Saturday, February 28, 2026

भोग, रोग और योग -9

 भोग, रोग और योग -9

         आयुर्वेद में रोग को केवल शारीरिक विकार ही नहीं माना गया है बल्कि इसमें अंतःकरण की भूमिका को भी स्वीकार किया गया है । आयुर्वेद कहता है - प्रज्ञापराध एव रोगाणां मूलकारणम् । अर्थात् विवेक का नाश ही रोगों का मूल कारण है । जहां भोगों पर विवेक को वरीयता दी जाती है, वहां रोग टिक ही नहीं सकता । आज चिकित्सालयों में जो रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है उसका अर्थ यह नहीं है कि रोग बढ़े हैं । इसके लिए हमारी जीवन-शैली उत्तरदायी है । हम रोग के निदान की विफलता के लिए चिकित्सक को ज़िम्मेवार ठहरा देते हैं परन्तु हमने जीवन में जो त्रुटि की है उस ओर हमारी दृष्टि कभी नहीं जाती ।

       यह रोग नहीं होकर हमारे लिए चेतावनी है कि हम प्रकृति के मार्ग (धर्म, ऋतु, स्वभाव आदि) से भटक रहे हैं । रोग केवल शारीरिक और मानसिक कमजोरी ही नहीं है बल्कि जीवन-शैली की चेतावनी है । रोग हमें बतलाता है कि हमने कहीं न कहीं प्रकृति के नियमों का उल्लंघन किया है । रोग को दण्ड न माने बल्कि आत्मा (स्वयं के भीतर) की पुकार मानें जो कह रही है - ‘ रुक जाओ, स्वयं की ओर लौट जाओ ।’ इस स्वयं की ओर लौटने की प्रक्रिया का नाम है - योग ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Friday, February 27, 2026

भोग, रोग और योग -8

 भोग, रोग और योग -8

            आवश्यकता की पूर्ति करना प्रकृति का दायित्व है । जब मनुष्य प्रकृति के विरुद्ध चलता है जैसे अति भोजन, अति भोग, अति तनाव, अति सोशल मीडिया आदि, तब शरीर और मन दोनों ही विद्रोह कर देते हैं । जब मनुष्य के जीवन की गति प्रकृति के नियमों के विरुद्ध चलने लगती है, तब शरीर और मन दोनों ही संकेत देने लगते हैं । ये संकेत ही रोग कहलाते हैं । मानसिक संकेत (रोग) आधि और शारीरिक संकेत व्याधि कहलाते हैं । 

     रोग जब आता है तब समझें कि शरीर और मन रोग के माध्यम से हमसे संवाद कर रहे हैं । हमें कम से कम रोग-दशा में तो इनकी बात सुननी ही चाहिए । भोग जब विवेकरहित हो जाता है तब रोग को जन्म देता है । 

       भगवान श्री कृष्ण कहते हैं - 

ध्यायतो विषयान् पुंस: संगस्तेषूपजायते ।

संगात् संजायते काम: कामात् क्रोधोऽभिजायते ।। गीता - 2.62 ।।

विषयों का निरंतर होने वाला चिंतन आसक्ति पैदा करता है, आसक्ति से कामना पैदा होती है । कामना से क्रोध और क्रोध से मनुष्य का पतन आरम्भ होता है ।

 क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Thursday, February 26, 2026

भोग, रोग और योग -7

 भोग, रोग और योग -7

         जीवन में शरीर के संचालन के लिए कुछ पदार्थों की आवश्यकता रहती है । आवश्यकता की पूर्ति का विधान परमात्मा ने प्रकृति के माध्यम से किया है । समस्या तो तब पैदा होती है, जब आवश्यकता आसक्ति में बदल जाती है । यह आसक्ति ही वासना है । गीता में भगवान कहते हैं कि विषय-चिन्तन से आसक्ति पैदा होती है और आसक्ति से कामना । कामना के कारण ही क्रोध और मतिभ्रम पैदा होती है, जिससे मनुष्य पतन की ओर अग्रसर होता जाता है । आधुनिक जीवन में यह पतन असंतोष, तनाव और अशान्ति के रूप में प्रकट हो रहा है ।

            ईशावास्योपनिषद कहती है - 

 ईशा वास्यमिदंसर्वं यत्किंच जगत्यां जगत् ।

 तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध: कस्य स्विद् धनम् ।। 1 ।।

       अर्थात् अखिल ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी जड़-चेतन स्वरूप जगत् है, यह सारा ईश्वर से व्याप्त है । उस ईश्वर को साथ रखते हुए इसे त्यागपूर्वक भोगते रहो, इसमें आसक्त मत होओ क्योंकि धन आदि भोग्य पदार्थ किसका है ? अर्थात् किसी का नहीं है । 

           सारांश है कि प्रारब्ध से मिल रहे भोगों को त्यागपूर्वक भोगें । भोग अर्थात् इंद्रिय-सुख को यदि त्याग पूर्वक और एक सीमा में रहते हुए भोग रहे हैं तो जीवन में अशान्ति का आगमन हो ही नहीं सकता । समस्या तो भोग को भोगने के बाद उसका त्याग न कर उसमें आसक्ति रखने से पैदा होती है । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, February 25, 2026

भोग, रोग और योग -6

 भोग, रोग और योग -6

        कठोपनिषद् के अनुसार -

           परांचि खानि व्यतृणत् स्वयम्भू:

                   तस्मात् परां पश्यति नान्तरात्मन् ।

           कश्चिद्धीर: प्रत्यगात्मानमैक्ष-

                         दावृत्तचक्षुमृतत्वमिच्छन् ।। (2.1.1)

          अर्थात् स्वयं प्रकट होने वाले परमेश्वर ने समस्त इंद्रियों के द्वार बाहर की ओर जाने वाले ही बनाए हैं; इसलिए वह बाहर की वस्तुओं को ही देखता है, अंतरात्मा को नहीं । किसी बुद्धिमान मनुष्य ने अमर पद को पाने की इच्छा करके चक्षु आदि इंद्रियों को बाह्य विषयों से लौटाई है, उसी ने अंतरात्मा को देखा है ।

          इंद्रियों के सभी विषय बाहर हैं । इन्द्रियाँ बनाई इसलिए है कि मनुष्य इंद्रियों के माध्यम से इन विषयों का ज्ञान करे और सुखमय जीवन बिताते हुए परमात्मा के द्वार तक पहुंचे । परन्तु दुर्भाग्य से मनुष्य ने इन विषयों के रस में डूब जाने को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया है । प्रत्येक विषय-रस का तो अनुभव होगा ही परन्तु उसको ही जीवन का सत्य मान लेना अनुचित है । रस में आसक्त होकर उसमें डूबना वासना है, इसे प्रेम नहीं कहा जा सकता । उस रस से बाहर निकल जाना ही वासना को प्रेम में परिवर्तित कर देता है । इसके लिए इन्द्रियों को बाह्य विषयों से लौटाना ही होगा ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Tuesday, February 24, 2026

भोग, रोग और योग -5

 भोग, रोग और योग -5

           सृष्टिकर्ता ने इंद्रियों को बाहर की ओर प्रवृत किया है, इसलिए मनुष्य बाहर ही सुख खोजता है, भीतर नहीं । मनुष्य की दृष्टि सदैव बाहर की ओर ही जाती है, भीतर की ओर नहीं । बाहर संसार, उसके विषय और उनसे उत्पन्न होने वाली अशान्ति है, जबकि भीतर शान्त स्वरूप ।

      भगवान गीता में बाह्य वस्तुओं को (भोगों को) बाहर ही छोड़ने का कहते हैं - 

             स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रूवो: ।

             प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ।। (गीता - 5/27 )

        गीता का यह श्लोक (5.27) कहता है - बाहर के पदार्थों को बाहर ही छोड़कर और नेत्रों की दृष्टि को भौंहों के मध्य स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण तथा अपान वायु को सम करना । इतना सब करके इंद्रियों की बाह्य विचरण प्रवृत्ति को नियंत्रित किया जा सकता है । फिर इंद्रियाँ विषयों की ओर नहीं भागेंगी । 

         इंद्रियों का विषयों की ओर भागना ही भोग उपलब्ध कराता है । भोगों के लिए भागना कभी न समाप्त होने वाली एक दौड़ है । यह दौड़ एक वृत्त की परिधि पर दौड़ने के समान है, जो कहीं नहीं पहुंचाती और न ही कभी समाप्त होती है । इसे ही संसार-चक्र कहा गया है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः

 शरणम् ।।

Monday, February 23, 2026

भोग, रोग और योग -4

 भोग, रोग और योग -4

              भगवान गीता में कहते हैं - ‘ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।’ (गीता -5/22) अर्थात् सभी भोग (सुख) इंद्रियों और विषयों के संयोग से पैदा होते हैं और दुःख के ही कारण हैं । 

          सभी सुख संयोगजन्य हैं और इंद्रिय स्पर्श से मिलते हैं । संयोग से जब किसी विषय का स्पर्श सम्बन्धित ज्ञानेंद्रिय से होता है, तब जीव एक प्रकार के सुख को अनुभव करता है । सुख का अनुभव करना ही भोग है । प्रत्येक इंद्रिय का एक विषय होता है, उस विषय से संपर्क होते ही मन को सुख का अनुभव होता है । जब विषय संपर्क बार-बार और असंयमित होता है, तब वही सुख दुःख में परिवर्तित होने लगता है । असंयमित भोग ही शारीरिक और मानसिक रोग का कारण बनते हैं । इन रोगों से शारीरिक और मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाता है, जिससे मनुष्य जीवन में अशान्त होकर दुःख का अनुभव करता है । जीवन में शान्ति के लिये इंद्रियों को भोगों की ओर भागने से रोकना होगा ।

           पांच इंद्रियों के पांच विषय - शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध । जो भी जीव इनमें आसक्त हो गया उनकी गति भी वैसी ही होती है जैसी मृग, हाथी, पतंगे, मछली और भंवरे की होती है । इन विषयों का आकर्षण जीव को शारीरिक और मानसिक रोगों के माध्यम से मृत्यु के द्वार तक पहुंचा देता है । ये सभी विषय विभिन्न वस्तुओं के रूप में हमारे आस-पास ही उपस्थित रहते हैं । उनमें आसक्त न होकर उनको बाहर ही छोड़ देना उचित है । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, February 22, 2026

भोग, रोग और योग -3

 भोग, रोग और योग -3

              मनुष्य का स्वभाव कुछ ऐसा है कि वह सदैव सुख की खोज में ही लगा रहता है । उसकी यह खोज स्वाभाविक है क्योंकि वह स्वयं आनन्द स्वरूप है । जब यह सुख केवल इंद्रिय-तृप्ति तक ही सिमट कर रह जाता है, तब मनुष्य अपने जीवन के लक्ष्य तक पहुंच नहीं पाता । भारतीय दर्शन इसी को भोग कहता है । भोग अपने आप में बुरा नहीं है परंतु जब भोग विवेक से रहित होकर किया जाता है, तब वह रोग को जन्म देता है । शास्त्रों ने योग को ही इस समस्या का एकमात्र समाधान बताया है । 

            भोग का अर्थ है - इंद्रियों से मिलने वाला सुख । भोग का अर्थ केवल भोजन अथवा भौतिक वस्तुएं ही नहीं है । असंयमित रूप से बोलना, सोचना, देखना, चाहना आदि भी भोग के ही विभिन्न रूप हैं । सभी इन्द्रियाँ भोगों में ही लगी हुई हैं । भोगों से इन्द्रियाँ अल्प रूप से तृप्त होती है परन्तु यह तृप्ति कुछ समय के लिए ही सुख देती है । सुख मिलने के बाद भी संतुष्टि कहाँ मिल पाती है, क्योंकि सुख न तो पर्याप्त लगता है और न ही वह दीर्घ कल तक टिकता है । इसी कारण से भीतर सदैव एक प्रकार की रिक्तता बनी रहती है, अभाव बना रहता है । यह अभाव ही जीवन में अशान्ति व तनाव पैदा करता है जिससे व्यक्ति समता में नहीं रह पाता और जीवनभर दुःखी होता रहता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।