Thursday, July 30, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -67

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -67

           हम आसक्ति को पीछे छोड़कर अनासक्ति की ओर आते हुए संक्षेप में अब तक हुए विवेचन से निकले सार को बताते चलते हैं । जितनी अधिक आसक्ति होती है, व्यक्ति व्यथित होकर उतनी ही अधिक विरक्ति की और चला जाता है । परन्तु यही विरक्ति जब व्यक्ति को स्वयं के अकेले पड़ जाने के रूप में खलती है, तब वह पुनः उतनी ही अधिक आसक्ति की ओर चला जाता है । यही मनुष्य के सुख-दुःख का कारण है । एक गृहस्थ जीवन भी इसी प्रकार आसक्ति और विरक्ति के मध्य एक दोलक की भांति दोलन करता रहता है, मध्य में रूक नहीं पाता । मध्य में रुकने के सूत्र जो इस श्रृंखला में मंथन के उपरांत निकल कर सामने आये हैं, वे हैं -  

प्रथम सूत्र - निष्ठा पूर्वक कर्तव्य कर्म को करते रहना ।

दूसरा सूत्र - किसी में भी दोष न देखना ।

तीसरा सूत्र - ‘मैं और मेरा’ की भावना का त्याग ।

चौथा सूत्र - संतुष्टि पूर्ण जीवन ।

पांचवां सूत्र - सहिष्णुता, विरोध को सहन करना ।

छठा सूत्र - कामनाओं पर नियंत्रण रखना ।

सातवाँ सूत्र - किसी से कोई आशा/अपेक्षा न रखना ।

आठवाँ सूत्र -साक्षी-भाव ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, July 29, 2026

गुरु -पूजा

 गुरु-पूजा

       ‘गुरु’ कोई व्यक्ति नहीं है, ‘गुरु’ वह है जिसमें गुरुत्व गुण हो अर्थात् आकर्षित करने का गुण । इस प्रकार ‘गुरु’ का अर्थ है, वह व्यक्ति जिसमें आकर्षित करने की क्षमता है । बहुत से लोग आत्मज्ञानी हुए है, परंतु सभी ‘गुरु’ नहीं हुए क्योंकि ‘गुरु’ में आत्मज्ञान होने के साथ-साथ और गुणों की भी आवश्यकता होती है ।आत्मज्ञान का संदेश दूसरे के भीतर तक पहुँचाने के लिए अभिव्यक्ति-कुशल होना आवश्यक है । जो मौन और निःशब्दता के अपने अनुभव को शब्दों में रूपांतरित कर दे, वही ‘गुरु’ हो सकता है । अनुभवी और शास्त्र-ज्ञान में कुशल व्यक्ति ही अपने शब्दों को तीर की भाँति किसी के भी हृदय में उतार सकता है । कोई स्वामीजी जैसा बिरला ही ‘अवर्णनीय का वर्णन’ कर सकता है । निःशब्दता को शब्द प्रदान करने की उच्च कला उनमें थी ।

          क्या आपको भी ऐसे ही किसी ‘गुरु’ की तलाश है ? उत्तर यदि ‘हाँ’ में है तो पहले आपको स्वयं एक आदर्श शिष्य बनना होगा । स्मरण रहे, केवल गुरु के कहे शब्द ही आपको आत्मज्ञान कराते हुए मुक्त नहीं कर सकते । आदर्श शिष्य वही है जो गुरु के शब्दों को सम्हाल सके । गुरु तो अपने अनुभव को शब्द दे सकता है परंतु आदर्श शिष्य वही है जो उनके कहे गए शब्दों को अपने भीतर ले जाकर उन्हें पुनः मौन और निःशब्दता में बदल दे । गुरु आपको अपने अधीन नहीं करता बल्कि सहारा देते हुए आपको अपने पैरों पर खड़ा करता है, फिर एक दिन वह सहारा भी आपसे छीन लेता है जिससे तुम स्वयं भी ‘गुरुत्व’ के गुणों से ओतप्रोत हो जाओ ।

         जीवन में जिनसे भी आपने ज्ञान लिया है, जिनके शब्दों ने आपको भीतर तक प्रभावित और परिवर्तित किया है, उन सभी को ‘गुरु’ कहा जा सकता हैं परंतु आदर्श ‘गुरु’ वही है जिनके शब्दों ने आपके भीतर की उठापटक को शांत करते हुए मौन और निःशब्दता में बदल दिया हो । मेरे जीवन में भी ऐसे ही एक व्यक्तित्व का परमात्मा की कृपा से पदार्पण हुआ जिसने मेरे भीतर की उठापटक को शांत करते हुए जीवन की दिशा को परिवर्तित किया है । मैं यह नहीं कहता कि मैं एक आदर्श शिष्य हूँ परंतु वे एक आदर्श ‘गुरु’ अवश्य हैं । जिसमें गुरुत्व का गुण होता है, ऐसे व्यक्ति स्वयं को कभी ‘गुरु’ कहलाना कभी पसंद भी नहीं करते । इसी गुण के कारण वे अधिक प्रचारित नहीं होते परंतु कोई न कोई तो उनको फिर भी पहचान लेता है ।

            आज गुरु-पूर्णिमा के पावन अवसर पर ऐसे ही एक व्यक्तित्व आचार्य श्री गोविंद राम जी शर्मा को मैं दण्डवत प्रणाम करता हूँ । उनकी पूजा के लिए उपरोक्त शब्दों के अतिरिक्त मेरे पास कुछ भी नहीं है और इन शब्दों को प्रकट कराने में उनकी परोक्ष भूमिका भी है । जीवन में सीखने और जानने योग्य जो भी है, इन्हीं के सानिध्य में रहकर सीखा और जाना है । 

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय ।

बलिहारी गुरु आपकी, गोविन्द दियो बताय ।।

आपको एक बार पुनः प्रणाम ।

।। हरिः शरणम् ।।

डॉ. प्रकाश काछवाल

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -66

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -66 

      प्रश्न यह उठता है कि इन तीनों भिक्षुओं में कौन सा भिक्षु सही मार्ग पर है । सतही तौर से देखा जाये तो तीनों भिक्षुक ही सही हैं परन्तु आसक्त भिक्षु अर्थात दूसरे भिक्षु को इन्द्रियों का दमन करने के स्थान पर उनका उचित उपयोग करना चाहिए अथवा प्रथम भिक्षुक की तरह विरक्त हो जाना चाहिए । प्रथम भिक्षु का विरक्त होना उचित है परन्तु यह विरक्ति स्वयं के स्वार्थ के लिए है । स्वयं की स्वार्थ-पूर्ति के लिए किया गया कार्य केवल कर्म-योग से विमुख होना ही प्रदर्शित करता है । कर्म-योग से विमुख होना परमात्मा के द्वारा दिए गए मानव शरीर का अपमान करना है । मनुष्य को यह भौतिक शरीर कर्म करने के लिए ही दिया गया है । साथ ही साथ यह आवश्यक है कि इस शरीर से कर्म भी निस्वार्थ भाव से केवल संसार की सेवा के लिए ही किये जाएँ ।

             इतने विवेचन के बाद हम पाते हैं कि केवल तीसरे और अंतिम भिक्षुक ने ही भगवान बुद्ध का सही मार्ग अपनाया है – ‘मंझिम निकाय’, इन्द्रियों का समुचित उपयोग करते हुए कर्म करना । न आसक्ति और न ही विरक्ति बल्कि अनासक्त होकर कर्म करना । भगवान श्री कृष्ण भी गीता में अर्जुन को यही बात कह रहे हैं -

  यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेSर्जुन ।

   कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ।। गीता-3/7 ।।

अर्थात हे अर्जुन ! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Tuesday, July 28, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -65

