Saturday, September 12, 2026

सम्भावामि युगे युगे -10

 सम्भवामि युगे युगे -10

        असुर भी तीक्ष्ण बुद्धि रखते है, शुक्राचार्य जैसे महान गुरु मिले हैं उन्हें । वह बात और है कि वे अपनी बुद्धि का उपयोग दूसरों को सताने में करते हैं । ज्ञान केवल बोलने और लिखने की बात नहीं है । ज्ञान को आचरण में लाए बिना वह एक भार के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है - ‘ज्ञानं भार: क्रियां विना’ । असुर और देव में यही अन्तर है । ज्ञान को जीवन में उतारने वाला देव और आचरण में न लाकर अथवा उसके ठीक विपरीत आचरण करने वाला असुर ।

          त्रेता के रावण की तरह ही द्वापर का जरासंध भी तो यही कर रहा है । श्रीकृष्ण से युद्ध करते हुए सत्रह बार हार चुका है, फिर भी भगवान को पहचान नहीं सका । शिशुपाल को वैसे ही सांत्वना दे रहा है, जैसे रावण अपनी रानियों को दे रहा था । चेदिराज शिशुपाल का विवाह रुक्मिणीजी से होना था । बीच में ही कृष्ण उनका हरण कर लाए । जरासन्ध और उसकी सेना ने रुक्मिणीजी को छुड़ाने के लिए बहुत संघर्ष किया परन्तु वे पराजित हुए । तब जरासन्ध शिशुपाल को सांत्वना देते हुए कहता है - 

यथा दारुमयी योषिन्नृत्यते कुहकेच्छया ।

एवमीश्वरतन्त्रोंऽयमीहते सुखदुःखयो: ।। भागवत -10/54/12 ।।

          जैसे कठपुतली बाज़ीगर की इच्छानुसार नाचती है, वैसे ही यह जीव भी भगवद् इच्छा के अधीन रहकर सुख और दुःख के सम्बन्ध में यथाशक्ति चेष्टा करता रहता है ।

          हिरण्यकश्यप हो, रावण हो चाहे शिशुपाल, सब ईश्वर की माया की इच्छानुसार नाच रहे हैं । चेदि नरेश शिशुपाल, कृष्ण की बुआ श्रुतश्रवा का पुत्र था अर्थात् रिश्ते में भाई । दन्तवक्त्र करुष देश का राजा था । दोनों का ही श्रीकृष्ण से वैर था । दोनों ही नहीं पहचान सके, श्रीकृष्ण रूप में परमात्मा को । राजसूय यज्ञ में गालियों पर गालियाँ देता जा रहा है, शिशुपाल । शापित को मुक्त करना भी तो है । माया के प्रभाव ने शिशुपाल को गालियाँ देने को विवश कर दिया । फिर भगवान को समता में बने रहकर आदर्श भी तो प्रस्तुत करना है । सौ गालियों के पूरा होने तक प्रतीक्षा की । शिशुपाल और दन्तवक्त्र का अन्त तो होना ही था । इस प्रकार जय-विजय के तीसरे राक्षस रूप का भी अन्त हुआ ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

Friday, September 11, 2026

सम्भवामि युगे युगे -9

 सम्भवामि युगे युगे -9

        हिरण्यकश्यप महान संत कैसे होता ? सनकादिक ऋषियों का श्राप व्यर्थ कैसे चला जाता और कैसे भगवान के हाथों वे मुक्त होते ? सब भगवान की माया का खेल है, जिसको समझ पाना प्रत्येक की क्षमता से बाहर है - ‘मम माया दुरत्यया’ । वह जिसको जैसा नचाना चाहती है, उसे वैसे ही नाचना पड़ता है । चाह कर भी वह माया की भूल-भूलैया से बाहर नहीं आ सकता । 

