Wednesday, August 12, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -80

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -80

सार - संक्षेप

        संसार में जीवों की असंख्य प्रजातियाँ है, यहाँ तक कि एक प्रजाति में भी आपको भिन्नता दृष्टिगोचर होगी । प्राणियों की सबसे बुद्धिमान प्रजाति का नाम है - मनुष्य । सभी जीवों में एक मात्र मनुष्य नाम का जीव ही ऐसा है जिसको कर्म करने की स्वतंत्रता है और इस स्वतंत्रता का उपयोग अपनी बुद्धि से करते हुए सर्वोच्च अवस्था तक पहुंच सकता है । वह सर्वोच्च अवस्था है - जहां से यात्रा प्रारम्भ की थी, सब कुछ पीछे छोड़कर वापस वहां तक पहुंच जाए । पर मनुष्य इससे उल्टा चलता है, सिर पर कर्मों की गठरी लादे एक योनि से दूसरी योनि में भटकता हुआ नए नए शरीर लेता जा रहा है परन्तु इनसे मुक्त होने की राह नहीं पकड़ पा रहा है ।

            परमात्मा ने मनुष्य को तीन विशेषताएं प्रदान की है - क्रिया, बोध और भाव । क्रिया से अर्थ है, कर्म स्वातंत्र्य । क्रिया को अपने स्वार्थपूर्ति में उपयोग कर वह उनमें आसक्त हो जाता है । यही उसके विभिन्न शरीरों में जन्मने-मरने का कारण है । इस कर्म-आसक्ति को वह बोध के माध्यम से अनासक्ति अथवा विरक्ति में परिवर्तित किया जा सकता है । एक गृहस्थ के लिए अनासक्त होना सरल है, जिससे वह बोध अर्थात् विवेक का उपयोग कर बिना लिप्त हुए अपने कर्तव्य कर्म कर सकता है ।

        अनासक्त होकर भी संतुष्ट नहीं होना है । क्रिया और बोध के साथ मिली भाव-शक्ति का उपयोग करते हुए परमात्मा से प्रेम करना है, उनसे अपनापन करना है । आसक्ति से राग-द्वेष पैदा होते हैं जबकि भाव से प्रेम । यह प्रेम ही संसार को अपना मानना छुड़ा देता है और परमात्मा से अपनापन करा देता है । इस प्रकार क्रिया, बोध और भाव की शक्तियों का सदुपयोग कर मनुष्य आसक्ति से अनुरक्ति की ओर आगे बढ़ सकता है । सब कुछ मुख्य रूप से हमारे बोध (विवेक) पर निर्भर करता है ।

        इसी के साथ ही ‘आसक्ति से अनुरक्ति की ओर’ की यात्रा का समापन होता है । श्रृंखला में अन्त तक साथ बने रहने के लिए आप सभी का हृदय से आभार ।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

Tuesday, August 11, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -79

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर - 79

         भक्ति में तीन चीजें आवश्यक हैं - श्रद्धा-विश्वास, स्त्रैण चित्त और एकांत । स्त्रियों में प्रथम दो स्वाभाविक रूप से होते हैं । महिलाएं स्त्रैण-चित्त होती हैं । उनमें संसार के प्रति अत्यधिक आसक्ति होती है । जब इस आसक्ति की दिशा पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाती है, तब वह परमात्मा में भी अत्यधिक अनुरक्त हो जाती है । स्त्रैण चित्त का दुरुपयोग करने से वे सांसारिक सुखों में डूब जाती हैं । सही उपयोग करने से प्रथम दो को उपलब्ध हुआ प्रत्येक साधक अनुरक्त हो जाता है, फिर एकांत उसे काट खाने को नहीं दौड़ता है क्योंकि एकांत में भी भगवान उसके साथ रहते हैं । इसलिए मीरा बाई भूतहा महल में भी भयग्रस्त नहीं हुई ।

         जिस पुरुष भक्त का चित्त भी स्त्रैण हो जाता है, तब वह भी परमात्मा के प्रति गहरा अनुरक्त हो जाता है । वृंदावन में भक्त राधा का रूप धारण किए रखते हैं । बाह्य रूप बदलने से श्रीकृष्ण नहीं मिलने वाले, भीतर से राधा (स्त्रैन चित्त) होना आवश्यक है। चलिए ! चलते-चलते अनुरक्त संत के भी उदाहरण पर दृष्टि डाल लेते हैं । 

          रसखान की अनुरक्ति देखिए कि वे उसी भूमि पर फिर से जन्म लेना चाहते हैं जिस पर अवतरित होकर परमात्मा ने श्रीकृष्ण के रूप में बाल-लीला की । सूरदासजी को भला कौन भूल सकता है । हाथ पकड़ कर भगवान ने उन्हें वृंदावन तक पहुंचा दिया और फिर अन्तर्धान हो गए । तब अनुरक्त सूरदासजी के मुंह से बोल फूट पड़े -

         हाथ छुड़ाए जात हो, निबल जान कर मोय ।

         हिरदै से जब जाओगे, तब जानूँगो तोय ।।

      क्या हम अभी भी अनुरक्ति को समझ नहीं पाए हैं ? अनुरक्ति को समझने के लिए सबसे पहले अपने भीतर श्रद्धा और विश्वास पैदा करें । श्रद्धा समर्पण कराती है और विश्वास अनन्य भक्ति । ऐसे में फिर अनुरक्ति से बंधे परमात्मा कहां जाएंगे, कैसे नहीं आएंगे ? इसलिए सदैव परमात्मा के प्रति श्रद्धा और विश्वास को दृढ़ रखें ।

कल सार - संक्षेप 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल 

।। हरि: शरणम्।।

Monday, August 10, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -78

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -78

           आसक्ति के पीछे संसार और शरीर से मिलने वाला भोग-सुख है, जबकि परमात्मा से अनुराग होना उनसे प्रेम करना है । आसक्ति राग पैदा करती है जबकि संसार के प्रति वीतरागता से परमात्मा में अनुराग हो जाता है । राग आसक्ति है और अनुराग अनुरक्ति है । 

           परमात्मा में अनुकरणीय अनुरक्ति देखना हो तो सबसे बेहतरीन उदाहरण गोपियों का है । गोपियां घर का काम भी करती थी तो भी ध्यान श्रीकृष्ण में लगा रहता था । भागवतजी में एक अध्याय गोपिका- गीत का है, जिसमें गोपियां श्रीकृष्ण को कहती हैं कि हम तुम्हारी बिना मोल की दासियां हैं । बिना मोल की दासियां कहने का अर्थ है कि वे कृष्ण से निश्छल और नि:स्वार्थ प्रेम करती थी । इतना प्रेम कि उनको अपने पति, घर के काम-काज, यहाँ तक कि कपड़े-लतों तक की भी सुध नहीं रहती थी । उनका परमात्मा के प्रति कोई शारीरिक और सांसारिक प्रेम नहीं था, उनका प्रेम तो अलौकिक था, दिव्य था । वे रात-दिन प्रेम-रस में भीगी रहती थी । वे स्वयं तक को भूल जाती थी, बस केवल एक कृष्ण …..। तभी कबीर ने प्रेम को इस प्रकार परिभाषित किया है - 

     प्रेम प्रेम सब कोई कहे, प्रेम न जाने कोय ।

     जा मारग साहिब मिले, प्रेम कहावै सोय ।।

     प्रेम की परिपूर्णता सेवा और त्याग में ही है । इन दो (सेवा और त्याग) गुणों के कारण ही गोपियां परमात्मा के प्रति अनुरक्त रही । सेवा और त्याग स्त्रियों में विशेष रूप से होते हैं क्योंकि उनका चित्त स्त्रैण होता है । उनमें श्रद्धा और विश्वास जन्मजात होता है, वे शीघ्र ही किसी पर विश्वास कर लेती हैं जिसके कारण कई दुष्ट व्यक्ति उनका नाजायज़ फ़ायदा उठाते हैं । 

