Monday, March 30, 2026

ज्ञान - बन्धन या मुक्ति

 ज्ञान - बंधन या मुक्ति 

        ज्ञान एक ऐसा शब्द है जो अपनी उपस्थिति, अभिव्यक्ति तथा आचरण के अनुसार अपना अर्थ बदलता रहता है । यही कारण है कि अज्ञान का अर्थ ज्ञान की अनुपस्थिति नहीं है बल्कि विपरीत ज्ञान होने को अज्ञान कहा जाता है । अज्ञान का अस्तित्व ज्ञान पर ही टिका है अन्यथा अज्ञान का स्वयं का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है । यह ठीक ऐसे ही है जैसे अंधकार स्वयं का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है बल्कि उसका अस्तित्व प्रकाश पर टिका होता है ।

        वास्तविक ज्ञान वह है, जो मुक्ति का साधन बनता है और वह साधन तभी बनता है जब उसको आचरण में लाते हुए जीवन को उसी अनुरूप बनाया जाए । आचरण में लाया ज्ञान स्वयं बोलता है, व्यक्ति को बोलने की ज़रूरत नहीं होती । बिना उपयोग में लाए ज्ञान को बोझ कहा गया है । उपयोग में लाया ज्ञान कहें अथवा ज्ञान का सदुपयोग करना कहें, दोनों एक ही बात है । ऐसा सदुपयोग किया ज्ञान ही विवेक कहलाता है ।

   ज्ञान सभी जीवों में जन्मजात होता है फिर भी कुछ जीवनभर अज्ञानी बने रह जाते हैं और कोई कोई एक ज्ञानी हो जाता है । आइए ! जानते हैं कि ज्ञान बंधन नहीं है बल्कि मुक्ति का साधन है । हम इस ज्ञान को विवेक बनाकर कैसे उपयोग में ले सकते हैं, यह हमारे ऊपर निर्भर है ।

        ज्ञान और विवेक, दोनों पर्यायवाची शब्द कहे जाते हैं, जिनको समान अर्थ के रूप में लिया जाता है । सत्य तो यह है कि दो शब्द समान अर्थ से प्रतीत होते हुए भी समान नहीं हैं । शब्दों का एक समान अर्थ होते हुए भी स्थानानुसार अलग-अलग शब्द उपयोग में लिए जाते हैं । उदाहरणार्थ - पानी और जल समानार्थी हैं परंतु स्थान के अनुसार इनका अलग अलग उपयोग किया जाता है । जैसे पानी पिया जाता है और जल शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है । ज्ञान और विवेक भी ऐसे ही दो शब्द हैं । ज्ञान प्रत्येक को है परंतु विवेक किसी किसी में होता है । ज्ञान शास्त्र पढ़कर, उन्हें कंठस्थ कर व्यक्त किया जा सकता है परंतु उपयोग में लिए बिना ऐसा ज्ञान केवल तोता-रटन्त के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । ज्ञान का सदुपयोग करना विवेक कहलाता है । ज्ञान यदि कोरा और किताबी है तो वह बँधनकारी है । जो ज्ञान व्यक्ति को मुक्त करदे वही वास्तविक ज्ञान (विवेक) है ।

“सा विद्या या विमुक्तये - ज्ञान वही है जो मनुष्य को मुक्त कर दे ।” (विष्णु पुराण - 1/19/41)

            जिसने ज्ञान का उपयोग नहीं किया वह बद्धज्ञानी है और जिसने इसका सदुपयोग कर लिया वह मुक्तज्ञानी है । बद्धज्ञानी बातें तो लम्बी लंबी करेगा लेकिन उसका मुक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं होगा । मुक्तज्ञानी अव्वल तो बोलेगा ही नहीं और यदि बोला भी तो उसकी वाणी ब्रह्मज्ञान तक ले जाने वाली होगी क्योंकि उसने ज्ञान को जीया है, रटा नहीं । 

          आधुनिक विज्ञान की कई पुस्तकें हैं फिर भी शिष्य को शिक्षक के मार्गदर्शन में प्रयोगशाला में उन पुस्तकों में समाहित ज्ञान को सिद्ध करना होता है । उदाहरणार्थ - रसायन विज्ञान में हाइड्रोजन गैस बनाने की विधि लिखी है कि जस्ते ( Zinc) के टुकड़े पर जब कोई भी अम्ल (Acid) डाला जाता है तो हाइड्रोजन गैस बनती है । जिस विद्यार्थी ने प्रयोगशाला में अपने हाथों से इस ज्ञान को सिद्ध कर लिया वास्तव में केवल उसी ने उस विधिक ज्ञान को अनुभव किया है । 

            पूर्वकाल में हमारे गुरुकुल शास्त्रीय ज्ञान को अनुभव कराने की प्रयोगशाला हुआ करते थे जहां हमारे ऋषिगण अपने शिष्यों को ज्ञान का अनुभव कराते थे । दुर्भाग्य से आज गुरुकुल लगभग समाप्त हो गए हैं । इसका परिणाम यह हुआ कि शास्त्रों को कथा बनाकर कहने वालों की तो भीड़ बढ़ गई और उन शास्त्रों में समाहित ज्ञान को अनुभव करा सकने वाले ऋषियों का अकाल पड़ गया । 

       सत्य की खोज में सबसे बड़ी बाधा यह भ्रम है कि हम पहले से ही सबकुछ जानते हैं । सीखने और जानने में बड़ा अन्तर है । सीखना मात्र ज्ञान है और उस ज्ञान का अनुभव कर लेना जानना है । हरिः शरणम् आश्रम के आचार्य श्री गोविन्दराम जी शर्मा कहते हैं - “सीखे हुए ज्ञान में ही अनुभव छिपा हुआ है । खोज करें ।” यह खोज तभी होगी, जब उस सीखे हुए ज्ञान का जीवन में प्रयोग करेंगे । प्रयोग से ही उस ज्ञान की उपयोगिता सिद्ध होगी । सबके पास ज्ञान पर्याप्त है । उस ज्ञान को उपयोग में जो कोई ले लेता है, उसको आत्म-ज्ञान हो जाता है, वह सत्य तक पहुँच जाता है ।

          ज्ञान कहीं से उधार नहीं लेना पड़ता । हमारे भीतर ज्ञान पर्याप्त मात्रा में है जो अज्ञान से ढककर भीतर कहीं गहरे दबा पड़ा है । हम ज्ञान के नाम पर अज्ञान में जी रहे हैं । उस अज्ञान को ज्ञान कह देने से वह ज्ञान नहीं हो जाता । जब तक हम सीखे और सुने हुए ज्ञान को केवल किताबी बातें मानते रहेंगे, तब तक हमारा कल्याण नहीं हो सकता । उस ज्ञान के भीतर डुबकी लगाने से ही हमारा जीवन सुधरेगा अन्यथा केवल लच्छेदार बातें लिखते, कहते और सुनते ही रहेंगे ।

           कबीर कहते हैं -

               ब्राह्मण है गुरु जगत का, साधु का गुरु नाहीं ।

               उलझ उलझ कर मरि रह्या, चारिउ वेदा माहीं ।।

          ब्राह्मण ने चारों वेदों को पढ़ा है, उन्हें रट भी लिया हैं परंतु उन अनुसार उसने अपना जीवन नहीं बनाया है । वह अपने ज्ञान से संसार को प्रभावित कर सकता है परन्तु किसी साधु को नहीं । साधु ने भले ही वेद नहीं पढ़े हों, फिर भी उसका सहज जीवन ब्राह्मण के ज्ञान से भी बहुत ऊँचा है । इसलिए ज्ञान को केवल पढ़ने और रट लेने से कुछ नहीं होना है । यह केवल शास्त्रों में उलझ कर रह जाना है, इससे तो मुक्त नहीं हुआ जा सकता । मुक्त होने के लिए तो ज्ञान को जीना होता है ।

         प्राचीन काल में शास्त्रार्थ हुआ करते थे । ये शास्त्रार्थ ज्ञान में अनुभवसिद्ध पुरुषों के मध्य हुआ करते थे । इसका लाभ यह होता था कि शास्त्रार्थ में भाग लेने वालों के साथ-साथ श्रोताओं को भी इसका लाभ मिलता था । भारत में पुरुषों के साथ ही महिला दार्शनिकों तथा साध्वियों की भी एक लम्बी परंपरा रही है । गार्गी, मैत्रेयी, वाक्, घोषा, अपाला आदि इसके उदाहरण है । आज ज्ञान के प्रसंग में हम गार्गी और मैत्रेयी की बात करेंगे । गार्गी का पूरा नाम गार्गी वाचकन्वी है, वे गर्गवंशी ऋषि वचकन्व की पुत्री थी । इसी प्रकार मैत्रेयी ऋषि ‘मित्र’ की पुत्री और ऋषि याज्ञवल्क की पत्नी थी । दोनों ही ब्रह्मज्ञानी थी ।

          एक बार राजा जनक ने अपने यहाँ शास्त्रार्थ का आयोजन किया । उन्होंने राजद्वार पर सोने की मोहरों से मढ़े सींगों वाली एक सहस्र गाएं खड़ी कर दी और घोषणा कर दी कि जो भी शास्त्रार्थ में जीतेगा, वह इन गौओं को पाने का अधिकारी होगा । शास्त्रार्थ चल रहा था परन्तु अभी तक कोई निर्णय न हो सका था । सुबह से राजद्वार पर खड़ी गाएँ भूख-प्यास से थकने लगी थी । तभी ऋषि याज्ञवल्क्य जी का वहाँ आना हुआ । गौओं को ले जाने की शर्त सुनकर उन्होंने अपने शिष्यों को उन थकीहारी गौओं को हांककर अपने आश्रम ले जाने का आदेश दिया । इस बात का शास्त्रार्थ में उपस्थित कई लोगों ने विरोध किया । 

          याज्ञवल्क्य की बात का प्रतिकार करने के लिए विदुषी गार्गी सामने आई । उसने उपस्थित सभी लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि मैं याज्ञवल्क्य जी से कुछ प्रश्न करूँगी । यदि उन्होंने उन प्रश्नों के उत्तर दे दिए तो फिर इस सभा में उपस्थित कोई भी इनको नहीं हरा सकेगा और वे इन गायों को लेने के अधिकारी होंगे ।

            तत्पश्चात् गार्गी ने याज्ञवल्क्यजी से कई प्रश्न किए । इन प्रश्नोत्तरों का विस्तार से वर्णन बृहदारण्यक उपनिषद् में मिलता है । याज्ञवल्क्यजी से शास्त्रार्थ प्रारम्भ करते हुए गार्गी ने पूछा कि हे ऋषिवर ! क्या आप अपने को सबसे बड़ा ज्ञानी मानते हैं, जो आपने गायों को हांकने के लिए अपने शिष्यों को आदेश दे दिया ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर देते हुए कहा कि मां ! मैं स्वयं को ज्ञानी नहीं मानता क्योंकि ‘‘मैं सबसे बड़ा ज्ञानी हूँ” ऐसा कोई अज्ञानी ही कह सकता है । ये गौएँ सुबह से यहाँ खड़ी-खड़ी थककर परेशान हो गई हैं, इस कारण इन गायों को देखकर मेरे मन में मोह उत्पन्न हो गया है । उत्तर सुनकर गार्गी ने कहा कि आपको मोह हुआ, लेकिन इस पुरस्कार को प्राप्त करने के लिए यह तो कोई योग्य कारण नहीं है । सभी सभासदों की आज्ञा हो तो मैं आपसे कुछ प्रश्न पूछना चाहूंगी । यदि आप इनके संतोषजनक जवाब दे पाएंगे तो आप इन गायों को निश्चित ही ले जा सकते हैं । 

            उपस्थित सभी सभासदों की सहमति मिलते ही गार्गी ने ऋषि याज्ञवल्क्य जी को संबोधित करते हुए प्रश्न पूछने प्रारंभ किए । गार्गी का प्रश्न: 'हे ऋषिवर ! जल के बारे में कहा जाता है कि हर पदार्थ इसमें घुलमिल जाता है तो यह जल स्वयं अंततः किसमें जाकर मिल जाता है ?’ गार्गी का यह पहला प्रश्न बहुत ही सरल था । याज्ञवल्क्यजी जैसे ज्ञानी से इतना सरल प्रश्न करना उनकी गरिमा के अनुकूल भी नहीं था फिर भी उन्होंने इसका उत्तर देते हुए कह दिया कि जल अन्तत: वायु में ओतप्रोत हो जाता है । तभी गार्गी ने पूछ लिया कि फिर वायु किसमें जाकर मिल जाती है और याज्ञवल्क्य का उत्तर था कि अंतरिक्ष लोक में ।

              गार्गी यहीं पर ही नहीं रूकी । वह याज्ञवल्क्य के द्वारा दिए गए प्रत्येक उत्तर को फिर से एक नए प्रश्न में बदलती गई और इस तरह गंधर्व लोक, आदित्य लोक, चन्द्रलोक, नक्षत्र लोक, देवलोक, इन्द्रलोक, प्रजापति लोक और यहाँ तक कि ब्रह्मलोक तक भी जा पहुंची और अन्त में गार्गी ने अति महत्वपूर्ण प्रश्न पूछ ही लिया कि यह ब्रह्मलोक किसमें जाकर मिल जाता है ?

            ब्रह्मलोक का न आदि है और न ही अन्त । ऐसा प्रश्न करना गार्गी की प्रतिभा के अनुसार उचित भी नहीं था । गार्गी पर क्रोधित होकर याज्ञवक्ल्य ने कहा, 'गार्गी, माति प्राक्षीर्मा ते मूर्धा व्यापप्त्त्’ अर्थात् गार्गी, इतने प्रश्न मत करो, कहीं ऐसा न हो कि इससे तुम्हारा मस्तक फट जाए । अच्छा वक्ता वही होता है जिसे पता होता है कि कब बोलना और कब चुप रहना है और गार्गी अच्छी वक्ता थी इसीलिए क्रोधित याज्ञवल्क्य की फटकार भी चुपचाप सुनती रही ।

       गार्गी को अपने प्रतिद्वन्द्वी यानी याज्ञवल्क्य से अब आगे केवल दो ही प्रश्न पूछने हैं । इस प्रकार उपरोक्त प्रश्न पूछते हुए गार्गी ने अगले प्रश्न के लिए बड़ी ही अच्छी भूमिका बांधी है ।

           गार्गी अब अपने दो प्रश्न पूछ रही है । 'ऋषिवर सुनो ! जिस प्रकार काशी या मिथिला का नरेश एक साथ दो अचूक बाणों को धनुष पर चढ़ाकर अपने दुश्मन पर लक्ष्य साधता है, वैसे ही मैं भी आपसे केवल दो ही प्रश्न पूछती हूँ ।’ गार्गी बड़ी ही आक्रामक मुद्रा में आ गई । याज्ञवल्क्य ने कहा- ‘हे गार्गी, जितने भी प्रश्न पूछने हैं, सब पूछ डालो ।’

           गार्गी ने एक साथ दो प्रश्न पूछ डाले - 'स्वर्गलोक से ऊपर जो कुछ भी है और पृथ्वी से नीचे जो कुछ भी है और इन दोनों के मध्य जो कुछ भी है - वह, तथा जो हो चुका है और जो अभी होना है, ये दोनों किसमें ओतप्रोत हैं ?'

           गार्गी का पहला प्रश्न 'स्पेस' (अंतरिक्ष) और दूसरा 'टाइम' (समय) के बारे था । स्पेस और टाइम के बाहर भी कुछ है क्या ? नहीं है, इसलिए गार्गी ने बाण की तरह पैने इन दो प्रश्नों के जरिए यह पूछ लिया कि सारा ब्रह्माण्ड किसके अधीन है ?

        याज्ञवल्क्य ने कहा- ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गी।’ अर्थात् हे गार्गी ! कोई अक्षर, अविनाशी तत्व है जिसके प्रशासन में, अनुशासन में सभी कुछ ओतप्रोत है । गार्गी ने पूछा कि यह सारा ब्रह्माण्ड किसके अधीन है तो याज्ञवल्क्य का उत्तर था- अक्षर तत्व के । इस बार याज्ञवल्क्य ने उपस्थित सभासदों को अक्षरतत्व के बारे में विस्तार से समझाया ।

          इस बार गार्गी अपने प्रश्नों के जवाब से इतनी प्रभावित हुई कि जनक की राजसभा में उसने याज्ञवल्क्य को परम ब्रह्मिष्ठ मान लिया । इसके बाद गार्गी ने याज्ञवल्क्य की प्रशंसा कर अपनी बात खत्म की तो सभी ने माना कि गार्गी में जरा भी अहंकार नहीं है । गार्गी ने याज्ञवल्क्य को प्रणाम किया और सभा से विदा ली । गार्गी का उद्‍येश्य ऋषि याज्ञवल्क्य को हराना नहीं था बल्कि अपने ज्ञान में अभिवृद्धि करना था ।

         जैसे कि पहले ही कहा गया है कि गार्गी वेदज्ञ और ब्रह्मज्ञानी थी, वे सभी प्रश्नों के जवाब जानती थी । यहां इस कहानी को बताने का तात्पर्य यह है कि अर्जुन के प्रश्नों से जैसे श्रीमदभगवद्गीता अस्तित्व में आई वैसे ही गार्गी के प्रश्नों के कारण 'बृहदारण्यक उपनिषद्' के मंत्रों का निर्माण हुआ ।

          प्रस्तुत है गार्गी और याज्ञवल्क्य के मध्य हुए कुछ अन्य प्रश्न और उत्तर, संवाद रूप में, जिनका वर्णन बृहदारण्यक उपनिषद् में विस्तार से किया गया है । ये प्रश्न आत्म-बोध की यात्रा में एक गृहस्थ का मार्गदर्शन करते हैं । गार्गी पूछ रही है कि महात्मन् ! ऐसा माना जाता है, स्वयं को जानने के लिए, आत्म-बोध के लिए ब्रह्मचर्य अनिवार्य है परन्तु आप तो ब्रह्मचारी नहीं हैं । आप स्वयं के दो दो पत्नियां हैं । क्या ऐसा नहीं लगता कि आप एक अनुचित उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं ?

           प्रश्न का उत्तर देने के स्थान पर याज्ञवल्क्य जी गार्गी से ही प्रतिप्रश्न करते हैं, ‘गार्गी ! ब्रह्मचारी कौन होता है ?’ गार्गी कहती है कि ब्रह्मचारी वह है, जो परम सत्य की खोज में लगा है । ‘फिर तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि एक गृहस्थ परम सत्य तक नहीं पहुँच सकता ।’ याज्ञवल्क्य ने पूछा । गार्गी कहती है कि ब्रह्मचारी स्वतंत्र होता है और गृहस्थ बंधन में । केवल स्वतन्त्र ही परमसत्य की खोज कर सकता है । विवाह को तो बन्धन कहा जाता है । याज्ञवल्क्य फिर प्रश्न करते हैं, ‘ क्या विवाह बन्धन है ?’ गार्गी ने कहा -‘निःसंदेह’ क्योंकि वैवाहिक जीवन में व्यक्ति को औरों का भी ध्यान रखना पड़ता है । पहले पत्नी की चिंता, फिर संतान की चिंता । इस प्रकार सांसारिक चिंताओं से घिरे व्यक्ति को आत्म-चिंतन के लिए समय ही कहाँ मिल पाता है ऐसे में वह मुक्त कैसे हो पाएगा ?’ 

          याज्ञवल्क्यजी ने कुछ देर सोचा और गार्गी से फिर एक प्रश्न किया । ‘किसी की चिंता करना बन्धन है या प्रेम ?’ गार्गी को ऐसे प्रश्न की अपेक्षा नहीं थी । वह बोली - ‘प्रेम भी तो एक बन्धन है, महर्षि ।’ महर्षि ने कहा - ‘नहीं गार्गी, सच्चा प्रेम हो तो मुक्त कर देता है । जब प्रेम में स्वार्थ प्रबल हो जाता है तो वह बंधन बन जाता है । इसलिए समस्या प्रेम नहीं है बल्कि स्वार्थ पर आधारित प्रेम है ।” गार्गी ने कहा - ‘प्रेम सदा स्वार्थ पर ही आधारित होता है, महर्षि ।’

        “नहीं, ऐसी बात नहीं है, गार्गी । प्रेम से जब आकांक्षाएँ जुड़ने लगती है, तब स्वार्थ का जन्म होता है । जिस प्रेम में अपेक्षाएं न हो, जो प्रेम केवल देना जानता हो, केवल वही प्रेम मुक्त करता है ।” याज्ञवल्क्य ने गार्गी को स्पष्ट किया । गार्गी ने कहा - ‘सुनने में आपके शब्द प्रभावित अवश्य करते हैं महर्षि, परंतु क्या आप ऐसे निःस्वार्थ प्रेम का कोई उदाहरण दे सकते हैं ?’

     याज्ञवल्क्यजी कह रहे हैं, “आँखें खोलो गार्गी और देखो, यह सारा जगत् निःस्वार्थ प्रेम का जीता जागता प्रमाण ही तो है । सूर्य से किरणों के माध्यम से मिल रही ऊर्जा पृथ्वी पर जीवन उत्पन्न करती है । यह पृथ्वी सूर्य से कुछ माँगती है क्या ? यह तो सूर्य के प्रेम में खिलना जानती है । न ही सूर्य पृथ्वी पर अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास करता है और न ही बदले में पृथ्वी से कुछ चाहता है । सूर्य तो स्वयं को जलाकर समस्त संसार को जीवन देता है । यही निःस्वार्थ प्रेम है गार्गी ।” 

         याज्ञवल्क्य आगे कह रहे हैं - “सुनो गार्गी, प्रकृति और पुरुष की यह लीला उनके आपसी सच्चे प्रेम का प्रतिफल है । हम सभी उसी प्रकृति और पुरुष के निःस्वार्थ प्रेम से ही उत्पन्न हुए हैं, फिर सत्य को खोजने में कैसी बाधा ?” 

           इन उत्तरों को सुनकर गार्गी पूर्णतः संतुष्ट हो जाती है और कहती है, ‘मैं अपनी पराजय स्वीकार करती हूँ ।’ याज्ञवल्क्य कहते हैं “इसमें जय-पराजय की बात ही नहीं है गार्गी ! प्रश्न पूछने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए क्योंकि प्रश्न पूछे जाते हैं, तभी उत्तर सामने आते हैं, जिनसे यह संसार लाभान्वित होता है ।”

         प्रत्येक संवाद (वाद-विवाद नहीं) का अच्छा परिणाम निकल कर सामने आता है । इस शास्त्रार्थ से भी गार्गी और याज्ञवल्क्यजी, दोनों को लाभ हुआ । गार्गी से हुए शास्त्रार्थ के पश्चात् याज्ञवल्क्य जी अपने आश्रम पहुँच जाते हैं । उन्हें पूर्ण वैराग्य हो जाता है और वे समस्त सम्पति को अपनी दोनों पत्नियों में आधी-आधी बांटकर वन में प्रस्थान करना चाहते हैं । याज्ञवल्क्यजी के दो पत्नियाँ थीं - मैत्रेयी और कात्यायनी । मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी, जिसने अपने पति के साथ बैठकर आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया था । मैत्रेयी ने सम्पति का मिला अपना आधा भाग भी कात्यायनी को दे दिया और कहा कि मैं भी वन में जाऊँगी क्योंकि वह जानती थी कि बृह्मविद्या के सामने भौतिक सुख-सम्पति सब तुच्छ है । वृहदारण्यक उपनिषद् में मैत्रेयी का अपने पति के साथ हुए रोचक संवाद का वर्णन भी मिलता है ।

        कात्यायनी तो एक सुशील गृहस्थ नारी थी, वह तो सम्पति पाकर संतुष्ट हो गई परंतु मैत्रेयी के भीतर संपत्ति और ब्रह्मज्ञान को लेकर बड़ा अंतर्द्वंद्व छिड़ गया । इस ऊहापोह में अटकी पत्नी को छोड़कर जब याज्ञवल्क्य वन को जाने लगे तो मैत्रेयी पूछ बैठी - ‘नाथ ! आपकी इस सम्पति की बात को छोड़ दीजिए, यदि मुझे सारे विश्व की सम्पति भी मिल जाए तो क्या मैं अमर हो सकती हूँ अर्थात् क्या मुझे उसको पाकर अमरता का अनुभव हो सकता है ?’ याज्ञवल्क्यजी का उत्तर था - ‘नहीं देवी, धन से अमरत्व प्राप्त नहीं होता ।’

            याज्ञवल्क्य कह रहे हैं - ‘पति, पत्नी, पुत्र, मित्र, धन आदि को हम इसलिए प्रिय मानते हैं क्योंकि उनसे हमें आत्मिक सुख मिलता है । जब हमें उनसे सुख मिलने की आशा समाप्त हो जाती है, उनसे प्रियता भी खो जाती है । इसका अर्थ है कि हम सर्वाधिक प्रेम स्वयं (आत्मा) से ही करते हैं । इसलिए केवल अपने आप (आत्मा) को ही जानने का प्रयास करो । आत्म-ज्ञान ही अमरत्व का एक मात्र मार्ग है । जब आत्मा का ज्ञान हो जाता है तो सब कुछ जान लिया जाता है । आत्म-ज्ञान से द्वैत भाव समाप्त हो जाता है, जैसे नमक जल में घुलकर अलग नहीं दिखता वैसे ही आत्मा ब्रह्म में एकाकार हो जाती है ।’

           मैत्रेयी इतना सब जानकार आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हो गई और भौतिक सम्पति को तुच्छ समझकर अपने पति के साथ वन में चली गई । इससे सिद्ध होता है कि गृहस्थ जीवन में भी आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हुआ जा सकता है । अतः गृहस्थ जीवन को बाधा न समझें बल्कि एक अच्छा अवसर जानें ।

           घर-संसार छोड़ देने से आत्म-ज्ञान हो ही जाएगा आवश्यक नहीं है परन्तु आत्म-ज्ञान हो जाने से घर-संसार स्वतः छूट जाएगा, यह पक्की बात है । इसका अर्थ है कि यदि गृहस्थ जीवन में रहते हुए ज्ञान का सदुपयोग किया जाए तो मुक्त हुआ जा सकता है । गृहस्थ जीवन में आसक्त होकर जीना ही बंधन है । प्राचीन समय में अनेकों ऋषि-मुनि भी गृहस्थ होते हुए भी अनासक्त होकर मुक्ति को उपलब्ध हुए हैं । गृहस्थ आश्रम केवल उन्हीं के लिए बन्धन है जो आपस में एक दूसरे से स्वार्थ के कारण बंधे हैं । जहां पर भी थोड़ी सी ठेस स्वार्थ की पूर्ति में लगती है कि परिस्थितियां बदल जाती है । इन परिस्थितियों के कारण ही जीवन-गाड़ी के दोनों पहिए आपसी संतुलन क़ायम नहीं रख पाते और गाड़ी लड़खड़ा जाती है ।

              प्रेम में समरसता होती है, स्वार्थ नहीं । जहां पर स्वार्थ आड़े आ जाता है, समरसता नहीं रह पाती और प्रेम खो जाता है । गृहस्थ जीवन में दोनों पक्षों की समरसता ही दोनों के भेद को समाप्त कर देती है जिससे उनके दो होने का अनुभव ही समाप्त हो जाता है । फिर वे दो होते हुए भी एक होना प्रतीत होते हैं । ऐसी समरसता तभी आ सकती है, जब जीवन में केवल किताबी ज्ञान को ही महत्व न मिले बल्कि उस ज्ञान के अनुसार अपना जीवन बना लें । ज्ञान को जीवन में उतार लेना ही विवेक है । विवेकपूर्ण जीवन ही व्यक्ति के कल्याण का मार्ग खोलता है । चाहे हम किसी भी आश्रम में यात्रा कर रहे हों, जीवन को विवेकपूर्ण ढंग से जीना ही आत्म-साक्षात्कार करा देता है ।             

                      विवेकपूर्ण गृहस्थ जीवन कोई बन्धन नहीं है । हमारे ऋषियों ने जीवन के जो चार भाग किए हैं, उन्हें आश्रम कहा जाता है - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास । यदि हम अपना जीवन इन्हीं चार आश्रम की अवस्थाओं को ध्यान में रखकर जिएँ तो फिर कोई भी अवस्था हमें बांध नहीं सकती । समस्या तो तब पैदा होती है, जब हम गृहस्थ जीवन से मुक्त ही नहीं होना चाहते । गृहस्थ जीवन के प्रति ऐसी आसक्ति के कारण ही गृहस्थ जीवन को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है अन्यथा यह जीवन मुक्ति के लिए सबसे श्रेष्ठ माना गया है ।

          एक आश्रम से दूसरे आश्रम में प्रवेश करने के लिए द्वार को भीतर की ओर खोलना होता है । इसका अर्थ है, बाहर के संसार से भीतर की (आत्मा की) ओर गति करना । गृहस्थ से वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करने के लिए हम इसके विपरीत, द्वार को बाहर की ओर खोलने का प्रयास करते हैं अर्थात् पुनः संसार की ओर गति करना चाहते हैं । यही हमारे जीवन की सबसे बड़ी भूल है ।

         गृहस्थ जीवन सदैव के लिए नहीं है, यह स्वीकार कर लेना सबसे महत्वपूर्ण है । इसमें ज्ञान की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है जो हमें यह सिखलाता है कि गृहस्थी में रहते हुए कैसे जीना है ? प्रत्येक स्वार्थ से ऊपर उठकर, वास्तविक प्रेम के साथ, एक दूसरे के प्रति समर्पण भाव रखते हुए । यही नहीं, जब गृहस्थ जीवन त्यागने की अवस्था आए तब बिना किसी झिझक के मुक्त होकर वानप्रस्थ अवस्था में आ जाएं । इसके लिए कहीं घर छोड़ कर जाना ही आवश्यक नहीं है बल्कि घर में रहते हुए अनासक्त हो जाना है ।

       ज्ञान कभी बन्धन नहीं हो सकता, वह तो सदैव मुक्त करने वाला है । हम ज्ञान का किस प्रकार उपयोग करते हैं, यह महत्वपूर्ण है । एक दृष्टांत के माध्यम से अपनी बात स्पष्ट करता हूँ । एक ब्राह्मण था । वह अपने जीवनयापन के लिए भागवत-कथा किया करता था । ब्राह्मण की दयनीय अवस्था देखकर धनाढ्य लोग अपने घर पर उनसे भागवत-कथा करवाया करते थे । एक बार उस नगर के राजा ने भी ब्राह्मण को कथा के लिए बुलवा लिया । 

         भागवत-कथा सात दिन के लिए होती है । प्रतिदिन कथा समाप्त करने के पश्चात् ब्राह्मण राजा से पूछता - ‘महाराज ! कथा समझ में आई ?, राजा प्रत्युत्तर में कहता - ‘ब्राह्मण देवता, पहले आप ही समझ लें ।’ प्रतिदिन ऐसा ही होता रहा, ब्राह्मण का एक ही प्रश्न और राजा का भी वही उत्तर । ऐसा होते-होते छठा दिन भी बीत गया । रात्रि को ब्राह्मण ने राजा द्वारा कहे जा रहे शब्दों पर गंभीरता से विचार किया । भीतर एक बिजली सी कौंधी और तत्क्षण ही ब्राह्मण को कथा पूर्ण रूप से समझ में आ गई ।

         प्रातःकाल होते ही ब्राह्मण ने ब्राह्मणी को कुछ समझाया और राजा के यहाँ जाने के स्थान पर वन की और प्रस्थान कर गए । राजा ने ब्राह्मण का कुछ समय तक तो इंतज़ार किया फिर और अधिक देरी होती हुई देखकर अपने अधीनस्थों को ब्राह्मण को लिवा लाने के लिए भेजा ।

       राजा के अधीनस्थ जब ब्राह्मण के घर पहुँचे तो उन्हें वे कहीं दिखलाई नहीं दिए । तभी वहाँ ब्राह्मणी आ गई । उन्होंने ब्राह्मणी से पूछा कि आज ब्राह्मण देवता राजा के यहाँ कथा करने क्यों नहीं आए ? ब्राह्मणी ने उत्तर दिया कि वे तो कहीं बाहर गए है । जाते-जाते कहकर गए हैं कि उन्हें आज कथा समझ में आ गई है, इसलिए वे राजा के यहाँ अब कथा नहीं कर पाएंगे ।

          कहानी का मर्म है कि ज्ञान पुस्तकों में समाहित है । हम उसे पढ़ते हैं, सुनते-सुनाते हैं परंतु जीवन में उतारते नहीं है । ज्ञान को जीवन में उपयोग में लाने का नाम ही विवेक है । ज्ञान के अनुसार जीने से किसी भी परिस्थिति को आप संजीदगी से लेने लगते हैं । फिर आप विपरीत परिस्थिति में दुःखी होकर रोने नहीं बैठोगे और न ही अनुकूल परिस्थिति में ख़ुशी के मारे उछलने लगोगे ।

            शास्त्रों में समाहित ज्ञान को केवल पढ़कर सुना देना ही ज्ञान को प्रचारित करना नहीं है । ज्ञान को पहले स्वयं आचरण में लाएं और फिर उसका प्रचार करें । जब तक आपके स्वयं का जीवन ज्ञानमय नहीं होगा तब तक सुनने वाले आपके ज्ञान का अनुकरण नहीं करेंगे । वे एक कान से सुनेंगे और दूसरे कान से उस ज्ञान को बाहर निकाल फेंकेंगे ।

         एक और दृष्टान्त से स्पष्ट हो जाएगा कि ज्ञान मुक्ति का साधन है, बंधन नहीं है । एक पहुँचे हुए संत राजा के दरबार में पहुँचते हैं । राजा और राजगुरु उनका स्वागत करते हैं । राजा एकांत में संत से मिलते हैं और बताते है कि राजगुरु से प्रतिदिन मार्गदर्शन लेता हूँ फिर भी शांत जीवन और मुक्ति के अनुभव की कोई संभावना आस-पास तक नज़र नहीं आती । संत ने राजगुरु के जीवन से संबंधित कुछ प्रश्न राजा से किए और तत्काल ही वे समझ गए कि आखिर कमी कहाँ है ?

          उन्होंने राजा को आश्वस्त किया कि इसके पीछे जो भी कारण हैं, उनको कल दरबार में सबके सामने ही स्पष्ट करूँगा । इसके लिए आवश्यक है कि आप राजसिंहासन को कुछ समय के लिए मुझे सौंप दे और आपके सभी मातहत मेरी आज्ञा का पालन करे । राजा ने हामी भर ली और तुरंत ही अपने मंत्री को बुलाकर राज्य की व्यवस्था कुछ समय के लिए संत को सौंपने की व्यवस्था करने का आदेश दे दिया ।

       प्रातः दरबार लगा । राजसिंहासन पर राजा के स्थान पर संत विराजमान हुए । राजा अपने राजगुरु के पास साधारण दरबारी की भांति बैठ गए । राजसिंहासन के पास खड़े सेवक अब संत द्वारा आदेश देने की प्रतीक्षा करने लगे ।

        सन्त ने प्रथम आदेश दिया - ‘राजगुरु को राजसिंहासन के बायीं और स्थित खम्भे से बांध दिया जाय ।’ सेवक ने तत्काल ही आज्ञा का पालन किया और राजगुरु को खंभे से बांध दिया । राजगुरु ऐसे आदेश से हतप्रभ रह गये परन्तु विवश थे, क्या करते, बंध गए । संत का दूसरा आदेश - ‘राजा को राजसिंहासन के दाईं ओर स्थित खंभे से बांध दें ।’ सेवक तनिक सकुचाए परंतु राजा ने आदेश पालन करने का संकेत किया । राजा को भी दूसरे खंभे से बांध दिया गया ।

          संत ने राजगुरु को कहा कि आप अब राजा को खोल दीजिए । राजगुरु ने कहा कि मैं स्वयं बंधा हूँ, किसी दूसरे को कैसे खोल सकता हूँ ? संत राजा की और उन्मुख हुए और बोले - ‘राजन् ! यही आपके प्रश्न का उत्तर है । एक बंधा हुआ व्यक्ति किसी दूसरे बंधे हुए को कभी भी मुक्त नहीं कर सकता ।’ राजगुरु प्रतिदिन राजा को ज्ञान देता था परंतु उसके स्वयं का जीवन उस ज्ञान के अनुसार नहीं था । ज्ञान का प्रवचन देने से महत्वपूर्ण है ज्ञान के अनुसार आचरण । 

         संत ने तत्काल ही बंधे हुए दोनों को खोलने का आदेश दिया और राजा को सिंहासन सौंप दिया । राजा के और साथ ही राजगुरु के, दोनों के ही संत की बात समझ में आ गई । बस, हमें भी जीवन में संत की इसी बात को समझना है । मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि सब कुछ जानते हुए भी वह जानबूझकर उलझा हुआ है । जाने हुए को जीवन में लागू करना है, उपयोग में लाना है, फिर जितना भी (कम या अधिक) जाना हुआ है, मुक्ति का साधन बन जाएगा ।

           परमात्मा ने प्रत्येक जीव को बुद्धि दी है, जिसमें ज्ञान उपजता है । ऐसा नहीं है कि मनुष्य के अतिरिक्त अन्य जीवों में ज्ञान का अभाव होता है । अपने शरीर के भले-बुरे का ज्ञान तो प्रत्येक जीव को होता है । हाँ, मनुष्य के अतिरिक्त अन्य जीव इस ज्ञान को जीवन में विभिन्न स्तर पर उपयोग करना नहीं जानते । परिस्थिति, वातावरण और स्थान के अनुरूप बदल पाने की जो क्षमता ज्ञान के माध्यम से मनुष्य ने विकसित की है, वैसी क्षमता अन्य जीवों में देखने को नहीं मिलती ।

           आहार, निद्रा, भय और मैथुन में जन्म से ही प्रत्येक जीव लगा हुआ है । केवल बुद्धि में अग्रणी होने के कारण मनुष्य सब जीवों में विशिष्ट है । बुद्धि में उपजा ज्ञान ही मनुष्य को अन्य जीवों से अलग करता है । इस ज्ञान को महत्व न देने वाला मनुष्य पशु के समान ही माना जाता है । मनुष्य द्वारा ज्ञान का सदुपयोग करने से वह ज्ञान ही विवेक में परिवर्तित होता है । विवेक उसे आत्म-ज्ञान की अवस्था तक ले जाता है । आत्म-अनात्म का ज्ञान हो जाना ही आत्म-साक्षात्कार (realization) कहलाता है ।

           आत्म-अनात्म का ज्ञान हो जाने से मनुष्य अपने आपको संसार से मुक्त अनुभव करता है । संसार से मुक्ति का अनुभव उसे परमात्मा की ओर अग्रसर कर देता है । इसलिए ज्ञान को संसार से मुक्ति और परमात्मा की प्राप्ति का साधन बताया गया है । प्रश्न उठता है कि मनुष्य आत्म-ज्ञान की अवस्था तक कैसे पहुंच सकता है ? 

           आत्म-ज्ञान की अवस्था तक पहुंचने के कई रास्ते हैं, अपने स्वभाव के अनुसार हम उन साधनों का उपयोग कर सकते हैं । आइए ! संक्षेप से उन साधनों के बारे में जानते हैं ।

शास्त्र-अध्ययन - सनातन धर्म शास्त्रों में सांसारिक और आध्यात्मिक ज्ञान का विस्तृत विवेचन उपलब्ध है । उनके अध्ययन से आत्म-ज्ञान की राह पर अग्रसर होने की प्रेरणा मिलती है । 

आत्म-विचार - शास्त्र-अध्ययन से उत्पन्न हुए विचारों और भावनाओं का विश्लेषण करना ।

आत्म-निरीक्षण - आत्म-विचार के अनुरूप जीवन में परिवर्तन हो रहा है अथवा नहीं, इस बात का बराबर निरीक्षण करते रहना ।

ध्यान - मैं शरीर नहीं हूँ तो फिर “मैं कौन हूँ” इसको ध्यान के माध्यम से जानने का प्रयास करना ।

गुरु की शरण - शास्त्रों में समाहित ज्ञान की व्याख्या वही कर सकता है, जिसने उस ज्ञान का अपने जीवन में उपयोग करते हुए उसका अनुभव किया है । वह व्यक्ति है - गुरु । गुरु शरीर नहीं है बल्कि गुरु वह अवस्था है जो शारीरिक स्तर से परे उस परमात्मा के स्तर तक पहुँच चुका है । गुरु आपको संकेत से उस मार्ग को बता सकता है, जिस पर चलकर वह परमात्मा तक पहुंचा है । चलना आपको ही है क्योंकि आत्म-ज्ञान की यात्रा आपकी व्यक्तिगत यात्रा है । इस यात्रा को गुरु पहले ही पूरी कर चुका है । 

             गुरु की शरण, आत्म-ज्ञान को उपलब्ध होने का सर्वोत्तम साधन है । परन्तु गुरु से ज्ञान प्राप्त कर उसको केवल वाणी और लेखनी के माध्यम से प्रस्तुत करते रहने से भी कुछ नहीं होना है । आवश्यक है कि गुरु-प्रदत्त ज्ञान को हम अपने जीवन में उतारें । ज्ञान जीवन में कितना उतरा है, इसको हम निम्न बातों के माध्यम से जान सकते हैं -

नैतिक जीवन - ज्ञान के अनुसार जीने पर हमारे जीवन में नैतिकता आती है । नैतिकता का अर्थ है - सत्य, अहिंसा और करुणा के मार्ग पर चलना । जिसके जीवन में नैतिकता नहीं है, उसका जीवन ज्ञान होने के पश्चात् भी मूल्यहीन है । 

वैराग्य - ज्ञान हो जाने पर संसार से मोह समाप्त हो जाता है और व्यक्ति वैराग्य को उपलब्ध हो जाता है । शरीर और संसार का निरंतर त्याग हो रहा है । आप चाहकर भी उनको बदलने से नहीं रोक सकते । ज्ञान इस बदलने को स्वीकार करता है, जिससे मनुष्य संसार और शरीर से मुक्त हो जाता है ।

प्रेम और भक्ति - ज्ञान से जब संसार और शरीर मूल्यहीन हो जाते हैं तब परमात्मा के प्रति प्रेम और भक्ति का उदय होता है । मनुष्य जीवन का उद्देश्य भी यही है कि वह अपने वास्तविक स्वरूप को पहिचाने जोकि परमात्मा का स्वरूप ही है अर्थात् सच्चिदानंद स्वरूप । स्वरूप तक पहुंचने की राह प्रेम और भक्ति से ही निकलती है ।

          इतने विवेचन से स्पष्ट है कि ज्ञान मुक्ति का मार्ग है । ज्ञान को प्राप्त करने के उपरान्त भी संसार में आसक्त बने रहना बंधन है । बन्धन से मुक्त न करने वाला ज्ञान, ज्ञान न होकर अज्ञान है । मुक्ति के लिए आवश्यक है कि हम ज्ञान के अनुसार अपना जीवन बनाएं ।

सार-संक्षेप

        सीखे और सुने हुए ज्ञान की क़ीमत दो कौड़ी की नहीं है । ज्ञान के मात्र दो शब्द जब विवेक बनकर जीवन में उतरते हैं तब वह जीवन भी अनमोल बन जाता है । आज इस संसार में सभी लोग एक दूसरे को ज्ञान बांट रहे हैं परन्तु एक भी व्यक्ति उस ज्ञान के अनुसार जी नहीं रहा है । सब ज्ञान देकर एक दूसरे को बदलने में लगे है, परंतु स्वयं को बदलना नहीं चाहते । मित्र, अपने मित्र को बदलना चाहता है और पति अपनी पत्नी को । ऐसा ज्ञान बंधन है, बोझ है । 

         ऋषि याज्ञवल्क्य और गार्गी के मध्य हुआ संवाद वास्तविक ज्ञान को स्पष्ट करता है । उन्होंने ज्ञान को अपने जीवन में उतारा है, साथ ही ज्ञान से ब्रह्म को भी जाना है । याज्ञवल्क्य ऋषि के गृहस्थ जीवन में दो-दो पत्नियों के होते हुए भी जो समरसता दिखलाई पड़ती है, उसके पीछे उच्च कोटि के ज्ञान के अनुसार उनका जीना ही है । ज्ञान जब विवेक बन जाता है, तब व्यक्ति के जीवन में अशांति का प्रवेश हो ही नहीं सकता । ज्ञान को विवेक में परिवर्तित करने के लिए सत्संग आवश्यक है । गोस्वामीजी मानस में लिखते हैं - 

बिनु सतसंग बिबेक न होई । रामकृपा बिनु सुलभ न सोई ।।

होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा । तब रघुनाथ चरन अनुरागा ।।

       अन्त में मैं आचार्यजी द्वारा कहे गए शब्दों का पुनः स्मरण करना चाहूँगा । वे कहते हैं - “सीखे हुए ज्ञान में ही अनुभव छिपा हुआ है । खोज करें ।” खोज तभी होगी, जब उस ज्ञान का जीवन में प्रयोग करेंगे । प्रयोग से ही उस ज्ञान की उपयोगिता सिद्ध होगी । ज्ञान को आत्मसात् करने के लिए परमात्मा की कृपा मानकर सत्संग कीजिए । फिर संसार से आसक्ति परमात्मा के प्रति अनुरक्ति में परिवर्तित हो जाएगी । ऐसा ज्ञान बंधन नहीं है बल्कि मुक्ति का साधन है ।

पुनश्च 

प्रश्न आया है कि आप ज्ञान को इतना अधिक महत्व दे रहे हैं जबकि भक्ति को सर्वोत्तम बताया जाता है। ऐसा क्यों ?

   आपका कहना सही है, मेरा भी यही मानना है कि सर्वोत्तम तो भक्ति ही है । ज्ञान और भक्ति, दोनों साथ हों तो सोने पर सुहागा है । अज्ञान हो तो न तो भक्ति सिद्ध हो सकती है और न ही कर्मयोग सिद्ध हो सकता है । ज्ञान और कर्म, दोनों लौकिक हैं जबकि भक्ति पारलौकिक है । भक्ति स्वयमेव ज्ञान को उपलब्ध करा देती है परन्तु वह ज्ञान तात्विक ज्ञान है । तात्विक ज्ञान तक पहुंचने के लिए सबसे पहले परमात्मा के अस्तित्व की स्वीकार्यता आवश्यक है । ऐसी स्वीकार्यता आधारभूत ज्ञान के बिना होना सम्भव नहीं है । आधारभूत ज्ञान से अज्ञान मिटता है । स्वामीजी कहते हैं कि तत्त्वज्ञान होता नहीं है बल्कि अज्ञान मिटता है । ज्ञान उत्पन्न होने वाली और मिटने वाली वस्तु नहीं है, वह तो जन्मजात सबमें होता है । बस, यह अज्ञान से ढका रहने से अनुभव में नहीं आता है । 

      यही कारण है कि मैं आधारभूत ज्ञान होने पर जोर देता हूँ न कि ज्ञान को भक्ति पर वरीयता देता हूँ । भक्ति ही परमात्मा के दर्शन कराती है, कर्म और ज्ञान तो उसकी संतान होने के कारण उसकी सहयोगी है ।

     प्रारम्भिक स्तर पर ज्ञान का महत्व अधिक है क्योंकि ज्ञान से ही अनुभव होता है कि कर्म निष्काम कैसे हो सकते हैं । ज्ञान से ही एक सर्वोच्च सत्ता के होने के बारे में अनुभव होता है । ज्ञान होने से ही कर्मयोग और भक्तियोग सिद्ध होने की राह आसान हो जाती है। भक्ति बिना समर्पण के सिद्ध नहीं होती और समर्पण बिना ज्ञान के नहीं हो सकता । समर्पण को केवल क्रिया मात्र मान लेंगे तो यह दिखावा तो हो सकता है, परन्तु हम असमर्पित ही रह जाएंगे । ज्ञानपूर्वक किया गया समर्पण ही वास्तव में भक्ति है ।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

Friday, March 6, 2026

भोग, रोग और योग

 भोग, रोग और योग 

मन - बन्धन और मोक्ष का कारण 

    अमृत-बिन्दु उपनिषद् में आता है -

         मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो: ।

         बन्धाय विषयासक्तं मुक्तं निर्विषयं स्मृतम् ।। 2 ।।

मन ही मनुष्य के लिए बंधन और मुक्ति का कारण है। इंद्रिय विषयों में आसक्त मन बंधन की ओर ले जाता है और जो इंद्रिय विषयों से मुक्त होता है वह मनुष्य को मुक्त कर देता है ।

               हम मन में किसी भी पदार्थ के बारे में एक पूर्वाग्रह पाल लेते हैं । उसी अनुसार हमें वह अच्छा अथवा बुरा लगता है । जो हमें अच्छा लगता है उसकी तो कामना करने लगते हैं और जो बुरा लगता है, उससे विरक्त होते जाते हैं । अच्छे से तो हमारा सम्पर्क बढ़ता है और बुरे से दूरी । ‘ममता, तू न गई मेरे मन से’, यह सब मन में समायी (माया) का ही खेल है ।

          मन - यह इंद्रियों और बुद्धि के बीच की अवस्था का नाम है । इंद्रियों से जो सुख का ज्ञान होता है, उसमें आसक्त होकर यदि मन चलता है, तो शरीर रुग्ण हो जाता है । यही मन यदि बुद्धि के ज्ञान से चलने लगे तो मुक्ति के अनुभव होने का मार्ग प्रशस्त होता है । इंद्रियों का ज्ञान माया से प्रेरित है और बुद्धि का ज्ञान आत्मा से । मन पर कौन सा ज्ञान प्रभावी है, यह महत्वपूर्ण है । यदि इंद्रियों का ज्ञान प्रभावी है तो व्यक्ति भोग को प्राथमिकता देता है, जोकि एक दिन रोग का जनक बनता है और यदि मन पर बुद्धि का ज्ञान प्रभावी है तो व्यक्ति एक दिन योग को उपलब्ध हो जाता है । 

          यह जानते हुए भी कि प्रत्येक भोग रोग की ओर ले जाने वाला है, मनुष्य भोगों की ओर ही क्यों भागता है ? विवेक ( बुद्धि का ज्ञान) का सदुपयोग कर वह भोगों से विरक्त होकर, रोग-मुक्त हो सकता है, अंततः जिसकी परिणीति योग में होगी ही, यह निश्चित है । भोग से रोग की ओर अथवा भोग से योग की ओर, दोनों में से किस ओर जाएं, यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है । चलिए ! इस विषय को थोड़ा गहराई से समझने का प्रयास करते हैं, "भोग, रोग और योग" लेख के माध्यम से।

          एक समान गति से एक ही दिशा में जा रहे दो वाहनों में बैठे व्यक्ति एक दूसरे के वाहन की गति का आकलन नहीं कर सकते, जबकि दोनों ही गतिमान हैं । दोनों में से किसी एक वाहन की गति में आया तनिक सा परिवर्तन दूसरे वाहन की गति में आए परिवर्तन को अनुभव कर लेता है परन्तु ऐसा अनुभव सत्य नहीं हो सकता । जैसे एक वाहन स्थिर है और दूसरा वाहन पास में से निकल रहा है तो दूसरे वाहन में बैठे व्यक्ति को पहले वाला वाहन विपरीत दिशा में जाता और स्वयं का वाहन स्थिर खड़ा प्रतीत होता है । रेलगाड़ी में बैठे हुए व्यक्ति को बाहर के पेड़ और पोल आदि पीछे भागते नज़र आयेंगे जबकि वास्तविकता यह है कि वह स्वयं गतिमान है और पेड़, पोल अपने स्थान पर स्थिर हैं । यही स्थिति इस संसार और शरीर की है ।

           जगत् वह है जो सदैव गति करता रहता है, एक पल के लिए भी स्थिर नहीं रहता । गति का अर्थ है कि यह जगत् परिवर्तनशील है, इसमें प्रतिपल बदलाव हो रहा है और इस बदलाव की गति हमारे शरीर में हो रहे बदलाव के समान ही है । यही कारण है कि जगत् में हो रहे परिवर्तन को हमारा शरीर समझ नहीं पाता, उसका अनुभव नहीं कर पाता । 

        स्वामीजी कहते हैं कि बहने वाले के लिए बहने वाला ही सत्य है क्योंकि बहनेवाला बहनेवाले को जान ही नहीं रहा है । बहनेवाले को तो रहनेवाला ही जान सकता है । शरीर और संसार बहनेवालों में हैं और हम स्वयं रहनेवाले हैं । जब इस बात का ज्ञान हो जाएगा उसी दिन यह संसार और शरीर असत्य हो जाएंगे । इंद्रियों का ज्ञान शरीर और संसार के सत्य होने का भ्रम जीवन भर बनाए रखता है । केवल विवेक ही हमारे इस भ्रम को तोड़ सकता है ।

           शरीर के मुख्य रूप से दो भाग हैं - स्थूल और सूक्ष्म । दोनों ही शरीर परिवर्तनशील हैं । स्थूल शरीर तो कुछ भी अनुभव नहीं करता, जो कुछ भी अनुभव करता है वह सूक्ष्म शरीर ही करता है । परन्तु सूक्ष्म शरीर द्वारा किया जाने वाला अनुभव भी सत्य नहीं होता । दोनों ही शरीरों में सदैव परिवर्तन होते रहते हैं । इधर जगत् भी परिवर्तनशील है । जो स्वयं बदल रहा वह दूसरे बदल रहे को बदलता हुआ अनुभव नहीं कर सकता । यही कारण है कि हमें सूक्ष्म शरीर के आधार पर स्वयं के साथ-साथ संसार भी सदैव रहनेवाला प्रतीत होता है । यह वैसे ही है जैसे एक ही दिशा में समान गति से चल रही दो रेलगाड़ियों में बैठे व्यक्ति एक दूसरे को स्थिर ही अनुभव करते हैं । लेकिन सूक्ष्म शरीर से होने वाला ऐसा अनुभव केवल भ्रम ही है, सत्य से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है ।

           यह अनुभव जिसको हो रहा है, वह कौन है ? हम समझते हैं कि यह अनुभव हमारे शरीर को हो रहा है परंतु यह सत्य नहीं है, यह भी हमारा भ्रम है । जिसको संसार की परिवर्तनशीलता का अनुभव हो रहा है वह अपरिवर्तनशील है, जोकि हम स्वयं हैं और वही हमारा स्वरूप है । इसी प्रकार संसार में रहते हुए सांसारिक विषयों के भोग से जिस सुख का अनुभव हम करते हैं, वह सुख भी हमारा केवल भ्रम ही है । जब हम संसार और उसके विषयों से मिलने वाले सुख से स्वयं को अलग कर लेंगे, तत्काल ही योग को उपलब्ध हो जाएंगे अन्यथा भोगों का दुष्चक्र हमें शारीरिक रोगों में उलझाकर शेष जीवन में मिलने वाले अतिशय दुःख से मुक्त नहीं होने देगा ।

              मनुष्य का स्वभाव कुछ ऐसा है कि वह सदैव सुख की खोज में ही लगा रहता है । उसकी यह खोज स्वाभाविक है क्योंकि वह स्वयं आनन्द स्वरूप है । जब यह सुख केवल इंद्रिय-तृप्ति तक ही सिमट कर रह जाता है, तब मनुष्य अपने जीवन के लक्ष्य तक पहुंच नहीं पाता । भारतीय दर्शन इसी को भोग कहता है । भोग अपने आप में बुरा नहीं है परंतु जब भोग विवेक से रहित होकर किया जाता है, तब वह रोग को जन्म देता है । शास्त्रों ने योग को ही इस समस्या का एकमात्र समाधान बताया है । 

            भोग का अर्थ है - इंद्रियों से मिलने वाला सुख । भोग का अर्थ केवल भोजन अथवा भौतिक वस्तुएं ही नहीं है । असंयमित रूप से बोलना, सोचना, देखना, चाहना आदि भी भोग के ही विभिन्न रूप हैं । सभी इन्द्रियाँ भोगों में ही लगी हुई हैं । भोगों से इन्द्रियाँ अल्प रूप से तृप्त होती है परन्तु यह तृप्ति कुछ समय के लिए ही सुख देती है । सुख मिलने के बाद भी संतुष्टि कहाँ मिल पाती है, क्योंकि सुख न तो पर्याप्त लगता है और न ही वह दीर्घ कल तक टिकता है । इसी कारण से भीतर सदैव एक प्रकार की रिक्तता बनी रहती है, अभाव बना रहता है । यह अभाव ही जीवन में अशान्ति व तनाव पैदा करता है जिससे व्यक्ति समता में नहीं रह पाता और जीवनभर दुःखी होता रहता है ।

              भगवान गीता में कहते हैं - ‘ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।’ (गीता -5/22) अर्थात् सभी भोग (सुख) इंद्रियों और विषयों के संयोग से पैदा होते हैं और दुःख के ही कारण हैं । 

          सभी सुख संयोगजन्य हैं और इंद्रिय स्पर्श से मिलते हैं । संयोग से जब किसी विषय का स्पर्श सम्बन्धित ज्ञानेंद्रिय से होता है, तब जीव एक प्रकार के सुख को अनुभव करता है । सुख का अनुभव करना ही भोग है । प्रत्येक इंद्रिय का एक विषय होता है, उस विषय से संपर्क होते ही मन को सुख का अनुभव होता है । जब विषय संपर्क बार-बार और असंयमित होता है, तब वही सुख दुःख में परिवर्तित होने लगता है । असंयमित भोग ही शारीरिक और मानसिक रोग का कारण बनते हैं । इन रोगों से शारीरिक और मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाता है, जिससे मनुष्य जीवन में अशान्त होकर दुःख का अनुभव करता है । जीवन में शान्ति के लिये इंद्रियों को भोगों की ओर भागने से रोकना होगा ।

           पांच इंद्रियों के पांच विषय - शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध । जो भी जीव इनमें आसक्त हो गया उनकी गति भी वैसी ही होती है जैसी मृग, हाथी, पतंगे, मछली और भंवरे की होती है । इन विषयों का आकर्षण जीव को शारीरिक और मानसिक रोगों के माध्यम से मृत्यु के द्वार तक पहुंचा देता है । ये सभी विषय विभिन्न वस्तुओं के रूप में हमारे आस-पास ही उपस्थित रहते हैं । उनमें आसक्त न होकर उनको बाहर ही छोड़ देना उचित है । 

           सृष्टिकर्ता ने इंद्रियों को बाहर की ओर प्रवृत किया है, इसलिए मनुष्य बाहर ही सुख खोजता है, भीतर नहीं । मनुष्य की दृष्टि सदैव बाहर की ओर ही जाती है, भीतर की ओर नहीं । बाहर संसार, उसके विषय और उनसे उत्पन्न होने वाली अशान्ति है, जबकि भीतर शान्त स्वरूप ।

      भगवान गीता में बाह्य वस्तुओं को (भोगों को) बाहर ही छोड़ने का कहते हैं - 

             स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रूवो: ।

             प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ।। (गीता - 5/27 )

        गीता का यह श्लोक (5.27) कहता है - बाहर के पदार्थों को बाहर ही छोड़कर और नेत्रों की दृष्टि को भौंहों के मध्य स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण तथा अपान वायु को सम करना । इतना सब करके इंद्रियों की बाह्य विचरण प्रवृत्ति को नियंत्रित किया जा सकता है । फिर इंद्रियाँ विषयों की ओर नहीं भागेंगी । 

         इंद्रियों का विषयों की ओर भागना ही भोग उपलब्ध कराता है । भोगों के लिए भागना कभी न समाप्त होने वाली एक दौड़ है । यह दौड़ एक वृत्त की परिधि पर दौड़ने के समान है, जो कहीं नहीं पहुंचाती और न ही कभी समाप्त होती है । इसे ही संसार-चक्र कहा गया है ।

        कठोपनिषद् के अनुसार -

           परांचि खानि व्यतृणत् स्वयम्भू:

                   तस्मात् परां पश्यति नान्तरात्मन् ।

           कश्चिद्धीर: प्रत्यगात्मानमैक्ष-

                         दावृत्तचक्षुमृतत्वमिच्छन् ।। (2.1.1)

          अर्थात् स्वयं प्रकट होने वाले परमेश्वर ने समस्त इंद्रियों के द्वार बाहर की ओर जाने वाले ही बनाए हैं; इसलिए वह बाहर की वस्तुओं को ही देखता है, अंतरात्मा को नहीं । किसी बुद्धिमान मनुष्य ने अमर पद को पाने की इच्छा करके चक्षु आदि इंद्रियों को बाह्य विषयों से लौटाई है, उसी ने अंतरात्मा को देखा है ।

          इंद्रियों के सभी विषय बाहर हैं । इन्द्रियाँ बनाई इसलिए है कि मनुष्य इंद्रियों के माध्यम से इन विषयों का ज्ञान करे और सुखमय जीवन बिताते हुए परमात्मा के द्वार तक पहुंचे । परन्तु दुर्भाग्य से मनुष्य ने इन विषयों के रस में डूब जाने को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया है । प्रत्येक विषय-रस का तो अनुभव होगा ही परन्तु उसको ही जीवन का सत्य मान लेना अनुचित है । रस में आसक्त होकर उसमें डूबना वासना है, इसे प्रेम नहीं कहा जा सकता । उस रस से बाहर निकल जाना ही वासना को प्रेम में परिवर्तित कर देता है । इसके लिए इन्द्रियों को बाह्य विषयों से लौटाना ही होगा ।

         जीवन में शरीर के संचालन के लिए कुछ पदार्थों की आवश्यकता रहती है । आवश्यकता की पूर्ति का विधान परमात्मा ने प्रकृति के माध्यम से किया है । समस्या तो तब पैदा होती है, जब आवश्यकता आसक्ति में बदल जाती है । यह आसक्ति ही वासना है । गीता में भगवान कहते हैं कि विषय-चिन्तन से आसक्ति पैदा होती है और आसक्ति से कामना । कामना के कारण ही क्रोध और मतिभ्रम पैदा होती है, जिससे मनुष्य पतन की ओर अग्रसर होता जाता है । आधुनिक जीवन में यह पतन असंतोष, तनाव और अशान्ति के रूप में प्रकट हो रहा है ।

            ईशावास्योपनिषद कहती है - 

 ईशा वास्यमिदंसर्वं यत्किंच जगत्यां जगत् ।

 तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध: कस्य स्विद् धनम् ।। 1 ।।

       अर्थात् अखिल ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी जड़-चेतन स्वरूप जगत् है, यह सारा ईश्वर से व्याप्त है । उस ईश्वर को साथ रखते हुए इसे त्यागपूर्वक भोगते रहो, इसमें आसक्त मत होओ क्योंकि धन आदि भोग्य पदार्थ किसका है ? अर्थात् किसी का नहीं है । 

           सारांश है कि प्रारब्ध से मिल रहे भोगों को त्यागपूर्वक भोगें । भोग अर्थात् इंद्रिय-सुख को यदि त्याग पूर्वक और एक सीमा में रहते हुए भोग रहे हैं तो जीवन में अशान्ति का आगमन हो ही नहीं सकता । समस्या तो भोग को भोगने के बाद उसका त्याग न कर उसमें आसक्ति रखने से पैदा होती है । 

            आवश्यकता की पूर्ति करना प्रकृति का दायित्व है । जब मनुष्य प्रकृति के विरुद्ध चलता है जैसे अति भोजन, अति भोग, अति तनाव, अति सोशल मीडिया आदि, तब शरीर और मन दोनों ही विद्रोह कर देते हैं । जब मनुष्य के जीवन की गति प्रकृति के नियमों के विरुद्ध चलने लगती है, तब शरीर और मन दोनों ही संकेत देने लगते हैं । ये संकेत ही रोग कहलाते हैं । मानसिक संकेत (रोग) आधि और शारीरिक संकेत व्याधि कहलाते हैं । 

     रोग जब आता है तब समझें कि शरीर और मन रोग के माध्यम से हमसे संवाद कर रहे हैं । हमें कम से कम रोग-दशा में तो इनकी बात सुननी ही चाहिए । भोग जब विवेकरहित हो जाता है तब रोग को जन्म देता है । 

       भगवान श्री कृष्ण कहते हैं - 

ध्यायतो विषयान् पुंस: संगस्तेषूपजायते ।

संगात् संजायते काम: कामात् क्रोधोऽभिजायते ।। गीता - 2.62 ।।

विषयों का निरंतर होने वाला चिंतन आसक्ति पैदा करता है, आसक्ति से कामना पैदा होती है । कामना से क्रोध और क्रोध से मनुष्य का पतन आरम्भ होता है ।

         आयुर्वेद में रोग को केवल शारीरिक विकार ही नहीं माना गया है बल्कि इसमें अंतःकरण की भूमिका को भी स्वीकार किया गया है । आयुर्वेद कहता है - प्रज्ञापराध एव रोगाणां मूलकारणम् । अर्थात् विवेक का नाश ही रोगों का मूल कारण है । जहां भोगों पर विवेक को वरीयता दी जाती है, वहां रोग टिक ही नहीं सकता । आज चिकित्सालयों में जो रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है उसका अर्थ यह नहीं है कि रोग बढ़े हैं । इसके लिए हमारी जीवन-शैली उत्तरदायी है । हम रोग के निदान की विफलता के लिए चिकित्सक को ज़िम्मेवार ठहरा देते हैं परन्तु हमने जीवन में जो त्रुटि की है उस ओर हमारी दृष्टि कभी नहीं जाती ।

       यह रोग नहीं होकर हमारे लिए चेतावनी है कि हम प्रकृति के मार्ग (धर्म, ऋतु, स्वभाव आदि) से भटक रहे हैं । रोग केवल शारीरिक और मानसिक कमजोरी ही नहीं है बल्कि जीवन-शैली की चेतावनी है । रोग हमें बतलाता है कि हमने कहीं न कहीं प्रकृति के नियमों का उल्लंघन किया है । रोग को दण्ड न माने बल्कि आत्मा (स्वयं के भीतर) की पुकार मानें जो कह रही है - ‘ रुक जाओ, स्वयं की ओर लौट जाओ ।’ इस स्वयं की ओर लौटने की प्रक्रिया का नाम है - योग ।

          योग का अर्थ है - जोड़ अर्थात् शरीर, मन और आत्मा का संतुलन । योग भोग को नकारता नहीं है बल्कि उसे शुद्ध करता है । योग हमें सिखाता है कि कैसे इंद्रियों का उपयोग हो । मनुष्य को चाहिए कि वह इंद्रियों का सदुपयोग करें, न कि उनका दास बन जाए । जब मन जागरूक होता है, तब इंद्रियों का भोजन भी संयमित होता है, विचार भी शान्त होते हैं और जीवन अपने आप सरल, सहज और स्वस्थ होने लगता है ।

       योग केवल आसन और प्राणायाम तक ही सीमित नहीं है । वह एक जीवन-दृष्टि है - सजगता (चैतन्यता), समता और स्वीकार्यता की दृष्टि । जहां योग है वहाँ भोग सीमा में रहता है । भोग सीमा में रहेगा तो रोग प्रथम तो आएगा ही नहीं है और अगर आ भी जाएगा तो धीरे-धीरे विदा होने लगेगा ।

        महर्षि पतञ्जलि के योग-सूत्रों में एक सूत्र कहता है -

योगश्चित्तवृत्तिनिरोध: (1.2)

अर्थात् योग का अर्थ है - चित्त की चंचल वृत्तियों का शमन ।

            इन्द्रियों का संयमित आहार, उनका संतुलित विहार और चैतन्य- जीवन (होशपूर्वक जीवन) - यही योग है और यही दुःखों का नाश करने वाला है ।

 भगवान गीता में कहते हैं - 

        युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।

        युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ।। (6.17)

अर्थात् दुःखों का नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का तथा यथायोग्य सोने-जागने वाले का ही सिद्ध होता है ।

      योग भोग का विरोध नहीं करता, बल्कि उसे मर्यादा में रखता है । जहां योग है, वहाँ भोग साधन बनता है, साध्य नहीं । योग न तो संसार से पलायन है और न ही भोग का निषेध । योग तो जीवन को अनुशासित करता है, उसे सजग और अर्थपूर्ण बनाता है । योग इंद्रियों का दमन नहीं है बल्कि उनका परिष्कार है । 

         जब मनुष्य भोग को ही जीवन का लक्ष्य बना लेता है, तब रोग अनिवार्य हो जाता है । जब योग जीवन की दृष्टि बन जाता है, तब रोग भी गुरु बनकर विदा हो जाता है । 

          आध्यात्मिक जीवन का सार यही है कि हम सुख की खोज बाहर नहीं, स्वयं के भीतर ही करें । जब भीतर संतुलन (समता) स्थापित हो जाता है, तब न तो भोग बाँधता है और न ही रोग डराता है । तब जीवन सहज, शान्त और सार्थक हो जाता है ।

उपनिषद् कहती है -

               नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो 

                        न मेधया न बहुना श्रुतेन ।

               यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- 

                    स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ।। मुण्डक उ.- 3/2/3 और कठ. उ.-1/2/23 ।।

        यह आत्मा (परमात्मा) न तो प्रवचन से, न बुद्धि से और न ही बार-बार सुनने से ही प्राप्त हो सकता है । यह परमात्मा जिसको स्वीकार कर लेता है, उसके द्वारा ही प्राप्त हो सकता है और उसके लिए अपने यथार्थ स्वरूप को प्रकट कर देता है । 

           परमात्मा से योग को उपलब्ध होने के लिए न तो शास्त्रों को पढ़ कर ज्ञानी होने की आवश्यकता है, और न ही बहुत सुनने की आवश्यकता है । योग को उपलब्ध होने के लिए तो समस्त भोगों की इच्छा का त्याग करके परमात्मा का ध्यान करना ही पर्याप्त है । भोगों की इच्छा के त्याग से असंयमित और अनुचित भोग होंगे ही नहीं । भोग संयमित होंगे तो रोगों से भी दूरी बनी रहेगी । स्वस्थ शरीर की परमात्मा के योग में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका है । सारांश है कि आत्मा (परमात्मा) न भोग से मिलता है और न ही संग्रह से - वह तो योगमय जीवन से प्रकट होता ।

          भोग, रोग और योग नामक इस लेख का सारांश है कि आत्मा (परमात्मा) न भोग से मिलता है और न ही संग्रह से - वह तो योगमय जीवन से प्रकट होता है ।

       योग को स्पष्ट करते हुए गीता में भगवान कहते हैं - 

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।

स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ।। 6/23 ।।

जिसमें दुःखों के संयोग का ही वियोग है, उसी को ‘योग’ नाम से जानना चाहिए । उस ध्यान योग का अभ्यास न उकताये हुए चित्त से निश्चयपूर्वक करना चाहिए । 

        दुःख के संयोग का वियोग होना ही योग है । जीवन में दु:ख आता ही तभी है जब बहने वाले का संग कर उसके साथ हम भी बहने लगते हैं । इस प्रकार दुःख के साथ हुए संयोग का जब वियोग हो जाता है, तब मनुष्य योग में स्थित हो जाता है । इसलिए दुःख के संयोग का वियोग हो जाना ही योग कहलाता है । 

       संयोग और वियोग प्रकृति में होते हैं अर्थात् संसार और शरीर में होते हैं जबकि योग परमात्मा के साथ होता है । परमात्मा के साथ हुए योग का वियोग होना संभव ही नहीं है । संसार और शरीर अस्थिर हैं । परिवर्तनशील होने के कारण केवल इन्हीं में संयोग और वियोग होते रहते हैं । परमात्मा शाश्वत और अपरिवर्तनशील है । इनके साथ योग होने पर पुनः वियोग होने का प्रश्न ही नहीं उठता । 

        योग को कैसे उपलब्ध हुआ जा सकता है ? उत्तर है- समता में रहते हुए । समता का दूसरा नाम ही ‘योग’ है ।

         गीता में भगवान श्रीकृष्ण समता को ही योग बताते हैं - 

        योगस्थ: कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय । 

        सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ।। 2/48 ।।

अर्थात् हे धनंजय ! तू आसक्ति का त्याग करके सिद्धि-असिद्धि में सम होकर योग में स्थित हुआ कर्मों को कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है ।

          स्वामीजी कहते हैं कि किसी एक वस्तु/व्यक्ति में राग होगा तो दूसरी वस्तु/व्यक्ति में द्वेष होना स्वाभाविक है । कार्य की सिद्धि अथवा असिद्धि में राग-द्वेष की भूमिका परोक्ष रूप से रहती है क्योंकि इनके रहते समता आनी कठिन है । इसलिए प्रत्येक कर्म राग-द्वेष से रहित होकर करना चाहिए । समता से जीवन में विचलन होना संभव ही नहीं है । फिर प्रत्येक परिस्थिति में मनुष्य समता में रहते हुए सुखी-दुःखी नहीं होता, अशान्त नहीं होता । समता को आचरण में लाने पर व्यक्ति योग के पथ से विचलित नहीं होता । इसीलिए समता को ही ‘योग’ कहा जाता है ।

सार-संक्षेप 

              भारतीय दर्शन में मनुष्य के जीवन को केवल भौतिक सुख की यात्रा नहीं माना गया है बल्कि उसे आत्मबोध की साधना कहा गया है । फिर भी जब मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर इंद्रिय-भोग को ही अपना लक्ष्य बना लेता है तब उसका जीवन असंतुलित हो जाता है । शान्ति के लिए इस असंतुलित जीवन को संतुलित करना आवश्यक है । इस असंतुलन और संतुलन की त्रयी है - भोग, रोग और योग । आधुनिक मनुष्य भोग से थका हुआ और रोग से डरा हुआ है । ऐसे समय में योग केवल स्वास्थ्य पद्धति न होकर आत्मिक आवश्यकता बन गया है । जब भोग विवेक से जुड़ता है तब योग जीवन की दिशा बन जाता है । इस प्रकार रोग भी अपनी भूमिका पूरी कर विदा हो जाता है । जहां विवेकपूर्ण भोग नहीं है, वहाँ रोग अवश्य आता है । जब जीवन में योग आता है तब जीवन स्वयं उपासना बन जाता है ।

           भोग से रोग तभी पैदा होता है जब हमारा विवेक से भटकाव हो जाता हैं । इस भटकाव से लौटने का मार्ग है - योग । भोग से रोग - आत्मिक असंतुलन है । आत्मिक संतुलन की पुनर्स्थापना का नाम ही योग है । भारतीय दर्शन का संदेश स्पष्ट है - जीवन का उद्देश्य भोग नहीं , बोध है और योग उसी बोध का मार्ग है । भोग सीमा में हो तो सौन्दर्य है, रोग-संकेत को समझ लें तो जीवन साधना बन जाता है । साधना से योग को उपलब्ध हुआ जा सकता है और योग जब जीवन बन जाता है तो मनुष्य पूर्णता को उपलब्ध हो जाता है । 

       सारांश यह है कि भोग, रोग और योग जीवन का आत्मिक सत्य है । भोग और रोग से योग की यात्रा आत्मिक असंतुलन से आत्मबोध की यात्रा है । इसीलिए भगवान गीता में अर्जुन को कहते हैं - तस्मात् योगी भवार्जुन (6/46) अर्थात् हे अर्जुन ! तू योगी हो जा । 

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल