Tuesday, November 3, 2026

सम्भवामि युगे युगे -62

 सम्भवामि युगे युगे -62

         आसुरी शक्तियां जब सक्रिय होती हैं, तब पतन का माध्यम बनता है - काम । नारी का आभूषण है, लज्जा परन्तु काल-चक्र जब घूमता है तब लज्जा दूर की कौड़ी हो जाती है । अभी चित्रकूट से निकलते समय अत्रि पत्नी अनुसुइयाजी ने सीताजी को पतिव्रत धर्म का उपदेश दिया था और इधर दण्डकारण्य में सूपनखा कितनी निर्लज्जता से बात कर रही थी । जब नारी लज्जा का त्याग कर देती है, समाज पतन की ओर अग्रसर हो जाता है । जिस बेबाक़ी से युवा लड़कियां आज जन्तर-मन्तर पर गालियाँ बक रही हैं, उसे निर्लज्जता की पराकाष्ठा नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे ? त्रेता में तो एक सूपनखा थी, यहां तो पग-पग पर कई सूपनाखाएँ एक साथ घूम रही हैं । 

            अनुसुइयाजी का पातिव्रत्य-धर्म का ज्ञान भारत जैसे सांस्कृतिक देश में इतनी शीघ्रता से सिसकियाँ लेने लगेगा, कल्पनातीत है । परन्तु हम वास्तविकता से कब तक मुंह मोड़ते रहेंगे ? अब राम नहीं आने वाले इस संस्कृति को बचाने क्योंकि जब तक हम स्वयं उन्हें बुलाएँगे नहीं तब तक वे नहीं आने वाले । इसके लिए हमें सर्वप्रथम हमारे भीतर सुप्त पड़ी दैवी सम्पदा को जाग्रत करना होगा । ऐसा नहीं करेंगे तो सूपनखा की बात सुनकर कई रावण एक साथ हमारी संस्कृति को मटियामेट करने के लिए टूट पड़ेंगे और साथ देंगे हमारे ही बीच बैठे मारीच, जो पहले से ही जानते हैं कि दोनों तरफ़ मरना निश्चित है । 

            विकृत मुख लेकर रोते हुए सूपनखा पहुंचती है, अपने भाई लंकानरेश रावण के पास । कारण जानते ही क्रोधित हो जाता है, रावण । फिर भी आशंकित है, अपनी मृत्यु को लेकर । रावण को एक मनुष्य से चुनौती मिली है तो वह कोई साधारण मनुष्य तो हो नहीं सकता । कुछ क्षण सोचता है और अंतिम निर्णय पर पहुंच जाता है । निर्णय - यदि साधारण मनुष्य है तो मेरे हाथों मारा जाएगा और साक्षात् परमात्मा है तो उसके हाथों मरना भी मेरे लिए कल्याणकारी होगा ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Monday, November 2, 2026

सम्भवामि युगे युगे -61

 सम्भवामि युगे युगे -61

              खर दूषण, रावण के भाई । बल में रावण से उन्नीस नहीं, उसके समान ही थे । जब अपात्र के पास सीमा से अधिक शक्ति आ जाती है तो उसका दुरुपयोग होने लगता है । दूसरों को अकारण सताने में ही उन्हें आनंद मिलता है । वे ऋषियों के यज्ञादि कर्मों में बाधा डालने लगे, इस वन में ऐसा आतंक था, उन दोनों भाइयों का । 

          आतंक जब एक सीमा से अधिक बढ़ जाता है तब उसका ख़ात्मा करना आवश्यक हो जाता है । आज सूपनखा के कारण उनके ख़ात्मे का दिन आ ही गया है । खर और दूषण बल के मद में चूर होकर राम-लखन को चुनौती दे बैठे । जीवन में चाहे आप किसी भी क्षेत्र (बल, धन आदि) की ऊंचाई को छू लें एक दिन वहां से पतन होना निश्चित है । इसलिए उनसे प्रभावित होकर जीवन में कभी भी अहंकार नहीं पालना चाहिए । अहंकार ही व्यक्ति के पतन की राह प्रसस्थ करता है ।

