आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -80
सार - संक्षेप
संसार में जीवों की असंख्य प्रजातियाँ है, यहाँ तक कि एक प्रजाति में भी आपको भिन्नता दृष्टिगोचर होगी । प्राणियों की सबसे बुद्धिमान प्रजाति का नाम है - मनुष्य । सभी जीवों में एक मात्र मनुष्य नाम का जीव ही ऐसा है जिसको कर्म करने की स्वतंत्रता है और इस स्वतंत्रता का उपयोग अपनी बुद्धि से करते हुए सर्वोच्च अवस्था तक पहुंच सकता है । वह सर्वोच्च अवस्था है - जहां से यात्रा प्रारम्भ की थी, सब कुछ पीछे छोड़कर वापस वहां तक पहुंच जाए । पर मनुष्य इससे उल्टा चलता है, सिर पर कर्मों की गठरी लादे एक योनि से दूसरी योनि में भटकता हुआ नए नए शरीर लेता जा रहा है परन्तु इनसे मुक्त होने की राह नहीं पकड़ पा रहा है ।
परमात्मा ने मनुष्य को तीन विशेषताएं प्रदान की है - क्रिया, बोध और भाव । क्रिया से अर्थ है, कर्म स्वातंत्र्य । क्रिया को अपने स्वार्थपूर्ति में उपयोग कर वह उनमें आसक्त हो जाता है । यही उसके विभिन्न शरीरों में जन्मने-मरने का कारण है । इस कर्म-आसक्ति को वह बोध के माध्यम से अनासक्ति अथवा विरक्ति में परिवर्तित किया जा सकता है । एक गृहस्थ के लिए अनासक्त होना सरल है, जिससे वह बोध अर्थात् विवेक का उपयोग कर बिना लिप्त हुए अपने कर्तव्य कर्म कर सकता है ।
अनासक्त होकर भी संतुष्ट नहीं होना है । क्रिया और बोध के साथ मिली भाव-शक्ति का उपयोग करते हुए परमात्मा से प्रेम करना है, उनसे अपनापन करना है । आसक्ति से राग-द्वेष पैदा होते हैं जबकि भाव से प्रेम । यह प्रेम ही संसार को अपना मानना छुड़ा देता है और परमात्मा से अपनापन करा देता है । इस प्रकार क्रिया, बोध और भाव की शक्तियों का सदुपयोग कर मनुष्य आसक्ति से अनुरक्ति की ओर आगे बढ़ सकता है । सब कुछ मुख्य रूप से हमारे बोध (विवेक) पर निर्भर करता है ।
इसी के साथ ही ‘आसक्ति से अनुरक्ति की ओर’ की यात्रा का समापन होता है । श्रृंखला में अन्त तक साथ बने रहने के लिए आप सभी का हृदय से आभार ।
।। हरिः शरणम् ।।
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल