सम्भवामि युगे युगे -43
विधि का विधान देखिए, सुबह से राजद्वार पर खड़ा सजा-धजा रथ राजा को प्रातःक़ालीन भ्रमण पर ले जाने के लिए तैयार खड़ा है और अब तपस्वी भेष में राम, जानकी और लखन लाल को इसी रथ से सारथी सुमंत्र वन में छोड़ने जा रहे हैं । विधि का विधान ही कुछ ऐसा है कि हम सोचते कुछ हैं और हो जाता कुछ और ही है । कहां तो राम का आज राज्याभिषेक होना निश्चित था और कहां अब वे ही राम वनगमन को तैयार हैं । माया का खेल समझना असम्भव है । जिसने इसको समझ लिया वह फिर माया में उलझता नहीं है बल्कि संसार चक्र से बाहर हो जाता है ।
सुमंत्र ने तीनों को रथ पर चढ़ाया और बढ़ चले शहर से बाहर निकलने वाली राह पर । अयोध्या के जन राम के वनगमन का समाचार पाते ही राजभवन की ओर दौड़ पड़े । कुछ समय रहते पहुंच पाए वे तो रथ के पीछे हो लिए, जो देर से पहुंचे वे राम-राम करते रथ के पहियों की लकीरों को ढूंढ़ते इधर-उधर बदहवास से घूमने लगे ।
जब जीवन का संध्याकाल आ जाता है, तब जाकर होश आता है कि परमात्मा को ढूंढ़े । कहां छिपा है, वह ? वह तो स्वयं के भीतर ही है और हम जगत् में ढूंढ़ने निकल पड़ते हैं । पहले अपने भीतर प्रवेश कर उसे ढूंढ़ो, उसी को अनुभव करो फिर जगत् में भी उसी की अनुभूति होगी । पहले उसे जगत् में ढूंढ़ने निकलोगे तो वह वहां होते हुए भी नहीं दिखेगा । जिस दिन अपने भीतर उसे देख लोगे उसके बाद सर्वत्र एक वही दिखेगा । उसे ढूंढ़ने की यात्रा बाहर की न होकर भीतर की यात्रा है । जब यह यात्रा पूरी होगी तब जाकर बाहर-भीतर का सारा भेद मिटेगा उससे पूर्व नहीं ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम्।।
णम् ।।