Monday, February 23, 2026

भोग, रोग और योग -4

 भोग, रोग और योग -4

              भगवान गीता में कहते हैं - ‘ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।’ (गीता -5/22) अर्थात् सभी भोग (सुख) इंद्रियों और विषयों के संयोग से पैदा होते हैं और दुःख के ही कारण हैं । 

          सभी सुख संयोगजन्य हैं और इंद्रिय स्पर्श से मिलते हैं । संयोग से जब किसी विषय का स्पर्श सम्बन्धित ज्ञानेंद्रिय से होता है, तब जीव एक प्रकार के सुख को अनुभव करता है । सुख का अनुभव करना ही भोग है । प्रत्येक इंद्रिय का एक विषय होता है, उस विषय से संपर्क होते ही मन को सुख का अनुभव होता है । जब विषय संपर्क बार-बार और असंयमित होता है, तब वही सुख दुःख में परिवर्तित होने लगता है । असंयमित भोग ही शारीरिक और मानसिक रोग का कारण बनते हैं । इन रोगों से शारीरिक और मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाता है, जिससे मनुष्य जीवन में अशान्त होकर दुःख का अनुभव करता है । जीवन में शान्ति के लिये इंद्रियों को भोगों की ओर भागने से रोकना होगा ।

           पांच इंद्रियों के पांच विषय - शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध । जो भी जीव इनमें आसक्त हो गया उनकी गति भी वैसी ही होती है जैसी मृग, हाथी, पतंगे, मछली और भंवरे की होती है । इन विषयों का आकर्षण जीव को शारीरिक और मानसिक रोगों के माध्यम से मृत्यु के द्वार तक पहुंचा देता है । ये सभी विषय विभिन्न वस्तुओं के रूप में हमारे आस-पास ही उपस्थित रहते हैं । उनमें आसक्त न होकर उनको बाहर ही छोड़ देना उचित है । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, February 22, 2026

भोग, रोग और योग -3

 भोग, रोग और योग -3

              मनुष्य का स्वभाव कुछ ऐसा है कि वह सदैव सुख की खोज में ही लगा रहता है । उसकी यह खोज स्वाभाविक है क्योंकि वह स्वयं आनन्द स्वरूप है । जब यह सुख केवल इंद्रिय-तृप्ति तक ही सिमट कर रह जाता है, तब मनुष्य अपने जीवन के लक्ष्य तक पहुंच नहीं पाता । भारतीय दर्शन इसी को भोग कहता है । भोग अपने आप में बुरा नहीं है परंतु जब भोग विवेक से रहित होकर किया जाता है, तब वह रोग को जन्म देता है । शास्त्रों ने योग को ही इस समस्या का एकमात्र समाधान बताया है । 

            भोग का अर्थ है - इंद्रियों से मिलने वाला सुख । भोग का अर्थ केवल भोजन अथवा भौतिक वस्तुएं ही नहीं है । असंयमित रूप से बोलना, सोचना, देखना, चाहना आदि भी भोग के ही विभिन्न रूप हैं । सभी इन्द्रियाँ भोगों में ही लगी हुई हैं । भोगों से इन्द्रियाँ अल्प रूप से तृप्त होती है परन्तु यह तृप्ति कुछ समय के लिए ही सुख देती है । सुख मिलने के बाद भी संतुष्टि कहाँ मिल पाती है, क्योंकि सुख न तो पर्याप्त लगता है और न ही वह दीर्घ कल तक टिकता है । इसी कारण से भीतर सदैव एक प्रकार की रिक्तता बनी रहती है, अभाव बना रहता है । यह अभाव ही जीवन में अशान्ति व तनाव पैदा करता है जिससे व्यक्ति समता में नहीं रह पाता और जीवनभर दुःखी होता रहता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Saturday, February 21, 2026

भोग, रोग और योग -2

 भोग, रोग और योग -2

           शरीर के मुख्य रूप से दो भाग हैं - स्थूल और सूक्ष्म । दोनों ही शरीर परिवर्तनशील हैं । स्थूल शरीर तो कुछ भी अनुभव नहीं करता, जो कुछ भी अनुभव करता है वह सूक्ष्म शरीर ही करता है । परन्तु सूक्ष्म शरीर द्वारा किया जाने वाला अनुभव भी सत्य नहीं होता । दोनों ही शरीरों में सदैव परिवर्तन होते रहते हैं । इधर जगत् भी परिवर्तनशील है । जो स्वयं बदल रहा वह दूसरे बदल रहे को बदलता हुआ अनुभव नहीं कर सकता । यही कारण है कि हमें सूक्ष्म शरीर के आधार पर स्वयं के साथ-साथ संसार भी सदैव रहनेवाला प्रतीत होता है । यह वैसे ही है जैसे एक ही दिशा में समान गति से चल रही दो रेलगाड़ियों में बैठे व्यक्ति एक दूसरे को स्थिर ही अनुभव करते हैं । लेकिन सूक्ष्म शरीर से होने वाला ऐसा अनुभव केवल भ्रम ही है, सत्य से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है ।

           यह अनुभव जिसको हो रहा है, वह कौन है ? हम समझते हैं कि यह अनुभव हमारे शरीर को हो रहा है परंतु यह सत्य नहीं है, यह भी हमारा भ्रम है । जिसको संसार की परिवर्तनशीलता का अनुभव हो रहा है वह अपरिवर्तनशील है, जोकि हम स्वयं हैं और वही हमारा स्वरूप है । इसी प्रकार संसार में रहते हुए सांसारिक विषयों के भोग से जिस सुख का अनुभव हम करते हैं, वह सुख भी हमारा केवल भ्रम ही है । जब हम संसार और उसके विषयों से मिलने वाले सुख से स्वयं को अलग कर लेंगे, तत्काल ही योग को उपलब्ध हो जाएंगे अन्यथा भोगों का दुष्चक्र हमें शारीरिक रोगों में उलझाकर शेष जीवन में मिलने वाले अतिशय दुःख से मुक्त नहीं होने देगा ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Friday, February 20, 2026

भोग, रोग और योग -1

 भोग, रोग और योग -1

          एक समान गति से एक ही दिशा में जा रहे दो वाहनों में बैठे व्यक्ति एक दूसरे के वाहन की गति का आकलन नहीं कर सकते, जबकि दोनों ही गतिमान हैं । दोनों में से किसी एक वाहन की गति में आया तनिक सा परिवर्तन दूसरे वाहन की गति में आए परिवर्तन को अनुभव कर लेता है परन्तु ऐसा अनुभव सत्य नहीं हो सकता । जैसे एक वाहन स्थिर है और दूसरा वाहन पास में से निकल रहा है तो दूसरे वाहन में बैठे व्यक्ति को पहले वाला वाहन विपरीत दिशा में जाता और स्वयं का वाहन स्थिर खड़ा प्रतीत होता है । रेलगाड़ी में बैठे हुए व्यक्ति को बाहर के पेड़ और पोल आदि पीछे भागते नज़र आयेंगे जबकि वास्तविकता यह है कि वह स्वयं गतिमान है और पेड़, पोल अपने स्थान पर स्थिर हैं । यही स्थिति इस संसार और शरीर की है ।

           जगत् वह है जो सदैव गति करता रहता है, एक पल के लिए भी स्थिर नहीं रहता । गति का अर्थ है कि यह जगत् परिवर्तनशील है, इसमें प्रतिपल बदलाव हो रहा है और इस बदलाव की गति हमारे शरीर में हो रहे बदलाव के समान ही है । यही कारण है कि जगत् में हो रहे परिवर्तन को हमारा शरीर समझ नहीं पाता, उसका अनुभव नहीं कर पाता । 

        स्वामीजी कहते हैं कि बहने वाले के लिए बहने वाला ही सत्य है क्योंकि बहनेवाला बहनेवाले को जान ही नहीं रहा है । बहनेवाले को तो रहनेवाला ही जान सकता है । शरीर और संसार बहनेवालों में हैं और हम स्वयं रहनेवाले हैं । जब इस बात का ज्ञान हो जाएगा उसी दिन यह संसार और शरीर असत्य हो जाएंगे । इंद्रियों का ज्ञान शरीर और संसार के सत्य होने का भ्रम जीवन भर बनाए रखता है । केवल विवेक ही हमारे इस भ्रम को तोड़ सकता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Thursday, February 19, 2026

मन - बन्धन और मोक्ष का कारण

 मन - बन्धन और मोक्ष का कारण 

    अमृत-बिन्दु उपनिषद् में आता है -

         मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो: ।

         बन्धाय विषयासक्तं मुक्तं निर्विषयं स्मृतम् ।। 2 ।।

मन ही मनुष्य के लिए बंधन और मुक्ति का कारण है। इंद्रिय विषयों में आसक्त मन बंधन की ओर ले जाता है और जो इंद्रिय विषयों से मुक्त होता है वह मनुष्य को मुक्त कर देता है ।

               हम मन में किसी भी पदार्थ के बारे में एक पूर्वाग्रह पाल लेते हैं । उसी अनुसार हमें वह अच्छा अथवा बुरा लगता है । जो हमें अच्छा लगता है उसकी तो कामना करने लगते हैं और जो बुरा लगता है, उससे विरक्त होते जाते हैं । अच्छे से तो हमारा सम्पर्क बढ़ता है और बुरे से दूरी । ‘ममता, तू न गई मेरे मन से’, यह सब मन में समायी (माया) का ही खेल है ।

          मन - यह इंद्रियों और बुद्धि के बीच की अवस्था का नाम है । इंद्रियों से जो सुख का ज्ञान होता है, उसमें आसक्त होकर यदि मन चलता है, तो शरीर रुग्ण हो जाता है । यही मन यदि बुद्धि के ज्ञान से चलने लगे तो मुक्ति के अनुभव होने का मार्ग प्रशस्त होता है । इंद्रियों का ज्ञान माया से प्रेरित है और बुद्धि का ज्ञान आत्मा से । मन पर कौन सा ज्ञान प्रभावी है, यह महत्वपूर्ण है । यदि इंद्रियों का ज्ञान प्रभावी है तो व्यक्ति भोग को प्राथमिकता देता है, जोकि एक दिन रोग का जनक बनता है और यदि मन पर बुद्धि का ज्ञान प्रभावी है तो व्यक्ति एक दिन योग को उपलब्ध हो जाता है । 

          यह जानते हुए भी कि प्रत्येक भोग रोग की ओर ले जाने वाला है, मनुष्य भोगों की ओर ही क्यों भागता है ? विवेक ( बुद्धि का ज्ञान) का सदुपयोग कर वह भोगों से विरक्त होकर, रोग-मुक्त हो सकता है, अंततः जिसकी परिणीति योग में होगी ही, यह निश्चित है । भोग से रोग की ओर अथवा भोग से योग की ओर, दोनों में से किस ओर जाएं, यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है । चलिए ! इस विषय को थोड़ा गहराई से समझने का प्रयास करते हैं । 

              इसी विषय पर कल से चर्चा प्रारम्भ करने जा रहे हैं, इस लेख के माध्यम से जिसका शीर्षक है -‘भोग, रोग और योग’ । 

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

Wednesday, February 18, 2026

नाभावो विद्यते सत:

 नाभावो विद्यते सत:

          प्रश्न है कि काम (सुख प्राप्त करने की इच्छा) क्यों पैदा होता है और इसका त्याग कैसे हो सकता है ?

       ‘काम’ शब्द की व्याख्या करना बड़ा ही कठिन है क्योंकि इसके विविध रूप है । प्रश्न तक सीमित रहते हुए इसे सरल भाषा में समझाने का प्रयत्न कर रहा हूँ ।

       जो प्रश्न है, वह ‘काम’ के उस रूप से संबंधित है जो हमें संसार में उलझा रहा है । उस ‘काम’ से मुक्त होने के लिए मनुष्य को सांसारिक पदार्थों को पाने की इच्छा का त्याग करना आवश्यक है । 

         एक सिक्के की तरह ‘काम’ के भी दो पहलू हैं । ‘काम’ संसार से सुख मिलने की सम्भावना तलाशता है, जिसके कारण मनुष्य ममता और आसक्ति के जाल में उलझकर संसार के बियाबान में ताउम्र भटकता रहता है, फिर भी उसे सुख नहीं मिलता । यही ‘काम’ अगर प्रेम और आनंद की दिशा पकड़ लेता है तो मनुष्य को परमात्मा तक ले जा सकता है । यह निर्णय तो स्वयं मनुष्य को ही करना है कि वह संसार से सुख चाहता है अथवा परमात्मा का प्रेम । फिर ‘काम’ स्वतः ही अपनी दिशा उसी प्रकार निर्धारित कर लेगा । ‘काम’ वर्जनीय नहीं है, मनुष्य की मानसिकता ही उसे विकृत बना देती है । अतः ‘काम’ को राम की दिशा में लगा देना ही उचित है ।

             जीवन में किसी शारीरिक सुख के लिए अनुभव किए जाने वाले ‘अभाव’ की पूर्ति के लिए जिस काम की उत्पत्ति होती है, हमें उसी काम का त्याग करना है । चलिए ! काम के जनक उसी ‘अभाव’ को समझने का प्रयास करते हैं।

ऋग्वेद (10.129.1) — नासदीय सूक्त में कहा गया है -

“नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम् नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् ।

किमावरीव: कुह कस्य शर्मन्नम्भ: किमासीद् गहनं गभीरम् ।।” 

अर्थात् प्रलय की दशा में न असत् था और न सत् ही था । उस समय न लोक थे और न अंतरिक्ष था, न कोई आवरण था और न ढकने योग्य कोई पदार्थ था । कहीं भी न कोई प्राणी था और न कोई सुख पहुंचाने वाला भोग ही था । उस समय गहन गंभीर जल भी नहीं था । 

         सृष्टि के अभ्युदय और प्राणियों की रचना के साथ ही सत् और असत् का भेद स्पष्ट होने लगा । संसार और शरीर असत् के अन्तर्गत हैं क्योंकि उनमें स्थायित्व नहीं है जबकि सत् अपरिवर्तनशील है । संसार के भोग पदार्थ प्राणी के जीवन को सुगमता पूर्वक संचालित करने के लिए आवश्यक हैं । उन पदार्थों के उपयोग से जो शारीरिक सुख जीव को मिला उसमें वह आसक्त होने लगा । उन पदार्थों, वस्तुओं आदि पर अपना अधिकार समझने लगा और उनका संग्रह करने लगा । इस प्रकार शारीरिक सुख की इच्छा पैदा होने से जीव संसार के साथ बंधता गया । शरीर के सुख को प्राप्त करने की की इच्छा ही ‘काम’ कहलाती है ।

       गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘काम’ की उत्पत्ति रजोगुण से हुई है ।

         काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव: ।

         महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ।। गीता - 3/37।।

अर्थात् रजोगुण से उत्पन्न यह ‘काम’ अर्थात् कामना ही पाप का कारण है । यह ‘काम’ ही क्रोध में परिणत होता है । यह बहुत अधिक खाने वाला और महापापी है । इस विषय में तू इसको ही वैरी जान ।

            इस प्रकार स्पष्ट है कि ‘काम’ की उत्पत्ति माया (प्रकृति) के ही एक गुण, रजोगुण से हुई है । मनुष्य जीवन का उद्देश्य माया से मुक्त होकर परमात्म-अवस्था को प्राप्त होना है । माया से मुक्त होने के लिए ‘काम’ पर नियंत्रण कर उसको जीतना आवश्यक है । यह ‘काम’ इतना प्रभावशाली है कि कोई भी व्यक्ति जीते-जी नहीं कह सकता कि उसने ‘काम’ को जीत लिया है । काम को जीतने का अर्थ है, जीवन में काम से निष्प्रभावी बने रहना ।

      रजोगुण से उत्पन्न ‘काम’ आपको संसार के साथ बाँधता है । इसी बंधन के कारण जीव संसार के आवागमन में पड़ा रहता है और मुक्त नहीं हो पाता । इसीलिए ‘काम’ को माया का अस्त्र कहा गया है, जिसका उपयोग करते हुए माया सृष्टि-चक्र को रूकने नहीं देती ।

     माया का सबसे बड़ा अस्त्र यह ‘काम’ ही है, जिसके कारण मनुष्य कंचन और कामिनी के आकर्षण से कभी मुक्त नहीं हो पाता । यह आकर्षण जीव के भीतर पल रहे ‘काम’ के कारण है । स्मरण रहे - माया में केवल आकर्षण है, वह किसी ओर आकर्षित नहीं होती; आकर्षित तो जीव ही होता है । माया के प्रति आकर्षित होकर जीव माया (काम) से मिलने वाले शारीरिक सुख का भोग करने लगता है । वास्तव में यह सुख प्रकृति के गुणों की क्रियाओं का परिणाम होता है ।

            प्रकृति में हो रही क्रियाएँ मनुष्य को इंद्रियों के माध्यम से सुख-दुःख प्रदान करती है । यथार्थ में इस संसार में सुख-दुःख जैसी चीज कहीं है ही नहीं । प्रकृति में हो रही क्रियाएँ जीव के समक्ष केवल परिस्थितियों का निर्माण करती है, जैसे वातावरण में तापक्रम का बढ़ना अथवा कम होना । स्पर्शेन्द्रिय के माध्यम से व्यक्ति को वातावरण में हो रहे परिवर्तन से गर्मी अथवा शीत का अनुभव होता है । हम इस परिस्थिति को सहन करने की क्षमता पैदा कर लेते है तो फिर हम वातावरण में हो रहे परिवर्तन से सुखी-दुःखी नहीं होंगे । इसका अर्थ है कि सुख-दुःख का अनुभव करना हमारी मानसिक दशा पर निर्भर है अर्थात् यथार्थ में सुख-दुःख कहीं नहीं है बल्कि प्रकृति में होने वाली क्रियाओं से केवल परिस्थितियाँ परिवर्तित होती हैं ।

          कहने का अर्थ है कि मन के कारण ही जीव सुख-दुःख का अनुभव करता है । सुखी दुःखी होने का कारण हमारा मन है ।

        जीवन में किसी अभाव का अनुभव और उस अभाव की पूर्ति के लिए उत्पन्न हुई इच्छा को ही ‘काम’ कहा गया है । ‘काम’ शब्द का अर्थ है - कामना, इच्छा अर्थात् इंद्रिय सुख की इच्छा । स्वामीजी कहते हैं कि ‘जैसा मैं चाहूँ, वैसा हो ज़ाय’ - यही काम है । किसी भी क्रिया, वस्तु और व्यक्ति का अच्छा लगना अथवा उससे कुछ भी सुख चाहना ‘काम’ है । जब भीतर किसी वस्तु अथवा व्यक्ति से इंद्रिय सुख पाने की चाहना होती है, तब कामना का जन्म होता है । उस कामना के कारण ही मनुष्य कर्म करने को विवश होता है । कर्म के फलस्वरूप इंद्रियों के माध्यम से व्यक्ति को सुख का अनुभव होता है ।

            स्वामीजी काम को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि “काम अभाव में पैदा होता है।” इसका अर्थ है कि जब जीवन में किसी चीज़ की कमी या अभाव होता है, तभी मनुष्य उस अभाव की पूर्ति के लिए कुछ करने को प्रेरित होता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि आवश्यकता ही प्रयास, मेहनत और काम को जन्म देती है । यदि सब कुछ सुगमता से मिल जाए तो काम करने की इच्छा नहीं रहती । जो पाने में दुर्लभ है, जिसको प्राप्त करने के लिए कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, उसी का हम अधिक अभाव अनुभव करते हैं । इसी अभाव के कारण उसे पाने की कामना अधिक बलवती होती है । ऐसी कठिनाई, अभाव या आवश्यकता इंसान को सक्रिय बनाती है । उदाहरण: पैसे की कमी हो तो व्यक्ति मेहनत करके नौकरी या व्यवसाय करता है । संसाधन कम हों तो मस्तिष्क अधिक रचनात्मक समाधान खोजता है । आवश्यकता ही आविष्कार और परिश्रम की जननी है ।

          अभाव ही हमें सुखी- दुःखी करता है । जिस अभाव की पूर्ति के लिए हम इतनी भाग-दौड़ करते हैं, जब वह लगभग पूर्णता को प्राप्त होने की स्थिति में आता है, तभी फिर कोई न कोई अन्य अभाव अनुभव में आ जाता है । मनुष्य जैसा चाहता है, वैसा कभी हो नहीं पाता क्योंकि जब होने वाला होता है कि फिर उसी में कुछ कमी अनुभव होने लगती है । अभाव की पूर्ति के लिए प्रयास करना पागलपन कि सिवाय कुछ भी नहीं है क्योंकि जिसे हम कभी पूर्णता के साथ प्राप्त नहीं कर सकते फिर भी प्रयास करते रहते हैं तो इसे पागलपन नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे ?

          एक नेताजी पागलखाने का दौरा कर रहे थे । एक वार्ड में एक पागल बार-बार शबनम शबनम पुकार रहा था । नेताजी ने चिकित्साधिकारी से पूछा कि यह व्यक्ति कैसे पागल हुआ ? उत्तर मिला कि यह शबनम से बड़ा प्रेम करता था परन्तु उस लड़की की शादी इससे न हो सकी । इसलिए यह उसके अभाव में पागल हो गया । आगे दूसरे वार्ड में भी एक व्यक्ति ठीक पहले व्यक्ति की तरह ही शबनम शबनम कर रहा था । नेताजी आश्चर्यचकित रह गए । बोले - क्या यह भी शबनम का कोई प्रेमी है, जिससे इसकी शादी नहीं हो सकी । चिकित्सक ने उत्तर दिया - ‘नहीं साहब, इसकी शादी शबनम से हो गयी थी ।’

         पहला व्यक्ति शबनम को चाहता था, नहीं मिली इसलिए पागल हो गया । दूसरा व्यक्ति शबनम से कुछ चाहता था, वह उसे नहीं मिला इसलिए पागल हो गया । दोनों ही स्थिति में अभाव ही पागल होने का मुख्य कारण था, एक तो किसी व्यक्ति के अभाव में और दूसरा, किसी व्यक्ति से सुख के अभाव में । इस अभाव का ही दूसरा नाम काम है ।

           ‘अभाव का नाम ही काम है’, यह कथन दार्शनिक दृष्टि से बहुत गहरा है । “अभाव सदैव असत् का ही होता है, सत् में कोई अभाव नहीं है।” सत् वह है - जो वास्तव में है, नित्य है, पूर्ण है । असत् वह है जो अस्थायी है, अपूर्ण है, नश्वर है । इसलिए कहा गया है कि जहाँ पूर्णता है (सत् है), वहाँ किसी कमी अर्थात् अभाव की कल्पना ही नहीं की जा सकती ।

           अभाव हमेशा उसी का होता है जो अपूर्ण (असत्) है ।

दार्शनिक व्याख्या (विशेषकर वेदांत में):

आत्मा/ब्रह्म = सत् → पूर्ण, अखंड, शाश्वत → कोई अभाव नहीं । 

शरीर, भोग, संसार = असत् → परिवर्तनशील → हमेशा कुछ न कुछ का अभाव ।

          जो व्यक्ति भीतर से संतुष्ट है, उसे बाहर की कमी कभी परेशान नहीं करती । जो अस्थायी वस्तुओं पर निर्भर रहता है, वह हमेशा अभाव अनुभव करता है । कहने का अर्थ है कि अभाव मन (असत्) की अवस्था है, स्वरूप (सत्) की नहीं । सत् में स्थित होने पर अभाव स्वयं विलीन हो जाता है ।

         सत् की परिभाषा — पूर्णता । सदेव सोम्य इदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् (छान्दोग्य उपनिषद् (6.2.1)

अर्थात् हे सोम्य ! प्रारम्भ में यह जगत् केवल सत् था — एक, अद्वितीय । यहाँ सत् को एक, अखंड और पूर्ण कहा गया है । जहाँ अद्वैत है, वहाँ किसी अन्य वस्तु का अभाव कैसे हो सकता है ?

नाभावो विद्यते सतः -7

         अभाव का सम्बन्ध असत् से है । यहाँ सत् और असत् का भेद स्पष्ट है।असत् का अर्थ है — जो स्थिर नहीं, जो परिवर्तनशील है । परिवर्तनशील वस्तु में ही “कमी-पूर्ति” का चक्र चलता रहता है । इसलिए अभाव असत् का लक्षण है न कि सत् का । सत् में अभाव असम्भव है । बृहदारण्यक उपनिषद् (1.4.2) का प्रसिद्ध मन्त्र है -

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।। 

अर्थात् वह भी पूर्ण है, यह भी पूर्ण है । पूर्ण से पूर्ण उत्पन्न होता है, पूर्ण में से पूर्ण निकालने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है । जहाँ पूर्णता है, वहाँ न कमी है, न आवश्यकता है और न ही कोई अभाव ।

   अभाव, अज्ञान का परिणाम है । आदिशंकराचार्य अपने ग्रंथ ब्रह्म ज्ञानावली माला में कहते हैं -

“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।” अर्थात् ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या है । जीव और ब्रह्म में कोई अन्तर नहीं है। 

       जगत् (असत्) को सत्य मानने से ही इच्छा, अभाव और दुःख उत्पन्न होता है । सत् का अज्ञान ही अभाव की अनुभूति कराता है जबकि सत् का ज्ञान अभाव का लय करा देता है । इसी बात को उन्होंने विवेकचूड़ामणि ग्रंथ के 20 वें श्लोक में फिर से स्पष्ट किया है ।

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्येत्येवंरूपो विनिश्चय ।

सोऽयं नित्यानित्यवस्तुविवेक: समुदाहृत : ।।

अर्थात् ‘ब्रह्म सत्य है और जगत् मिथ्या है‘ ऐसा निश्चय है, यही ‘नित्यानित्यवस्तु-विवेक‘ कहलाता है।

            इतने विवेचन से स्पष्ट है कि अभाव वस्तु में नहीं, हमारी दृष्टि में है । दृष्टि सत् में स्थिर होते ही अभाव स्वतः समाप्त हो जाता है ।

“अभाव सदैव असत् का ही होता है, सत् में कोई अभाव नहीं है ।”

    आइए ! पहले “सत्” और “असत्” को समझते हैं । सत् क्या है ? सत् वह है जो नित्य (हमेशा रहने वाला) है । सत् पूर्ण, अपरिवर्तनीय और स्वयं में पर्याप्त है । उपनिषद् कहता है — ‘सदेव सोम्य इदमग्र आसीत् ।’ (छान्दोग्य उपनिषद्) अर्थात् आरम्भ में और वास्तव में सिर्फ सत् ही है । जो सदा है, जो पूर्ण है, उसे भला किस चीज़ की कमी होगी ?

          असत् क्या है ? असत् वह है जो बदलता रहता है, नश्वर है, आज है, कल नहीं रहेगा, सदैव अपूर्ण ही रहेगा । शरीर, धन, पद, संबंध, भोग सब असत् हैं । जहाँ परिवर्तन है, वहीं कमी/अभाव का अनुभव होता है ।

         अभाव किसे कहते हैं ? अभाव का अर्थ है —“जो होना चाहिए, वह नहीं हो रहा है।” अब जरा सोचिए - जो पूर्ण है, उसमें “होना चाहिए” जैसा कुछ बचता है क्या ? नहीं बचता । जो अपूर्ण है, वही कहता है - मुझे और चाहिए, बहुत कुछ चाहिए । इसलिए अभाव केवल असत् में ही सम्भव है।

         पूर्णता का मंत्र ‘‘पूर्णमदः पूर्णमिदं…’ (बृहदारण्यक उपनिषद्) स्पष्ट करता है कि जहाँ पूर्णता है, वहाँ न कुछ जोड़ने की आवश्यकता है और न ही घटने का कोई भय । वहाँ अभाव का कोई स्थान ही ही नहीं है ।

        असत् में ही इच्छा रहती है । गीता (3.37) में भगवान कहते हैं - ‘काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।’ यह काम (इच्छा) कहाँ से आता है ? यह आता है, रजोगुण से । रजोगुण अर्थात् संसार यानी असत् और इच्छा (काम) अर्थात् अभाव की अनुभूति ।

     जरा अपने अनुभव से इस बात को समझिए । उदाहरण : नींद । गहरी नींद में न धन चाहिए, न मान-सम्मान चाहिए और न ही कोई संबंध । क्यों ? क्योंकि उस समय आप अपने सत् के समीप होते हैं । दूसरा उदाहरण : जीवन में संतोष । जो व्यक्ति भीतर से शांत है, संतुष्टि के कारण वह कम साधनों में भी पूर्णता देखता है । वस्तुएँ वही हैं, केवल दृष्टि बदल गई है ।

          इसलिए शास्त्र निष्कर्ष देता है - ‘अभावो न वस्तुनि, किन्तु अविद्यायाम् ।’ अभाव वस्तु में नहीं, अज्ञान में है । जब हम असत् को सत् मान लेते हैं (अज्ञान), तभी अभाव जन्म लेता है । सार यह है कि सत् पूर्ण है, इसलिए उसमें अभाव असम्भव है । असत् अपूर्ण है, इसलिए वही अभाव का कारण है ।

     संस्कृत में एक सूत्र है। - ‘अभावोऽपि असतो धर्मः, न सतः।’ अर्थात् अभाव भी असत् का ही धर्म है, सत् का नहीं । एक अन्य सूत्र कहता है - ‘यत्र पूर्णता तत्र न किञ्चिदभावः।’ अर्थात् जहाँ पूर्णता है, वहाँ किसी प्रकार का अभाव नहीं हो सकता ।

        प्रश्न है कि “ज्ञान होने पर अभाव का अनुभव क्यों समाप्त हो जाता है ?” ज्ञान कहता है - ‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत: ।’ असत् की तो सत्ता नहीं है और सत् का अभाव नहीं है । सत् को जानते ही असत् का निषेध हो जाता है और इस प्रकार अभाव का अनुभव समाप्त हो जाता है । आइए ! इसे एकदम सीधी भाषा, बिना कठिन शब्दों के समझते हैं । 

            “अभाव सदैव असत् का ही होता है, सत् में कोई अभाव नहीं है।” सबसे पहले एक सरल प्रश्न - अभाव कब लगता है ? जब हमें ऐसा लगता है कि “कुछ चाहिए, जो मेरे पास नहीं है।” अब ध्यान दें — यह भावना किसमें होती है ? मन में ।

       . “सत्” क्या है — सरल अर्थ में, सत् का अर्थ है - जो हमेशा है, जो अपने-आप में पूरा है, जिसे किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं है । उपनिषद् इसे कहते हैं: पूर्ण । अब सोचिए, जो पूरा है, उसे किस चीज़ की कमी होगी ? किसी की नहीं। इसलिए सत् में कोई अभाव नहीं हो सकता ।

             “असत्” क्या है ? असत् वह है, जो बदलता रहता है, जो टिकता नहीं है, जो आज है, कल चला जाता है । जैसे: पैसा, शरीर, सम्बन्ध, मान-सम्मान आदि । इन सब में एक बात समान है - ये कभी पूरे नहीं लगते, सदैव अपर्याप्त ही लगते हैं । क्यों ? क्योंकि ये अस्थायी हैं ।

        अभाव असत् में ही क्यों होता है ? कारण है - जीवन में संतुष्टि का न होना । मान लीजिए — आपके पास 10 हैं । अब आपको 20 चाहिए । 20 मिल गए तो अब आपको 50 चाहिए । क्यों ? क्योंकि जो चीज़ स्थिर नहीं, वह कभी संतोष नहीं दे सकती । इसलिए असत् जितना मिलेगा, उतना ही और नया अभाव पैदा करेगा । एक बहुत साधारण सा उदाहरण देता हूँ - नींद में किसी प्रकार के अभाव का अनुभव नहीं होता है । जब आप गहरी नींद में होते हैं, तब न तो भूख होती है, न डर, न चाह । क्यों ? क्योंकि उस समय आप अपने “सत्” के सबसे क़रीब होते हैं। नीन्द में कोई अभाव नहीं होता, क्योंकि उस समय मन नहीं होता । नींद में मन अविद्या में लीन हो जाता है ।

     मूल बात यह है कि अभाव वस्तु में नहीं है । अभाव तो मन की कल्पना मात्र है । जब मन असत् की ओर भागता है तब अभाव पैदा होता है । जब मन सत् में ठहरता है तब पूर्णता का अनुभव होता है । इस एक पंक्ति में ही पूरा अर्थ स्पष्ट हो जाता है कि जो बदलता है, उसी में सदैव कमी दिखती है और जो स्थिर है, उसमें कमी की संभावना ही नहीं है ।

        प्रश्न उठता है कि दुःख क्यों असत् से जुड़ा है ? ज्ञान से अभाव कैसे मिटता है ? असत् चाहे जितना मिल जाए वह सदैव अपर्याप्त ही रहता है और जो और जैसा मिला है वह भी भला टिकता कहां है ? ऐसे में व्यक्ति दुःखी होगा ही । इस प्रकार दुःख का सीधा संबंध असत् से जुड़ा है । जब ज्ञान हो जाता है कि असत् का स्थाई भाव नहीं है तो व्यक्ति इसमें आसक्त ही नहीं होगा । आसक्ति के न होने पर अभाव स्वतः ही मिट जाता है ।

     लेख का मूल वाक्य है - “अभाव सदैव असत् का ही होता है, सत् में कोई अभाव नहीं है ।” अभाव क्या है ? अभाव है, जीवन में कुछ न कुछ कमी का अनुभव होना । जब मन कहता है: “यह नहीं है”, “और चाहिए”, वहीं अभाव है। 

       असत् क्या है ? असत् है, जो बदलता है, टिकता नहीं । जैसे; शरीर, पैसा, पद, सुख आदि । ये सब आते हैं, जाते हैं, कभी पूरे नहीं लगते । इसलिए इनमें हमेशा कमी महसूस होती है ।

          सत् क्या है ? सत् वह है, जो सदा है, जो पूरा है । जैसे: अस्तित्व, आत्मा, शुद्ध चेतना । यह कभी भी बदलता नहीं है, घटता नहीं है और न ही कभी बढ़ता ही है । जो पूरा है, उसमें कमी हो ही नहीं सकती ।

      सीधा सा नियम है - जहाँ परिवर्तन है, वहाँ अभाव है । जहाँ स्थिरता है, वहाँ कोई अभाव नहीं है । इसलिए अभाव असत् का गुण है और पूर्णता सत् का स्वभाव है । गहरी नींद में कुछ चाहिए नहीं, कुछ खोया हुआ नहीं लगता । क्यों ? क्योंकि उस समय आप सत् के पास होते हैं।

    मूल बात - अभाव वस्तु में नहीं, अस्थिरता में है । सत् स्थिर है, इसलिए उसमें अभाव होना असंभव है ।

         प्रश्न है कि मन असत् की ओर ही क्यों भागता है ? क्योंकि असत् से मिले सुख को ही मनुष्य जीवन का सत्य समझ लेता है और उसी को बार-बार पाने की कामना करता है । इस प्रकार उसका मन सदैव असत् की ओर ही भागता है । मन ही अभाव का अनुभव करता है । 

          अभाव केवल उसी चीज़ में लगता है जो पूरी नहीं है । जो पूरी है, उसमें अभाव नहीं हो सकता । एक सरल उदाहरण: गिलास A — पूरा भरा हुआ । क्या आप कहेंगे इसमें कोई कमी है ? नहीं, क्योंकि गिलास पूरा भरा हुआ है । गिलास B — आधा भरा हुआ है । आप क्या कहेंगे ? आप कहेंगे, “इसमें और पानी आ सकता है, इसलिए इसमें और पानी डालना चाहिए ।” इस प्रकार अभाव केवल आधे भरे गिलास में है, पूरे भरे में नहीं । यही अन्तर है सत् और असत् में ।

       अब “सत्” और “असत्” को इस प्रकार समझिए । सत् जो पूरा, स्थिर और अपने आप में पर्याप्त है । इसलिए इसमें कोई अभाव नहीं है । असत् अधूरा, बदलने वाला और टिकने वाला नहीं है, इसलिए इसमें सदैव अभाव बना रहेगा।

         दैनिक जीवन के उदाहरण से इस बात को समझते हैं । सबसे सटीक उदाहरण है - पैसा । थोड़ा पैसा और चाहिए । ज़्यादा पैसा आ गया फिर भी कहेंगे, और चाहिए । कभी ‘और चाहिए’ कहना क्यों नहीं रुकता ? क्योंकि पैसा असत् है । इसके लिए उत्तरदायी है, हमारा मन । मन कहता है: यह नहीं, वह चाहिए । वह मिल गया तो उसे वह और चाहिए । मन हमेशा असत् से जुड़ा है, इसलिए उसमें सदैव अभाव रहेगा ।

        प्रश्न है कि सत् में कैसे स्थित हुआ जा सकता है ? असत् का निषेध होते ही जीव सत् में स्थित हो जाता है । इसलिए संसार से विमुखता ही सत् का अनुभव करा देती है । बहुत सीधा नियम है : जहाँ “चाहिए, और चाहिए” है, वहाँ असत् है । जहाँ “नहीं चाहिए” है, वहाँ सत् है । अभाव चीज़ों की वजह से नहीं होता, अभाव अधूरेपन की वजह से होता है । सत् पूरा है, इसलिए उसमें अभाव नहीं है ।

           स्वामीजी के सामने प्रश्न आया कि आत्मा तो चेतन है, फिर यह शरीर में क्यों फँसता है ? उनका उत्तर था - “सुख के लिए फँसता है ।” सुख की इच्छा ही काम है । प्रश्न उठता है कि काम से मुक्त होने के लिए क्या करना चाहिए ? काम की उत्पत्ति जहां से प्रारंभ होती है, उसी स्थान पर ध्यान केंद्रित करें तो काम को स्वयं पर प्रभावी होने देने से बचा जा सकता है । 

           परमात्मा अकेले थे, ‘एकाकी न रमते’ । अचानक उनमें आनन्द को अनुभव करने की इच्छा पैदा हुई । ऐसी इच्छा को स्फुरणा कहा जाता है । स्फुरणा वह विचार है, जो अचानक भीतर बिजली की तरह कौंधता है । स्फुरणा केवल चेतन में ही होती है । भगवान इसी स्फुरणा के कारण एक से दो हुए । एक से दो होकर परमात्मा स्वयं तो उस दूसरे में लिप्त नहीं हुए परंतु हम दूसरे में लिप्त हो गए । इस प्रकार स्फुरणा हमारे लिए ‘काम’ बन गई और हम संसार में उलझ गए । स्फुरणा निरन्तर रहने वाली चेतना है, जबकि काम इस स्फुरण से उत्पन्न सापेक्ष क्रिया है । जब स्फुरण अहंकार (अहम् वृत्ति) से जा जुड़ता है तो वह भीतर स्वयं के ‘कर्ता’ होने का भाव पैदा करता है । यहीं से काम, कर्म और भोग पैदा होते हैं ।

         अभाव का अनुभव ‘पर’ में ही होता है, ‘स्व’ में नहीं । यदि मन इस स्फुरण के स्रोत अर्थात् ‘स्व’ पर स्थिर हो जाए, तो आत्म-साक्षात्कार हो जाता है अर्थात् अभाव का अभाव हो जाता है । फिर स्फुरणा ही मुक्ति का मार्ग बन जाती है । स्फुरण वह प्रकाश है, जो परमात्मा के अनुभव को सम्भव बनाता है जबकि काम उस प्रकाश से प्रेरित होकर किया जाने वाला कार्य है । 

      स्वामीजी कहते हैं - “उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओं की इच्छा को ही ‘काम‘ कहते हैं । कामना अभाव में पैदा होती है । अभाव सदैव असत् में रहता है, सत् में अभाव है ही नहीं । परंतु जब सत् असत् के साथ गठजोड़ कर लेता है, तब असत् में उपस्थित अभाव को वह अपने में मान लेता है ।”

       जीवन में अभाव का कब अनुभव होता है ? जब आपको लगता है—“मेरे पास जो है, वह पर्याप्त नहीं है।” यह भावना किसी चीज़ के अधूरे होने से आती है । जो अधूरा है, वही असत् है । जो चीज़ बदलती रहती है, टिकती नहीं है, आज है, कल नहीं रहेगी, वही असत् है। असत् कभी पूरा नहीं लगता, इसलिए उसी में अभाव पैदा होता है।

         जो पूरा है, वही सत् है । जो हमेशा है, बदलता नहीं, अपने आप में पर्याप्त है, वही सत् है । जो पहले से पूरा है, उसे किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं हो सकती ।

         इसलिए स्पष्ट है कि अभाव अधूरेपन (असत्) की अनुभूति है, जबकि पूर्णता सत् की । पूर्णता में अभाव असंभव है । अन्त में कहा जा सकता है कि जिसे कुछ चाहिए, वह असत् में स्थित है । जिसे कुछ नहीं चाहिए, वह सत् में स्थित है । सत् में स्थित होने के लिए सत् - असत् के तादात्म्य को तोड़ना होगा । फिर असत् के अभाव का अनुभव नहीं होगा ।

सार - संक्षेप 

                 अभावों की पूर्ति के प्रयास में हम न जाने कितनी योनियों में भटक चुके हैं तथा आगे न जाने कितनी योनियों में और भटकेंगे । कामना रखेंगे तो भटकना कभी भी नहीं रुकेगा । कामना पूरी होना असम्भव है क्योंकि यह असत् है । असत् कभी पूर्ण नहीं हो सकता, वह तो सदैव अपूर्ण ही बना रहेगा । अपूर्णता ही अभाव पैदा करती है । 

          अभाव का अनुभव केवल मन में ही होता है । मन असत् है, इसलिए उसमें अभाव अनुभव होना असम्भव नहीं है । मन के साथ जब हम गठजोड़ कर लेते हैं तब ही हमें अभाव अपने में अनुभव होता है । हम सत् हैं और मन असत् । असत् के साथ सत् का गठजोड़ बेमेल है परन्तु परमात्मा की माया के कारण हम भ्रमित हो जाते हैं । यह गठजोड़ तभी टूट सकता है जब हमें आत्म-अनात्म का ज्ञान हो जाए, सत् असत् का ज्ञान हो जाए । ऐसा ज्ञान हो जाने से संसार से विमुखता हो जाती है, जो हमें परमात्मा के द्वार तक ले जाती है ।

         ज्ञान हो जाने पर असत् से हुई विमुखता से जीवन में संतोष और शान्ति का पदार्पण होता है । यही आनन्द की अवस्था है । असत् से विमुख हो जाएं या सत् के सम्मुख हो जाएं, दोनों ही हमें सच्चिदानन्द स्वरूप तक ले जाती है । मानव के रूप में जन्म लेने का और इस मनुष्य जीवन का लक्ष्य भी निज स्वरूप की प्राप्ति ही है ।

         सारांश है कि हमें असत् के अनुसार भटकना नहीं है क्योंकि असत् अभाव का अनुभव कराएगा और इस अभाव से काम का जन्म होगा । केवल सुख पाने की इच्छा का त्याग करके हम प्रत्येक अभाव से मुक्त हो सकते हैं । 

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

Saturday, January 31, 2026

त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्

 त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् (त्यागात् शान्ति: अनन्तरम् )

         संसार का प्रत्येक जीव अपने पूर्वकृत कर्मों का फल भोगने को विवश है । ये कर्म उसने अपनी इच्छा को पूरी करने के लिए किए थे । व्यक्ति की प्रत्येक इच्छा पूरी हो जाएगी, ऐसा होना संभव ही नहीं है । जीव को वही मिलता है, जो विधि के विधान के अनुरूप होता है । इच्छा पूरी नहीं होती तो जीव दुःखी हो जाता है और यदि इच्छानुसार सब कुछ मिल गया तो वह उसके पास टिकता नहीं है । आप कितना ही प्रयास कर लें, उसको आप रख ही नहीं सकते । एक इच्छा पूरी नहीं हुई कि दूसरी इच्छा पैदा हो जाती है, इस प्रकार विभिन्न इच्छाओं के द्वन्द्व से घिरा जीव जीवनभर अशान्ति में जीता है ।

        स्वामीजी कहते हैं कि मनुष्य की सभी इच्छाऐं पूरी नहीं हो सकती, इसलिए इच्छाऐं रखना व्यर्थ है । इच्छाओं के त्याग से अनन्त शान्ति मिल जाती है । जो अपनी नहीं है, वह हमारे पास रह नहीं सकती । उसका त्याग तो स्वतः हो रहा है । जैसे शरीर के लिए विषाक्त वस्तुओं, मल-मूत्र, मवाद आदि के त्याग से भी हमें शान्ति का अनुभव होता है तो फिर अन्य इच्छाओं के त्याग से क्यों नहीं होगा ? 

          स्वामीजी कहते हैं कि जिसका त्याग स्वतः हो रहा है, उसको हम अपने पास सदैव के लिए रखना चाहें, तो भी नहीं रख सकते । जो शरीर आज जन्मा है, उस शरीर को भी एक दिन मरना ही है । इस प्रकार उसका त्याग तो स्वतः ही हो रहा है । हमें तो केवल जीने की इच्छा का त्याग करना है । गीता में भगवान कहते हैं - ‘त्यागाच्छान्तिरननन्तरम्’ अर्थात् त्याग से तत्काल ही परमशान्ति प्राप्त हो जाती है । प्रश्न है कि त्याग क्या है ? परम शान्ति को उपलब्ध होने के लिए त्याग किसका किया जाए ? चलिए ! ‘त्याग से शान्ति’ विषय पर चिन्तन प्रारम्भ करते हुए लेख में आगे बढ़ते हैं ।

           प्रकृति ने संसार के प्रत्येक जीव को किसी भी वस्तु, शरीर, पदार्थ आदि को पकड़ने और छोड़ने के लिए आवश्यक अंग दिए हैं । इन अंगों के माध्यम से वह जीवन भर ‘पकड़ने-छोड़ने’ में ही व्यस्त रहता है । वह शरीर की क्रियाओं के लिए आवश्यक ऊर्जा के लिए भोजन ग्रहण करता है । शरीर को सुचारू रूप से चलाने के लिए भोजन करना आवश्यक है । भोजन से ही जीव को पकड़ने और छोड़ने की ऊर्जा मिलती है । इस ऊर्जा से जीव इधर-उधर घूमता है, अपने लिए भोजन प्राप्त करता है । भोजन से प्राप्त ऊर्जा से ही भोजन का पाचन होता है और इसी ऊर्जा से भोजन से उत्पन्न ऊर्जा का संचय तथा विषाक्त पदार्थों को शरीर के बाहर छोड़ा जाता है ।  

          पकड़ना और छोड़ना, जब तक मात्र क्रिया रहती है, तब तक तो जीव इसमें उलझता नहीं है परंतु जब यही क्रियाएँ कर्म बन जाती है, तब मनुष्य स्वयं पकड़ने-छोड़ने में उलझ जाता है । जहां जीव ने इन क्रियाओं को अपने द्वारा होना मान लिया वहीं वह इन क्रियाओं का कर्ता बन बैठता है । क्रिया जब तक प्रकृति के द्वारा होना मानते हैं तब तक वे जीव को प्रभावित नहीं करती परन्तु जब जीव इन क्रियाओं को अपने द्वारा करना मान लेता है तब वे उसके कर्म बनकर उसे प्रभावित करने लगती है । 

      जिस प्रकार प्रत्येक क्रिया का परिणाम अवश्य होता है, उसी प्रकार प्रत्येक कर्म का फल भी मिलना निश्चित है । प्रत्येक क्रिया के परिणाम की भोक्ता केवल प्रकृति होती है जबकि कर्म का परिणाम जीव को भोगना पड़ता है । इसीलिए कहा जाता है कि जो कर्ता बनता है, उसको उस कर्म के फल का भोक्ता भी होना पड़ता है ।

            हमारा जीवन हमारे ही कर्मों का परिणाम है क्योंकि हमने कभी न कभी कोई कर्म अपनी इच्छा के वशीभूत होकर किया है । जब किसी कारण से उस कर्म का वांछित परिणाम उस शरीर के जीवन में नहीं मिल पाता तब जीव उस जीवन को अशान्त रहते हुए जीता है । परिणामस्वरूप जीव को अपनी इच्छा के अनुसार फल प्राप्ति के लिए संसार में फिर से एक नया शरीर लेकर आना पड़ता है । उसे पूर्व जन्म में किए गए कर्मों के फल इस नए शरीर में आकर मिलते हैं । अपने मनोनुकूल फल मिल जाने पर भी उसे शान्ति कहाँ मिल पाती है ? कर्म-फल मिलते ही जीव की उस फल में आसक्ति हो जाती है, ममता हो जाती है । मिले हुए फल में ममता/ आसक्ति कर लेना ही जीव के बंधन का कारण है । ऐसी आसक्ति के परिणाम स्वरूप जीव फिर से वैसा ही फल प्राप्त करने की पुनः कामना कर बैठता है । प्रत्येक कामना को पूरा करने के लिए फिर से कर्म करना आवश्यक हो जाता है । इस प्रकार जो जीव है, वह फल, आसक्ति और कर्म के चक्रव्यूह में फँस जाता है और उसे जीवन में कभी शान्ति नहीं मिलती ।

            इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि जीव के जीवन में पकड़ना और छोड़ना कितना महत्वपूर्ण है । पकड़ने को ग्रहण करना कहा जाता है और छोड़ने को त्याग । जीव चौरासी के चक्रव्यूह में फँसा ही इसलिए है कि वह पकड़ने ही पकड़ने में लगा हुआ है, छोड़ना कुछ भी नहीं चाहता । जो कुछ छूट रहा है वह स्वतः ही छूट रहा है, उसमें जीव की कोई भूमिका नहीं है । भोजन के अपशिष्ट का शरीर से बाहर निकलना कोई छोड़ना नहीं है, उसका तो स्वतः ही त्याग होना निश्चित है । जब तक अपनी इच्छा से ग्रहण करना नहीं छूटेगा तब तक जीव यूँही चौरासी में भटकता रहेगा । जीव के सामने मुख्य समस्या यही है कि उसका ग्रहण करना कैसे छूटे ? इसके छूटे बिना सांसारिक चक्रव्यूह से मुक्त होना सम्भव नहीं है ।

         प्रश्न उठता है कि संसार के इस चक्रव्यूह से मुक्त कैसे हुआ जा सकता है ? इसका एक शब्द में छोटा सा उत्तर है - त्याग ।

            परमात्मा शाश्वत हैं और प्रकृति परिवर्तनशील । परमात्मा का अंश जीव स्वयं है और प्रकृति का अंश है, संसार और शरीर । शरीर जिस दिन से अस्तित्व में आया है, उसी दिन से समाप्ति की ओर अग्रसर है । जन्म के साथ ही शरीर का मृत्यु की ओर चलना प्रारंभ हो जाता है । शरीर की मृत्यु हो जाने के बाद भी क्या जीवन कभी रूका है ? जीवन कभी नहीं रुकता । इस प्रकार फिर एक नए शरीर का जन्म और उसका पुनः मृत्यु की ओर प्रस्थान । यही तो संसार-चक्र है । शरीर का हो रहा क्षरण ही त्याग है जो स्वतः हो रहा है, इसको रोकने में जीव बेबस है । वह चाहकर भी शरीर को मरने से नहीं रोक सकता । इस प्रकार शरीर के छूटने को त्याग नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह तो अपने आप हो ही रहा है । फिर त्याग किसको कहा जाता है ? प्रकृति से जो मिला है उसका छूटना निश्चित है परन्तु जीवन में जो आपने अपने स्तर पर ग्रहण किया है, उसको छोड़ना ही वास्तव में त्याग है । आइए ! जानते हैं कि हमने जीवन में क्या क्या ग्रहण किया है जिनको छोड़ना संसार-चक्र से मुक्त होने के लिए आवश्यक है ?

           जीव संसार में शरीर लेकर आता है, उसमें आसक्त होकर सुख-दुःख भोगता है और जीवनभर दुःखी रहता है । वास्तव में देखा जाए तो इस संसार में दुःख ही दुःख है । इसीलिए संसार को दुखालय कहा गया है । दुःख का कारण है, अपने लिए सुख चाहना । जब तक सुख की कामना पैदा नहीं होगी तब तक दुःख आपके द्वार पर दस्तक तक दे नहीं सकता । 

         हमने जीवन में दुःख ही दुःख देखे हैं, सुख आज तक मिला नहीं है । जब तक हम दुःख के कारण को नहीं जानेंगे तब तक हमें सुख नहीं मिलेगा । हमारे दुःख का कारण ही सुख पाने की इच्छा है । इस प्रकार कहा जा सकता है कि दुःख के मूल में हमारी असंख्य कामनाएँ ही हैं । सुख की कामना जीवन में कभी पूरी नहीं हो सकती क्योंकि एक कामना जब तक पूरी होने वाली होती है कि तत्काल ही दूसरी कामना उठ खड़ी होती है । दूसरी कामना का पैदा होना ही लोभ है । सुख-भोग की इच्छा ‘काम’ कहलाती है तथा जब इस इच्छा का विस्तार होता है और मनुष्य संग्रह करने को उद्यत होता है, तब इसे ‘लोभ’ कहा जाता है । जब कामना पूरी नहीं होती तो क्रोध का जन्म होता है । इस प्रकार दुःख के मूल में कामना है और कामना के दो उपोत्पाद लोभ और क्रोध उसके सहयोगी है । 

        काम, क्रोध और लोभ - ये तीनों ही मनुष्य को अशान्त और दुःखी करते हैं । दुःखपूर्वक जीना ही नरक भोगना है । तभी गीता में भगवान ने इन तीनों का त्याग करने का कहा है ।

       त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमतमात्मन: ।

       काम: क्रोधस्तथा लोभस्ततस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ।।गीता -16/21 ।।

काम, क्रोध, और लोभ - ये तीन प्रकार के नरक के द्वार हैं और पतन के कारण हैं, इसलिए इन तीनों का त्याग कर देना चाहिए ।

          स्वामीजी कहते हैं कि ‘मैं चाहूं वैसा हो जाए’ ही काम है । जब प्रथम बार किसी एक विषय का संयोग सम्बन्धित इंद्रिय के साथ होता है, तब शरीर (मन) को एक नया अनुभव होता है जिसे सुख अथवा दुःख कहा जाता है । उस सुख-दुःख के अनुभव से जीव का विषय के साथ एक सम्बन्ध बन जाता है, जिसे आसक्ति कहा जाता है । उसी सम्बन्ध के कारण मनुष्य उस विषय को पुनः प्राप्त करने की कामना करता है । इस प्रकार मनुष्य ‘जैसा चाहता है वैसा होने’ के लिए अर्थात् अपनी कामनापूर्ति के लिये संकल्प करता है । संकल्प वह योजना है जिसके अनुसार कामना पूरी करने के लिए कर्म करने का क्रम निश्चित किया जाता है । कहने का अर्थ है कि शारीरिक सुख प्राप्ति के निश्चित लक्ष्य तक पहुंचने के लिए पहले संकल्प होता उसके पश्चात् कामना पूरी करने के लिए कर्म किए जाते हैं ।

         कामना पूरी हो जाए तो फिर वैसे ही सुख की प्राप्ति के लिए पुनः उस विषय की कामना उत्पन्न हो जाती है । इस प्रकार दिन प्रतिदिन नए-नए विषयों की असंख्य कामनाएं उत्पन्न होती रहती है । इसी को लोभ कहा जाता है । लोभ के कारण उस विषय, वस्तु अथवा पदार्थ के प्रति राग उत्पन्न हो जाता है । लोभ से उत्पन्न हुआ राग संग्रह को प्रेरित करता है क्योंकि व्यक्ति प्राप्त हुए को न तो खोना चाहता है और न ही बाँटना, उसके लिए तो प्राप्त सदैव अपर्याप्त ही रहता है । जब संग्रह एक सीमा से अधिक बढ़ जाता है तब तुलनात्मक दृष्टि से व्यक्ति अन्यों से अपने को ऊंचा समझने लगता है । इसी भावना को अहंकार कहा जाता है । 

          कामनाओं का न तो अन्त है और न ही सभी कामनाएं पूरी हो सकती है । जब कामनाओं की पूर्ति में बाधा आती है तो व्यक्ति को क्रोध आता है । यह क्रोध आता है बाधक (बाधा उत्पन्न करने वाले) के प्रति । काम की पूर्ति में आई बाधा से उत्पन्न क्रोध से कामी के मन में बाधक के प्रति जो भावना उत्पन्न होती है, उसे द्वेष कहा गया है । क्रोध से ही सभी विकार पैदा होते हैं क्योंकि क्रोध से मनुष्य की बुद्धि सुन्न हो जाती है, जिसके कारण व्यक्ति में सोचने-समझने की शक्ति नहीं रहती । बुद्धि का उपयोग न होने के कारण मनुष्य का पतन होना निश्चित है ।

        इस प्रकार स्पष्ट होता है कि काम के कारण ही मनुष्य के भीतर लोभ, संग्रह, क्रोध और राग-द्वेष आदि विकार पैदा होते हैं । ये सभी विकार आगन्तुक है, इनका स्वरूप के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि ये विकार व्यक्ति के अपने नहीं हैं । ये शरीर में जैसे आए हैं, वैसे ही अपने आप चले जाएंगे । स्वामीजी उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जैसे खिड़की खुली रह जाती है तो कुत्ता घर में प्रवेश कर जाता है । जब उसे कुछ नहीं मिलेगा तो वह घूमकर स्वतः ही वापस चला जाएगा । इसी प्रकार हमें विकारों से उदासीन बने रहना है, उनके साथ सम्बन्ध नहीं बनाना है । सम्बन्ध नहीं बनाएंगे तो विकारों का त्याग स्वतः ही हो जाएगा । विकारों का त्याग प्रयास करने से नहीं होता बल्कि उनको अपना और अपने में न मानने से होता है । इस प्रकार क्रोध का त्याग भी स्वतः ही हो जाता है ।

         हमने जितने भी विकारों की चर्चा की है, वे सब दुःख के कारण है । इन सभी विकारों का जनक केवल और केवल एक काम ही है । इस प्रकार स्पष्ट होता है कि काम ही दुःख के मूल में है । यह काम है क्या ? शरीर के सुख के लिए वस्तु/पदार्थ अथवा व्यक्ति को प्राप्त करने की इच्छा करना । “मैं चाहूँ वैसा हो जाय” यही काम है । हम सब अपने शरीर को सुख मिले, इसकी इच्छा करते हुए चाहते हैं कि ऐसा हो जाय और जिससे हमारे सुख में बाधा पड़ती नज़र आए, ‘वैसा नहीं हो’ चाहते हैं । ‘ऐसा हो और ऐसा नहीं हो’, ऐसी इच्छा रखना ही काम है । 

       ‘ऐसा हो जाय’ इस कामना को पूरा करने के लिए व्यक्ति कर्म करता है । शरीर में विभिन्न क्रियाएं स्वतः ही होती रहती है परन्तु जब इन क्रियाओं के होने से मनुष्य को शारीरिक सुख का अनुभव होता है, तो उसे लगता है कि यह क्रिया मेरे द्वारा ही की जा रही है । इस प्रकार शरीर के द्वारा होने वाली प्रत्येक क्रिया, जिससे मनुष्य की मन चाही पूरी हो जाती है, वह क्रिया कर्म बन जाती है । इस प्रकार स्पष्ट होता है कि प्रत्येक कर्म के मूल में काम ही है । 

          प्रश्न उठता है कि काम इस शरीर में कैसे प्रवेश करता है ? मनुष्य जन्म लेते समय निर्मल और मासूम सा प्रतीत होता है । काम के कारण धीरे-धीरे उसकी प्रवृत्ति बदलती जाती है । काम शरीर में प्रवेश करता है, इंद्रियों के माध्यम से । धीरे-धीरे यह काम मनुष्य के मन- बुद्धि को अपने अधीन कर लेता है । काम के प्रति आसक्त हुए मनुष्य के जीवन में ऐसी अवस्था आती है जब वह पूर्ण रूप से काम के अधीन हो जाता है और ऊल-जलूल हरकतें करते हुए दिशाविहीन हो जाता है । जीवन के उद्देश्य से हुए भटकाव का उसको भान तक नहीं होता और एक दिन उसके शरीर का जीवन समाप्त होने की अवस्था तक पहुंच जाता है ।

         काम मनुष्य के शरीर में कैसे प्रवेश करता है ? चलिए ! इसको समझने के लिए शरीर-संरचना (Anatomy) और उसकी कार्यिकी (Physiology) की ओर दृष्टिपात करते हैं । 

        मनुष्य शरीर पांच भौतिक तत्वों से बना है । शरीर में स्थित दस इंद्रियों में पांच तो ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं और पांच ही कर्मेन्द्रियाँ होती है । कुल पांच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं जिनमें कान श्रवणेन्द्रिय है, नासिका घ्राणेंद्रिय है, नेत्र दर्शनेन्द्रिय है, मुख में स्थित जिव्हा स्वादेन्द्रिय है और त्वचा स्पर्शेन्द्रिय है । पांच कर्मेन्द्रियाँ इस प्रकार हैं - वाक् इंद्रिय ( vocal chords), हाथ, पैर, उपस्थ (प्रजनन और मूत्र विसर्जन) इंद्रिय, और गुदा द्वार ।

           काम ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से शरीर में प्रवेश करता है और मन-बुद्धि पर अपना अधिकार जमाते हुए मस्तिष्क के उच्चतम स्थान (अहम्) पर जा बैठता है । काम के वशीभूत होकर मन विभिन्न कर्मेन्द्रियों से कर्म करवाता है । ये कर्मेन्द्रियाँ काम को और अधिक पुष्ट करती हैं । इस प्रकार मनुष्य काम के द्वारा फैलाए गए मकड़ज़ाल में बुरी तरह फँस जाता है । इस प्रकार स्पष्ट होता है कि ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से काम उत्पन्न होता है और काम की पूर्ति क्रिया (कर्म) के माध्यम से कर्मेन्द्रियों द्वारा होती है ।

          शरीर की प्रत्येक क्रिया प्रकृति के नियमों के अनुसार होती है । उन क्रियाओं को आप अपनी इच्छाओं के अनुरूप बदल नहीं सकते । हाँ, शतप्रतिशत सत्य यही है । अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए हम इन क्रियाओं को अपने अनुसार करने का प्रयास अवश्य करते हैं और उसमें कुछ सीमा तक सफल होते प्रतीत भी होते हैं । कामनाओं की सफलता के लिए जो क्रिया सम्पन्न होती है उसको अपने द्वारा किया जाना मान लेना ही क्रिया को कर्म की श्रेणी में ला खड़ा कर देता है अन्यथा तो आपके द्वारा किया जाने वाला प्रत्येक कर्म वास्तव में प्रकृति में होने वाली क्रिया मात्र ही है । 

           शरीर में होने वाली प्रत्येक क्रिया प्रकृति के गुणों के कारण सम्भव होती है । शरीर में किस गुण की मुख्यता है, उसी पर क्रिया की गुणवत्ता निर्भर करती है । गुण की प्रधानता आपका स्वभाव निर्धारित करती है । स्वभाव को परिवर्तित करना केवल मनुष्य जीवन में ही सम्भव है । स्वभाव परिवर्तन से गुण परिवर्तित हो जाते हैं और गुणों में आए परिवर्तन से स्वभाव बदल जाता है । स्वभाव संस्कार बन अगले जन्म (भावी जीवन) को निर्धारित करता है । यही संस्कार नए जीवन में स्वभाव बन परिलक्षित होते हैं । इस प्रकार कहा जा सकता है कि गुण और स्वभाव एक दूसरे को परिवर्तित कर सकने में सक्षम हैं ।

             गुणों से हो रही क्रियाओं में आसक्त हो जाना ही गुणों का संग करना है । जिन क्रियाओं के प्रति आपका आसक्त भाव है, प्रकृति उन्हीं क्रियाओं के होने में उत्तरदायी गुणों की वृद्धि आपके स्थूल शरीर में करती रहती है । गुणों में होने वाले ऐसे परिवर्तन एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है । आज अगर शरीर तामसिक गुण प्रधान है, वह कल सात्विक गुण प्रधान में भी परिवर्तित हो सकता है । सब कुछ आपकी उस इच्छा पर निर्भर करता है जिसके अनुसार आप जैसा होना/करना चाहते हैं । स्थूल शरीर के अन्त समय में आपके शरीर में जिस गुण की प्रधानता होगी, आपका भावी शरीर भी वैसे ही प्रधान गुण वाला होगा । (कारणं गुणसंगोस्य सदासद्योनि जन्मसु - गीता - 13/21 )

            पूर्वजन्म से मिले संस्कार के अनुसार ही स्वभाव और गुण नए जीवन में आते हैं । उन गुणों से ही विभिन्न क्रियाएँ संपन्न होती हैं । उन क्रियाओं का एक निश्चित परिणाम होता है । उस परिणाम अर्थात् उस क्रिया के फल में जब आसक्ति हो जाती है, तब वह क्रिया ही कर्म बन जाती है । हमें जीवन में किसी भी क्रिया के फल में आसक्ति नहीं करनी है अन्यथा सांसारिक बन्धन पैदा कर लेंगे । जब फ़लासक्ति नहीं होगी तो गुण और स्वभाव भी परिवर्तित होने लगेंगे और भावी जन्म भी उच्च श्रेणी का होगा । इसीलिए कहा जाता है कि ‘your life is not by chance but by your choice’ । अब यह हमारे ऊपर निर्भर है कि हम गुणों से होने वाली क्रिया को उससे मिलने वाले फल में आसक्त होकर कर्म बनाते हैं अथवा अनासक्त रहते हुए क्रिया को साक्षी भाव से केवल होते हुए देखते हैं ।

        अपनी बात को थोड़ा और स्पष्ट करने का प्रयास करता हूँ । शरीर के निर्वाह के लिए सांस लेना और भोजन करना आवश्यक है । इसके लिए होने वाली क्रियाएँ, श्वसन और पाचन आदि मात्र क्रिया है, कर्म नहीं । ये कर्म तब बनती हैं जब जीव उनको करने में अपनी भूमिका मानने लगता है । इसमें जीव की भूमिका भला कैसे हो सकती है ? आप खाना खा सकते हैं (कर्म) परंतु पाचन (क्रिया) आपके हाथ में नहीं है । समागम (कर्म) आप कर सकते हैं परंतु रज (अंडे) का निषेचन (क्रिया) करना आपके नियंत्रण में नहीं है । जब परिणाम आपके हाथ में नहीं है तो फिर क्रिया पर आपका नियंत्रण कैसे हो सकता है ? यदि नियन्त्रण होता तो संसार में एक भी स्त्री बांझ नहीं कहलाती और कोई व्यक्ति जीवन में कभी भी अपच का शिकार भी नहीं होता । 

               जिस क्रिया पर आप अपना नियन्त्रण होना मानते हैं, वे ही आपके कर्म बन जाती हैं । परन्तु ध्यान में रहे, आप प्रयास कर कर्म भले ही कर लें, परिणाम आपकी सोच के अनुसार ही होगा, ऐसा होना सदैव के लिए सम्भव नहीं है, संयोग से कभी हो जाए वह बात अलग है ।

       मनुष्य के शरीर में पांच कर्मेन्द्रियाँ हैं । परमात्मा ने मनुष्य को अधिकार दिया है कि वह उनसे अपनी इच्छानुसार कुछ क्रियाऐं करवा सकता है, तभी इनको कर्मेन्द्रियाँ कहा जाता क्रियेन्द्रिय नहीं । उसकी यह इच्छा ही उसके गुणों और स्वभाव में परिवर्तन लाती है । परिवर्तन के अनुसार ही उसका भावी जीवन निश्चित होता है । इनके द्वारा होने वाली क्रिया को कर्म भले ही कह दें पर वे कर्म न होकर क्रिया ही होती हैं क्योंकि प्रत्येक कर्म का परिणाम भी पूर्व निर्धारित होता है, व्यक्ति के नियंत्रण में नहीं होता । हाथ, पैर आदि का नियंत्रण जिस शक्ति के पास है वही उस क्रिया को नियंत्रित कर सकती है, कोई अन्य नहीं । हाँ, हम इसको अपने द्वारा मान सकते हैं, पर नियंत्रण तो उस अदृश्य शक्ति के पास ही रहता है ।

          तो फिर क्या हम कर्म करना छोड़ दें ? ऐसा करना सम्भव भी नहीं है क्योंकि प्रकृति में क्रिया होगी ही और आपका यह शरीर प्रकृति का ही एक अंग है । शरीर है तो उसमें क्रिया होगी ही और उस क्रिया में आसक्ति रखने से कर्म भी होंगे । इस जीवन में आसक्ति नहीं करेंगे तो क्या, किसी पूर्व जीवन में कोई आसक्ति रही थी तभी तो यह जीवन मिला है । उस पूर्व जीवन में रही आसक्ति के कारण ही तो आप इस जीवन में कर्म करने को विवश हुए हैं । अतः कर्म का त्याग सम्भव ही नहीं है । हाँ, प्रत्येक कर्म को प्रकृति की क्रिया मान लेने से इस जीवन में न तो कर्म में आसक्ति रहेगी और न ही उसके फल में ।

        प्रश्न उठता है कि मनुष्य किसके प्रति आसक्त होता है ? कर्म में अथवा उसके फल में । मनुष्य सबसे पहले क्रिया के परिणाम (फ़ल) में आसक्त होता है । फल के प्रति हुई आसक्ति उसे क्रिया (कर्म) में आसक्त कर देती है । कर्म को क्रिया बनाने के लिए हमें फ़लासक्ति का त्याग करना होगा । परिणाम से दृष्टि हटी नहीं कि प्रत्येक कर्म क्रिया बन जाता है, गुणों की प्रधानता बदलने लगती है और गुणातीत अवस्था की प्राप्ति हो जाती है । इसी प्रकार गुणों के परिवर्तन से स्वभाव बदलता है और एक दिन स्वभाव कहीं पीछे छूट जाता है और व्यक्ति अपने स्वरूप को पा लेता है ।


          कर्म के फल में आसक्ति ही मनुष्य के बन्धन का कारण है - फलेसक्तो निबध्यते (गीता -5/12) । इसलिए कर्म-फल में आसक्ति का त्याग ही बन्धन-मुक्त होने के लिए आवश्यक है । यही गीता में भगवान द्वारा अर्जुन को कहा गया कर्म-योग है । कर्म-योग के लिए ज्ञान होना आवश्यक है । यही कारण है कि भगवान ने गीता में सबसे पहले अर्जुन को सांख्य-योग कहा है । कर्म-योग में ज्ञान, सहयोगी की भूमिका में है । 


          जीवन में जब परमात्म-भक्ति का उदय होता है तब कर्म और ज्ञान, दोनों योग स्वतः ही सध जाते हैं । कर्मयोगी तो कर्म को करने में रुचि रखता है इसलिए वह निष्काम-भाव से कर्म करते हुए संसार की सेवा करता है । ज्ञान इसमें सहयोग करता है । ज्ञानी की दृष्टि में संसार और परमात्मा दो रहते हैं । कहने को तो ज्ञानी अद्वैतवादी होता है परन्तु वास्तव में वह सदैव द्वैत की बात करता है क्योंकि ज्ञानी का देहाभिमान छूटना बड़ा मुश्किल होता है । ज्ञानयोगी संसार को असत् मानता है और परमात्मा को सत् । इसी ज्ञान के आधार पर कर्मों में रत कर्मयोगी अपने आपको संसार की सेवा में समर्पित करते हुए परमात्मा की ओर गति करता है ।

          भक्ति में केवल एक भगवान की ओर ही दृष्टि रहती है । केवल भक्त ही संसार को परमात्मा का स्वरूप समझता है । भक्त चहूँ ओर एक परमात्मा को ही देखता है । यही कारण है कि भक्ति में द्वैत कहीं है ही नहीं । दो कहीं है ही नहीं, केवल एक ही है - वासुदेव सर्वम् । जब केवल एक ही है तो फिर उसे एक कहना भी उपयुक्त नहीं है । इसलिए भक्त की दृष्टि में सर्वम् है ही नहीं, केवल वासुदेव ही है । इसलिए परमात्मा के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हो जाना ही जीवन का एक मात्र लक्ष्य होना चाहिए । 

          प्रश्न उठता है कि फिर जीवन में त्याग का महत्व क्या है ? त्याग का महत्व इसलिए है क्योंकि बिना त्याग के भक्त होना सम्भव ही नहीं है । फिर एक प्रश्न - त्याग कौन करे ? त्याग करे वह व्यक्ति, जो स्वयं के मूल स्वरूप को भूलकर संसार के तुच्छ पदार्थों को चाहता है । त्याग कैसे करें ? संसार के पदार्थों, वस्तुओं और व्यक्तियों को अपनी और अपने लिए न मानें । क्या इसका अर्थ यह है कि संसार की वस्तुओं और व्यक्तियों का त्याग कर दें ? नहीं, ये आपके हैं ही नहीं । जो आपके नहीं है, आपको उनके त्याग का अधिकार ही कहाँ रह जाता है ? आप चाहे इनको कितना ही अपना मानें, ये आपके पास रहेगी भी नहीं । इनका त्याग तो स्वतः ही हो रहा है । जिनका त्याग अपने आप हो रहा है, उसका त्याग आप कैसे करोगे ? इनको तो आपको केवल अपना और अपने लिए नहीं मानना है, त्यागना तो आपको कुछ और ही है ।

            अन्त में बड़ा ही महत्वपूर्ण प्रश्न कि फिर त्याग किसका करें ? जो आपके पास जन्म से पहले भी नहीं थी और शरीर की मृत्यु हो जाने के उपरांत भी आपके साथ नहीं जाएगी, उनका त्याग आपको करना है अन्यथा उनका त्याग तो स्वतः होना ही है । आपने जो कुछ इस संसार में आकर अर्जित किया है, इसी संसार से किया है, उस सबको इसी संसार को लौटा दें । यह भले ही त्याग न हो परन्तु यह आपके जीवन में शांति का मार्ग अवश्य प्रशस्त करेगा । इसी लिए स्वामीजी कहते हैं कि धन का सुख उसको पकड़ने (संग्रह करने) में नहीं है, धन से सुख तो उसको छोड़ने में ही मिलता है । 

              वस्तु/पदार्थ को छोड़ना त्याग नहीं है । मान लिया, आपने वस्तु/पदार्थ का त्याग कर भी दिया परन्तु भीतर ही भीतर उसका चिंतन करते रहे तो यह कैसा त्याग हुआ ? 2010 में मैं एक ग्रुप के साथ तिब्बत स्थित कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गया था । संघ में एक प्रौढ़ दम्पति भी थे । उनमें महिला साथी बार-बार अपने पोते को याद कर रही थी । आख़िर मैंने उनको कह ही दिया कि माताजी, अच्छा होता कि आप इस यात्रा पर आती ही नहीं । हम हमारे धामों की यात्रा करते ही इसलिए हैं कि संसार से विमुख हो जाएं और यात्रा के दौरान आने वाली कठिनाइयों को सहन करें । संसार से विमुखता ‘त्याग’ है और रास्ते की कठिनाइयों को सहन करना ‘तप’ । तीर्थयात्रा में ही आपके त्याग और तप की परीक्षा होती है । 

            संसार के वस्तुओं/व्यक्तियों का भौतिक रूप से त्याग कर देना केवल बाहरी और दिखाऊ त्याग है । भौतिक रूप से किया गया त्याग उनसे मिलने वाले रस का त्याग नहीं है । यह रस ही सुख देता है । रस ही हमारी इच्छाओं का जनक है । इसलिए वस्तुओं/व्यक्तियों से सुख पाने की इच्छा को छोड़ देना ही वास्तविक त्याग है । जब तक भीतर रस है, तब तक त्याग दिखते हुए भी त्याग नहीं है । बाहरी त्याग के स्थान पर भीतरी त्याग महत्वपूर्ण है । वस्तुओं/व्यक्तियों से मिलने वाले सुख/रस का त्याग कर देना आन्तरिक/भीतरी त्याग है । आन्तरिक त्याग से सुख प्राप्त करने की कामना का त्याग स्वतः ही हो जाता है ।

          अतः त्याग उन कामनाओं का करें जिनको आपने अपने भीतर, अपने शारीरिक सुख के लिए पैदा की है । ये कामनाएँ पैदा हुई है, फल की इच्छा रखने के कारण । फल की इच्छा के कारण कामनाएँ पैदा हुई हैं और उन कामनाओं की पूर्ति हेतु आपने कर्म किए हैं । प्रत्येक कर्म का एक निश्चित फल होता है । उस फल में आसक्ति हो जाने से आपकी इच्छा पुनः उस फल को प्राप्त करने की होती है । इसी फलेच्छा का नाम कामना है । इस कामना को उत्पन्न होने से रोकने के लिए कर्म-फल की इच्छा का त्याग करना होगा । इसका त्याग होते ही जीवन में अनन्त शान्ति का अवतरण हो जाता है जो आनन्द की अवस्था है । त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ।। गीता - 12/12 ।। इसी त्याग से व्यक्ति परमात्मा के प्रति समर्पित होता है । यही भक्ति है, शरणागति है ।

सार-बिन्दू

     1.त्याग किसका करें? त्याग करें - जो दुःख के कारण है, उनका । जहां दुःख है, वहां नरक है ।

     2. दुःख के मूल में काम है । क्रोध और लोभ तो काम के उपोत्पाद है ।

     3.’काम’ का कारण - “ऐसा होना चाहिए और ऐसा नहीं होना चाहिए ।”

     4. कर्म-फल की इच्छा ही ‘काम’ है ।

     5.कर्म का आधार भी ‘काम’ है ।

     6.ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से काम उत्पन्न होता है और काम की पूर्ति कर्मेन्द्रियों के माध्यम से होती है । 

     7.क्रिया और कर्म में अंतर - प्रकृति के गुणों से क्रिया होती है और गुणों में आसक्ति रखने से कर्म ।

     8. श्वसन, पाचन आदि मात्र क्रिया है, कर्म नहीं । कर्म वे होते हैं जिनके होने अथवा न होने में जीव की भूमिका रहती है । आप खाना खा सकते हैं (कर्म) परंतु पाचन (क्रिया) आपके हाथ में नहीं है । आप समागम (कर्म) कर सकते हैं परंतु अंडे का निषेचन (क्रिया) करना आपके नियंत्रण में नहीं है ।

     9. कर्मेन्द्रियाँ - मनुष्य की इच्छा से कर्म करती है । शेष क्रियाएँ स्वतः होती है ।

    10.फले सक्तो निबध्यते - फल में आसक्ति रखना ही सांसारिक बंधन है । इसलिए फल में आसक्ति का त्याग कर दें । 

    11.कर्म न करना जीव के हाथ में नहीं है - प्रारब्ध के कारण और फल में आसक्ति के कारण कर्मों का त्याग होना इस जीवन में असंभव सा है । अतः कर्म फल की इच्छा का त्याग करना ही श्रेष्ठ है ।

    12.कर्म फल की इच्छा का त्याग ही कर्म योग है जिसमें सहयोगी की भूमिका में ज्ञान है ।

    13.सर्वोत्तम है - परमात्मा के प्रति समर्पण । शरणागति से कर्म-फल की इच्छा त्याग स्वतः हो जाता है और जीवन में अनन्त शांति का अवतरण । त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् (त्यागात् शान्ति: अनन्तरम्)

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल