Friday, November 6, 2026

सम्भवामि युगे युगे -65

 सम्भवामि युगे युगे -65

       योजना सुनकर मारीच अपना सिर पीट लेता है परन्तु रावण की योजनानुसार चलना उसकी मजबूरी है । वह जानता है कि इस समय वह रावण राज में है, रावण के साथ उसके पुष्पक विमान में है और साथ ही शस्र विहीन भी है । वह चुपचाप रावण की सारी बातें सुनता रहा और भीतर ही भीतर राम नाम का स्मरण करते हुए प्रभु के दर्शन की कल्पना करता रहा ।

           इधर पंचवटी में लक्ष्मण कन्द-मूल- फल इकट्ठे करने वन में गए हैं । राम-सीता के मध्य कुटिया में वार्तालाप चल रहा है । राम कहते हैं - ‘ सीते ! चेहरे को विकृत कर दिए जाने से क्रुद्ध हुई सूपनखा रावण के पास गई है और रावण अपनी बहिन के अपमान का बदला लेने आता ही होगा । अब समय आ गया है उसका वध करने का । तुम्हें कोई हानि नहीं पहुंचे इसलिए तुम अग्नि में प्रवेश कर जाओ और अपनी माया से छाया सीता को मेरे साथ कर दो । मैं शीघ्र ही इन दुष्टों का नाश कर दूँगा ।’

            आदर्श पत्नी वही होती है, जो पति के किए प्रत्येक संकेत को समझ जाए । भगवान राम के ऐसा कहते ही सीता अग्नि में प्रवेश कर गई और अपनी माया के बल से अपनी सजीव प्रतिकृति (छाया सीता) उस कुटिया में उपस्थित कर दी । छाया सीता का रूप, रंग और व्यवहार मूल सीता से तनिक भी भिन्न नहीं था । कन्द-फल लेकर लौट आए लक्ष्मण भी इस भेद को समझ नहीं पाए । आधुनिक युग में भी असल नक़ली का भेद समझ में कहां आता है । कई बार तो नक़ली असली की तुलना में अधिक प्रभावशाली होता है जिससे लोग भ्रमित होकर नक़ली को ही असली समझ बैठते हैं ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Thursday, November 5, 2026

सम्भवामि युगे युगे -64

 सम्भवामि युगे युगे -64

        असुर प्रायः आपस में कभी लड़ते नहीं हैं, वे तो देवताओं से ही लड़ने-भिड़ने को आतुर रहते हैं । सारे असुरों में बड़ी एकता होती है । किसी भी देश की आंतरिक स्थिति कैसी है वह वहां के निवासियों की दैवी और आसुरी सम्पदा के अनुपात पर निर्भर करती है । देश के जिस क्षेत्र में आसुरी सम्पदा की बहुतायत होती है तो वह क्षेत्र सदैव अशान्त बना रहता है । जहां केवल आसुरी लोग रहते हैं, वे पड़ौस के दैवी संपदा बहुल क्षेत्र पर आक्रमण करते रहते हैं । ऐसे दैवासुर संग्राम आदिकाल से होते आ रहे हैं और तब तक होते रहेंगे जब तक प्रलय नहीं हो जाता । 

         मारीच भी रावण से भिड़ने को उत्सुक नहीं है क्योंकि वह जानता है कि इससे भिड़ने पर जान तो उसकी ही जाएगी । जो राजा हो, साथ ही जिसके हाथ में शस्त्र हो, उसका कभी भी विरोध नहीं करना चाहिए । जब दोनों ओर मरना ही निश्चित है तो फिर असुर के हाथों मरने से अच्छा है, भगवान के हाथों मरना ।  

        रावण ने अपनी योजना मारीच को स्पष्ट की । मारीच को स्वर्ण-मृग बनना होगा । जैविक इतिहास में सोने के हिरण का कोई विवरण उपलब्ध नहीं है अर्थात् सोने का हिरण होता ही नहीं है । यदि कहीं स्वर्ण मृग दिखलाई दे तो समझ जाएं कि वह माया है । मारीच अपनी सीखी हुई माया से स्वर्ण मृग बन सकता है ।

          प्रश्न उठता है कि स्वर्ण मृग ही क्यों, साधारण मृग क्यों नहीं ? देखने में कृष्ण मृग भी कम आकर्षक नहीं होता, उसकी नाभि में तो सुगन्ध फैलाने वाली कस्तूरी भी होती है, परन्तु रावण मारीच को स्वर्ण मृग बनने का ही कहता है । रावण जानता है कि प्रत्येक स्त्री को स्वर्ण प्रिय होता है, उसका सोने के प्रति अत्यधिक आकर्षण होता है । स्वर्ण मृग को देखकर वह (सीता) मचल उठेगी और अपने पति से उसका शिकार करने का कहेगी । राम का बाण लगते ही मारीच लक्ष्मण को पुकारेगा । पुकार सुनकर लक्ष्मण दौड़ पड़ेगा और पीछे से अकेली रह गई सीता का मैं हरण कर लूंगा । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, November 4, 2026

