त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् (त्यागात् शान्ति: अनन्तरम् )
संसार का प्रत्येक जीव अपने पूर्वकृत कर्मों का फल भोगने को विवश है । ये कर्म उसने अपनी इच्छा को पूरी करने के लिए किए थे । व्यक्ति की प्रत्येक इच्छा पूरी हो जाएगी, ऐसा होना संभव ही नहीं है । जीव को वही मिलता है, जो विधि के विधान के अनुरूप होता है । इच्छा पूरी नहीं होती तो जीव दुःखी हो जाता है और यदि इच्छानुसार सब कुछ मिल गया तो वह उसके पास टिकता नहीं है । आप कितना ही प्रयास कर लें, उसको आप रख ही नहीं सकते । एक इच्छा पूरी नहीं हुई कि दूसरी इच्छा पैदा हो जाती है, इस प्रकार विभिन्न इच्छाओं के द्वन्द्व से घिरा जीव जीवनभर अशान्ति में जीता है ।
स्वामीजी कहते हैं कि मनुष्य की सभी इच्छाऐं पूरी नहीं हो सकती, इसलिए इच्छाऐं रखना व्यर्थ है । इच्छाओं के त्याग से अनन्त शान्ति मिल जाती है । जो अपनी नहीं है, वह हमारे पास रह नहीं सकती । उसका त्याग तो स्वतः हो रहा है । जैसे शरीर के लिए विषाक्त वस्तुओं, मल-मूत्र, मवाद आदि के त्याग से भी हमें शान्ति का अनुभव होता है तो फिर अन्य इच्छाओं के त्याग से क्यों नहीं होगा ?
स्वामीजी कहते हैं कि जिसका त्याग स्वतः हो रहा है, उसको हम अपने पास सदैव के लिए रखना चाहें, तो भी नहीं रख सकते । जो शरीर आज जन्मा है, उस शरीर को भी एक दिन मरना ही है । इस प्रकार उसका त्याग तो स्वतः ही हो रहा है । हमें तो केवल जीने की इच्छा का त्याग करना है । गीता में भगवान कहते हैं - ‘त्यागाच्छान्तिरननन्तरम्’ अर्थात् त्याग से तत्काल ही परमशान्ति प्राप्त हो जाती है । प्रश्न है कि त्याग क्या है ? परम शान्ति को उपलब्ध होने के लिए त्याग किसका किया जाए ? चलिए ! ‘त्याग से शान्ति’ विषय पर चिन्तन प्रारम्भ करते हुए लेख में आगे बढ़ते हैं ।
प्रकृति ने संसार के प्रत्येक जीव को किसी भी वस्तु, शरीर, पदार्थ आदि को पकड़ने और छोड़ने के लिए आवश्यक अंग दिए हैं । इन अंगों के माध्यम से वह जीवन भर ‘पकड़ने-छोड़ने’ में ही व्यस्त रहता है । वह शरीर की क्रियाओं के लिए आवश्यक ऊर्जा के लिए भोजन ग्रहण करता है । शरीर को सुचारू रूप से चलाने के लिए भोजन करना आवश्यक है । भोजन से ही जीव को पकड़ने और छोड़ने की ऊर्जा मिलती है । इस ऊर्जा से जीव इधर-उधर घूमता है, अपने लिए भोजन प्राप्त करता है । भोजन से प्राप्त ऊर्जा से ही भोजन का पाचन होता है और इसी ऊर्जा से भोजन से उत्पन्न ऊर्जा का संचय तथा विषाक्त पदार्थों को शरीर के बाहर छोड़ा जाता है ।
पकड़ना और छोड़ना, जब तक मात्र क्रिया रहती है, तब तक तो जीव इसमें उलझता नहीं है परंतु जब यही क्रियाएँ कर्म बन जाती है, तब मनुष्य स्वयं पकड़ने-छोड़ने में उलझ जाता है । जहां जीव ने इन क्रियाओं को अपने द्वारा होना मान लिया वहीं वह इन क्रियाओं का कर्ता बन बैठता है । क्रिया जब तक प्रकृति के द्वारा होना मानते हैं तब तक वे जीव को प्रभावित नहीं करती परन्तु जब जीव इन क्रियाओं को अपने द्वारा करना मान लेता है तब वे उसके कर्म बनकर उसे प्रभावित करने लगती है ।
जिस प्रकार प्रत्येक क्रिया का परिणाम अवश्य होता है, उसी प्रकार प्रत्येक कर्म का फल भी मिलना निश्चित है । प्रत्येक क्रिया के परिणाम की भोक्ता केवल प्रकृति होती है जबकि कर्म का परिणाम जीव को भोगना पड़ता है । इसीलिए कहा जाता है कि जो कर्ता बनता है, उसको उस कर्म के फल का भोक्ता भी होना पड़ता है ।
हमारा जीवन हमारे ही कर्मों का परिणाम है क्योंकि हमने कभी न कभी कोई कर्म अपनी इच्छा के वशीभूत होकर किया है । जब किसी कारण से उस कर्म का वांछित परिणाम उस शरीर के जीवन में नहीं मिल पाता तब जीव उस जीवन को अशान्त रहते हुए जीता है । परिणामस्वरूप जीव को अपनी इच्छा के अनुसार फल प्राप्ति के लिए संसार में फिर से एक नया शरीर लेकर आना पड़ता है । उसे पूर्व जन्म में किए गए कर्मों के फल इस नए शरीर में आकर मिलते हैं । अपने मनोनुकूल फल मिल जाने पर भी उसे शान्ति कहाँ मिल पाती है ? कर्म-फल मिलते ही जीव की उस फल में आसक्ति हो जाती है, ममता हो जाती है । मिले हुए फल में ममता/ आसक्ति कर लेना ही जीव के बंधन का कारण है । ऐसी आसक्ति के परिणाम स्वरूप जीव फिर से वैसा ही फल प्राप्त करने की पुनः कामना कर बैठता है । प्रत्येक कामना को पूरा करने के लिए फिर से कर्म करना आवश्यक हो जाता है । इस प्रकार जो जीव है, वह फल, आसक्ति और कर्म के चक्रव्यूह में फँस जाता है और उसे जीवन में कभी शान्ति नहीं मिलती ।
इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि जीव के जीवन में पकड़ना और छोड़ना कितना महत्वपूर्ण है । पकड़ने को ग्रहण करना कहा जाता है और छोड़ने को त्याग । जीव चौरासी के चक्रव्यूह में फँसा ही इसलिए है कि वह पकड़ने ही पकड़ने में लगा हुआ है, छोड़ना कुछ भी नहीं चाहता । जो कुछ छूट रहा है वह स्वतः ही छूट रहा है, उसमें जीव की कोई भूमिका नहीं है । भोजन के अपशिष्ट का शरीर से बाहर निकलना कोई छोड़ना नहीं है, उसका तो स्वतः ही त्याग होना निश्चित है । जब तक अपनी इच्छा से ग्रहण करना नहीं छूटेगा तब तक जीव यूँही चौरासी में भटकता रहेगा । जीव के सामने मुख्य समस्या यही है कि उसका ग्रहण करना कैसे छूटे ? इसके छूटे बिना सांसारिक चक्रव्यूह से मुक्त होना सम्भव नहीं है ।
प्रश्न उठता है कि संसार के इस चक्रव्यूह से मुक्त कैसे हुआ जा सकता है ? इसका एक शब्द में छोटा सा उत्तर है - त्याग ।
परमात्मा शाश्वत हैं और प्रकृति परिवर्तनशील । परमात्मा का अंश जीव स्वयं है और प्रकृति का अंश है, संसार और शरीर । शरीर जिस दिन से अस्तित्व में आया है, उसी दिन से समाप्ति की ओर अग्रसर है । जन्म के साथ ही शरीर का मृत्यु की ओर चलना प्रारंभ हो जाता है । शरीर की मृत्यु हो जाने के बाद भी क्या जीवन कभी रूका है ? जीवन कभी नहीं रुकता । इस प्रकार फिर एक नए शरीर का जन्म और उसका पुनः मृत्यु की ओर प्रस्थान । यही तो संसार-चक्र है । शरीर का हो रहा क्षरण ही त्याग है जो स्वतः हो रहा है, इसको रोकने में जीव बेबस है । वह चाहकर भी शरीर को मरने से नहीं रोक सकता । इस प्रकार शरीर के छूटने को त्याग नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह तो अपने आप हो ही रहा है । फिर त्याग किसको कहा जाता है ? प्रकृति से जो मिला है उसका छूटना निश्चित है परन्तु जीवन में जो आपने अपने स्तर पर ग्रहण किया है, उसको छोड़ना ही वास्तव में त्याग है । आइए ! जानते हैं कि हमने जीवन में क्या क्या ग्रहण किया है जिनको छोड़ना संसार-चक्र से मुक्त होने के लिए आवश्यक है ?
जीव संसार में शरीर लेकर आता है, उसमें आसक्त होकर सुख-दुःख भोगता है और जीवनभर दुःखी रहता है । वास्तव में देखा जाए तो इस संसार में दुःख ही दुःख है । इसीलिए संसार को दुखालय कहा गया है । दुःख का कारण है, अपने लिए सुख चाहना । जब तक सुख की कामना पैदा नहीं होगी तब तक दुःख आपके द्वार पर दस्तक तक दे नहीं सकता ।
हमने जीवन में दुःख ही दुःख देखे हैं, सुख आज तक मिला नहीं है । जब तक हम दुःख के कारण को नहीं जानेंगे तब तक हमें सुख नहीं मिलेगा । हमारे दुःख का कारण ही सुख पाने की इच्छा है । इस प्रकार कहा जा सकता है कि दुःख के मूल में हमारी असंख्य कामनाएँ ही हैं । सुख की कामना जीवन में कभी पूरी नहीं हो सकती क्योंकि एक कामना जब तक पूरी होने वाली होती है कि तत्काल ही दूसरी कामना उठ खड़ी होती है । दूसरी कामना का पैदा होना ही लोभ है । सुख-भोग की इच्छा ‘काम’ कहलाती है तथा जब इस इच्छा का विस्तार होता है और मनुष्य संग्रह करने को उद्यत होता है, तब इसे ‘लोभ’ कहा जाता है । जब कामना पूरी नहीं होती तो क्रोध का जन्म होता है । इस प्रकार दुःख के मूल में कामना है और कामना के दो उपोत्पाद लोभ और क्रोध उसके सहयोगी है ।
काम, क्रोध और लोभ - ये तीनों ही मनुष्य को अशान्त और दुःखी करते हैं । दुःखपूर्वक जीना ही नरक भोगना है । तभी गीता में भगवान ने इन तीनों का त्याग करने का कहा है ।
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमतमात्मन: ।
काम: क्रोधस्तथा लोभस्ततस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ।।गीता -16/21 ।।
काम, क्रोध, और लोभ - ये तीन प्रकार के नरक के द्वार हैं और पतन के कारण हैं, इसलिए इन तीनों का त्याग कर देना चाहिए ।
स्वामीजी कहते हैं कि ‘मैं चाहूं वैसा हो जाए’ ही काम है । जब प्रथम बार किसी एक विषय का संयोग सम्बन्धित इंद्रिय के साथ होता है, तब शरीर (मन) को एक नया अनुभव होता है जिसे सुख अथवा दुःख कहा जाता है । उस सुख-दुःख के अनुभव से जीव का विषय के साथ एक सम्बन्ध बन जाता है, जिसे आसक्ति कहा जाता है । उसी सम्बन्ध के कारण मनुष्य उस विषय को पुनः प्राप्त करने की कामना करता है । इस प्रकार मनुष्य ‘जैसा चाहता है वैसा होने’ के लिए अर्थात् अपनी कामनापूर्ति के लिये संकल्प करता है । संकल्प वह योजना है जिसके अनुसार कामना पूरी करने के लिए कर्म करने का क्रम निश्चित किया जाता है । कहने का अर्थ है कि शारीरिक सुख प्राप्ति के निश्चित लक्ष्य तक पहुंचने के लिए पहले संकल्प होता उसके पश्चात् कामना पूरी करने के लिए कर्म किए जाते हैं ।
कामना पूरी हो जाए तो फिर वैसे ही सुख की प्राप्ति के लिए पुनः उस विषय की कामना उत्पन्न हो जाती है । इस प्रकार दिन प्रतिदिन नए-नए विषयों की असंख्य कामनाएं उत्पन्न होती रहती है । इसी को लोभ कहा जाता है । लोभ के कारण उस विषय, वस्तु अथवा पदार्थ के प्रति राग उत्पन्न हो जाता है । लोभ से उत्पन्न हुआ राग संग्रह को प्रेरित करता है क्योंकि व्यक्ति प्राप्त हुए को न तो खोना चाहता है और न ही बाँटना, उसके लिए तो प्राप्त सदैव अपर्याप्त ही रहता है । जब संग्रह एक सीमा से अधिक बढ़ जाता है तब तुलनात्मक दृष्टि से व्यक्ति अन्यों से अपने को ऊंचा समझने लगता है । इसी भावना को अहंकार कहा जाता है ।
कामनाओं का न तो अन्त है और न ही सभी कामनाएं पूरी हो सकती है । जब कामनाओं की पूर्ति में बाधा आती है तो व्यक्ति को क्रोध आता है । यह क्रोध आता है बाधक (बाधा उत्पन्न करने वाले) के प्रति । काम की पूर्ति में आई बाधा से उत्पन्न क्रोध से कामी के मन में बाधक के प्रति जो भावना उत्पन्न होती है, उसे द्वेष कहा गया है । क्रोध से ही सभी विकार पैदा होते हैं क्योंकि क्रोध से मनुष्य की बुद्धि सुन्न हो जाती है, जिसके कारण व्यक्ति में सोचने-समझने की शक्ति नहीं रहती । बुद्धि का उपयोग न होने के कारण मनुष्य का पतन होना निश्चित है ।
इस प्रकार स्पष्ट होता है कि काम के कारण ही मनुष्य के भीतर लोभ, संग्रह, क्रोध और राग-द्वेष आदि विकार पैदा होते हैं । ये सभी विकार आगन्तुक है, इनका स्वरूप के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि ये विकार व्यक्ति के अपने नहीं हैं । ये शरीर में जैसे आए हैं, वैसे ही अपने आप चले जाएंगे । स्वामीजी उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जैसे खिड़की खुली रह जाती है तो कुत्ता घर में प्रवेश कर जाता है । जब उसे कुछ नहीं मिलेगा तो वह घूमकर स्वतः ही वापस चला जाएगा । इसी प्रकार हमें विकारों से उदासीन बने रहना है, उनके साथ सम्बन्ध नहीं बनाना है । सम्बन्ध नहीं बनाएंगे तो विकारों का त्याग स्वतः ही हो जाएगा । विकारों का त्याग प्रयास करने से नहीं होता बल्कि उनको अपना और अपने में न मानने से होता है । इस प्रकार क्रोध का त्याग भी स्वतः ही हो जाता है ।
हमने जितने भी विकारों की चर्चा की है, वे सब दुःख के कारण है । इन सभी विकारों का जनक केवल और केवल एक काम ही है । इस प्रकार स्पष्ट होता है कि काम ही दुःख के मूल में है । यह काम है क्या ? शरीर के सुख के लिए वस्तु/पदार्थ अथवा व्यक्ति को प्राप्त करने की इच्छा करना । “मैं चाहूँ वैसा हो जाय” यही काम है । हम सब अपने शरीर को सुख मिले, इसकी इच्छा करते हुए चाहते हैं कि ऐसा हो जाय और जिससे हमारे सुख में बाधा पड़ती नज़र आए, ‘वैसा नहीं हो’ चाहते हैं । ‘ऐसा हो और ऐसा नहीं हो’, ऐसी इच्छा रखना ही काम है ।
‘ऐसा हो जाय’ इस कामना को पूरा करने के लिए व्यक्ति कर्म करता है । शरीर में विभिन्न क्रियाएं स्वतः ही होती रहती है परन्तु जब इन क्रियाओं के होने से मनुष्य को शारीरिक सुख का अनुभव होता है, तो उसे लगता है कि यह क्रिया मेरे द्वारा ही की जा रही है । इस प्रकार शरीर के द्वारा होने वाली प्रत्येक क्रिया, जिससे मनुष्य की मन चाही पूरी हो जाती है, वह क्रिया कर्म बन जाती है । इस प्रकार स्पष्ट होता है कि प्रत्येक कर्म के मूल में काम ही है ।
प्रश्न उठता है कि काम इस शरीर में कैसे प्रवेश करता है ? मनुष्य जन्म लेते समय निर्मल और मासूम सा प्रतीत होता है । काम के कारण धीरे-धीरे उसकी प्रवृत्ति बदलती जाती है । काम शरीर में प्रवेश करता है, इंद्रियों के माध्यम से । धीरे-धीरे यह काम मनुष्य के मन- बुद्धि को अपने अधीन कर लेता है । काम के प्रति आसक्त हुए मनुष्य के जीवन में ऐसी अवस्था आती है जब वह पूर्ण रूप से काम के अधीन हो जाता है और ऊल-जलूल हरकतें करते हुए दिशाविहीन हो जाता है । जीवन के उद्देश्य से हुए भटकाव का उसको भान तक नहीं होता और एक दिन उसके शरीर का जीवन समाप्त होने की अवस्था तक पहुंच जाता है ।
काम मनुष्य के शरीर में कैसे प्रवेश करता है ? चलिए ! इसको समझने के लिए शरीर-संरचना (Anatomy) और उसकी कार्यिकी (Physiology) की ओर दृष्टिपात करते हैं ।
मनुष्य शरीर पांच भौतिक तत्वों से बना है । शरीर में स्थित दस इंद्रियों में पांच तो ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं और पांच ही कर्मेन्द्रियाँ होती है । कुल पांच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं जिनमें कान श्रवणेन्द्रिय है, नासिका घ्राणेंद्रिय है, नेत्र दर्शनेन्द्रिय है, मुख में स्थित जिव्हा स्वादेन्द्रिय है और त्वचा स्पर्शेन्द्रिय है । पांच कर्मेन्द्रियाँ इस प्रकार हैं - वाक् इंद्रिय ( vocal chords), हाथ, पैर, उपस्थ (प्रजनन और मूत्र विसर्जन) इंद्रिय, और गुदा द्वार ।
काम ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से शरीर में प्रवेश करता है और मन-बुद्धि पर अपना अधिकार जमाते हुए मस्तिष्क के उच्चतम स्थान (अहम्) पर जा बैठता है । काम के वशीभूत होकर मन विभिन्न कर्मेन्द्रियों से कर्म करवाता है । ये कर्मेन्द्रियाँ काम को और अधिक पुष्ट करती हैं । इस प्रकार मनुष्य काम के द्वारा फैलाए गए मकड़ज़ाल में बुरी तरह फँस जाता है । इस प्रकार स्पष्ट होता है कि ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से काम उत्पन्न होता है और काम की पूर्ति क्रिया (कर्म) के माध्यम से कर्मेन्द्रियों द्वारा होती है ।
शरीर की प्रत्येक क्रिया प्रकृति के नियमों के अनुसार होती है । उन क्रियाओं को आप अपनी इच्छाओं के अनुरूप बदल नहीं सकते । हाँ, शतप्रतिशत सत्य यही है । अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए हम इन क्रियाओं को अपने अनुसार करने का प्रयास अवश्य करते हैं और उसमें कुछ सीमा तक सफल होते प्रतीत भी होते हैं । कामनाओं की सफलता के लिए जो क्रिया सम्पन्न होती है उसको अपने द्वारा किया जाना मान लेना ही क्रिया को कर्म की श्रेणी में ला खड़ा कर देता है अन्यथा तो आपके द्वारा किया जाने वाला प्रत्येक कर्म वास्तव में प्रकृति में होने वाली क्रिया मात्र ही है ।
शरीर में होने वाली प्रत्येक क्रिया प्रकृति के गुणों के कारण सम्भव होती है । शरीर में किस गुण की मुख्यता है, उसी पर क्रिया की गुणवत्ता निर्भर करती है । गुण की प्रधानता आपका स्वभाव निर्धारित करती है । स्वभाव को परिवर्तित करना केवल मनुष्य जीवन में ही सम्भव है । स्वभाव परिवर्तन से गुण परिवर्तित हो जाते हैं और गुणों में आए परिवर्तन से स्वभाव बदल जाता है । स्वभाव संस्कार बन अगले जन्म (भावी जीवन) को निर्धारित करता है । यही संस्कार नए जीवन में स्वभाव बन परिलक्षित होते हैं । इस प्रकार कहा जा सकता है कि गुण और स्वभाव एक दूसरे को परिवर्तित कर सकने में सक्षम हैं ।
गुणों से हो रही क्रियाओं में आसक्त हो जाना ही गुणों का संग करना है । जिन क्रियाओं के प्रति आपका आसक्त भाव है, प्रकृति उन्हीं क्रियाओं के होने में उत्तरदायी गुणों की वृद्धि आपके स्थूल शरीर में करती रहती है । गुणों में होने वाले ऐसे परिवर्तन एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है । आज अगर शरीर तामसिक गुण प्रधान है, वह कल सात्विक गुण प्रधान में भी परिवर्तित हो सकता है । सब कुछ आपकी उस इच्छा पर निर्भर करता है जिसके अनुसार आप जैसा होना/करना चाहते हैं । स्थूल शरीर के अन्त समय में आपके शरीर में जिस गुण की प्रधानता होगी, आपका भावी शरीर भी वैसे ही प्रधान गुण वाला होगा । (कारणं गुणसंगोस्य सदासद्योनि जन्मसु - गीता - 13/21 )
पूर्वजन्म से मिले संस्कार के अनुसार ही स्वभाव और गुण नए जीवन में आते हैं । उन गुणों से ही विभिन्न क्रियाएँ संपन्न होती हैं । उन क्रियाओं का एक निश्चित परिणाम होता है । उस परिणाम अर्थात् उस क्रिया के फल में जब आसक्ति हो जाती है, तब वह क्रिया ही कर्म बन जाती है । हमें जीवन में किसी भी क्रिया के फल में आसक्ति नहीं करनी है अन्यथा सांसारिक बन्धन पैदा कर लेंगे । जब फ़लासक्ति नहीं होगी तो गुण और स्वभाव भी परिवर्तित होने लगेंगे और भावी जन्म भी उच्च श्रेणी का होगा । इसीलिए कहा जाता है कि ‘your life is not by chance but by your choice’ । अब यह हमारे ऊपर निर्भर है कि हम गुणों से होने वाली क्रिया को उससे मिलने वाले फल में आसक्त होकर कर्म बनाते हैं अथवा अनासक्त रहते हुए क्रिया को साक्षी भाव से केवल होते हुए देखते हैं ।
अपनी बात को थोड़ा और स्पष्ट करने का प्रयास करता हूँ । शरीर के निर्वाह के लिए सांस लेना और भोजन करना आवश्यक है । इसके लिए होने वाली क्रियाएँ, श्वसन और पाचन आदि मात्र क्रिया है, कर्म नहीं । ये कर्म तब बनती हैं जब जीव उनको करने में अपनी भूमिका मानने लगता है । इसमें जीव की भूमिका भला कैसे हो सकती है ? आप खाना खा सकते हैं (कर्म) परंतु पाचन (क्रिया) आपके हाथ में नहीं है । समागम (कर्म) आप कर सकते हैं परंतु रज (अंडे) का निषेचन (क्रिया) करना आपके नियंत्रण में नहीं है । जब परिणाम आपके हाथ में नहीं है तो फिर क्रिया पर आपका नियंत्रण कैसे हो सकता है ? यदि नियन्त्रण होता तो संसार में एक भी स्त्री बांझ नहीं कहलाती और कोई व्यक्ति जीवन में कभी भी अपच का शिकार भी नहीं होता ।
जिस क्रिया पर आप अपना नियन्त्रण होना मानते हैं, वे ही आपके कर्म बन जाती हैं । परन्तु ध्यान में रहे, आप प्रयास कर कर्म भले ही कर लें, परिणाम आपकी सोच के अनुसार ही होगा, ऐसा होना सदैव के लिए सम्भव नहीं है, संयोग से कभी हो जाए वह बात अलग है ।
मनुष्य के शरीर में पांच कर्मेन्द्रियाँ हैं । परमात्मा ने मनुष्य को अधिकार दिया है कि वह उनसे अपनी इच्छानुसार कुछ क्रियाऐं करवा सकता है, तभी इनको कर्मेन्द्रियाँ कहा जाता क्रियेन्द्रिय नहीं । उसकी यह इच्छा ही उसके गुणों और स्वभाव में परिवर्तन लाती है । परिवर्तन के अनुसार ही उसका भावी जीवन निश्चित होता है । इनके द्वारा होने वाली क्रिया को कर्म भले ही कह दें पर वे कर्म न होकर क्रिया ही होती हैं क्योंकि प्रत्येक कर्म का परिणाम भी पूर्व निर्धारित होता है, व्यक्ति के नियंत्रण में नहीं होता । हाथ, पैर आदि का नियंत्रण जिस शक्ति के पास है वही उस क्रिया को नियंत्रित कर सकती है, कोई अन्य नहीं । हाँ, हम इसको अपने द्वारा मान सकते हैं, पर नियंत्रण तो उस अदृश्य शक्ति के पास ही रहता है ।
तो फिर क्या हम कर्म करना छोड़ दें ? ऐसा करना सम्भव भी नहीं है क्योंकि प्रकृति में क्रिया होगी ही और आपका यह शरीर प्रकृति का ही एक अंग है । शरीर है तो उसमें क्रिया होगी ही और उस क्रिया में आसक्ति रखने से कर्म भी होंगे । इस जीवन में आसक्ति नहीं करेंगे तो क्या, किसी पूर्व जीवन में कोई आसक्ति रही थी तभी तो यह जीवन मिला है । उस पूर्व जीवन में रही आसक्ति के कारण ही तो आप इस जीवन में कर्म करने को विवश हुए हैं । अतः कर्म का त्याग सम्भव ही नहीं है । हाँ, प्रत्येक कर्म को प्रकृति की क्रिया मान लेने से इस जीवन में न तो कर्म में आसक्ति रहेगी और न ही उसके फल में ।
प्रश्न उठता है कि मनुष्य किसके प्रति आसक्त होता है ? कर्म में अथवा उसके फल में । मनुष्य सबसे पहले क्रिया के परिणाम (फ़ल) में आसक्त होता है । फल के प्रति हुई आसक्ति उसे क्रिया (कर्म) में आसक्त कर देती है । कर्म को क्रिया बनाने के लिए हमें फ़लासक्ति का त्याग करना होगा । परिणाम से दृष्टि हटी नहीं कि प्रत्येक कर्म क्रिया बन जाता है, गुणों की प्रधानता बदलने लगती है और गुणातीत अवस्था की प्राप्ति हो जाती है । इसी प्रकार गुणों के परिवर्तन से स्वभाव बदलता है और एक दिन स्वभाव कहीं पीछे छूट जाता है और व्यक्ति अपने स्वरूप को पा लेता है ।
कर्म के फल में आसक्ति ही मनुष्य के बन्धन का कारण है - फलेसक्तो निबध्यते (गीता -5/12) । इसलिए कर्म-फल में आसक्ति का त्याग ही बन्धन-मुक्त होने के लिए आवश्यक है । यही गीता में भगवान द्वारा अर्जुन को कहा गया कर्म-योग है । कर्म-योग के लिए ज्ञान होना आवश्यक है । यही कारण है कि भगवान ने गीता में सबसे पहले अर्जुन को सांख्य-योग कहा है । कर्म-योग में ज्ञान, सहयोगी की भूमिका में है ।
जीवन में जब परमात्म-भक्ति का उदय होता है तब कर्म और ज्ञान, दोनों योग स्वतः ही सध जाते हैं । कर्मयोगी तो कर्म को करने में रुचि रखता है इसलिए वह निष्काम-भाव से कर्म करते हुए संसार की सेवा करता है । ज्ञान इसमें सहयोग करता है । ज्ञानी की दृष्टि में संसार और परमात्मा दो रहते हैं । कहने को तो ज्ञानी अद्वैतवादी होता है परन्तु वास्तव में वह सदैव द्वैत की बात करता है क्योंकि ज्ञानी का देहाभिमान छूटना बड़ा मुश्किल होता है । ज्ञानयोगी संसार को असत् मानता है और परमात्मा को सत् । इसी ज्ञान के आधार पर कर्मों में रत कर्मयोगी अपने आपको संसार की सेवा में समर्पित करते हुए परमात्मा की ओर गति करता है ।
भक्ति में केवल एक भगवान की ओर ही दृष्टि रहती है । केवल भक्त ही संसार को परमात्मा का स्वरूप समझता है । भक्त चहूँ ओर एक परमात्मा को ही देखता है । यही कारण है कि भक्ति में द्वैत कहीं है ही नहीं । दो कहीं है ही नहीं, केवल एक ही है - वासुदेव सर्वम् । जब केवल एक ही है तो फिर उसे एक कहना भी उपयुक्त नहीं है । इसलिए भक्त की दृष्टि में सर्वम् है ही नहीं, केवल वासुदेव ही है । इसलिए परमात्मा के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हो जाना ही जीवन का एक मात्र लक्ष्य होना चाहिए ।
प्रश्न उठता है कि फिर जीवन में त्याग का महत्व क्या है ? त्याग का महत्व इसलिए है क्योंकि बिना त्याग के भक्त होना सम्भव ही नहीं है । फिर एक प्रश्न - त्याग कौन करे ? त्याग करे वह व्यक्ति, जो स्वयं के मूल स्वरूप को भूलकर संसार के तुच्छ पदार्थों को चाहता है । त्याग कैसे करें ? संसार के पदार्थों, वस्तुओं और व्यक्तियों को अपनी और अपने लिए न मानें । क्या इसका अर्थ यह है कि संसार की वस्तुओं और व्यक्तियों का त्याग कर दें ? नहीं, ये आपके हैं ही नहीं । जो आपके नहीं है, आपको उनके त्याग का अधिकार ही कहाँ रह जाता है ? आप चाहे इनको कितना ही अपना मानें, ये आपके पास रहेगी भी नहीं । इनका त्याग तो स्वतः ही हो रहा है । जिनका त्याग अपने आप हो रहा है, उसका त्याग आप कैसे करोगे ? इनको तो आपको केवल अपना और अपने लिए नहीं मानना है, त्यागना तो आपको कुछ और ही है ।
अन्त में बड़ा ही महत्वपूर्ण प्रश्न कि फिर त्याग किसका करें ? जो आपके पास जन्म से पहले भी नहीं थी और शरीर की मृत्यु हो जाने के उपरांत भी आपके साथ नहीं जाएगी, उनका त्याग आपको करना है अन्यथा उनका त्याग तो स्वतः होना ही है । आपने जो कुछ इस संसार में आकर अर्जित किया है, इसी संसार से किया है, उस सबको इसी संसार को लौटा दें । यह भले ही त्याग न हो परन्तु यह आपके जीवन में शांति का मार्ग अवश्य प्रशस्त करेगा । इसी लिए स्वामीजी कहते हैं कि धन का सुख उसको पकड़ने (संग्रह करने) में नहीं है, धन से सुख तो उसको छोड़ने में ही मिलता है ।
वस्तु/पदार्थ को छोड़ना त्याग नहीं है । मान लिया, आपने वस्तु/पदार्थ का त्याग कर भी दिया परन्तु भीतर ही भीतर उसका चिंतन करते रहे तो यह कैसा त्याग हुआ ? 2010 में मैं एक ग्रुप के साथ तिब्बत स्थित कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गया था । संघ में एक प्रौढ़ दम्पति भी थे । उनमें महिला साथी बार-बार अपने पोते को याद कर रही थी । आख़िर मैंने उनको कह ही दिया कि माताजी, अच्छा होता कि आप इस यात्रा पर आती ही नहीं । हम हमारे धामों की यात्रा करते ही इसलिए हैं कि संसार से विमुख हो जाएं और यात्रा के दौरान आने वाली कठिनाइयों को सहन करें । संसार से विमुखता ‘त्याग’ है और रास्ते की कठिनाइयों को सहन करना ‘तप’ । तीर्थयात्रा में ही आपके त्याग और तप की परीक्षा होती है ।
संसार के वस्तुओं/व्यक्तियों का भौतिक रूप से त्याग कर देना केवल बाहरी और दिखाऊ त्याग है । भौतिक रूप से किया गया त्याग उनसे मिलने वाले रस का त्याग नहीं है । यह रस ही सुख देता है । रस ही हमारी इच्छाओं का जनक है । इसलिए वस्तुओं/व्यक्तियों से सुख पाने की इच्छा को छोड़ देना ही वास्तविक त्याग है । जब तक भीतर रस है, तब तक त्याग दिखते हुए भी त्याग नहीं है । बाहरी त्याग के स्थान पर भीतरी त्याग महत्वपूर्ण है । वस्तुओं/व्यक्तियों से मिलने वाले सुख/रस का त्याग कर देना आन्तरिक/भीतरी त्याग है । आन्तरिक त्याग से सुख प्राप्त करने की कामना का त्याग स्वतः ही हो जाता है ।
अतः त्याग उन कामनाओं का करें जिनको आपने अपने भीतर, अपने शारीरिक सुख के लिए पैदा की है । ये कामनाएँ पैदा हुई है, फल की इच्छा रखने के कारण । फल की इच्छा के कारण कामनाएँ पैदा हुई हैं और उन कामनाओं की पूर्ति हेतु आपने कर्म किए हैं । प्रत्येक कर्म का एक निश्चित फल होता है । उस फल में आसक्ति हो जाने से आपकी इच्छा पुनः उस फल को प्राप्त करने की होती है । इसी फलेच्छा का नाम कामना है । इस कामना को उत्पन्न होने से रोकने के लिए कर्म-फल की इच्छा का त्याग करना होगा । इसका त्याग होते ही जीवन में अनन्त शान्ति का अवतरण हो जाता है जो आनन्द की अवस्था है । त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ।। गीता - 12/12 ।। इसी त्याग से व्यक्ति परमात्मा के प्रति समर्पित होता है । यही भक्ति है, शरणागति है ।
सार-बिन्दू
1.त्याग किसका करें? त्याग करें - जो दुःख के कारण है, उनका । जहां दुःख है, वहां नरक है ।
2. दुःख के मूल में काम है । क्रोध और लोभ तो काम के उपोत्पाद है ।
3.’काम’ का कारण - “ऐसा होना चाहिए और ऐसा नहीं होना चाहिए ।”
4. कर्म-फल की इच्छा ही ‘काम’ है ।
5.कर्म का आधार भी ‘काम’ है ।
6.ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से काम उत्पन्न होता है और काम की पूर्ति कर्मेन्द्रियों के माध्यम से होती है ।
7.क्रिया और कर्म में अंतर - प्रकृति के गुणों से क्रिया होती है और गुणों में आसक्ति रखने से कर्म ।
8. श्वसन, पाचन आदि मात्र क्रिया है, कर्म नहीं । कर्म वे होते हैं जिनके होने अथवा न होने में जीव की भूमिका रहती है । आप खाना खा सकते हैं (कर्म) परंतु पाचन (क्रिया) आपके हाथ में नहीं है । आप समागम (कर्म) कर सकते हैं परंतु अंडे का निषेचन (क्रिया) करना आपके नियंत्रण में नहीं है ।
9. कर्मेन्द्रियाँ - मनुष्य की इच्छा से कर्म करती है । शेष क्रियाएँ स्वतः होती है ।
10.फले सक्तो निबध्यते - फल में आसक्ति रखना ही सांसारिक बंधन है । इसलिए फल में आसक्ति का त्याग कर दें ।
11.कर्म न करना जीव के हाथ में नहीं है - प्रारब्ध के कारण और फल में आसक्ति के कारण कर्मों का त्याग होना इस जीवन में असंभव सा है । अतः कर्म फल की इच्छा का त्याग करना ही श्रेष्ठ है ।
12.कर्म फल की इच्छा का त्याग ही कर्म योग है जिसमें सहयोगी की भूमिका में ज्ञान है ।
13.सर्वोत्तम है - परमात्मा के प्रति समर्पण । शरणागति से कर्म-फल की इच्छा त्याग स्वतः हो जाता है और जीवन में अनन्त शांति का अवतरण । त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् (त्यागात् शान्ति: अनन्तरम्)
।। हरिः शरणम् ।।
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
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