Saturday, June 6, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -13

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -13

             मन का एक निश्चित कर्म फल (भोग) और कर्म (भोग प्राप्ति के लिए) की तरफ झुक जाना ही आसक्ति है । कर्म फल में आसक्त होने से हमारी कामनाएं और अधिक बढ़ती हैं, कामनाएं अपेक्षा (Expectations) को जन्म देती है और फिर अपेक्षा आप से अथवा आपकी कामनाओं की पूर्ति जिनसे होनी है, उन सभी के प्रति आपको आसक्त (Attach) कर देती है । अगर हम किसी भी प्रकार के कर्म के फल (भोग) की आशा मन में न संजोयें, तो हमारा मन न तो किसी कर्म फल (भोग) में आसक्त होगा और न ही इस शरीर को किसी विशेष कर्म को करने के लिए प्रेरित करेगा ।

         बार-बार मन के अनुसार कर्म के लिए प्रेरित करने से शरीर भी मन के अनुसार अपने आपको ढाल लेता है । जब एक बार मन के अनुसार शरीर ढल जाता है तो फिर बुद्धि द्वारा मन को नियंत्रित करना लगभग असंभव हो जाता है । इसलिए प्रारम्भिक स्तर पर ही बुद्धि से मन को नियंत्रित कर लेना अधिक सुगम रहता है । प्रारम्भिक अवस्था में बुद्धि आत्मा (आप स्वयं) के अनुसार कार्य करती है और मन को अपने अधीन बनाये रख सकती है परन्तु जब शरीर एक बार मन के अनुसार स्वयं को ढाल लेता है, तो फिर बुद्धि का मन पर से नियंत्रण लगभग समाप्त हो जाता है । मन के अनुसार कर्म करना आसक्ति पैदा करता है जबकि बुद्धि के अनुसार कर्म करना आपको अनासक्ति की ओर ले जाता है ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Friday, June 5, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -12

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -12

       आसक्ति वास्तव में जड़ तत्वों और इन्द्रिय सुखों के प्रति व्यक्ति का लगाव ही है । मन भौतिक सुखों के प्रति आसक्त हो जाता है और फिर बुद्धि को भी समझा बुझाकर अपने साथ कर लेता है । बुद्धि से श्रेष्ठ अहं है अर्थात् हमारा अहंकार और उससे श्रेष्ठ और सर्वोच्च है वह मूल और शुद्ध अहम् अर्थात् आत्मा है, जोकि हम स्वयं हैं । अगर अहम् (आत्मा) भौतिक सुखों के प्रति आसक्ति को स्वीकार नहीं करे और साथ ही भीतर अहंकार भी न रहे तो हमारी बुद्धि मन को पुनः अपने नियंत्रण में ले लेती है । 

          हाँ, यह शतप्रतिशत सत्य है कि हमारी आत्मा प्रत्येक अनुचित आचरण का प्रारम्भ में विरोध करती है जिसका अनुभव आप सभी को अपने जीवन में कभी न कभी अवश्य ही हुआ होगा परन्तु जब अनुचित आचरण से आपके मन को सुख मिलता प्रतीत होता है तो बुद्धि भी आत्मा से विपरीत दिशा पकड़ कर मन के साथ हो जाती है । ऐसी स्थिति में आत्मा असहाय हो जाती है और मन अपना खेल खेलने लगता है । इसीलिए संत-जन आत्म-जागरण की बात करते हैं, भगवान बुद्ध भी आत्म-बोध को महत्वपूर्ण बतलाते हैं ।

           वास्तव में देखा जाये तो मन भी तो किसी न किसी कारण से ऐसा व्यवहार करता होगा । मन के ऐसे आसक्ति पूर्ण व्यवहार के पीछे मुख्य रूप से हमारी कामनाएं ही है । कामनाओं को पूरा करने के लिए हम कर्म करते हैं और कर्म से हमें फल मिलता है और हमारी इच्छा (Desire) के अनुसार फल प्राप्त होने से हमारा मन उस कर्म के प्रति झुक जाता है । 

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Thursday, June 4, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -11

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -11

                      परमात्मा से अनुरक्ति के लिए मुख्य बात है, संसार से आसक्ति को छोड़ना । यह आसक्ति तभी छूट सकती है, जब हमारा मन पर नियंत्रण हो । केवल मन पर नियंत्रण कर लेने से ही हमारा समस्त इन्द्रियों पर नियंत्रण स्थापित हो जाता है । इस जड़ शरीर में, जो कि अपरा प्रकृति की देन है; पाँच भौतिक तत्वों के साथ-साथ मन, बुद्धि और अहंकार भी उपस्थित रहते हैं । भौतिक तत्वों से श्रेष्ठ मन है और मन से श्रेष्ठ बुद्धि है । 

       संसार के सभी भोग पदार्थ मिल भी जाए तो भी वे मन को संतुष्ट नहीं कर सकते । फिर भी हम विषय-भोगों से ही मन को सन्तुष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं । हमारी सोच ही ऐसी बन गई है कि भोग पदार्थों से मन को संतुष्ट कर, नियंत्रित किया जा सकता है । भौतिक तत्वों से मन को कभी भी संतुष्ट कर नियंत्रित नहीं किया जा सकता बल्कि बुद्धि से अवश्य ही इसको नियंत्रित किया जा सकता है ।

             उच्च पदस्थापित व्यक्ति अपने अधीनस्थ को नियंत्रित कर सकता है, अधीनस्थ अपने अधिकारी को नहीं । जब अधीनस्थ अपने उच्चाधिकारी को नियंत्रण में ले लेता है, तब उस अधिकारी और उसके विभाग का पतन होना निश्चित है । यही नियम इस शरीर पर भी लागू होता है । मन को अगर बुद्धि नियंत्रित कर लेती है तो हम आसक्त से अनासक्त अथवा विरक्त हो सकते हैं । अगर दुर्भाग्य वश मन बुद्धि को नियंत्रित कर लेता है तो फिर इस शरीर और उसके कार्यों में हमारी आसक्ति बढ़ने लगती है ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, June 3, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -10

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -10 

          इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जिसे हम विरक्ति होना कहते हैं, वास्तव में वह आसक्ति का ही दूसरा नाम है अर्थात् एक ही सिक्के का दूसरा पहलू है । विरक्त होना तो बहुत ऊँची बात है और उस विरक्त होने के स्तर को छू लेना हमारे जैसे किसी भी साधारण व्यक्ति की पहुँच से बहुत दूर है । इसका अर्थ यह कदापि भी नहीं है कि विरक्त हुआ ही नहीं जा सकता । विरक्त होने के लिए गृहस्थ जीवन उपयुक्त नहीं है, उसके लिए तो पूर्वजन्म के संस्कार से मिले नए जीवन के प्रारम्भ में ही विरक्ति की नींव पड़ जाती है । गृहस्थ जीवन में तो हम विरक्ति के नाम पर कभी कम और कभी अधिक आसक्ति-भाव को प्राप्त होते रहते हैं । विरक्त होना एक गृहस्थ के लिए लगभग असंभव सी बात है ।

         आसक्ति और विरक्ति के मध्य में जो स्थिति बन सकती है अथवा हम बना सकते हैं, उस अवस्था का नाम है अनासक्ति । अनासक्ति में हम न तो किसी के प्रति आसक्त होते हैं और न ही विरक्त । ऐसा हो गया तो अच्छा, वैसा नहीं हुआ तो भी अच्छा । अगर हम आसक्ति को त्यागकर केवल विरक्त होने का नाटक भर ही करते रहे तो जीवन में कभी भी अनासक्त नहीं हो सकते ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Tuesday, June 2, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -9

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -9

         मेरे एक मित्र है, बड़े ही सरल ह्रदय व्यक्ति है । जब से मैं उनके संपर्क में आया हूँ तब से उन्हें तम्बाकू का विभिन्न रूपों में सेवन करते हुए देख रहा हूँ, कम से कम 45-50 वर्ष तो हो ही गए होंगे । मेरे आग्रह पर उन्होंने तम्बाकू का सेवन करना कोई 20 बार छोड़ दिया है परन्तु प्रत्येक बार कुछ समय बाद पुनः उसका सेवन प्रारम्भ कर देते हैं । वास्तव में देखा जाये तो उन्होंने कभी तम्बाकू के सेवन को मन से त्यागा भी नहीं था । 20 बार उन्होंने तम्बाकू की आसक्ति त्यागकर उससे विरक्त होने का प्रयास तो किया परन्तु यह उनकी तम्बाकू से पूर्ण विरक्ति नहीं थी बल्कि उससे विरक्त होने का नाटक भर था । अगर वास्तव में वे विरक्त हुए होते तो पुनः तम्बाकू का सेवन करना प्रारम्भ ही नहीं करते । 

           यह तो एक प्रकार का दोलन करना था आसक्ति और विरक्ति के मध्य । वास्तव में तो उनकी तम्बाकू के प्रति आसक्ति कभी विरक्ति में परिवर्तित हुई ही नहीं थी । आज भी वे मुझसे छिपकर तम्बाकू का सेवन करते हैं और स्वीकार भी करते हैं कि जब 20 बार के प्रयास से भी आदत नहीं छूटी तो अब छूट भी नहीं सकती । अब उन्होंने तम्बाकू को छोड़ने का संकल्प करना भी छोड़ दिया है । 

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Monday, June 1, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -8

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -8 

          अब प्रश्न यह उठता है कि आसक्ति और विरक्ति के बीच झूलते जीवन में मध्य में ठहर कर अनासक्त कैसे हुआ जा सकता है ? कोई भी उपाय नहीं है अनासक्ति को उपलब्ध होने का, सिवाय स्वयं के मन पर नियंत्रण करने के । इससे पहले कि इस शरीर का जीवन समाप्ति की ओर चला जाये, हमें स्वयं के मन पर नियंत्रण साधना होगा । आसक्ति हमें उस ओर खींचती है, जिसके प्रति हम आसक्त हैं । जब उससे उब जाते है अथवा आसक्ति को जब कोई गहरी चोट पहुँचती है तब हम विरक्त होने का मार्ग पकड़ लेते है । 

        परन्तु हमारा दुर्भाग्य, हम सही मायने में विरक्त भी तो नहीं हो पाते हैं । वास्तविक विरक्ति है, आसक्ति की ओर फिर कभी भी न लौटना । हम विरक्त कभी भी नहीं होते बल्कि विरक्त होने का नाटक भर करते हैं । यह बात सदैव ध्यान में रखें कि नाटक सदैव हमारा मन करता है हमारी आत्मा अर्थात् हम स्वयं नहीं । आत्मा तो जानती है कि हम जो विरक्ति का नाटक कर रहे हैं वह वास्तव में आसक्ति को और अधिक मजबूत करने का एक उपाय भर है । तभी तो हम विरक्त न रहकर पुनः आसक्त हो जाते हैं ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, May 31, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -7

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -7 

      हमारा मन ही दोलन करता रहता है और आसक्ति और विरक्ति के मध्य झुलाता रहता है । मन पर नियंत्रण स्थापित कर लेना ही अनासक्त हो जाना है । दोलक गति करता है क्योंकि गति उसे आप स्वयं देते हो अन्यथा दोलक तो मध्य में ठहरा हुआ ही था । दोलक में दोलन उसके एक तरफ ऊपर ले जाने से होता है और फिर उसको छोड़ देने से वह स्वतः ही एक से दूसरी तरफ और दूसरी से पहली तरफ, दोलन करता रहता है । उसका यह दोलन करना तभी रुकता है, जब गुरुत्वाकर्षण बल के कारण उसकी गति निरंतर और धीरे-धीरे कम होती जाती है और एक अवस्था ऐसी आती है जब वह मध्य में आकर ठहर जाता है । 

            हमारी जिंदगी में भी इस दोलन की तरह गति होती रहती है, कभी इधर कभी उधर । मध्य में ठहराव कहीं और कभी भी दिखलाई नहीं पड़ता । जब अवस्था ढल रही होती है, हम असहाय नज़र आने लगते हैं, तब मजबूरी में बाहर से लगभग ठहर से जाते हैं परन्तु भीतर मन का दोलन करना नहीं रुकता । इस प्रकार जीवन भर हम आसक्ति और विरक्ति के मध्य सदैव झूलते ही रहते हैं, अनासक्त कभी हो ही नहीं पाते ।            

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।