सम्भवामि युगे युगे -63

 सम्भवामि युगे युगे -63

          आसुरी स्वभाव रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति एक असुर का स्वभाव जानता है । सूपनखा जानती है, रावण का स्वभाव । इसलिए दण्डकारण्य के दो मनुष्यों के साथ रहने वाली सुन्दर नारी का ज़िक्र अवश्य करती है । स्त्री, प्रत्येक असुर की सबसे बड़ी कमजोरी । यही रावण की भी है और यही कमजोरी आज प्रत्येक व्यक्ति में घर करती जा रही है । सूपनखा को आश्वस्त किया गया - तुम्हारे अपमान का बदला अवश्य लिया जाएगा । रात को अपने शयनकक्ष में चिंतित रावण इधर-उधर घूम रहा है । मंदोदरी चिंतित होने का कारण पूछ भी रही है, परंतु रावण कोई उत्तर नहीं देता । अचानक एक योजना बनाता है - सीता-हरण की । परन्तु सूपनखा ने तो कहा था कि वे बड़े बलशाली है । तभी उसे याद आता है - मायावी मारीच । वस्त्र धारण किए और चल पड़ा मारीच के समुद्र तट पर स्थित निवास स्थान की ओर ।

              माया दो प्रकार की - विद्या माया और अविद्या माया । अविद्या माया का उपयोग आसुरी स्वभाव वाले करते हैं और विद्या माया दैवी स्वभाव वाले । विद्या माया आपको परमात्मा तक ले जाती है और अविद्या माया आपको संसार में उलझाकर रख देती है । रावण कम ज्ञानी था क्या ? सबकुछ जानता था वह । वह जानता है कि मारीच ऐसी माया जानता है कि वह बड़े से बड़े कथित ज्ञानी मनुष्य तक को भ्रम में डाल सकता है । माया से पार पाना बहुत कठिन है परन्तु भगवान गीता में कहते हैं कि जो मेरी शरण लेता है, वह इस माया से पार हो जाता है । 

          आज मारीच के पास चल कर गया है रावण । कहता है - ‘मारीच, तू मायावी हरिण बन जाना । आगे मेरा काम ।’ मारीच - ‘आगे क्या काम है आपका ?’ रावण - ‘मुझे उस सुन्दर नारी का अपहरण करना है जो दण्डकारण्य में उन दो युवकों के साथ है ।’ सुनकर मारीच को पूर्व का घटनाक्रम स्मरण हो आता है । वह कहता है कि वे राम-लक्ष्मण है और अयोध्या के राजकुमार हैं । उनके द्वारा चलाए गए बिना फल के बाण से ही तो वह इतनी दूर लंका में आकर गिरा था । विविध भांति समझाता है मारीच, परन्तु रावण को कुछ समझना ही नहीं था इसलिए जानते हुए भी समझा नहीं ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Tuesday, November 3, 2026

सम्भवामि युगे युगे -62

 सम्भवामि युगे युगे -62

         आसुरी शक्तियां जब सक्रिय होती हैं, तब पतन का माध्यम बनता है - काम । नारी का आभूषण है, लज्जा परन्तु काल-चक्र जब घूमता है तब लज्जा दूर की कौड़ी हो जाती है । अभी चित्रकूट से निकलते समय अत्रि पत्नी अनुसुइयाजी ने सीताजी को पतिव्रत धर्म का उपदेश दिया था और इधर दण्डकारण्य में सूपनखा कितनी निर्लज्जता से बात कर रही थी । जब नारी लज्जा का त्याग कर देती है, समाज पतन की ओर अग्रसर हो जाता है । जिस बेबाक़ी से युवा लड़कियां आज जन्तर-मन्तर पर गालियाँ बक रही हैं, उसे निर्लज्जता की पराकाष्ठा नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे ? त्रेता में तो एक सूपनखा थी, यहां तो पग-पग पर कई सूपनाखाएँ एक साथ घूम रही हैं । 

            अनुसुइयाजी का पातिव्रत्य-धर्म का ज्ञान भारत जैसे सांस्कृतिक देश में इतनी शीघ्रता से सिसकियाँ लेने लगेगा, कल्पनातीत है । परन्तु हम वास्तविकता से कब तक मुंह मोड़ते रहेंगे ? अब राम नहीं आने वाले इस संस्कृति को बचाने क्योंकि जब तक हम स्वयं उन्हें बुलाएँगे नहीं तब तक वे नहीं आने वाले । इसके लिए हमें सर्वप्रथम हमारे भीतर सुप्त पड़ी दैवी सम्पदा को जाग्रत करना होगा । ऐसा नहीं करेंगे तो सूपनखा की बात सुनकर कई रावण एक साथ हमारी संस्कृति को मटियामेट करने के लिए टूट पड़ेंगे और साथ देंगे हमारे ही बीच बैठे मारीच, जो पहले से ही जानते हैं कि दोनों तरफ़ मरना निश्चित है । 

            विकृत मुख लेकर रोते हुए सूपनखा पहुंचती है, अपने भाई लंकानरेश रावण के पास । कारण जानते ही क्रोधित हो जाता है, रावण । फिर भी आशंकित है, अपनी मृत्यु को लेकर । रावण को एक मनुष्य से चुनौती मिली है तो वह कोई साधारण मनुष्य तो हो नहीं सकता । कुछ क्षण सोचता है और अंतिम निर्णय पर पहुंच जाता है । निर्णय - यदि साधारण मनुष्य है तो मेरे हाथों मारा जाएगा और साक्षात् परमात्मा है तो उसके हाथों मरना भी मेरे लिए कल्याणकारी होगा ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Monday, November 2, 2026

सम्भवामि युगे युगे -61

 सम्भवामि युगे युगे -61

              खर दूषण, रावण के भाई । बल में रावण से उन्नीस नहीं, उसके समान ही थे । जब अपात्र के पास सीमा से अधिक शक्ति आ जाती है तो उसका दुरुपयोग होने लगता है । दूसरों को अकारण सताने में ही उन्हें आनंद मिलता है । वे ऋषियों के यज्ञादि कर्मों में बाधा डालने लगे, इस वन में ऐसा आतंक था, उन दोनों भाइयों का । 

          आतंक जब एक सीमा से अधिक बढ़ जाता है तब उसका ख़ात्मा करना आवश्यक हो जाता है । आज सूपनखा के कारण उनके ख़ात्मे का दिन आ ही गया है । खर और दूषण बल के मद में चूर होकर राम-लखन को चुनौती दे बैठे । जीवन में चाहे आप किसी भी क्षेत्र (बल, धन आदि) की ऊंचाई को छू लें एक दिन वहां से पतन होना निश्चित है । इसलिए उनसे प्रभावित होकर जीवन में कभी भी अहंकार नहीं पालना चाहिए । अहंकार ही व्यक्ति के पतन की राह प्रसस्थ करता है ।

          बल के अहंकार ने खर-दूषण को मार डाला । राम-लखन असुरों के ख़ात्मे की दिशा में एक कदम आगे बढ़ चुके थे । प्रतीक्षा है रावण को कुछ उल्टा पुल्टा करने को विवश कर देने की, जिससे उसके विनाश का आधार तैयार हो सके । इस काम के लिए तो एक सूपनखा का होना ही पर्याप्त है ।

           कहने को तो सूपनखा एक स्त्री है परंतु प्रश्न है कि क्या वह वास्तव में एक नारी है ? जब स्त्री में काम भाव लज्जा से ढका नहीं रहता, उघड़ जाता है तब उसके स्त्री होने पर भी प्रश्न चिन्ह लग जाता है । हाँ, एक पुरुष की तुलना में काम-भाव स्त्री में कई गुना अधिक होता है परंतु वह अपने काम की संतुष्टि के लिए पुरुष को पहले आमंत्रण कभी नहीं देती । जब वह पुरुष को पहले आमंत्रित करने लगे तो समझ लें कि उसका स्त्रीत्व नष्ट हो चुका है । जिस स्त्री का स्त्रीत्व समाप्त हो चुका है, उसके आमंत्रण को पुरुष भी ठुकरा देता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, November 1, 2026

सम्भवामि युगे युगे -60

 सम्भवामि युगे युगे -60

       कई वर्षों से वह क्षेत्र सूना ही पड़ा था । भला कौन जीव उस शापित वन में रहने का ख़तरा मोल लेता । राक्षसों को वह स्थान अपने लिए उपयुक्त लगा । वे वहाँ आकर रहने लगे । दण्डक वन के आस-पास के क्षेत्र में ऋषि तप, यज्ञ आदि करते थे । राक्षस उन्हें सताते और मार डालते । राम का आगमन अब इस वन क्षेत्र को पुनः समृद्ध कर देगा, अगस्त्य ऋषि ने ऐसा सोचकर ही उन्हें पंचवटी में निवास करने को कहा ।

         एक बार सूपनखा जोकि रावण की सगी बहन थी, पंचवटी के आस-पास यूं ही वन में घूम रही थी । एक दिन भगवान की सक्रिय माया के प्रभाव क्षेत्र में प्रवेश कर गई । दो सुन्दर नवयुवकों को देखकर कामातुर हो गई ।आसुरी स्वभाव को कुछ समय के लिए त्याग दिया । सुन्दर नारी का रूप बनाकर विवाह हेतु अनुनय-विनय करती रही । दोनों युवक एक दूसरे के पास भेजते रहे । अपने को असफल होता देखकर उसने अपना मूल विकराल आसुरी स्वरूप प्रकट किया । देखकर सीताजी भय से काँपने लगी । राम के संकेत पर लखन ने उसके नाक-कान काट डाले । 

           कामातुर नारी की जब उपेक्षा होती है, तब वह अपने आपको बहुत अधिक अपमानित अनुभव करती है । अपमान के दंश से घायल नारी अधिक घातक हो जाती है । रोती बिलखती पहुंच गई अपने भाइयों, खर-दूषण के पास । कौन है इस वन में जिसने हमारी बहन को कुरूप किया है ? आज तक किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी जो हमें अपमानित करते हुए चुनौती दे सके । खर-दूषण का एकछत्र राज्य था वहाँ, उस वन में । बहुत सताया था ऋषियों को उन्होंने । तपस्वियों के यज्ञ में बाधा डालते और कई बार तो उनको मार कर खा जाते थे । ऋषि-हड्डियों के ढेर पर ढेर लगा दिए गए थे ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

 ।।

Saturday, October 31, 2026

सम्भवामि युगे युगे -59

 सम्भवामि युगे युगे -59

               भक्त और भगवान के मध्य वार्तालाप स्थिति की गंभीरता समझ समाप्त होता है । अंततः अगस्त्य ऋषि भगवान को रहने के लिए शापग्रस्त दण्डकवन में पंचवटी नामक स्थान का नाम सुझाते हैं । संत का हृदय कोमल होता है । कुम्भज ऋषि जानते हैं कि दण्डकारण्य में साधना करने वाले ऋषि-मुनि वहाँ रहने वाले राक्षसों से त्रस्त हैं । भगवान के पंचवटी में निवास करने से दो लाभ होंगे, एक तो ऋषियों को राक्षसों से मुक्ति मिल जाएगी और दूसरा, दण्डक वन भी शाप-मुक्त हो जाएगा ।  

                    अगस्त्यजी तो त्रिकालदर्शी थे । वे जानते थे कि राम का वन में घूमना निरुद्देश्य नहीं है । उनके उद्देश्य की पूर्ति कैसे होगी, वे यह भी जानते थे । इसीलिए उन्होंने राम को दंडक वन में आगे जाकर गोदावरी के तट पर पंचवटी नामक स्थान पर कुटिया बनाकर निवास करने का आग्रह किया । रास्ते में जटायु से भेंट होती है । जटायु की भक्ति देखकर भगवान प्रसन्न होते हैं । गोदावरी के तट पर पहुंचकर एक सुंदर आश्रम का निर्माण कर राम अपनी भार्या और अनुज के साथ वहाँ निवास करने लगते हैं ।

           दण्डक वन भी शापित है । इक्ष्वाकु वंश में एक राजा हुए थे - दण्ड । दण्डकारण्य में कभी राजा दण्ड का ही समृद्ध राज्य हुआ करता था । दण्ड के द्वारा की गई एक गलती से उसका राज्य तहस नहस हो गया । हुआ यूँ कि एक बार दानवों के गुरु ऋषि शुक्राचार्य की पुत्री अरजा भ्रमण पर थी । उसका सामना राजा दण्ड से हो गया । दण्ड ने उस कन्या के साथ अनुचित और अशोभनीय व्यवहार किया । 

            राजा दण्ड द्वारा किए गए व्यवहार से दुःखी होकर अरज़ा रोती हुई अपने पिता के पास गई । शुक्राचार्यजी सारी घटना सुनकर क्रोधित हो गए । उन्होंने राजा दण्ड के राज्य को नष्ट होने का शाप दे डाला । शाप के परिणाम स्वरूप दण्ड के राज्य में भयंकर विनाश हुआ । वहाँ की सारी स्मृद्धि मटियामेट हो गई । कालांतर में उस निर्जन स्थान पर घना वन विकसित हुआ, जिसे दण्डकारण्य कहा जाने लगा ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम्।।

रणम् ।।