भोग, रोग और योग
मन - बन्धन और मोक्ष का कारण
अमृत-बिन्दु उपनिषद् में आता है -
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो: ।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्तं निर्विषयं स्मृतम् ।। 2 ।।
मन ही मनुष्य के लिए बंधन और मुक्ति का कारण है। इंद्रिय विषयों में आसक्त मन बंधन की ओर ले जाता है और जो इंद्रिय विषयों से मुक्त होता है वह मनुष्य को मुक्त कर देता है ।
हम मन में किसी भी पदार्थ के बारे में एक पूर्वाग्रह पाल लेते हैं । उसी अनुसार हमें वह अच्छा अथवा बुरा लगता है । जो हमें अच्छा लगता है उसकी तो कामना करने लगते हैं और जो बुरा लगता है, उससे विरक्त होते जाते हैं । अच्छे से तो हमारा सम्पर्क बढ़ता है और बुरे से दूरी । ‘ममता, तू न गई मेरे मन से’, यह सब मन में समायी (माया) का ही खेल है ।
मन - यह इंद्रियों और बुद्धि के बीच की अवस्था का नाम है । इंद्रियों से जो सुख का ज्ञान होता है, उसमें आसक्त होकर यदि मन चलता है, तो शरीर रुग्ण हो जाता है । यही मन यदि बुद्धि के ज्ञान से चलने लगे तो मुक्ति के अनुभव होने का मार्ग प्रशस्त होता है । इंद्रियों का ज्ञान माया से प्रेरित है और बुद्धि का ज्ञान आत्मा से । मन पर कौन सा ज्ञान प्रभावी है, यह महत्वपूर्ण है । यदि इंद्रियों का ज्ञान प्रभावी है तो व्यक्ति भोग को प्राथमिकता देता है, जोकि एक दिन रोग का जनक बनता है और यदि मन पर बुद्धि का ज्ञान प्रभावी है तो व्यक्ति एक दिन योग को उपलब्ध हो जाता है ।
यह जानते हुए भी कि प्रत्येक भोग रोग की ओर ले जाने वाला है, मनुष्य भोगों की ओर ही क्यों भागता है ? विवेक ( बुद्धि का ज्ञान) का सदुपयोग कर वह भोगों से विरक्त होकर, रोग-मुक्त हो सकता है, अंततः जिसकी परिणीति योग में होगी ही, यह निश्चित है । भोग से रोग की ओर अथवा भोग से योग की ओर, दोनों में से किस ओर जाएं, यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है । चलिए ! इस विषय को थोड़ा गहराई से समझने का प्रयास करते हैं, "भोग, रोग और योग" लेख के माध्यम से।
एक समान गति से एक ही दिशा में जा रहे दो वाहनों में बैठे व्यक्ति एक दूसरे के वाहन की गति का आकलन नहीं कर सकते, जबकि दोनों ही गतिमान हैं । दोनों में से किसी एक वाहन की गति में आया तनिक सा परिवर्तन दूसरे वाहन की गति में आए परिवर्तन को अनुभव कर लेता है परन्तु ऐसा अनुभव सत्य नहीं हो सकता । जैसे एक वाहन स्थिर है और दूसरा वाहन पास में से निकल रहा है तो दूसरे वाहन में बैठे व्यक्ति को पहले वाला वाहन विपरीत दिशा में जाता और स्वयं का वाहन स्थिर खड़ा प्रतीत होता है । रेलगाड़ी में बैठे हुए व्यक्ति को बाहर के पेड़ और पोल आदि पीछे भागते नज़र आयेंगे जबकि वास्तविकता यह है कि वह स्वयं गतिमान है और पेड़, पोल अपने स्थान पर स्थिर हैं । यही स्थिति इस संसार और शरीर की है ।
जगत् वह है जो सदैव गति करता रहता है, एक पल के लिए भी स्थिर नहीं रहता । गति का अर्थ है कि यह जगत् परिवर्तनशील है, इसमें प्रतिपल बदलाव हो रहा है और इस बदलाव की गति हमारे शरीर में हो रहे बदलाव के समान ही है । यही कारण है कि जगत् में हो रहे परिवर्तन को हमारा शरीर समझ नहीं पाता, उसका अनुभव नहीं कर पाता ।
स्वामीजी कहते हैं कि बहने वाले के लिए बहने वाला ही सत्य है क्योंकि बहनेवाला बहनेवाले को जान ही नहीं रहा है । बहनेवाले को तो रहनेवाला ही जान सकता है । शरीर और संसार बहनेवालों में हैं और हम स्वयं रहनेवाले हैं । जब इस बात का ज्ञान हो जाएगा उसी दिन यह संसार और शरीर असत्य हो जाएंगे । इंद्रियों का ज्ञान शरीर और संसार के सत्य होने का भ्रम जीवन भर बनाए रखता है । केवल विवेक ही हमारे इस भ्रम को तोड़ सकता है ।
शरीर के मुख्य रूप से दो भाग हैं - स्थूल और सूक्ष्म । दोनों ही शरीर परिवर्तनशील हैं । स्थूल शरीर तो कुछ भी अनुभव नहीं करता, जो कुछ भी अनुभव करता है वह सूक्ष्म शरीर ही करता है । परन्तु सूक्ष्म शरीर द्वारा किया जाने वाला अनुभव भी सत्य नहीं होता । दोनों ही शरीरों में सदैव परिवर्तन होते रहते हैं । इधर जगत् भी परिवर्तनशील है । जो स्वयं बदल रहा वह दूसरे बदल रहे को बदलता हुआ अनुभव नहीं कर सकता । यही कारण है कि हमें सूक्ष्म शरीर के आधार पर स्वयं के साथ-साथ संसार भी सदैव रहनेवाला प्रतीत होता है । यह वैसे ही है जैसे एक ही दिशा में समान गति से चल रही दो रेलगाड़ियों में बैठे व्यक्ति एक दूसरे को स्थिर ही अनुभव करते हैं । लेकिन सूक्ष्म शरीर से होने वाला ऐसा अनुभव केवल भ्रम ही है, सत्य से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है ।
यह अनुभव जिसको हो रहा है, वह कौन है ? हम समझते हैं कि यह अनुभव हमारे शरीर को हो रहा है परंतु यह सत्य नहीं है, यह भी हमारा भ्रम है । जिसको संसार की परिवर्तनशीलता का अनुभव हो रहा है वह अपरिवर्तनशील है, जोकि हम स्वयं हैं और वही हमारा स्वरूप है । इसी प्रकार संसार में रहते हुए सांसारिक विषयों के भोग से जिस सुख का अनुभव हम करते हैं, वह सुख भी हमारा केवल भ्रम ही है । जब हम संसार और उसके विषयों से मिलने वाले सुख से स्वयं को अलग कर लेंगे, तत्काल ही योग को उपलब्ध हो जाएंगे अन्यथा भोगों का दुष्चक्र हमें शारीरिक रोगों में उलझाकर शेष जीवन में मिलने वाले अतिशय दुःख से मुक्त नहीं होने देगा ।
मनुष्य का स्वभाव कुछ ऐसा है कि वह सदैव सुख की खोज में ही लगा रहता है । उसकी यह खोज स्वाभाविक है क्योंकि वह स्वयं आनन्द स्वरूप है । जब यह सुख केवल इंद्रिय-तृप्ति तक ही सिमट कर रह जाता है, तब मनुष्य अपने जीवन के लक्ष्य तक पहुंच नहीं पाता । भारतीय दर्शन इसी को भोग कहता है । भोग अपने आप में बुरा नहीं है परंतु जब भोग विवेक से रहित होकर किया जाता है, तब वह रोग को जन्म देता है । शास्त्रों ने योग को ही इस समस्या का एकमात्र समाधान बताया है ।
भोग का अर्थ है - इंद्रियों से मिलने वाला सुख । भोग का अर्थ केवल भोजन अथवा भौतिक वस्तुएं ही नहीं है । असंयमित रूप से बोलना, सोचना, देखना, चाहना आदि भी भोग के ही विभिन्न रूप हैं । सभी इन्द्रियाँ भोगों में ही लगी हुई हैं । भोगों से इन्द्रियाँ अल्प रूप से तृप्त होती है परन्तु यह तृप्ति कुछ समय के लिए ही सुख देती है । सुख मिलने के बाद भी संतुष्टि कहाँ मिल पाती है, क्योंकि सुख न तो पर्याप्त लगता है और न ही वह दीर्घ कल तक टिकता है । इसी कारण से भीतर सदैव एक प्रकार की रिक्तता बनी रहती है, अभाव बना रहता है । यह अभाव ही जीवन में अशान्ति व तनाव पैदा करता है जिससे व्यक्ति समता में नहीं रह पाता और जीवनभर दुःखी होता रहता है ।
भगवान गीता में कहते हैं - ‘ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।’ (गीता -5/22) अर्थात् सभी भोग (सुख) इंद्रियों और विषयों के संयोग से पैदा होते हैं और दुःख के ही कारण हैं ।
सभी सुख संयोगजन्य हैं और इंद्रिय स्पर्श से मिलते हैं । संयोग से जब किसी विषय का स्पर्श सम्बन्धित ज्ञानेंद्रिय से होता है, तब जीव एक प्रकार के सुख को अनुभव करता है । सुख का अनुभव करना ही भोग है । प्रत्येक इंद्रिय का एक विषय होता है, उस विषय से संपर्क होते ही मन को सुख का अनुभव होता है । जब विषय संपर्क बार-बार और असंयमित होता है, तब वही सुख दुःख में परिवर्तित होने लगता है । असंयमित भोग ही शारीरिक और मानसिक रोग का कारण बनते हैं । इन रोगों से शारीरिक और मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाता है, जिससे मनुष्य जीवन में अशान्त होकर दुःख का अनुभव करता है । जीवन में शान्ति के लिये इंद्रियों को भोगों की ओर भागने से रोकना होगा ।
पांच इंद्रियों के पांच विषय - शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध । जो भी जीव इनमें आसक्त हो गया उनकी गति भी वैसी ही होती है जैसी मृग, हाथी, पतंगे, मछली और भंवरे की होती है । इन विषयों का आकर्षण जीव को शारीरिक और मानसिक रोगों के माध्यम से मृत्यु के द्वार तक पहुंचा देता है । ये सभी विषय विभिन्न वस्तुओं के रूप में हमारे आस-पास ही उपस्थित रहते हैं । उनमें आसक्त न होकर उनको बाहर ही छोड़ देना उचित है ।
सृष्टिकर्ता ने इंद्रियों को बाहर की ओर प्रवृत किया है, इसलिए मनुष्य बाहर ही सुख खोजता है, भीतर नहीं । मनुष्य की दृष्टि सदैव बाहर की ओर ही जाती है, भीतर की ओर नहीं । बाहर संसार, उसके विषय और उनसे उत्पन्न होने वाली अशान्ति है, जबकि भीतर शान्त स्वरूप ।
भगवान गीता में बाह्य वस्तुओं को (भोगों को) बाहर ही छोड़ने का कहते हैं -
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रूवो: ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ।। (गीता - 5/27 )
गीता का यह श्लोक (5.27) कहता है - बाहर के पदार्थों को बाहर ही छोड़कर और नेत्रों की दृष्टि को भौंहों के मध्य स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण तथा अपान वायु को सम करना । इतना सब करके इंद्रियों की बाह्य विचरण प्रवृत्ति को नियंत्रित किया जा सकता है । फिर इंद्रियाँ विषयों की ओर नहीं भागेंगी ।
इंद्रियों का विषयों की ओर भागना ही भोग उपलब्ध कराता है । भोगों के लिए भागना कभी न समाप्त होने वाली एक दौड़ है । यह दौड़ एक वृत्त की परिधि पर दौड़ने के समान है, जो कहीं नहीं पहुंचाती और न ही कभी समाप्त होती है । इसे ही संसार-चक्र कहा गया है ।
कठोपनिषद् के अनुसार -
परांचि खानि व्यतृणत् स्वयम्भू:
तस्मात् परां पश्यति नान्तरात्मन् ।
कश्चिद्धीर: प्रत्यगात्मानमैक्ष-
दावृत्तचक्षुमृतत्वमिच्छन् ।। (2.1.1)
अर्थात् स्वयं प्रकट होने वाले परमेश्वर ने समस्त इंद्रियों के द्वार बाहर की ओर जाने वाले ही बनाए हैं; इसलिए वह बाहर की वस्तुओं को ही देखता है, अंतरात्मा को नहीं । किसी बुद्धिमान मनुष्य ने अमर पद को पाने की इच्छा करके चक्षु आदि इंद्रियों को बाह्य विषयों से लौटाई है, उसी ने अंतरात्मा को देखा है ।
इंद्रियों के सभी विषय बाहर हैं । इन्द्रियाँ बनाई इसलिए है कि मनुष्य इंद्रियों के माध्यम से इन विषयों का ज्ञान करे और सुखमय जीवन बिताते हुए परमात्मा के द्वार तक पहुंचे । परन्तु दुर्भाग्य से मनुष्य ने इन विषयों के रस में डूब जाने को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया है । प्रत्येक विषय-रस का तो अनुभव होगा ही परन्तु उसको ही जीवन का सत्य मान लेना अनुचित है । रस में आसक्त होकर उसमें डूबना वासना है, इसे प्रेम नहीं कहा जा सकता । उस रस से बाहर निकल जाना ही वासना को प्रेम में परिवर्तित कर देता है । इसके लिए इन्द्रियों को बाह्य विषयों से लौटाना ही होगा ।
जीवन में शरीर के संचालन के लिए कुछ पदार्थों की आवश्यकता रहती है । आवश्यकता की पूर्ति का विधान परमात्मा ने प्रकृति के माध्यम से किया है । समस्या तो तब पैदा होती है, जब आवश्यकता आसक्ति में बदल जाती है । यह आसक्ति ही वासना है । गीता में भगवान कहते हैं कि विषय-चिन्तन से आसक्ति पैदा होती है और आसक्ति से कामना । कामना के कारण ही क्रोध और मतिभ्रम पैदा होती है, जिससे मनुष्य पतन की ओर अग्रसर होता जाता है । आधुनिक जीवन में यह पतन असंतोष, तनाव और अशान्ति के रूप में प्रकट हो रहा है ।
ईशावास्योपनिषद कहती है -
ईशा वास्यमिदंसर्वं यत्किंच जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध: कस्य स्विद् धनम् ।। 1 ।।
अर्थात् अखिल ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी जड़-चेतन स्वरूप जगत् है, यह सारा ईश्वर से व्याप्त है । उस ईश्वर को साथ रखते हुए इसे त्यागपूर्वक भोगते रहो, इसमें आसक्त मत होओ क्योंकि धन आदि भोग्य पदार्थ किसका है ? अर्थात् किसी का नहीं है ।
सारांश है कि प्रारब्ध से मिल रहे भोगों को त्यागपूर्वक भोगें । भोग अर्थात् इंद्रिय-सुख को यदि त्याग पूर्वक और एक सीमा में रहते हुए भोग रहे हैं तो जीवन में अशान्ति का आगमन हो ही नहीं सकता । समस्या तो भोग को भोगने के बाद उसका त्याग न कर उसमें आसक्ति रखने से पैदा होती है ।
आवश्यकता की पूर्ति करना प्रकृति का दायित्व है । जब मनुष्य प्रकृति के विरुद्ध चलता है जैसे अति भोजन, अति भोग, अति तनाव, अति सोशल मीडिया आदि, तब शरीर और मन दोनों ही विद्रोह कर देते हैं । जब मनुष्य के जीवन की गति प्रकृति के नियमों के विरुद्ध चलने लगती है, तब शरीर और मन दोनों ही संकेत देने लगते हैं । ये संकेत ही रोग कहलाते हैं । मानसिक संकेत (रोग) आधि और शारीरिक संकेत व्याधि कहलाते हैं ।
रोग जब आता है तब समझें कि शरीर और मन रोग के माध्यम से हमसे संवाद कर रहे हैं । हमें कम से कम रोग-दशा में तो इनकी बात सुननी ही चाहिए । भोग जब विवेकरहित हो जाता है तब रोग को जन्म देता है ।
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं -
ध्यायतो विषयान् पुंस: संगस्तेषूपजायते ।
संगात् संजायते काम: कामात् क्रोधोऽभिजायते ।। गीता - 2.62 ।।
विषयों का निरंतर होने वाला चिंतन आसक्ति पैदा करता है, आसक्ति से कामना पैदा होती है । कामना से क्रोध और क्रोध से मनुष्य का पतन आरम्भ होता है ।
आयुर्वेद में रोग को केवल शारीरिक विकार ही नहीं माना गया है बल्कि इसमें अंतःकरण की भूमिका को भी स्वीकार किया गया है । आयुर्वेद कहता है - प्रज्ञापराध एव रोगाणां मूलकारणम् । अर्थात् विवेक का नाश ही रोगों का मूल कारण है । जहां भोगों पर विवेक को वरीयता दी जाती है, वहां रोग टिक ही नहीं सकता । आज चिकित्सालयों में जो रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है उसका अर्थ यह नहीं है कि रोग बढ़े हैं । इसके लिए हमारी जीवन-शैली उत्तरदायी है । हम रोग के निदान की विफलता के लिए चिकित्सक को ज़िम्मेवार ठहरा देते हैं परन्तु हमने जीवन में जो त्रुटि की है उस ओर हमारी दृष्टि कभी नहीं जाती ।
यह रोग नहीं होकर हमारे लिए चेतावनी है कि हम प्रकृति के मार्ग (धर्म, ऋतु, स्वभाव आदि) से भटक रहे हैं । रोग केवल शारीरिक और मानसिक कमजोरी ही नहीं है बल्कि जीवन-शैली की चेतावनी है । रोग हमें बतलाता है कि हमने कहीं न कहीं प्रकृति के नियमों का उल्लंघन किया है । रोग को दण्ड न माने बल्कि आत्मा (स्वयं के भीतर) की पुकार मानें जो कह रही है - ‘ रुक जाओ, स्वयं की ओर लौट जाओ ।’ इस स्वयं की ओर लौटने की प्रक्रिया का नाम है - योग ।
योग का अर्थ है - जोड़ अर्थात् शरीर, मन और आत्मा का संतुलन । योग भोग को नकारता नहीं है बल्कि उसे शुद्ध करता है । योग हमें सिखाता है कि कैसे इंद्रियों का उपयोग हो । मनुष्य को चाहिए कि वह इंद्रियों का सदुपयोग करें, न कि उनका दास बन जाए । जब मन जागरूक होता है, तब इंद्रियों का भोजन भी संयमित होता है, विचार भी शान्त होते हैं और जीवन अपने आप सरल, सहज और स्वस्थ होने लगता है ।
योग केवल आसन और प्राणायाम तक ही सीमित नहीं है । वह एक जीवन-दृष्टि है - सजगता (चैतन्यता), समता और स्वीकार्यता की दृष्टि । जहां योग है वहाँ भोग सीमा में रहता है । भोग सीमा में रहेगा तो रोग प्रथम तो आएगा ही नहीं है और अगर आ भी जाएगा तो धीरे-धीरे विदा होने लगेगा ।
महर्षि पतञ्जलि के योग-सूत्रों में एक सूत्र कहता है -
योगश्चित्तवृत्तिनिरोध: (1.2)
अर्थात् योग का अर्थ है - चित्त की चंचल वृत्तियों का शमन ।
इन्द्रियों का संयमित आहार, उनका संतुलित विहार और चैतन्य- जीवन (होशपूर्वक जीवन) - यही योग है और यही दुःखों का नाश करने वाला है ।
भगवान गीता में कहते हैं -
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ।। (6.17)
अर्थात् दुःखों का नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का तथा यथायोग्य सोने-जागने वाले का ही सिद्ध होता है ।
योग भोग का विरोध नहीं करता, बल्कि उसे मर्यादा में रखता है । जहां योग है, वहाँ भोग साधन बनता है, साध्य नहीं । योग न तो संसार से पलायन है और न ही भोग का निषेध । योग तो जीवन को अनुशासित करता है, उसे सजग और अर्थपूर्ण बनाता है । योग इंद्रियों का दमन नहीं है बल्कि उनका परिष्कार है ।
जब मनुष्य भोग को ही जीवन का लक्ष्य बना लेता है, तब रोग अनिवार्य हो जाता है । जब योग जीवन की दृष्टि बन जाता है, तब रोग भी गुरु बनकर विदा हो जाता है ।
आध्यात्मिक जीवन का सार यही है कि हम सुख की खोज बाहर नहीं, स्वयं के भीतर ही करें । जब भीतर संतुलन (समता) स्थापित हो जाता है, तब न तो भोग बाँधता है और न ही रोग डराता है । तब जीवन सहज, शान्त और सार्थक हो जाता है ।
उपनिषद् कहती है -
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्य-
स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ।। मुण्डक उ.- 3/2/3 और कठ. उ.-1/2/23 ।।
यह आत्मा (परमात्मा) न तो प्रवचन से, न बुद्धि से और न ही बार-बार सुनने से ही प्राप्त हो सकता है । यह परमात्मा जिसको स्वीकार कर लेता है, उसके द्वारा ही प्राप्त हो सकता है और उसके लिए अपने यथार्थ स्वरूप को प्रकट कर देता है ।
परमात्मा से योग को उपलब्ध होने के लिए न तो शास्त्रों को पढ़ कर ज्ञानी होने की आवश्यकता है, और न ही बहुत सुनने की आवश्यकता है । योग को उपलब्ध होने के लिए तो समस्त भोगों की इच्छा का त्याग करके परमात्मा का ध्यान करना ही पर्याप्त है । भोगों की इच्छा के त्याग से असंयमित और अनुचित भोग होंगे ही नहीं । भोग संयमित होंगे तो रोगों से भी दूरी बनी रहेगी । स्वस्थ शरीर की परमात्मा के योग में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका है । सारांश है कि आत्मा (परमात्मा) न भोग से मिलता है और न ही संग्रह से - वह तो योगमय जीवन से प्रकट होता ।
भोग, रोग और योग नामक इस लेख का सारांश है कि आत्मा (परमात्मा) न भोग से मिलता है और न ही संग्रह से - वह तो योगमय जीवन से प्रकट होता है ।
योग को स्पष्ट करते हुए गीता में भगवान कहते हैं -
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ।। 6/23 ।।
जिसमें दुःखों के संयोग का ही वियोग है, उसी को ‘योग’ नाम से जानना चाहिए । उस ध्यान योग का अभ्यास न उकताये हुए चित्त से निश्चयपूर्वक करना चाहिए ।
दुःख के संयोग का वियोग होना ही योग है । जीवन में दु:ख आता ही तभी है जब बहने वाले का संग कर उसके साथ हम भी बहने लगते हैं । इस प्रकार दुःख के साथ हुए संयोग का जब वियोग हो जाता है, तब मनुष्य योग में स्थित हो जाता है । इसलिए दुःख के संयोग का वियोग हो जाना ही योग कहलाता है ।
संयोग और वियोग प्रकृति में होते हैं अर्थात् संसार और शरीर में होते हैं जबकि योग परमात्मा के साथ होता है । परमात्मा के साथ हुए योग का वियोग होना संभव ही नहीं है । संसार और शरीर अस्थिर हैं । परिवर्तनशील होने के कारण केवल इन्हीं में संयोग और वियोग होते रहते हैं । परमात्मा शाश्वत और अपरिवर्तनशील है । इनके साथ योग होने पर पुनः वियोग होने का प्रश्न ही नहीं उठता ।
योग को कैसे उपलब्ध हुआ जा सकता है ? उत्तर है- समता में रहते हुए । समता का दूसरा नाम ही ‘योग’ है ।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण समता को ही योग बताते हैं -
योगस्थ: कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय ।
सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ।। 2/48 ।।
अर्थात् हे धनंजय ! तू आसक्ति का त्याग करके सिद्धि-असिद्धि में सम होकर योग में स्थित हुआ कर्मों को कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है ।
स्वामीजी कहते हैं कि किसी एक वस्तु/व्यक्ति में राग होगा तो दूसरी वस्तु/व्यक्ति में द्वेष होना स्वाभाविक है । कार्य की सिद्धि अथवा असिद्धि में राग-द्वेष की भूमिका परोक्ष रूप से रहती है क्योंकि इनके रहते समता आनी कठिन है । इसलिए प्रत्येक कर्म राग-द्वेष से रहित होकर करना चाहिए । समता से जीवन में विचलन होना संभव ही नहीं है । फिर प्रत्येक परिस्थिति में मनुष्य समता में रहते हुए सुखी-दुःखी नहीं होता, अशान्त नहीं होता । समता को आचरण में लाने पर व्यक्ति योग के पथ से विचलित नहीं होता । इसीलिए समता को ही ‘योग’ कहा जाता है ।
सार-संक्षेप
भारतीय दर्शन में मनुष्य के जीवन को केवल भौतिक सुख की यात्रा नहीं माना गया है बल्कि उसे आत्मबोध की साधना कहा गया है । फिर भी जब मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर इंद्रिय-भोग को ही अपना लक्ष्य बना लेता है तब उसका जीवन असंतुलित हो जाता है । शान्ति के लिए इस असंतुलित जीवन को संतुलित करना आवश्यक है । इस असंतुलन और संतुलन की त्रयी है - भोग, रोग और योग । आधुनिक मनुष्य भोग से थका हुआ और रोग से डरा हुआ है । ऐसे समय में योग केवल स्वास्थ्य पद्धति न होकर आत्मिक आवश्यकता बन गया है । जब भोग विवेक से जुड़ता है तब योग जीवन की दिशा बन जाता है । इस प्रकार रोग भी अपनी भूमिका पूरी कर विदा हो जाता है । जहां विवेकपूर्ण भोग नहीं है, वहाँ रोग अवश्य आता है । जब जीवन में योग आता है तब जीवन स्वयं उपासना बन जाता है ।
भोग से रोग तभी पैदा होता है जब हमारा विवेक से भटकाव हो जाता हैं । इस भटकाव से लौटने का मार्ग है - योग । भोग से रोग - आत्मिक असंतुलन है । आत्मिक संतुलन की पुनर्स्थापना का नाम ही योग है । भारतीय दर्शन का संदेश स्पष्ट है - जीवन का उद्देश्य भोग नहीं , बोध है और योग उसी बोध का मार्ग है । भोग सीमा में हो तो सौन्दर्य है, रोग-संकेत को समझ लें तो जीवन साधना बन जाता है । साधना से योग को उपलब्ध हुआ जा सकता है और योग जब जीवन बन जाता है तो मनुष्य पूर्णता को उपलब्ध हो जाता है ।
सारांश यह है कि भोग, रोग और योग जीवन का आत्मिक सत्य है । भोग और रोग से योग की यात्रा आत्मिक असंतुलन से आत्मबोध की यात्रा है । इसीलिए भगवान गीता में अर्जुन को कहते हैं - तस्मात् योगी भवार्जुन (6/46) अर्थात् हे अर्जुन ! तू योगी हो जा ।
।। हरिः शरणम् ।।
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
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