          बल के अहंकार ने खर-दूषण को मार डाला । राम-लखन असुरों के ख़ात्मे की दिशा में एक कदम आगे बढ़ चुके थे । प्रतीक्षा है रावण को कुछ उल्टा पुल्टा करने को विवश कर देने की, जिससे उसके विनाश का आधार तैयार हो सके । इस काम के लिए तो एक सूपनखा का होना ही पर्याप्त है ।

           कहने को तो सूपनखा एक स्त्री है परंतु प्रश्न है कि क्या वह वास्तव में एक नारी है ? जब स्त्री में काम भाव लज्जा से ढका नहीं रहता, उघड़ जाता है तब उसके स्त्री होने पर भी प्रश्न चिन्ह लग जाता है । हाँ, एक पुरुष की तुलना में काम-भाव स्त्री में कई गुना अधिक होता है परंतु वह अपने काम की संतुष्टि के लिए पुरुष को पहले आमंत्रण कभी नहीं देती । जब वह पुरुष को पहले आमंत्रित करने लगे तो समझ लें कि उसका स्त्रीत्व नष्ट हो चुका है । जिस स्त्री का स्त्रीत्व समाप्त हो चुका है, उसके आमंत्रण को पुरुष भी ठुकरा देता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, November 1, 2026

सम्भवामि युगे युगे -60

 सम्भवामि युगे युगे -60

       कई वर्षों से वह क्षेत्र सूना ही पड़ा था । भला कौन जीव उस शापित वन में रहने का ख़तरा मोल लेता । राक्षसों को वह स्थान अपने लिए उपयुक्त लगा । वे वहाँ आकर रहने लगे । दण्डक वन के आस-पास के क्षेत्र में ऋषि तप, यज्ञ आदि करते थे । राक्षस उन्हें सताते और मार डालते । राम का आगमन अब इस वन क्षेत्र को पुनः समृद्ध कर देगा, अगस्त्य ऋषि ने ऐसा सोचकर ही उन्हें पंचवटी में निवास करने को कहा ।

         एक बार सूपनखा जोकि रावण की सगी बहन थी, पंचवटी के आस-पास यूं ही वन में घूम रही थी । एक दिन भगवान की सक्रिय माया के प्रभाव क्षेत्र में प्रवेश कर गई । दो सुन्दर नवयुवकों को देखकर कामातुर हो गई ।आसुरी स्वभाव को कुछ समय के लिए त्याग दिया । सुन्दर नारी का रूप बनाकर विवाह हेतु अनुनय-विनय करती रही । दोनों युवक एक दूसरे के पास भेजते रहे । अपने को असफल होता देखकर उसने अपना मूल विकराल आसुरी स्वरूप प्रकट किया । देखकर सीताजी भय से काँपने लगी । राम के संकेत पर लखन ने उसके नाक-कान काट डाले । 

           कामातुर नारी की जब उपेक्षा होती है, तब वह अपने आपको बहुत अधिक अपमानित अनुभव करती है । अपमान के दंश से घायल नारी अधिक घातक हो जाती है । रोती बिलखती पहुंच गई अपने भाइयों, खर-दूषण के पास । कौन है इस वन में जिसने हमारी बहन को कुरूप किया है ? आज तक किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी जो हमें अपमानित करते हुए चुनौती दे सके । खर-दूषण का एकछत्र राज्य था वहाँ, उस वन में । बहुत सताया था ऋषियों को उन्होंने । तपस्वियों के यज्ञ में बाधा डालते और कई बार तो उनको मार कर खा जाते थे । ऋषि-हड्डियों के ढेर पर ढेर लगा दिए गए थे ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