        आज की बालिकाओं में स्त्रैण चित्त का निरन्तर अभाव होता जा रहा है, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण दिल्ली के जन्तर-मंतर पर परिलक्षित हुआ उनका व्यवहार है । इतना बुरा प्रदर्शन तो किसी गए गुजरे पुरुष का भी नहीं देखा गया है । ऐसे में शायद ही भविष्य में कोई परमात्मा में अनुरक्त मीरां देखने को मिले ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ.प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, August 9, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -77

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -77

             एक-दो पाठकों द्वारा ‘अनुरक्ति’ का उदाहरण देने का अनुरोध किया गया है । मुझे इस बात का सदैव गर्व रहता है कि मैं उस राज्य से हूँ जहां परमात्मा में अनुरक्त भक्तों का इतिहास रहा है । सबसे बड़ा उदाहरण तो मीरां बाई का है । मेड़ता में जन्म लेकर पली-बढ़ी मीरां का विवाह मेवाड़ के राजकुमार भोजराज के साथ कर दिया गया था । फिर भी वे सदैव कहती रही कि ‘ जिनके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई’ । संसार से अनासक्त मीरां सदैव श्रीकृष्ण भक्ति में लीन रहती थी । परमात्मा के प्रति ऐसी अनुरक्ति का उदाहरण आज इक्कीसवीं शताब्दी में मिलना मुश्किल है ।

          मीरां बाई के अलावा मकराना की बालिका करमा बाई भी परमात्मा के प्रति अनुरक्त थी तभी तो जगन्नाथ को आज भी उसके खीचड़े का भोग रुचता है । पिता द्वारा स्वयं से पूर्व श्रीकृष्ण को ज़ीमाने का आदेश ही उनको परमात्मा के प्रति अनुरक्त कर गया । करमा ने भोजन तब तक नहीं किया जब तक भगवान ने साक्षात् प्रकट होकर उसका बनाया खीचड़ा नहीं खा लिया । ऐसी अबोध अनुरक्ति भी परमात्मा के दर्शन करा सकती है ।

         मांझवास (नागौर) की फूली बाई, राम-भक्ति में इतनी तल्लीन रहती थी कि उसकी थेपड़ियाँ (गोबर के कण्डे) दूसरी स्त्रियाँ चुरा ले जाती थी । जब वह गांव प्रधान से इस चोरी की शिकायत करती तो वे फूली से उसकी थेपड़ियों की पहचान बताने को कहते । तब वे एक ही बात कहती कि मेरी जिस भी थेपड़ी को हाथ लगाओगे, उससे राम-राम की धुन निकलेगी । फूली बाई की भगवान के प्रति अनुरक्ति की कल्पना कीजिए कि केवल उसके रोम-रोम में ही राम-धुन नहीं बसी थी बल्कि जिसको भी उसने छुआ वह भी राममय हो गया ।

क्रमशः

 प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Saturday, August 8, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -76

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -76

            हम सब ‘नहीं’ से ही प्रेम करने लगे हैं । वास्तव में यह प्रेम न होकर हमारे स्वार्थ के कारण उनमें हमारी आसक्ति है । आसक्ति को प्रेम का नाम नहीं दिया जा सकता । प्रेम विनाशी और परिवर्तनशील के साथ हो ही नहीं सकता । उनके साथ किया गया प्रेम आज है, कल नहीं रहेगा । हमने संसार, उसके व्यक्तियों, वस्तुओं में मोह/आसक्ति को प्रेम का नाम दे दिया है, यह ग़लत है । सांसारिक मोह के कारण ही हम दूसरों को ‘अपना’ कहने लगे हैं । वास्तव में वे अपने न तो पूर्व में कभी थे, न आज हैं और न भविष्य में कभी अपने होंगे । 

           आसक्ति/राग जिसको हमने ‘प्रेम’ नाम दे रखा है, वास्तव में वह अपना स्वार्थ है । जिस समय स्वार्थपूर्ति में बाधा आएगी, यही प्रेम (राग) द्वेष में परिवर्तित हो जाएगा । राग का विलोम द्वेष है क्योंकि दोनों में ही दो का अस्तित्व बना रहता है । प्रेम का कोई विलोम शब्द नहीं है क्योंकि प्रेम में किसी दूसरे का स्थान ही नहीं है । 

       ‘प्रेम गली अति सांकरी, जाँ में दो न समाही ।

        जब ‘मैं’ था तब हरि नहीं, अब हरि है ‘मैं’ नाहीं ।।’

         प्रेम तो अविनाशी है और अविनाशी से किया गया प्रेम ही अनुरक्ति है । इसलिए संसार और शरीर सम्बंधियों को ‘मैं, मेरा और मेरे लिए’ मानना छोड़कर अनासक्त हो जाएं और फिर अपनी ऊर्जा को परमात्मा से अपनापन करने में समर्पित कर दें । ऊर्जा भी परमात्मा की तरह अनादि और अविनाशी है । आसक्ति को छोड़ अनासक्त होकर जो ऊर्जा बचाई है, उसको अनुरक्ति में समर्पित कर दें, जीवन में ऐसा करना ही सर्वोत्तम है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Friday, August 7, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -75

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -75

           आसक्ति होती है, ‘नहीं’ को ‘है’ मान लेने के कारण । इसका अर्थ यह नहीं है कि ‘नहीं’ अलग है और ‘है’ अलग है । ‘नहीं’ भी ‘है’ है परन्तु जिस रूप में हम ‘नहीं’ को ‘है’ मान बैठे हैं, उस रूप में वह ‘है’ नहीं है । हम संसार के बदलाव और चमक दमक को ‘है’ मान बैठे हैं, वास्तव में वह चमक दमक संसार की नहीं है, इसीलिए इसको ‘नहीं’ कहा गया है । इस ‘नहीं’ में जो चमक दमक है, वह ‘है’ के कारण है । इस प्रकार यदि ‘नहीं’ की चमक दमक में आसक्त न होकर उसमें ‘है’ को देखेंगे तो ‘नहीं’ भी ‘है’ हो जाएगा ।

          शरीर और जगत् ‘नहीं’ है क्योंकि जैसे आज हैं, वैसे कल नहीं रहेंगे । परमात्मा और हम जैसे आज हैं वैसे ही कल रहेंगे इसलिए ये ‘है’ हैं । शरीर में इंद्रियाँ है । सभी इंद्रियां भी शरीर की तरह ‘नहीं’ के अन्तर्गत ही है ।‘नहीं’ से नहीं ही दिखलाई देगा परन्तु उस दिखलाई पड़ने वाले को ‘है’ मान लेने के कारण ही हम उस दृश्य में आसक्त हो जाते हैं । दृश्य जो देखा गया है वह सत्य नहीं है, यहाँ तक कि जब दृश्य पर दृष्टि पड़ी और उस दृश्य को मस्तिष्क द्वारा देखा गया, तब तक वह दृश्य वैसा नहीं रहा, जब उस पर दृष्टि पड़ी थी । ऐसे में उसे ‘है’ कैसे कहा जा सकता है ?

           दूसरी बात, जो कुछ हम देखना चाहते हैं अथवा सुनना, स्पर्श करना, सूंघना या स्वाद लेना चाहते हैं, हमारी आसक्ति वैसा ही अनुभव करा देती है । इसका अर्थ है कि हम हमारी आसक्ति से संचालित हो रहे हैं, जबकि हम जानते हैं कि अपनी आसक्ति के कारण जिसके पीछे पड़े हैं वह सब भी ‘नहीं’ होता जा रहा है । फिर ऐसे ‘नहीं’ के साथ रहकर क्या हम शान्ति को प्राप्त कर सकते हैं ? इस प्रश्न का उत्तर स्वयं को पहचान लेने से अर्थात अनुभूति होने से पूर्व किसी को नहीं मिलने वाला । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, July 29, 2026

