ज्ञान -2
आधुनिक विज्ञान की कई पुस्तकें हैं फिर भी शिष्य को शिक्षक के मार्गदर्शन में प्रयोगशाला में उन पुस्तकों में समाहित ज्ञान को सिद्ध करना होता है । उदाहरणार्थ - रसायन विज्ञान में हाइड्रोजन गैस बनाने की विधि लिखी है कि जस्ते ( Zinc) के टुकड़े पर जब कोई भी अम्ल (Acid) डाला जाता है तो हाइड्रोजन गैस बनती है । जिस विद्यार्थी ने प्रयोगशाला में अपने हाथों से इस ज्ञान को सिद्ध कर लिया वास्तव में केवल उसी ने उस विधिक ज्ञान को अनुभव किया है ।
पूर्वकाल में हमारे गुरुकुल शास्त्रीय ज्ञान को अनुभव कराने की प्रयोगशाला हुआ करते थे जहां हमारे ऋषिगण अपने शिष्यों को ज्ञान का अनुभव कराते थे । दुर्भाग्य से आज गुरुकुल लगभग समाप्त हो गए हैं । इसका परिणाम यह हुआ कि शास्त्रों को कथा बनाकर कहने वालों की तो भीड़ बढ़ गई और उन शास्त्रों में समाहित ज्ञान को अनुभव करा सकने वाले ऋषियों का अकाल पड़ गया ।
सत्य की खोज में सबसे बड़ी बाधा यह भ्रम है कि हम पहले से ही सबकुछ जानते हैं । सीखने और जानने में बड़ा अन्तर है । सीखना मात्र ज्ञान है और उस ज्ञान का अनुभव कर लेना जानना है । हरिः शरणम् आश्रम के आचार्य श्री गोविन्दराम जी शर्मा कहते हैं - “सीखे हुए ज्ञान में ही अनुभव छिपा हुआ है । खोज करें ।” यह खोज तभी होगी, जब उस सीखे हुए ज्ञान का जीवन में प्रयोग करेंगे । प्रयोग से ही उस ज्ञान की उपयोगिता सिद्ध होगी । सबके पास ज्ञान पर्याप्त है । उस ज्ञान को उपयोग में जो कोई ले लेता है, उसको आत्म-ज्ञान हो जाता है, वह सत्य तक पहुँच जाता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
No comments:
Post a Comment