सम्भवामि युगे युगे -17
इस असुर का अन्त तो भगवान के हाथों ही होगा और इसके लिए उन्हें अपनी माया से ही कोई रास्ता निकालना होगा । प्रश्न था कि इस कार्य के लिए भगवान को बुलाएगा कौन ? भगवान तो अपने भक्त की एक पुकार के साथ ही आ जाते हैं । इसका अर्थ है कि किसी भक्त की खोज की जाए । असुर वंश में भक्त कहां होंगे ? वहां तो असुर ही असुर होंगे । कयादू का पुत्र भी असुर होगा । साथ ही यह भी सत्य है कि असुर समुदाय से बाहर कोई भक्त यहां आने का साहस भी करेगा, इसमें सन्देह है । नहीं, असुर समुदाय में से किसी को ही भक्त बनना होगा । भक्त बनना भी इतना आसान नहीं है । जहां भोग-विलास के सब साधन हो वहां परमात्म-भक्ति कौन करेगा ?
असुरों के बीच जन्मे किसी बालक को ही भक्त बनना होगा । ऐसा विधान तो माया के माध्यम से भगवान ही रच सकते हैं । माया से प्रेरित नारद बीच रास्ते ही क़यादू का अपहरण कर ले जा रहे इन्द्र के सामने जा खड़े हुए । एक ओर देवराज तो दूसरी ओर देवर्षि । दोनों ओर देव, तो आपस में संघर्ष होने का प्रश्न ही नहीं है । यही तो दैवी सम्पति की विशेषता है । देवराज की राह रोककर क़यादू को इस आश्वासन के साथ छुड़ा लाए कि इसके गर्भ में भगवान का परम भक्त है और यही भक्त हिरण्यकश्यप की मृत्यु का कारण बनेगा । विश्वास कर इन्द्र ने क़यादू को नारद के सुपुर्द कर दिया ।
गर्भस्थ शिशु पर वातावरण का प्रभाव पड़ता है, सस्त्राब्दियों से हमारे शास्त्र कहते आ रहे हैं । आज विज्ञान भी उसी बात की पुष्टि कर रहा है । पिता से मिले गुणसूत्र की भूमिका संतान के भौतिक शरीर के निर्माण तक ही सीमित रहती है, उसके स्वभाव निर्माण में उसकी कोई भूमिका नहीं रहती ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।