Tuesday, April 7, 2026

मुक्ति अथवा भक्ति -7

 मुक्ति अथवा भक्ति -7 

          जिस प्रकार योगवासिष्ठ के उत्पत्ति-प्रकरण में अज्ञान की सात भूमिकाएं बताई गई है उसी प्रकार निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) में ज्ञान की भी सात भूमिकाएं बतलाई गई हैं । ये सात भूमिकाएं है - शुभेच्छा, विचारणा, तनुमानसा, सत्वापत्ति, असंसक्ति, पदार्थाभावना और तुर्यगा । इनमें पहले की तीन भूमिकाएँ (शुभेच्छा, विचारणा और तनुमानसा) ज्ञान प्राप्ति से पहले की है जबकि अगली चार (सत्वापत्ति, असंसक्ति, पदार्थाभावना और तुर्यगा) जीवन्मुक्ति की अवस्थाएं हैं ।

          योगवासिष्ठ में वसिष्ठ मुनि भगवान श्रीराम को उपदेश देते हुए कह रहे हैं - 

शास्त्रसज्जनसम्पर्कै: प्रज्ञामादौ विवर्धयेत् ।

 प्रथमा भूमिकैषोक्ता योगस्यैव च योगिन: ।।

विचारणाद्वितीया स्यातृतीयाऽसंगभावना । 

विलापनी चतुर्थी स्याद्वासनाविलयात्मिका ।।

शुद्धसंविन्मयानन्दरूपा भवति पञ्चमी । 

अर्धसुप्तप्रबुद्धाभो जीवनमुक्तोऽत्र तिष्ठति ।।

स्वसंवेदनरूपा च षष्ठी भवति भूमिका । 

आनन्दैकघनाकारा सुषुप्तसदृशस्थिति: ।।

तूर्यावस्थोपशान्ताथ मुक्तिरेवेह केवलम् । 

समता स्वच्छता सौम्या सप्तमी भूमिका भवेत् ।।

(योगवासिष्ठ - निर्वाण प्रकरण पूर्वार्ध - सर्ग 120/1-5 )

ज्ञान की ये सात भूमिकाएं (अवस्थाएं) आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग हैं, जो शुभेच्छा से प्रारंभ होकर तुर्यगा अर्थात् परम आनन्द की स्थिति तक जाती है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Monday, April 6, 2026

मुक्ति अथवा भक्ति -6

 मुक्ति अथवा भक्ति -6

          नींद के समय जो स्वप्न देखा गया है, जागने के पश्चात् अनुभव में आई हुई बातों के विषय में जो प्रतीति होती है, वह अज्ञान की ‘स्वप्न’ अवस्था है । स्वप्न को ही सत्य समझ लेना, हमारा अज्ञान नहीं तो और क्या है ? चिरकाल तक स्वप्न में डूबे रहने के बाद सुदृढ़ अभिनिवेश (मृत्यु से भय) या चिरस्थायित्व की कल्पना से पुष्ट हो जगत् भाव को प्राप्त हुआ स्वप्न महाजाग्रत की समता प्राप्त कर लेता है । प्रत्येक मनुष्य (जीव) अपने शरीर के मोह में इतना अधिक बंधा हुआ है कि वह शरीर के मरने को ही अपना मरना मानने लगता है । यही कारण है कि उसे सदैव मृत्यु का भय सताता रहता है । छोटे से छोटा जीव भी अपने शरीर की मृत्यु से बचना चाहता है । 

          यह शरीर मरणधर्मा है । जिसने इस धरा पर शरीर धारण किया है, उसे एक न एक दिन यह शरीर छोड़ना ही होगा । मृत्यु का भय (अभिनिवेश) इस शरीर को बचाने की जुगत मात्र है । इस अवस्था को प्राप्त हुआ स्वप्न ‘स्वप्न- जाग्रत’ माना गया है । यह अज्ञान की छठी अवस्था है । अज्ञान की इन छः अवस्थाओं का परित्याग करने पर जीव की जो जड़ अवस्था (अपने आपको संसार का मान लेना) है, वही दुःखों का बोध कराने वाली अज्ञान से संपन्न ‘सुषुप्ति’ अवस्था कही गई है । इस अवस्था से मुक्त होने के लिए ज्ञान ही एकमात्र साधन है । अज्ञान की इन अवस्थाओं का विस्तार से वर्णन योगवासिष्ठ में मिलता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, April 5, 2026

मुक्ति अथवा भक्ति -5

 मुक्ति अथवा भक्ति -5 

       महासर्ग के आदि में परमात्मा से जो प्रथम व्यष्टि चेतन प्रकट होता है वह भविष्य में होने वाले ‘चित्त’ और ‘जीव’ अर्थों के रूप में एक होकर ‘जाग्रत’ अवस्था के बीज रूप में स्थित होता है क्योंकि वह महाप्रलय के समय भी परमात्मा में बीज रूप से ही था । इसलिए अज्ञान की इस अवस्था को बीज-जाग्रत अवस्था कहा जाता है । यह अज्ञान की प्रथम अवस्था है ।

          यह नवजात बीज जब ‘यह देह मैं हूँ’, ‘यह देह मेरे लिए है’ और ‘ये संसार के सभी पदार्थ मेरे द्वारा भोगने के लिए बने हैं’, ऐसी जो भीतर प्रतीति होती है, वह अज्ञान की ‘जाग्रत’ अवस्था है । यह देह मैं हूँ, यह मेरे लिए है, सब भोग्य पदार्थ मेरे हैं, ऐसी प्रतीति उत्पन्न होने के पश्चात् कई जन्मों के अभ्यास से यह प्रतीति दृढ़ होती जाती है । यह दृढ़ प्रतीति जब स्फुरित होती है, तब यह अज्ञान की ‘महाजाग्रत’ अवस्था कहलाती है । जाग्रत पुरुष का जो जगत् के ही तुल्य मनोराज्य होता है, वह अज्ञान की ‘जाग्रत-स्वप्न’ अवस्था कहलाती है । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Saturday, April 4, 2026

मुक्ति अथवा भक्ति -4

 मुक्ति अथवा भक्ति -4

           परमात्मा ने जीवों की रचना ‘आनन्द’ को अनुभव करने के लिए की परन्तु जीव आनन्द की खोज में न लग कर सांसारिक पदार्थों से सुख प्राप्त करने की खोज में लग गया । सांसारिक सुख आनन्द की एक छद्म अनुभूति मात्र है, वह आनन्द नहीं है । पदार्थों से प्राप्त होने वाले सुख को जीवन का लक्ष्य बना लेना ही हमारा अज्ञान है ।

       यह अज्ञान कैसे हमारे जीवन में धीरे-धीरे गहरे में उतरता जाता है ? इसका विवरण हमारे शास्त्रों में विस्तार से मिलता है । परमात्मा से चला जीव कैसे अज्ञान के अंधकार में डूबता जाता है, इसको समझने के लिए शास्त्रों में अज्ञान की सात अवस्थाएं/भूमिकायें बतलाई गई है । 

           अज्ञान की कुल सात भूमिकाएं है जिसके आधार पर वह जीव में दृढ़ता से स्थित रहता है । ये सात भूमिकाएं (अवस्थाएं) हैं - बीज-जाग्रत, जाग्रत, महाजाग्रत, जाग्रत-स्वप्न, स्वप्न, स्वप्न-जाग्रत और सुषुप्ति । ये सात भूमिकाएं अज्ञान के सात भेद हैं अर्थात् इनको अज्ञान की सात अवस्थाएं भी कहा जा सकता है । ये सातों भेद एक- दूसरे से संयुक्त होकर अलग अलग अनेकों नाम धारण करते हैं । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Friday, April 3, 2026

मुक्ति अथवा भक्ति -3

 मुक्ति अथवा भक्ति -3 

          जैसे घर का मालिक घर में रहते हुए विभिन्न प्रकार की चेष्टाएं करता है परन्तु उसका घर कुछ भी नहीं करता । उसी तरह शरीर में आसक्त होकर जीवात्मा ही विविध चेष्टाएं करता है, शरीर कुछ भी नहीं करता । शरीर तो इन चेष्टाओं को प्रकट रूप देने का माध्यम मात्र है । इन्हीं चेष्टाओं (कर्मों) के कारण जीवात्मा ही सुखी-दुःखी होता है । संसार को दुखालय कहा जाता है क्योंकि अनुभव किया गया प्रत्येक सुख भी अल्प समय पश्चात् दुःख में बदल जाता है । इस दुःख को स्वयं में अनुभव करने का कारण हमारा अज्ञान है । इस अज्ञान के कारण ही जीवात्मा कर्ता और भोक्ता बनता है अन्यथा मूलतः तो उसकी ‘न करोति न लिप्यते’ की अवस्था है । 

        रेशम का कीड़ा अण्डे से बाहर निकलकर लार्वा बनता है और फिर प्यूपा की अवस्था में आते हुए अपनी लार से रेशम की डोर बनाकर अपने चारों ओर लपेट लेता है, जिसमें वह सुरक्षित रहकर पूर्ण रूप से विकसित होता है । इस प्रकार वह रेशम की डोर से निर्मित कोष में वह बन्धन को प्राप्त होता है । शरीर के पूर्ण रूप से विकसित होते ही डोर को काटकर उसे बाहर निकलना होता है परन्तु यह रेशम का बन्धन ही उसे मृत्यु की ओर ले जाता है । इसी प्रकार जीव भी रेशम के कीड़े की तरह शरीर के सुख की चाहना से विभिन्न बंधनों (घर, जन आदि) में बंध जाता है और जीवनभर छटपटाता रहता है । कितना ही प्रयास कर ले, वह इस बंधन से मुक्त नहीं हो पाता । इस बन्धन को मन से स्वीकार कर लेना ही हमारा अज्ञान है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Thursday, April 2, 2026

मुक्ति अथवा भक्ति -2

 मुक्ति अथवा भक्ति -2

           विवेचन से स्पष्ट है कि ज्ञान का जब प्रेम में जाकर समापन होता है तभी व्यक्ति भावपूर्ण अवस्था को प्राप्त होता है । संसार में अनेकों जीव है, सभी सांसारिक पदार्थों की आसक्ति में आकण्ठ डूबे हुए है । अन्य जीवों की बात को तो छोड़ दें, मनुष्य जैसा विवेकवान जीव भी इन आसक्तियों से कहां मुक्त हो पाया है ? पदार्थों की आसक्तियों में डूबा मनुष्य बंधा हुआ है, संसार के साथ । इन सांसारिक बंधनों से मुक्त होने के लिए उसे अपने ज्ञान को सतह पर लाना होगा जो अभी अज्ञान की असंख्य पर्तों के नीचे दबा पड़ा है । जीवन में ज्ञान कैसे उतरेगा, जानने के लिए हमें एक दृष्टि अपने अज्ञान पर डालनी होगी । 

         अज्ञान से ज्ञान प्राप्ति की यात्रा में आगे बढ़ने से पहले हमें अज्ञान को जानना चाहिए । अज्ञान का अर्थ ज्ञान की अनुपस्थिति मात्र नहीं है बल्कि जन्म-जन्मांतरों से चली आ रही मूढ़ता ही इस अज्ञान का कारण है । अज्ञान की दृढ़ता हो जाने से ज्ञान उसके नीचे दब जाता है । इसका कारण है- ‘देही को विस्मृत कर देह को ही सब कुछ समझ लेना ।’ यह जड़ देह एक पदार्थ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । वास्तव में देह की सत्ता है ही नहीं । देह तो जड़ है, इसे सुख-दुःख का अनुभव नहीं होता, परन्तु साथ ही यह भी सत्य है कि सुख -दुःख का अनुभव तो फिर होता है । प्रश्न है कि सुख-दुःख का अनुभव शरीर नहीं करता तो फिर कौन करता है ? देहाभिमानी जीवात्मा ही अविवेक के कारण सुखी-दुःखी होता है । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Wednesday, April 1, 2026

मुक्ति अथवा भक्ति -1

 मुक्ति अथवा भक्ति -1

         ज्ञान से मुक्ति की अवस्था को प्राप्त हुआ जा सकता है, इस बात में किसी प्रकार का कोई संदेह नहीं है । क्या जीवन में मुक्त हो जाना ही पर्याप्त है अथवा उससे आगे भी कोई और यात्रा हो सकती है ? ज्ञान जीवन्मुक्त कर देता है क्योंकि ज्ञान अभाव को नष्ट कर देता है और भाव (सत् ) तक पहुंचा देता है । जीवन्मुक्त हो जाने के उपरान्त भी जिस बात की कमी शेष रह जाती है वह है, प्रेम । प्रेम को उपलब्ध होने के लिए ज्ञान को पीछे छोड़ते हुए उससे भी आगे बढ़ना पड़ता है । मैं तो यहाँ तक कहता हूँ की प्रेम के लिए तो अर्जित किए हुए समस्त ज्ञान को भूलकर ही आगे बढ़ना होता है । इसका अर्थ यह नहीं है कि ज्ञान की उपयोगिता नहीं है बल्कि इससे अर्थ है ज्ञानी होने के अहंकार को समाप्त करना । एक बार हुआ ज्ञान कभी विस्मृत नहीं होता । ज्ञान को विस्मृत कर देना तो अज्ञान में डूब जाना है । 

            हमने ज्ञान से जो कुछ जाना है, वह जब उपयोग में लिया जाता है तब विवेक प्रकट होता है । विवेक ही जीवन में शान्ति और प्रेम की यात्रा करवाता है । ज्ञान से सबकुछ जानकर मुक्त तो हुआ जा सकता है परन्तु प्रेमरस से सरोबार होने के लिए उस ज्ञान को जीवन में उतारकर उसे अनुभव करना आवश्यक है । 

           प्रसिद्ध कवि स्व. गया प्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ की एक कविता ‘स्वदेश’ है जिसमें वे कहते हैं - 

             जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं ।

             वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं ।।

           मनुष्य भावों से भरा है परन्तु सांसारिक उलझनों में घिर कर वह अभाव की स्थिति तक पहुंच गया है । पुनः भावपूर्ण स्थिति को प्राप्त करने के लिए उसे ज्ञान अर्जित करते हुए प्रेम की अवस्था तक पहुंचना ही होगा ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।