सम्भवामि युगे युगे -6
परमात्मा यदि माया के माध्यम से अपना खेल नहीं खेले तो उनको अवतरित होना ही नहीं पड़े । हां, सत्य है क्योंकि माया ही मनुष्य को दिग्भ्रमित कर उससे उल्टे सीधे कर्म करवा देती है, जिनके परिणाम उसे भोगने पड़ते हैं । ये कर्म ही धर्म-अधर्म को बढ़ाते घटाते रहते हैं । यदि धरा पर अधर्म बढ़ रहा है तो क्या वह कभी परमात्मा की दृष्टि से छिपा रह सकता है ? उनकी दृष्टि से कुछ भी छिपा हुआ नहीं है । वे चाहते तो बिना अवतरित हुए भी अधर्म को नष्ट कर सकते हैं परंतु नहीं करते क्योंकि उन्हीं का बनाया एक नियम यह भी है कि जब-जब धर्म निष्प्रभावी होगा और अधर्म का प्रभाव बढ़ेगा, प्रकृति को अधीन करके मैं स्वयं अवतरित होऊंगा ।
उनकी दृष्टि जब अधर्म के बढ़ते प्रभाव पर पड़ती है तब माया के माध्यम से ऐसा खेल रचते हैं कि उनके अवतरित होने की राह आसान हो जाती है । जय-विजय, उन्हीं के दो पार्षद, उन्हीं की आज्ञा से, उन्हीं के निवास की पहरेदारी कर रहे थे । माया के माध्यम से उन्होंने ऐसा खेल रचा कि न जाने कहां से सनाकादिक ऋषि हरिः शरणम्, हरिः शरणम् जपते हुए वहां आ पहुँचते हैं और श्रीहरि के दर्शन को उत्सुक हो जाते हैं । अपने कर्तव्य-पथ पर डटे हुए जय-विजय उनको प्रवेश करने से रोक देते हैं ।
सनकादिक ऋषि, जिनको बिना किसी रोक-टोक के सर्वत्र आने-जाने की अनुमति मिली हुई है, वे आज श्रीहरिः के यहां प्रवेश से रोके जाने पर जय-विजय को श्राप दे देते हैं - “जाओ पृथ्वी पर तीन बार राक्षस के रूप में जन्म लो, तीन जन्मों बाद श्रीहरि: ही तुम्हें मुक्त करेंगे ।” इस प्रकार अपने तीन अवतार लेने के लिए आधारशिला रख दी भगवान ने । राक्षस होने का अर्थ ही है, अधर्म में रत होना । अब तीन बार राक्षस रूप में जन्म लेकर जय-विजय पृथ्वी पर उत्पात करेंगे और धर्म को दबायेंगे ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।