आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -17
किसी भी क्षेत्र में कर्म करने के प्रारम्भिक काल में हमारी निष्ठा में कभी कोई कमी नहीं रहती है परन्तु प्रारब्ध (Destiny) के फलस्वरूप मिलने वाले कर्म-भोग के प्रति बनता हुआ आसक्ति भाव हमारी निष्ठा को धीरे-धीरे कमजोर करता जाता है । जब यह निष्ठा, लोभ (Greed) में परिवर्तित हो जाती है तब अनासक्ति आसक्ति में परिवर्तित हो जाती है । एक चिकित्सक की आसक्ति कई क्षेत्रों में हो सकती है जिसमें धन, मान-सम्मान की चाहना आदि प्रमुख हैं । हमें इन सब बातों को एक ओर रखकर अपने क्षेत्र के कार्य को कर्तव्य कर्म समझकर सम्पादित करना होगा तभी हम स्वयं को प्रत्येक प्रकार की आसक्ति से मुक्त रख पाएंगे ।
विरक्ति में तो कर्तव्य-कर्म का भी त्याग करना पड़ता है जबकि अनासक्ति में केवल आसक्ति को त्यागना होता है, कर्तव्य-कर्म को नहीं । अतः निष्ठा पूर्वक कर्तव्य कर्म करते रहना ही अनासक्त होना है । भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते भी हैं कि-
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण: ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मण: ।। गीता – 3/8 ।।
अर्थात हे अर्जुन, तू नियत कर्तव्य कर्म कर; क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी संभव नहीं होगा ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।