स्वास्थ्य
‘स्व’ में स्थित रहने का नाम ही स्वास्थ्य है । विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 1948 में स्वास्थ्य की जो सर्वमान्य परिभाषा दी है उसमें स्वास्थ्य को “पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण” के रूप में परिभाषित किया गया है, न कि केवल रोग की अनुपस्थिति के रूप में । विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि स्वास्थ्य का अर्थ केवल बीमारी का अभाव होना ही नहीं है बल्कि इसमें शारीरिक सुख अर्थात् रोग या दुर्बलता की अनुपस्थिति से मुक्त शरीर का सुचारू रूप से कार्य करने के साथ-साथ मानसिक और सामाजिक रूप से भी मनुष्य का विकार रहित होना आवश्यक है ।
शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से मनुष्य तभी स्वस्थ हो सकता है जब वह आध्यात्मिक रूप से भी स्वस्थ हो । अध्यात्म पर ही व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्वस्थ होना निर्भर करता है । इसी कारण से भारतीय दर्शन में आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ पुरुष को ही शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से स्वस्थ माना गया है ।
गीता में तीन शब्द हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं - प्रकृतिस्थ, शरीरस्थ और स्वस्थ । एक स्थान पर सत्वस्थ शब्द भी आया है । सत्वस्थ और स्वस्थ अर्थात् सत्व में स्थित होना और स्व में स्थित होना, दोनों एक ही अर्थ लिए हुए है । शरीर भी प्रकृति का अंश है, इसलिए प्रकृति और शरीर, इन दोनों में स्थित होना लगभग एक ही बात है परंतु ‘स्व’ में स्थित होना अर्थात् स्वस्थ होना इन दोनों (प्रकृति और शरीर) में स्थित होने के ठीक विपरीत है । यहाँ स्थित होने वाला कौन है ? चलिए ! इन तीन शब्दों पर चर्चा करते हुए हम अपना स्वास्थ्य सुधारने का प्रयास करते हैं अर्थात् स्वस्थ होने की ओर अग्रसर होते हैं ।
‘प्रकृतिस्थ/स्वस्थ’ चर्चा के माध्यम से हम यह भी जानने का प्रयास करेंगे कि यह स्थित होने वाला कौन है ? इस चर्चा को हम आधुनिक विज्ञान से प्रारंभ करेंगे और ऋषियों के प्राचीन विज्ञान तक पहुँचने का प्रयास करेंगे, जिससे हमें ‘स्वस्थ’ होने की राह मिल सकेगी ।
प्रत्येक वृत्त में दो स्थान महत्वपूर्ण होते हैं - एक तो उसका केन्द्र और दूसरी उसकी परिधि । वृत्त जब तक स्थिर रहता है तब तक किसी भी स्थान पर स्थित रहने में कोई परेशानी नहीं होती परन्तु प्रत्येक वृत्त की नियति में सदैव स्थिर रहना होता नहीं है । जब वृत्त अपने केन्द्र की धुरी पर घूमने लगता है, तब वह चक्र कहलाता है । चक्र वह वृत्त है जो सदैव परिभ्रमण की अवस्था में रहता है । चक्र की परिधि का प्रत्येक बिन्दु चलायमान रहता है जबकि उसका केन्द्र-बिन्दु सदैव स्थिर अवस्था में रहता है ।
संसार भी एक वृत्त है, जो सदैव गति करता रहता है, इसीलिए इसको संसार-चक्र कहा जाता है । संसार और शरीर, दोनों एक समान है क्योंकि शरीर संसार का ही अंश है । जन्म से लेकर वृद्धावस्था और यहाँ तक की देह त्याग से लेकर पुनर्जन्म तक शरीर भी गति करता है । संसार-चक्र का केन्द्र सदैव स्थिर रहता है । इसी प्रकार शरीर का केन्द्र भी सदैव स्थिर अवस्था में रहता है । शरीर का केन्द्र ही शरीर की बदलने वाली प्रत्येक अवस्था का द्रष्टा है । संसार और शरीर, दोनों ही के केन्द्र में परमात्मा है । केन्द्र से बाहर हो रहा उसका (परमात्मा का) विस्तार ही वृत्त की परिधि का निर्माण करता है । इसका अर्थ है कि चक्र के केन्द्र में स्थित परमात्मा ही चक्र की परिधि पर भी स्थित है । कहने का अर्थ है कि केन्द्र हो अथवा परिधि, सर्वत्र एक परमात्मा ही है ।
चक्र के घूमने पर केन्द्र की स्थिति में तो किसी प्रकार का विचलन नहीं होता क्योंकि वह तो सदैव स्थिर रहता है परन्तु परिधि की स्थिति में सर्वाधिक विचलन होता है । देखा जाए तो परिधि पर जो भी स्थित है, जब वह स्वयं को परिधि के साथ आत्मसात कर लेता है, तभी वह विचलित होता है अन्यथा नहीं । परिधि की स्थिति में जो परिवर्तन आता है, वह परिवर्तन ही परिधि पर स्थित व्यक्ति के लिए विभिन्न परिस्थितियों का निर्माण करता है ।
परिधि के प्रत्येक पारिस्थितिक परिवर्तन को मनुष्य स्वयं में अनुभव करते हुए सुखी-दुःखी होता रहता है । वास्तव में देखा जाए तो प्रत्येक परिस्थिति का कारण परिधि पर स्थित शरीर की गतिशीलता है, न कि स्वयं की । परिधि पर मनुष्य के शरीर की असमान गति उसके लिए प्रतिकूल परिस्थिति का निर्माण करती है और एक समान गति अनुकूल परिस्थिति का । अनुकूल परिस्थिति उसे सुख प्रदान करती है जबकि प्रतिकूल परिस्थिति दुःख का अनुभव कराती है ।
केन्द्र से परिधि पर स्थित विभिन्न बिंदुओं में से दूरस्थ बिन्दू सर्वाधिक विचलित होता है । ज्यों ज्यों परिधि से केन्द्र की और आते हैं, यह विचलन कम होता जाता है । जब चलते-चलते केंद्र तक पहुँच जाते हैं, यह विचलन एकदम से समाप्त हो जाता है । केन्द्र परमात्मा है और परिधि संसार । संसार का हम जितना अधिक विस्तार करते हैं, परमात्मा से उतने ही दूर होते जाते हैं । परिधि की केन्द्र से जितनी अधिक दूरी होगी, हमारा संसार भी उतना ही विशाल होगा । बड़े संसार में स्थित रहने पर परिस्थितियों में परिवर्तन भी अधिक होगा और विचलन भी ।
मनुष्य का अपने शरीर के केन्द्र में स्थित होने का अर्थ है कि व्यक्ति स्व-स्थित है अर्थात् स्वस्थ है । चक्र चाहे कितनी ही तेज़ गति से घूमे, केंद्र सदैव स्थिर बना रहता है । गाड़ी का पहिया भी एक चक्र है । वह केंद्र के स्थिर रहने पर ही गति कर सकता है अन्यथा नहीं । यही हमारे जीवन-चक्र का सत्य है । केन्द्र में स्थित होकर जीने वाला व्यक्ति कभी सुखी-दुःखी नहीं होता ।
जीवन में व्यक्ति जब केन्द्र को छोड़ परिधि की ओर चलता है तब वह केन्द्र में अपनी स्थिति को भूल जाता है और स्वयं को परिधि में स्थित होना समझ लेता है । परिधि की ओर उसकी गति परिस्थितियों को परिवर्तित करते हुए उसे सुखी-दुःखी करती रहती है ।
मनुष्य के जीवन में दुःख का आगमन तभी होता है जब वह परिधि पर स्थित रहते हुए अपने जीवन में विचलन अनुभव करता है । उस विचलन के कारण उसे जीवन में कुछ अभाव महसूस होता है । जीवन में अभाव का होना ही मनुष्य के दुःख का महत्वपूर्ण कारण है । उस दुःख की निवृत्ति के लिए वह सुख पाने की इच्छा करता है । सुख पाने के लिए वह विभिन्न कर्म करता है । कर्म उसकी विचलन की स्थिति को परिवर्तित करने का केवल प्रयास भर है ।
कर्म ही व्यक्ति के जीवन में विभिन्न परिस्थितियों का निर्माण करता है । वह परिस्थिति व्यक्ति के अनुकूल भी हो सकती है और प्रतिकूल भी । अनुकूल परिस्थिति में व्यक्ति सुख का अनुभव करता है और प्रतिकूल परिस्थिति में दुःख का । इसका अर्थ है कि कर्म करने से मनुष्य सुखी-दुःखी नहीं होता । उसे सुख-दुःख का जो अनुभव होता है वह उसकी परिस्थिति में होने वाले परिवर्तन के कारण ही होता है, कर्म तो केवल परिस्थिति का निर्माण करता है । कहने का अर्थ है कि मनुष्य के सुख-दुःख का कारण उसके जीवन में आने वाली विभिन्न परिस्थितियाँ होती है और इन परिस्थितियों के निर्माण में उसके द्वारा किए जाने वाले कर्मों की भूमिका रहती है । इस प्रकार स्पष्ट है कि सुख-दुःख के अनुभव में कर्मों की प्रत्यक्ष भूमिका न होकर परोक्ष भूमिका रहती है ।
वृत्त के केंद्र में परमात्मा है और केंद्र का विस्तार (परिधि) संसार है । प्रत्येक परिधि का एक केन्द्र अवश्य ही होता है । केंद्र के अभाव में परिधि का न तो निर्माण हो सकता है और न ही उसका अस्तित्व बना रह सकता है । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि केंद्र का विस्तारित रूप ही वृत्त की परिधि का निर्माण करता है । केन्द्र सदैव स्थिर रहता है जबकि परिधि पर बसे संसार में परिवर्तन होते रहते क्योंकि वह स्थिर न होकर गतिमान है । विडम्बना है कि परिधि पर बसे संसार के साथ तादात्म्य स्थापित करके ही मनुष्य दुःख को दूर करने का उपाय खोजता है । जीवन में आए प्रत्येक दुःख को दूर करने का उपाय वह कर्म में ढूँढता है । सकाम कर्म करने के कारण ही मनुष्य संसार-चक्र की गति के साथ तारतम्यता नहीं बिठा पाता । संसार की गति के साथ तालमेल न रहने के कारण यही कर्म व्यक्ति के समक्ष विभिन्न परिस्थितियों को बनाता बिगाड़ता रहता है । परिस्थितियों का सदुपयोग न कर पाने के कारण ही उसके जीवन में सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं ।
प्रश्न उठता है कि परिस्थितियों का सदुपयोग कैसे किया जा सकता है ? परिस्थिति का सदुपयोग से तात्पर्य है कि व्यक्ति प्रत्येक परिस्थिति में किस प्रकार का आचरण करे । प्रतिकूल परिस्थिति में व्यक्ति दुख का अनुभव करता है और सुख की प्राप्ति के लिए प्रयास करता है । उसे सुख मिल भी सकता है और नहीं भी । सुख के न मिलने पर दुःख का बढ़ना लाज़मी है । दुःख न बढ़े, इसके लिए प्रतिकूल परिस्थिति में सुख की इच्छा का त्याग कर देना चाहिए ।
सुख की इच्छा का त्याग कर देने से मनुष्य के सामने चाहे कितनी ही प्रतिकूल परिस्थिति हो, वह दुःखी नहीं होगा । इसी प्रकार अनुकूल परिस्थिति में उसे उदार हो जाना चाहिए । अनुकूल परिस्थिति सुख का अनुभव कराती है । सुख में सदैव एक बात का ध्यान रखें कि दुःख उसके साथ छाया की तरह चल रहा है । उदार होने से अर्थ है, सबको सुख पहुँचाना । सुख में बौराना नहीं है बल्कि उदारतापूर्वक उस सुख को सबमें बाँटना है । स्वयं के लिए सुख की इच्छा का त्याग और सबके प्रति उदारता दिखाना ही प्रत्येक परिस्थिति का सदुपयोग करना है ।
केंद्र (परमात्मा) की परिधि होने से जगत् भी केन्द्र से भिन्न नहीं है । केंद्र (परमात्मा) के कारण ही परिधि (संसार) का अस्तित्व है । जगत् में पदार्थ और क्रिया है जबकि परमात्मा अक्रिय है । क्रिया के कारण ही जगत् में गति है । जिस दिन जगत् क्रियाहीन होकर अक्रिय हो जाएगा, वह स्वयं भी परमात्मा हो जाएगा । जगत् के पदार्थों और क्रियाओं के साथ जीव जब अपना सम्बन्ध होना मान लेता है तब वह केन्द्र से दूर होता जाता है और परिधि (जगत्) को केन्द्र (परमात्मा) से भिन्न मानने लगता है । पदार्थ और क्रिया में आसक्त जीव केन्द्र को भूल जाता है और उसका संसार ही उसके लिए केन्द्र बन जाता है और वह परिधि की परिस्थिति में हो रहे सतत् परिवर्तन के कारण सुखी-दुःखी होता रहता है । केन्द्र से चला जीव परिधि के चक्र तक आ गया है, कारण चाहे कुछ भी रहा हो, उसे परिधि पर ही सदैव के लिए स्थित नहीं रहना है । उसे अपने केन्द्र पर लौटना ही होगा तभी वह सुख-दुःख से मुक्त होकर आनन्द को उपलब्ध हो सकेगा अन्यथा नहीं ।
जगत् परिधि (प्रकृति) है और उस परिधि का केन्द्र परम पुरुष अर्थात् परमात्मा है । परम पुरुष का अंश (पुरुष) प्रकृति के साथ सम्बन्ध मान जीव बन जाता है । इस जीव बने पुरुष के लिए प्रकृति तो ‘पर’ है और परम पुरुष ‘स्व’ है । विडंबना है कि जीव ने ‘पर’ को ही ‘स्व’ मान लिया है । गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीव के सुखी-दुःखी होने का कारण स्पष्ट करते हुए कहा है -
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुंक्ते प्रकृतिजान्गुणान् ।
कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ।। 13/21 ।।
प्रकृति में स्थित पुरुष ही प्रकृतिजन्य गुणों का भोक्ता बनता है और गुणों का संग ही उसके ऊँच-नीच योनियों में जन्म लेने का कारण बनता है ।
भगवान ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रकृति में स्थित पुरुष (जीव) प्रकृति के गुण और उनसे होने वाली क्रियाओं और पदार्थों में आसक्त होकर उनका संग कर लिया है । संग करना अर्थात् उनको अपना और अपने लिए मान कर सम्बन्ध स्थापित कर लेना । प्रकृति के गुणों की क्रियाओं के परिणाम से जीव को जो सुख मिलता है, उससे वह अभिभूत होकर स्व (अपने मूल स्वरूप) को भूल जाता है और अपने आप को पर (प्रकृति) होना मान लेता है ।
गुणों से होने वाली प्रत्येक क्रिया की कर्ता वास्तव में पर (प्रकृति) ही है परंतु जीव (पुरुष) उन क्रियाओं को अपने द्वारा किए जाने वाले कर्म मान लेता है । जो कर्म करता है, उसे कर्ता कहा जाता है । जो कर्म का कर्ता होता है वही उस कर्म के परिणाम का भोक्ता भी होता है, यह प्रकृति के नियम की बात है । प्रश्न उठता है कि प्रकृति के गुणों से होने वाली क्रियाएं तो अनादि काल से चली आ रही है और प्रत्येक क्रिया का एक निश्चित परिणाम भी होता है, फिर हम केवल कुछ क्रियाओं के परिणाम के ही भोक्ता क्यों बनते हैं ?
समष्टि में हो रही प्रत्येक क्रिया का परिणाम हमें कमोबेश प्रभावित करता ही है, यह भी नियम है । फिर भी हम ऐसी क्रिया के परिणाम से व्यथित नहीं होते, उसको केवल प्रकृति का स्वभाव मान स्वीकार कर लेते हैं । हम ऐसी किसी भी क्रिया को अपने द्वारा होना तब तक नहीं मानते जब तक उस क्रिया से हमारा कोई न कोई सीधा सम्बन्ध न हो । जैसे यूक्रेन-रुस के मध्य चल रहा युद्ध व्यथित नहीं कर रहा है लेकिन पड़ौसी से हुई छोटी सी तकरार भी हमारी रात की नींद छीन लेती है । कहने का अर्थ है कि जो क्रिया व्यष्टि से सम्बन्धित है, जिसके परिणाम से हम सीधे-सीधे जुड़े हैं, केवल उन क्रियाओं से ही हम सुखी-दुःखी होते हैं । निष्कर्ष है कि प्रकृति के गुणों से हो रही प्रत्येक क्रिया अपना फल देती है परंतु फल की इच्छा रखते हुए जिस क्रिया से हम अपना संबंध बना लेते हैं केवल उसी क्रिया के कारण होने वाला परिवर्तन ही हमारी परिस्थिति को परिवर्तित कर सुखी-दुःखी करता है ।
प्रकृति में स्थित होकर जीव अपने सुख के लिए उसके गुणों का संग कर लेता है और फिर उन गुणों को अपनी अंगुली के इशारों पर नचाते हुए क्रियाएं करवाना चाहता है । ऐसा नहीं है कि गुण जीव की इच्छानुसार क्रिया करते नहीं हैं, उनको क्रियाएं करनी भी पड़ती है परन्तु उन गुणों की भी अपनी विवशताएं हैं । वे आपकी इच्छा के अनुसार क्रियाएं तो सम्पन्न कर देंगे परन्तु उन क्रियाओं के परिणाम आपकी इच्छानुसार ही होंगे, यह आवश्यक नहीं है । गुणों से होने वाली क्रियाओं के परिणाम तो प्रकृति के नियमानुसार ही होंगे, आपकी इच्छानुसार नहीं ।
‘मेरी इच्छानुसार गुण क्रिया करे ही’, ऐसा आप नहीं बोल रहे हैं बल्कि यह आपका अहंकार बोल रहा है । ‘अहंकार विमूढ़ात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता -3/27), अहंकारग्रस्त जीव जब गुणों से क्रिया करवाता है तब वही क्रिया उसके कर्म बन कर अपने परिणाम से उसे नचाती है । अहंकारवश क्रिया को कर्म बना लेना ही जीव को कर्ता बना देती है फिर उस कर्म का परिणाम भी कर्ता को भोक्ता बनकर भोगना पड़ता है । उन्हीं कर्मों के कारण जीव ऊंची-नीची योनियों में भटकता हुआ परिधि (संसार चक्र) पर ही घूमता रहता है, उससे मुक्त होकर केंद्र (परमात्मा) तक नहीं पहुंच पाता ।
‘प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश:’ (गीता-3/27-पूर्वार्द्ध) सम्पूर्ण क्रियाएं सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा ही सम्पादित होती है । चूंकि यह शरीर भी प्रकृति का अंश है, अतः इसके द्वारा की जा रही प्रत्येक क्रिया भी वास्तव में प्रकृति के गुणों द्वारा ही हो रही है । ‘अहंकारविमूढ़ात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता- 3/27-उत्तरार्ध), दुर्भाग्यवश यह जीव अपने शरीर में हो रही प्रत्येक क्रिया को अपने द्वारा किए जाने वाले कर्म कह देता है । प्रकृति के ये तीन गुण कौन कौन से है और इनसे क्रिया कैसे संपादित होती है ?
प्रकृति के तीन गुण हैं - सत्व, रज और तम । इन तीन गुणों से जीव का स्वभाव बनता है । जीव के स्वभावानुसार ही ये तीनों गुण क्रियाएं करते हैं । प्रत्येक मनुष्य में तीनों गुण एक साथ उपस्थित रहते हैं परंतु जिस गुण की प्रधानता होती है, उसका वैसा ही स्वभाव होता है और प्रमुखत: उसी गुण के अनुसार उसके कर्म होते हैं । स्वभाव का अर्थ है कि मनुष्य ने किसी एक गुण को विशेष रूप से अपने अधीन कर लिया है । इसका अर्थ यह नहीं है कि उसके द्वारा होने वाली क्रियाओं में शेष दो गुणों की कोई भूमिका नहीं रहती । प्रत्येक शरीर में क्रिया तो तीनों गुणों के आपसी तालमेल से ही सम्भव होती है, किसी एक गुण से कोई क्रिया पूर्णतः संपन्न नहीं हो सकती ।
सात्विक (स्वभाव वाले) व्यक्ति में सात्विक गुण की प्रधानता होती है क्योंकि उसने राजसिक और तामसिक गुणों पर विजय प्राप्त कर सात्विक गुण को प्रधान बनाया है । इन तीनों गुणों से होने वाली विविध क्रियाएं एक दूसरी को नियंत्रित करती है । व्यक्ति में जिस गुण की मुख्यता रहती है वह गुण शेष दो गुणों से होने वाली क्रियाओं को नियंत्रित कर सकता है । उदाहरणार्थ क्रोध करने में मुख्य भूमिका राजसिक/तामसिक गुण की होती है । सात्विक व्यक्ति को भी क्रोध आ सकता है, इसका अर्थ है कि उसके शरीर में उपस्थित राजसिक/तामसिक गुण कुछ समय के लिए प्रभावशाली हुए हैं । परन्तु सात्विक गुण की प्रधानता होने से वह व्यक्ति अपने क्रोध को शीघ्र ही नियंत्रित कर लेता है । इस प्रकार के क्रोध को सात्विक क्रोध कहा जाता है । ‘बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीत’ । लंका जाने के लिए समुद्र ने जब भगवान श्रीराम को रास्ता नहीं दिया तब वे भी कुछ समय के लिए कुपित हुए थे परन्तु उनका यह क्रोध सात्विक था ।
क्रोध की क्रिया राजसिक/तामसिक गुण से संपन्न होती है परन्तु उस क्रिया को सात्विक गुण से नियंत्रित किया जा सकता है । इसका अर्थ है कि जीव में उपस्थित तीनों गुण एक दूसरे से सामंजस्य करते हुए क्रियाएं करते हैं और उन क्रियाओं के परिणाम को नियंत्रित भी करते हैं । जिस मनुष्य ने गुणों की इस प्रकृति को समझ लिया वह शीघ्र ही इन गुणों का अतिक्रमण कर जाता है । फिर ऐसा मनुष्य सब कुछ करते हुए भी कुछ नहीं करता और कुछ न करते हुए भी सब कुछ करता है ।
गुणों की प्रकृति को समझने से अर्थ है, यह ज्ञान हो जाना कि मैं कुछ भी नहीं करता बल्कि सब कुछ प्रकृति के गुणों द्वारा ही किया जाता है । ऐसा मनुष्य फिर कर्मों के परिणाम में स्पृहा (प्रबल इच्छा) नहीं रख सकता और न ही कर्मों में लिप्त होकर कर्म-बंधन में जकड़ सकता है । भगवान ने भी अवतार लेकर बहुत से कर्म किए है, अगर वे किसी भी प्रकार का कर्म नहीं करते तो क्या राक्षसों का वध हो जाता ? सब कुछ करके भी न तो वे कभी कर्मों में लिप्त हुए और न उनकी कर्मफल में स्पृहा ही रही ।
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ।। गीता - 4/14 ।।
भगवान स्वयं कह रहे हैं कि कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है इसलिए मुझे कर्म लिप्त नहीं करते । इस प्रकार जो तत्व से मुझे जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बंधता ।
मुख्य बात जो समझने की है, वह यह है कि शरीर और उसमें स्थित आत्मा (पुरुष) को एक दूसरे से भिन्न मानें । प्रकृति का अंश होने के कारण शरीर में भी तीनों गुण रहते हैं । शरीर में स्थित पुरुष जब स्वयं को शरीर से अभिन्न होना मान लेता है, समस्या तभी पैदा होती है । शरीर प्रकृति का अंश है जबकि आत्मा परमात्मा का । हम आत्मा हैं, शरीर नहीं । इसका अर्थ है कि हम परमात्मा से अभिन्न हैं और शरीर से भिन्न । जीवन में समस्या तभी पैदा होती है जब हम स्वयं को शरीर होना समझ लेते हैं । याद रखें - संसार के सारे पदार्थ शरीर के लिए आवश्यक हो सकते हैं, आत्मा के लिए नहीं । आत्मा परमात्मा की तरह ही अक्रिय है, क्रियाएँ तो केवल प्रकृति में होती है । इसका सीधा सा अर्थ है कि शरीर में होने वाली क्रियाओं को हम अपने द्वारा करना न मानें ।
गुण भले ही प्रकृति में हों परंतु प्रकृति का जहां से आगमन हुआ है, मूलतः गुण उन्हीं (परमात्मा) के कारण हैं । प्रश्न उठता है कि परमात्मा को प्रकृति में गुण डालने की आवश्यकता क्यों पड़ी ? वे अकेले थे, अव्यक्त थे और उनको स्वयं का सच्चिदानन्द स्वरूप जो देखना था । उसे देखने के लिए उनका अव्यक्त से व्यक्त होना आवश्यक था । व्यक्त होने के लिए उन्होंने प्रकृति में तीन गुण डाले तभी वे अक्रियता से सक्रिय होने की दिशा में आगे बढ़ पाए । वे स्वयं निर्गुण हैं परंतु उनमें प्रकृति में गुण डालने की क्षमता है । प्रकृति में गुण, केवल निर्गुण से ही आने संभव होते हैं । गुण आने से ही उसका क्रियाशील होना सम्भव होता है। अव्यक्त और निर्गुण परमात्मा प्रकृति को अपने अधीन कर उसकी क्रिया के कारण ही सगुण रूप से व्यक्त होते हैं । व्यक्त होकर भी वे गुणों से होने वाली क्रियाओं में उलझते नहीं हैं बल्कि उन क्रियाओं के कारण हो रहे परिवर्तन को देख-देख कर ही आनंदित होते रहते हैं ।
यह जीव भी परमात्मा का ही अंश है - ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन: । - (गीता - 15/7) । जीव भी निर्गुण अव्यक्त से सगुण होकर व्यक्त हुआ है । उसे परमात्मा की तरह प्रकृति की क्रियाओं से सम्बन्ध स्थापित नहीं करना चाहिए । गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को इसी बात को समझाते हुए कह रहे हैं -
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्यय: ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ।। गीता -3/31 ।।
हे कुन्तीनन्दन ! यह पुरुष स्वयं (जीव) अनादि होने से और गुणों से रहित होने से अविनाशी परमात्म-स्वरूप ही है । यह शरीर में रहता हुआ भी न करता है और न लिप्त होता है ।
पुरुष जोकि जीव बन गया है, वास्तव में वह अनादि और निर्गुण है । इसलिए वह अविनाशी परमात्मा स्वरूप ही है । वास्तव में देखा जाए तो वह स्वयं ही परमात्मा है । देखा जाए तो पुरुष प्रकृति/शरीर में स्थित हो ही नहीं सकता क्योंकि दोनों में भिन्नता है । पुरुष परमात्मा का अंश है और यह नियम है कि अंश की एकता अंशी के साथ ही रहती है किसी अन्य के साथ नहीं । फिर भी मूल बात को समझने की दृष्टि से पुरुष के शरीर में होने को शरीर में स्थित होना मान लेते हैं । शरीर में स्थित होने और शरीर को अपना मान लेने में बड़ा अन्तर है । शरीर में रहते हुए उससे विरक्त रहना ही जीव को परमात्म स्वरूप की स्थिति में ले आता है । शरीर के गिरते ही वह परमात्मा है अन्यथा शरीर में रहते हुए उसमें आसक्त होकर वह जन्म-मरण के चक्र में घूमता रहता है ।
पुरुष के रूप में शरीर में रहते हुए शरीर के द्वारा होने वाली क्रियाओं से सम्बन्ध न रखना ही सबसे महत्वपूर्ण है । शरीर में स्थित होकर उसके द्वारा होने वाली विभिन्न क्रियाओं को अपने द्वारा किए जाने वाले कर्म मान लेना ही जीव को कर्ता बना देता है । कर्ता बनते ही आप भोक्ता बन जाते हैं । कर्म के परिणाम को भोगने वाला बनते ही अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों से दो-चार होना पड़ता है जो आपके सुख-दुःख का कारण बनती है । शरीर से होने वाले कर्म आपके समक्ष परिस्थितियों का निर्माण करते हैं और उन परिस्थितियों को मन तक ले जाने पर आप सुखी-दुःखी होते हैं । जो परिस्थितियों को अपने भीतर तक नहीं ले जाते तब तक सुख-दुःख जीवन में आ ही नहीं सकते ।
प्रकृति के गुण ही मनुष्य के समक्ष उपस्थित होने वाली प्रत्येक परिस्थिति के निर्माण के मूल में है । प्रकृति में तीन गुण, इन गुणों से संपन्न होती क्रियाएं, उन क्रियाओं से उत्पन्न होने वाली अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियां, प्रत्येक परिस्थिति से अनुभव किए जाने वाला सुख-दुःख, अनुभव में आने वाले सुख-दुःख को बढ़ाने-घटाने के लिए गुणों को अपने अधीन कर क्रियाओं को अपने अनुसार कराना (कर्म) और फिर जिन गुणों से अपने अनुकूल कर्मफल प्राप्त हो सके उन गुणों में आसक्त हो जाना । गुणों में आसक्त हो जाना ही गुणों के वश में हो जाना है । मनुष्य सोचता है कि मैंने प्रकृति के गुणों को अपने वश में कर लिया है परन्तु आसक्ति-भाव के कारण होता है उल्टा, वह अपनी आसक्ति के कारण उन गुणों के वश में हो जाता है । गुणों के प्रति पैदा होने वाली यह आसक्ति ही मनुष्य को संसार के साथ बांध देती है ।
भगवान गीता में कहते हैं कि प्रत्येक गुण बँधनकारी है । सत्व गुण ज्ञान की आसक्ति और सुखासक्ति से संसार के साथ बांध देता है जबकि राजसिक गुण राग पैदा करते हुए कर्मों में प्रवृत कर बांध देता है । तामसिक गुण तो अज्ञान से ही उत्पन्न है । वह प्रमाद, निद्रा और आलस्य के कारण बँधनकारी है ।
सत्वं सुखे संजयति रज: कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तम: प्रमादे संजयत्युत ।। गीता - 14/9 ।।
हे अर्जुन ! सत्व गुण सुख में, रजोगुण कर्म में लगाकर मनुष्य पर विजय करता है । तमोगुण ज्ञान को ढककर एवं प्रमाद में लगाकर मनुष्य पर विजय करता है ।
शरीर और उसमें स्थित आत्मा, ये दोनों नारियल के खोल और उसकी गिरी (गट या गोला) की तरह एक दूसरे से भिन्न हैं । प्रत्येक शरीर में गुण रहते है । शरीर में रहते हुए हमें उन गुणों को आत्मा से दूर रखना (गुणातीत होना) है । प्रकृति कभी भी गुणों से रहित नहीं हो सकती और न ही प्रकृति के गुणों को हम मिटा सकते हैं । या तो मनुष्य उन गुणों के वश में हो सकता है या इन गुणों से अतीत हुआ जा सकता है । शरीर में रहते हुए गुणों की ओर से उदासीन हो जाना ही गुणातीत हो जाना है । गुणातीत होने के लिए शरीर में रहते हुए भी हमें अपने स्वरूप में स्थित रहना है । स्वरूप में स्थित मनुष्य देह के/में रहते हुए भी देहमुक्त (विदेह) हो जाता है । फिर शरीर में हो रही क्रियाओं से वह तनिक भी प्रभावित नहीं होता । यही जीवन मुक्ति की अवस्था है ।
गुणातीत व्यक्ति की विशेषताओं का वर्णन करते हुए भगवान कहते हैं -
समदुःखसुख: स्वस्थ: समलोष्टाश्मकांचन: ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति: ।।
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो: ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीत: स उच्यते ।। गीता -14/24-25 ।।
जो धीर मनुष्य दुःख-सुख में सम तथा अपने स्वरूप में स्थित रहता है; जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और स्वर्ण में सम रहता है; जो प्रिय-अप्रिय में सम रहता है; जो अपनी निंदा-स्तुति में सम रहता है । जो मान-अपमान में सम रहता है; जो मित्र-शत्रु के पक्ष में सम रहता है और जो संपूर्ण कर्मों के आरम्भ का त्यागी है, वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है ।
केंद्र (परमात्मा) से विस्तारित हुई इस परिधि (संसार) में विभिन्न जीवों के शरीर हैं । शरीर अवश्य ही परिधि पर स्थित है परंतु जीव बना यह आत्मा अर्थात् पुरुष का इस परिधि से कोई सम्बन्ध नहीं है । इस परिधि (जगत) को संसार-सागर कहा जाता है । इस सागर में यह शरीर एक तैरती हुई नाव है । नाव में सवार जीव को केंद्र तक पहुँचना है । इसके लिए नाव (शरीर) से उसे यात्रा करनी है । नाव तभी तक सुरक्षित है, जब तक इसमें सागर (संसार) का जल न भर जाए । इसी प्रकार हमें अपने भीतर संसार को नहीं भरना है और साथ ही साथ इस संसार में रहना भी है । इसके लिए हमारे सामने आने वाली अनुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थितियों से हमें विचलित होकर सुखी-दुःखी नहीं होना है ।
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ।। गीता - 2/15 ।।
हे पुरुषों में श्रेष्ठ अर्जुन ! सुख-दुःख में सम रहनेवाले जिस बुद्धिमान् मनुष्य को ये मात्रास्पर्श (पदार्थ) विचलित (सुखी-दुःखी) नहीं करते, वह अमर होने में समर्थ हो जाता है अर्थात् वह अमर हो जाता है ।
सुख-दुःख में सम रहना इस शरीर के रहते बहुत कठिन है । मनुष्य ने अपने सांसारिक सम्बन्ध इतने प्रगाढ़ कर लिए हैं कि वह कच्चे नारियल की भांति हो गया है । जबकि उसे होना चाहिए पके नारियल की तरह, खोल (शरीर) अलग और गट (पुरुष) अलग । ऐसा होने के लिए शरीर और संसार से सम्बन्ध विच्छेद कर लेना ही एक मात्र उपाय है ।
परिस्थितियों से अनुभव होने वाले सुख-दुःख से यह जानने में आ जाता है कि जीव कहाँ पर स्थित है ? शरीर में, प्रकृति में अथवा स्व में । शरीर और संसार में आसक्त व्यक्ति ही शरीरस्थ अथवा प्रकृतिस्थ है । पूर्व में जिस वृत्त का उल्लेख इस लेख में किया गया है उसके अनुसार यदि जीव परिधि पर स्थित है तो वह प्रकृति में स्थित है । परिधि पर भ्रमण करते हुए भी यदि जीव अपने शरीर को अनुकूल अवस्था में ले जाने अथवा प्रतिकूल अवस्था से बाहर निकालने का प्रयास करता है तो वह शरीर में स्थित है । दोनों में स्थित रहने से उत्पन्न होने वाली विभिन्न परिस्थितियाँ व्यक्ति को प्रभावित करती हैं क्योंकि परिधि की गतिशीलता निश्चित ही वहाँ स्थित वस्तुओं/ व्यक्तियों को प्रभावित करेंगी ही ।
परिधि पर परिभ्रमण करते हुए भी जिसकी दृष्टि सदैव वृत्त के केंद्र पर बनी रहती है, वह जीव ही अपने स्वरूप में स्थित है । जो जिसका अंश होता है, उसका उसी पर दृष्टि रखना स्वाभाविक है । जब दृष्टि अपने मूल से विक्षेपित हो जाती है, तब जीव संसार-चक्र में घूमने लगता है । स्वामीजी कहते हैं कि यह ‘मूल की भूल’ है । इस संसार-चक्र का भ्रमण तभी समाप्त होता है, जब जीव को इस ‘मूल की भूल’ का ज्ञान हो जाए । भूल के मिटते ही तत्काल उसको अपने मूल स्रोत का अनुभव हो जाता है । फिर उसको परिधि (संसार-चक्र) की गतिशीलता तनिक भी प्रभावित नहीं कर सकती । स्मरण रहे - जब तक आपकी दृष्टि केन्द्र पर रहेगी, परिधि के विचलन से आप तनिक भी प्रभावित नहीं होंगे । मूल पर दृष्टि रखने वाला जीव प्रकृति (जगत्) और शरीर में स्थित प्रतीत होते हुए भी उनमें स्थित नहीं है । इसी स्थिति को जीव का स्वस्थ होना कहा जाता है ।
इतने विवेचन से स्पष्ट है कि जीव ही ‘स्व’ अथवा ‘पर’ में स्थित होता है । ‘स्व’ और ‘पर’ का गठबन्धन ही जीव कहलाता है । जीव पर जब ‘पर’ का प्रभाव अधिक हो जाता है, तब वह प्रकृतिस्थ/शरीरस्थ होता है । जब इस स्व और पर के गठबन्धन में टूट होना प्रारम्भ होता है, तब जीव ‘पर’ को छोड़ ‘स्व’ की ओर चलना प्रारम्भ कर देता है । जिस दिन जीव ‘स्व’ पर पूर्ण रूप से स्थित हो जाता है, वह स्वस्थ कहलाता है । स्वस्थ जीव और मूल स्वरूप में फिर किसी प्रकार का अंतर नहीं रह जाता । यह जीवन्मुक्ति की अवस्था है । फिर जीवन-मुक्त के लिए शरीर और प्रकृति का कोई अर्थ नहीं रह जाता । यह अवस्था विदेह हो जाने की अवस्था है । फिर प्रारब्ध भोग पूर्ण होते ही शरीर गिर जाता है और जीव प्रकृति से भी मुक्त होकर अपने स्वरूप में समाहित हो जाता है ।
स्वरूप में स्थित होना और स्वरूप में समाहित हो जाने में केवल शरीर की उपस्थिति भर का अन्तर है । शरीर के गिरते ही जीव विलीन हो जाता है और केवल स्वरूप ही शेष रह जाता है । यही जीव का परमात्मा हो जाना है । फिर आपके स्वरूप और परमात्मा में रत्ती भर भी अन्तर नहीं रहता । आत्म-बोध की इस अवस्था से फिर संसार में लौटना नहीं होता । जो आनन्द निज स्वरूप को पा लेने में है, वैसा आनन्द इस परिवर्तनशील संसार में कहाँ है ? हमारा स्वरूप ही सत्, चित्त, आनन्द (सच्चिदानन्द) है जोकि स्वयं परमात्मा का स्वरूप है । वृत्त की परिधि (संसार) में घूमते हुए हमारी दृष्टि केंद्र (परमात्मा) से हट जाती है, यही हमारे जीवन की समस्या है । परिधि पर परिभ्रमण करते हुए केन्द्र पर दृष्टि रखेंगे तो एक दिन निश्चित ही केन्द्र को पाकर उसमें स्वयं को विलीन कर देंगे ।
प्रकृति दिखलाई पड़ती है, इसलिए वह हमें सत्य प्रतीत होती है । दिखलाई पड़ने के लिए आवश्यक है कि उसमें क्रियाएं हों । क्रियाएं परिवर्तनशीलता की परिचायक हैं । परिवर्तनशील पर ही दृष्टि जाती है तभी भौतिक वस्तुओं और व्यक्तियों को अनुभव किया जाता है । अपरिवर्तनीय की ओर दृष्टि तभी जाती है जब परिवर्तनशील से दृष्टि हटाते हैं । अपरिवर्तनीय के अनुभव के लिए तो परिवर्तनशील वातावरण से विमुख होना पड़ता है । परिवर्तनशील में रमण करने वाला अपरिवर्तनीय का अंश भी (जोकि स्वयं भी प्रत्येक परिवर्तन से परे है ) भ्रमित होकर स्वयं में परिवर्तन अनुभव करने लगता है । वास्तव में देखा जाए तो प्रकृति और शरीर परिवर्तनशील है और इसमें प्रविष्ट पुरुष अपरिवर्तनीय है ।
वृत्त का केंद्र सदैव स्थिर रहता है, उसकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता जबकि वृत्त की परिधि कभी स्थिर नहीं रह सकती । परिधि केंद्र से विस्तारित होते हुए चाहे जितनी दूर तक फैल सकती है और सिकुड़ कर केन्द्र में समाहित भी हो सकती है । परिधि पर चलने वाला परिवर्तनशीलता का खेल केन्द्र के कारण ही सम्भव होता है परन्तु केन्द्र स्वयं सदैव अपरिवर्तनीय बना रहता है । मनुष्य को यह निश्चित करना है कि वह केन्द्र तक पहुंचकर अपनी अपरिवर्तनशीलता का अनुभव कर ले अथवा फिर परिधि की परिवर्तनशीलता में ही रमा रहे । केन्द्र तक पहुँचकर वह आनन्दित हो सकता है अन्यथा परिधि की परिवर्तनशीलता में उलझकर जीवनभर सुखी-दुःखी होते रहना ही उसकी नियति होगी ।
परिधि पर स्थित जीव सदैव द्वंद्व में उलझा रहता है । हाँ-ना, अभी-बाद में, कभी यह करूँ, कभी वो करूँ, हानि-लाभ, मान-अपमान आदि अनगिनत द्वंद्वों से उसे जीवनभर मुक्ति नहीं मिलती । मुक्ति तो निर्द्वंद्वता को उपलब्ध होने से ही मिलेगी ।
प्रकृतिस्थ होकर सुख-दुःख, हानि-लाभ और जीवन- मृत्यु के द्वंद्व में उलझे मनुष्य के लिए कबीर ने कहा है -
चलती चक्की देखकर दिया कबीर रोय ।
दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय ।।
चक्की के दो पाट हमारे जीवन के विभिन्न द्वन्द्व ही है, जिनमें फँसकर मनुष्य जीवनभर पिसता रहता है । चक्की का एक पाट तो स्थिर रहता है और दूसरा पाट केंद्र में लगी किल्ली के सहारे घूमता है । किल्ली के सहारे ही अनाज के दानें पाटों के बीच प्रवेश करते हैं और धीरे-धीरे परिधि की ओर चलते हुए पिसते जाते हैं । परन्तु जिस दाने ने केन्द्र (किल्ली) को पकड़ लिया, उस पर चक्की के चलने का कोई प्रभाव नहीं पड़ता । यह चक्की की किल्ली अर्थात् केन्द्र ही परमात्मा है जिसके सहारे यह हमारा संसार (चक्की) घूमता है । जिसने अपनी दृष्टि इस किल्ली पर रखी वह संसार से निर्द्वंद्व हो जाता है और पिसने से बच जाता है । यह आत्म-ज्ञान की अवस्था है । आत्म- ज्ञान को उपलब्ध होने के बाद अनुभव होता है कि -
पाट पाट तो सब कहे, किल्ली कहे न कोय ।
जो किल्ली के साथ रहत है, बाल न बाँका होय ।।
धन्य है कबीर, जिन्होंने साधारण से उदाहरण से जगत् में रहने की कला प्रकट कर दी । मनुष्य जीवन में संसार से मुक्त होने के लिए केन्द्र (किल्ली) का आश्रय लेना ही उचित है और यह केन्द्र ही परमात्मा है, जो प्रत्येक स्थान पर, यहाँ तक कि हमारे भीतर भी हर समय उपस्थित है । बस उसकी उपस्थिति को अनुभव करने के लिए दृष्टि को बाहर के संसार से हटाकर आत्मकेन्द्रित करने की आवश्यकता है ।
सार-संक्षेप
अव्यक्त परमात्मा का अपने आनन्द के लिए दो रूपों में स्वयं को विभाजित कर लेना ही जगत् के रूप में व्यक्त हो जाना है । ये दो रूप हैं - प्रकृति और पुरुष । मूलतः पुरुष तो परमात्मा की तरह अव्यक्त ही है जो प्रकृति के गुणों से अपने आप को शरीर के माध्यम से व्यक्त करता है । व्यक्त होकर पुरुष अपने स्वरूप (सच्चिदानन्द) से विमुख होकर संसार और शरीर में आसक्त हो जाता है । उसकी यह आसक्ति प्रकृति के गुणों के प्रति होती है । पुरुष स्वयं निर्गुण है जबकि प्रकृति गुणों से ओतप्रोत है । गुणों के कारण प्रकृति में विभिन्न क्रियाएँ चलती रहती है जो प्रकृति को सदैव परिवर्तित करती रहती है । प्रकृति और शरीर में रहते हुए भी पुरुष सदैव निर्गुण और अपरिवर्तित रहता है ।
पुरुष जिस दिन अपने आपको प्रकृति के गुणों की क्रियाओं का कर्ता मान लेता है, उसी दिन वह प्रकृति में स्थित हो जाता है । निर्गुण और शाश्वत स्वरूप होते हुए भी पुरुष अपने आपको गुणों से भरा और परिवर्तनशील मानने लगता है । ऐसी स्थिति को प्राप्त होकर यही पुरुष जीव बन जाता है । यह भ्रम की अवस्था है, वास्तव में जीव पुरुष ही है । जीव बने पुरुष का यह सबसे बड़ा भ्रम है । प्रकृति के गुणों के कारण होने वाली क्रियाओं को वह अपने द्वारा किए जाने वाले कर्म कहता है । कर्म का जो कर्ता होता है, वही उस कर्म के परिणाम का भोक्ता भी होता है । कर्ता-भोक्ता के इस जोड़ से जब विभिन्न परिस्थितियां बनती है, तब जीव सुखी-दुःखी होता है ।
जीव को सुख-दुःख से मुक्त होने के लिए प्रकृति और शरीर से विमुख होकर अपने स्वरूप में स्थित होना होगा । स्वरूप में स्थित जीव ही स्वस्थ होता है । ‘स्व’ में स्थित जीव को ही शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से स्वस्थ कहा जा सकता है । ‘अध्यात्म’ अर्थात् स्वयं के स्वरूप को पहचान लेना, यह सोच हमारे पूर्वजों की ही देन है । अध्यात्म की सर्वोच्च अवस्था ही आत्म-बोध है । आत्म-बोध को उपलब्ध हुआ जीव ही पूर्ण रूप से स्वस्थ है । स्वस्थ जीव (पुरुष) ही शरीर के मिट जाने के साथ ही अपने मूल स्वरूप को पाकर परमात्मा हो जाता है ।
इतनी चर्चा का निष्कर्ष है कि संसार में रहते हुए भी स्व में स्थित होकर सदैव परमात्मा को याद रखें । इसके लिए सदैव कहते रहें - ‘हे नाथ ! हे मेरे नाथ !! मैं आपको भूलूँ नहीं ।’
इसी के साथ इस चर्चा को यहीं विराम देते हैं । साथ बने रहने के लिए आप सभी का आभार ।
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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