Monday, June 1, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -8

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -8 

          अब प्रश्न यह उठता है कि आसक्ति और विरक्ति के बीच झूलते जीवन में मध्य में ठहर कर अनासक्त कैसे हुआ जा सकता है ? कोई भी उपाय नहीं है अनासक्ति को उपलब्ध होने का, सिवाय स्वयं के मन पर नियंत्रण करने के । इससे पहले कि इस शरीर का जीवन समाप्ति की ओर चला जाये, हमें स्वयं के मन पर नियंत्रण साधना होगा । आसक्ति हमें उस ओर खींचती है, जिसके प्रति हम आसक्त हैं । जब उससे उब जाते है अथवा आसक्ति को जब कोई गहरी चोट पहुँचती है तब हम विरक्त होने का मार्ग पकड़ लेते है । 

        परन्तु हमारा दुर्भाग्य, हम सही मायने में विरक्त भी तो नहीं हो पाते हैं । वास्तविक विरक्ति है, आसक्ति की ओर फिर कभी भी न लौटना । हम विरक्त कभी भी नहीं होते बल्कि विरक्त होने का नाटक भर करते हैं । यह बात सदैव ध्यान में रखें कि नाटक सदैव हमारा मन करता है हमारी आत्मा अर्थात् हम स्वयं नहीं । आत्मा तो जानती है कि हम जो विरक्ति का नाटक कर रहे हैं वह वास्तव में आसक्ति को और अधिक मजबूत करने का एक उपाय भर है । तभी तो हम विरक्त न रहकर पुनः आसक्त हो जाते हैं ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, May 31, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -7

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -7 

      हमारा मन ही दोलन करता रहता है और आसक्ति और विरक्ति के मध्य झुलाता रहता है । मन पर नियंत्रण स्थापित कर लेना ही अनासक्त हो जाना है । दोलक गति करता है क्योंकि गति उसे आप स्वयं देते हो अन्यथा दोलक तो मध्य में ठहरा हुआ ही था । दोलक में दोलन उसके एक तरफ ऊपर ले जाने से होता है और फिर उसको छोड़ देने से वह स्वतः ही एक से दूसरी तरफ और दूसरी से पहली तरफ, दोलन करता रहता है । उसका यह दोलन करना तभी रुकता है, जब गुरुत्वाकर्षण बल के कारण उसकी गति निरंतर और धीरे-धीरे कम होती जाती है और एक अवस्था ऐसी आती है जब वह मध्य में आकर ठहर जाता है । 

            हमारी जिंदगी में भी इस दोलन की तरह गति होती रहती है, कभी इधर कभी उधर । मध्य में ठहराव कहीं और कभी भी दिखलाई नहीं पड़ता । जब अवस्था ढल रही होती है, हम असहाय नज़र आने लगते हैं, तब मजबूरी में बाहर से लगभग ठहर से जाते हैं परन्तु भीतर मन का दोलन करना नहीं रुकता । इस प्रकार जीवन भर हम आसक्ति और विरक्ति के मध्य सदैव झूलते ही रहते हैं, अनासक्त कभी हो ही नहीं पाते ।            

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Saturday, May 30, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -6

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -6 

              दोलक का बांयी और जाना आसक्ति है और दायीं और जाना विरक्ति । अनासक्ति है, दोलक का मध्य में ठहर जाना । आसक्ति जितनी अधिक तीव्र होगी, विरक्ति भी उतनी ही तेज़ होगी । विरक्ति के नाटक से जब व्यक्ति उब जाता है, तब वह पुनः आसक्ति की और लौट आता है, मध्य में एक पल के लिए भी नहीं ठहरता । आसक्ति से जब मोह भंग होता है, वह पुनः विरक्ति की ओर चल देता है, मध्य में एक क्षण के लिये भी नहीं ठहरता ।

         एक दोलक की भांति सदैव दोलन (Oscillation) करते रहना व्यक्ति की नियति (Destiny) बन चूका है । अगर आप किसी अति आसक्त व्यक्ति (Attached person) को विरक्त होते हुए देखो तो कभी भी यह मत समझना कि वह सदैव के लिए विरक्त हो चूका है । वह कभी भी पुनः उतना ही अधिक तेजी के साथ आसक्त भी हो सकता है । सब कुछ मन का खेल है और मन ही उसे आसक्ति और विरक्ति के मध्य भटकाता रहता है, अनासक्त होने ही नहीं देता । आज जो हमारा सर्वाधिक प्रिय व्यक्ति है, वह एक दिन भी अगर हमारा कहना नहीं माने तो हम तत्काल उससे दूरी बना लेते हैं । उस व्यक्ति से हमारी अधिक समीपता उसके प्रति रहे हमारे आसक्त भाव को बतलाती है और तत्काल होने वाली उससे दूरी हमारी विरक्ति को प्रदर्शित करती है । वास्तव में देखा जाये तो यह हमारा मन ही है, जो हमें आसक्ति और विरक्ति के मध्य में झुला रहा है और मध्य में ठहरने का अवसर ही नहीं देता ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Friday, May 29, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -5

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -5 

            पहला भिक्षु जो कि निर्विकार भाव से अपने रास्ते चल रहा है, वह विरक्त है । दूसरा भिक्षु, जिसने युवती को नदी पार कराने से इनकार कर दिया, उसके मन में अभी भी वह स्त्री बसी हुई है । वह भिक्षु उस युवती के प्रति आसक्त है । तीसरा युवा भिक्षु अनासक्त है, उसने युवती की सहायता करने को उसका हाथ पकड़ा था परंतु उसके मन ने स्त्री को नहीं पकड़ा था । विरक्ति, आसक्ति और अनासक्ति में यही मूलभूत अंतर है । 

           अनासक्ति का अर्थ है, न तो विरक्ति और न ही आसक्ति, एक दम मध्य में रहना । भगवान बुद्ध ने इस साम्य अवस्था प्राप्त कर लेने को मंझिम निकाय कहा है । मंझिम निकाय अर्थात् मध्य में रहना । एक गृहस्थ के लिए अनासक्त होना ही सर्वोत्तम मार्ग है ।

           इस कहानी से ही अनासक्ति (Detachment) की बात को आगे लिए चलते हैं । ऐसा नहीं है कि हम अनासक्त भाव को बड़ी सुगमता से और जीवन में कभी भी पकड़ सकते हैं । बड़ा ही कठिन है, अनासक्त होना । आसक्त होने में कुछ भी नहीं लगता, विरक्त होने की नौटंकी भी की जा सकती है परन्तु अनासक्त होने का तो नाटक भी नहीं किया जा सकता । भगवान बुद्ध का मंझिम निकाय का एक ही अर्थ है, मध्य में रहना । एक दोलक (Pendulum) जब गति करता है तो पहले बांयी तरफ जाता है और फिर उतनी ही तेज़ गति के साथ दायीं ओर चला जाता है, मध्य में वह ठहर ही नहीं सकता । हाँ, केवल एक परिस्थिति में वह मध्य में ठहरता है जब गुरुत्वाकर्षण बल का प्रभाव उसे वहाँ ठहरने को मजबूर कर दे । 

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Thursday, May 28, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -4

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -4 

            एक बार तीन बौद्ध भिक्षु भिक्षा लेने के लिए पास के ही गांव की ओर जा रहे थे । गांव पहुंचने के लिए रास्ते मे एक नदी को पैदल ही पार करना पड़ता था । नाव का कोई साधन नहीं था । जब तीनों भिक्षु नदी किनारे पहुंचते हैं तो देखते हैं कि एक षोडशी नदी के उस पार जाने के लिए पहले से ही खड़ी है । उसकी हिम्मत नदी के प्रवाह में उतरने की नहीं हो रही थी । उसने सबसे आगे चल रहे पहले भिक्षु को हाथ पकड़ कर नदी पार कराने को कहा । उस भिक्षु का उस कन्या की ओर ध्यान ही नहीं गया । कन्या ने पीछे चल रहे दूसरे भिक्षु से हाथ पकड़कर नदी पार कराने को कहा । भिक्षु ने इस प्रकार एक कन्या को हाथ पकड़कर नदी पार कराने को एक साधु के लिए अनुचित मानते हुए इनकार कर दिया । लाचार युवती ने अंतिम प्रयास करते हुए तीसरे युवा भिक्षु से सहायता मांगी । तुरंत ही उस युवक भिक्षु ने युवती का हाथ पकड़ा और सहारा देते हुए नदी पार करा दी । पार पहुंचकर युवती ने उस भिक्षु का बड़ा आभार माना और अपने रास्ते चल दी ।

                तीनो भिक्षु गांव में प्रवेश कर रहे हैं । पहला भिक्षु निर्विकार भाव से सबसे आगे अपने रास्ते पर चल रहा है । दूसरा भिक्षु बार बार तीसरे भिक्षु को उस युवती का हाथ पकड़कर नदी पार कराने को अनुचित बतला रहा है । साथ ही वह उस युवा भिक्षु की शिकायत भगवान बुद्ध से करने की धमकी भी दे रहा है । आख़िरकार तीसरे भिक्षु से रहा नहीं गया, उसे दूसरे भिक्षु को उत्तर देना ही पड़ा । तीसरे युवा भिक्षु ने उस दूसरे भिक्षु को कहा कि मैंने तो उस युवती का हाथ नदी पार कराते ही छोड़ दिया था परंतु आप तो अभी तक उस युवती को मन ही मन पकड़े हुए हैं ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, May 27, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -3

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -3 

              एक गृहस्थ का जीवन भी आसक्ति और विरक्ति के मध्य डोलता रहता है । आसक्ति और विरक्ति दोनों के ही अस्थाई होने के कारण वह कभी भी मुक्त नहीं हो पाता । इसलिए मुक्त होने के लिए आवश्यक है कि वह अनुरक्त हो जाए । अनुरक्ति में अनुराग होता है अर्थात् अनुरक्त वह है जिसमें आसक्ति तो है परंतु उसकी आसक्ति संसार में न होकर परमात्मा में है । अनुरक्ति में संसार से सम्बन्ध तो रहता है परन्तु वह संबंध मोह, ममता से रहित निःस्वार्थ होता है, साथ ही परमात्मा से सम्बन्ध श्रद्धा, विश्वास और प्रेम का होता है । 

            आसक्ति को अनुरक्ति में परिवर्तित करने का रास्ता अनासक्ति से होकर गुजरता है । सर्वप्रथम आसक्त को अनासक्त होना होगा । फिर अनासक्ति को अनुरक्ति में परिवर्तित होते देर नहीं लगेगी । 

          यह अनासक्ति कैसे हमें परमात्मा के द्वार तक ले जाती है ? कैसे यह सांसारिक प्रेम को पारमात्मिक प्रेम में बदल देती है ? जानने के लिए सबसे पहले अनासक्ति क्या है ? यह जानना होगा । तो चलिए ! आसक्ति से अनुरक्ति की ओर बढ़ते हुए अनासक्त होने का प्रयास करते हैं । सबसे पहले एक दृष्टान्त के माध्यम से जानने का प्रयास करते हैं कि अनासक्ति क्या है ? 

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Tuesday, May 26, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -2

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -2 

          विरक्त का अर्थ है बिना राग के अर्थात् जिस व्यक्ति का संसार और उसके पदार्थों से वैराग्य हो गया हो । एक विरक्त व्यक्ति पुनः संसार की आसक्ति में कभी भी फँस सकता है । जैसे एक दोलक (Pendulum) जब बाईं ओर की उच्च अवस्था तक पहुँच जाता है तब वह वहाँ ठहर नहीं सकता । गति करते हुए वह दाईं ओर जाता है और वहाँ भी उच्चतम स्तर को छूकर पुनः बाईं ओर गति करता है । यही स्थिति आसक्ति और विरक्ति की है । आसक्त व्यक्ति कभी भी विरक्त हो सकता है और विरक्त कभी भी आसक्ति की ओर लौट सकता है । विरक्ति में आसक्ति का भी थोड़ा अंश छिपा रहता है और आसक्ति में विरक्ति का । बस, केवल परिस्थिति बदलने की देर है कि आसक्ति विरक्ति में बदल जाती है और विरक्ति आसक्ति में ।

          आसक्ति और विरक्ति के मध्य भी एक स्थिति बन सकती है - अनासक्ति की । दोलक दोलन करते हुए कभी बाईं ओर जाता है और कभी दाईं ओर । दोनों ही स्थितियों में सर्वोच्च स्तर पर जाकर वह कुछ क्षण के लिये रूकता है लेकिन गुरुत्वाकर्षण बल के कारण वह स्थाई रूप से वहां रूक नहीं सकता । दोनों ओर की ऊँचाइयों के बिलकुल मध्यम में भी एक स्थिति आती है, जहां पर वह स्थाई रूप से ठहर सकता है । इसी प्रकार आसक्ति और विरक्ति के एकदम मध्यम में भी एक स्थित बनती है और उस स्थिति का नाम है - अनासक्ति अर्थात् न तो आसक्ति और न ही विरक्ति । अनासक्ति को वीतरागिता भी कहते हैं अर्थात् न किसी में राग और न किसी से द्वेष । भगवान श्री कृष्ण न रागी थे और न ही वैरागी बल्कि वे वीतरागी थे, अनासक्त थे ।

 क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।