Thursday, February 26, 2026

भोग, रोग और योग -7

 भोग, रोग और योग -7

         जीवन में शरीर के संचालन के लिए कुछ पदार्थों की आवश्यकता रहती है । आवश्यकता की पूर्ति का विधान परमात्मा ने प्रकृति के माध्यम से किया है । समस्या तो तब पैदा होती है, जब आवश्यकता आसक्ति में बदल जाती है । यह आसक्ति ही वासना है । गीता में भगवान कहते हैं कि विषय-चिन्तन से आसक्ति पैदा होती है और आसक्ति से कामना । कामना के कारण ही क्रोध और मतिभ्रम पैदा होती है, जिससे मनुष्य पतन की ओर अग्रसर होता जाता है । आधुनिक जीवन में यह पतन असंतोष, तनाव और अशान्ति के रूप में प्रकट हो रहा है ।

            ईशावास्योपनिषद कहती है - 

 ईशा वास्यमिदंसर्वं यत्किंच जगत्यां जगत् ।

 तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध: कस्य स्विद् धनम् ।। 1 ।।

       अर्थात् अखिल ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी जड़-चेतन स्वरूप जगत् है, यह सारा ईश्वर से व्याप्त है । उस ईश्वर को साथ रखते हुए इसे त्यागपूर्वक भोगते रहो, इसमें आसक्त मत होओ क्योंकि धन आदि भोग्य पदार्थ किसका है ? अर्थात् किसी का नहीं है । 

           सारांश है कि प्रारब्ध से मिल रहे भोगों को त्यागपूर्वक भोगें । भोग अर्थात् इंद्रिय-सुख को यदि त्याग पूर्वक और एक सीमा में रहते हुए भोग रहे हैं तो जीवन में अशान्ति का आगमन हो ही नहीं सकता । समस्या तो भोग को भोगने के बाद उसका त्याग न कर उसमें आसक्ति रखने से पैदा होती है । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, February 25, 2026

भोग, रोग और योग -6

 भोग, रोग और योग -6

        कठोपनिषद् के अनुसार -

           परांचि खानि व्यतृणत् स्वयम्भू:

                   तस्मात् परां पश्यति नान्तरात्मन् ।

           कश्चिद्धीर: प्रत्यगात्मानमैक्ष-

                         दावृत्तचक्षुमृतत्वमिच्छन् ।। (2.1.1)

          अर्थात् स्वयं प्रकट होने वाले परमेश्वर ने समस्त इंद्रियों के द्वार बाहर की ओर जाने वाले ही बनाए हैं; इसलिए वह बाहर की वस्तुओं को ही देखता है, अंतरात्मा को नहीं । किसी बुद्धिमान मनुष्य ने अमर पद को पाने की इच्छा करके चक्षु आदि इंद्रियों को बाह्य विषयों से लौटाई है, उसी ने अंतरात्मा को देखा है ।

          इंद्रियों के सभी विषय बाहर हैं । इन्द्रियाँ बनाई इसलिए है कि मनुष्य इंद्रियों के माध्यम से इन विषयों का ज्ञान करे और सुखमय जीवन बिताते हुए परमात्मा के द्वार तक पहुंचे । परन्तु दुर्भाग्य से मनुष्य ने इन विषयों के रस में डूब जाने को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया है । प्रत्येक विषय-रस का तो अनुभव होगा ही परन्तु उसको ही जीवन का सत्य मान लेना अनुचित है । रस में आसक्त होकर उसमें डूबना वासना है, इसे प्रेम नहीं कहा जा सकता । उस रस से बाहर निकल जाना ही वासना को प्रेम में परिवर्तित कर देता है । इसके लिए इन्द्रियों को बाह्य विषयों से लौटाना ही होगा ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Tuesday, February 24, 2026

भोग, रोग और योग -5

 भोग, रोग और योग -5

           सृष्टिकर्ता ने इंद्रियों को बाहर की ओर प्रवृत किया है, इसलिए मनुष्य बाहर ही सुख खोजता है, भीतर नहीं । मनुष्य की दृष्टि सदैव बाहर की ओर ही जाती है, भीतर की ओर नहीं । बाहर संसार, उसके विषय और उनसे उत्पन्न होने वाली अशान्ति है, जबकि भीतर शान्त स्वरूप ।

      भगवान गीता में बाह्य वस्तुओं को (भोगों को) बाहर ही छोड़ने का कहते हैं - 

             स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रूवो: ।

             प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ।। (गीता - 5/27 )

