भोग, रोग और योग -11
भगवान गीता में कहते हैं -
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ।। (6.17)
अर्थात् दुःखों का नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का तथा यथायोग्य सोने-जागने वाले का ही सिद्ध होता है ।
योग भोग का विरोध नहीं करता, बल्कि उसे मर्यादा में रखता है । जहां योग है, वहाँ भोग साधन बनता है, साध्य नहीं । योग न तो संसार से पलायन है और न ही भोग का निषेध । योग तो जीवन को अनुशासित करता है, उसे सजग और अर्थपूर्ण बनाता है । योग इंद्रियों का दमन नहीं है बल्कि उनका परिष्कार है ।
जब मनुष्य भोग को ही जीवन का लक्ष्य बना लेता है, तब रोग अनिवार्य हो जाता है । जब योग जीवन की दृष्टि बन जाता है, तब रोग भी गुरु बनकर विदा हो जाता है ।
आध्यात्मिक जीवन का सार यही है कि हम सुख की खोज बाहर नहीं, स्वयं के भीतर ही करें । जब भीतर संतुलन (समता) स्थापित हो जाता है, तब न तो भोग बाँधता है और न ही रोग डराता है । तब जीवन सहज, शान्त और सार्थक हो जाता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।