Tuesday, December 23, 2025

रुचि/भूख

 रुचि / भूख

            प्रत्येक व्यक्ति की रुचि भिन्न-भिन्न होती है । कुछ लोग भोजन में रुचि रखते हैं, कुछ की रुचि पढ़ने, लिखने में होती है और कुछ की घूमने फिरने में । रुचि जब एक सीमा से अधिक बढ़ जाती है तब उसे ‘भूख’ कहा जाता है । इस भूख को शांत करने के लिए व्यक्ति अनेकों प्रयास करता है । कहने का अर्थ है कि इस संसार में सभी के पीछे एक प्रकार की भूख लगी है । 
              मुख्य बात है कि आपका भोजन कैसा है, आप क्या पढ़ते/लिखते हैं, कैसी जगह जाते हैं, घूमते-फिरते हैं, आप कैसे लोगों के संग उठते-बैठते हैं ?  कहने का अर्थ है कि आपकी रुचि सात्विक है, राजसिक अथवा तामसिक । सात्विक भोजन आपकी पेट की भूख को शांत करेगा और शरीर को पुष्ट भी । घूमना यदि तीर्थों की ओर है तो ऐसा भावपूर्ण पर्यटन आपके अन्तर्मन को शुद्ध बनाता है । इसी प्रकार सात्विक पठन-पाठन और लेखन स्वयं को जानने की जिज्ञासा को शांत करते हैं । आत्म-ज्ञान की भूख जाग्रत होते ही सोच, विचार और आचरण बदल जाते है । पढ़ने, सुनने, बोलने और लिखने में एक प्रकार की संतुष्टि का अनुभव होता है । 
            कुछ समय के लिए लेखन से हुई दूरी से मुझे जीवन में कुछ अभाव का अनुभव हुआ, संभवतः संतुष्टि का अभाव । लेखन से आत्मसंतुष्टि मिलती है । दूसरी बात, पाठक भी पुनः लेखन प्रारम्भ करने का बार-बार आग्रह कर रहे हैं ।  विचारों को जो गति लेखन से मिलती है, वह मुझे किसी अन्य साधन से नहीं मिली । लेखनी जब चलती है, तब न जाने भीतर से इतने विचार कहाँ से प्रकट हो जाते हैं ? लेखनी तो आपकी हो सकती है परंतु भाव जागृत करने में निःसंदेह अदृश्य शक्ति की भूमिका रहती है । लेखनी उठती भी तभी है, जब भीतर भाव जगते हैं । लेखनी तो केवल उन भावों को भाषाबद्ध करती है । लेखन की भूख का सीधा सम्बन्ध भीतर उठ रहे भावों से है ।
          आत्मकल्याण में लेखन की भले ही प्रत्यक्ष भूमिका नहीं होती हो परंतु अध्यात्म पथ पर अग्रसर करने में इसका महत्वपूर्ण स्थान है । लेखन से आत्मकल्याण की भूख सदैव बनी रहती है । 
        तो बात चल रही थी भूख की । चलिए ! इसी भूख पर बात को आगे बढ़ाते हैं । प्रत्येक जीव को भूख विरासत में जन्मजात मिलती है । भूख का अर्थ है - किसी चीज़ की आवश्यकता को अनुभव करना । यह आवश्यकता किसी की भी हो सकती है । शरीर को ऊर्जा की आवश्यकता होती है तो भूख लगती है । मन को मनोरंजन की भूख होती है । आर्थिक अभाव वाले को धन की भूख होती है । आध्यात्मिक व्यक्ति को आत्म-ज्ञान की भूख होती है । भूख का अनुभव होता है तो यह निश्चित है कि उस भूख को शान्त करने के लिए कोई न कोई भोज्य पदार्थ अवश्य उपलब्ध है । उसकी अनुपस्थिति में भूख का अनुभव हो ही नहीं सकता ।
          भूख के अनुभव से जो भोज्य पदार्थ ग्रहण किया जाता है उससे जीव को तुष्टि अर्थात् तृप्ति-सुख का अनुभव होता है । तुष्टि से पुष्टि होती है अर्थात् भोक्ता पुष्ट होता है । पुष्टि का अर्थ है जीवन में ऊर्जा का संचार । जब तुष्टि और पुष्टि का अनुभव हो जाता है तब भूख मिट जाती है अर्थात् क्षुधा निवृत्ति हो जाती है । यह क्षुधा निवृत्ति तब तक ही रहती है जब तक कि भोक्ता को तुष्टि और पुष्टि में किसी कमी का अनुभव नहीं हो । कमी का अनुभव होते ही भूख पुनः जाग्रत हो जाती है । भूख अन्य जीवों के लिए केवल शरीर को पुष्ट बनाए रखने का आधार मात्र है परन्तु मनुष्य की भूख का केवल एक मात्र यही कारण नहीं है । मनुष्य की भूख के कई कारण हो सकते है ।
           मनुष्य अपनी अनेकों प्रकार की भूख के कारण ही विभिन्न योनियों में भटकते हुए संसार-चक्र से बाहर निकल नहीं पा रहा है । स्वामीजी कहते हैं कि हमें भूख लगती है इसका अर्थ है कि इस भूख को शान्त करने के लिए कहीं न कहीं भोजन अवश्य ही है । यदि भोजन नहीं होता तो भूख भी नहीं होती । इसी प्रकार स्वयं को जानने की जिज्ञासा है तो उस जिज्ञासा को शान्त करने के लिए कहीं ज्ञान भी है । कहने का अर्थ है कि आप जानते तो हैं कि आप शरीर नहीं है बल्कि इस शरीर से भिन्न है परन्तु अज्ञानवश आप इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं । 
        क्या कारण है कि मनुष्य की यह भूख मिटती ही नहीं है ? भोजन मिल जाने पर भी इस शरीर की भूख सदैव के लिए शान्त क्यों नहीं होती, बार-बार  भोजन पाने की आवश्यकता क्यों रहती है ?  जब तक हमें भूख की प्रकृति का ज्ञान नहीं होगा, तब तक इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल पाएगा । चलिए ! पहले मनुष्य की भूख को जानने का प्रयास करते हैं ।
          भूख दो प्रकार की होती है - सांसारिक और आध्यात्मिक । सांसारिक भूख जीव को विभिन्न योनियों में भटकाती है जबकि आध्यात्मिक भूख उसे मुक्त करती है । जब तक सांसारिक भूख से विमुखता नहीं होती तब तक आध्यात्मिक भूख का जाग्रत होना असम्भव है । दोनों भूख एक साथ जाग्रत नहीं रह सकती । प्रायः व्यक्ति दोनों भूख की बात करता अवश्य है परंतु वास्तव में वह आध्यात्मिक रूप से भूखा होने का केवल नाटक ही करता है । 
            सांसारिक भूख को शान्त करने के लिए भटकने वाला जीव कभी भी आध्यात्मिक नहीं हो सकता । हाँ, सांसारिक भूख की अवहेलना कर आध्यात्मिकता की ओर बढ़ने की ललक सांसारिक भूख को एक सीमा तक शान्त अवश्य कर देती है ।
         सांसारिक भूख भी तीन प्रकार की होती है - शारीरिक (स्थूल शरीर की), मानसिक (सूक्ष्म शरीर की) और सामाजिक । शारीरिक भूख भी दो प्रकार की होती है - आवश्यकता मय भूख और वासनामय भूख । शरीर को ऊर्जायुक्त को बनाए रखने के लिए जो भूख पैदा होती है, वह आवश्यकता की भूख है । यह भूख भोजन के रूप में अन्न-जल ग्रहण करने पर एक बार के लिए शान्त हो जाती है । जब शरीर को पुनः ऊर्जा की आवश्यकता होती है तो यह भूख फिर जाग उठती है ।
           दूसरी शारीरिक भूख है, वासनामय भूख । यह स्पर्शजन्य भूख है । प्रथम बार किसी विषय के इंद्रिय-स्पर्श से सुख की जो अनुभूति होती है, जीव उसी सुख को बार-बार अनुभव करना चाहता है । इस प्रकार उसी सुख को पुनः प्राप्त करने की भूख  पैदा हो जाती है । चाहे कितनी ही बार इंद्रिय को विषय रूपी भोजन मिल जाए फिर भी यह भूख शान्त नहीं होती बल्कि प्रत्येक बार इसकी तीव्रता बढ़ती ही जाती है । इस प्रकार यह भूख जीवन में कभी भी शान्त नहीं हो पाती । यहाँ तक कि शरीर के क्षीण होते जाने पर भी यह भूख समाप्त नहीं होती । तब वह भूख शारीरिक स्तर को छोड़कर मानसिक स्तर पर स्थानांतरित हो जाती है । व्यक्ति जिस भोग को शरीर के स्तर पर भोग नहीं सकता, उसको वह अब मानसिक स्तर पर भोगने लग जाता है । इस प्रकार सांसारिक भूख शारीरिक से मानसिक भूख तक विस्तारित हो जाती है ।
         शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियाँ है - त्वचा (स्पर्शेन्द्रिय), कान (श्रवणेन्द्रिय), नाक (घ्राणेंद्रिय), आँख (दर्शनेन्द्रिय) और जिह्वा (स्वादेन्द्रिय) । इनके पाँच विषय क्रमश इस प्रकार हैं - स्पर्श, शब्द, गंध, रूप और रस । विषय अपने से सम्बन्धित इंद्रिय के संपर्क में आता है, तब उस स्पर्श से उस विषय का ज्ञान होता है । उस ज्ञान से जीव को सुख या दुःख का अनुभव होता है । जिस विषय से उसे सुख का अनुभव होता है, उसे जीव बार-बार प्राप्त करना चाहता है और जिससे दुःख होता है उसकी उपेक्षा करना चाहता है । एक ही विषय कभी दुःख देता है और कभी सुख । इसी सुख-दुःख से राग - द्वेष पैदा होते हैं ।
            सुख-दुःख का अनुभव होना उस विषय की मात्रा, समय, परिस्थिति और स्थान आदि पर निर्भर करता है । जैसे अपने विरोधी की आलोचना जब सुनते हैं तो सुख का अनुभव होता है और प्रियजन की आलोचना सुनने पर दुःख का । मिष्ठान्न कम मात्रा में जो रस प्रधान करता है, अत्यधिक मात्रा में उपभोग करने पर वह दुःखी करता है । राग-रंग, संगीत आदि विवाह समारोह में तो सुख देते हैं परन्तु शोक की अवस्था में उन्हें देखकर ही उपेक्षा का भाव पैदा होता है ।
        इंद्रिय सुख को प्राप्त करने में पाँच कर्मेन्द्रियाँ अपना सहयोग देती है । कर्मेन्द्रियों की सक्रियता सुख-दुःख के अनुभव पर निर्भर करती है । मूल बात यह है कि इंद्रिय-सुख की चाहना ही मनुष्य की वासनामय भूख को बढ़ाने में मुख्य भूमिका निभाती है । 
          संसार के जितने भी सुख हैं, सब स्पर्शजन्य सुख है । मनुष्य शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं । संयोग से जब कोई एक भी विषय इनसे स्पर्श करता है तब शरीर को एक प्रकार के सुख का अनुभव होता है । इस प्रकार प्रथम स्पर्श से होने वाले सुख को संयोगजन्य सुख कहा जाता है । इस स्पर्श-संयोग से अनुभव हुए सुख को हमारी इन्द्रियाँ बार-बार चाहने लगती है । इस बार-बार की चाहना को ही वासना कहा जाता है । इससे सिद्ध होता है कि  जीव की आवश्यकतामय भूख तो मिट सकती है परन्तु वासनामय भूख का मिटना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है ।
          राजा भृर्तहरि कहते हैं - 
           भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता:
                    तपो न तप्तं  वयमेव तप्ता: ।
           कालो न यातो वयमेव याता:
                    तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णा: ।। वैराग्य शतक /7 ।।
अर्थात् भोगों को हमने नहीं भोगा बल्कि भोगों ने हमें ही भोग लिया । तपस्या हमने नहीं की बल्कि हम ख़ुद तप गए । काल अर्थात् समय कहीं नहीं गया बल्कि हम स्वयं ही चले गए । इतना होने के बाद भी मेरी कुछ पाने की तृष्णा जीर्ण नहीं हुई बल्कि हम स्वयं ही जीर्ण हो गए ।
         भागवतजी के नवम् स्कंध में राजा ययाति का प्रसंग आता है । दानवों के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से उनका विवाह हुआ था । देवयानी के साथ पूर्व में हुई एक घटना के कारण दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा को विवश होकर देवयानी की दासी बनना पड़ा । भला एक पुरुष एक ही स्त्री से कब संतुष्ट हुआ है, भले ही उसने प्रेम-विवाह ही क्यों न किया हो । जो सुख वस्तु/व्यक्ति के प्राप्त नहीं होने पर मिलता है वह सुख उसके प्रति हमारा आकर्षण होने के कारण है । उस वस्तु/व्यक्ति के मिल जाने पर वह सुख पहले जितना  नहीं रह जाता है । स्त्री/पुरुष का आकर्षण भी ऐसा ही है, जो सुख उनके न मिलने पर मिलता है, वह सुख उनके मिल जाने पर धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जाता है । वैसा ही सुख पुनः पाने के लिए पुरुष किसी दूसरी स्त्री के आकर्षण में फँस जाता है । ययाति भी ऐसे पुरुषों में से एक थे । शर्मिष्ठा के साथ भी एक दिन उनका सम्बन्ध बन ही गया ।
          देवयानी को जब इस अपवित्र सम्बन्ध के बारे में पता चला तो वह ययाति से रूठकर अपने पिता के पास चली गई । कामान्ध ययाति भी भला पीछे कहाँ रहने वाला था । ययाति पर दृष्टि पड़ते ही शुक्राचार्यजी ने उसे असमय ही बूढ़ा होने का श्राप दे डाला । ययाति का शरीर तत्काल ही वृद्ध हो गया । ययाति ने बड़ी अनुनय-विनय की और इससे देवयानी के सुख में आने वाली असामयिक बाधा से होने वाले अनिष्ट का वास्ता दिया । तब शुक्राचार्यजी ने कहा कि वह इस श्राप से मुक्त होने के लिए किसी भी व्यक्ति को अपनी वृद्धावस्था देकर उससे उसकी युवावस्था ले सकता है ।
         ययाति के पाँच पुत्र थे - यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु, अनु और पूरू । प्रथम चार पुत्रों ने ययाति की अनुचित माँग ठुकरा दी । सबसे छोटे पुत्र पूरू ने ययाति का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और पिता से वृद्धावस्था लेकर उन्हें अपनी युवावस्था दे दी । पूरू जानता था कि यह शरीर मरणधर्मा है, इसको संसार की सेवा में लगा देना ही इसका सदुपयोग करना है ।
       पिता की कामना ने पुत्र को समय से पहले बूढ़ा कर दिया । पिता ययाति अपने पुत्र की युवावस्था पाकर कई वर्षों तक काम-सुख भोगता रहा, फिर भी उसको तृप्ति नहीं मिली । काम व्यक्ति को उम्रभर असंतुष्ट बनाए रखता है, संतुष्टि तो कामना रहित होने में है । यह तृप्ति मिलती है - त्याग से । भोग से भला कोई कभी तृप्त हुआ है ? ययाति की युवावस्था उधार की थी इसलिए कई वर्षों तक बनी रही परन्तु समय तो कभी रूकता नहीं, वह तो अपनी गति से भागता जाता है । ययाति युवा रहा परन्तु बढ़ती उम्र ने उसे कुछ सोचने को विवश कर दिया । उसे अपने किए पर बड़ी ग्लानि हुई । उसने देवयानी से अपने पतन की चर्चा की और भोगों से वैराग्य ले लिया । देवयानी से वे कहते हैं - 
        न जातु काम: कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
        हविषा कृष्णवत् र्मेव भूय एवाभिवर्धते ।। 9/19/14 ।।
विषयों को भोगने से भोगवासना कभी शान्त नहीं हो सकती । जिस प्रकार घी की आहुति डालने पर आग और अधिक भड़कती है, वैसे ही भोगों से भोगवासनाएँ और अधिक प्रबल होती है ।
         ययाति ने अपने असमय वृद्ध हुए पुत्र पूरू को उसकी युवावस्था लौटा दी और अपने चार बड़े पुत्रों में राज्य के विभिन्न भाग करके बाँट दिया । सबसे छोटे पुत्र पूरू ने चूँकि उनकी माँग को तत्काल पूरा किया था, उसे सभी संपत्तियां देते हुए अपने राज्य पर अभिषिक्त किया और वन में चले गए ।
       सामाजिक वर्जनाएँ और शारीरिक विवशताएँ भले ही पुरुष को स्त्री-भोग से रोक दें फिर भी रूप-रस को भोगने से वह कभी बाज़ नहीं आता । मनुष्य के जीवन की विडम्बना है कि वह विषय- भोग में आकण्ठ डूबा हुआ है । आज तक भोगों से कभी कोई तृप्त नहीं हुआ है । शरीर की आवश्यकता अनुसार भोज्य पदार्थ सभी को मिलते हैं परंतु जब आवश्यकता मय भूख वासना बन जाती है तब उसका अन्त नहीं आता । विषय-भोग ही जीवन में दुःख का कारण बनते हैं । विषयों की यह तृष्णा ही उसके दुःख का कारण है ।
       या दुस्त्यज्या दुर्मतिभिर्जीर्यतो या न जीर्यते ।
       तां तृष्णां दुःखनिवहां शर्मकामो द्रुतं त्यजेत् ।। भागवत - 9/19/16 ।।
      विषयों की तृष्णा ही दुःखों का उद्ग़म स्थान है । मंदबुद्धि लोग बड़ी कठिनाई से इसका त्याग कर सकते हैं । शरीर बूढ़ा हो जाता है, पर तृष्णा नित्य नवीन होती जाती है । अतः जो कल्याण चाहता है, उसे शीघ्र से शीघ्र इस तृष्णा (भोग-वासना) का त्याग कर देना चाहिए ।