        गीता का यह श्लोक (5.27) कहता है - बाहर के पदार्थों को बाहर ही छोड़कर और नेत्रों की दृष्टि को भौंहों के मध्य स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण तथा अपान वायु को सम करना । इतना सब करके इंद्रियों की बाह्य विचरण प्रवृत्ति को नियंत्रित किया जा सकता है । फिर इंद्रियाँ विषयों की ओर नहीं भागेंगी । 

         इंद्रियों का विषयों की ओर भागना ही भोग उपलब्ध कराता है । भोगों के लिए भागना कभी न समाप्त होने वाली एक दौड़ है । यह दौड़ एक वृत्त की परिधि पर दौड़ने के समान है, जो कहीं नहीं पहुंचाती और न ही कभी समाप्त होती है । इसे ही संसार-चक्र कहा गया है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः

 शरणम् ।।

Monday, February 23, 2026

भोग, रोग और योग -4

 भोग, रोग और योग -4

              भगवान गीता में कहते हैं - ‘ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।’ (गीता -5/22) अर्थात् सभी भोग (सुख) इंद्रियों और विषयों के संयोग से पैदा होते हैं और दुःख के ही कारण हैं । 

          सभी सुख संयोगजन्य हैं और इंद्रिय स्पर्श से मिलते हैं । संयोग से जब किसी विषय का स्पर्श सम्बन्धित ज्ञानेंद्रिय से होता है, तब जीव एक प्रकार के सुख को अनुभव करता है । सुख का अनुभव करना ही भोग है । प्रत्येक इंद्रिय का एक विषय होता है, उस विषय से संपर्क होते ही मन को सुख का अनुभव होता है । जब विषय संपर्क बार-बार और असंयमित होता है, तब वही सुख दुःख में परिवर्तित होने लगता है । असंयमित भोग ही शारीरिक और मानसिक रोग का कारण बनते हैं । इन रोगों से शारीरिक और मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाता है, जिससे मनुष्य जीवन में अशान्त होकर दुःख का अनुभव करता है । जीवन में शान्ति के लिये इंद्रियों को भोगों की ओर भागने से रोकना होगा ।

           पांच इंद्रियों के पांच विषय - शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध । जो भी जीव इनमें आसक्त हो गया उनकी गति भी वैसी ही होती है जैसी मृग, हाथी, पतंगे, मछली और भंवरे की होती है । इन विषयों का आकर्षण जीव को शारीरिक और मानसिक रोगों के माध्यम से मृत्यु के द्वार तक पहुंचा देता है । ये सभी विषय विभिन्न वस्तुओं के रूप में हमारे आस-पास ही उपस्थित रहते हैं । उनमें आसक्त न होकर उनको बाहर ही छोड़ देना उचित है । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, February 22, 2026

भोग, रोग और योग -3

 भोग, रोग और योग -3

              मनुष्य का स्वभाव कुछ ऐसा है कि वह सदैव सुख की खोज में ही लगा रहता है । उसकी यह खोज स्वाभाविक है क्योंकि वह स्वयं आनन्द स्वरूप है । जब यह सुख केवल इंद्रिय-तृप्ति तक ही सिमट कर रह जाता है, तब मनुष्य अपने जीवन के लक्ष्य तक पहुंच नहीं पाता । भारतीय दर्शन इसी को भोग कहता है । भोग अपने आप में बुरा नहीं है परंतु जब भोग विवेक से रहित होकर किया जाता है, तब वह रोग को जन्म देता है । शास्त्रों ने योग को ही इस समस्या का एकमात्र समाधान बताया है । 

            भोग का अर्थ है - इंद्रियों से मिलने वाला सुख । भोग का अर्थ केवल भोजन अथवा भौतिक वस्तुएं ही नहीं है । असंयमित रूप से बोलना, सोचना, देखना, चाहना आदि भी भोग के ही विभिन्न रूप हैं । सभी इन्द्रियाँ भोगों में ही लगी हुई हैं । भोगों से इन्द्रियाँ अल्प रूप से तृप्त होती है परन्तु यह तृप्ति कुछ समय के लिए ही सुख देती है । सुख मिलने के बाद भी संतुष्टि कहाँ मिल पाती है, क्योंकि सुख न तो पर्याप्त लगता है और न ही वह दीर्घ कल तक टिकता है । इसी कारण से भीतर सदैव एक प्रकार की रिक्तता बनी रहती है, अभाव बना रहता है । यह अभाव ही जीवन में अशान्ति व तनाव पैदा करता है जिससे व्यक्ति समता में नहीं रह पाता और जीवनभर दुःखी होता रहता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Saturday, February 21, 2026

भोग, रोग और योग -2

 भोग, रोग और योग -2

           शरीर के मुख्य रूप से दो भाग हैं - स्थूल और सूक्ष्म । दोनों ही शरीर परिवर्तनशील हैं । स्थूल शरीर तो कुछ भी अनुभव नहीं करता, जो कुछ भी अनुभव करता है वह सूक्ष्म शरीर ही करता है । परन्तु सूक्ष्म शरीर द्वारा किया जाने वाला अनुभव भी सत्य नहीं होता । दोनों ही शरीरों में सदैव परिवर्तन होते रहते हैं । इधर जगत् भी परिवर्तनशील है । जो स्वयं बदल रहा वह दूसरे बदल रहे को बदलता हुआ अनुभव नहीं कर सकता । यही कारण है कि हमें सूक्ष्म शरीर के आधार पर स्वयं के साथ-साथ संसार भी सदैव रहनेवाला प्रतीत होता है । यह वैसे ही है जैसे एक ही दिशा में समान गति से चल रही दो रेलगाड़ियों में बैठे व्यक्ति एक दूसरे को स्थिर ही अनुभव करते हैं । लेकिन सूक्ष्म शरीर से होने वाला ऐसा अनुभव केवल भ्रम ही है, सत्य से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है ।

           यह अनुभव जिसको हो रहा है, वह कौन है ? हम समझते हैं कि यह अनुभव हमारे शरीर को हो रहा है परंतु यह सत्य नहीं है, यह भी हमारा भ्रम है । जिसको संसार की परिवर्तनशीलता का अनुभव हो रहा है वह अपरिवर्तनशील है, जोकि हम स्वयं हैं और वही हमारा स्वरूप है । इसी प्रकार संसार में रहते हुए सांसारिक विषयों के भोग से जिस सुख का अनुभव हम करते हैं, वह सुख भी हमारा केवल भ्रम ही है । जब हम संसार और उसके विषयों से मिलने वाले सुख से स्वयं को अलग कर लेंगे, तत्काल ही योग को उपलब्ध हो जाएंगे अन्यथा भोगों का दुष्चक्र हमें शारीरिक रोगों में उलझाकर शेष जीवन में मिलने वाले अतिशय दुःख से मुक्त नहीं होने देगा ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Friday, February 20, 2026

भोग, रोग और योग -1

 भोग, रोग और योग -1

          एक समान गति से एक ही दिशा में जा रहे दो वाहनों में बैठे व्यक्ति एक दूसरे के वाहन की गति का आकलन नहीं कर सकते, जबकि दोनों ही गतिमान हैं । दोनों में से किसी एक वाहन की गति में आया तनिक सा परिवर्तन दूसरे वाहन की गति में आए परिवर्तन को अनुभव कर लेता है परन्तु ऐसा अनुभव सत्य नहीं हो सकता । जैसे एक वाहन स्थिर है और दूसरा वाहन पास में से निकल रहा है तो दूसरे वाहन में बैठे व्यक्ति को पहले वाला वाहन विपरीत दिशा में जाता और स्वयं का वाहन स्थिर खड़ा प्रतीत होता है । रेलगाड़ी में बैठे हुए व्यक्ति को बाहर के पेड़ और पोल आदि पीछे भागते नज़र आयेंगे जबकि वास्तविकता यह है कि वह स्वयं गतिमान है और पेड़, पोल अपने स्थान पर स्थिर हैं । यही स्थिति इस संसार और शरीर की है ।

           जगत् वह है जो सदैव गति करता रहता है, एक पल के लिए भी स्थिर नहीं रहता । गति का अर्थ है कि यह जगत् परिवर्तनशील है, इसमें प्रतिपल बदलाव हो रहा है और इस बदलाव की गति हमारे शरीर में हो रहे बदलाव के समान ही है । यही कारण है कि जगत् में हो रहे परिवर्तन को हमारा शरीर समझ नहीं पाता, उसका अनुभव नहीं कर पाता । 

        स्वामीजी कहते हैं कि बहने वाले के लिए बहने वाला ही सत्य है क्योंकि बहनेवाला बहनेवाले को जान ही नहीं रहा है । बहनेवाले को तो रहनेवाला ही जान सकता है । शरीर और संसार बहनेवालों में हैं और हम स्वयं रहनेवाले हैं । जब इस बात का ज्ञान हो जाएगा उसी दिन यह संसार और शरीर असत्य हो जाएंगे । इंद्रियों का ज्ञान शरीर और संसार के सत्य होने का भ्रम जीवन भर बनाए रखता है । केवल विवेक ही हमारे इस भ्रम को तोड़ सकता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।