सम्भवामि युगे युगे -62
आसुरी शक्तियां जब सक्रिय होती हैं, तब पतन का माध्यम बनता है - काम । नारी का आभूषण है, लज्जा परन्तु काल-चक्र जब घूमता है तब लज्जा दूर की कौड़ी हो जाती है । अभी चित्रकूट से निकलते समय अत्रि पत्नी अनुसुइयाजी ने सीताजी को पतिव्रत धर्म का उपदेश दिया था और इधर दण्डकारण्य में सूपनखा कितनी निर्लज्जता से बात कर रही थी । जब नारी लज्जा का त्याग कर देती है, समाज पतन की ओर अग्रसर हो जाता है । जिस बेबाक़ी से युवा लड़कियां आज जन्तर-मन्तर पर गालियाँ बक रही हैं, उसे निर्लज्जता की पराकाष्ठा नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे ? त्रेता में तो एक सूपनखा थी, यहां तो पग-पग पर कई सूपनाखाएँ एक साथ घूम रही हैं ।
अनुसुइयाजी का पातिव्रत्य-धर्म का ज्ञान भारत जैसे सांस्कृतिक देश में इतनी शीघ्रता से सिसकियाँ लेने लगेगा, कल्पनातीत है । परन्तु हम वास्तविकता से कब तक मुंह मोड़ते रहेंगे ? अब राम नहीं आने वाले इस संस्कृति को बचाने क्योंकि जब तक हम स्वयं उन्हें बुलाएँगे नहीं तब तक वे नहीं आने वाले । इसके लिए हमें सर्वप्रथम हमारे भीतर सुप्त पड़ी दैवी सम्पदा को जाग्रत करना होगा । ऐसा नहीं करेंगे तो सूपनखा की बात सुनकर कई रावण एक साथ हमारी संस्कृति को मटियामेट करने के लिए टूट पड़ेंगे और साथ देंगे हमारे ही बीच बैठे मारीच, जो पहले से ही जानते हैं कि दोनों तरफ़ मरना निश्चित है ।
विकृत मुख लेकर रोते हुए सूपनखा पहुंचती है, अपने भाई लंकानरेश रावण के पास । कारण जानते ही क्रोधित हो जाता है, रावण । फिर भी आशंकित है, अपनी मृत्यु को लेकर । रावण को एक मनुष्य से चुनौती मिली है तो वह कोई साधारण मनुष्य तो हो नहीं सकता । कुछ क्षण सोचता है और अंतिम निर्णय पर पहुंच जाता है । निर्णय - यदि साधारण मनुष्य है तो मेरे हाथों मारा जाएगा और साक्षात् परमात्मा है तो उसके हाथों मरना भी मेरे लिए कल्याणकारी होगा ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।