             देखिए ! रावण कैसी ज्ञान भरी बातें कर रहा है ? राम-रावण युद्ध चल रहा है । एक-एक कर लंका के योद्धा मारे जा रहे हैं और रावण अभी भी हथियार डालने के लिए तैयार नहीं है । एक पुत्र (अक्षय कुमार) तो हनुमानज़ी के हाथों अशोक वाटिका में पहले ही मारा जा चुका है । लो, अब दूसरा पुत्र इंद्रजीत भी युद्ध में मारा गया । पुत्र-हीन हो चुका रावण इस बार भीतर से बुरी तरह टूट चुका है । जीवन में टूटे हुए ज्ञान-बद्ध व्यक्ति के मुख से ज्ञान की बातें बहुत निकलती है क्योंकि यह ज्ञान ही उसको विपरीत परिस्थिति में एक प्रकार से सांत्वना देता है, आश्रय प्रदान करता है । मानस में तुलसी लिखते हैं - 

तब दसकंठ बिबिधि बिधि, समुझाईं सब नारि ।

नस्वर रूप जगत सब, देखहु हृदयं बिचारि ।। लंकाकाण्ड - 77।।

        मेघनाद के मारे जाने के बाद विलाप कर रही रानियों को विविध प्रकार से समझाते हुए कह रहा है कि समस्त जगत् का यह रूप नाशवान है, इस बात का हृदय में विचार करो ।

           रावण दुष्ट है परन्तु उसके मुंह से ज्ञान की बातें बड़ी अच्छी निकल रही है । क्या उसको पूर्व में ज्ञान नहीं था कि शरीर नश्वर है । पर क्या ऐसी ज्ञान भरी बातों का किसी पर प्रभाव पड़ेगा ? नहीं, क्योंकि जिसने ज्ञान को अपने जीवन में नहीं उतारा है, ऐसे व्यक्ति के द्वारा दिए ज्ञान का अनुकरण कोई भी नहीं करता । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Thursday, September 10, 2026

सम्भावामि युगे युगे -8

 सम्भवामि युगे युगे -8

          तीन युगों में परमात्मा के तीन अवतार, जय-विजय को आसुरी रूप से मुक्त करने के लिए हुए । यह आसुरी और दैवी रूप क्या हैं ? चलिए ! इन्हें समझने के लिए श्रीमदभगवद्गीता का सहारा लेते हैं । 

                गीता में भगवान कहते हैं कि प्रत्येक मनुष्य में दो प्रकार की संपदा रहती है - दैव और आसुरी । किसी के भीतर दैव संपदा अधिक प्रभावी होती है और किसी में असुर संपदा । स्थूल शरीर को देखकर हम अनुभव नहीं कर सकते कि कौन दैव संपदा से ओतप्रोत है और कौन नहीं । असुरों के सींग-पूंछ नहीं होते और देवताओं में से कोई सुगंध नहीं निकलती । इसलिए आवरण में कुछ नहीं रखा, मनुष्य का आचरण ही उसकी पहचान बताता है । ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ रावण भी राक्षस हो सकता है और असुर कुल में जन्म लेने वाला प्रह्लाद भी भगवद् भक्त हो सकता है । केवल आचरण ही उनकी पहचान कराता है । जब तक मुख से वाणी प्रस्फुटित नहीं होती तब तक कौवे और कोयल में कोई अंतर नहीं दिखता ।

          हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप भी कम ज्ञानी नहीं थे । हिरण्याक्ष बहुत बलशाली भी था । अपने बल के प्रदर्शन के लिए उसे कोई समकक्ष बलशाली नहीं मिल रहा था । हिरण्यकश्यप की तो बात ही छोड़िए, वरदान पाकर वह स्वयं को ही भगवान मान बैठा था । आज भी तो ऐसे कई ज्ञानी महात्मा हैं जो स्वयं को परमात्मा का अवतार बता रहे हैं । हिरण्यकश्यप को तो उनके पुत्र ने बहुत बार पारमात्मिक-ज्ञान देने का प्रयास किया था परन्तु परिणाम में क्या मिला ? मृत्युदण्ड । वह तो परमात्मा की कृपा थी कि प्रत्येक बार प्रह्लादजी मृत्यु के मुख में जाने से बच गए । फिर भी ज्ञानी हिरण्यकश्यप का विवेक कहां जाग्रत हुआ ? यदि विवेक जाग्रत हो जाता तो सम्भव है कि वह उस समय का महान संत होता ।