गुरु -पूजा

 गुरु-पूजा

       ‘गुरु’ कोई व्यक्ति नहीं है, ‘गुरु’ वह है जिसमें गुरुत्व गुण हो अर्थात् आकर्षित करने का गुण । इस प्रकार ‘गुरु’ का अर्थ है, वह व्यक्ति जिसमें आकर्षित करने की क्षमता है । बहुत से लोग आत्मज्ञानी हुए है, परंतु सभी ‘गुरु’ नहीं हुए क्योंकि ‘गुरु’ में आत्मज्ञान होने के साथ-साथ और गुणों की भी आवश्यकता होती है ।आत्मज्ञान का संदेश दूसरे के भीतर तक पहुँचाने के लिए अभिव्यक्ति-कुशल होना आवश्यक है । जो मौन और निःशब्दता के अपने अनुभव को शब्दों में रूपांतरित कर दे, वही ‘गुरु’ हो सकता है । अनुभवी और शास्त्र-ज्ञान में कुशल व्यक्ति ही अपने शब्दों को तीर की भाँति किसी के भी हृदय में उतार सकता है । कोई स्वामीजी जैसा बिरला ही ‘अवर्णनीय का वर्णन’ कर सकता है । निःशब्दता को शब्द प्रदान करने की उच्च कला उनमें थी ।

          क्या आपको भी ऐसे ही किसी ‘गुरु’ की तलाश है ? उत्तर यदि ‘हाँ’ में है तो पहले आपको स्वयं एक आदर्श शिष्य बनना होगा । स्मरण रहे, केवल गुरु के कहे शब्द ही आपको आत्मज्ञान कराते हुए मुक्त नहीं कर सकते । आदर्श शिष्य वही है जो गुरु के शब्दों को सम्हाल सके । गुरु तो अपने अनुभव को शब्द दे सकता है परंतु आदर्श शिष्य वही है जो उनके कहे गए शब्दों को अपने भीतर ले जाकर उन्हें पुनः मौन और निःशब्दता में बदल दे । गुरु आपको अपने अधीन नहीं करता बल्कि सहारा देते हुए आपको अपने पैरों पर खड़ा करता है, फिर एक दिन वह सहारा भी आपसे छीन लेता है जिससे तुम स्वयं भी ‘गुरुत्व’ के गुणों से ओतप्रोत हो जाओ ।

         जीवन में जिनसे भी आपने ज्ञान लिया है, जिनके शब्दों ने आपको भीतर तक प्रभावित और परिवर्तित किया है, उन सभी को ‘गुरु’ कहा जा सकता हैं परंतु आदर्श ‘गुरु’ वही है जिनके शब्दों ने आपके भीतर की उठापटक को शांत करते हुए मौन और निःशब्दता में बदल दिया हो । मेरे जीवन में भी ऐसे ही एक व्यक्तित्व का परमात्मा की कृपा से पदार्पण हुआ जिसने मेरे भीतर की उठापटक को शांत करते हुए जीवन की दिशा को परिवर्तित किया है । मैं यह नहीं कहता कि मैं एक आदर्श शिष्य हूँ परंतु वे एक आदर्श ‘गुरु’ अवश्य हैं । जिसमें गुरुत्व का गुण होता है, ऐसे व्यक्ति स्वयं को कभी ‘गुरु’ कहलाना कभी पसंद भी नहीं करते । इसी गुण के कारण वे अधिक प्रचारित नहीं होते परंतु कोई न कोई तो उनको फिर भी पहचान लेता है ।

            आज गुरु-पूर्णिमा के पावन अवसर पर ऐसे ही एक व्यक्तित्व आचार्य श्री गोविंद राम जी शर्मा को मैं दण्डवत प्रणाम करता हूँ । उनकी पूजा के लिए उपरोक्त शब्दों के अतिरिक्त मेरे पास कुछ भी नहीं है और इन शब्दों को प्रकट कराने में उनकी परोक्ष भूमिका भी है । जीवन में सीखने और जानने योग्य जो भी है, इन्हीं के सानिध्य में रहकर सीखा और जाना है । 

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय ।

बलिहारी गुरु आपकी, गोविन्द दियो बताय ।।

आपको एक बार पुनः प्रणाम ।

।। हरिः शरणम् ।।

डॉ. प्रकाश काछवाल