भोग, रोग और योग -14
योग को कैसे उपलब्ध हुआ जा सकता है ? उत्तर है- समता में रहते हुए । समता का दूसरा नाम ही ‘योग’ है ।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण समता को ही योग बताते हैं -
योगस्थ: कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय ।
सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ।। 2/48 ।।
अर्थात् हे धनंजय ! तू आसक्ति का त्याग करके सिद्धि-असिद्धि में सम होकर योग में स्थित हुआ कर्मों को कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है ।
स्वामीजी कहते हैं कि किसी एक वस्तु/व्यक्ति में राग होगा तो दूसरी वस्तु/व्यक्ति में द्वेष होना स्वाभाविक है । कार्य की सिद्धि अथवा असिद्धि में राग-द्वेष की भूमिका परोक्ष रूप से रहती है क्योंकि इनके रहते समता आनी कठिन है । इसलिए प्रत्येक कर्म राग-द्वेष से रहित होकर करना चाहिए । समता से जीवन में विचलन होना संभव ही नहीं है । फिर प्रत्येक परिस्थिति में मनुष्य समता में रहते हुए सुखी-दुःखी नहीं होता, अशान्त नहीं होता । समता को आचरण में लाने पर व्यक्ति योग के पथ से विचलित नहीं होता । इसीलिए समता को ही ‘योग’ कहा जाता है ।
कल सार-संक्षेप
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।