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -65 

         इस श्रृंखला में आगे बढ़ने से पहले मैं आपको पुनः उसी दृष्टान्त की ओर लिये चलता हूँ, जिसमें तीन बौद्ध भिक्षुक भिक्षा प्राप्त करने के लिए एक गाँव की ओर जा रहे होते हैं । गाँव में प्रवेश करने से पहले एक नदी को पैदल ही पार करना पड़ता है क्योंकि पार जाने के लिए नदी के इस किनारे पर नाव आदि की कोई व्यवस्था नहीं है । नदी के किनारे पर बैठी सुकुमारी की हिम्मत नहीं हो रही है, बिना किसी सहारे के नदी को पार करने की । वह एक-एक कर प्रत्येक बौद्ध भिक्षु से हाथ पकड़ कर नदी पार करने का आग्रह करती है । 

         पहला भिक्षुक विरक्त है, उस पर उस कन्या की अनुनय-विनय का कोई प्रभाव नहीं पड़ता और वह उसको अनदेखा कर अपने मार्ग पर आगे बढ़ जाता है । दूसरा भिक्षुक उस कन्या की बात को सुनता और समझता तो है परन्तु वह साधना-पथ पर है और मानता है कि एक लड़की का हाथ पकड़ने से उसके भीतर काम-भाव जाग्रत हो सकता है । वह तो इन्द्रियों का दमन करने में लगा हुआ है । वह इस कन्या के आग्रह को साधना-मार्ग से विचलित करने का एक प्रलोभन समझता है और वह उस प्रलोभन के जाल में फंसना नहीं चाहता है । वह उस कन्या की विनती को ठुकरा देता है । तीसरा भिक्षुक उस कन्या की विनती को स्वीकार करता है और उसका हाथ पकड़ कर उसे भी नदी पार करवा देता है । नदी के उस पार जाकर वह उसका हाथ छोड़ अपने रास्ते चल देता है और उस घटना को पुनः याद ही नहीं करता है, परन्तु दूसरा भिक्षुक वह दृश्य भूला नहीं पाता है । उस भिक्षुक को वह दृश्य बार-बार याद आता है और वह उस दृश्य में तीसरे भिक्षुक का पतन देखता है ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Monday, July 27, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -64

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -64

               इन्द्रियां दबती नहीं है । इनको चाहे जितना दबा लो, हमसे ये दबेगी भी नहीं । ऐसे में विरक्त होना छोड़ कर इन्द्रियों का समुचित उपयोग (कर्म) करते हुए संसार की नि:स्वार्थ भाव से सेवा करने में लग जाओ, अनासक्ति स्वयं ही आ जाएगी । भगवान श्री कृष्ण भी गीता में यही बात कहते हैं कि कर्म न करने से; कर्म करना उचित है (गीता-3/8) । एक मनुष्य के लिए विरक्त होने से अच्छा है कि वह संसार की सेवा करने के लिए अनासक्त होकर कर्म करे ।

            आसक्ति का कैसा प्रभाव होता है, यह आप स्वयं ही देख लीजिये । ‘आसक्ति से अनुरक्ति’ की राह में चलते हुए ‘अनासक्ति’ विषय पर ही आकर अटक गया हूँ । लिखने की मेरी आसक्ति इतनी अधिक प्रबल हो गयी है, जो एक छोटे से लेकिन महत्वपूर्ण विषय को स्पष्ट करने के लिए इतना अधिक विस्तार दे दिया है । इसी प्रकार जब हम किसी भोग को एक बार भोग लेते हैं, तब उसको बार-बार भोगने की इच्छा जाग्रत होकर बढ़ती जाती है । यह बार-बार भोग प्राप्त करने के लिए मनुष्य का कर्म करने को विवश होना ही आसक्ति है । एक बार त्याग पूर्वक भोगना अर्थात मन में बार-बार भोगने की इच्छा नहीं रखना ही हमें आसक्ति से दूर रख सकता है ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, July 26, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -63

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -63

          विरक्ति और अनासक्ति दोनों में से अनासक्ति को ही क्यों चुनें ? स्पष्ट करने के लिए पहले एक कहानी सुनाता हूँ । एक विरक्त तपस्वी ने कई वर्षों तक तप किया, मोक्ष प्राप्ति के लिए । आखिर एक दिन उसका भौतिक शरीर छूटा और जीवात्मा पहुँच गया धर्मराज के यहाँ । धर्मराज ने उसके कर्मों का लेखा-जोखा देखकर उसे स्वर्ग ले जाने का आदेश दिया । जीवात्मा तो मोक्ष चाहता था अतः उसने प्रतिवाद किया । जीवात्मा ने कहा कि ‘मैंने बहुत काल तक तप किया है, मैं तो मोक्ष का अधिकारी हूँ । मुझे स्वर्ग ही क्यों ?’ 

           धर्मराज ने कहा, ‘बिलकुल सत्य है कि आपने कठोर तप किया है परन्तु केवल कठोर तप आपको मोक्ष नहीं दिलवा सकता । इन्द्रियों से ज्ञान प्राप्त करने और कर्म करने के स्थान पर आपने उनको दबाकर, उनका दमन करते हुए तप किया है । आपने स्वयं के लिए इतना सब कुछ किया है, जबकि यह शरीर परमात्मा ने आपको संसार की सेवा करने के लिए, परमार्थ के लिए दिया है, न कि केवल स्वयं की स्वार्थ-सिद्धि के लिए । अगर आपको मोक्ष ही प्राप्त करना है तो इसके लिए सर्वप्रथम आप स्वर्ग को भोगिये और फिर मनुष्य योनि प्राप्त कर संसार की सेवा कीजिये, तभी आप मोक्ष प्राप्त करने के अधिकारी बन पायेंगे ।’

         अध्यात्म-पथ पर अग्रसर प्रत्येक व्यक्ति की ऐसी ही स्थिति है । संसार की सेवा करने का विचार त्यागकर केवल इन्द्रियों को दबाने में लगे हुए हैं और इन्द्रियां है कि दबती ही नहीं है । ब्रह्मलीन स्वामी श्री रामसुखदासजी महाराज साफ़-साफ़ कहा करते थे ‘संसार की सेवा करो और पिंड छुडाओ ।’ सुनने में बड़ी साधारण सी बात लगती है परन्तु बड़ा गूढ़ सार है उनकी कही इस बात में । 

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Saturday, July 25, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -62

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -62 

         भीतर काम-भोग का भाव जीवित है और ऊपर से दिखावा कर रहे हैं, काम को जीत लेने का । देव ऋषि नारद ने भी एक बार काम को जीत लिया था परन्तु उस काम विजय का उन्हें अभिमान हो गया था । परमात्मा की इच्छा नहीं थी कि उनका भक्त पतन की राह पर अग्रसर हो । उन्होंने देवर्षि को पतन से बचाने के लिए कुछ लीला की । देवर्षि नारद के समक्ष काम-भोग की परिस्थितियाँ बनते ही भीतर दबा काम-भाव पुनः सतह पर आ गया । हम तो साधारण मानव है, हमें कौन रोकेगा ? इस पतन से । हमारे समक्ष एक ही रास्ता है, आसक्ति से बचें और अनासक्त हो जाएँ । इसलिए अनासक्ति के प्रत्येक सूत्र पर चलते हुए बिना किसी अहंकार के साक्षी-भाव को उपलब्ध हो जाएँगे, तभी अनासक्त हो पाएंगे अन्यथा नहीं ।

         अब प्रश्न यही उठता है कि अनासक्ति और विरक्ति दोनों में से कौन सी स्थिति अधिक महत्वपूर्ण है अर्थात हमें विरक्त होना चाहिए अथवा अनासक्त ? विरक्ति और अनासक्ति दोनों ही महत्वपूर्ण है और दोनों ही आपके उत्थान में सहायक हैं । अगर मुझे इन दोनों में से किसी एक को चुनने का कहा जाये तो मैं अनासक्ति का चुनाव करूँगा  । क्यों ? क्योंकि ……,। आगे बढ़ने से पहले चलिए ! एक कहानी सुनिए । इस कहानी से इस ‘क्यों’ का उत्तर मिल जाएगा ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।