नाभावो विद्यते सतः -12
प्रश्न उठता है कि दुःख क्यों असत् से जुड़ा है ? ज्ञान से अभाव कैसे मिटता है ? असत् चाहे जितना मिल जाए वह सदैव अपर्याप्त ही रहता है और जो और जैसा मिला है वह भी भला टिकता कहां है ? ऐसे में व्यक्ति दुःखी होगा ही । इस प्रकार दुःख का सीधा संबंध असत् से जुड़ा है । जब ज्ञान हो जाता है कि असत् का स्थाई भाव नहीं है तो व्यक्ति इसमें आसक्त ही नहीं होगा । आसक्ति के न होने पर अभाव स्वतः ही मिट जाता है ।
लेख का मूल वाक्य है - “अभाव सदैव असत् का ही होता है, सत् में कोई अभाव नहीं है ।” अभाव क्या है ? अभाव है, जीवन में कुछ न कुछ कमी का अनुभव होना । जब मन कहता है: “यह नहीं है”, “और चाहिए”, वहीं अभाव है।
असत् क्या है ? असत् है, जो बदलता है, टिकता नहीं । जैसे; शरीर, पैसा, पद, सुख आदि । ये सब आते हैं, जाते हैं, कभी पूरे नहीं लगते । इसलिए इनमें हमेशा कमी महसूस होती है ।
सत् क्या है ? सत् वह है, जो सदा है, जो पूरा है । जैसे: अस्तित्व, आत्मा, शुद्ध चेतना । यह कभी भी बदलता नहीं है, घटता नहीं है और न ही कभी बढ़ता ही है । जो पूरा है, उसमें कमी हो ही नहीं सकती ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।