 क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, September 9, 2026

सम्भवामि युगे युगे -7

 सम्भवामि युगे युगे -7

       जय-विजय का पहला जन्म - सतयुग के हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप । पहले ने तो पृथ्वी को जल से बाहर निकालने में बाधा उत्पन्न की । वराह अवतार लेकर उसको मारना पड़ा । दूसरे ने स्वयं को संसार का कर्ता-धर्ता माना और आतंक का पर्याय बन बैठा, यहां तक कि अपने पुत्र को भी अनेकों बार मारने का प्रयास किया । बढ़ते अधर्म को देखकर भगवान को नरसिंह रूप धरकर उसे मारना पड़ा । 

      जय-विजय का दूसरा जन्म - त्रेता के रावण और कुम्भकरण । उन्हें मारने के लिए राम बनना पड़ा । इसके लिए क्या क्या नहीं करना पड़ा ? पिता का मरण, माता को अपयश, प्रिय भाई से दूरी, जंगल-जंगल भटकना, पत्नी वियोग और अंततः अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना ।

       जय-विजय का तीसरा जन्म - द्वापर के शिशुपाल और दन्तवक्त्र । उनके आचरण से अधर्म बढ़ता जा रहा था । कई अधर्मी कुक्कुरमुतों की तरह उग रहे थे, जिनमें जरासन्ध भी एक था । कंस भी कम नहीं था । अपने पिता को जेल में डाल रखा था । इतने अधर्मियों को एक साथ मारना आसान नहीं था क्योंकि सब के सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे थे । जरासन्ध से सत्रह बार पराजित होने की लीला रची, जिससे वह बार-बार युद्ध करे और एक-एक कर सभी अधर्मियों को साथ ले आए । 

        माता-पिता (देवकी-वसुदेव) जेल में, मामा कंस को आकाशवाणी के कारण पक्का विश्वास था कि उनसे उत्पन्न पुत्र ही उसका काल बनेगा । कंस की दृष्टि में एक-एक कर पैदा हुए सात बच्चों का काम तमाम कर दिया गया अथवा हो गया । अब आठवाँ आने वाला है, यही अधर्म का नाश करने वाला है । आने से पहले अपनी माया को गोकुल भेजा, साथ ही स्वयं कृष्ण बनकर चुपके से मथुरा आए, घनघोर काली बरसाती आधी रात को । पहरेदारों तक को पता नहीं चला, रुदन तक न सुन सके बेचारे, इतनी गहरी नींद हावी हो गई । अनुकूल समय की प्रतीक्षा में रात को ही खिसक लिए मथुरा से गोकुल को और माया को मथुरा भेज दिया । वहीं से एक एक कर सब विधर्मियों का उद्धार करना प्रारम्भ किया और मथुरा, हस्तिनापुर और द्वारका तक धर्म को पुनः स्थापित किया ।

इन्हीं तीन अवतारों की लीला का अपनी अल्प बुद्धि से गुणगान करने का प्रयास करूंगा ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल 

।। हरिः शरणम् ।।

Tuesday, September 8, 2026

सम्भवामि युगे युगे -6

 सम्भवामि युगे युगे -6

               परमात्मा यदि माया के माध्यम से अपना खेल नहीं खेले तो उनको अवतरित होना ही नहीं पड़े । हां, सत्य है क्योंकि माया ही मनुष्य को दिग्भ्रमित कर उससे उल्टे सीधे कर्म करवा देती है, जिनके परिणाम उसे भोगने पड़ते हैं । ये कर्म ही धर्म-अधर्म को बढ़ाते घटाते रहते हैं । यदि धरा पर अधर्म बढ़ रहा है तो क्या वह कभी परमात्मा की दृष्टि से छिपा रह सकता है ? उनकी दृष्टि से कुछ भी छिपा हुआ नहीं है । वे चाहते तो बिना अवतरित हुए भी अधर्म को नष्ट कर सकते हैं परंतु नहीं करते क्योंकि उन्हीं का बनाया एक नियम यह भी है कि जब-जब धर्म निष्प्रभावी होगा और अधर्म का प्रभाव बढ़ेगा, प्रकृति को अधीन करके मैं स्वयं अवतरित होऊंगा । 

         उनकी दृष्टि जब अधर्म के बढ़ते प्रभाव पर पड़ती है तब माया के माध्यम से ऐसा खेल रचते हैं कि उनके अवतरित होने की राह आसान हो जाती है । जय-विजय, उन्हीं के दो पार्षद, उन्हीं की आज्ञा से, उन्हीं के निवास की पहरेदारी कर रहे थे । माया के माध्यम से उन्होंने ऐसा खेल रचा कि न जाने कहां से सनाकादिक ऋषि हरिः शरणम्, हरिः शरणम् जपते हुए वहां आ पहुँचते हैं और श्रीहरि के दर्शन को उत्सुक हो जाते हैं । अपने कर्तव्य-पथ पर डटे हुए जय-विजय उनको प्रवेश करने से रोक देते हैं । 

            सनकादिक ऋषि, जिनको बिना किसी रोक-टोक के सर्वत्र आने-जाने की अनुमति मिली हुई है, वे आज श्रीहरिः के यहां प्रवेश से रोके जाने पर जय-विजय को श्राप दे देते हैं - “जाओ पृथ्वी पर तीन बार राक्षस के रूप में जन्म लो, तीन जन्मों बाद श्रीहरि: ही तुम्हें मुक्त करेंगे ।” इस प्रकार अपने तीन अवतार लेने के लिए आधारशिला रख दी भगवान ने । राक्षस होने का अर्थ ही है, अधर्म में रत होना । अब तीन बार राक्षस रूप में जन्म लेकर जय-विजय पृथ्वी पर उत्पात करेंगे और धर्म को दबायेंगे ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।। 

Monday, September 7, 2026

सम्भवामि युगे युगे -5

 सम्भवामि युगे युगे -5

           तो बात चल रही थी, माया के खेल की । माया और पुरुष, दोनों के अलग-अलग क्षेत्र, कहीं कोई एक दूसरे से प्रभावित होने अथवा प्रभावित करने का कारण नहीं । माया प्रभावित नहीं करती बल्कि पुरुष ही उससे प्रभावित होता है । कोई कारण न होते हुए भी पुरुष कैसे प्रभावित हो जाता है ? माया में तीन गुण रहते हैं - सत्व, रजस और तमस । इन तीन गुणों के कारण ही माया में विभिन्न क्रियाएं सम्पन्न होती है । ये क्रियाएं माया में एक प्रकार का आकर्षण उत्पन्न करती हैं । क्रियाओं की चकाचौंध से प्रकृतिस्थ पुरुष प्रभावित हो जाता है ।

           माया से प्रभावित होकर पुरुष उसे अपने अनुसार उपयोग में लाने का प्रयास करता है । परमात्मा की माया सरलता से पुरुष के वश में आती नहीं है । जिसका परिणाम होता है कि पुरुष माया पर अपना अधिकार जमाने के लिए माया के गुणों का ही सहारा लेता है । परन्तु गुण माया के अन्तर्गत होने के कारण वे माया की आज्ञानुसार चलते हुए पुरुष को नचाना प्रारम्भ कर देते हैं । पुरुष को यह भ्रम होता है कि वह माया को नचा रहा है, जबकि वास्तव में पुरुष ही माया के परवश हुआ नाचता है ।

          जो व्यक्ति अपने जीवन में स्वयं कर्ता बनता है और परिणाम मिलने पर ईश्वर को दोष देता है तो वह सबसे बड़ा झूठा है । माया और मायापति कुछ नहीं करते परन्तु माया में गुणों के कारण हो रही क्रियाओं को देखकर आप उनमें उलझ जाते हैं । क्रियाओं में उलझ जाने से अर्थ है, क्रियाओं को अपने स्वार्थ अनुसार चलाने का प्रयास करना । सभी क्रियाएं पूर्वनिर्धारित होती हैं, वे उसी अनुसार ही होंगी । केवल आप ही भ्रम पाल लेते हैं कि ये क्रियाएं मैं अपनी इच्छानुसार कर रहा हूँ । यही कर्ताभाव है । कर्ता होने पर भोक्ता भी होना पड़ेगा । प्रश्न उठता है कि परमात्मा बिना उलझे इस खेल को माया से कैसे खेल लेते हैं, जबकि हम इसमें उलझ जाते हैं ?  

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, September 6, 2026

सम्भवामि युगे युगे -4

 सम्भवामि युगे युगे -4

         धर्म को दबाकर अधर्म बढ़ेगा तभी तो परमात्मा अवतार लेंगे । ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब चारों ओर धर्म का ही बोलबाला है तो फिर अधर्म बढ़ कैसे जाता है ? अधर्म का बढ़ना भी परमात्मा का माया के माध्यम से खेले जाने वाला एक खेल है । भगवान ने प्रकृति बनाई, उसके नियम बनाए और साथ ही नियम तोड़ने पर मिलने वाले परिणाम भी बना दिए । इनमें एक नियम यह भी है कि जब-जब धर्म की हानि होगी और धर्म निष्प्रभावी होगा, तब-तब परमात्मा धर्म की पुनर्स्थापना के लिए अवतरित होंगे, चाहे युग कोई सा भी हो । 

          हम सोचते हैं कि सतयुग बहुत महान युग रहा होगा, जबकि सत्यता यह है कि भगवान को सबसे अधिक अवतार भी सतयुग में ही लेने पड़े । अभी कलियुग चल रहा है और एक बार परमात्मा को फिर अवतार (कल्कि) लेना है । चारों ओर अधर्म बढ़ता दिख रहा है, धर्म का नाम केवल शास्त्रों में रह गया है । न जाने उनके अवतरित होने की कब तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी ? सतयुग में धर्म और अधर्म के मध्य संघर्ष प्रायः कम देखने को मिलता था, जबकि कलियुग में संघर्ष तुलनात्मक रूप से अधिक हो रहा है । जहां संघर्ष न के बराबर होता है अथवा बिलकुल नहीं होता, वहां परमात्मा को दौड़ कर शीघ्र आना पड़ता है । ऋषि-मुनि अपनी साधना में लीन रहते थे, बेचारे लड़ नहीं पाते थे तो भगवान को अवतार लेना पड़ता था ।

            हिरण्याक्ष पृथ्वी को जल से बाहर निकालने में बाधा बन कर खड़ा था, किस मनुष्य ने उसके साथ संघर्ष किया ? एक ने भी नहीं, आना पड़ा परमात्मा को, शूकर का शरीर लेकर । हिरण्यकशिपु से संघर्ष केवल एक बालक ने किया वह भी केवल वाणी के स्तर पर । कितने प्रयास किए गए थे प्रह्लाद को मारने के । अंततः नरसिंह रूप लेकर स्वयं परमात्मा को आना पड़ा । प्रह्लाद भी असुर कुल में पैदा हुआ था, परंतु था बड़ा ईश्वर-भक्त । इनके ही कुल में (पौत्र) पैदा हुए थे राजा बलि । जिसके अहंकार ( दानवीर होने का) को तोड़ने के लिए परमात्मा को वामन अवतार लेकर तीन कदम धरती माँगनी पड़ी । ये सब सतयुग की ही तो कथाएं हैं ।

 क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।