Saturday, May 23, 2026

आसक्ति/अनुरक्ति

 आसक्ति/अनुरक्ति 

                परमात्मा ने इस जगत् (प्रकृति) का निर्माण करते हुए इसमें गुणों से युक्त विभिन्न प्रकार के पदार्थ बनाए हैं । इन पदार्थों से जुड़कर जीव सुख- दुःख का अनुभव करता है । जगत् भी परमात्मा है और पदार्थ में उपस्थित गुण भी परमात्मा हैं । गुणों के कारण पदार्थ में हो रही क्रियाओं से परमात्मा को सुख-दुःख का अनुभव नहीं होता क्योंकि उन्होंने गुणों से कोई सम्बन्ध नहीं रखा है । गुण उनके कारण हैं अवश्य, फिर भी वे गुणों में नहीं है और न ही गुण उनमें हैं । वे तो गुणातीत हैं ।

       भगवान कहते हैं कि ‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:’ (गीता - 15/7) - इस लोक में यह जीव बना हुआ आत्मा (जीवात्मा) मेरा ही सनातन अंश है । फिर यह विवेकवान जीव (मनुष्य) गुणों से मिल रहे सुख-दुःख के अनुभव को अपने में, अपने द्वारा और अपने लिए क्यों मानने लगा है ? सुख-दुःख का स्वयं में अनुभव करना, उसे परमात्मा का अंश होने से नीचे के स्तर पर ले आता है । इस पतन का कारण है, उसके द्वारा गुणों का संग कर लेना अर्थात् गुणों में आसक्त हो जाना । गुणों का संग कर लेने के कारण ही वह विभिन्न प्रकार की उच्च-निम्न योनियों में भटकता रहता है और परमात्मा का अंश होने के बावजूद भी जन्म-मरण से मुक्त होकर उन तक पहुँच नहीं पाता । 

       परमात्मा ने तो प्रकृति का निर्माण कर उसमें गुणों को डालते हुए स्वयं को इनसे अलग कर लिया परन्तु यह जीवात्मा उनका अंश होते हुए भी प्रकृति के गुणों से स्वयं को अलग क्यों नहीं कर पा रहा है ? इसका उत्तर है - उसका गुणों के प्रति आसक्ति-भाव । इस आसक्ति से दूर हटने का भी क्या कोई रास्ता है ? हाँ है - परमात्मा में अनुरक्ति अर्थात् गुणों में आसक्ति को छोड़ने के लिए आवश्यक है कि हमारी परमात्मा में अनुरक्ति हो । आइए ! कल से इसी विषय पर चर्चा को आगे बढ़ाते हैं और चलते हैं -‘आसक्ति से अनुरक्ति की ओर’ ।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

Saturday, May 9, 2026

ज्ञान और कर्म

 ज्ञान और कर्म 

           आधुनिक काल में ज्ञान और कर्म के माध्यम से वैराग्य को उपलब्ध हो भक्ति की राह पकड़ शरणागत हो जाना ही सर्वोत्तम है । ज्ञान और कर्म तो प्राप्त तथा करने पड़ते हैं परन्तु भक्ति तो स्वतः होती है । हां, मनुष्य को भक्ति की अवस्था तक ले जाने में ज्ञान की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता ।

         जीव का सारा संसार कर्म के इर्द-गिर्द ही घूमता है । बिना कर्म के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती । भक्ति की राह भी कर्म के माध्यम से भी निकलती है और भक्ति होने से कर्म भी अकर्म हो जाते हैं । कर्म के रहस्य को समझ पाना बहुत ही कठिन है । किस कर्म का परिणाम कब, कहाँ और कैसा मिलेगा यह कर्म करने के स्थान, समय और परिस्थिति पर निर्भर करता है । कर्म जब ज्ञानपूर्वक किया जाता है तो वह वैराग्य की ओर ले जाता है । वैराग्य हुआ तो संसार से मुक्ति मिल जाती है । वैराग्य होने से ही परमात्मा से/के प्रेम और भक्ति की राह निकलती है ।   

     प्रश्न है कि कर्म में ज्ञान की भूमिका कहां है ? कर्म को भक्ति तक ले जाने में ज्ञान की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है । जब तक जीव को ज्ञान नहीं होता तब तक वह कर्म-रहस्य को समझ ही नहीं पाएगा । एक बार कर्मों का स्वरूप समझ में आ गया तो कर्म-योग के माध्यम से संसार की सेवा होगी और ज्ञान-योग से वैराग्य का जन्म होगा । 

          ज्ञान से कर्म कैसे प्रभावित होते हैं ? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए आइए, प्रवेश करते हैं, इस नई चर्चा में - ‘ज्ञान उदय जब होत है…..’ ।

         गीता हमारा मुख्य प्रासादिक ग्रन्थ है । जीवन की प्रत्येक समस्या का समाधान इसमें मिल जाता है । मनुष्य के जीवन में तो अनन्त समस्याएं हैं, एक का निवारण नहीं होता कि तब तक दूसरी समस्या सामने आ खड़ी होती है । ऐसे में क्या यह सम्भव है कि जीवन की प्रत्येक समस्या का समाधान गीता से हो सकता है ? मनुष्य की प्रत्येक समस्या कर्म आधारित होती है और उसका समाधान कर्म के माध्यम से ही हो सकता है । गीता को मुख्य रूप से कर्मयोग का ग्रन्थ कहा जाता है । इसमें कर्मों से समस्या कैसे पैदा होती है और उस समस्या का कर्म करते हुए कैसे निवारण किया जा सकता है, विस्तार से वर्णन किया गया है ।

         प्रश्न उठता है कि जब समस्त समस्याओं के मूल में कर्म ही है तो फिर क्यों न कर्म करने से पीछे ही हट जाएं ? कहना बड़ा आसान है पर वास्तविकता है कि कर्म करने से दूर हुआ नहीं जा सकता । भगवान कहते हैं - 

 न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।

 कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै ।। गीता - 3/5।।

अर्थात् कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्था में क्षणमात्र भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता, क्योंकि प्रकृति के परवश हुए सब प्राणियों से प्रकृतिजन्य गुण कर्म करवा लेते हैं ।

            प्रकृति के गुण ही कर्म कराते हैं । इन गुणों के वशीभूत होकर मनुष्य कर्म करने को विवश होता है, इसलिए कर्मों से पलायन करना सम्भव ही नहीं है । फिर भी कभी-कभी मनुष्य परिस्थितियों से डर कर कर्म छोड़ने की सोचता अवश्य है । कितना ही विचार कर लें, आप कर्मों को करने से कभी भी मुक्त नहीं हो सकते ।

             कर्म करने से मुक्त होने का अर्थ है एक ऐसी व्यवस्था को चुनौती देना जिससे पार जाने के लिए कर्म के अतिरिक्त दूसरा कोई साधन है ही नहीं क्योंकि कर्म न करना भी एक कर्म है । जैसे क्रोध आने पर आप क्रोधित करने वाले पर हाथ उठा सकते हैं, साथ ही हाथ को उठने से रोक भी सकते हैं । हाथ उठाना और हाथ को उठने से रोकना, दोनों ही कर्म हैं । इसी प्रकार कर्म करना और कर्म से भाग जाना, दोनों ही कर्म हैं और दोनों का फल मिलना भी निश्चित है । 

       कर्मों से पिण्ड छुड़ाकर जाने वाले को भी उन्हीं कर्मों के साम्राज्य में लौटकर पुनः कर्म करने को विवश होना पड़ता है । इसलिए परिस्थितियों से घबराकर संसार से पलायन करना उचित नहीं है बल्कि उस राह को खोजना चाहिए जो आपसे कर्म कराते हुए उन परिस्थितियों से आपको मुक्त कर सके जिनसे आप प्रभावित हो रहे हैं ।

         अर्जुन भी तो युद्ध मैदान में बनी प्रतिकूल परिस्थिति (पारिवारिक मोह ) से डर कर क्षात्र-धर्म से विमुख हो रहा था । महाभारत युद्ध के प्रारम्भ होने से पूर्व ही अर्जुन मोहग्रस्त होकर विषाद करने लग गया था क्योंकि सामने पितामह भीष्म थे, जिनकी गोद में उसका बचपन बीता था; सामने गुरु द्रोणाचार्य थे, जिन्होंने उसे धनुर्विद्या सिखाई थी । ऐसे में भला वह उनसे युद्ध कैसे कर सकता था ? तब उसके सखा कृष्ण ने उसको बहुत प्रकार से समझाया था ।

     गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं-

   यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।

   मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ।। 18/59 ।।

अर्थात् अहंकार का आश्रय लेकर तू जो ऐसा मान रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तेरा यह निश्चय मिथ्या है; क्योंकि तेरी क्षत्रिय प्रकृति तुझे युद्ध में लगा देगी ।

       मनुष्य जब जन्म लेता है तब अपने साथ प्राकृतिक स्वभाव लेकर आता है । उस स्वभाव के अनुसार ही उसका किसी एक वर्ण में जन्म होता है । जीवन में उसी वर्ण के स्वभावानुसार उससे कर्म होते हैं । वह चाहकर भी उन कर्मों से दूर नहीं जा सकता । अर्जुन ने क्षत्रिय वर्ण में जन्म लिया था, उससे कर्म भी वैसे ही होने थे जैसा उसका वर्ण था अर्थात् राज्य की सुरक्षा और संसार के हित के लिए युद्ध जैसा घोर कर्म करना । भगवान यही तो कह रहे हैं कि तू युद्ध न करने वाला कौन होता है ? अगर तू युद्ध से एक बार के लिए पलायन कर भी जाएगा तो भी तेरी क्षात्र प्रकृति तुम्हें युद्धभूमि में आने को विवश कर देगी । फिर भी तू युद्ध नहीं करता तो उसका परिणाम भी तुम्हें अपकीर्ति और निंदा के रूप में इस जीवन में भी और उसके बाद भी कई सदियों तक भुगतना पड़ेगा ।

        जन्म के पश्चात् स्वभावानुसार कर्म और फिर गुणों में आसक्त होकर किए जाने वाले नए कर्म, उन कर्मों का परिणाम भोगना, उस जीवन में कर्मफल न मिलने पर उन कर्मों से प्रारब्ध बन जाना और उन प्रारब्ध कर्मों से नया शरीर और एक नया स्वभाव । इस प्रकार संसार-चक्र निर्बाध गति से चलता रहता है ।

         प्रत्येक कर्म का जन्म और स्वभाव से सीधा सम्बन्ध है । इसी बात को भगवान श्रीकृष्ण ने भागवतजी में स्पष्ट किया है । वे कहते हैं -

कर्मणा जायते जन्तु: कर्मणैव विलीयते ।

सुखं दु:खं भयं क्षेमं कर्मणैवाभिपद्यते ।। 10/24/13।।

    प्राणी अपने कर्म के अनुसार ही पैदा होता है और कर्म से ही मर जाता है । उसे उसके कर्म के अनुसार ही सुख-दुःख, भय और मंगल के निमित्तों ( माध्यमों) की प्राप्ति होती है ।

           हमें अपने जीवन में मिलने वाले सुख-दुःख, होने वाले हानि-लाभ, मान-अपमान आदि के लिए हम स्वयं उत्तरदायी हैं, इसके लिए किसी दूसरे को दोष देना अनुचित है । हमारे कर्म ही हमारे भाग्य का निर्माण करते हैं , और तो और प्रत्येक जीवन की दशा और दिशा के निर्धारण में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है । मानस में तुलसी लिखते हैं - 

काहु न कोउ सुख दुख कर दाता । 

निज कर करम भोग सब भ्राता ।। 2/92/4 ।।

तथा 

हानि लाभु जीवनु मरनु,

जसु अपजसु बिधि हाथ ।। 2/171 ।।

     कर्म के प्रभाव से परमात्मा भी अछूते नहीं रह सकते । जब-जब शरीर धारण करते हैं तब-तब वे भी कर्म करने और फिर उन कर्मों का फल भोगने को विवश होते हैं । इसलिए स्पष्ट है कि कर्मों को करने और उनका फल भोगने से कोई भी बच नहीं सकता ।

         इतने विवेचन से स्पष्ट है कि प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में कर्म करने को विवश है । कर्म ही उसका भावी जन्म निश्चित करते हैं और उन्हीं कर्मों के आधार पर उसका स्वभाव बनता है । प्रश्न उठता है कि कर्म तो सभी करते हैं, फिर कोई तो मुक्त हो जाता है, कोई ऊंच-नीच योनियों में जन्म लेकर उनका फल पाता है, ऐसा क्यों और कैसे होना सम्भव होता है ?

           भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं -

      कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मण: ।

      अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति: ।।4/17 ।।

     अर्थात् कर्म का तत्व भी जानना चाहिए और अकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिए तथा विकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिए; क्योंकि कर्मों की गति गहन है अर्थात् कर्मों की गति (फल) समझने में बड़ी कठिन है ।

        प्रत्येक कर्म फल देता है, यह निश्चित है परन्तु जिस फल की आशा रखकर हम कर्म करते हैं, वैसा ही उसका परिणाम मिलेगा, सम्भव नहीं है । इसका कारण है, प्रतिक्रिया अर्थात् प्रत्येक क्रिया (कर्म) की प्रतिक्रिया अवश्य ही होती है । प्रत्येक कर्म (क्रिया) का परिणाम तो लगभग हमारी सोच के अनुरूप मिल सकता है परन्तु उस कर्म की प्रतिक्रिया क्या होगी और उसका फल क्या मिलेगा, उससे हम सदैव अनभिज्ञ बने रहते हैं। यही कर्मों की गति है । इस प्रकार स्पष्ट है कि कौन सा कर्म और उसकी प्रतिक्रिया कैसा फल देंगे, हम निश्चित नहीं कर सकते । तभी भगवान ने गीता में कहा है - कर्मण्यवाधिकारस्ते मा फ़लेषु कदाचन (2/47), कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, फल में नहीं ।

           कल जो कुछ मैंने लिखा था, उस पर कई प्रतिक्रियाएँ आई हैं, उनसे पता चलता है कि संभवतः वह बात कइयों के गले नहीं उतरी है । मैंने लिखा है - ‘प्रत्येक कर्म (क्रिया) का परिणाम तो लगभग हमारी सोच के अनुरूप मिल सकता है परन्तु उस कर्म की प्रतिक्रिया क्या होगी और उसका फल क्या मिलेगा, उससे हम सदैव अनभिज्ञ बने रहते हैं । यही कर्मों की गति है ।’ 

      शंका उठनी स्वाभाविक है; क्योंकि हम कर्म को अपने को प्राप्त होने वाले फल तक ही सीमित मानकर बैठे हैं । यह सोच मृषा है । अपने लिए किए जाने वाले कर्म से (सकाम कर्म से) केवल कर्ता ही प्रभावित नहीं होता बल्कि सारी कायनात प्रभावित होती है । हम कर्म का फल पाकर सुखी-दुःखी हो सकते हैं परन्तु हमारे कर्म के परिणाम से कितने जीव सुखी-दुःखी हुए होंगे, इस बारे में हम सदैव अनभिज्ञ बने रहते हैं । हमारा कर्मफल केवल हमारे तक ही सीमित नहीं रहता वह दूसरों तक भी पहुँचता है । फिर उस कर्मफल की जो दूसरों में प्रतिक्रियाऐं होगी, उसका परिणाम भी हमें ही भुगतना होगा ।

              आधुनिक विज्ञान भी कहता है कि छोटा सा एक जीव जैसे मधुमक्खी भी यदि हमारे कर्म के कारण तड़पती है तो उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप सुनामी तक आ सकती है । आज जो हम प्रकृति का विनाश करने पर उतारू हैं, उसकी प्रतिक्रिया में हमें अतिवृष्टि, भूकम्प, बाढ़, सूखा और न जाने कौन कौन से परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं और आगे भी न जाने कितने भुगतने होंगे । हमारे द्वारा किया गया प्रत्येक कर्म केवल एक फल ही देकर समाप्त नहीं होगा बल्कि उसकी प्रतिक्रिया का वह फल भी भुगतने के लिए भी तैयार रहना होगा, जिसका भविष्य में इस जन्म में नहीं तो आगे किसी जन्म में हमें मिलना निश्चित है ।

     चलिए, लेख को आगे बढ़ाते हैं । भगवान का यह कहना कि कर्म करने का अधिकार मनुष्य को है परन्तु फल पर नहीं इसका अर्थ है कि कर्म का फल उसकी इच्छा के अनुकूल ही मिलेगा, कहना सम्भव ही नहीं है । सब कुछ प्रकृति के गुणों के अधीन है । हम फल की कैसी इच्छा सोचकर कर्म करते हैं और परिणाम में हमें कैसा फल मिल जाता है, यह निर्भर करता है कर्म की गति पर । भगवान ने गीता में अकर्म और विकर्म के बारे में स्पष्ट किया है परन्तु हम इनके विस्तार में अभी नहीं जाना चाहेंगे क्योंकि इस लेख से उनका सीधा सम्बन्ध नहीं है । हम बात करेंगे कर्म (सकाम कर्म) की क्योंकि उसकी गति को समझना सबसे कठिन है । कर्मों की गति को समझना कैसे कठिन है, जानने के लिए चलते हैं, एक सन्त के आश्रम में ।

           घने जंगल में एक तालाब था । तालाब के किनारे पर एक कुटिया थी । कुटिया में एक संत अपने शिष्य के साथ निवास करते थे । तालाब उनके लिए जल का एक मात्र स्रोत था । तालाब में मछलियाँ अठखेलियाँ करती रहती थी । यदा कदा दूर कहीं से भोजन की खोज करते करते कुछ बगुले उस तालाब की ओर चले आते थे । एक दिन संत तालाब के किनारे शान्त भाव से बैठे भगवद्चिंतन में लीन थे । बगुले के आने की आहट से उनका ध्यान भंग हो गया । उन्होंने देखा कि बगुला तालाब में उतर चुका है । वह बिना हिले-डुले एक मछली पर टकटकी लगाए खड़ा है । सन्त ने सोचा कि अब उस मछली का शिकार बनना निश्चित है । यह सोचकर उन्होंने तत्काल ही बगुले को वहाँ से उड़ा दिया । इस प्रकार एक मछली के प्राण बच गए । संत आश्वस्त थे कि आज उन्होंने एक मछली को मरने से बचा कर बड़ा पुण्य अर्जित कर लिया है ।

        समय पाकर संत का बुलावा आ गया । अब कुटिया में उनका शिष्य अकेला ही रह गया । अपने गुरु के चले जाने पर वह शिष्य ही सन्त हो गया । उस नए संत ने भी अपना एक शिष्य बना लिया । इस प्रकार उस कुटिया में संत और शिष्य, दोनों बड़े आराम से रहने लगे । कुटिया भी यथा स्थान थी और वह तालाब भी । तालाब में मछलियाँ और मछलियों का शिकार करने यदा कदा बगुलों का आ धमकना, पूर्व की भाँति चलता रहा । समय भले ही परिवर्तित हो गया हो, परन्तु उस स्थान पर वातावरण पूर्व की भाँति ही बना हुआ था । प्रकृति में बदलाव की गति धीमी होने के कारण तेज़ी से परिवर्तित होने वाला जीव उसी को स्थाई मान लेता है । 

          संत तो चले गए । किसी एक के चले जाने से जगत् की गति रुक नहीं जाती । हम अपने जीवन में सोचते हैं कि हमारे जाने से संसार में एक रिक्तता आ जाएगी परन्तु प्रकृति में परिवर्तन भले ही कितना ही हो जाए, उसमें रिक्तता आना असंभव है । परिवर्तन भी मात्र इतना ही होता है कि पिता के चले जाने पर पुत्र ही पिता बनकर उस रिक्तता को भर देता है, जैसे कि कुटिया से गुरु के चले जाने पर शिष्य ही गुरु बन गया था और उसके पास भी एक नया शिष्य आ गया था ।

            संसार का यही नियम है, इधर एक जाता है तो उधर दूसरा जन्म ले रहा होता है । इसी भांति संसार चक्र सतत गतिमान बना रहता है । हम सोचते हैं कि सब जा रहे हैं, मेरा अभी जाने का समय नहीं आया है । उसको यह पता नहीं है कि वह अभी ही नहीं बल्कि कभी भी जा सकता है ।

               हाँ, तो बात चल रही थी कि गुरु तो चले गए और उनके शिष्य ही नए गुरु के रूप में अपने शिष्य को ज्ञान देने लगे । एक रात को नए सन्त ने स्वप्न में अपने गुरु को देखा । गुरु ने कहा कि बेटे, मैं तुम्हें एक महत्वपूर्ण बात बता रहा हूँ, ध्यान से सुनना । तालाब में मछली का शिकार करने आए बगुले को कभी भी मत उड़ाना । मैंने एक दिन मछली का शिकार करने आए बगुले को उड़ा दिया था, जिससे वह बगुला उस दिन भूखा ही रह गया । मैंने सोचा था कि मछली के प्राण बचाने के लिए किए गए कर्म से मुझे पुण्य प्राप्त होगा परंतु भूखे बगुले को उड़ा देने के कारण वह मेरे लिये पाप कर्म बन गया ।

             दिवंगत सन्त अपने शिष्य को स्वप्न में आगे कह रहे हैं कि बगुले के भूखे रह जाने से बने पाप कर्म के कारण मुझे कुछ दिनों के लिए नरक में जाना पड़ा । वहाँ मैं कई दिनों तक भूखा बैठा रहा । अपना पाप कर्म भुगतने के बाद आज ही मैं वहाँ से मुक्त हुआ हूँ । इसलिए तू मेरी इस बात की गाँठ बाँध ले कि तालाब में आए बगुले को भूलकर भी मत उड़ाना । इतना सुनते ही नए गुरु का स्वप्न टूट गया । उन्होंने मन में यह बात दृढ़ता से बिठा ली कि तालाब में आए बगुले को किसी भी हाल में उड़ाना नहीं है ।

             जीवन में सभी का अपना-अपना अनुभव होता है और उसी अनुभव के अनुसार वे पाप और पुण्य कर्मों की परिभाषा गढ़ लेते हैं । महत्वपूर्ण बात तो कर्म के साथ बने सम्बन्ध की है । वह सम्बन्ध अन्त तक कैसा बना रहेगा, जब तक स्पष्ट नहीं हो जाता तब तक कर्म की गति किस प्रकार की होगी, कहा नहीं जा सकता ।

             समय बदलता है परन्तु परिस्थितियां वैसे ही आती-जाती रहती है । परिस्थितियों में परिवर्तन आना शाश्वत है । बीत जाने वाला समय पुनः नहीं लौटता परन्तु परिस्थितियों का बार- बार आगमन पहले की भांति ही होता रहता है । अंतर केवल इतना ही होता है कि व्यक्ति अर्थात् प्राणी बदल जाते हैं, स्थान वहीं का वहीं बना रहता है । कुटिया और तालाब के पास समय अवश्य ही बीता, प्राणी भी बदले परंतु एक दिन फिर वैसी ही परिस्थिति बन गई जैसे पहले वाले गुरु के समय बनी थी । कहीं दूर से कुछ बगुले आए थे । उन्होंने मछलियों को कई दिनों तक अपना आहार बनाया । 

          एक दिन तालाब के किनारे बैठे वर्तमान गुरु चिंतन में लीन थे कि तालाब में बगुले की उपस्थिति का उनको भान हुआ । उन्होंने देखा कि बगुला एक मछली के पीछे पड़ा हुआ है । वह बार-बार मछली को मारने के लिए चौंच मारता परन्तु मछली प्रत्येक बार स्वयं को बचा लेती । उसको अपने गुरु की स्वप्न में कही गई बात का स्मरण हो आया । उसने बगुले को नहीं उड़ाया । नए गुरु केवल बगुले और मछली के मध्य चल रही आँख-मिचौली को देखते रहे । अंततः बगुले ने मछली को मार ही डाला ।

            नए सन्त का भी एक दिन बुलावा आ गया । ये संत भी शिष्य को अकेला छोड़ कर चले गए । आना-जाना, प्रत्येक प्राणी की नियति में है । राजा भी जाएगा, फ़क़ीर भी जाएगा । आना-जाना इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना महत्वपूर्ण है, आपका यहां से साथ क्या ले कर जाना ? आप यहाँ से जन-धन को तो साथ लेकर जा नहीं सकते । हाँ, अपने द्वारा किए गए कर्म और अपनी अपूर्ण कामनाएं आपके साथ अवश्य ही जाएँगे । यहां रहते हुए आपने क्या किया, कैसे कर्म किए, किसलिए किए ? ऐसे सभी कर्म ही आपका भावी जन्म और जीवन निश्चित करते हैं ।

       दो पीढ़ियों के चले जाने के उपरांत भी कुटिया और उसके आस-पास कुछ भी नहीं बदला था, सिवाय समय और प्राणियों के । संसार वैसे ही चल रहा था । किसी के जाने-आने से संसार की गति में कोई अंतर नहीं आता । तालाब और कुटिया पूर्व की भांति अपने स्थान पर ही थे । तीसरी पीढ़ी के रूप में बचा शिष्य भी अब संत बन गया था । ज्ञान की खोज में एक जिज्ञासु वहाँ आकर उनके साथ रहने लगा । वह उनका शिष्य बन गया । संसार में कभी रिक्तता आ ही नहीं सकती क्योंकि परमात्मा स्वयं संसार के रूप में अवतरित हुए हैं । परमात्मा पूर्ण हैं, उनमें अपूर्णता नहीं आती । तीसरी पीढी के संत और उनका युवा शिष्य, दोनों कुटिया में जीवन बिताने लगे । संत परमात्मा के चिंतन में रत रहते । शिष्य पूर्ण समर्पण भाव से उनकी सेवा करता और अपना आध्यात्मिक ज्ञान बढ़ाता ।  

एक दिन नए सन्त ने अपने गुरु को स्वप्न में देखा । वे कह रहे थे कि बेटा ! तालाब मे जब भी बगुले आए और मछली मारने लगे तो उसे उड़ाने अथवा न उड़ाने का निर्णय सोच-समझकर करना । मेरे गुरु ने बगुले को उड़ा दिया था, जिससे उस दिन वह भूखा रह गया। इसके कारण मेरे गुरु को नरक जाना पड़ा। मैंने अपने गुरु के कहने से बगुले को नहीं उड़ाया था, जिस कारण से मुझे कुछ समय के लिए नरक में जाकर मरती हुई उस मछली की तरह तड़फना पड़ा था जो कि बगुले को न उड़ाने के कारण मारी गई थी । कारण, उस दिन बगुले ने मछली को क्रीड़ा करते हुए मार डाला था । वह चौंच मारकर मछली को इधर-उधर दौड़ते और तड़फते देखकर ही खुश हो रहा था । 

         मछली को बगुले ने अपना पेट भरने के लिए नहीं मारा था क्योंकि उस दिन वह भूखा नहीं था । केवल अपने मनोरंजन के लिए ही उसने मछली को मार डाला था । उस दिन मेरे द्वारा बगुले को उड़ा देना ही मेरा कर्तव्य था । मैं तो उस दिन उसे उड़ा नहीं पाया था पर तू इस बात का ध्यान अवश्य रखना और ऐसी परिस्थिति आए तो अपने विवेक से सोच-समझकर निर्णय लेना ।

          हमारी स्थिति तो और भी ख़राब है । मनोरंजन और शारीरिक सुख के लिए कुछ भी करते जा रहे हैं और उनको इस आधार पर उचित ठहराते हैं कि ऐसा किए बिना काम कैसे चलेगा, सभी तो यही कर रहे हैं । सभी अनुचित कार्य कर रहे हैं इसका अर्थ यह नहीं है कि आप भी करने लगें । आप अनुचित कार्य नहीं करेंगे तो कम से कम आपको उस कर्म के प्रति ग्लानि तो नहीं होगी । आप उचित अथवा अनुचित जैसा भी कर रहे है तब भी संसार का काम चल रहा है और जिस दिन आप नहीं रहेंगे तब भी संसार यथावत चलता रहेगा । 

         तीसरी पीढ़ी के सन्त को चिन्तन मुद्रा में ही यहीं छोड़, चलिए इस आश्रम से बाहर निकलते हैं और कर्म-रहस्य को जानने का प्रयास करते हैं । कर्म, अकर्म और विकर्म - तीनों में से अकर्म तो मुक्त कर देते हैं तथा विकर्म पतन की पराकाष्ठा तक ले जाते हैं, जिससे बाहर निकलकर फिर से मनुष्य शरीर का मिलना बड़ा ही कठिन है । कर्म अर्थात् सकाम कर्म में ही अधिकांश लोग उलझे हुए है । मुख्य रूप से ये कर्म ही जगत् को गतिमान बनाए हुए हैं ।

          कर्म के सम्बन्ध में दो बातें मुख्य हैं । एक तो प्रत्येक कर्म का परिणाम मिलना निश्चित होता है और दूसरे प्रत्येक जीव से कर्म होंगे ही । यही कारण है कि कर्मों से दूर भागकर भी कर्म करने ही पड़ते हैं । इसलिए विवेकवान मनुष्य के लिए यही उचित है कि वह कर्म से मुँह न मोड़े । भगवान कहते हैं - 

            सहजं कर्म कौंतेय सदोषमपि न त्यजेत् ।

            सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता: ।। गीता - 18/48 ।।

अर्थात् हे कुन्तीनन्दन ! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँसे अग्नि की तरह किसी न किसी दोष से युक्त है ।

        सहज कर्म प्रत्येक जीव से होते हैं । मनुष्य के ध्यान देने योग्य है कि वह इन कर्मों से अपना आसक्तिपूर्ण सम्बन्ध न जोड़े । जहां अग्नि होगी वहां धुआँ होगा ही वैसे ही प्रत्येक कर्म के साथ उसका परिणाम (अच्छा, बुरा अथवा मिश्रित) जुड़ा रहेगा ।

           प्रत्येक कर्म एक क्रिया मात्र है और प्रत्येक क्रिया का परिणाम अवश्य होता है । यहां एक बात को ध्यान में रखना आवश्यक है । क्रिया का परिणाम तो मिलता ही है, साथ ही क्रिया की प्रतिक्रिया होती है उसका परिणाम भी मिलता है । प्रत्येक क्रिया का परिणाम तो प्रायः तत्काल ही मिल जाता है परंतु प्रतिक्रिया का परिणाम कब मिलेगा, कहा नहीं जा सकता । इसलिए प्रत्येक कर्म को करने से पूर्व इस बात को स्मृति में रखें कि इस कर्म की प्रतिक्रिया का परिणाम भी हमें ही भुगतना होगा, कब और कहाँ, यह सब प्रकृति के विधान (विधि) पर निर्भर है ।

            भीष्म एक पूर्वजन्म में जब राजा थे और रथ पर बैठकर नगर भ्रमण पर निकले थे तो रास्ते में एक नाग ने उनकी राह रोक ली थी । भीष्म का कर्म केवल इतना सा था कि उन्होंने नाग को रास्ते से हटाने का आदेश दिया था । नाग को रास्ते से हटाते ही उस कर्म का परिणाम तत्काल ही मिल गया । परंतु उस कर्म की प्रतिक्रिया का परिणाम सौ जन्मों बाद शरशैया के रूप में उन्हें भुगतना पड़ा क्योंकि पूर्व कर्म के समय नाग का शरीर काँटों से बिंध गया था ।

           प्रतिक्रिया वह कर्म है, जो प्रारम्भ में तो संचित होता है और उस जीवन में परिणाम न दे पाने पर आपका प्रारब्ध बनता है । अभी जो आश्रम की कथा कही है, उसमें बगुले को उड़ाते ही सन्त को कर्म का परिणाम मिल चुका था परंतु उस कर्म की प्रतिक्रिया का परिणाम उन्हें नरक में भूखे रहकर भुगतना पड़ा । दूसरे सन्त ने बगुले को न उड़ाने का कर्म किया था जिसकी प्रतिक्रिया में उन्हें नरक जाकर घायल मछली की तरह तड़पना पड़ा । इसलिए कर्म का पूर्ण परिणाम (प्रतिक्रिया सहित) जब तक नहीं मिल जाता तब तक कुछ भी कहा नहीं जा सकता । 

        इतने विवेचन में कर्म-रहस्य के आधारभूत सिद्धान्त को प्रकट करने का प्रयास किया गया है । कर्म के आधार पर ही यह संसार चक्र घूमता है । सभी मनुष्य यदि अकर्म की अवस्था को उपलब्ध हो जाए तो संसार-चक्र थम सकता है परन्तु ऐसा होना असम्भव है । अपने जीवन में मनुष्य कहीं न कहीं और कभी न कभी काम के वशीभूत हो ही जाता है, जिसके परिणाम के लिए उसे संसार-चक्र में बने रहना पड़ता है । मानस में तुलसी लिखते हैं - 

करम प्रधान बिस्व करि राखा । 

जो जस करइ सो तस फलु चाखा ।। 2/219/4 ।।

       सारा विश्व कर्म के कारण ही बना है और कर्म के आधार पर ही गतिमान है । यहां जो भी जीव जैसा कर्म करता है, उसे उसका वैसा ही परिणाम भुगतना पड़ता है । कर्मों के आधार पर ही जीव को भांति-भांति के शरीर मिलते बिछुड़ते रहते हैं । यही संसार-चक्र है ।

         प्रत्येक कर्म (सकाम) कामना के अधीन है । वह कामना वर्तमान जीवन की भी हो सकती है अथवा वह पूर्व जन्म की भी हो सकती है । पूर्वजन्म में अधूरी रह गई कामना इस जीवन में अल्प प्रयास/कर्म से ही परिणाम दे देती है । उस कर्म के परिणाम में आसक्ति पैदा हो जाए तो फिर एक नई कामना पैदा हो जाएगी अन्यथा वह कर्म अपना फल देकर नष्ट हो जाता है । इस प्रकार जीव के प्रारब्ध कर्म बनते और नष्ट होते रहते हैं । यदि सभी प्रारब्ध कर्म फल देकर नष्ट हो जाएं और नया प्रारब्ध न बन सके तो जीव मुक्त हो जाता है ।

          प्रारब्ध ही जन्म-मरण अर्थात् जीव द्वारा नए-नए शरीर धारण करने के लिए उत्तरदायी है । शरीरों का मिलना-बिछड़ना ही संसार-चक्र है, जिसमें घूमते हुए जीव सुखी-दुःखी होता रहता है । कोई भी जीव सदैव के लिए सुखी नहीं हो सकता और न ही दुःखी होता है । वैसे संसार में दुःख के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । जिसे सुख कहा जाता है, वह दुःख की अपेक्षा से है अर्थात् दुःख की तीव्रता का कम हो जाना या उसको सहन कर लेने की क्षमता का बढ जाना ही सुख समझ लिया जाता है । 

        संसार परिवर्तनशील है, इसलिए यहां सुख दुःख में और दुःख सुख में परिवर्तित होता रहता है । हम अपने जीवन में कभी दुःखी नहीं होना चाहते परंतु फिर भी होते हैं क्योंकि संसार मिला ही दुःख के कारण है । दुःख का कारण था कामना का पूरा न हो पाना । हमारी सुख की इच्छा इस दुःख के मूल में है । शारीरिक सुख की इच्छा करना ही काम है । 

         काम से कामना उत्पन्न होती है और कामना से कर्म । कर्म से ही प्रारब्ध बनता है और प्रारब्ध के कारण संसार में जीव का आवागमन बना रहता है । जीव को जब मनुष्य शरीर मिलता है तब उसका उद्देश्य इस सांसारिक आवागमन के चक्र से बाहर निकलने का होना चाहिए न कि सांसारिक सुख-दुःख का भोग करने का । इस आवागमन को मिटाने के लिए एक मात्र उपाय है, प्रारब्ध को बनने से रोकना ।

         प्रारब्ध कर्म बनते हैं, संचित कर्म से और कर्मों का संचय होता है क्रियमाण कर्म से । मनुष्य क्रियमाण कर्म करता है, कामना के वशीभूत होकर । यदि हम अपनी कामनाओं पर अंकुश लगा दें तो न तो क्रियमाण कर्म होंगे, न उनका संचय होगा और न ही प्रारब्ध बनेगा ।

          मुख्य बात है कि कर्म भी होते रहें तथा नया प्रारब्ध भी न बने, क्या ऐसा होना इस जीवन में सम्भव हो सकता है ? प्रश्न का उत्तर है कि हाँ, ऐसा होना सम्भव हो सकता है, यदि हमारे कर्म ज्ञानपूर्वक हों । ज्ञान ही कर्मों के परिणाम से हमें मुक्ति दिला सकता है ।

         जीव में कर्म होते हैं - प्रकृति के गुणों के कारण । चाहे जीव लाख प्रयास कर ले, बिना गुणों के कर्म होने असम्भव है । मनुष्य की भूल यही है कि वह कर्मों को अपने द्वारा किया जाना मानता है जबकि वास्तविकता है कि सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा ही होते हैं । ज्ञान इन कर्मों को ‘करने’ से ‘होने’ में बदल देता है । ‘करना’ कर्म है और ‘होना’ क्रिया । प्रकृति में गुणों के कारण प्रत्येक पदार्थ में क्रिया सतत चलती रहती है परन्तु दुर्बुद्धि मनुष्य उसे अपने द्वारा किए जाने वाले कर्म बना देता है । ज्ञान हो जाने से दुर्बुद्धि सद्बुद्धि में बदल जाती है । इस प्रकार कर्म भी क्रिया हो जाते हैं और हम ‘करना’ से ‘होना’ में स्थानान्तरित हो जाते हैं ।

          ज्ञान से प्रकृति के गुणों और उनसे होने वाली क्रियाओं में कोई परिवर्तन नहीं होता बल्कि उससे केवल हमारी मानसिकता बदल जाती है । ज्ञान हमें हमारे कर्मों के होने की वास्तविकता को प्रकट कर देता है, जिससे हम गुणों से हो रही क्रियाओं में आसक्त नहीं होते । क्रियाओं में आसक्ति ही उन्हें कर्म में बदलती है । आसक्ति हटते ही क्रियाएं तो यथावत चलती रहती है परन्तु कर्म, अकर्म हो जाते हैं । फिर हम सब कुछ करते हुए भी कुछ नहीं करते ।

          ज्ञान यह स्पष्ट कर देता है कि सारे कर्म प्रकृति के गुणों से होने वाली क्रिया मात्र है । परमात्मा भी क्रिया नहीं करते इसलिए अवतरित होने की अवस्था में वे भी क्रिया (कर्म) अर्थात् लीला करने के लिए अपनी प्रकृति की सहायता लेते हैं । त्रेता में परमात्मा का अवतार राम के रूप में हुआ था । उनके साथ ही प्रकृति ने भी सीता के रूप में शरीर धारण किया था । अध्यात्म-रामायण में सीताजी कहती हैं कि जितने भी कर्म आप राम द्वारा किया जाना मानते हैं, वास्तव में वे सब कर्म मेरे द्वारा ही किए हुए हैं । 

एवमादीनि कर्माणि मयैवाचरितान्यपि ।

आरोपयन्ति रामेऽस्मिन्निर्विकारेऽखिलात्मनि ।। बालकाण्ड - 1/42 ।।

       सीताजी कह रही हैं कि राम के अवतार लेने से लेकर लंका विजय के पश्चात् हुए राज्याभिषेक तक के समस्त कर्म यद्यपि मेरे ही किए हुए हैं तो भी अज्ञानी लोग उन्हें निर्विकार सर्वात्मा भगवान राम में आरोपित करते हैं ।

           कहने का अर्थ है कि सभी क्रियाएं प्रकृति के द्वारा ही होती है, मनुष्य तो उन क्रियाओं के साथ स्वार्थवश अपना सम्बन्ध बना लेता है । क्रियाओं से होनेवाली सुख-दुःख की अनुभूति से उदासीन रहे तो क्रिया से किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं बनेगा और न ही क्रिया कर्म बनेगी । ज्ञान होने पर ही हम कर्म से पुनः क्रिया तक पहुंच सकते हैं ।

             चलो ! यह मान लेते हैं कि ज्ञान को उपलब्ध हो जाने पर कर्म पुनः क्रिया हो जाते हैं परन्तु उन कर्मों का क्या होगा, जो पूर्व में आसक्ति रखते हुए (सकाम कर्म) किए गए हैं ? जैसा कि विवेचन में आया है कि प्रत्येक कर्म का फल मिलना निश्चित है, इसलिए ज्ञान होने से पूर्व किए गए कर्मों का फल या तो हम चख चुके है अथवा वे संचित कर्म के रूप में हमारे पास संग्रहित है । ज्ञान हो जाने पर आगे नए क्रियमाण कर्म तो होते नहीं है, साथ ही सभी संचित कर्म भी नष्ट हो जाते हैं । ज्ञान होने का अर्थ ही यही है कि हमने जो भी कर्म किए हैं, उसमें हमारी कोई भूमिका नहीं थी, वे सभी प्रकृति की क्रिया मात्र थी । ऐसे में संचित कर्म भी अपना अस्तित्व खो देते हैं । अस्तित्व खोने का अर्थ है कि फिर उन कर्मों से हमारा कोई सम्बन्ध नहीं रहता जिससे उनका प्रारब्ध कर्म बनना भी सम्भव नहीं होता ।

 गीता में भगवान इसी बात को स्पष्ट करते हुए कहते हैं - 

  यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।

  ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ।। 4/37 ।।

हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को सर्वथा भस्म कर देती है, ऐसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को सर्वथा भस्म कर देती है ।

              ज्ञानरूपी अग्नि सभी कर्मों को समाप्त अवश्य ही कर देती है परन्तु प्रारब्ध-कर्म इस अग्नि से बच निकलते हैं क्योंकि प्रारब्ध बनता है, पूर्वजन्म के संचित कर्मों से और इन कर्मों का परिणाम वर्तमान जीवन में मिलना निश्चित है । जब ज्ञान से जीवन प्रकाशित होता है तब शेष रहे प्रारब्ध-कर्म भी फल देकर इसी जीवन में नष्ट हो जाते हैं । प्रारब्ध समाप्त होते ही शरीर गिर जाता है, फिर नए शरीर में जाना नहीं होता, यही मोक्ष है ।

ज्ञान को उपलब्ध हुए मनुष्य के सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं फिर प्रारब्ध की ओर उसकी दृष्टि जाएगी ही नहीं । दृष्टि न जाने से आशय है कि फिर वह पूर्व के कर्मों से बने प्रारब्ध को भोगने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहता है, उनसे व्यथित नहीं होता । 

          कर्म के मूल में कामना है और कामना का कारण मनुष्य का संकल्प करना है । ‘मुझे जो चाहिए, उसको मैं कैसे प्राप्त कर सकता हूँ’?’ इसकी जो योजना मस्तिष्क में बनती है उसका नाम ही संकल्प है । इस योजना को क्रियान्वित करने के लिए मन में कामना पैदा होती है । जब तक व्यक्ति किसी वस्तु/व्यक्ति को प्राप्त करने का संकल्प नहीं करेगा, तब तक उसमें कामना पैदा नहीं होगी ।

            संकल्प और कामना रहित मनुष्य से कर्म तो होंगे परन्तु वे कर्म भूने हुए बीज के समान होते हैं जो कोई परिणाम नहीं देते । परमात्मा ने ऐसे व्यक्तियों को बुद्धिमान कहा है ।

           गीता में भगवान कहते हैं - 

         यस्य सर्वे समारम्भा: कामसंकल्पवर्जिता: ।

         ज्ञानाग्निद्ग्धकर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधा: ।। 4/19 ।।

अर्थात् जिसके सम्पूर्ण कर्मों के आरम्भ संकल्प और कामना से रहित हैं तथा जिसके सम्पूर्ण कर्म ज्ञानरूपी अग्नि से जल गए हैं, उसको ज्ञानीज़न भी पण्डित अर्थात् बुद्धिमान कहते हैं ।

           इतने विवेचन से स्पष्ट है कि कर्म-रहस्य को स्पष्ट करने में ज्ञान की भूमिका महत्वपूर्ण है । कर्म के माध्यम से मनुष्य का जीवन सुखद और शान्तिमय बनता है । प्रत्येक जीव में जन्मजात ज्ञान होता है परन्तु ये ज्ञान उसके आहार, निद्रा, भय और मैथुन तक ही सीमित है । मनुष्य में इससे आगे भी कुछ करने का ज्ञान है परन्तु उसका यह ज्ञान अज्ञान के अन्धकार तले दबा हुआ रहता है । प्रश्न उठता है कि उस ज्ञान को प्रकाशित कैसे किया जा सकता है ? इसका उत्तर श्रीकृष्ण के इस कथन से स्पष्ट होता है - 

 श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: ।

ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ।। गीता - 4/39 ।।

     जो जितेन्द्रिय तथा साधन-परायण है, ऐसा श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है और ज्ञान को प्राप्त होकर वह तत्काल परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है ।

           इस श्लोक में भगवान ने ज्ञान प्राप्ति के तीन मुख्य आधार बताए हैं - जिसने अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर लिया है, जो साधन-पारायण है अर्थात् जो ज्ञान प्राप्त करने के प्रति गंभीर है तथा जो श्रद्धापूर्वक अपने गुरु से ज्ञान प्राप्त करने का इच्छुक है । ऐसे तीन गुणों से युक्त मनुष्य ही ज्ञान प्राप्त करने का अधिकारी है ।

        ज्ञान प्राप्त होते ही मनुष्य तत्काल ही परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है । मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या उसका जीवनभर अशान्त बने रहना है । इस अशान्ति का कारण है, उसकी फल और कर्म के प्रति आसक्ति । ज्ञान ही उन आसक्तियों को हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है ।

          ज्ञान होने पर मनुष्य की फल में आसक्ति मिट जाती है जिससे उसे कर्मफल से मुक्ति मिल जाती है । इस प्रकार उसका संसार से आवागमन मिट जाता है । कर्म और फल में आसक्ति ही उसे पुनर्जन्म की ओर ले जाती है ।

         प्रश्न उठता है कि जब कर्मों में आसक्ति को ही मिटाना है तो कर्मों में सुधार करके भी तो यह काम हो सकता है । हाँ, बिलकुल हो सकता है, क्यों नहीं हो सकता परन्तु कर्मों में सुधार के लिए भी तो थोड़ा बहुत ज्ञान होना आवश्यक है । बिना ज्ञान के तो सब मनुष्य कर्मों की भेड़-चाल में उलझकर एक दूसरे का अनुसरण कर रहे हैं ।

           दैनिक क्रियाओं को औपचारिकतावश पूरी कर देना, न तो परमात्मा का स्मरण है और न ही निष्काम कर्म । होशपूर्वक की जाने वाली प्रत्येक क्रिया ही भीतर भाव उत्पन्न कर सकती है अन्यथा भजन तो कैसेट प्लेयर भी सुनाता है और तोता भी राम-राम बोलता है । होशपूर्वक कर्म करने से आशय है, ज्ञानपूर्वक कर्म करना । इस प्रकार ज्ञान और कर्म का सीधा सम्बन्ध है, यह सिद्ध होता है ।

             केवल कर्म में रत रहना कर्मयोग नहीं है बल्कि ज्ञानपूर्वक निष्काम होकर कर्म करना ही कर्मयोग है, जहां अपने लिए कुछ भी नहीं किया जाता है और न ही किए जाने की स्मृति ही रहती है । केवल कर्म के बारे में ज्ञान होने से ही ऐसा सम्भव हो सकता है । कर्म और ज्ञान एक दूसरे के सहयोगी होते हैं, तभी कर्मयोग होता है । 

         सुतीक्ष्ण नाम का एक ब्राह्मण था । एक बार उसके मन में संशय हुआ कि कर्म महत्वपूर्ण है अथवा ज्ञान । वे अपनी शंका का समाधान करने के लिए ऋषि अगस्त्य के आश्रम गए । उन्होंने ऋषि अगस्त्यजी को पूछा - ‘भगवन ! आप धर्म के तत्त्व को जानते हैं । आपको समस्त शास्त्रों और धर्म के सिद्धांतों का सुनिश्चित ज्ञान है । मेरे मन में एक संशय है, उसका समाधान कीजिए । मैं जानना चाहता हूँ कि मोक्ष का साधन कर्म है, ज्ञान है अथवा दोनों ही हैं ? इन तीन पक्षों में से जो वास्तव में मोक्ष का कारण हो, उसको स्पष्ट कीजिए ।’

        महर्षि अगस्त्यजी ने कहा - ‘इनमें तीसरा पक्ष सही है अर्थात् निष्काम कर्म और ज्ञान दोनों के एक साथ होने से ही परमपद की प्राप्ति होती है ।’ वे कहते हैं -

              उभाभ्यामेव पक्षाभ्यां यथा खे पक्षिणां गतिः।

              तथैव ज्ञानकर्माभ्यां जायते परमं पदम्।। योगवासिष्ठ -1/1/7।।

        जैसे पक्षी आकाश में दोनों पंखों से ही उड़ते हैं, वैसे ही ज्ञान और कर्म दोनों के योग से ही परम पद की प्राप्ति होती है ।

          जिस प्रकार पक्षी एक पंख से उड़ नहीं सकता वैसे ही अकेले ज्ञान अथवा कर्म से आध्यात्मिक राह कठिन हो जाती है । कर्म और ज्ञान एक दूसरे के सहयोगी है । अतः परमपद तक पहुंचने के लिए दोनों को एक दूसरे का सहयोग लेना ही उचित है ।

         स्पष्ट है कि न तो अकेले कर्म से मोक्ष मिलना सम्भव है और न ही अकेले ज्ञान से । दोनों का संतुलन और आपसी तालमेल ही मनुष्य को परमात्मा के द्वार तक सुगमता पूर्वक ले जाते हैं । इसलिए न तो कर्म का त्याग करना चाहिए और न ही ज्ञान को हेय दृष्टि से देखना चाहिए ।

        गीता में भगवान श्रीकृष्ण सम्पूर्ण यज्ञों को स्पष्ट करने के पश्चात् कहते हैं कि द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है क्योंकि सम्पूर्ण कर्म और पदार्थ ज्ञान (तत्त्वज्ञान) में लीन हो जाते हैं । (4/33) । स्वामीजी कहते हैं कि ज्ञान होने से सम्पूर्ण कर्मों और पदार्थों से सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है, जिससे स्वार्थवश सकाम कर्म नहीं होते । द्रव्यमय यज्ञ में क्रिया और पदार्थ की मुख्यता है जबकि ज्ञानयज्ञ में विवेक-विचार की मुख्यता है ।

         ज्ञानपूर्वक किए जाने वाले कर्मों से तत्त्वज्ञान की प्राप्ति होना सरल है । गीता में भगवान कहते हैं कि -

    न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।

    तत्स्वयं योगसंसिद्ध: कलेनात्मनि विन्दति ।। गीता - 4/38 ।।

      इस मनुष्य लोक में ज्ञान के समान पवित्र करनेवाला नि:सन्देह दूसरा कोई साधन नहीं है । जिसका योग भलीभाँति सिद्ध हो गया है, वह (कर्मयोगी) उस तत्त्वज्ञान को अवश्य ही अपने में पा लेता है ।

       इस प्रकार कर्मयोग और तत्त्व-ज्ञान प्राप्ति में ज्ञान की भूमिका सिद्ध होती है ।

        ज्ञान और कर्म, दोनों का सामंजस्य हो तो आत्म-बोध की अवस्था को शीघ्र ही प्राप्त किया जा सकता है । कर्म और ज्ञान एक दूसरे के पूरक हैं न कि विरोधी । प्रायः लोग दोनों साधनों को अलग अलग मानते हैं परंतु ऐसा कहना सत्य नहीं है । हां, यह सत्य है कि मनुष्य इन दोनों में से एक को अपने स्वभावानुसार वरीयता देता है । जिसकी कुछ न कुछ करते रहने में रुचि होती है, वह कर्म मार्ग पर आगे बढ़ता है और जिसकी जानने में रुचि होती है वह ज्ञान को प्रमुखता देता है । 

     भगवान कर्म और ज्ञानयोग, दोनों का फल एक ही बता रहे हैं -    

सांख्ययोगौ पृथग्बाला: प्रवदन्ति न पण्डिता: ।

एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ।। गीता - 5/4 ।।

    बेसमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोग को अलग अलग कहते हैं, न कि पण्डितजन ; क्योंकि इन दोनों में से एक साधन में भी अच्छी तरह से स्थित मनुष्य दोनों के फल (परमात्मा) को प्राप्त कर लेता है अर्थात् आत्म-साक्षात्कार कर लेता है ।   

           दोनों (ज्ञान और कर्म) का परिणाम एक ही है - आत्म-बोध को उपलब्ध होना । इसका अर्थ है कि कर्मयोग और ज्ञान योग दोनों समकक्ष हैं । दोनों के समकक्ष होने और एक दूसरे के पूरक होने के कारण शीघ्र ही सिद्धि मिल जाती है ।

          कर्म और ज्ञानयोग दोनों में ही त्याग होता है । कर्मयोग में अहम् का त्याग होता है जबकि ज्ञानयोगी संसार के मोह का त्याग करता है । सेवा कर्म करते हुए यदि भीतर ‘मैं कर्ता हूँ’ का भाव है तो वह कर्मयोग नहीं है, इसी प्रकार यदि ज्ञान अर्जित करके भी संसार के मोहजाल में जकड़े हुए हैं तो आप ज्ञानयोगी नहीं हो सकते । ज्ञानपूर्वक कर्म करने से अहम् और सांसारिक मोह, दोनों का त्याग सुगम हो जाता है । इसलिए कर्म और ज्ञान, इन दोनों में महत्वपूर्ण हुआ - त्याग ।

     श्रुति कहती है -

   न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशु: । 

  (कैवल्य उपनिषद् - 2 तथा महानारायणोपनिषद् - 10/5)

अर्थात् न धन से, न कर्म से और न संतान के उत्पादन से ही मोक्ष प्राप्त होता है । प्रमुख यतियों ने एक मात्र त्याग से ही मोक्ष को अनुभव किया है ।

              भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि कर्मयोग के बिना ज्ञानयोग सिद्ध होना कठिन है । मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है । (गीता - 5/6 ) कर्मयोग के द्वारा करने का राग मिट जाता है । रागरहित होने से सांसारिक मोह से छूटना सुगम हो जाता है ।

       कर्म ज्ञान बिना और ज्ञान कर्म बिना अधूरे रहते हैं, यह निश्चित है । दोनों आपस में गहरे से जुड़े हैं । ज्ञान को उपलब्ध मनुष्य सब कुछ करते हुए भी वास्तव में कुछ नहीं करता । निष्काम कर्म करते हुए मनुष्य संसार के साथ बंधता नहीं है, वह सदैव मुक्त ही रहता है । इसीलिए कहा जाता है कि कर्मयोगी स्वतः ही अपने आप में ज्ञान पा लेता है और ज्ञानयोगी सभी कर्म करते हुए भी उनमें लिप्त नहीं होता । ज्ञानी जानता है कि शरीर की कर्मेन्द्रियों के द्वारा जो कुछ भी किया जा रहा है उसको सुख - दुःख के रूप में शरीर की ज्ञानेंद्रियां ही अनुभव कर रही है, मैं’ इस करने और उससे होने वाले प्रत्येक अनुभव से परे हूँ ।

        भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं -  

नेव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत त्तत्ववित् ।

पश्यंशृंण्वन्स्पृशंजिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपंश्वसन् ।।

प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषपन्नपि ।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ।। गीता - 5 /8-9)

    तत्त्व को जाननेवाला सांख्ययोगी देखता हुआ, सुनता हुआ, छूता हुआ, सूँघता हुआ, खाता हुआ, चलता हुआ, ग्रहण करता हुआ, बोलता हुआ, त्याग करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ तथा आँख खोलता और मूँदता हुआ भी ‘सम्पूर्ण इंद्रियाँ इंद्रियों के विषयों में बरत रही है’ - ऐसा समझकर ‘मैं स्वयं कुछ भी नहीं करता हूँ’ - ऐसा माने ।

         गीताजी के इन दो श्लोकों (5/ 8-9) को समझकर पुनः उसी आश्रम में चलते हैं जहां पहले के दो सन्त तो जा चुके हैं और तीसरा सन्त बैठा हुआ अपने दादा गुरु और गुरु के द्वारा कहे गए शब्दों पर विचार कर रहा है । विचार ही विवेक की जननी है । देखते हैं, विवेक जाग्रत होता है अथवा नहीं ।

       तीसरा सन्त जो अब गुरु है विचार कर रहा है कि मेरे दादा गुरु ने भूखे बगुले को मछली मारने से रोक दिया इसलिए वे स्वर्ग पाने से दूर हो गए । मेरे गुरु ने मछली के साथ क्रीड़ा कर रहे बगुले को नहीं उड़ाया इसलिए नरक में मछली की तरह तड़फना पड़ा । तीसरा ऐसा कौन सा रास्ता हो सकता है, जिससे मुझे नरकगामी न होना पड़े । तालाब भी रहेगा, उसमें मछलियाँ भी होंगी और अपना पेट भरने के लिए बगुले भी आएंगे । तो क्या मैं अपनी कुटिया के बाहर बैठना ही छोड़ दूँ जिससे बगुले द्वारा मछली के शिकार किए जाने पर मेरी दृष्टि ही न पड़े ।

           वर्तमान सन्त को यही उपाय उचित लगा । तत्काल ही वह वहाँ से उठा और अपनी कुटिया के भीतर बैठकर ध्यान करने लगा । परन्तु यह क्या हुआ ? आज तो ध्यान हो ही नहीं रहा । ध्यान में जाने पर अपने गुरु की कही बात याद आने लगती, फिर कल्पना में मछली मारता बगुला दिखाई देता, उसे उड़ाने को हाथ उठता पर गुरु की बात याद कर रुक जाता । झुंझला कर फिर गुरु की बात पर विचार करने लगता परन्तु क्या करूँ क्या न करूँ, इसका उत्तर उसे नहीं मिल पाया ।

          अर्जुन भी तो इसी प्रकार क्या करूँ, क्या न करूँ के द्वन्द्व में फँसकर युद्ध से पलायन करने चला था । सन्त ने तो बाहर बैठना तक छोड़ दिया था । कुटिया के भीतर रहकर भी कौनसा वह द्वन्द्व से मुक्त हो गया था ? भीतर बैठे बैठे विचारों की श्रृंखला में डूबता-उतराता सन्त शीघ्र ही किसी निर्णय पर पहुँचने वाला है ।

          अचानक सन्त के भीतर एक बिजली सी कौंधी । विचार से विवेक जाग्रत हुआ, ज्ञान का उदय हुआ । केवल एक ही बात बुद्धि में उपजी - “मैं करने वाला कौन होता हूँ ?” सन्त का विवेक कहता है - ‘जिसने संसार बनाया, तालाब बनाया, तालाब में मछलियाँ पैदा की, उनको बगुले का भोजन बनाया - इन सब क्रियाओं में बाधा डालने वाला मैं कौन होता हूँ ?’ इस प्रकार उन्हें अपने सभी प्रश्नों के उत्तर मिल गए और शान्ति को प्राप्त होकर वे ध्यानावस्था में चले गए ।

            आज पूर्व की भांति वे कुटिया से बाहर निकलकर तालाब के किनारे बैठे । बगुले को आना ही था, मछली मारकर पेट भरना ही था । सन्त निर्लिप्त भाव से बैठे रहे । न तो बगुले को उड़ाने का सोचा और न ही न उड़ाने का । सब कुछ प्रकृति की क्रिया मानते हुए परमात्मा के ध्यान में लीन हो गए । ठीक वैसे ही जैसे सती के कर्मों के फल को उसके प्रारब्ध पर छोड़कर शंकर समाधिस्थ हो गए थे ।

             सन्त को ज्ञान हो गया और ज्ञान का सम्बन्ध कर्म से जुड़ गया । इतना होते ही द्वन्द्व-मुक्त होकर उन्होंने शान्ति को पा लिया ।

      कर्म और ज्ञान का इतना गहरा सम्बन्ध है कि एक का दूसरे पर प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सकता । ज्ञान कर्म पर भारी पड़ता है क्योंकि कर्म का सम्बन्ध इंद्रियों से है और ज्ञान का सम्बन्ध बुद्धि से । शरीर से सूक्ष्म इंद्रियाँ है और इंद्रियों से सूक्ष्म मन । मन से भी सूक्ष्म है बुद्धि । बुद्धि की दिशा सही हो तो उसमें उपजा ज्ञान विवेक में परिवर्तित हो जाता है जो मनुष्य के लिए आत्म-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त कर देता है । 

        बुद्धि में विवेक को जाग्रत करने में कर्म की भी भूमिका रहती है । यदि कर्म बिना किसी स्वार्थ और कामना के किए जाएँ तो वे मनुष्य को रागरहित कर देते हैं । जब राग-द्वेष नहीं रहते तब बुद्धि में निवास करनेवाला ज्ञान भी करवट लेते हुए विवेक में परिवर्तित होने लगता है । विवेक से मनुष्य को अनुचित-उचित का ज्ञान हो जाता है, जिससे सकाम कर्म तो होते नहीं हैं और निष्काम कर्म भी अकर्म हो जाते हैं । ऐसा कर्मयोगी कर्म करते हुए भी कुछ नहीं करता और नहीं करते हुए भी सब कुछ करता है । कहने का अर्थ है कि ज्ञानी भक्त का न तो कर्मों को करने में राग रहता है और न ही वह कर्मों का त्याग ही करता है ।

           विवेक से मनुष्य के सभी कर्म निष्प्रभावी हो जाते हैं अर्थात् परिणाम नहीं देते । इस अवस्था को उपलब्ध व्यक्ति अपने स्वभावानुसार भक्ति की राह भी पकड़ सकता है । विवेक ही मनुष्य को आत्म-ज्ञान होने की अवस्था तक ले जाता है ।

         भक्ति में भक्त भगवान के प्रति पूर्ण समर्पित होता है । वह अपने संपूर्ण कर्म भगवान को अर्पित करता है । ऐसे कर्म जो परमात्मा के लिए किए जाते हैं और साथ ही उनका फल परमात्मा को अर्पण कर दिया जाता है तो उन कर्मों का परिणाम भक्त को भुगतना नहीं पड़ता । आसक्ति का त्याग किए बिना कोई भी कर्म परमात्मा के लिए नहीं किया जा सकता अर्थात् परमात्मा के लिए कर्म करने से अर्थ है कि कर्मों के प्रति अब कोई आसक्ति नहीं रही है ।

            स्वामीजी कहते हैं कि कर्मयोगी अपने सम्पूर्ण कर्मों को संसार के अर्पण करता है, ज्ञानयोगी प्रकृति के अर्पण करता है और भक्तियोगी भगवान के अर्पण करता है । तीनों योगों का परिणाम एक ही है अर्थात् फिर कोई भी कर्म फल देने में सक्षम नहीं रहता । तीनों योगों में सबसे महत्वपूर्ण एक ही बात है, ‘अपने लिए कुछ भी न करना’ ।

              जो कर्म अपने लिए किए जाते हैं, उन्हीं में मनुष्य आसक्त होता है । संसार की सेवा के लिए किए जाने वाले कर्म मनुष्य को मुक्त करते हैं । कर्मों से आसक्ति हटाने के दो ही मार्ग हैं - ज्ञान और भक्ति । ज्ञान से कर्मों का विज्ञान समझ में आता है और भक्ति से कर्मों को करने में परमात्मा की भूमिका समझ में आती है । परमात्मा की भूमिका अर्थात् यह स्वीकार करना कि सभी कर्म परमात्मा के द्वारा हो रहे हैं और मैं कुछ भी नहीं कर रहा हूँ । ऐसा मानने से फिर आप कर्म के फल से प्रभावित नहीं होंगे ।

          इतने विवेचन से स्पष्ट है कि ज्ञान, कर्म और भक्ति, तीनों का मुख्य उद्देश्य कर्मों के प्रति आसक्ति को समाप्त करना है । उद्देश्य रहता है कि येन केन प्रकारेण मनुष्य कर्तापन के भाव से मुक्त हो । मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी समस्या ही यही है कि वह कहता है कि ‘मैं कर्ता हूँ ‘ यानि सब कुछ करने वाला मैं ही हूँ । ‘मैं नहीं होता तो यह काम कौन करता ?’ संसार में इसी वहम को पालते पालते करोड़ों लोग चले गए फिर भी संसार के सभी कार्य यथावत हो रहे हैं । यह हमारा अज्ञान नहीं है तो और क्या है ?

             अज्ञान है - ‘मैं कर्ता हूँ’, ऐसा मानना । इस अज्ञान के नीचे ज्ञान दबा पड़ा है जो कहता है कि तू कुछ भी नहीं कर रहा है, सब कुछ प्रकृति के माध्यम से हो रहा है । प्रकृति को यह भी ख़्याल नहीं है कि वो भी कुछ कर रही है । वह तो यही जानती है कि जिसने उसे सृजित किया है, वही जाने कि कौन ‘कर्ता’ है ? प्रकृति भी परमात्मा की तरह अनादि है । परमात्मा भी ‘कर्ता’ नहीं है ? प्रश्न उठता है कि फिर ‘कर्ता’ कौन है ? सब कुछ एक निश्चित व्यवस्था के अनुसार हो रहा है । इस व्यवस्था का नाम है - गुण-कर्म विभाग । जो इस व्यवस्था को समझ जाता है वह इस कर्मप्रधान संसार चक्र से बाहर निकल जाता है अन्यथा तो सब इस चक्र में घूमते रहने को विवश हैं ही ।

           ज्ञान से कर्ता होने के अभिमान को तोड़ा जा सकता है, जिससे सारे कर्म भस्मीभूत हो जाते हैं । फिर केवल प्रारब्ध कर्म शेष रहते हैं, जिनका फल भोग कर मनुष्य जन्म-मरण से मुक्त हो जाता है । कर्मयोग में ज्ञान की भूमिका बस इतनी ही है । 

सार - संक्षेप 

              संसार कर्मप्रधान है इसलिए यहाँ सभी जीव कर्म करने को विवश हैं । प्रायः सभी जीव अपने पूर्व मनुष्य जीवन के प्रारब्ध के अनुसार ही कर्म करते हैं, उनसे हटकर कोई भी कर्म वे अपनी इच्छानुसार नहीं कर सकते । केवल मनुष्य ही एकमात्र ऐसा जीव है, जिसको कर्म-स्वतंत्रता मिली है । यदि उसके पास यह शक्ति नहीं होती तो संसार-चक्र थम सकता था क्योंकि फिर मनुष्य का प्रारब्ध ही नहीं बनता । इच्छानुसार कर्म करने से ही प्रारब्ध बनता है ।

           संसार-चक्र से बाहर निकलने के लिए मनुष्य को प्रारब्ध-कर्म बनाने से मुक्त होना होगा । इसके लिए एक ही रास्ता है कि वह अपने आधारभूत ज्ञान का उपयोग कर्म करने में करे । आधारभूत ज्ञान वह है जो उसे जीवन में परिस्थितियों का सामना करते हुए उसे अनुभव रूप से प्राप्त हुआ है । इस ज्ञान के अनुसार कर्म करने से सकाम कर्मों पर अंकुश लग जाएगा । सकाम कर्म नहीं कर रहे हैं, इसका अर्थ है कि करने का राग समाप्त हो रहा है । इस प्रकार राग समाप्ति से विवेक (ज्ञान की उच्च अवस्था) जाग्रत होता है । विवेक के कारण कर्म के प्रति हमारी सोच बदल जाती है । फिर हम जिस कर्म को अपने द्वारा ‘करना’ मानते हैं वह ‘होना’ में बदल जाता है । ‘होना’ से ही ‘है’ अर्थात् परमात्मा की राह निकलती है । 

             ज्ञान (विवेक) से सकाम कर्म/ क्रियमाण कर्म तो होते नहीं हैं और जो भी कर्म अब तक संचित हुए हैं वे भी नष्ट हो जाते है । केवल प्रारब्ध कर्म शेष रह जाते हैं, जिनका फल भोग कर मनुष्य ‘है’ की अवस्था तक पहुंच सकता है । स्वामीजी एक दोहे के माध्यम से यही बात इस प्रकार कहा करते हैं -

        ज्ञान उदय जब होत है, संचित कर्म बिलाय ।

        क्रियमाण उपजे नहीं, प्रारब्ध ही रह जाय ।।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

Saturday, April 18, 2026

ज्ञान - मुक्ति का मार्ग

 ज्ञान - मुक्ति का मार्ग 

          ‘ज्ञान - बंधन या मुक्ति’ लेख से स्पष्ट हो जाता है कि यदि ज्ञान का सदुपयोग किया जाए तो वह मुक्ति के द्वार खोल देता है । ज्ञान वह साधन है जो साधक को साध्य का अनुभव करा सकता है । मनुष्य की सबसे बड़ी विडम्बना है कि वह ज्ञान का सदुपयोग नहीं कर पा रहा है । प्रत्येक मनुष्य में ज्ञान जन्मजात होता है , बस वह केवल अज्ञान के नीचे दबा पड़ा रहता है । जिस प्रकार प्रत्येक पत्थर में मूर्ति छिपी रहती है और अवांछित पत्थर को हटा दिया जाये तो मूर्ति प्रकट हो जाती है वैसे ही अज्ञान से मुक्त होते ही ज्ञान प्रकाशित होने लगता है । 

        अज्ञान के हटते ही भीतर ज्ञान का उदय हो जाता है । यह अज्ञान कैसे हटाया जा सकता है ? ज्ञान जाग्रत हो जाने से साधक जीवन्मुक्त हो जाता है ? क्या साधक के लिए केवल मुक्ति ही पर्याप्त है अथवा फिर भी कोई कमी शेष रह जाती है ? आइए! ऐसे ही ज्ञान से सम्बन्धित कुछ प्रश्नों के उत्तर जानते हुए भक्ति तक पहुंचने का प्रयास करते हैं । 

       ज्ञान से भक्ति अथवा भक्ति से ज्ञान, दोनों कथन ही सही हैं । यह हमारे स्वभाव (प्रकृति) पर निर्भर करता है कि हम किस मार्ग के योग्य हैं । ज्ञान मुक्ति का दाता है जबकि भक्ति प्रेम की । मुक्ति शान्ति प्रदान कर सकती है परन्तु संतुष्टि तो प्रेम से ही मिलती है । हम इस लेख ‘मुक्ति अथवा भक्ति’ के माध्यम से यह जानने का प्रयास करेंगे कि ज्ञान और भक्ति, दोनों ही हमारे जीवन में कैसे उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं ? 

         ज्ञान से मुक्ति की अवस्था को प्राप्त हुआ जा सकता है, इस बात में किसी प्रकार का कोई संदेह नहीं है । क्या जीवन में मुक्त हो जाना ही पर्याप्त है अथवा उससे आगे भी कोई और यात्रा हो सकती है ? ज्ञान जीवन्मुक्त कर देता है क्योंकि ज्ञान अभाव को नष्ट कर देता है और भाव (सत् ) तक पहुंचा देता है । जीवन्मुक्त हो जाने के उपरान्त भी जिस बात की कमी शेष रह जाती है वह है, प्रेम । प्रेम को उपलब्ध होने के लिए ज्ञान को पीछे छोड़ते हुए उससे भी आगे बढ़ना पड़ता है । मैं तो यहाँ तक कहता हूँ की प्रेम के लिए तो अर्जित किए हुए समस्त ज्ञान को भूलकर ही आगे बढ़ना होता है । इसका अर्थ यह नहीं है कि ज्ञान की उपयोगिता नहीं है बल्कि इससे अर्थ है ज्ञानी होने के अहंकार को समाप्त करना । एक बार हुआ ज्ञान कभी विस्मृत नहीं होता । ज्ञान को विस्मृत कर देना तो अज्ञान में डूब जाना है । 

            हमने ज्ञान से जो कुछ जाना है, वह जब उपयोग में लिया जाता है तब विवेक प्रकट होता है । विवेक ही जीवन में शान्ति और प्रेम की यात्रा करवाता है । ज्ञान से सबकुछ जानकर मुक्त तो हुआ जा सकता है परन्तु प्रेमरस से सरोबार होने के लिए उस ज्ञान को जीवन में उतारकर उसे अनुभव करना आवश्यक है । 

           प्रसिद्ध कवि स्व. गया प्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ की एक कविता ‘स्वदेश’ है जिसमें वे कहते हैं - 

जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं ।

वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं ।।

           मनुष्य भावों से भरा है परन्तु सांसारिक उलझनों में घिर कर वह अभाव की स्थिति तक पहुंच गया है । पुनः भावपूर्ण स्थिति को प्राप्त करने के लिए उसे ज्ञान अर्जित करते हुए प्रेम की अवस्था तक पहुंचना ही होगा ।

           विवेचन से स्पष्ट है कि ज्ञान का जब प्रेम में जाकर समापन होता है तभी व्यक्ति भावपूर्ण अवस्था को प्राप्त होता है । संसार में अनेकों जीव है, सभी सांसारिक पदार्थों की आसक्ति में आकण्ठ डूबे हुए है । अन्य जीवों की बात को तो छोड़ दें, मनुष्य जैसा विवेकवान जीव भी इन आसक्तियों से कहां मुक्त हो पाया है ? पदार्थों की आसक्तियों में डूबा मनुष्य बंधा हुआ है, संसार के साथ । इन सांसारिक बंधनों से मुक्त होने के लिए उसे अपने ज्ञान को सतह पर लाना होगा जो अभी अज्ञान की असंख्य पर्तों के नीचे दबा पड़ा है । जीवन में ज्ञान कैसे उतरेगा, जानने के लिए हमें एक दृष्टि अपने अज्ञान पर डालनी होगी । 

         अज्ञान से ज्ञान प्राप्ति की यात्रा में आगे बढ़ने से पहले हमें अज्ञान को जानना चाहिए । अज्ञान का अर्थ ज्ञान की अनुपस्थिति मात्र नहीं है बल्कि जन्म-जन्मांतरों से चली आ रही मूढ़ता ही इस अज्ञान का कारण है । अज्ञान की दृढ़ता हो जाने से ज्ञान उसके नीचे दब जाता है । इसका कारण है- ‘देही को विस्मृत कर देह को ही सब कुछ समझ लेना ।’ यह जड़ देह एक पदार्थ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । वास्तव में देह की सत्ता है ही नहीं । देह तो जड़ है, इसे सुख-दुःख का अनुभव नहीं होता, परन्तु साथ ही यह भी सत्य है कि सुख -दुःख का अनुभव तो फिर होता है । प्रश्न है कि सुख-दुःख का अनुभव शरीर नहीं करता तो फिर कौन करता है ? देहाभिमानी जीवात्मा ही अविवेक के कारण सुखी-दुःखी होता है ।

          जैसे घर का मालिक घर में रहते हुए विभिन्न प्रकार की चेष्टाएं करता है परन्तु उसका घर कुछ भी नहीं करता । उसी तरह शरीर में आसक्त होकर जीवात्मा ही विविध चेष्टाएं करता है, शरीर कुछ भी नहीं करता । शरीर तो इन चेष्टाओं को प्रकट रूप देने का माध्यम मात्र है । इन्हीं चेष्टाओं (कर्मों) के कारण जीवात्मा ही सुखी-दुःखी होता है । संसार को दुखालय कहा जाता है क्योंकि अनुभव किया गया प्रत्येक सुख भी अल्प समय पश्चात् दुःख में बदल जाता है । इस दुःख को स्वयं में अनुभव करने का कारण हमारा अज्ञान है । इस अज्ञान के कारण ही जीवात्मा कर्ता और भोक्ता बनता है अन्यथा मूलतः तो उसकी ‘न करोति न लिप्यते’ की अवस्था है । 

        रेशम का कीड़ा अण्डे से बाहर निकलकर लार्वा बनता है और फिर प्यूपा की अवस्था में आते हुए अपनी लार से रेशम की डोर बनाकर अपने चारों ओर लपेट लेता है, जिसमें वह सुरक्षित रहकर पूर्ण रूप से विकसित होता है । इस प्रकार वह रेशम की डोर से निर्मित कोष में वह बन्धन को प्राप्त होता है । शरीर के पूर्ण रूप से विकसित होते ही डोर को काटकर उसे बाहर निकलना होता है परन्तु यह रेशम का बन्धन ही उसे मृत्यु की ओर ले जाता है । इसी प्रकार जीव भी रेशम के कीड़े की तरह शरीर के सुख की चाहना से विभिन्न बंधनों (घर, जन आदि) में बंध जाता है और जीवनभर छटपटाता रहता है । कितना ही प्रयास कर ले, वह इस बंधन से मुक्त नहीं हो पाता । इस बन्धन को मन से स्वीकार कर लेना ही हमारा अज्ञान है ।

           परमात्मा ने जीवों की रचना ‘आनन्द’ को अनुभव करने के लिए की परन्तु जीव आनन्द की खोज में न लग कर सांसारिक पदार्थों से सुख प्राप्त करने की खोज में लग गया । सांसारिक सुख आनन्द की एक छद्म अनुभूति मात्र है, वह आनन्द नहीं है । पदार्थों से प्राप्त होने वाले सुख को जीवन का लक्ष्य बना लेना ही हमारा अज्ञान है ।

       यह अज्ञान कैसे हमारे जीवन में धीरे-धीरे गहरे में उतरता जाता है ? इसका विवरण हमारे शास्त्रों में विस्तार से मिलता है । परमात्मा से चला जीव कैसे अज्ञान के अंधकार में डूबता जाता है, इसको समझने के लिए शास्त्रों में अज्ञान की सात अवस्थाएं/भूमिकायें बतलाई गई है । 

           अज्ञान की कुल सात भूमिकाएं है जिसके आधार पर वह जीव में दृढ़ता से स्थित रहता है । ये सात भूमिकाएं (अवस्थाएं) हैं - बीज-जाग्रत, जाग्रत, महाजाग्रत, जाग्रत-स्वप्न, स्वप्न, स्वप्न-जाग्रत और सुषुप्ति । ये सात भूमिकाएं अज्ञान के सात भेद हैं अर्थात् इनको अज्ञान की सात अवस्थाएं भी कहा जा सकता है । ये सातों भेद एक- दूसरे से संयुक्त होकर अलग अलग अनेकों नाम धारण करते हैं । 

       महासर्ग के आदि में परमात्मा से जो प्रथम व्यष्टि चेतन प्रकट होता है वह भविष्य में होने वाले ‘चित्त’ और ‘जीव’ अर्थों के रूप में एक होकर ‘जाग्रत’ अवस्था के बीज रूप में स्थित होता है क्योंकि वह महाप्रलय के समय भी परमात्मा में बीज रूप से ही था । इसलिए अज्ञान की इस अवस्था को बीज-जाग्रत अवस्था कहा जाता है । यह अज्ञान की प्रथम अवस्था है ।

          यह नवजात बीज जब ‘यह देह मैं हूँ’, ‘यह देह मेरे लिए है’ और ‘ये संसार के सभी पदार्थ मेरे द्वारा भोगने के लिए बने हैं’, ऐसी जो भीतर प्रतीति होती है, वह अज्ञान की ‘जाग्रत’ अवस्था है । यह देह मैं हूँ, यह मेरे लिए है, सब भोग्य पदार्थ मेरे हैं, ऐसी प्रतीति उत्पन्न होने के पश्चात् कई जन्मों के अभ्यास से यह प्रतीति दृढ़ होती जाती है । यह दृढ़ प्रतीति जब स्फुरित होती है, तब यह अज्ञान की ‘महाजाग्रत’ अवस्था कहलाती है । जाग्रत पुरुष का जो जगत् के ही तुल्य मनोराज्य होता है, वह अज्ञान की ‘जाग्रत-स्वप्न’ अवस्था कहलाती है । 

          नींद के समय जो स्वप्न देखा गया है, जागने के पश्चात् अनुभव में आई हुई बातों के विषय में जो प्रतीति होती है, वह अज्ञान की ‘स्वप्न’ अवस्था है । स्वप्न को ही सत्य समझ लेना, हमारा अज्ञान नहीं तो और क्या है ? चिरकाल तक स्वप्न में डूबे रहने के बाद सुदृढ़ अभिनिवेश (मृत्यु से भय) या चिरस्थायित्व की कल्पना से पुष्ट हो जगत् भाव को प्राप्त हुआ स्वप्न महाजाग्रत की समता प्राप्त कर लेता है । प्रत्येक मनुष्य (जीव) अपने शरीर के मोह में इतना अधिक बंधा हुआ है कि वह शरीर के मरने को ही अपना मरना मानने लगता है । यही कारण है कि उसे सदैव मृत्यु का भय सताता रहता है । छोटे से छोटा जीव भी अपने शरीर की मृत्यु से बचना चाहता है । 

          यह शरीर मरणधर्मा है । जिसने इस धरा पर शरीर धारण किया है, उसे एक न एक दिन यह शरीर छोड़ना ही होगा । मृत्यु का भय (अभिनिवेश) इस शरीर को बचाने की जुगत मात्र है । इस अवस्था को प्राप्त हुआ स्वप्न ‘स्वप्न- जाग्रत’ माना गया है । यह अज्ञान की छठी अवस्था है । अज्ञान की इन छः अवस्थाओं का परित्याग करने पर जीव की जो जड़ अवस्था (अपने आपको संसार का मान लेना) है, वही दुःखों का बोध कराने वाली अज्ञान से संपन्न ‘सुषुप्ति’ अवस्था कही गई है । इस अवस्था से मुक्त होने के लिए ज्ञान ही एकमात्र साधन है । अज्ञान की इन अवस्थाओं का विस्तार से वर्णन योगवासिष्ठ में मिलता है ।

          जिस प्रकार योगवासिष्ठ के उत्पत्ति-प्रकरण में अज्ञान की सात भूमिकाएं बताई गई है उसी प्रकार निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) में ज्ञान की भी सात भूमिकाएं बतलाई गई हैं । ये सात भूमिकाएं है - शुभेच्छा, विचारणा, तनुमानसा, सत्वापत्ति, असंसक्ति, पदार्थाभावना और तुर्यगा । इनमें पहले की तीन भूमिकाएँ (शुभेच्छा, विचारणा और तनुमानसा) ज्ञान प्राप्ति से पहले की है जबकि अगली चार (सत्वापत्ति, असंसक्ति, पदार्थाभावना और तुर्यगा) जीवन्मुक्ति की अवस्थाएं हैं ।

          योगवासिष्ठ में वसिष्ठ मुनि भगवान श्रीराम को उपदेश देते हुए कह रहे हैं - 

शास्त्रसज्जनसम्पर्कै: प्रज्ञामादौ विवर्धयेत् ।

 प्रथमा भूमिकैषोक्ता योगस्यैव च योगिन: ।।

विचारणाद्वितीया स्यातृतीयाऽसंगभावना । 

विलापनी चतुर्थी स्याद्वासनाविलयात्मिका ।।

शुद्धसंविन्मयानन्दरूपा भवति पञ्चमी । 

अर्धसुप्तप्रबुद्धाभो जीवनमुक्तोऽत्र तिष्ठति ।।

स्वसंवेदनरूपा च षष्ठी भवति भूमिका । 

आनन्दैकघनाकारा सुषुप्तसदृशस्थिति: ।।

तूर्यावस्थोपशान्ताथ मुक्तिरेवेह केवलम् । 

समता स्वच्छता सौम्या सप्तमी भूमिका भवेत् ।।

(योगवासिष्ठ - निर्वाण प्रकरण पूर्वार्ध - सर्ग 120/1-5 )

ज्ञान की ये सात भूमिकाएं (अवस्थाएं) आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग हैं, जो शुभेच्छा से प्रारंभ होकर तुर्यगा अर्थात् परम आनन्द की स्थिति तक जाती है ।

       ज्ञान की जो सात भूमिकाएँ (शुभेच्छा, विचारणा, तनुमानसा, सत्वापत्ति, असंसक्ति, पदार्थाभावना और तुर्यगा) बताई गई हैं, वे ज्ञान प्राप्ति की सात अवस्थाएं अर्थात् सात सोपान है । प्रथम सोपान से उत्तरोत्तर आगे बढ़ता हुआ मनुष्य पूर्ण ज्ञान को प्राप्त होना होता है । आइए ! जानते हैं कि प्रत्येक अवस्था अपनी संपन्नता को कैसे प्राप्त होती है ?

       प्रथम अवस्था है - शुभेच्छा अर्थात् सद्भावना । इस अवस्था को उपलब्ध होने के लिए ‘श्रवण’ महत्वपूर्ण है । इस सोपान पर खड़े व्यक्ति को सबसे पहले शास्त्रों और संतों की संगति से अपनी बुद्धि शुद्ध और तीक्ष्ण करनी होती है । यह योगी के योग की पहली भूमिका है ।

      दूसरी अवस्था है - विचारणा अर्थात् सही विचार । इस अवस्था को उपलब्ध होने के लिए सुने/पढ़े हुए पर ‘मनन’ करना होता है । इससे सच्चिदानन्द ब्रह्म के स्वरूप का निरंतर चिंतन होगा । संतों और शास्त्रों के सानिध्य से जो कुछ सुना है/पढ़ा है, उस पर मनन करना । 

      तीसरी अवस्था है -तनुमानसा अर्थात् सूक्ष्म मन । इस अवस्था को उपलब्ध होने में ‘निदिध्यासन’ की भूमिका है । निदिध्यासन का अर्थ है - संसार से असंग होकर परमात्मा के ध्यान में नित्य स्थित रहना ।

     उपरोक्त तीनों ज्ञान प्राप्ति से पूर्व की तैयारी की अवस्थाएं हैं । मनुष्य स्वयं को ज्ञान मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए तैयार कर रहा है । आगे की चार अवस्थाएं ज्ञान प्राप्ति में उत्तरोत्तर हो रही प्रगति को व्यक्त करती है । 

     ज्ञान प्राप्त होने की निम्न चार अवस्थाएं (चौथी से सातवीं) हैं -

      चौथी अवस्था है - सत्वापत्ति अर्थात् सत्व की प्राप्ति । इसको ‘विलापनी’ भी कहा जाता है । इस सोपान पर आते-आते वासना का अत्यन्त अभाव हो जाता है । इस चौथी भूमिका में ब्रह्म-साक्षात्कार से अज्ञान आदि सांसारिक प्रपञ्च की निवृत्ति हो जाती है ।

      पांचवी अवस्था है - असंसक्ति अर्थात् आसक्ति रहित होना । आसक्ति रहित होने से पुरुष को समस्त संसार स्वप्नवत् प्रतीत होता है । इस अवस्था में जीवन्मुक्त पुरुष अर्द्धनिद्रा अर्थात् ‘आधा सोया और आधा जागा’ की अवस्था में रहता है । अर्धसुप्त पुरुष को संसार की जैसी प्रतीति होती है वैसी ही प्रतीति इस ‘ब्रह्मवित’ पुरुष को होती है । यह विशुद्ध चिन्मय आनन्दस्वरूप प्राप्ति की पांचवी भूमिका है ।

      छठी अवस्था है - पदार्थ अभावना अर्थात् पदार्थों (संसार) का अभाव । इस सोपान पर पहुँचने पर पुरुष को एक विज्ञानानन्दघन परमात्मा का ही अनुभव रहता है, संसार का कुछ भी अनुभव नहीं रहता । इस अवस्था को ‘तुर्यावस्था’ भी कहा जाता है । यह शान्तिमय अवस्था है ।

        सातवीं अवस्था है - तुर्यातीत अवस्था । यह विदेह-मुक्ति रूप अवस्था है । इस सोपान पर पहुंचकर पुरुष स्वयं अपनी देह को भी भूल जाता है । यह अवस्था समता, स्वच्छता और सौम्यतारूप है । इस भूमिका में स्थित योगी को ‘ब्रह्मविद् वरिष्ठ’ कहते हैं । यह गाढ सुषुप्ति की अवस्था है । इसमें संसार का अत्यन्त अभाव हो जाता है । छठी अवस्था (तुर्यावस्था) में तो योगी को दूसरे द्वारा जगाये जाने पर प्रबोध होता है किन्तु इस सातवीं भूमिका (तुर्यातीत/तुर्यगा) में स्थित योगी दूसरे के द्वारा जगाये जाने पर भी नहीं जागता क्योंकि वह जीता हुआ भी शव के समान है अर्थात् विदेह की अवस्था को उपलब्ध हो चुका है ।

           प्रथम तीन अवस्थाएं ज्ञान प्राप्ति से पूर्व की अवस्थाएं है, इसलिए जगत् रूप ही है । चौथी अवस्था स्वप्नावस्था है क्योंकि उसमें जगत् स्वप्नवत् प्रतीत होता है । पांचवी अवस्था अर्ध-सुषुप्ति की अवस्था है । इस अवस्था में आनन्द के साथ एकात्मभाव रहता है । अन्य पदार्थों के ज्ञान से सर्वथा रहित हो जाने से छठी भूमिका को ‘तुर्य’ कहा जाता है । इससे आगे की अंतिम अवस्था (तुर्यातीत) है । यह अवस्था मन और वाणी से परे है तथा स्वप्रकाश परब्रह्मरूप ही है ।

      सातवें सोपान तक पहुंचा पुरुष वासनारहित हो जाता है । वासनारहित बुद्धि से जो भी कर्म किए जाते हैं, वे कर्म भूने हुए बीज के सदृश होते हैं । वे फिर अंकुरित नहीं होते अर्थात् भावी जन्म देने वाले नहीं होते ।

         जो पुरुष सातवीं अवस्था तक पहुँच जाता है, वह स्वयं ही ब्रह्म स्वरूप जो जाता है । भगवान गीता में अर्जुन को इस सोपान तक पहुँचे हुए पुरुष के बारे में कहते हैं -

         ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति ।

         सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ।। 18/54 ।।

           वह ब्रह्मभूत बना हुआ प्रसन्न मन वाला न तो किसी के लिए शोक करता है और न ही किसी की इच्छा करता है । ऐसा सम्पूर्ण प्राणियों में समभाव वाला साधक मेरी पराभक्ति को प्राप्त हो जाता है ।

          ब्रह्मभूत होने का अर्थ है, ब्रह्म के साथ तात्त्विक सम्बन्ध हो जाना । ब्रह्मभूत ब्रह्म तो नहीं होता परन्तु ब्रह्म के समान हो जाता है । ज्ञान की यह सर्वोच्च अवस्था है, जोकि मुक्ति की अवस्था भी है । भगवान गीता के सातवें अध्याय में ज्ञानी भक्त को सर्वश्रेष्ठ बताते हुए कहते हैं कि ‘ज्ञानीत्वात्मैव मे मतम्’ अर्थात् मेरे मत में ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है ।

       अब तक हुए विवेचन से आपको भी अनुभव हुआ होगा कि ज्ञान मार्ग से ज्ञान की उच्चावस्था (परमात्मा) तक पहुंचने के लिए कितना तामझाम करना पड़ता है । ज्ञान-मार्ग सुगम नहीं है । यही कारण है कि साधक की बीच रास्ते ही इससे विमुख होने की सम्भावना रहती है । मानस में काकभुशुण्डिजी गरुड़ज़ी को कहते हैं - 

           ग्यान पंथ कृपान कै धारा । परत खगेस होइ नहीं बारा ।।

           जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई । सो कैवल्य परम पद लहई ।। मानस -7/119/1।।

        ज्ञान-मार्ग कृपाण की धार पर चलने के समान है । इससे गिरते देर नहीं लगती । जो इस पंथ को बिना किसी बाधा के निभा ले जाता है वही कैवल्य पद को प्राप्त कर लेता है । प्रायः इस मार्ग में बाधाएँ आती ही हैं क्योंकि जन्म-जन्मों के संस्कारों से मुक्त होना इतना सरल नहीं है । ज्ञान का अहंकार, देहाभिमान और संसार से पूर्ण रूप से विमुख न हो पाना इसमें सबसे बड़ी बाधायें हैं ।

         ज्ञान हमें ज्ञानस्वरूप परमात्मा तक ले जाता है । इससे ज्ञानी मुक्त तो हो जाता है, परन्तु परमात्मा का प्रेम पाने के लिए उसे भक्ति में प्रवेश करना ही होगा । ज्ञान का मार्ग कठिन है, इसकी तुलना में भक्ति का मार्ग बड़ा सरल और सुगम है । सभी मार्गों में भक्ति-मार्ग सबसे सुगम मार्ग है । भक्ति में केवल परमात्मा के अतिरिक्त किसी अन्य के आश्रय और किसी प्रकार के परिश्रम की आवश्यकता ही नहीं है । 

          भागवतजी में भक्त प्रह्लाद भक्ति के नौ भेद बताते हुए अपने पिताजी को कह रहे हैं - 

श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पादसेवनम् ।

अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ।। भागवत - 7/5/23 ।।

       भगवान की भक्ति के नौ भेद हैं - भगवान की गुण-लीला, नाम आदि का श्रवण, उन्हीं का कीर्तन, उनके रूप-नाम आदि का स्मरण, उनके चरणों की सेवा, पूजा-अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन ।

           भक्त प्रह्लाद ने भक्ति के जो नौ भेद बताए है, उनमें से किसी एक को भी जीवन में सिद्ध कर लिया जाये तो भक्ति को उपलब्ध हुआ जा सकता है । इन नौ प्रकार की भक्ति को नवधा-भक्ति कहा जाता है ।

          भागवतजी में ज्ञान और वैराग्य को भक्ति के पुत्र बताया गया है । भक्ति इन दोनों की मां है अर्थात् ज्ञान और वैराग्य का जन्म भक्ति की कोख से ही हुआ है । इसका अर्थ है कि जिसमें भक्ति का संचार हुआ है उसमें ज्ञान और वैराग्य का आगमन स्वतः ही हो जाता है । उसे अतिरिक्त परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं होती । 

          ज्ञान से वैराग्य पैदा होता है और वैराग्य से कर्म-योग सिद्ध होता है । कर्म और ज्ञान-योग के सिद्ध होते ही जीव में भक्ति का उदय हो जाता है; परंतु इस मार्ग में परिश्रम और समय अधिक लगता है । परिश्रम के लिए शरीर और संसार का आश्रय लेना पड़ता है, जिससे मुक्ति के बाद भी आंशिक रूप से बंधन में बंधे रहने की संभावना बनी रहती है । इस बंधन का कारण होता है, ज्ञान का अहंकार, संसार में अन्यों से अपने आपको श्रेष्ठ मान लेने का अभिमान ।

          भक्ति में ऐसा बिलकुल भी नहीं है । भक्ति में केवल परमात्मा का आश्रय लेना होता है जिससे संसार और शरीर से स्वतः मुक्ति हो जाती है । भक्ति में अहंकार का कोई स्थान नहीं रहता क्योंकि जब सब कुछ परमात्मा ही है तो कौन तो श्रेष्ठ है और वह किससे श्रेष्ठ होगा ? यही बात मुक्ति (ज्ञान) पर भक्ति को वरीयता प्रदान करती है ।

          विवेचन की दृष्टि से मुक्ति पर भक्ति भारी पड़ती दिख रही है क्योंकि भक्ति में मुक्ति भी है और परमात्मा से/का प्रेम भी । ज्ञान का अंतिम लक्ष्य केवल संसार से मुक्त होकर परमात्मा में विलीन हो जाना है । इसलिए ज्ञान को मुक्ति का मार्ग तो कहा जाता है परंतु इसमें भगवान का प्रेम उपलब्ध नहीं होता । अद्वैत सिद्धांत को मानने वाले के लिए ज्ञान-मार्ग ही सही मार्ग है । परन्तु इसमें दो की उपस्थिति (एक ज्ञानी और दूसरा ज्ञेय) तब तक बनी रहती है, जब तक कि भौतिक शरीर गिर नहीं जाता । परमात्मा में विलीन होने के पश्चात् ही एक रहता है, उससे पहले नहीं ।

           प्रेम करने/पाने के लिए दो का होना आवश्यक है - एक प्रेम करने वाला और दूसरा प्रेम पाने वाला । इसलिए द्वैत सिद्धान्त में विश्वास करने वालों के लिए भक्ति-मार्ग को श्रेष्ठ बताया गया है, एक भक्त और दूसरा भगवान । वास्तव में भक्ति-मार्ग अंततः अद्वैत को ही पुष्ट करता है क्योंकि भक्त की दृष्टि में एक भगवान के अतिरिक्त कोई दूसरा होता ही नहीं है । ऐसी भक्ति में आख़िर द्वैत कहाँ तक टिक पाएगा ? 

       भक्ति में जो एक होकर फिर से दो हुआ जाता है वह परमात्मा को प्रेम करने के लिए तथा उससे प्रेम पाने के लिए होता है न कि द्वैत सिद्धांत के अनुसार । चने के बीज की तरह, आधे-आधे दोनों भाग, एक दूसरे से अभिन्न, मूल स्थान से जुड़कर एकाकार हुए । भक्त और भगवान एक दूसरे से भिन्न प्रतीत होते हुए भी वास्तव में अभिन्न हैं । 

          मेरी दृष्टि में आज के समय में ज्ञान को अधिक महत्व दिया जा रहा है इसलिए ज्ञान-मार्ग पर चलते हुए भक्ति को उपलब्ध होना ही श्रेष्ठ है । मेरा अनुभव यही कहता है कि बिना भक्ति के ज्ञान अकेला मूल्यहीन है ।

          ज्ञान और भक्ति की इस चर्चा में कर्म विषय पर बात नहीं की जाए तो अपूर्णता रहेगी । गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने ज्ञान और कर्म-मार्ग में कुछ भी अंतर नहीं माना है । दोनों को ही लौकिक बताया है, जबकि भक्ति को अलौकिक । कर्म में ज्ञान और ज्ञान में कर्म, दोनों एक दूसरे के सहयोगी है और दोनों ही परमात्मा की ओर ले जाने वाले हैं । 

            कर्म-योग में सेवा के लिए कर्म करते हुए राग अर्थात् आसक्ति को समाप्त करना होता है । ज्ञान में प्रकृति से सम्बन्ध विच्छेद करते हुए वैराग्य को उपलब्ध होना है । राग अर्थात् संसार और उसके पदार्थों से आसक्ति समाप्त होना ही वैराग्य है जिससे मनुष्य संसार से मुक्त हो जाता है । जब तक जीव को ज्ञान नहीं होता तब तक कर्म-रहस्य को वह समझ नहीं पाएगा । एक बार कर्मों का स्वरूप समझ में आ गया तो कर्म-योग के माध्यम से संसार की सेवा होगी और ज्ञान-योग से वैराग्य का जन्म होगा । 

          मुख्य बात जो इस लेख में हुई विवेचना से निकल कर सामने आई है, वह यह है कि ज्ञान श्रेष्ठ है परन्तु यदि ज्ञान से भक्ति को उपलब्ध हो जाएं तो वह मार्ग सर्वश्रेष्ठ है । मुक्ति और भक्ति, दोनों में से किसी एक को चुनना हो तो मैं भक्ति को चुनूँगा परन्तु ज्ञान के रास्ते से होकर, जिससे मुक्ति के साथ-साथ परमात्मा से प्रेम भी हो जाए और साथ ही उनके प्रेम का कृपापात्र भी बन सकूं ।

सार-संक्षेप 

        गीता को मुख्य रूप से कर्म-योग का ग्रन्थ कहा गया है क्योंकि इसमें ज्ञान एक गृहस्थ (अर्जुन) को दिया गया है । गृहस्थ जीवन में अपना कर्तव्य निभाने और जीविकोपार्जन के लिए कर्म करने आवश्यक हैं । इन कर्मों को करते हुए भी परमात्मा से योग को उपलब्ध हुआ जा सकता है । कर्मों को करने में जब तक राग रहेगा तब तक योग की ओर जाना संभव नहीं है । वैराग्य ज्ञान से पैदा होता है । ज्ञानपूर्वक कर्म ही रागरहित हो सकते हैं, बिना ज्ञान के तो फलासक्ति सकाम कर्मों की ओर ही ले जाएगी ।

        मनुष्य बिना किसी बन्धन के स्वतंत्र ही पैदा होता है परन्तु विभिन्न भोगों की आसक्तियों में फँसकर संसार के साथ बंध जाता है । कर्म और ज्ञान की रागरहित राह हमें इस संसार से मुक्त करती है । इसलिए कर्म और ज्ञान, दोनों ही रास्तों को लौकिक कहा गया है । लौकिक मार्गों में पराश्रय और परिश्रम की आवश्यकता रहती है । इन दोनों से भी मुक्त होना आवश्यक है । इसके लिए भक्ति की राह सर्वोत्तम है । भक्ति में केवल एक भगवान का ही आश्रय है और साथ ही विश्राम भी ।

           सीधे परमात्मा की शरण ले लेना आज के युग में लगभग असंभव सा है क्योंकि मनुष्य परिश्रम करते हुए कर्म और ज्ञान के स्तर पर जाकर ही सब कुछ पाना चाहता है । वह परमात्मा के प्रति समर्पण को भी एक क्रिया मानने लगा है । परमात्मा की शरण में जाने को एक क्रिया मान लेने से कभी भी शरणागत नहीं हुआ जा सकता । अतः इस युग में ज्ञान और कर्म के माध्यम से वैराग्य को उपलब्ध हो भक्ति की राह पकड़ शरणागत हो जाना ही सर्वोत्तम मार्ग है । 

         ज्ञान मुक्ति तो प्रदान करता है परन्तु परमात्मा से/के प्रेम के लिये भक्ति आवश्यक है । इसलिए साधना में लगे मनुष्य के लिए आवश्यक है कि गुरु के सानिध्य में ज्ञान प्राप्त करते हुए भक्ति की राह पर चले । गीता में भगवान ने भी कहा है - ‘ज्ञानी-भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय है । वह तो साक्षात् मेरा ही स्वरूप है ।’ इस विवेचन का सार है कि यदि मुक्ति के साथ-साथ परमात्मा का प्रेम भी चाहिए तो ज्ञानी-भक्त होने का प्रयास कीजिए अन्यथा ज्ञान से मुक्ति तो स्वतः सिद्ध है ।

          इसी के साथ ‘मुक्ति अथवा भक्ति’ लेख के समापन की आज्ञा चाहूँगा । अन्त तक साथ बने रहने के लिए आपका आभार ।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

Monday, March 30, 2026

ज्ञान - बन्धन या मुक्ति

 ज्ञान - बंधन या मुक्ति 

        ज्ञान एक ऐसा शब्द है जो अपनी उपस्थिति, अभिव्यक्ति तथा आचरण के अनुसार अपना अर्थ बदलता रहता है । यही कारण है कि अज्ञान का अर्थ ज्ञान की अनुपस्थिति नहीं है बल्कि विपरीत ज्ञान होने को अज्ञान कहा जाता है । अज्ञान का अस्तित्व ज्ञान पर ही टिका है अन्यथा अज्ञान का स्वयं का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है । यह ठीक ऐसे ही है जैसे अंधकार स्वयं का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है बल्कि उसका अस्तित्व प्रकाश पर टिका होता है ।

        वास्तविक ज्ञान वह है, जो मुक्ति का साधन बनता है और वह साधन तभी बनता है जब उसको आचरण में लाते हुए जीवन को उसी अनुरूप बनाया जाए । आचरण में लाया ज्ञान स्वयं बोलता है, व्यक्ति को बोलने की ज़रूरत नहीं होती । बिना उपयोग में लाए ज्ञान को बोझ कहा गया है । उपयोग में लाया ज्ञान कहें अथवा ज्ञान का सदुपयोग करना कहें, दोनों एक ही बात है । ऐसा सदुपयोग किया ज्ञान ही विवेक कहलाता है ।

   ज्ञान सभी जीवों में जन्मजात होता है फिर भी कुछ जीवनभर अज्ञानी बने रह जाते हैं और कोई कोई एक ज्ञानी हो जाता है । आइए ! जानते हैं कि ज्ञान बंधन नहीं है बल्कि मुक्ति का साधन है । हम इस ज्ञान को विवेक बनाकर कैसे उपयोग में ले सकते हैं, यह हमारे ऊपर निर्भर है ।

        ज्ञान और विवेक, दोनों पर्यायवाची शब्द कहे जाते हैं, जिनको समान अर्थ के रूप में लिया जाता है । सत्य तो यह है कि दो शब्द समान अर्थ से प्रतीत होते हुए भी समान नहीं हैं । शब्दों का एक समान अर्थ होते हुए भी स्थानानुसार अलग-अलग शब्द उपयोग में लिए जाते हैं । उदाहरणार्थ - पानी और जल समानार्थी हैं परंतु स्थान के अनुसार इनका अलग अलग उपयोग किया जाता है । जैसे पानी पिया जाता है और जल शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है । ज्ञान और विवेक भी ऐसे ही दो शब्द हैं । ज्ञान प्रत्येक को है परंतु विवेक किसी किसी में होता है । ज्ञान शास्त्र पढ़कर, उन्हें कंठस्थ कर व्यक्त किया जा सकता है परंतु उपयोग में लिए बिना ऐसा ज्ञान केवल तोता-रटन्त के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । ज्ञान का सदुपयोग करना विवेक कहलाता है । ज्ञान यदि कोरा और किताबी है तो वह बँधनकारी है । जो ज्ञान व्यक्ति को मुक्त करदे वही वास्तविक ज्ञान (विवेक) है ।

“सा विद्या या विमुक्तये - ज्ञान वही है जो मनुष्य को मुक्त कर दे ।” (विष्णु पुराण - 1/19/41)

            जिसने ज्ञान का उपयोग नहीं किया वह बद्धज्ञानी है और जिसने इसका सदुपयोग कर लिया वह मुक्तज्ञानी है । बद्धज्ञानी बातें तो लम्बी लंबी करेगा लेकिन उसका मुक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं होगा । मुक्तज्ञानी अव्वल तो बोलेगा ही नहीं और यदि बोला भी तो उसकी वाणी ब्रह्मज्ञान तक ले जाने वाली होगी क्योंकि उसने ज्ञान को जीया है, रटा नहीं । 

          आधुनिक विज्ञान की कई पुस्तकें हैं फिर भी शिष्य को शिक्षक के मार्गदर्शन में प्रयोगशाला में उन पुस्तकों में समाहित ज्ञान को सिद्ध करना होता है । उदाहरणार्थ - रसायन विज्ञान में हाइड्रोजन गैस बनाने की विधि लिखी है कि जस्ते ( Zinc) के टुकड़े पर जब कोई भी अम्ल (Acid) डाला जाता है तो हाइड्रोजन गैस बनती है । जिस विद्यार्थी ने प्रयोगशाला में अपने हाथों से इस ज्ञान को सिद्ध कर लिया वास्तव में केवल उसी ने उस विधिक ज्ञान को अनुभव किया है । 

            पूर्वकाल में हमारे गुरुकुल शास्त्रीय ज्ञान को अनुभव कराने की प्रयोगशाला हुआ करते थे जहां हमारे ऋषिगण अपने शिष्यों को ज्ञान का अनुभव कराते थे । दुर्भाग्य से आज गुरुकुल लगभग समाप्त हो गए हैं । इसका परिणाम यह हुआ कि शास्त्रों को कथा बनाकर कहने वालों की तो भीड़ बढ़ गई और उन शास्त्रों में समाहित ज्ञान को अनुभव करा सकने वाले ऋषियों का अकाल पड़ गया । 

       सत्य की खोज में सबसे बड़ी बाधा यह भ्रम है कि हम पहले से ही सबकुछ जानते हैं । सीखने और जानने में बड़ा अन्तर है । सीखना मात्र ज्ञान है और उस ज्ञान का अनुभव कर लेना जानना है । हरिः शरणम् आश्रम के आचार्य श्री गोविन्दराम जी शर्मा कहते हैं - “सीखे हुए ज्ञान में ही अनुभव छिपा हुआ है । खोज करें ।” यह खोज तभी होगी, जब उस सीखे हुए ज्ञान का जीवन में प्रयोग करेंगे । प्रयोग से ही उस ज्ञान की उपयोगिता सिद्ध होगी । सबके पास ज्ञान पर्याप्त है । उस ज्ञान को उपयोग में जो कोई ले लेता है, उसको आत्म-ज्ञान हो जाता है, वह सत्य तक पहुँच जाता है ।

          ज्ञान कहीं से उधार नहीं लेना पड़ता । हमारे भीतर ज्ञान पर्याप्त मात्रा में है जो अज्ञान से ढककर भीतर कहीं गहरे दबा पड़ा है । हम ज्ञान के नाम पर अज्ञान में जी रहे हैं । उस अज्ञान को ज्ञान कह देने से वह ज्ञान नहीं हो जाता । जब तक हम सीखे और सुने हुए ज्ञान को केवल किताबी बातें मानते रहेंगे, तब तक हमारा कल्याण नहीं हो सकता । उस ज्ञान के भीतर डुबकी लगाने से ही हमारा जीवन सुधरेगा अन्यथा केवल लच्छेदार बातें लिखते, कहते और सुनते ही रहेंगे ।

           कबीर कहते हैं -

               ब्राह्मण है गुरु जगत का, साधु का गुरु नाहीं ।

               उलझ उलझ कर मरि रह्या, चारिउ वेदा माहीं ।।

          ब्राह्मण ने चारों वेदों को पढ़ा है, उन्हें रट भी लिया हैं परंतु उन अनुसार उसने अपना जीवन नहीं बनाया है । वह अपने ज्ञान से संसार को प्रभावित कर सकता है परन्तु किसी साधु को नहीं । साधु ने भले ही वेद नहीं पढ़े हों, फिर भी उसका सहज जीवन ब्राह्मण के ज्ञान से भी बहुत ऊँचा है । इसलिए ज्ञान को केवल पढ़ने और रट लेने से कुछ नहीं होना है । यह केवल शास्त्रों में उलझ कर रह जाना है, इससे तो मुक्त नहीं हुआ जा सकता । मुक्त होने के लिए तो ज्ञान को जीना होता है ।

         प्राचीन काल में शास्त्रार्थ हुआ करते थे । ये शास्त्रार्थ ज्ञान में अनुभवसिद्ध पुरुषों के मध्य हुआ करते थे । इसका लाभ यह होता था कि शास्त्रार्थ में भाग लेने वालों के साथ-साथ श्रोताओं को भी इसका लाभ मिलता था । भारत में पुरुषों के साथ ही महिला दार्शनिकों तथा साध्वियों की भी एक लम्बी परंपरा रही है । गार्गी, मैत्रेयी, वाक्, घोषा, अपाला आदि इसके उदाहरण है । आज ज्ञान के प्रसंग में हम गार्गी और मैत्रेयी की बात करेंगे । गार्गी का पूरा नाम गार्गी वाचकन्वी है, वे गर्गवंशी ऋषि वचकन्व की पुत्री थी । इसी प्रकार मैत्रेयी ऋषि ‘मित्र’ की पुत्री और ऋषि याज्ञवल्क की पत्नी थी । दोनों ही ब्रह्मज्ञानी थी ।

          एक बार राजा जनक ने अपने यहाँ शास्त्रार्थ का आयोजन किया । उन्होंने राजद्वार पर सोने की मोहरों से मढ़े सींगों वाली एक सहस्र गाएं खड़ी कर दी और घोषणा कर दी कि जो भी शास्त्रार्थ में जीतेगा, वह इन गौओं को पाने का अधिकारी होगा । शास्त्रार्थ चल रहा था परन्तु अभी तक कोई निर्णय न हो सका था । सुबह से राजद्वार पर खड़ी गाएँ भूख-प्यास से थकने लगी थी । तभी ऋषि याज्ञवल्क्य जी का वहाँ आना हुआ । गौओं को ले जाने की शर्त सुनकर उन्होंने अपने शिष्यों को उन थकीहारी गौओं को हांककर अपने आश्रम ले जाने का आदेश दिया । इस बात का शास्त्रार्थ में उपस्थित कई लोगों ने विरोध किया । 

          याज्ञवल्क्य की बात का प्रतिकार करने के लिए विदुषी गार्गी सामने आई । उसने उपस्थित सभी लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि मैं याज्ञवल्क्य जी से कुछ प्रश्न करूँगी । यदि उन्होंने उन प्रश्नों के उत्तर दे दिए तो फिर इस सभा में उपस्थित कोई भी इनको नहीं हरा सकेगा और वे इन गायों को लेने के अधिकारी होंगे ।

            तत्पश्चात् गार्गी ने याज्ञवल्क्यजी से कई प्रश्न किए । इन प्रश्नोत्तरों का विस्तार से वर्णन बृहदारण्यक उपनिषद् में मिलता है । याज्ञवल्क्यजी से शास्त्रार्थ प्रारम्भ करते हुए गार्गी ने पूछा कि हे ऋषिवर ! क्या आप अपने को सबसे बड़ा ज्ञानी मानते हैं, जो आपने गायों को हांकने के लिए अपने शिष्यों को आदेश दे दिया ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर देते हुए कहा कि मां ! मैं स्वयं को ज्ञानी नहीं मानता क्योंकि ‘‘मैं सबसे बड़ा ज्ञानी हूँ” ऐसा कोई अज्ञानी ही कह सकता है । ये गौएँ सुबह से यहाँ खड़ी-खड़ी थककर परेशान हो गई हैं, इस कारण इन गायों को देखकर मेरे मन में मोह उत्पन्न हो गया है । उत्तर सुनकर गार्गी ने कहा कि आपको मोह हुआ, लेकिन इस पुरस्कार को प्राप्त करने के लिए यह तो कोई योग्य कारण नहीं है । सभी सभासदों की आज्ञा हो तो मैं आपसे कुछ प्रश्न पूछना चाहूंगी । यदि आप इनके संतोषजनक जवाब दे पाएंगे तो आप इन गायों को निश्चित ही ले जा सकते हैं । 

            उपस्थित सभी सभासदों की सहमति मिलते ही गार्गी ने ऋषि याज्ञवल्क्य जी को संबोधित करते हुए प्रश्न पूछने प्रारंभ किए । गार्गी का प्रश्न: 'हे ऋषिवर ! जल के बारे में कहा जाता है कि हर पदार्थ इसमें घुलमिल जाता है तो यह जल स्वयं अंततः किसमें जाकर मिल जाता है ?’ गार्गी का यह पहला प्रश्न बहुत ही सरल था । याज्ञवल्क्यजी जैसे ज्ञानी से इतना सरल प्रश्न करना उनकी गरिमा के अनुकूल भी नहीं था फिर भी उन्होंने इसका उत्तर देते हुए कह दिया कि जल अन्तत: वायु में ओतप्रोत हो जाता है । तभी गार्गी ने पूछ लिया कि फिर वायु किसमें जाकर मिल जाती है और याज्ञवल्क्य का उत्तर था कि अंतरिक्ष लोक में ।

              गार्गी यहीं पर ही नहीं रूकी । वह याज्ञवल्क्य के द्वारा दिए गए प्रत्येक उत्तर को फिर से एक नए प्रश्न में बदलती गई और इस तरह गंधर्व लोक, आदित्य लोक, चन्द्रलोक, नक्षत्र लोक, देवलोक, इन्द्रलोक, प्रजापति लोक और यहाँ तक कि ब्रह्मलोक तक भी जा पहुंची और अन्त में गार्गी ने अति महत्वपूर्ण प्रश्न पूछ ही लिया कि यह ब्रह्मलोक किसमें जाकर मिल जाता है ?

            ब्रह्मलोक का न आदि है और न ही अन्त । ऐसा प्रश्न करना गार्गी की प्रतिभा के अनुसार उचित भी नहीं था । गार्गी पर क्रोधित होकर याज्ञवक्ल्य ने कहा, 'गार्गी, माति प्राक्षीर्मा ते मूर्धा व्यापप्त्त्’ अर्थात् गार्गी, इतने प्रश्न मत करो, कहीं ऐसा न हो कि इससे तुम्हारा मस्तक फट जाए । अच्छा वक्ता वही होता है जिसे पता होता है कि कब बोलना और कब चुप रहना है और गार्गी अच्छी वक्ता थी इसीलिए क्रोधित याज्ञवल्क्य की फटकार भी चुपचाप सुनती रही ।

       गार्गी को अपने प्रतिद्वन्द्वी यानी याज्ञवल्क्य से अब आगे केवल दो ही प्रश्न पूछने हैं । इस प्रकार उपरोक्त प्रश्न पूछते हुए गार्गी ने अगले प्रश्न के लिए बड़ी ही अच्छी भूमिका बांधी है ।

           गार्गी अब अपने दो प्रश्न पूछ रही है । 'ऋषिवर सुनो ! जिस प्रकार काशी या मिथिला का नरेश एक साथ दो अचूक बाणों को धनुष पर चढ़ाकर अपने दुश्मन पर लक्ष्य साधता है, वैसे ही मैं भी आपसे केवल दो ही प्रश्न पूछती हूँ ।’ गार्गी बड़ी ही आक्रामक मुद्रा में आ गई । याज्ञवल्क्य ने कहा- ‘हे गार्गी, जितने भी प्रश्न पूछने हैं, सब पूछ डालो ।’

           गार्गी ने एक साथ दो प्रश्न पूछ डाले - 'स्वर्गलोक से ऊपर जो कुछ भी है और पृथ्वी से नीचे जो कुछ भी है और इन दोनों के मध्य जो कुछ भी है - वह, तथा जो हो चुका है और जो अभी होना है, ये दोनों किसमें ओतप्रोत हैं ?'

           गार्गी का पहला प्रश्न 'स्पेस' (अंतरिक्ष) और दूसरा 'टाइम' (समय) के बारे था । स्पेस और टाइम के बाहर भी कुछ है क्या ? नहीं है, इसलिए गार्गी ने बाण की तरह पैने इन दो प्रश्नों के जरिए यह पूछ लिया कि सारा ब्रह्माण्ड किसके अधीन है ?

        याज्ञवल्क्य ने कहा- ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गी।’ अर्थात् हे गार्गी ! कोई अक्षर, अविनाशी तत्व है जिसके प्रशासन में, अनुशासन में सभी कुछ ओतप्रोत है । गार्गी ने पूछा कि यह सारा ब्रह्माण्ड किसके अधीन है तो याज्ञवल्क्य का उत्तर था- अक्षर तत्व के । इस बार याज्ञवल्क्य ने उपस्थित सभासदों को अक्षरतत्व के बारे में विस्तार से समझाया ।

          इस बार गार्गी अपने प्रश्नों के जवाब से इतनी प्रभावित हुई कि जनक की राजसभा में उसने याज्ञवल्क्य को परम ब्रह्मिष्ठ मान लिया । इसके बाद गार्गी ने याज्ञवल्क्य की प्रशंसा कर अपनी बात खत्म की तो सभी ने माना कि गार्गी में जरा भी अहंकार नहीं है । गार्गी ने याज्ञवल्क्य को प्रणाम किया और सभा से विदा ली । गार्गी का उद्‍येश्य ऋषि याज्ञवल्क्य को हराना नहीं था बल्कि अपने ज्ञान में अभिवृद्धि करना था ।

         जैसे कि पहले ही कहा गया है कि गार्गी वेदज्ञ और ब्रह्मज्ञानी थी, वे सभी प्रश्नों के जवाब जानती थी । यहां इस कहानी को बताने का तात्पर्य यह है कि अर्जुन के प्रश्नों से जैसे श्रीमदभगवद्गीता अस्तित्व में आई वैसे ही गार्गी के प्रश्नों के कारण 'बृहदारण्यक उपनिषद्' के मंत्रों का निर्माण हुआ ।

          प्रस्तुत है गार्गी और याज्ञवल्क्य के मध्य हुए कुछ अन्य प्रश्न और उत्तर, संवाद रूप में, जिनका वर्णन बृहदारण्यक उपनिषद् में विस्तार से किया गया है । ये प्रश्न आत्म-बोध की यात्रा में एक गृहस्थ का मार्गदर्शन करते हैं । गार्गी पूछ रही है कि महात्मन् ! ऐसा माना जाता है, स्वयं को जानने के लिए, आत्म-बोध के लिए ब्रह्मचर्य अनिवार्य है परन्तु आप तो ब्रह्मचारी नहीं हैं । आप स्वयं के दो दो पत्नियां हैं । क्या ऐसा नहीं लगता कि आप एक अनुचित उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं ?

           प्रश्न का उत्तर देने के स्थान पर याज्ञवल्क्य जी गार्गी से ही प्रतिप्रश्न करते हैं, ‘गार्गी ! ब्रह्मचारी कौन होता है ?’ गार्गी कहती है कि ब्रह्मचारी वह है, जो परम सत्य की खोज में लगा है । ‘फिर तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि एक गृहस्थ परम सत्य तक नहीं पहुँच सकता ।’ याज्ञवल्क्य ने पूछा । गार्गी कहती है कि ब्रह्मचारी स्वतंत्र होता है और गृहस्थ बंधन में । केवल स्वतन्त्र ही परमसत्य की खोज कर सकता है । विवाह को तो बन्धन कहा जाता है । याज्ञवल्क्य फिर प्रश्न करते हैं, ‘ क्या विवाह बन्धन है ?’ गार्गी ने कहा -‘निःसंदेह’ क्योंकि वैवाहिक जीवन में व्यक्ति को औरों का भी ध्यान रखना पड़ता है । पहले पत्नी की चिंता, फिर संतान की चिंता । इस प्रकार सांसारिक चिंताओं से घिरे व्यक्ति को आत्म-चिंतन के लिए समय ही कहाँ मिल पाता है ऐसे में वह मुक्त कैसे हो पाएगा ?’ 

          याज्ञवल्क्यजी ने कुछ देर सोचा और गार्गी से फिर एक प्रश्न किया । ‘किसी की चिंता करना बन्धन है या प्रेम ?’ गार्गी को ऐसे प्रश्न की अपेक्षा नहीं थी । वह बोली - ‘प्रेम भी तो एक बन्धन है, महर्षि ।’ महर्षि ने कहा - ‘नहीं गार्गी, सच्चा प्रेम हो तो मुक्त कर देता है । जब प्रेम में स्वार्थ प्रबल हो जाता है तो वह बंधन बन जाता है । इसलिए समस्या प्रेम नहीं है बल्कि स्वार्थ पर आधारित प्रेम है ।” गार्गी ने कहा - ‘प्रेम सदा स्वार्थ पर ही आधारित होता है, महर्षि ।’

        “नहीं, ऐसी बात नहीं है, गार्गी । प्रेम से जब आकांक्षाएँ जुड़ने लगती है, तब स्वार्थ का जन्म होता है । जिस प्रेम में अपेक्षाएं न हो, जो प्रेम केवल देना जानता हो, केवल वही प्रेम मुक्त करता है ।” याज्ञवल्क्य ने गार्गी को स्पष्ट किया । गार्गी ने कहा - ‘सुनने में आपके शब्द प्रभावित अवश्य करते हैं महर्षि, परंतु क्या आप ऐसे निःस्वार्थ प्रेम का कोई उदाहरण दे सकते हैं ?’

     याज्ञवल्क्यजी कह रहे हैं, “आँखें खोलो गार्गी और देखो, यह सारा जगत् निःस्वार्थ प्रेम का जीता जागता प्रमाण ही तो है । सूर्य से किरणों के माध्यम से मिल रही ऊर्जा पृथ्वी पर जीवन उत्पन्न करती है । यह पृथ्वी सूर्य से कुछ माँगती है क्या ? यह तो सूर्य के प्रेम में खिलना जानती है । न ही सूर्य पृथ्वी पर अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास करता है और न ही बदले में पृथ्वी से कुछ चाहता है । सूर्य तो स्वयं को जलाकर समस्त संसार को जीवन देता है । यही निःस्वार्थ प्रेम है गार्गी ।” 

         याज्ञवल्क्य आगे कह रहे हैं - “सुनो गार्गी, प्रकृति और पुरुष की यह लीला उनके आपसी सच्चे प्रेम का प्रतिफल है । हम सभी उसी प्रकृति और पुरुष के निःस्वार्थ प्रेम से ही उत्पन्न हुए हैं, फिर सत्य को खोजने में कैसी बाधा ?” 

           इन उत्तरों को सुनकर गार्गी पूर्णतः संतुष्ट हो जाती है और कहती है, ‘मैं अपनी पराजय स्वीकार करती हूँ ।’ याज्ञवल्क्य कहते हैं “इसमें जय-पराजय की बात ही नहीं है गार्गी ! प्रश्न पूछने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए क्योंकि प्रश्न पूछे जाते हैं, तभी उत्तर सामने आते हैं, जिनसे यह संसार लाभान्वित होता है ।”

         प्रत्येक संवाद (वाद-विवाद नहीं) का अच्छा परिणाम निकल कर सामने आता है । इस शास्त्रार्थ से भी गार्गी और याज्ञवल्क्यजी, दोनों को लाभ हुआ । गार्गी से हुए शास्त्रार्थ के पश्चात् याज्ञवल्क्य जी अपने आश्रम पहुँच जाते हैं । उन्हें पूर्ण वैराग्य हो जाता है और वे समस्त सम्पति को अपनी दोनों पत्नियों में आधी-आधी बांटकर वन में प्रस्थान करना चाहते हैं । याज्ञवल्क्यजी के दो पत्नियाँ थीं - मैत्रेयी और कात्यायनी । मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी, जिसने अपने पति के साथ बैठकर आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया था । मैत्रेयी ने सम्पति का मिला अपना आधा भाग भी कात्यायनी को दे दिया और कहा कि मैं भी वन में जाऊँगी क्योंकि वह जानती थी कि बृह्मविद्या के सामने भौतिक सुख-सम्पति सब तुच्छ है । वृहदारण्यक उपनिषद् में मैत्रेयी का अपने पति के साथ हुए रोचक संवाद का वर्णन भी मिलता है ।

        कात्यायनी तो एक सुशील गृहस्थ नारी थी, वह तो सम्पति पाकर संतुष्ट हो गई परंतु मैत्रेयी के भीतर संपत्ति और ब्रह्मज्ञान को लेकर बड़ा अंतर्द्वंद्व छिड़ गया । इस ऊहापोह में अटकी पत्नी को छोड़कर जब याज्ञवल्क्य वन को जाने लगे तो मैत्रेयी पूछ बैठी - ‘नाथ ! आपकी इस सम्पति की बात को छोड़ दीजिए, यदि मुझे सारे विश्व की सम्पति भी मिल जाए तो क्या मैं अमर हो सकती हूँ अर्थात् क्या मुझे उसको पाकर अमरता का अनुभव हो सकता है ?’ याज्ञवल्क्यजी का उत्तर था - ‘नहीं देवी, धन से अमरत्व प्राप्त नहीं होता ।’

            याज्ञवल्क्य कह रहे हैं - ‘पति, पत्नी, पुत्र, मित्र, धन आदि को हम इसलिए प्रिय मानते हैं क्योंकि उनसे हमें आत्मिक सुख मिलता है । जब हमें उनसे सुख मिलने की आशा समाप्त हो जाती है, उनसे प्रियता भी खो जाती है । इसका अर्थ है कि हम सर्वाधिक प्रेम स्वयं (आत्मा) से ही करते हैं । इसलिए केवल अपने आप (आत्मा) को ही जानने का प्रयास करो । आत्म-ज्ञान ही अमरत्व का एक मात्र मार्ग है । जब आत्मा का ज्ञान हो जाता है तो सब कुछ जान लिया जाता है । आत्म-ज्ञान से द्वैत भाव समाप्त हो जाता है, जैसे नमक जल में घुलकर अलग नहीं दिखता वैसे ही आत्मा ब्रह्म में एकाकार हो जाती है ।’

           मैत्रेयी इतना सब जानकार आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हो गई और भौतिक सम्पति को तुच्छ समझकर अपने पति के साथ वन में चली गई । इससे सिद्ध होता है कि गृहस्थ जीवन में भी आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हुआ जा सकता है । अतः गृहस्थ जीवन को बाधा न समझें बल्कि एक अच्छा अवसर जानें ।

           घर-संसार छोड़ देने से आत्म-ज्ञान हो ही जाएगा आवश्यक नहीं है परन्तु आत्म-ज्ञान हो जाने से घर-संसार स्वतः छूट जाएगा, यह पक्की बात है । इसका अर्थ है कि यदि गृहस्थ जीवन में रहते हुए ज्ञान का सदुपयोग किया जाए तो मुक्त हुआ जा सकता है । गृहस्थ जीवन में आसक्त होकर जीना ही बंधन है । प्राचीन समय में अनेकों ऋषि-मुनि भी गृहस्थ होते हुए भी अनासक्त होकर मुक्ति को उपलब्ध हुए हैं । गृहस्थ आश्रम केवल उन्हीं के लिए बन्धन है जो आपस में एक दूसरे से स्वार्थ के कारण बंधे हैं । जहां पर भी थोड़ी सी ठेस स्वार्थ की पूर्ति में लगती है कि परिस्थितियां बदल जाती है । इन परिस्थितियों के कारण ही जीवन-गाड़ी के दोनों पहिए आपसी संतुलन क़ायम नहीं रख पाते और गाड़ी लड़खड़ा जाती है ।

              प्रेम में समरसता होती है, स्वार्थ नहीं । जहां पर स्वार्थ आड़े आ जाता है, समरसता नहीं रह पाती और प्रेम खो जाता है । गृहस्थ जीवन में दोनों पक्षों की समरसता ही दोनों के भेद को समाप्त कर देती है जिससे उनके दो होने का अनुभव ही समाप्त हो जाता है । फिर वे दो होते हुए भी एक होना प्रतीत होते हैं । ऐसी समरसता तभी आ सकती है, जब जीवन में केवल किताबी ज्ञान को ही महत्व न मिले बल्कि उस ज्ञान के अनुसार अपना जीवन बना लें । ज्ञान को जीवन में उतार लेना ही विवेक है । विवेकपूर्ण जीवन ही व्यक्ति के कल्याण का मार्ग खोलता है । चाहे हम किसी भी आश्रम में यात्रा कर रहे हों, जीवन को विवेकपूर्ण ढंग से जीना ही आत्म-साक्षात्कार करा देता है ।             

                      विवेकपूर्ण गृहस्थ जीवन कोई बन्धन नहीं है । हमारे ऋषियों ने जीवन के जो चार भाग किए हैं, उन्हें आश्रम कहा जाता है - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास । यदि हम अपना जीवन इन्हीं चार आश्रम की अवस्थाओं को ध्यान में रखकर जिएँ तो फिर कोई भी अवस्था हमें बांध नहीं सकती । समस्या तो तब पैदा होती है, जब हम गृहस्थ जीवन से मुक्त ही नहीं होना चाहते । गृहस्थ जीवन के प्रति ऐसी आसक्ति के कारण ही गृहस्थ जीवन को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है अन्यथा यह जीवन मुक्ति के लिए सबसे श्रेष्ठ माना गया है ।

          एक आश्रम से दूसरे आश्रम में प्रवेश करने के लिए द्वार को भीतर की ओर खोलना होता है । इसका अर्थ है, बाहर के संसार से भीतर की (आत्मा की) ओर गति करना । गृहस्थ से वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करने के लिए हम इसके विपरीत, द्वार को बाहर की ओर खोलने का प्रयास करते हैं अर्थात् पुनः संसार की ओर गति करना चाहते हैं । यही हमारे जीवन की सबसे बड़ी भूल है ।

