नाभावो विद्यते सत:
प्रश्न है कि काम (सुख प्राप्त करने की इच्छा) क्यों पैदा होता है और इसका त्याग कैसे हो सकता है ?
‘काम’ शब्द की व्याख्या करना बड़ा ही कठिन है क्योंकि इसके विविध रूप है । प्रश्न तक सीमित रहते हुए इसे सरल भाषा में समझाने का प्रयत्न कर रहा हूँ ।
जो प्रश्न है, वह ‘काम’ के उस रूप से संबंधित है जो हमें संसार में उलझा रहा है । उस ‘काम’ से मुक्त होने के लिए मनुष्य को सांसारिक पदार्थों को पाने की इच्छा का त्याग करना आवश्यक है ।
एक सिक्के की तरह ‘काम’ के भी दो पहलू हैं । ‘काम’ संसार से सुख मिलने की सम्भावना तलाशता है, जिसके कारण मनुष्य ममता और आसक्ति के जाल में उलझकर संसार के बियाबान में ताउम्र भटकता रहता है, फिर भी उसे सुख नहीं मिलता । यही ‘काम’ अगर प्रेम और आनंद की दिशा पकड़ लेता है तो मनुष्य को परमात्मा तक ले जा सकता है । यह निर्णय तो स्वयं मनुष्य को ही करना है कि वह संसार से सुख चाहता है अथवा परमात्मा का प्रेम । फिर ‘काम’ स्वतः ही अपनी दिशा उसी प्रकार निर्धारित कर लेगा । ‘काम’ वर्जनीय नहीं है, मनुष्य की मानसिकता ही उसे विकृत बना देती है । अतः ‘काम’ को राम की दिशा में लगा देना ही उचित है ।
जीवन में किसी शारीरिक सुख के लिए अनुभव किए जाने वाले ‘अभाव’ की पूर्ति के लिए जिस काम की उत्पत्ति होती है, हमें उसी काम का त्याग करना है । चलिए ! काम के जनक उसी ‘अभाव’ को समझने का प्रयास करते हैं।
ऋग्वेद (10.129.1) — नासदीय सूक्त में कहा गया है -
“नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम् नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् ।
किमावरीव: कुह कस्य शर्मन्नम्भ: किमासीद् गहनं गभीरम् ।।”
अर्थात् प्रलय की दशा में न असत् था और न सत् ही था । उस समय न लोक थे और न अंतरिक्ष था, न कोई आवरण था और न ढकने योग्य कोई पदार्थ था । कहीं भी न कोई प्राणी था और न कोई सुख पहुंचाने वाला भोग ही था । उस समय गहन गंभीर जल भी नहीं था ।
सृष्टि के अभ्युदय और प्राणियों की रचना के साथ ही सत् और असत् का भेद स्पष्ट होने लगा । संसार और शरीर असत् के अन्तर्गत हैं क्योंकि उनमें स्थायित्व नहीं है जबकि सत् अपरिवर्तनशील है । संसार के भोग पदार्थ प्राणी के जीवन को सुगमता पूर्वक संचालित करने के लिए आवश्यक हैं । उन पदार्थों के उपयोग से जो शारीरिक सुख जीव को मिला उसमें वह आसक्त होने लगा । उन पदार्थों, वस्तुओं आदि पर अपना अधिकार समझने लगा और उनका संग्रह करने लगा । इस प्रकार शारीरिक सुख की इच्छा पैदा होने से जीव संसार के साथ बंधता गया । शरीर के सुख को प्राप्त करने की की इच्छा ही ‘काम’ कहलाती है ।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘काम’ की उत्पत्ति रजोगुण से हुई है ।
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव: ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ।। गीता - 3/37।।
अर्थात् रजोगुण से उत्पन्न यह ‘काम’ अर्थात् कामना ही पाप का कारण है । यह ‘काम’ ही क्रोध में परिणत होता है । यह बहुत अधिक खाने वाला और महापापी है । इस विषय में तू इसको ही वैरी जान ।
इस प्रकार स्पष्ट है कि ‘काम’ की उत्पत्ति माया (प्रकृति) के ही एक गुण, रजोगुण से हुई है । मनुष्य जीवन का उद्देश्य माया से मुक्त होकर परमात्म-अवस्था को प्राप्त होना है । माया से मुक्त होने के लिए ‘काम’ पर नियंत्रण कर उसको जीतना आवश्यक है । यह ‘काम’ इतना प्रभावशाली है कि कोई भी व्यक्ति जीते-जी नहीं कह सकता कि उसने ‘काम’ को जीत लिया है । काम को जीतने का अर्थ है, जीवन में काम से निष्प्रभावी बने रहना ।
रजोगुण से उत्पन्न ‘काम’ आपको संसार के साथ बाँधता है । इसी बंधन के कारण जीव संसार के आवागमन में पड़ा रहता है और मुक्त नहीं हो पाता । इसीलिए ‘काम’ को माया का अस्त्र कहा गया है, जिसका उपयोग करते हुए माया सृष्टि-चक्र को रूकने नहीं देती ।
माया का सबसे बड़ा अस्त्र यह ‘काम’ ही है, जिसके कारण मनुष्य कंचन और कामिनी के आकर्षण से कभी मुक्त नहीं हो पाता । यह आकर्षण जीव के भीतर पल रहे ‘काम’ के कारण है । स्मरण रहे - माया में केवल आकर्षण है, वह किसी ओर आकर्षित नहीं होती; आकर्षित तो जीव ही होता है । माया के प्रति आकर्षित होकर जीव माया (काम) से मिलने वाले शारीरिक सुख का भोग करने लगता है । वास्तव में यह सुख प्रकृति के गुणों की क्रियाओं का परिणाम होता है ।
प्रकृति में हो रही क्रियाएँ मनुष्य को इंद्रियों के माध्यम से सुख-दुःख प्रदान करती है । यथार्थ में इस संसार में सुख-दुःख जैसी चीज कहीं है ही नहीं । प्रकृति में हो रही क्रियाएँ जीव के समक्ष केवल परिस्थितियों का निर्माण करती है, जैसे वातावरण में तापक्रम का बढ़ना अथवा कम होना । स्पर्शेन्द्रिय के माध्यम से व्यक्ति को वातावरण में हो रहे परिवर्तन से गर्मी अथवा शीत का अनुभव होता है । हम इस परिस्थिति को सहन करने की क्षमता पैदा कर लेते है तो फिर हम वातावरण में हो रहे परिवर्तन से सुखी-दुःखी नहीं होंगे । इसका अर्थ है कि सुख-दुःख का अनुभव करना हमारी मानसिक दशा पर निर्भर है अर्थात् यथार्थ में सुख-दुःख कहीं नहीं है बल्कि प्रकृति में होने वाली क्रियाओं से केवल परिस्थितियाँ परिवर्तित होती हैं ।
कहने का अर्थ है कि मन के कारण ही जीव सुख-दुःख का अनुभव करता है । सुखी दुःखी होने का कारण हमारा मन है ।
जीवन में किसी अभाव का अनुभव और उस अभाव की पूर्ति के लिए उत्पन्न हुई इच्छा को ही ‘काम’ कहा गया है । ‘काम’ शब्द का अर्थ है - कामना, इच्छा अर्थात् इंद्रिय सुख की इच्छा । स्वामीजी कहते हैं कि ‘जैसा मैं चाहूँ, वैसा हो ज़ाय’ - यही काम है । किसी भी क्रिया, वस्तु और व्यक्ति का अच्छा लगना अथवा उससे कुछ भी सुख चाहना ‘काम’ है । जब भीतर किसी वस्तु अथवा व्यक्ति से इंद्रिय सुख पाने की चाहना होती है, तब कामना का जन्म होता है । उस कामना के कारण ही मनुष्य कर्म करने को विवश होता है । कर्म के फलस्वरूप इंद्रियों के माध्यम से व्यक्ति को सुख का अनुभव होता है ।
स्वामीजी काम को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि “काम अभाव में पैदा होता है।” इसका अर्थ है कि जब जीवन में किसी चीज़ की कमी या अभाव होता है, तभी मनुष्य उस अभाव की पूर्ति के लिए कुछ करने को प्रेरित होता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि आवश्यकता ही प्रयास, मेहनत और काम को जन्म देती है । यदि सब कुछ सुगमता से मिल जाए तो काम करने की इच्छा नहीं रहती । जो पाने में दुर्लभ है, जिसको प्राप्त करने के लिए कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, उसी का हम अधिक अभाव अनुभव करते हैं । इसी अभाव के कारण उसे पाने की कामना अधिक बलवती होती है । ऐसी कठिनाई, अभाव या आवश्यकता इंसान को सक्रिय बनाती है । उदाहरण: पैसे की कमी हो तो व्यक्ति मेहनत करके नौकरी या व्यवसाय करता है । संसाधन कम हों तो मस्तिष्क अधिक रचनात्मक समाधान खोजता है । आवश्यकता ही आविष्कार और परिश्रम की जननी है ।
अभाव ही हमें सुखी- दुःखी करता है । जिस अभाव की पूर्ति के लिए हम इतनी भाग-दौड़ करते हैं, जब वह लगभग पूर्णता को प्राप्त होने की स्थिति में आता है, तभी फिर कोई न कोई अन्य अभाव अनुभव में आ जाता है । मनुष्य जैसा चाहता है, वैसा कभी हो नहीं पाता क्योंकि जब होने वाला होता है कि फिर उसी में कुछ कमी अनुभव होने लगती है । अभाव की पूर्ति के लिए प्रयास करना पागलपन कि सिवाय कुछ भी नहीं है क्योंकि जिसे हम कभी पूर्णता के साथ प्राप्त नहीं कर सकते फिर भी प्रयास करते रहते हैं तो इसे पागलपन नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे ?
एक नेताजी पागलखाने का दौरा कर रहे थे । एक वार्ड में एक पागल बार-बार शबनम शबनम पुकार रहा था । नेताजी ने चिकित्साधिकारी से पूछा कि यह व्यक्ति कैसे पागल हुआ ? उत्तर मिला कि यह शबनम से बड़ा प्रेम करता था परन्तु उस लड़की की शादी इससे न हो सकी । इसलिए यह उसके अभाव में पागल हो गया । आगे दूसरे वार्ड में भी एक व्यक्ति ठीक पहले व्यक्ति की तरह ही शबनम शबनम कर रहा था । नेताजी आश्चर्यचकित रह गए । बोले - क्या यह भी शबनम का कोई प्रेमी है, जिससे इसकी शादी नहीं हो सकी । चिकित्सक ने उत्तर दिया - ‘नहीं साहब, इसकी शादी शबनम से हो गयी थी ।’
पहला व्यक्ति शबनम को चाहता था, नहीं मिली इसलिए पागल हो गया । दूसरा व्यक्ति शबनम से कुछ चाहता था, वह उसे नहीं मिला इसलिए पागल हो गया । दोनों ही स्थिति में अभाव ही पागल होने का मुख्य कारण था, एक तो किसी व्यक्ति के अभाव में और दूसरा, किसी व्यक्ति से सुख के अभाव में । इस अभाव का ही दूसरा नाम काम है ।
‘अभाव का नाम ही काम है’, यह कथन दार्शनिक दृष्टि से बहुत गहरा है । “अभाव सदैव असत् का ही होता है, सत् में कोई अभाव नहीं है।” सत् वह है - जो वास्तव में है, नित्य है, पूर्ण है । असत् वह है जो अस्थायी है, अपूर्ण है, नश्वर है । इसलिए कहा गया है कि जहाँ पूर्णता है (सत् है), वहाँ किसी कमी अर्थात् अभाव की कल्पना ही नहीं की जा सकती ।
अभाव हमेशा उसी का होता है जो अपूर्ण (असत्) है ।
दार्शनिक व्याख्या (विशेषकर वेदांत में):
आत्मा/ब्रह्म = सत् → पूर्ण, अखंड, शाश्वत → कोई अभाव नहीं ।
शरीर, भोग, संसार = असत् → परिवर्तनशील → हमेशा कुछ न कुछ का अभाव ।
जो व्यक्ति भीतर से संतुष्ट है, उसे बाहर की कमी कभी परेशान नहीं करती । जो अस्थायी वस्तुओं पर निर्भर रहता है, वह हमेशा अभाव अनुभव करता है । कहने का अर्थ है कि अभाव मन (असत्) की अवस्था है, स्वरूप (सत्) की नहीं । सत् में स्थित होने पर अभाव स्वयं विलीन हो जाता है ।
सत् की परिभाषा — पूर्णता । सदेव सोम्य इदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् (छान्दोग्य उपनिषद् (6.2.1)
अर्थात् हे सोम्य ! प्रारम्भ में यह जगत् केवल सत् था — एक, अद्वितीय । यहाँ सत् को एक, अखंड और पूर्ण कहा गया है । जहाँ अद्वैत है, वहाँ किसी अन्य वस्तु का अभाव कैसे हो सकता है ?
नाभावो विद्यते सतः -7
अभाव का सम्बन्ध असत् से है । यहाँ सत् और असत् का भेद स्पष्ट है।असत् का अर्थ है — जो स्थिर नहीं, जो परिवर्तनशील है । परिवर्तनशील वस्तु में ही “कमी-पूर्ति” का चक्र चलता रहता है । इसलिए अभाव असत् का लक्षण है न कि सत् का । सत् में अभाव असम्भव है । बृहदारण्यक उपनिषद् (1.4.2) का प्रसिद्ध मन्त्र है -
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।
अर्थात् वह भी पूर्ण है, यह भी पूर्ण है । पूर्ण से पूर्ण उत्पन्न होता है, पूर्ण में से पूर्ण निकालने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है । जहाँ पूर्णता है, वहाँ न कमी है, न आवश्यकता है और न ही कोई अभाव ।
अभाव, अज्ञान का परिणाम है । आदिशंकराचार्य अपने ग्रंथ ब्रह्म ज्ञानावली माला में कहते हैं -
“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।” अर्थात् ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या है । जीव और ब्रह्म में कोई अन्तर नहीं है।
जगत् (असत्) को सत्य मानने से ही इच्छा, अभाव और दुःख उत्पन्न होता है । सत् का अज्ञान ही अभाव की अनुभूति कराता है जबकि सत् का ज्ञान अभाव का लय करा देता है । इसी बात को उन्होंने विवेकचूड़ामणि ग्रंथ के 20 वें श्लोक में फिर से स्पष्ट किया है ।
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्येत्येवंरूपो विनिश्चय ।
सोऽयं नित्यानित्यवस्तुविवेक: समुदाहृत : ।।
अर्थात् ‘ब्रह्म सत्य है और जगत् मिथ्या है‘ ऐसा निश्चय है, यही ‘नित्यानित्यवस्तु-विवेक‘ कहलाता है।
इतने विवेचन से स्पष्ट है कि अभाव वस्तु में नहीं, हमारी दृष्टि में है । दृष्टि सत् में स्थिर होते ही अभाव स्वतः समाप्त हो जाता है ।
“अभाव सदैव असत् का ही होता है, सत् में कोई अभाव नहीं है ।”
आइए ! पहले “सत्” और “असत्” को समझते हैं । सत् क्या है ? सत् वह है जो नित्य (हमेशा रहने वाला) है । सत् पूर्ण, अपरिवर्तनीय और स्वयं में पर्याप्त है । उपनिषद् कहता है — ‘सदेव सोम्य इदमग्र आसीत् ।’ (छान्दोग्य उपनिषद्) अर्थात् आरम्भ में और वास्तव में सिर्फ सत् ही है । जो सदा है, जो पूर्ण है, उसे भला किस चीज़ की कमी होगी ?
असत् क्या है ? असत् वह है जो बदलता रहता है, नश्वर है, आज है, कल नहीं रहेगा, सदैव अपूर्ण ही रहेगा । शरीर, धन, पद, संबंध, भोग सब असत् हैं । जहाँ परिवर्तन है, वहीं कमी/अभाव का अनुभव होता है ।
अभाव किसे कहते हैं ? अभाव का अर्थ है —“जो होना चाहिए, वह नहीं हो रहा है।” अब जरा सोचिए - जो पूर्ण है, उसमें “होना चाहिए” जैसा कुछ बचता है क्या ? नहीं बचता । जो अपूर्ण है, वही कहता है - मुझे और चाहिए, बहुत कुछ चाहिए । इसलिए अभाव केवल असत् में ही सम्भव है।
पूर्णता का मंत्र ‘‘पूर्णमदः पूर्णमिदं…’ (बृहदारण्यक उपनिषद्) स्पष्ट करता है कि जहाँ पूर्णता है, वहाँ न कुछ जोड़ने की आवश्यकता है और न ही घटने का कोई भय । वहाँ अभाव का कोई स्थान ही ही नहीं है ।
असत् में ही इच्छा रहती है । गीता (3.37) में भगवान कहते हैं - ‘काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।’ यह काम (इच्छा) कहाँ से आता है ? यह आता है, रजोगुण से । रजोगुण अर्थात् संसार यानी असत् और इच्छा (काम) अर्थात् अभाव की अनुभूति ।
जरा अपने अनुभव से इस बात को समझिए । उदाहरण : नींद । गहरी नींद में न धन चाहिए, न मान-सम्मान चाहिए और न ही कोई संबंध । क्यों ? क्योंकि उस समय आप अपने सत् के समीप होते हैं । दूसरा उदाहरण : जीवन में संतोष । जो व्यक्ति भीतर से शांत है, संतुष्टि के कारण वह कम साधनों में भी पूर्णता देखता है । वस्तुएँ वही हैं, केवल दृष्टि बदल गई है ।
इसलिए शास्त्र निष्कर्ष देता है - ‘अभावो न वस्तुनि, किन्तु अविद्यायाम् ।’ अभाव वस्तु में नहीं, अज्ञान में है । जब हम असत् को सत् मान लेते हैं (अज्ञान), तभी अभाव जन्म लेता है । सार यह है कि सत् पूर्ण है, इसलिए उसमें अभाव असम्भव है । असत् अपूर्ण है, इसलिए वही अभाव का कारण है ।
संस्कृत में एक सूत्र है। - ‘अभावोऽपि असतो धर्मः, न सतः।’ अर्थात् अभाव भी असत् का ही धर्म है, सत् का नहीं । एक अन्य सूत्र कहता है - ‘यत्र पूर्णता तत्र न किञ्चिदभावः।’ अर्थात् जहाँ पूर्णता है, वहाँ किसी प्रकार का अभाव नहीं हो सकता ।
प्रश्न है कि “ज्ञान होने पर अभाव का अनुभव क्यों समाप्त हो जाता है ?” ज्ञान कहता है - ‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत: ।’ असत् की तो सत्ता नहीं है और सत् का अभाव नहीं है । सत् को जानते ही असत् का निषेध हो जाता है और इस प्रकार अभाव का अनुभव समाप्त हो जाता है । आइए ! इसे एकदम सीधी भाषा, बिना कठिन शब्दों के समझते हैं ।
“अभाव सदैव असत् का ही होता है, सत् में कोई अभाव नहीं है।” सबसे पहले एक सरल प्रश्न - अभाव कब लगता है ? जब हमें ऐसा लगता है कि “कुछ चाहिए, जो मेरे पास नहीं है।” अब ध्यान दें — यह भावना किसमें होती है ? मन में ।
. “सत्” क्या है — सरल अर्थ में, सत् का अर्थ है - जो हमेशा है, जो अपने-आप में पूरा है, जिसे किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं है । उपनिषद् इसे कहते हैं: पूर्ण । अब सोचिए, जो पूरा है, उसे किस चीज़ की कमी होगी ? किसी की नहीं। इसलिए सत् में कोई अभाव नहीं हो सकता ।
“असत्” क्या है ? असत् वह है, जो बदलता रहता है, जो टिकता नहीं है, जो आज है, कल चला जाता है । जैसे: पैसा, शरीर, सम्बन्ध, मान-सम्मान आदि । इन सब में एक बात समान है - ये कभी पूरे नहीं लगते, सदैव अपर्याप्त ही लगते हैं । क्यों ? क्योंकि ये अस्थायी हैं ।
अभाव असत् में ही क्यों होता है ? कारण है - जीवन में संतुष्टि का न होना । मान लीजिए — आपके पास 10 हैं । अब आपको 20 चाहिए । 20 मिल गए तो अब आपको 50 चाहिए । क्यों ? क्योंकि जो चीज़ स्थिर नहीं, वह कभी संतोष नहीं दे सकती । इसलिए असत् जितना मिलेगा, उतना ही और नया अभाव पैदा करेगा । एक बहुत साधारण सा उदाहरण देता हूँ - नींद में किसी प्रकार के अभाव का अनुभव नहीं होता है । जब आप गहरी नींद में होते हैं, तब न तो भूख होती है, न डर, न चाह । क्यों ? क्योंकि उस समय आप अपने “सत्” के सबसे क़रीब होते हैं। नीन्द में कोई अभाव नहीं होता, क्योंकि उस समय मन नहीं होता । नींद में मन अविद्या में लीन हो जाता है ।
मूल बात यह है कि अभाव वस्तु में नहीं है । अभाव तो मन की कल्पना मात्र है । जब मन असत् की ओर भागता है तब अभाव पैदा होता है । जब मन सत् में ठहरता है तब पूर्णता का अनुभव होता है । इस एक पंक्ति में ही पूरा अर्थ स्पष्ट हो जाता है कि जो बदलता है, उसी में सदैव कमी दिखती है और जो स्थिर है, उसमें कमी की संभावना ही नहीं है ।
प्रश्न उठता है कि दुःख क्यों असत् से जुड़ा है ? ज्ञान से अभाव कैसे मिटता है ? असत् चाहे जितना मिल जाए वह सदैव अपर्याप्त ही रहता है और जो और जैसा मिला है वह भी भला टिकता कहां है ? ऐसे में व्यक्ति दुःखी होगा ही । इस प्रकार दुःख का सीधा संबंध असत् से जुड़ा है । जब ज्ञान हो जाता है कि असत् का स्थाई भाव नहीं है तो व्यक्ति इसमें आसक्त ही नहीं होगा । आसक्ति के न होने पर अभाव स्वतः ही मिट जाता है ।
लेख का मूल वाक्य है - “अभाव सदैव असत् का ही होता है, सत् में कोई अभाव नहीं है ।” अभाव क्या है ? अभाव है, जीवन में कुछ न कुछ कमी का अनुभव होना । जब मन कहता है: “यह नहीं है”, “और चाहिए”, वहीं अभाव है।
असत् क्या है ? असत् है, जो बदलता है, टिकता नहीं । जैसे; शरीर, पैसा, पद, सुख आदि । ये सब आते हैं, जाते हैं, कभी पूरे नहीं लगते । इसलिए इनमें हमेशा कमी महसूस होती है ।
सत् क्या है ? सत् वह है, जो सदा है, जो पूरा है । जैसे: अस्तित्व, आत्मा, शुद्ध चेतना । यह कभी भी बदलता नहीं है, घटता नहीं है और न ही कभी बढ़ता ही है । जो पूरा है, उसमें कमी हो ही नहीं सकती ।
सीधा सा नियम है - जहाँ परिवर्तन है, वहाँ अभाव है । जहाँ स्थिरता है, वहाँ कोई अभाव नहीं है । इसलिए अभाव असत् का गुण है और पूर्णता सत् का स्वभाव है । गहरी नींद में कुछ चाहिए नहीं, कुछ खोया हुआ नहीं लगता । क्यों ? क्योंकि उस समय आप सत् के पास होते हैं।
मूल बात - अभाव वस्तु में नहीं, अस्थिरता में है । सत् स्थिर है, इसलिए उसमें अभाव होना असंभव है ।
प्रश्न है कि मन असत् की ओर ही क्यों भागता है ? क्योंकि असत् से मिले सुख को ही मनुष्य जीवन का सत्य समझ लेता है और उसी को बार-बार पाने की कामना करता है । इस प्रकार उसका मन सदैव असत् की ओर ही भागता है । मन ही अभाव का अनुभव करता है ।
अभाव केवल उसी चीज़ में लगता है जो पूरी नहीं है । जो पूरी है, उसमें अभाव नहीं हो सकता । एक सरल उदाहरण: गिलास A — पूरा भरा हुआ । क्या आप कहेंगे इसमें कोई कमी है ? नहीं, क्योंकि गिलास पूरा भरा हुआ है । गिलास B — आधा भरा हुआ है । आप क्या कहेंगे ? आप कहेंगे, “इसमें और पानी आ सकता है, इसलिए इसमें और पानी डालना चाहिए ।” इस प्रकार अभाव केवल आधे भरे गिलास में है, पूरे भरे में नहीं । यही अन्तर है सत् और असत् में ।
अब “सत्” और “असत्” को इस प्रकार समझिए । सत् जो पूरा, स्थिर और अपने आप में पर्याप्त है । इसलिए इसमें कोई अभाव नहीं है । असत् अधूरा, बदलने वाला और टिकने वाला नहीं है, इसलिए इसमें सदैव अभाव बना रहेगा।
दैनिक जीवन के उदाहरण से इस बात को समझते हैं । सबसे सटीक उदाहरण है - पैसा । थोड़ा पैसा और चाहिए । ज़्यादा पैसा आ गया फिर भी कहेंगे, और चाहिए । कभी ‘और चाहिए’ कहना क्यों नहीं रुकता ? क्योंकि पैसा असत् है । इसके लिए उत्तरदायी है, हमारा मन । मन कहता है: यह नहीं, वह चाहिए । वह मिल गया तो उसे वह और चाहिए । मन हमेशा असत् से जुड़ा है, इसलिए उसमें सदैव अभाव रहेगा ।
प्रश्न है कि सत् में कैसे स्थित हुआ जा सकता है ? असत् का निषेध होते ही जीव सत् में स्थित हो जाता है । इसलिए संसार से विमुखता ही सत् का अनुभव करा देती है । बहुत सीधा नियम है : जहाँ “चाहिए, और चाहिए” है, वहाँ असत् है । जहाँ “नहीं चाहिए” है, वहाँ सत् है । अभाव चीज़ों की वजह से नहीं होता, अभाव अधूरेपन की वजह से होता है । सत् पूरा है, इसलिए उसमें अभाव नहीं है ।
स्वामीजी के सामने प्रश्न आया कि आत्मा तो चेतन है, फिर यह शरीर में क्यों फँसता है ? उनका उत्तर था - “सुख के लिए फँसता है ।” सुख की इच्छा ही काम है । प्रश्न उठता है कि काम से मुक्त होने के लिए क्या करना चाहिए ? काम की उत्पत्ति जहां से प्रारंभ होती है, उसी स्थान पर ध्यान केंद्रित करें तो काम को स्वयं पर प्रभावी होने देने से बचा जा सकता है ।
परमात्मा अकेले थे, ‘एकाकी न रमते’ । अचानक उनमें आनन्द को अनुभव करने की इच्छा पैदा हुई । ऐसी इच्छा को स्फुरणा कहा जाता है । स्फुरणा वह विचार है, जो अचानक भीतर बिजली की तरह कौंधता है । स्फुरणा केवल चेतन में ही होती है । भगवान इसी स्फुरणा के कारण एक से दो हुए । एक से दो होकर परमात्मा स्वयं तो उस दूसरे में लिप्त नहीं हुए परंतु हम दूसरे में लिप्त हो गए । इस प्रकार स्फुरणा हमारे लिए ‘काम’ बन गई और हम संसार में उलझ गए । स्फुरणा निरन्तर रहने वाली चेतना है, जबकि काम इस स्फुरण से उत्पन्न सापेक्ष क्रिया है । जब स्फुरण अहंकार (अहम् वृत्ति) से जा जुड़ता है तो वह भीतर स्वयं के ‘कर्ता’ होने का भाव पैदा करता है । यहीं से काम, कर्म और भोग पैदा होते हैं ।
अभाव का अनुभव ‘पर’ में ही होता है, ‘स्व’ में नहीं । यदि मन इस स्फुरण के स्रोत अर्थात् ‘स्व’ पर स्थिर हो जाए, तो आत्म-साक्षात्कार हो जाता है अर्थात् अभाव का अभाव हो जाता है । फिर स्फुरणा ही मुक्ति का मार्ग बन जाती है । स्फुरण वह प्रकाश है, जो परमात्मा के अनुभव को सम्भव बनाता है जबकि काम उस प्रकाश से प्रेरित होकर किया जाने वाला कार्य है ।
स्वामीजी कहते हैं - “उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओं की इच्छा को ही ‘काम‘ कहते हैं । कामना अभाव में पैदा होती है । अभाव सदैव असत् में रहता है, सत् में अभाव है ही नहीं । परंतु जब सत् असत् के साथ गठजोड़ कर लेता है, तब असत् में उपस्थित अभाव को वह अपने में मान लेता है ।”
जीवन में अभाव का कब अनुभव होता है ? जब आपको लगता है—“मेरे पास जो है, वह पर्याप्त नहीं है।” यह भावना किसी चीज़ के अधूरे होने से आती है । जो अधूरा है, वही असत् है । जो चीज़ बदलती रहती है, टिकती नहीं है, आज है, कल नहीं रहेगी, वही असत् है। असत् कभी पूरा नहीं लगता, इसलिए उसी में अभाव पैदा होता है।
जो पूरा है, वही सत् है । जो हमेशा है, बदलता नहीं, अपने आप में पर्याप्त है, वही सत् है । जो पहले से पूरा है, उसे किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं हो सकती ।
इसलिए स्पष्ट है कि अभाव अधूरेपन (असत्) की अनुभूति है, जबकि पूर्णता सत् की । पूर्णता में अभाव असंभव है । अन्त में कहा जा सकता है कि जिसे कुछ चाहिए, वह असत् में स्थित है । जिसे कुछ नहीं चाहिए, वह सत् में स्थित है । सत् में स्थित होने के लिए सत् - असत् के तादात्म्य को तोड़ना होगा । फिर असत् के अभाव का अनुभव नहीं होगा ।
सार - संक्षेप
अभावों की पूर्ति के प्रयास में हम न जाने कितनी योनियों में भटक चुके हैं तथा आगे न जाने कितनी योनियों में और भटकेंगे । कामना रखेंगे तो भटकना कभी भी नहीं रुकेगा । कामना पूरी होना असम्भव है क्योंकि यह असत् है । असत् कभी पूर्ण नहीं हो सकता, वह तो सदैव अपूर्ण ही बना रहेगा । अपूर्णता ही अभाव पैदा करती है ।
अभाव का अनुभव केवल मन में ही होता है । मन असत् है, इसलिए उसमें अभाव अनुभव होना असम्भव नहीं है । मन के साथ जब हम गठजोड़ कर लेते हैं तब ही हमें अभाव अपने में अनुभव होता है । हम सत् हैं और मन असत् । असत् के साथ सत् का गठजोड़ बेमेल है परन्तु परमात्मा की माया के कारण हम भ्रमित हो जाते हैं । यह गठजोड़ तभी टूट सकता है जब हमें आत्म-अनात्म का ज्ञान हो जाए, सत् असत् का ज्ञान हो जाए । ऐसा ज्ञान हो जाने से संसार से विमुखता हो जाती है, जो हमें परमात्मा के द्वार तक ले जाती है ।
ज्ञान हो जाने पर असत् से हुई विमुखता से जीवन में संतोष और शान्ति का पदार्पण होता है । यही आनन्द की अवस्था है । असत् से विमुख हो जाएं या सत् के सम्मुख हो जाएं, दोनों ही हमें सच्चिदानन्द स्वरूप तक ले जाती है । मानव के रूप में जन्म लेने का और इस मनुष्य जीवन का लक्ष्य भी निज स्वरूप की प्राप्ति ही है ।
सारांश है कि हमें असत् के अनुसार भटकना नहीं है क्योंकि असत् अभाव का अनुभव कराएगा और इस अभाव से काम का जन्म होगा । केवल सुख पाने की इच्छा का त्याग करके हम प्रत्येक अभाव से मुक्त हो सकते हैं ।
।। हरिः शरणम् ।।
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
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