आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -19
अपने पुत्र के मुंह से दूसरे की निंदा सुनकर संत बड़े आहत हुए । सूफी संत ने अपने पुत्र से कहा -“ बेटा, इन सोये हुए लोगों की इस प्रकार आलोचना करने से बेहतर था कि तुम भी इनकी तरह सोये हुए ही रहते, कम से कम तुम्हें किसी का दोष तो दिखलाई नहीं पड़ता ।” इतना कहकर वे चुप हो गए और परमात्मा के नाम का स्मरण करते हुए मस्जिद की तरफ बढ़ने लगे । सूफी संत ने अपने पुत्र से सत्य ही कहा था । अगर उनका पुत्र भी नींद में सोया रहता तो कम से कम उसे किसी व्यक्ति में दोष तो दिखलाई नहीं पड़ता ।
हम चाहे कितनी भी ईश्वर से प्रार्थना कर लें, अगर हमारा मन निर्मल नहीं है तो हमारी वह प्रार्थना ईश्वर तक पहुँच ही नहीं सकती । हम ईश्वर की प्रार्थना करते हुए स्वयं को अन्य लोगों से ऊँचा समझने लगते हैं और दूसरे व्यक्तियों में दोष ढूँढने लगते हैं । वास्तव में किसी भी व्यक्ति में केवल दोष ही दोष नहीं होते बल्कि साथ में कुछ गुण भी होते हैं । भाईजी श्री हनुमान प्रसादजी पोद्दार कहते हैं कि किसी को बुरा न समझें । दूसरे को बुरा समझेंगे तो आप में वह बुराई पहले ही आ जाएगी ।
आध्यात्मिक पथ पर चल रहे व्यक्ति भी अपने आपको दूसरे से आगे होने का भ्रम पाले रहते हैं । दूसरों से स्वयं को श्रेष्ठ समझना भी एक विकार है । इस विकार को साथ रखकर परमात्मा के मार्ग पर आगे बढ़ते रहने के स्थान पर आप भटक सकते हैं, इस बात को सदैव स्मृति में रखना होगा ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।