         गृहस्थ जीवन सदैव के लिए नहीं है, यह स्वीकार कर लेना सबसे महत्वपूर्ण है । इसमें ज्ञान की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है जो हमें यह सिखलाता है कि गृहस्थी में रहते हुए कैसे जीना है ? प्रत्येक स्वार्थ से ऊपर उठकर, वास्तविक प्रेम के साथ, एक दूसरे के प्रति समर्पण भाव रखते हुए । यही नहीं, जब गृहस्थ जीवन त्यागने की अवस्था आए तब बिना किसी झिझक के मुक्त होकर वानप्रस्थ अवस्था में आ जाएं । इसके लिए कहीं घर छोड़ कर जाना ही आवश्यक नहीं है बल्कि घर में रहते हुए अनासक्त हो जाना है ।

       ज्ञान कभी बन्धन नहीं हो सकता, वह तो सदैव मुक्त करने वाला है । हम ज्ञान का किस प्रकार उपयोग करते हैं, यह महत्वपूर्ण है । एक दृष्टांत के माध्यम से अपनी बात स्पष्ट करता हूँ । एक ब्राह्मण था । वह अपने जीवनयापन के लिए भागवत-कथा किया करता था । ब्राह्मण की दयनीय अवस्था देखकर धनाढ्य लोग अपने घर पर उनसे भागवत-कथा करवाया करते थे । एक बार उस नगर के राजा ने भी ब्राह्मण को कथा के लिए बुलवा लिया । 

         भागवत-कथा सात दिन के लिए होती है । प्रतिदिन कथा समाप्त करने के पश्चात् ब्राह्मण राजा से पूछता - ‘महाराज ! कथा समझ में आई ?, राजा प्रत्युत्तर में कहता - ‘ब्राह्मण देवता, पहले आप ही समझ लें ।’ प्रतिदिन ऐसा ही होता रहा, ब्राह्मण का एक ही प्रश्न और राजा का भी वही उत्तर । ऐसा होते-होते छठा दिन भी बीत गया । रात्रि को ब्राह्मण ने राजा द्वारा कहे जा रहे शब्दों पर गंभीरता से विचार किया । भीतर एक बिजली सी कौंधी और तत्क्षण ही ब्राह्मण को कथा पूर्ण रूप से समझ में आ गई ।

         प्रातःकाल होते ही ब्राह्मण ने ब्राह्मणी को कुछ समझाया और राजा के यहाँ जाने के स्थान पर वन की और प्रस्थान कर गए । राजा ने ब्राह्मण का कुछ समय तक तो इंतज़ार किया फिर और अधिक देरी होती हुई देखकर अपने अधीनस्थों को ब्राह्मण को लिवा लाने के लिए भेजा ।

       राजा के अधीनस्थ जब ब्राह्मण के घर पहुँचे तो उन्हें वे कहीं दिखलाई नहीं दिए । तभी वहाँ ब्राह्मणी आ गई । उन्होंने ब्राह्मणी से पूछा कि आज ब्राह्मण देवता राजा के यहाँ कथा करने क्यों नहीं आए ? ब्राह्मणी ने उत्तर दिया कि वे तो कहीं बाहर गए है । जाते-जाते कहकर गए हैं कि उन्हें आज कथा समझ में आ गई है, इसलिए वे राजा के यहाँ अब कथा नहीं कर पाएंगे ।

          कहानी का मर्म है कि ज्ञान पुस्तकों में समाहित है । हम उसे पढ़ते हैं, सुनते-सुनाते हैं परंतु जीवन में उतारते नहीं है । ज्ञान को जीवन में उपयोग में लाने का नाम ही विवेक है । ज्ञान के अनुसार जीने से किसी भी परिस्थिति को आप संजीदगी से लेने लगते हैं । फिर आप विपरीत परिस्थिति में दुःखी होकर रोने नहीं बैठोगे और न ही अनुकूल परिस्थिति में ख़ुशी के मारे उछलने लगोगे ।

            शास्त्रों में समाहित ज्ञान को केवल पढ़कर सुना देना ही ज्ञान को प्रचारित करना नहीं है । ज्ञान को पहले स्वयं आचरण में लाएं और फिर उसका प्रचार करें । जब तक आपके स्वयं का जीवन ज्ञानमय नहीं होगा तब तक सुनने वाले आपके ज्ञान का अनुकरण नहीं करेंगे । वे एक कान से सुनेंगे और दूसरे कान से उस ज्ञान को बाहर निकाल फेंकेंगे ।

         एक और दृष्टान्त से स्पष्ट हो जाएगा कि ज्ञान मुक्ति का साधन है, बंधन नहीं है । एक पहुँचे हुए संत राजा के दरबार में पहुँचते हैं । राजा और राजगुरु उनका स्वागत करते हैं । राजा एकांत में संत से मिलते हैं और बताते है कि राजगुरु से प्रतिदिन मार्गदर्शन लेता हूँ फिर भी शांत जीवन और मुक्ति के अनुभव की कोई संभावना आस-पास तक नज़र नहीं आती । संत ने राजगुरु के जीवन से संबंधित कुछ प्रश्न राजा से किए और तत्काल ही वे समझ गए कि आखिर कमी कहाँ है ?

          उन्होंने राजा को आश्वस्त किया कि इसके पीछे जो भी कारण हैं, उनको कल दरबार में सबके सामने ही स्पष्ट करूँगा । इसके लिए आवश्यक है कि आप राजसिंहासन को कुछ समय के लिए मुझे सौंप दे और आपके सभी मातहत मेरी आज्ञा का पालन करे । राजा ने हामी भर ली और तुरंत ही अपने मंत्री को बुलाकर राज्य की व्यवस्था कुछ समय के लिए संत को सौंपने की व्यवस्था करने का आदेश दे दिया ।

       प्रातः दरबार लगा । राजसिंहासन पर राजा के स्थान पर संत विराजमान हुए । राजा अपने राजगुरु के पास साधारण दरबारी की भांति बैठ गए । राजसिंहासन के पास खड़े सेवक अब संत द्वारा आदेश देने की प्रतीक्षा करने लगे ।

        सन्त ने प्रथम आदेश दिया - ‘राजगुरु को राजसिंहासन के बायीं और स्थित खम्भे से बांध दिया जाय ।’ सेवक ने तत्काल ही आज्ञा का पालन किया और राजगुरु को खंभे से बांध दिया । राजगुरु ऐसे आदेश से हतप्रभ रह गये परन्तु विवश थे, क्या करते, बंध गए । संत का दूसरा आदेश - ‘राजा को राजसिंहासन के दाईं ओर स्थित खंभे से बांध दें ।’ सेवक तनिक सकुचाए परंतु राजा ने आदेश पालन करने का संकेत किया । राजा को भी दूसरे खंभे से बांध दिया गया ।

          संत ने राजगुरु को कहा कि आप अब राजा को खोल दीजिए । राजगुरु ने कहा कि मैं स्वयं बंधा हूँ, किसी दूसरे को कैसे खोल सकता हूँ ? संत राजा की और उन्मुख हुए और बोले - ‘राजन् ! यही आपके प्रश्न का उत्तर है । एक बंधा हुआ व्यक्ति किसी दूसरे बंधे हुए को कभी भी मुक्त नहीं कर सकता ।’ राजगुरु प्रतिदिन राजा को ज्ञान देता था परंतु उसके स्वयं का जीवन उस ज्ञान के अनुसार नहीं था । ज्ञान का प्रवचन देने से महत्वपूर्ण है ज्ञान के अनुसार आचरण । 

         संत ने तत्काल ही बंधे हुए दोनों को खोलने का आदेश दिया और राजा को सिंहासन सौंप दिया । राजा के और साथ ही राजगुरु के, दोनों के ही संत की बात समझ में आ गई । बस, हमें भी जीवन में संत की इसी बात को समझना है । मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि सब कुछ जानते हुए भी वह जानबूझकर उलझा हुआ है । जाने हुए को जीवन में लागू करना है, उपयोग में लाना है, फिर जितना भी (कम या अधिक) जाना हुआ है, मुक्ति का साधन बन जाएगा ।

           परमात्मा ने प्रत्येक जीव को बुद्धि दी है, जिसमें ज्ञान उपजता है । ऐसा नहीं है कि मनुष्य के अतिरिक्त अन्य जीवों में ज्ञान का अभाव होता है । अपने शरीर के भले-बुरे का ज्ञान तो प्रत्येक जीव को होता है । हाँ, मनुष्य के अतिरिक्त अन्य जीव इस ज्ञान को जीवन में विभिन्न स्तर पर उपयोग करना नहीं जानते । परिस्थिति, वातावरण और स्थान के अनुरूप बदल पाने की जो क्षमता ज्ञान के माध्यम से मनुष्य ने विकसित की है, वैसी क्षमता अन्य जीवों में देखने को नहीं मिलती ।

           आहार, निद्रा, भय और मैथुन में जन्म से ही प्रत्येक जीव लगा हुआ है । केवल बुद्धि में अग्रणी होने के कारण मनुष्य सब जीवों में विशिष्ट है । बुद्धि में उपजा ज्ञान ही मनुष्य को अन्य जीवों से अलग करता है । इस ज्ञान को महत्व न देने वाला मनुष्य पशु के समान ही माना जाता है । मनुष्य द्वारा ज्ञान का सदुपयोग करने से वह ज्ञान ही विवेक में परिवर्तित होता है । विवेक उसे आत्म-ज्ञान की अवस्था तक ले जाता है । आत्म-अनात्म का ज्ञान हो जाना ही आत्म-साक्षात्कार (realization) कहलाता है ।

           आत्म-अनात्म का ज्ञान हो जाने से मनुष्य अपने आपको संसार से मुक्त अनुभव करता है । संसार से मुक्ति का अनुभव उसे परमात्मा की ओर अग्रसर कर देता है । इसलिए ज्ञान को संसार से मुक्ति और परमात्मा की प्राप्ति का साधन बताया गया है । प्रश्न उठता है कि मनुष्य आत्म-ज्ञान की अवस्था तक कैसे पहुंच सकता है ? 

           आत्म-ज्ञान की अवस्था तक पहुंचने के कई रास्ते हैं, अपने स्वभाव के अनुसार हम उन साधनों का उपयोग कर सकते हैं । आइए ! संक्षेप से उन साधनों के बारे में जानते हैं ।

शास्त्र-अध्ययन - सनातन धर्म शास्त्रों में सांसारिक और आध्यात्मिक ज्ञान का विस्तृत विवेचन उपलब्ध है । उनके अध्ययन से आत्म-ज्ञान की राह पर अग्रसर होने की प्रेरणा मिलती है । 

आत्म-विचार - शास्त्र-अध्ययन से उत्पन्न हुए विचारों और भावनाओं का विश्लेषण करना ।

आत्म-निरीक्षण - आत्म-विचार के अनुरूप जीवन में परिवर्तन हो रहा है अथवा नहीं, इस बात का बराबर निरीक्षण करते रहना ।

ध्यान - मैं शरीर नहीं हूँ तो फिर “मैं कौन हूँ” इसको ध्यान के माध्यम से जानने का प्रयास करना ।

गुरु की शरण - शास्त्रों में समाहित ज्ञान की व्याख्या वही कर सकता है, जिसने उस ज्ञान का अपने जीवन में उपयोग करते हुए उसका अनुभव किया है । वह व्यक्ति है - गुरु । गुरु शरीर नहीं है बल्कि गुरु वह अवस्था है जो शारीरिक स्तर से परे उस परमात्मा के स्तर तक पहुँच चुका है । गुरु आपको संकेत से उस मार्ग को बता सकता है, जिस पर चलकर वह परमात्मा तक पहुंचा है । चलना आपको ही है क्योंकि आत्म-ज्ञान की यात्रा आपकी व्यक्तिगत यात्रा है । इस यात्रा को गुरु पहले ही पूरी कर चुका है । 

             गुरु की शरण, आत्म-ज्ञान को उपलब्ध होने का सर्वोत्तम साधन है । परन्तु गुरु से ज्ञान प्राप्त कर उसको केवल वाणी और लेखनी के माध्यम से प्रस्तुत करते रहने से भी कुछ नहीं होना है । आवश्यक है कि गुरु-प्रदत्त ज्ञान को हम अपने जीवन में उतारें । ज्ञान जीवन में कितना उतरा है, इसको हम निम्न बातों के माध्यम से जान सकते हैं -

नैतिक जीवन - ज्ञान के अनुसार जीने पर हमारे जीवन में नैतिकता आती है । नैतिकता का अर्थ है - सत्य, अहिंसा और करुणा के मार्ग पर चलना । जिसके जीवन में नैतिकता नहीं है, उसका जीवन ज्ञान होने के पश्चात् भी मूल्यहीन है । 

वैराग्य - ज्ञान हो जाने पर संसार से मोह समाप्त हो जाता है और व्यक्ति वैराग्य को उपलब्ध हो जाता है । शरीर और संसार का निरंतर त्याग हो रहा है । आप चाहकर भी उनको बदलने से नहीं रोक सकते । ज्ञान इस बदलने को स्वीकार करता है, जिससे मनुष्य संसार और शरीर से मुक्त हो जाता है ।

प्रेम और भक्ति - ज्ञान से जब संसार और शरीर मूल्यहीन हो जाते हैं तब परमात्मा के प्रति प्रेम और भक्ति का उदय होता है । मनुष्य जीवन का उद्देश्य भी यही है कि वह अपने वास्तविक स्वरूप को पहिचाने जोकि परमात्मा का स्वरूप ही है अर्थात् सच्चिदानंद स्वरूप । स्वरूप तक पहुंचने की राह प्रेम और भक्ति से ही निकलती है ।

          इतने विवेचन से स्पष्ट है कि ज्ञान मुक्ति का मार्ग है । ज्ञान को प्राप्त करने के उपरान्त भी संसार में आसक्त बने रहना बंधन है । बन्धन से मुक्त न करने वाला ज्ञान, ज्ञान न होकर अज्ञान है । मुक्ति के लिए आवश्यक है कि हम ज्ञान के अनुसार अपना जीवन बनाएं ।

सार-संक्षेप

        सीखे और सुने हुए ज्ञान की क़ीमत दो कौड़ी की नहीं है । ज्ञान के मात्र दो शब्द जब विवेक बनकर जीवन में उतरते हैं तब वह जीवन भी अनमोल बन जाता है । आज इस संसार में सभी लोग एक दूसरे को ज्ञान बांट रहे हैं परन्तु एक भी व्यक्ति उस ज्ञान के अनुसार जी नहीं रहा है । सब ज्ञान देकर एक दूसरे को बदलने में लगे है, परंतु स्वयं को बदलना नहीं चाहते । मित्र, अपने मित्र को बदलना चाहता है और पति अपनी पत्नी को । ऐसा ज्ञान बंधन है, बोझ है । 

         ऋषि याज्ञवल्क्य और गार्गी के मध्य हुआ संवाद वास्तविक ज्ञान को स्पष्ट करता है । उन्होंने ज्ञान को अपने जीवन में उतारा है, साथ ही ज्ञान से ब्रह्म को भी जाना है । याज्ञवल्क्य ऋषि के गृहस्थ जीवन में दो-दो पत्नियों के होते हुए भी जो समरसता दिखलाई पड़ती है, उसके पीछे उच्च कोटि के ज्ञान के अनुसार उनका जीना ही है । ज्ञान जब विवेक बन जाता है, तब व्यक्ति के जीवन में अशांति का प्रवेश हो ही नहीं सकता । ज्ञान को विवेक में परिवर्तित करने के लिए सत्संग आवश्यक है । गोस्वामीजी मानस में लिखते हैं - 

बिनु सतसंग बिबेक न होई । रामकृपा बिनु सुलभ न सोई ।।

होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा । तब रघुनाथ चरन अनुरागा ।।

       अन्त में मैं आचार्यजी द्वारा कहे गए शब्दों का पुनः स्मरण करना चाहूँगा । वे कहते हैं - “सीखे हुए ज्ञान में ही अनुभव छिपा हुआ है । खोज करें ।” खोज तभी होगी, जब उस ज्ञान का जीवन में प्रयोग करेंगे । प्रयोग से ही उस ज्ञान की उपयोगिता सिद्ध होगी । ज्ञान को आत्मसात् करने के लिए परमात्मा की कृपा मानकर सत्संग कीजिए । फिर संसार से आसक्ति परमात्मा के प्रति अनुरक्ति में परिवर्तित हो जाएगी । ऐसा ज्ञान बंधन नहीं है बल्कि मुक्ति का साधन है ।

पुनश्च 

प्रश्न आया है कि आप ज्ञान को इतना अधिक महत्व दे रहे हैं जबकि भक्ति को सर्वोत्तम बताया जाता है। ऐसा क्यों ?

   आपका कहना सही है, मेरा भी यही मानना है कि सर्वोत्तम तो भक्ति ही है । ज्ञान और भक्ति, दोनों साथ हों तो सोने पर सुहागा है । अज्ञान हो तो न तो भक्ति सिद्ध हो सकती है और न ही कर्मयोग सिद्ध हो सकता है । ज्ञान और कर्म, दोनों लौकिक हैं जबकि भक्ति पारलौकिक है । भक्ति स्वयमेव ज्ञान को उपलब्ध करा देती है परन्तु वह ज्ञान तात्विक ज्ञान है । तात्विक ज्ञान तक पहुंचने के लिए सबसे पहले परमात्मा के अस्तित्व की स्वीकार्यता आवश्यक है । ऐसी स्वीकार्यता आधारभूत ज्ञान के बिना होना सम्भव नहीं है । आधारभूत ज्ञान से अज्ञान मिटता है । स्वामीजी कहते हैं कि तत्त्वज्ञान होता नहीं है बल्कि अज्ञान मिटता है । ज्ञान उत्पन्न होने वाली और मिटने वाली वस्तु नहीं है, वह तो जन्मजात सबमें होता है । बस, यह अज्ञान से ढका रहने से अनुभव में नहीं आता है । 

      यही कारण है कि मैं आधारभूत ज्ञान होने पर जोर देता हूँ न कि ज्ञान को भक्ति पर वरीयता देता हूँ । भक्ति ही परमात्मा के दर्शन कराती है, कर्म और ज्ञान तो उसकी संतान होने के कारण उसकी सहयोगी है ।

     प्रारम्भिक स्तर पर ज्ञान का महत्व अधिक है क्योंकि ज्ञान से ही अनुभव होता है कि कर्म निष्काम कैसे हो सकते हैं । ज्ञान से ही एक सर्वोच्च सत्ता के होने के बारे में अनुभव होता है । ज्ञान होने से ही कर्मयोग और भक्तियोग सिद्ध होने की राह आसान हो जाती है। भक्ति बिना समर्पण के सिद्ध नहीं होती और समर्पण बिना ज्ञान के नहीं हो सकता । समर्पण को केवल क्रिया मात्र मान लेंगे तो यह दिखावा तो हो सकता है, परन्तु हम असमर्पित ही रह जाएंगे । ज्ञानपूर्वक किया गया समर्पण ही वास्तव में भक्ति है ।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल