आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -16
तुलाधार वैश्य के इस दृष्टान्त से अनासक्त होने का प्रथम सूत्र निकलकर सामने आता है – ‘निष्ठा पूर्वक कर्तव्य कर्म करना’ । निष्ठा पूर्वक कर्म करते रहना ही अनासक्ति है । हमारा कर्म क्या है, यह पूर्वजन्म के पुरुषार्थ (प्रारब्ध) के द्वारा पहले से ही निश्चित किया जा चुका है । उसी के अनुसार हम अपना जीवन प्रारम्भ करते है और जीवन में कर्मों का प्रारम्भ भी इसी प्रारब्ध को अभिव्यक्त करने के लिए होता है । पूर्वजन्म के पुरुषार्थ के कारण ही आज मैं एक चिकित्सक हूँ, इसका अर्थ यह है कि रुग्ण व्यक्तियों की चिकित्सा करना मेरा कर्तव्य कर्म है । मुझे अपना निर्धारित कर्तव्य कर्म निष्ठा पूर्वक करते रहना चाहिए, तभी मैं अनासक्त हो सकता हूँ ।
मेरी निष्ठा (Loyalty) में रही कोई कमी, धन, जन, मान-सम्मान आदि के प्रति मेरी आसक्ति को ही प्रदर्शित करेगी । जब आप निष्ठा पूर्वक कर्म करेंगे तो फिर न तो आप अपने कर्म के प्रति आसक्त हो सकते हैं और न ही उस कर्म से विरक्त । फिर प्रत्येक रुग्ण व्यक्ति का मन लगाकर उपचार करना ही जीवन का एक मात्र उद्देश्य बन जायेगा और प्रत्येक स्थिति में मैं अपने आपको खुश रख सकूंगा ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।