मन - बन्धन और मोक्ष का कारण
अमृत-बिन्दु उपनिषद् में आता है -
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो: ।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्तं निर्विषयं स्मृतम् ।। 2 ।।
मन ही मनुष्य के लिए बंधन और मुक्ति का कारण है। इंद्रिय विषयों में आसक्त मन बंधन की ओर ले जाता है और जो इंद्रिय विषयों से मुक्त होता है वह मनुष्य को मुक्त कर देता है ।
हम मन में किसी भी पदार्थ के बारे में एक पूर्वाग्रह पाल लेते हैं । उसी अनुसार हमें वह अच्छा अथवा बुरा लगता है । जो हमें अच्छा लगता है उसकी तो कामना करने लगते हैं और जो बुरा लगता है, उससे विरक्त होते जाते हैं । अच्छे से तो हमारा सम्पर्क बढ़ता है और बुरे से दूरी । ‘ममता, तू न गई मेरे मन से’, यह सब मन में समायी (माया) का ही खेल है ।
मन - यह इंद्रियों और बुद्धि के बीच की अवस्था का नाम है । इंद्रियों से जो सुख का ज्ञान होता है, उसमें आसक्त होकर यदि मन चलता है, तो शरीर रुग्ण हो जाता है । यही मन यदि बुद्धि के ज्ञान से चलने लगे तो मुक्ति के अनुभव होने का मार्ग प्रशस्त होता है । इंद्रियों का ज्ञान माया से प्रेरित है और बुद्धि का ज्ञान आत्मा से । मन पर कौन सा ज्ञान प्रभावी है, यह महत्वपूर्ण है । यदि इंद्रियों का ज्ञान प्रभावी है तो व्यक्ति भोग को प्राथमिकता देता है, जोकि एक दिन रोग का जनक बनता है और यदि मन पर बुद्धि का ज्ञान प्रभावी है तो व्यक्ति एक दिन योग को उपलब्ध हो जाता है ।
यह जानते हुए भी कि प्रत्येक भोग रोग की ओर ले जाने वाला है, मनुष्य भोगों की ओर ही क्यों भागता है ? विवेक ( बुद्धि का ज्ञान) का सदुपयोग कर वह भोगों से विरक्त होकर, रोग-मुक्त हो सकता है, अंततः जिसकी परिणीति योग में होगी ही, यह निश्चित है । भोग से रोग की ओर अथवा भोग से योग की ओर, दोनों में से किस ओर जाएं, यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है । चलिए ! इस विषय को थोड़ा गहराई से समझने का प्रयास करते हैं ।
इसी विषय पर कल से चर्चा प्रारम्भ करने जा रहे हैं, इस लेख के माध्यम से जिसका शीर्षक है -‘भोग, रोग और योग’ ।
।। हरिः शरणम् ।।
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
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