Wednesday, October 28, 2026

सम्भवामि युगे युगे -56

 सम्भवामि युगे युगे -56

             चित्रकुट । एक ही स्थान पर रहते हुए बारह वर्ष बीत गए हैं । वन में आने का एक उद्देश्य असुरों से मुक्ति दिलाते हुए ऋषियों को भययुक्त करना भी है । रास्ते में बाली को परास्त कर रघुवंश का राजमुकुट भी लेना है । मुख्य दृष्टि तो रावण-कुम्भकर्ण बने जय-विजय पर टिकी है । कैसे उनको एक बार फिर से मुक्त करें ? सीता के साथ मिलकर योजना बनाई गई । योजना परमात्मा की और उसके क्रियान्वयन की ज़िम्मेवारी प्रकृति पर । प्रकृति ने अपनी माया को सक्रिय किया ।

         चित्रकूट को अब छोड़ना होगा । रास्ते में कई ऋषि-मुनि और भक्तजन उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं । चित्रकूट से आगे की यात्रा प्रारम्भ होती है । राम आगे चल रहे हैं, लक्ष्मण सबसे पीछे हैं और बीच में सीता चल रही है । मानस में तुलसी इसका वर्णन करते हुए लिखते हैं कि राम और लखन के मध्य सीता चलते हुए ऐसे शोभित हो रही है, जैसे ब्रह्म और जीव में बीच माया होती है । मनुष्य की विडंबना है कि उसके और ब्रह्म के बीच माया आ जाती है जिससे वह माया के आकर्षण में ही फँस कर रह जाता है, ब्रह्म की ओर दृष्टि तक नहीं जाती । 

            चित्रकूट से निकलते समय अत्रि-अनुसईयाजी से उनके आश्रम में भेंट करते हैं । सीताजी को विविध प्रकार के आभूषणों की भेंट के साथ अनुसुइयाजी द्वारा पतिव्रत-धर्म का उपदेश दिया गया । आगे बढ़ते हुए वे दण्डकारण्य में प्रवेश करते हैं । वहां ऋषि-मुनि तपस्या और यज्ञ आदि कर रहे हैं, उनमें राक्षस बाधा डालते हैं । 

            वहाँ की दशा देखकर भगवान प्रतिज्ञा करते हैं -“निसिचर हीन करउँ महि, भुज उठाइ पन कीन्ह ।” इस प्रकार उस क्षेत्र को राक्षसों से मुक्त कर सभी को निर्भय करते है । रास्ते में शरभंग ऋषि भी उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं, परमात्मा के सगुण रूप के दर्शन करने के लिए । दर्शन कर कृतार्थ हो जाते हैं और भेद-भक्ति का वरदान पाकर योगाग्नि से शरीर को त्यागते हुए आगे की यात्रा पर निकल जाते हैं । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

Tuesday, October 27, 2026

सम्भवामि युगे युगे -55

 सम्भवामि युगे युगे -55

                  बाली द्वारा दशरथ के साथ किए गए व्यवहार से अपमानित और दुःखी कैकेई अपनी बात कहकर चित्रकूट से विदा हो गई । राम तो जानते ही हैं कि आगे की यात्रा में उन्हें क्या क्या करना है ? परंतु मानव मन विवश है, अपनी चाही करवाने के लिए, यह जानते हुए भी कि जो होना है वह उसके बस में नहीं है और जो होगा वह राम की इच्छा से ही होगा ।

         चलिए ! चित्रकूट लौटते हैं । कैकेई से आशीर्वाद प्राप्त कर भगवान राम ने भरत को परिवार और सेना सहित अवध के लिए विदा किया । कैकेई और भरत का अपने प्रति अगाध प्रेम देखकर उनकी आँखें डबडबा आई ।

           उधर भरत सेना सहित अयोध्या पहुंचते हैं और सिंहासन पर राम की चरण पादुका रखकर नंदीग्राम चले गए। वहां कुटिया बनाकर एक तपस्वी का जीवन जीते हुए अयोध्या का राजकार्य देखने लगे । तपस्वी जीवन भी कैसा ? मानस में तुलसी लिखते हैं -

तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा । चंचरीक जिमि चंपक बागा ।। अयोध्या.-324/7।।

          नंदीग्राम में भरत कुटिया बनाकर बिना किसी राग के ऐसे निवास कर रहे हैं, जैसे भँवरा चम्पा के बाग में रहता है । भँवरा फूलों पर मंडराता रहता है और उनका रस लेता रहता है । परन्तु चम्पा के बाग में खिले हुए फूल देखकर भी भँवरा उदासीन ही बना रहता है ।

        भरत को परिवार सहित विदा करके राम अपने आश्रम लौटते हैं । भरत के भ्रातृ-प्रेम को देखकर बड़े भावुक हो गए । लक्ष्मण भी उनकी दशा देखकर द्रवित हो रहे हैं । संसार में यदि कुछ संग्रहणीय है तो एक मात्र प्रेम ही है । प्रेम से भावुक हुए राम स्वयं को सम्हालते हैं और लक्ष्मण के साथ आगे की योजना पर विचार करते हैं । चित्रकूट रहते हुए सब लोगों को उनका पता मालूम हो गया हैं । वे विचार करते हैं कि अब समय आ गया है, यहाँ से आगे प्रस्थान करना चाहिए ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

Monday, October 26, 2026

सम्भवामि युगे युगे -54

 सम्भवामि युगे युगे -54

                 राम के वनवास के पीछे हम मुख्यतः कैकेई के स्वार्थ को ही दोष दे देते हैं । इसी प्रकार कुछ इसका कारण मंथरा की ईर्ष्या भी बताते हैं । राम भी कैकेई से राजतिलक होने के मुहूर्त से एक दिन पूर्व मिले थे, यह भी वनवास का एक कारण है । इसी कड़ी में रघुवंश के राजमुकुट की वापसी का कैकेई द्वारा किया गया प्रयास भी तो एक कारण हो सकता है । कारण कुछ भी रहा हो परंतु यह सत्य है कि राम को वनवास हुआ था और वनवास देने की मांग निःसंदेह कैकेई की ही थी । 

    नारद को विश्वमोहिनी से विवाह करने से रोकने के लिए किया गया उपक्रम और प्रतिशोध स्वरूप नारदजी से मिला शाप भी तो एक कारण था । नारदजी को अपनी गलती का जब तक भान हुआ तब तक देरी हो चुकी थी । तीर जब कमान से निकल जाता है, फिर उसे लौटा लाने का कोई उपाय नहीं होता । होश आते ही नारदजी ने अपने दिए शाप के लिए क्षमा भी मांगी परंतु भगवान ने क्या कहा ? ‘मेरी इच्छा । मम इच्छा कह दीनदयाला ।’ सत्य है, उनकी इच्छा के बिना जगत् में पत्ता भी नहीं हिल सकता ।

         आज हम राम को दिए वनवास के पीछे के कारणों की विवेचना कर रहे हैं । देखा जाए तो वनवास का एकमात्र कारण हरि-इच्छा ही थी । विडम्बना है कि हम इस सत्य को स्वीकार कर नहीं पाते कि सबकुछ प्रभु की इच्छा से ही होता है । हम घटना घटित होने के बाद उसके कारणों की समीक्षा कर सकते हैं । हाँ, यह समीक्षा एक सीमा तक सीख लेने के लिए तो उपयोगी हो सकती है परंतु घटित घटना को आप तनिक भी परिवर्तित नहीं कर सकते । इसलिए आपके लिए घटित शुभ हो अथवा अशुभ, परिणाम को हरि इच्छा मानकर प्रसन्न रहना चाहिए । सब उस मायापति की माया की उठापटक है । न तो मंथरा दोषी है, न कैकेई और न ही देवर्षि नारद । कुछ नाम और भी जोड़े जा सकते । प्रत्येक घटना के पीछे एक मात्र परमात्मा की इच्छा ही कारण है । ऐसा स्वीकार कर लेने से मनुष्य सुख-दुःख के घेरे से परे निकल जाता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, October 25, 2026

सम्भवामि युगे युगे -53

 सम्भवामि युगे युगे -53

                   कैकेई ने आगे कहा - ‘राम ! कोई भी पत्नी अपने पति का अपमान सहन नहीं कर सकती । मैं भी उस अपमान को सहन नहीं कर सकी । दिन-रात उस मुकुट की वापसी के लिए उपाय खोजती रहती । जब तुम्हारे राजतिलक का समय आया तो मेरी दशरथजी के साथ उसी मुकुट को लेकर चर्चा हुई । यह बात हम दो ही जानते थे । उसी समय मैंने तुरंत ही तुम्हें वन में भेजने का निर्णय कर लिया क्योंकि मैं जानती थी कि वन में रहने वाले वानरराज बाली से यदि मुकुट कोई वापस ला सकता है तो वह है, केवल राम । इस प्रकार तुम्हें वनवास देने का कलंक मैंने अपने सिर पर ले लिया ।’  

       आंखों में उतर आए आंसुओं को छिपाते हुए बोली कि मैं यह नहीं जानती थी कि तुम्हारे मोह में जकड़े महाराज हमें छोड़ जाएंगे । पता होता तो संभवतः मैं अपने प्रतिशोध का कोई दूसरा रास्ता खोजती । इस प्रकार कैकेई ने अपनी बात पूरी की और रोने लगी । भगवान ने कैकेई को सांत्वना दी और आश्वासन दिया कि शीघ्र ही वे राजमुकुट लेकर अयोध्या लौटेंगे । 

        चित्रकूट में तो भगवान सबसे अन्त कैकेई से मिले थे परंतु जब वनवास की अवधि पूरी कर राम लौटे तो सबसे पहले माता कैकेई से मिले और उनके चरणों में रघुवंश का राजमुकुट रख दिया । कैकेई ने राम को आशीर्वाद देते हुए हृदय से लगा लिया और राजमुकुट उनके सिर पर रखते हुए उसी समय अवध का राजा घोषित कर दिया । बाद में वशिष्ठ मुनि ने विधि विधान से राजतिलक किया ।

          कैकेई को आज जिस दृष्टि से देखा जा रहा है, वह उसके साथ अन्याय है । उन जैसी सुंदर, विदुषी, बहादुर स्त्री तत्कालीन समय कोई दूसरी नहीं थी । भगवान राम ने सदैव उनको प्राथमिकता दी है वह उनकी उदारता हो सकती है फिर भी कैकेई में भी तो कोई न कोई विशेषता रही होगी । हमें भी उसकी उपेक्षा करने का कोई कारण नहीं की मिलता फिर भी कैकई आज तक को हेय दृष्टि से देखा जाता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

Saturday, October 24, 2026

सम्भवामि युगे युगे -52

 सम्भवामि युगे युगे -52

         राम बोले - ‘वह कैसे मां ? आप अपने आपको इतने वर्षों तक अपमान का दुःख क्यों सहन करती रही ? आपका पुत्र राम आपके मन की  शांति के लिए कुछ भी कर सकता है, आप आदेश तो करें ।’ 

             कैकेई -  ‘जब राजतिलक का मुहूर्त निश्चित हो गया तब मैं और महाराज बड़े प्रसन्न थे । इधर राजतिलक होना है और उधर रघुवंश का मूल राजमुकुट तो बाली के पास है । बिना उस मुकुट के राजतिलक होना कैसे सम्भव है ?’ मैंने उसी समय निश्चित कर लिया था कि राजमुकुट को वापस लाने का उपयुक्त समय आ गया है । मंथरा की ईर्ष्या ने मेरे मन की इस उलझन को सुलझाने सहायता की । महाराज के पास मेरे पूर्व के दो वरदान सुरक्षित रखे थे । मेरे मन में भरत को राजा बनाना कभी था ही नहीं । इसलिए मैंने प्रथम वर के रूप में भरत के लिए राज्य माँगा क्योंकि मैं जानती थी कि वह तुम्हारे होते इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा । दूसरे वरदान के रूप में मैंने राम के लिए वनवास इस कारण से माँगा कि एक तो तुम स्वयं यही चाहते थे और दूसरा, मैं जानती थी कि उस मुकुट को लाना केवल राम के ही वश की बात है ।’

             कैकेई ने आगे कहा - ‘अब वन में आगे वानर राज बाली से तुम्हारा सामना होगा । तेरे पिताजी का मुकुट उनके पास है । तुम्हें वह मुकुट उसे पराजित करके लाना है ।’ ‘परंतु माते ! पिताजी का मुकुट उसके पास पहुँचा कैसे ?’ राम ने उत्सुक होकर पूछा । तब कैकेई ने बाली तक मुकुट पहुँचने की कथा विस्तार से बताई - 

         ‘तुम्हारे जन्म से भी बहुत पहले की बात है । एक बार अयोध्या के राजा दशरथ का मृगया के लिए वन में गए थे । रास्ते में उनका बाली से सामना हो गया । उस समय मैं (महारानी कैकेई) उनके साथ थी । मेरी सुंदरता पर बाली पहले से ही मुग्ध था । मुझे महाराज के साथ देखकर वह मुझे प्राप्त करने की जुगत लगाने लगा । इसके लिए उसे महाराज को परास्त करना आवश्यक था । बाली ने राजा दशरथ को युद्ध के लिए ललकारा क्योंकि वह जानता था कि उसे यह वरदान प्राप्त है कि उसकी दृष्टि जिस किसी पर भी पड़ेगी उसका आधा बल उसमें आ जाएगा ।  इस कारण से युद्ध में दशरथजी के सामने बाली भारी पड़ने लगा । युद्ध का परिणाम आने से पहले ही निश्चित हो गया था कि पराजय राजा दशरथ की ही होगी । पराजित राजा दशरथ के सामने बाली ने शर्त रखी कि या तो वे मुझे (कैकेई को) उसको सौंप दे अथवा अपना मुकुट यहाँ छोड़कर मुझे लेकर अयोध्या लौट जाए । मजबूर राजा को मुकुट बाली के पास छोड़ना पड़ा ।’

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

Friday, October 23, 2026

सम्भवामि युगे युगे -51

 सम्भवामि युगे युगे -51

             चित्रकूट में भरत का भगवान से मिलन होता है । भक्त-भगवान का मिलन । यह मिलन कोई साधारण मिलन नहीं है । भरत का चरित्र अनुकरणीय है, जिसमें प्रेम कूट कूट कर भरा है । कहा भी जाता है कि भाइयों में प्रेम हो तो भरत जैसा । भरत के चरित्र का वर्णन करना हो तो शब्द भी कम पड़ जाते हैं । 

           वसिष्ठजी, अयोध्यावासियों और माताओं के साथ भरतजी और रिपुदमन कुछ दिन चित्रकूट में रूकते हैं । जनकजी भी अपनी पत्नी सुनयनाजी के साथ वहाँ आ जाते हैं । सभी बैठकर कुछ वैकल्पिक रास्ता निकालने का प्रयास करते हैं परंतु विधाता ने जो निर्धारित कर दिया है, उसको परमात्मा भी टाल नहीं सकते । राम ने भी पिता के दिए दोनों वचनों की अनुपालना यथावत रखी । भरत ने राजसिंहासन के वास्तविक उत्तराधिकारी से उनकी चरण पादुका मांगी । पादुका को सिंहासन पर सम्मान के साथ रख कर ही वे शासन चलाएंगे । भरतजी ने तब तक ही राज्य सम्भालने की हामी भरी, जब तक राम अयोध्या लौट नहीं आते । 

           चरण पादुका लेकर अयोध्या के लिए प्रस्थान करने की तैयारी होने लगती है । राम एक एक कर सबको विदा करते हैं । सबसे अन्त में वे कैकेयी के पास पहुँचते हैं और उन्हें प्रणाम करते हैं । अपराध बोध से ग्रस्त होकर पश्चाताप की अग्नि में जल रही कैकेई पुत्र के सामने सिर झुका लेती है । राम उन्हें बड़े प्रेम से कहते हैं - ‘ माते ! किसी प्रकार का शोक करने की आवश्यकता नहीं है । आपने वनवास देकर मुझे ही उपकृत किया है । जीवन में मुझे जो काम करने है, वे सब कैसे होंगे, इसी सोच में डूबा मैं कोई राह तलाश रहा था । आपने पिताजी से मेरे लिए वन का राज्य माँगकर मेरी सारी दुविधा मिटा दी । माँ, आप दुःख नहीं करें, मैं आपका वही बालपन वाला प्रिय राम हूँ ।’ 

