Thursday, October 15, 2026

सम्भवामि युगे युगे -43

 सम्भवामि युगे युगे -43

             विधि का विधान देखिए, सुबह से राजद्वार पर खड़ा सजा-धजा रथ राजा को प्रातःक़ालीन भ्रमण पर ले जाने के लिए तैयार खड़ा है और अब तपस्वी भेष में राम, जानकी और लखन लाल को इसी रथ से सारथी सुमंत्र वन में छोड़ने जा रहे हैं । विधि का विधान ही कुछ ऐसा है कि हम सोचते कुछ हैं और हो जाता कुछ और ही है । कहां तो राम का आज राज्याभिषेक होना निश्चित था और कहां अब वे ही राम वनगमन को तैयार हैं । माया का खेल समझना असम्भव है । जिसने इसको समझ लिया वह फिर माया में उलझता नहीं है बल्कि संसार चक्र से बाहर हो जाता है । 

        सुमंत्र ने तीनों को रथ पर चढ़ाया और बढ़ चले शहर से बाहर निकलने वाली राह पर । अयोध्या के जन राम के वनगमन का समाचार पाते ही राजभवन की ओर दौड़ पड़े । कुछ समय रहते पहुंच पाए वे तो रथ के पीछे हो लिए, जो देर से पहुंचे वे राम-राम करते रथ के पहियों की लकीरों को ढूंढ़ते इधर-उधर बदहवास से घूमने लगे । 

            जब जीवन का संध्याकाल आ जाता है, तब जाकर होश आता है कि परमात्मा को ढूंढ़े । कहां छिपा है, वह ? वह तो स्वयं के भीतर ही है और हम जगत् में ढूंढ़ने निकल पड़ते हैं । पहले अपने भीतर प्रवेश कर उसे ढूंढ़ो, उसी को अनुभव करो फिर जगत् में भी उसी की अनुभूति होगी । पहले उसे जगत् में ढूंढ़ने निकलोगे तो वह वहां होते हुए भी नहीं दिखेगा । जिस दिन अपने भीतर उसे देख लोगे उसके बाद सर्वत्र एक वही दिखेगा । उसे ढूंढ़ने की यात्रा बाहर की न होकर भीतर की यात्रा है । जब यह यात्रा पूरी होगी तब जाकर बाहर-भीतर का सारा भेद मिटेगा उससे पूर्व नहीं ।

 क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम्।।

णम् ।।

Wednesday, October 14, 2026

सम्भवामि युगे युगे -42

 सम्भवामि युगे युगे -42

            समय केवल माता-पिता और पुत्र की परीक्षा ही नहीं लेता बल्कि यह परीक्षा पूरे परिवार की होती है । हमारा सामाजिक और पारिवारिक ताना-बाना ऐसी सांस्कृतिक डोर से बुना गया है कि इसको कहीं से भी थोड़ा सा छेड़ा जाए तो उसकी तरंगे डोर के अंतिम सिरे तक पहुंच जाती है । यही कारण है कि सनातन संस्कृति को समझने वाले अपने परिवार की प्रत्येक कड़ी पर ध्यान केंद्रित रखते हैं । प्रत्येक कड़ी का ध्यान न रखने के कारण ही इस कलियुग में पारिवारिक ढाँचा चरमरा रहा है, फिर यह तो त्रेता की बात है । कैकेयी के दो वरदानों ने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया । धीरे-धीरे एक-एक कर सभी कड़ियाँ इससे प्रभावित होने जा रही है । यही तो माया का खेल है ।

                प्रत्येक परिवार में धीरे-धीरे इसी प्रकार परिस्थितियां बनती बिगड़ती रहती है । राम को तो वन में जाना आवश्यक है क्योंकि लंका तक पहुंचने के रास्ते में कई जन उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं । राम तो निश्चित ही वन को जाएंगे परन्तु माया का संचालन करने के लिए सीता का भी साथ होना आवश्यक है । सीता और लक्ष्मण साथ हो जाते हैं क्योंकि जय-विजय के उद्धार में इन दो की भूमिकाएं भी महत्वपूर्ण होने जा रही है । परीक्षा कौशल्या की भी है, साथ ही उर्मिला और भरत की भी । कैकेयी जानती है कि उसको अपयश का भागी बनकर उपेक्षित रहते हुए वैधव्य जीवन भोगना होगा । परिवार में केवल एक कैकेयी ही ऐसी है, जो चाहकर भी अपना दुःख प्रकट नहीं कर सकती । रामकाज के लिए कई दुःख हृदयांगम करने होते हैं । कैकेयी का ऐसा उपेक्षित जीवन होगा कि उससे जन्म लेने वाला पुत्र ही उससे दूर हो जाएगा । स्त्री सब कुछ सह सकती है परंतु पुत्र द्वारा किया गया अपमान उसे भीतर ही भीतर तोड़ देता है । फिर भी कैकेयी उसी परिवार में रहते हुए अपने भीतर दुःखों का सागर समेटे एकाकी जीवन बिताएगी ।

              राम, सीता और लखन की वन यात्रा प्रारम्भ होने जा रही है । सबसे आशीर्वाद और आज्ञा लेकर वल्कल वस्त्र धारी तीनों जने सुमन्त्रजी के साथ दशरथजी के पास पहुंचते हैं । बड़े भारी मन से वनगमन की आज्ञा देते हुए नरेश व्यथित हो जाते हैं । सुमन्त्र को पास बुलाकर कहते हैं कि दो-चार दिन वन में घुमाकर लौटा लाना । बड़ी भारी विडम्बना है कि मोह पाश में बंधा दुःखी हृदय मृत्यु-शैय्या पर आ जाता है फिर भी आशा नहीं छोड़ पाता । आशा की किरण प्राणों की लौ से भी तेज होती, प्राण लौ तो बुझ जाती है परन्तु आशा की किरण जन्म-जन्मांतर तक नहीं बुझ पाती ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Tuesday, October 13, 2026

सम्भवामि युगे युगे -41

 सम्भवामि युगे युगे -41

          व्यक्ति विधि के लिखे विधान को पलटने का भरसक प्रयास करता है । यह विधि ही मायापति की माया है । कर्म हम करते हैं और उन कर्मों के अनुसार परमात्मा विधि से हमारा विधान लिखाते हैं । यह बात हमारी समझ से बाहर रहती है, तभी तो हम प्रत्येक परिस्थिति के लिए किसी दूसरे को ज़िम्मेवार ठहराने का प्रयास करते हैं जबकि वास्तविकता है कि प्रत्येक परिस्थिति के लिए हम स्वयं ही ज़िम्मेदार होते हैं । मैं तो कहूँगा कि हम इतना सब जानते हुए भी अनजान बने रहते हैं क्योंकि हमारा विश्वास अपने शास्त्रों पर तनिक सा भी नहीं है । यही कारण है कि हम विधान को स्वीकार करने के स्थान पर उसे अपनी शक्ति से बदलने का प्रयास करते हैं । इस प्रयास के पीछे हमारा सांसारिक मोह है । दशरथजी भी तो यही कर रहे हैं । 

              कैकेयी को दिए हुए वचनों को निर्मूल करने का एक ही रास्ता बचा है, दशरथजी के पास । वे राम को कहते हैं कि तुम अयोध्या के सेनापति हो, राज्य की सुरक्षा के नाम पर मुझे गिरफ़्तार कर लो और अवधपति बन जाओ । इससे तुम्हारे सामने वचन पालन की बाध्यता नहीं रहेगी । परंतु राम कोई औरंगज़ेब तो थे नहीं कि अपने पिता (शाहजहां) को गिरफ़्तार कर जेल में डाल देते और शासन अपने हाथ में ले लेते । आज के युग में एक सेनापति राजा को इतना कहने का भी समय नहीं देता, उससे पूर्व ही उसे गिरफ़्तार कर जेल में डाल देता अथवा फांसी पर लटका देता । परंतु राम कोई साधारण मनुष्य नहीं है, वे तो मर्यादा पुरुषोत्तम है ।

           जिनका जन्म भी मर्यादित हो और कर्म भी, वे भला ऐसी गलती कैसे कर सकते हैं ? राम ने अपने पिता को समझाया कि आपका ऐसा कहना उचित नहीं है । आपकी आन-बान और शान को अक्षुण बनाए रखना मेरा प्रथम कर्तव्य है । मैं ऐसा कुछ भी नहीं कर सकता जो नियम विरुद्ध और निन्दनीय हो । पिताजी, आप मुझे वन-गमन की आज्ञा दें । समय आपकी और मेरी परीक्षा ले रहा है और उस परीक्षा के परिणाम से ही भविष्य में इतिहास लिखा जाएगा ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Monday, October 12, 2026

सम्भवामि युगे युगे -40

 सम्भवामि युगे युगे -40

              इधर कैकेयी रणचण्डी बनी बैठी है और उधर दशरथ राम-राम की रट लगाते बार-बार मूर्छित हो रहे हैं । इस धरती पर चाहे कितनी ही बड़ी घटना हो जाय, भास्कर का रथ कभी नहीं रुकता । भोर को होना ही था । कैकेयी का रनिवास सूना पड़ा था और इधर कोप- भवन में राज-परिवार का टूटता ताना-बाना एक कोने में पड़ा सिसक रहा था । ब्रह्ममुहूर्त में जाग जाने वाले राजा आज कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे । सुमन्त्र के सारथी जीवन में आज पहली बार ऐसा हुआ था कि रथ तैयार है और रथी का कोई अता-पता नहीं है । ढूंढ़ते-ढूंढ़ते कोप-भवन तक पहुंच गए । राजा की दशा का कारण कैकेयी के अलावा दूसरा कोई नहीं बता सकता है । कारण बताने के स्थान पर आदेश दिया कि राम को राजा से मिलने भेजा जाय ।

             सेवक की कभी हिम्मत नहीं होती कि वह प्रतिप्रश्न कर सके । सुमन्त्र ने तत्काल ही राम को संदेश पहुंचा दिया । राम तो साक्षात् परमात्मा हैं, भला उनसे कोई बात छिपी कैसे रह सकती है ? फिर भी लोकाचार के नाते कोप-भवन में प्रवेश कर माता-पिता को प्रणाम किया और कैकेयी से राजा की इस दशा का कारण जानना चाहा । कैकेयी ने रात की सारी घटना बता दी । रघुकुल की रीति, राम की शपथ, दो वरदान और पिता का पुत्र-मोह । राम कोई साधारण मनुष्य नहीं है कि विपरीत बात सुनकर संतुलन खो दे । समता में रहते हुए बोल पड़े - ‘बस, इतनी सी बात ! चौदह वर्ष ही क्यों, राजा के वचनों की साख के लिए उनका राम जीवन भर वन में रहने को तैयार है ।’

               अश्रु भरे नयनों ने राम की बातों की सराहना की परंतु दशरथ तो राम नहीं है न ! भीतर के भाव आंसू बन प्रवाहित हो चले और भावुक पिता ने पुत्र को हृदय से लगा लिया । जो एक पल के लिए पुत्र को अपनी दृष्टि से दूर नहीं रखना चाहते, वे कैसे अपने पुत्र को चौदह वर्ष के लिए वनगमन का आदेश दे सकते हैं । कैकेयी के द्वारा कहे गए शब्दों पर राजा दशरथ का मौन रह जाना, चौदह वर्ष के वनवास के आदेश पर मोहर लगा रहा था । इस समय निर्णय राम को ही करना है । नहीं, ऐसा हमारी सोच कह सकती है, मैं तो कहता हूँ कि यह राम का ही निर्णय है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

 ।।

Sunday, October 11, 2026

सम्भवामि युगे युगे -39

 सम्भवामि युगे युगे -39

              रात होने पर दशरथजी कैकेयी के रनिवास पहुंचे । परंतु यह क्या, यह तो सूना पड़ा है । परिचारिका से पूछा तो उसने कोपभवन की ओर संकेत कर दिया । सदा सजी-धजी रहने वाली प्राणप्रिया आज बाल बिखेरे किसी रणचण्डी से कम नहीं लग रही थी । बड़ी मान-मनोव्वल करनी पड़ी राजा को, तब जाकर कैकेयी थोड़ी बहुत बात करने लगी । राम की शपथ दिलाकर राजा के पास अमानत के रूप में पड़े दो वरदान मांग लिए - भरत के लिए राज्य और तपस्वी भेष में राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास । 

          राज्य चाहे राम को मिले अथवा भरत को, राजा को इससे कोई फ़र्क़ पड़ने वाला नहीं है परंतु राम से दूरी वे सहन नहीं कर सकते । कैकेयी को बहुत प्रकार से समझाया, यहां तक कि उसके पैरों तक में गिर पड़े परंतु आज तो मायातीत की माया ने सुकोमल कैकेयी को भी पाषाण हृदयी बना दिया था । ‘नहीं, राम को वन में जाना ही होगा, आपने राम की शपथ ली है । आप अपने वचन से भले ही टल जाएं परंतु टलने से पहले रघुवंश की कीर्ति का ध्यान कर लें ।’ कैकेयी किसी काली नागिन की तरह फ़न फैलाए फुँफकार रही थी ।

              नारी के मोहपाश में जकड़ा पुरुष अपना भला-बुरा नहीं समझता । इसी बंधन में बंधा वह उचित-अनुचित का विचार किए बिना पत्नी ही नहीं, किसी भी स्त्री को वचन दे सकता है । आज ये वचन तीर की भांति राजा दशरथ के हृदय को विदीर्ण कर रहे थे । उन्हें वर्षों पूर्व हुई उस घटना का स्मरण हो आया जब पुत्र वियोग में अंधे माता-पिता प्राण त्याग रहे थे । राजा समझ गए कि उनके कर्म का परिणाम आज उनके समक्ष आकर खड़ा हो गया है । राम से होने वाला वियोग ही उनकी मृत्यु का कारण बनने जा रहा है । उन्होंने कैकेयी को समझाने का अंतिम प्रयास किया परन्तु उसको मानना नहीं था तो मानी ही नहीं । तीन हठ प्रसिद्ध हैं - त्रिया-हठ, बाल- हठ और राज-हठ, परन्तु त्रिया-हठ के सामने शेष दोनों हठ बहुत बौने हैं ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Saturday, October 10, 2026

सम्भवामि युगे युगे -38

 सम्भवामि युगे युगे -38

           कैकेयी इतना सबकुछ जानकार विस्मित रह गई । एक तरफ़ उसका सुहाग है और दूसरी ओर परमात्मा का कार्य । माता को असमंजस में घिरा देखकर राम बोले - ‘ माता, आप यह सुना हुआ सब विस्मृत कर दें । आप परिस्थिति बनाने बिगाड़ने वाली कौन होती है ? परिस्थितियों को नियंत्रित करना प्रकृति का कार्य है । माया को अपना कार्य करने दे । आप निश्चिंत होकर रात्रि की प्रतीक्षा कीजिए ।’ इतना कहकर राम ने कैकेयी को प्रणाम किया और वहाँ से निकल गए ।

                इसे परमात्मा की माया का प्रभाव कहें अथवा पुत्र के वचन सुनकर माता के हृदय को लगा आघात, कैकेयी घटनाक्रम को विस्मृत कर बैठी । सुन्न होकर बैठी कैकेयी को याद नहीं रहा कि पुत्र ने क्या कहा परन्तु ऐसा आभास अवश्य हो रहा था कि निकट भविष्य में अवश्य कुछ अशुभ घटित होने जा रहा है । सिर को एक हल्का सा झटका देकर कैकेयी उठी और पूर्व की भांति दैनिक कार्यों में व्यस्त हो गई ।

             राम ने मां के पास जाकर बहुत कुछ कहते हुए भी कुछ नहीं कहा क्योंकि कैकेयी सब कुछ भूल चुकी है । अब माया का खेल शुरू अर्थात् फिर से संसार की उठापटक । मंथरा जोकि कैकेयी की सेविका थी, राजमहल जाने के लिए घर से निकली । अयोध्या को सजती देखकर विस्मय करने लगी । किसी से पूछा तो पता चला कि राम का कल राज्याभिषेक होने जा रहा है । दुःखी हुई क्योंकि अब तो राजमाता का पद कौशल्या का होगा । कैकेयी की भी जब पूछ नहीं रहेगी तो उसके सामने बेचारी मंथरा की क्या बिसात ? राजमहल पहुंचकर वही सब कुछ किया जो ईर्ष्या की मारी एक स्त्री करती है । परंतु कैकेयी कोई साधारण स्त्री तो थी नहीं, बड़ी विदुषी और बहादुर थी वह । माया को मंथरा के माध्यम से बड़ा संघर्ष करना पड़ा तब कहीं जाकर कैकेयी कोप-भवन में जाने को राज़ी हुई । कोप-भवन राजमहल का वह भाग, जहां जाकर कोई भी पटरानी राजा से अपनी नाराज़गी व्यक्त कर सकती थी । देखा गया है कि काम पिपासु व्यक्ति इसी जगह आकर स्त्री के समक्ष समर्पण कर बैठता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Friday, October 9, 2026

सम्भावामि युगे युगे -37

 सम्भवामि युगे युगे -37

            ‘ऐसा कौन सा कारण है राम, जो उन्हें मृत्यु-द्वार तक ले जाएगा’ - कैकेयी ने उत्सुकता जताई । राम ने कहा - ‘‘मां, एक बार पिताजी शिकार करने के लिए वन में गए थे । अचानक उन्हें एक दिशा से कुछ आवाज़ सुनाई दी, जिससे उन्हें लगा कि कोई हिंसक पशु तालाब से पानी पी रहा है । शिकार करने के लिए उन्होंने उस दिशा में शब्द-भेदी बाण चला दिया । पास जाकर देखा तो कोई युवा दर्द के मारे तड़प रहा था । पिताजी को बड़ा पश्चाताप हो रहा था । उन्होंने उस युवक को सहारा देकर बिठाया ।

          युवक ने बताया कि वह अपने अन्धे माता-पिता को तीर्थ-यात्रा पर लेकर जा रहा है । दोनों ही प्यासे हैं । उन्होंने मुझसे जल पिलाने की मांग की तो जल भरने यहां चला आया । मैं तो मर रहा हूँ, कृपा करके मेरे अन्धे वृद्ध माता-पिता के पास जाकर उन्हें जल पिला दें । इतना कहकर युवक ने प्राण त्याग दिए । दुःखी राजा जल लेकर ढूंढ़ते हुए वृद्ध दंपति के पास पहुंचे । युवक के पिता ने पद-चाप सुनकर कहा - ‘बेटा श्रवण, आ गए ! बड़ी देर कर दी ।’ पिताजी ने उनको जल पिलाने का प्रयास किया परंतु उनके मौन ने सब कुछ स्पष्ट कर दिया था । पिताजी ने अनजाने में हुई घटना पर दुःख प्रकट किया और क्षमा मांगते हुए जल पीने का आग्रह किया परंतु दोनों ने रोते हुए इनकार कर दिया ।

              प्राण त्यागते प्यासे वृद्ध दंपति ने पिताजी को श्राप दिया कि जैसे हम पुत्र वियोग में शरीर त्याग रहे हैं, ऐसे ही एक दिन आप भी पुत्र वियोग में मृत्यु शैया का वरण करेंगे । आज वही श्राप, पिताजी को मरने की स्थिति तक ले आया है ।” राम आगे कहते हैं कि अपने कर्मों का परिणाम ही व्यक्ति भुगतता है । इसके लिए किसी दूसरे को दोष नहीं दिया जा सकता । इसलिए माता आप दुःखी न हो, जो होना है वह तो होकर रहेगा । इसमें आप और मैं अथवा कोई दूसरा कर भी क्या सकता है ? समझदार वही है, जो सबकुछ जानकर बिना विचलित हुए प्रत्येक परिस्थिति का सदुपयोग करे ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।