 ।।

Saturday, October 31, 2026

सम्भवामि युगे युगे -59

 सम्भवामि युगे युगे -59

               भक्त और भगवान के मध्य वार्तालाप स्थिति की गंभीरता समझ समाप्त होता है । अंततः अगस्त्य ऋषि भगवान को रहने के लिए शापग्रस्त दण्डकवन में पंचवटी नामक स्थान का नाम सुझाते हैं । संत का हृदय कोमल होता है । कुम्भज ऋषि जानते हैं कि दण्डकारण्य में साधना करने वाले ऋषि-मुनि वहाँ रहने वाले राक्षसों से त्रस्त हैं । भगवान के पंचवटी में निवास करने से दो लाभ होंगे, एक तो ऋषियों को राक्षसों से मुक्ति मिल जाएगी और दूसरा, दण्डक वन भी शाप-मुक्त हो जाएगा ।  

                    अगस्त्यजी तो त्रिकालदर्शी थे । वे जानते थे कि राम का वन में घूमना निरुद्देश्य नहीं है । उनके उद्देश्य की पूर्ति कैसे होगी, वे यह भी जानते थे । इसीलिए उन्होंने राम को दंडक वन में आगे जाकर गोदावरी के तट पर पंचवटी नामक स्थान पर कुटिया बनाकर निवास करने का आग्रह किया । रास्ते में जटायु से भेंट होती है । जटायु की भक्ति देखकर भगवान प्रसन्न होते हैं । गोदावरी के तट पर पहुंचकर एक सुंदर आश्रम का निर्माण कर राम अपनी भार्या और अनुज के साथ वहाँ निवास करने लगते हैं ।

           दण्डक वन भी शापित है । इक्ष्वाकु वंश में एक राजा हुए थे - दण्ड । दण्डकारण्य में कभी राजा दण्ड का ही समृद्ध राज्य हुआ करता था । दण्ड के द्वारा की गई एक गलती से उसका राज्य तहस नहस हो गया । हुआ यूँ कि एक बार दानवों के गुरु ऋषि शुक्राचार्य की पुत्री अरजा भ्रमण पर थी । उसका सामना राजा दण्ड से हो गया । दण्ड ने उस कन्या के साथ अनुचित और अशोभनीय व्यवहार किया । 

            राजा दण्ड द्वारा किए गए व्यवहार से दुःखी होकर अरज़ा रोती हुई अपने पिता के पास गई । शुक्राचार्यजी सारी घटना सुनकर क्रोधित हो गए । उन्होंने राजा दण्ड के राज्य को नष्ट होने का शाप दे डाला । शाप के परिणाम स्वरूप दण्ड के राज्य में भयंकर विनाश हुआ । वहाँ की सारी स्मृद्धि मटियामेट हो गई । कालांतर में उस निर्जन स्थान पर घना वन विकसित हुआ, जिसे दण्डकारण्य कहा जाने लगा ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम्।।

रणम् ।।

Friday, October 30, 2026

सम्भवामि युगे युगे -58

 सम्भवामि युगे युगे -58

        आज सुतीक्ष्ण जी को अवसर मिला है, गुरु-ऋण उतारने का । गुरु का दिया ज्ञान शिष्य पर ऋण होता है । जो शिष्य गुरु की कही गई बात को जीवन में उतार ले तो वह ऋण मुक्त हो जाता है । अगस्त्य जी के ज्ञान की अनुपालना से सुतीक्ष्ण जी को राम मिले । अब सुतीक्ष्णजी अपने गुरु से राम को मिलाकर ऋण उतारने जा रहे हैं । 

       शिष्य सुतीच्छन ने भगवान को अपने गुरु की वन में उपस्थिति का संकेत भी कर दिया है । अगस्त्य ऋषि भविष्यदृष्टा भी हैं । राम,सीता, लखन की भावी-यात्रा को देखकर अगस्त्यजी समझ जाते हैं कि आगे क्या होने वाला है । सीता-हरण, फिर उनकी खोज, दुष्ट राक्षसों का वध, शबरी से भेंट,बाली का उद्धार आदि । सेतु निर्माण की ओर दृष्टि जाते ही उनको हंसी आ गई । वाह प्रभु ! किसी काम का अपने भक्त को श्रेय देना कोई आपसे सीखे । काम आप करते हो और नाम हमारा हो जाता है । शाप को आशीर्वाद में बदलना केवल आपके ही वश में है । मैंने तो दो नटखट बालकों को शाप दिया था । उस समय मैं नहीं जानता था कि वह शाप न होकर वरदान है । उन्हीं दो नादान बालकों को मैं सेतु निर्माण करते देख रहा हूँ । 

               अगस्त्यजी कुटिया से बाहर आकर भगवान राम से भेंट करते हैं । भगवान के दर्शन करते ही अगस्त्यजी के नेत्रों में जल भर आया । दोनों भाई (राम और लक्ष्मण) मुनि के चरण कमलों में गिर पड़े । ऋषि ने उठाकर दोनों को हृदय से लगा लिया । कुशलक्षेम पूछकर आसन पर बैठाया और स्तुति करने लगे । ऋषि कहते हैं कि आज मेरे समान भाग्यवान कोई नहीं है । आश्रम में रहने वाले अन्य मुनिगण श्री राम के दर्शन कर धन्य हो गए ।

           राम कह रहे हैं - ‘ मुनि ! आप से क्या छिपाव, आप सबकुछ जानते ही हैं कि मैं यहां क्यों आया हूँ ? आप मुझे वही सलाह दीजिए जिससे मैं त्रसित मुनियों को राक्षसों के भय से मुक्त कर सकूं ।’ भगवान अगस्त्यजी से रहने के लिए उचित स्थान पूछते हैं । ऋषि सब समझते हैं, भविष्यदृष्टा जो हैं । बोले - ‘हे नाथ ! आपने क्या सोचकर मुझसे सलाह मांगी है ? आप समस्त लोकों के स्वामी हैं, फिर भी मुझसे पूछते हैं । आपने मुझसे एक मनुष्य की तरह प्रश्न किया है, तो मैं कहता हूँ कि आप सीताजी और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय में निवास कीजिए । मुझे अनन्य प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य और आपके चरण कमलों में अटूट प्रेम प्राप्त हो । आप अपने भक्तों को सदैव ही बड़ाई दिया करते हैं, इसी से आपने मुझसे ऐसा प्रश्न किया है ।’

 क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

Thursday, October 29, 2026

सम्भवामि युगे युगे -57

 सम्भवामि युगे युगे -57

       वन में आगे बढ़ते हुए राम की एक आश्रम में सुतीच्छन ऋषि से भेंट होती है । सुतीच्छनजी अगस्त्य ऋषि के शिष्य हैं । भगवान से प्रेमाभक्ति ही चाही, सुतीक्ष्णजी ने । अपने गुरुजी से मिलाने के लिए सुतीक्ष्णजी भी साथ हो लिए । इस प्रकार विभिन्न ऋषियों से रास्ते में भेंट करते हुए भगवान अपनी भार्या और अनुज के साथ अगस्त्य ऋषि के आश्रम जा पहुंचे । सुतीक्ष्णजी ने अन्दर प्रवेश कर अपने गुरु को प्रणाम किया और सूचना दी कि जगत् के आधार राम अपनी पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ आपसे मिलने आए हैं । कुम्भज ऋषि देखते ही परमात्मा को पहचान गए ।

          अगस्त्यजी का एक नाम कुम्भज भी है क्योंकि उनका जन्म घड़े से हुआ था । घड़े से जन्म ! है न आश्चर्य की बात । कई वर्षों पहले ऐसा होना आश्चर्य की बात मानी जाती थी परन्तु आज नहीं क्योंकि आज शरीर से बाहर भी निषेचन (fertilisation) होने लगे हैं । अतः यदि हम अगस्त्यजी को संसार के प्रथम परखनली शिशु (Test tube baby/ IVF Baby) भी कह दें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।

         अगस्त्यजी की माता उर्वशी, स्वर्ग की अप्सरा थी । स्वर्ग की अप्सरा का चिरयौवना होना आवश्यक है । मित्र और वरुण नामक दो देवता, आसक्त हो गए उर्वशी पर । इधर दोनों देवता और उधर स्वर्ग की अप्सरा । मना भी नहीं कर सकती उनको और साथ ही यौवन भी सुरक्षित रखना था । इस द्वन्द्व में फँसी उर्वशी के सामने एक ही विकल्प बचा, घड़े को माध्यम बना लिया । दोनों देवताओं के स्खलित शुक्र (sperms) और उर्वशी के दो डिम्ब (ovum) एक घड़े में डालते हुए उसे प्रकृति द्वारा निर्धारित काल-क्रिया के लिए उपयुक्त वातावरण में रख दिया गया ।  

         परिणाम, दो शिशुओं का जन्म - अगस्त्यजी और वशिष्ठजी । वशिष्ठजी छोटे हैं, जो बड़े होकर अवध के राजगुरु बने । अगस्त्यजी बड़े हैं, उनका जन्म वशिष्ठजी से पहले हुआ, इसलिए वे ही कुम्भज कहलाए । वशिष्ठजी को अवध के राजगुरु होने का यह लाभ मिला कि उन्हें राम के दर्शन अपने अग्रज से पहले हुए । अगस्त्यजी तो ऋषि थे, बड़े होते ही वन में तपस्या करने चले गए । कथा के वर्तमान में वे दण्डकारण्य में भगवान की प्रतीक्षा कर रहे हैं । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, October 28, 2026

सम्भवामि युगे युगे -56

 सम्भवामि युगे युगे -56

             चित्रकुट । एक ही स्थान पर रहते हुए बारह वर्ष बीत गए हैं । वन में आने का एक उद्देश्य असुरों से मुक्ति दिलाते हुए ऋषियों को भययुक्त करना भी है । रास्ते में बाली को परास्त कर रघुवंश का राजमुकुट भी लेना है । मुख्य दृष्टि तो रावण-कुम्भकर्ण बने जय-विजय पर टिकी है । कैसे उनको एक बार फिर से मुक्त करें ? सीता के साथ मिलकर योजना बनाई गई । योजना परमात्मा की और उसके क्रियान्वयन की ज़िम्मेवारी प्रकृति पर । प्रकृति ने अपनी माया को सक्रिय किया ।

         चित्रकूट को अब छोड़ना होगा । रास्ते में कई ऋषि-मुनि और भक्तजन उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं । चित्रकूट से आगे की यात्रा प्रारम्भ होती है । राम आगे चल रहे हैं, लक्ष्मण सबसे पीछे हैं और बीच में सीता चल रही है । मानस में तुलसी इसका वर्णन करते हुए लिखते हैं कि राम और लखन के मध्य सीता चलते हुए ऐसे शोभित हो रही है, जैसे ब्रह्म और जीव में बीच माया होती है । मनुष्य की विडंबना है कि उसके और ब्रह्म के बीच माया आ जाती है जिससे वह माया के आकर्षण में ही फँस कर रह जाता है, ब्रह्म की ओर दृष्टि तक नहीं जाती । 

            चित्रकूट से निकलते समय अत्रि-अनुसईयाजी से उनके आश्रम में भेंट करते हैं । सीताजी को विविध प्रकार के आभूषणों की भेंट के साथ अनुसुइयाजी द्वारा पतिव्रत-धर्म का उपदेश दिया गया । आगे बढ़ते हुए वे दण्डकारण्य में प्रवेश करते हैं । वहां ऋषि-मुनि तपस्या और यज्ञ आदि कर रहे हैं, उनमें राक्षस बाधा डालते हैं । 

            वहाँ की दशा देखकर भगवान प्रतिज्ञा करते हैं -“निसिचर हीन करउँ महि, भुज उठाइ पन कीन्ह ।” इस प्रकार उस क्षेत्र को राक्षसों से मुक्त कर सभी को निर्भय करते है । रास्ते में शरभंग ऋषि भी उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं, परमात्मा के सगुण रूप के दर्शन करने के लिए । दर्शन कर कृतार्थ हो जाते हैं और भेद-भक्ति का वरदान पाकर योगाग्नि से शरीर को त्यागते हुए आगे की यात्रा पर निकल जाते हैं । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।