             कैकेई बोली - ‘पुत्र, मैं दुःखी नहीं हूँ । सांसारिक दृष्टि से मैं बहुत बुरी हूँ परन्तु सत्य क्या है, यह या तो मैं जानती हूँ अथवा तुम । आज मैं तुमसे अपने भीतर छिपा दर्द कह रही हूँ । यह मत समझना कि तुम्हें वनवास देने में केवल मन्थरा की भूमिका रही है अथवा तुम्हारी इच्छा थी । जब मुझे मंथरा बरगला रही थी उसी समय मेरे मन में तेरी कही बात जीवन्त हो उठी थी । मैं कई वर्षों से इसी अवसर की प्रतीक्षा कर रही थी । तेरे लिए महाराज से वनवास मांगने में मेरा भी एक स्वार्थ छिपा था । मेरे मन में कई दिनों से एक प्रतिशोध की आग जल रही है, पुत्र । उस आग को शान्त करने की कामना भी तुम्हारे वनवास की मांग के साथ जुड़ी है । मेरे अन्तर्मन में कई वर्षों से जल रही उस अग्नि को केवल तुम ही ठण्डा कर सकते हो ।’  

 क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Thursday, October 22, 2026

सम्भवामि युगे युगे -50

 सम्भवामि युगे युगे -50

            इधर गंगा पार आकर निषादराज देखते हैं कि जहां से सुमंत्रजी को विदा किया था, वे वहीं के वहीं खड़े विषाद में डूबे हुए हैं । समझाबुझाकर अपने चार व्यक्तियों को उनके साथ कर अयोध्या के लिए विदा करते हैं । सुमंत्र के अवध लौटने पर उनके साथ में राम को आया न देखकर दशरथ प्राण त्याग देते हैं । वसिष्ठ मुनि भरत शत्रुघ्न को ननिहाल से बुलवा लेते हैं और पिता का अंतिम संस्कार कराते हैं । परिवार की दशा देखकर बड़े दुःखी हैं, भरत । जब सभा जुड़ती है तब वशिष्ठजी भरत को विविध भांति समझाते हैं ।

        वसिष्ठजी भरत को समझाते हुए कह रहे हैं कि - ‘ संसार में हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश सब विधाता के हाथ में है । इसलिए तुम्हें इस संबद्ध में शोक करने की कोई आवश्यकता नहीं है । 

सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेउ मुनिनाथ ।

हानि लाभु जीवनु मरनु, जसु अपजसु बिधि हाथ ।। अयोध्याकाण्ड - 171 ।।

         राजा दशरथ ने अपना जीवन आदर्श स्थापित करते हुए जीया है और अपने वचनों को सत्य सिद्ध किया है, इसलिए उनके चले जाने पर तुम्हारा शोक करने का कोई कारण नहीं बनता । अब तुम अपने पिता द्वारा दिए गए वचन का मान रखते हुए अयोध्या का राज्य सम्भालो ।’

        भरत ने कहा - ‘गुरुवर ! आपने मुझे उचित सलाह दी है । परंतु कुछ भी करने से पूर्व मैं वन में जाकर भैया से मिलना चाहता हूँ । वे जैसा कहेंगे, फिर मैं वैसा ही करने को तैयार हूँ ।’ गुरु वसिष्ठजी ने मंत्रणा करते हुए दूसरे दिन राम से मिलने के लिए वन में चलने की आज्ञा दे दी । अयोध्या की ज़िम्मेवारी विश्वस्त अधीनस्थों को सौंपकर गुरु, माताओं और अयोध्यावासियों के साथ दोनों भाई वन की ओर चल पड़े ।

             निषादराज गुह को जब भरत के सेना सहित चित्रकूट की ओर जाने की सूचना मिली तो व्यथित हो गए । वे सोचने लगे कि कहीं भरत निष्कंटक राज्य की चाह में राम को राह से हटाने के लिए तो नहीं आ रहे हैं ? एक बुजुर्ग वनवासी ने सगुन देखकर निषादराज को भाइयों के होने वाले मिलन की वास्तविकता बताते हुए भरत का विरोध करने से रोक दिया । जब भरत से मिलना हुआ तब उनकी दशा देखकर गुह को बड़ा पश्चाताप हुआ । निषादराज साथ हो लेते हैं और चित्रकूट पहुंच जाते हैं । दूर से ही राम को देखकर भरत दण्डवत प्रणाम करते हैं । द्रवित हुए राम आगे बढ़ते हुए भरत को उठाकर हृदय से लगा लेते हैं ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।