अपना कहते हैं, उन सबको अपने मन सहित मेरे चरणों में डाल दो । हम जब अपने केंद्र में परमात्मा को रखेंगे तब सब कुछ परमात्मा का ही होगा । फिर एक परमात्मा ही अपने होंगे, दूसरा कोई अपना नहीं होगा । यही परमात्मा से अपनापन है ।

           स्वामीजी ‘परमात्मा से अपनापन’ को स्पष्ट करते हुए प्रत्येक बार मीरा बाई का उदाहरण देते हैं । मीरा बाई कहती है - ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’ । यहाँ तो दूसरों को भी अपना माने बैठे हैं, फिर मीरा बाई की स्थिति में कैसे पहुंचेंगे ? हम तो इस संसार के बने बैठे हैं । हम यह नहीं जानते कि संसार में हो रहे परिवर्तन को देखने वाला स्वयं अपरिवर्तनीय है । न बदलने वाला ही बदलाव का अनुभव कर सकता है, ऐसे में हम संसार के कैसे हुए ? हम शरीर के बदलने का अनुभव कर रहे हैं, इसका अर्थ है कि हम शरीर नहीं हैं । फिर इस शरीर और शरीर से संबंधित व्यक्ति, विषयों और पदार्थों को अपना क्यों कहते हैं ? इस बात का ज्ञान होते ही परिवर्तित हो रहे संसार से तो आसक्ति की समाप्ति और अविनाशी परमात्मा में अनुरक्ति हो जाएगी ।

            केवल एक परमात्मा ही अपरिवर्तनशील है इसलिए हम परमात्मा से एक हैं और प्रतिपल बदलने वाले संसार से भिन्न हैं । जिस प्रकार हम संसार के मोह में फँसकर आसक्त हुए बैठे थे, इस बात का ज्ञान होते ही संसार से अनासक्त होकर परमात्मा से प्रेम करने लगेंगे । परमात्मा से प्रेम करना, उन्हें अपना मानना और उनसे अपनापन होना ही अनुरक्ति है ।

क्रमशः  

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, August 5, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -73

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -73

                भगवान श्रीराम मानस में कहते हैं -

 जननी जनक बंधु सुत दारा । तनु धनु भवन सुहृद परिवारा ।।

  सबके ममता ताग बटोरी । मम पद मनहि बाँध बरि डोरी ।।

  समदर्शी इच्छा कछु नाहीं । हरष सोक भय नहिं मन माहीं ।।

 अस सज्जन मम उर बस कैसें । लोभी हृदयं बसइ धनु जैसें ।।

                        -सुन्दरकाण्ड - 48/4-7

          माता, पिता, भाई, पुत्र, पत्नी, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार - इन सबके ममत्व रूपी तागों को बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बनाकर उसके द्वारा जो अपने मन को मेरे चरणों में बांध देता है अर्थात् सारे सांसारिक सम्बंधों का केंद्र मुझे बना लेता है, जो समदर्शी है, जिसकी कोई इच्छा नहीं है और जिसके मन में हर्ष, शोक और भय नहीं है । ऐसा सज्जन मेरे हृदय में कैसे बसता है ? जैसे लोभी के हृदय में धन बसता है ।

         ‘चमड़ी जाय पर दमड़ी न जाय’ एक प्रसिद्ध कहावत है । धन को अपना मानने वाले लोभी व्यक्ति की यही स्थिति है । जैसे लोभी के मन में धन बसता है वैसे ही परमात्मा को अपना कहने वाला परमात्मा में बसता है । तुलसी मानस के समापन में कहते है - ‘……लोभी प्रिय जिमि दाम ।…’ जैसे लोभी व्यक्ति को धन प्रिय लगता है, वैसे ही हे राम ! आप मुझे प्रिय लगें । 

क्रमशः

प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Tuesday, August 4, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -72

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -72

           प्रायः प्रश्न उठता है कि परमात्मा से अपनापन कैसे हो ? जब तक हम स्वनिर्मित संसार को अपना कहते रहेंगे तब तक परमात्मा से अपनापन नहीं हो सकता । दो नावों में पैर रखकर नदी के पार नहीं हुआ जा सकता । सहारा/आश्रय तो एक का ही लेना पड़ेगा, चाहे संसार का लें अथवा परमात्मा का । सीधा परमात्मा का आश्रय ले लें तो सर्वोत्तम है, जोकि भक्ति-मार्ग है परन्तु एक गृहस्थ के लिए सीधा परमात्मा का आश्रय लेना जरा असम्भव सा है । उसके लिए तो संसार में रहते हुए, अपना कर्तव्य निभाते हुए अनासक्त होना ही सम्भव है । इसलिए एक गृहस्थ के लिए अनासक्ति तक पहुंचने के लिए ज्ञान-कर्म मार्ग ही उचित मार्ग है । अनासक्ति से फिर अनुरक्ति की राह निकलती है और परमात्मा में ‘अपनापन’ होना सम्भव हो जाता है ।

          आसक्त व्यक्ति को जब तत्वज्ञान हो जाता है तब वह संसार से विमुख होकर विरक्त हो जाता है । इसी प्रकार अनासक्त होकर संसार में रहने वाला व्यक्ति भक्ति की राह पकड़कर परमात्मा के प्रति अनुरक्त हो जाता है । सबसे बड़ी समस्या तो संसार से आसक्ति समाप्त करने की है । भक्ति-मार्ग से इस आसक्ति की दिशा परिवर्तित की जा सकती है और परमात्मा से अपनापन होना सम्भव हो जाता है । 

           लंका में रहते हुए भी विभीषण भगवान श्रीराम की भक्ति में लीन थे । जब भाई से ममत्व समाप्त हुआ तब वे भगवान के शरणागत हुए । मानस में गोस्वामीजी ने इसका वर्णन बड़े ही सुंदर ढंग से किया है । भगवान से अपनापन करने के लिए क्या किया जाना चाहिए, इसको स्वयं भगवान ने स्पष्ट किया है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Monday, August 3, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -71

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -71

        स्वामी शरणानंदजी महाराज कहते हैं - “आसक्ति का अत्यन्त अभाव हुए बिना अनुरक्ति के साम्राज्य में प्रवेश ही नहीं होता ।” आसक्ति का अत्यन्त अभाव होगा, विवेक का सदुपयोग करने से । हमें विचार करना होगा कि हमने संसार में आसक्त होकर दुःख के अतिरिक्त पाया ही क्या है ? विचार से ही विवेक पैदा होता है और विवेक से ही अनासक्त हुआ जा सकता है अन्यथा तो अज्ञान के अंधकार तले अनासक्ति की राह मिलनी असंभव है । 

                स्वामी शरणानंदजी महाराज जिस अनुरक्ति की बात करते हैं स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज ने उसको परमात्मा से ‘अपनापन’ कहा है । हम धन-सम्पति, पत्नी, पुत्र-पुत्री को ‘अपना’ कहते हैं, यह हमारा सांसारिक मोह है, आसक्ति है । जब यही आसक्ति परमात्मा के प्रति हो जाती है, तब परमात्मा ही अपने लगने लगते हैं । यही परमात्मा के प्रति ‘अपनापन’ रखना है । इस प्रकार हमें केवल आसक्ति की दिशा बदलनी है । आसक्ति हट जाने का नाम अनासक्ति है और उसकी दिशा परिवर्तन का नाम अनुरक्ति अथवा परमात्मा से अपनापन है । इस प्रकार स्पष्ट है कि संसार के प्रति आसक्ति का अत्यन्त अभाव ही हमें परमात्मा के प्रति अनुरक्त होने की ओर ले जाता है ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, August 2, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -70

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -70 

             अनासक्ति भी ऐसी ही अवस्था का नाम है, जिसमें मनुष्य संसार में रहते हुए भी निर्लिप्त रहता है । अनासक्त जीवन आपको संसार से मुक्त भले ही करदे परन्तु परमात्मा की तरफ़ जाना है तो वह इससे भी आगे की यात्रा है । हम अनासक्त होकर सांसारिक आसक्ति को बहुत पीछे छोड़ आए हैं । अब हमें अपने भीतर परमात्मा के प्रति आसक्ति पैदा करनी होगी । परमात्मा के प्रति आसक्ति को ही अनुरक्ति कहा जाता है । आसक्ति से अनुरक्ति की ओर जाने के लिए अनासक्ति तो मध्य का एक पड़ाव मात्र है । इसलिए अनासक्त होकर ही सन्तुष्ट नहीं होना है बल्कि पूर्व की सांसारिक आसक्ति को भविष्य की अनुरक्ति में बदलना होगा । प्रश्न है कि अनासक्ति अनुरक्ति में कैसे परिवर्तित होगी ?

               मन की चंचलता पर नियंत्रण होते ही व्यक्ति आसक्त से अनासक्त हो जाता है । मन की चंचलता नियंत्रित होती है, बुद्धि में उपजे ज्ञान से । इस ज्ञान (विवेक) का सदुपयोग कर सांसारिक आसक्ति की दिशा बदल कर उसे परमात्मा की ओर मोड़ा जा सकता है । इसके लिए सांसारिक आसक्ति का अत्यंत अभाव होना आवश्यक है । समस्या यही है कि अनासक्त जब परमात्मा के प्रति आसक्त होने का प्रयास करता है तब न जाने कब वह पुनः संसार में आसक्त हो जाता है, इसका पता ही नहीं चलता । इसका कारण है, मन का बुद्धि पर पुनः प्रभावी हो जाना । इसलिए अनुरक्ति के लिए सांसारिक आसक्ति का पूर्ण रूप से मिट जाना आवश्यक है ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Saturday, August 1, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -69

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -69

           आसक्ति से अनासक्त हो जाना इतना सरल नहीं है परन्तु अनासक्ति से अनुरक्ति तक पहुँचना तुलनात्मक दृष्टि से सुगम है । मनुष्य के जीवन में आ रही समस्त समस्याओं की जड़ में आसक्ति ही है । आसक्ति का त्याग कर या तो विरक्ति में जाया जा सकता है अथवा फिर अनासक्त होकर मन की चंचलता को नियंत्रित कर लिया जाता है । मन की चंचलता ही प्रायः आसक्ति को विरक्ति में ले जाती है परंतु ऐसी विरक्ति आसक्ति का ही दूसरा रूप होती है । मन की चंचलता के कारण ऐसी विरक्ति भी आसक्ति के त्याग का प्रदर्शन मात्र बन कर रह जाती है । ऐसी विरक्ति कब आसक्ति में पुनः परिवर्तित हो जाती है, पता ही नहीं चलता । 

              मन की चंचलता ही मनुष्य को विपरीत परिस्थिति में अस्थाई रूप से विरक्त तो कर देती है परन्तु थोड़ी सी अनुकूलता मिलते ही व्यक्ति विरक्ति का चोला उतारकर पुनः संसार में आसक्त हो जाता है । इसलिए कहा जा सकता है कि ऐसी विरक्ति आत्मिक स्तर पर नहीं हुई है बल्कि यह केवल मन की उठापटक मात्र ही है । संसार में रहते हुए (जहां पर आसक्त होने के अनगिनत साधन हैं) विरक्ति में जाना लगभग असम्भव है । यदि संसार के एक स्थान को छोड़कर अन्यत्र जैसे वन आदि में चले भी जाएंगे तो भी सांसारिक आसक्तियां पीछा छोड़ने वाली नहीं है । संसार बाहर से छोड़ने पर विरक्ति नहीं आती बल्कि स्थायी विरक्ति के लिए तो संसार को भीतर से त्यागना पड़ता है । फिर संसार में रहते हुए भी कमल के पत्ते के जल में तैरते हुए भी जल से निर्लिप्त बने रहने की तरह हम भी संसार में रहते हुए भी उसमें लिप्त नहीं होंगे ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Friday, July 31, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -68

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -68 

           अनासक्ति के इन आठ सूत्रों से एक ही अभिप्राय है, मन पर नियंत्रण । केवल आठ ही क्यों, अगर हम अधिक गहराई से और सूक्ष्म रूप से विश्लेषण करें तो कुछ और भी सूत्र निकल कर हमारे सामने आ सकते हैं । इनमें से किसी एक सूत्र को आत्म-सात करते हुए आसक्ति से स्वयं को दूर रखा जा सकता है । सभी सूत्र आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए हैं । किसी भी एक सूत्र को पकड़ लेने से समस्त आठों सूत्र सध जाते हैं, ऐसा मेरा मानना है । 

        एक गृहस्थ को न तो आसक्त होना चाहिए और न ही विरक्त । उसके लिए मध्यम मार्ग ही उपयुक्त है । अनासक्ति अर्थात पूर्व जन्म के संस्कारों से मिलने वाले इन्द्रियों के सुख को त्याग-पूर्वक भोगना, उन भोगों के प्रति आसक्त नहीं होना और न ही उन भोगों से डर कर दूर भाग कर विरक्त होना । समस्त इन्द्रियों का समुचित उपयोग करते हुए संसार की सेवा करें और आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हों, वास्तविक अनासक्ति यही है ।

          एक गृहस्थ के लिए विरक्त होने के स्थान पर अनासक्त होना सरल है । अनासक्ति से ही अनुरक्ति की राह निकलती है । अपने बनाए संसार के घेरे को तोड़कर बाहर निकलना ही ‘आसक्ति से अनुरक्ति की ओर’ चलना है ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।