ज्ञान उदय जब होत है …..28
कर्म ज्ञान बिना और ज्ञान कर्म बिना अधूरे रहते हैं, यह निश्चित है । दोनों आपस में गहरे से जुड़े हैं । ज्ञान को उपलब्ध मनुष्य सब कुछ करते हुए भी वास्तव में कुछ नहीं करता । निष्काम कर्म करते हुए मनुष्य संसार के साथ बंधता नहीं है, वह सदैव मुक्त ही रहता है । इसीलिए कहा जाता है कि कर्मयोगी स्वतः ही अपने आप में ज्ञान पा लेता है और ज्ञानयोगी सभी कर्म करते हुए भी उनमें लिप्त नहीं होता । ज्ञानी जानता है कि शरीर की कर्मेन्द्रियों के द्वारा जो कुछ भी किया जा रहा है उसको सुख - दुःख के रूप में शरीर की ज्ञानेंद्रियां ही अनुभव कर रही है, मैं’ इस करने और उससे होने वाले प्रत्येक अनुभव से परे हूँ ।
भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं -
नेव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत त्तत्ववित् ।
पश्यंशृंण्वन्स्पृशंजिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपंश्वसन् ।।
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषपन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ।। गीता - 5 /8-9)
तत्त्व को जाननेवाला सांख्ययोगी देखता हुआ, सुनता हुआ, छूता हुआ, सूँघता हुआ, खाता हुआ, चलता हुआ, ग्रहण करता हुआ, बोलता हुआ, त्याग करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ तथा आँख खोलता और मूँदता हुआ भी ‘सम्पूर्ण इंद्रियाँ इंद्रियों के विषयों में बरत रही है’ - ऐसा समझकर ‘मैं स्वयं कुछ भी नहीं करता हूँ’ - ऐसा माने ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।