      प्रत्येक व्यक्ति यह बात जानता है, फिर भी भोगों से उसका वैराग्य नहीं हो पाता । इसीलिए अष्टावक्र महाराज राजा जनक को कहते हैं - 
        मुक्तिमिच्छासि चेत्तात विषयान् विषवत्त्यज ।
        क्षमार्जवदयातोषसत्यं पियूषवद् भज ।। अ.गी. -1/2।।
हे प्रिय ! यदि तू मुक्ति को चाहता है, तो विषयों को विष के समान त्याग दे और क्षमा, दया, संतोष तथा सत्य का अमृत के सदृश सेवन कर ।            
       शरीर की वासनामय भूख मानसिक भूख है ।  यह वास्तव में स्थूल शरीर की भूख न होकर सूक्ष्म शरीर की भूख है । दोनों ही शरीरों की भूख में अधिक अंतर नहीं है । मन में किसी वस्तु अथवा पदार्थ और क्रिया के प्रति आसक्ति हो जाती है, तब मानसिक भूख तीव्र हो जाती है । अभी तक हमने काम-भोग की चर्चा की है । दूसरी वासनामय भूख, संग्रह की भूख है । काम-भोग के बाद इस वासनामय भूख का दूसरा उदाहरण धन का संग्रह करना है । धन का संग्रह करने वाला धन का उपयोग कर ही नहीं सकता । धन कमाना अनुचित नहीं है बल्कि धन को महत्वपूर्ण मानकर केवल उसका संग्रह करने लग जाना अनुचित है । धन की आवश्यकता सबको रहती है । आवश्यकतानुसार उपयोग कर शेष धन का सदुपयोग करते हुए उसे सद्कार्यों में लगा देना उचित है । ऐसा करने से धन के संग्रह की भूख समाप्त हो जाती है । 
           विषय-भोग स्थूल शरीर के स्तर पर भोगा जाता है । उस भोग से मिले सुख-दुःख का अनुभव सूक्ष्म शरीर को होता है । जब स्थूल देह मरती है तब सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर का त्याग कर देता है, फिर स्थूल शरीर को किसी प्रकार के सुख-दुःख का अनुभव नहीं होता । विषय-भोग से मिले सुख-दुःख का अंकन सूक्ष्म शरीर में ही होता है । इसी के आधार पर सूक्ष्म शरीर में ही अधिक भोग मिलने की कामना (वासना), विषय के प्रति आसक्ति, व्यक्ति के प्रति ममता, स्थान आदि के प्रति मोह, धन को संग्रहित करने की प्रवृति आदि पैदा होते हैं । ये सभी सूक्ष्म शरीर में संग्रहित होते रहते हैं । इन्हीं के कारण व्यक्ति विभिन्न शरीर लेता-त्यागता रहता है । 
           मुख्य रूप से हम धन के संग्रह की प्रवृति को ही सूक्ष्म शरीर की भूख कहते हैं । धन कमाना अनुचित नहीं है क्योंकि धन से ही हम स्थूल शरीर की आवश्यकता पूरी करते हैं । जीवन की दो वास्तविकताओं को जानते हुए भी हम उनसे अनजान बने रहते हैं । पहली वास्तविकता - इस जीवन में स्थूल धन का जितना भी संग्रह किया है, उसको शरीर छोड़ने पर कोई भी अपने साथ नहीं ले जा सकता । हम भलीभाँति जानते हैं कि जितना धन हमने अर्जित कर संग्रहित कर लिया है, वह हमारे पूरे जीवन के लिए पर्याप्त है, फिर भी हम ‘और अधिक, और अधिक’ की रट लगाते रहते हैं । दूसरी वास्तविकता -  धन से केवल पदार्थ ही क्रय किए जा सकते हैं जिनकी व्यवस्था कर्म-सिद्धान्त के अनुसार परमात्मा ने जन्म से पूर्व ही निश्चित कर रखी है । उस प्रारब्ध से न तो रत्ती भर कम मिलना है न ही अधिक । फिर भी हम जीवन भर धन कमाने और उसको संग्रहित करने में लगे हैं । यह मानसिक भूख नहीं है तो और क्या है ? 
          मन सूक्ष्म शरीर का मुख्य अंग है, जो हमें चौरासी के चक्कर में डाले रखता है, उससे बाहर निकलने नहीं देता । इसीलिए संग्रह की भूख को सूक्ष्म शरीर की भूख कहा गया है । 
           धन के लोभी व्यक्ति के मन में धन अपना विशेष स्थान बना लेता है जिससे वह उसका कितना ही संग्रह करले फिर भी भूखा का भूखा ही रह जाता है । वास्तव में धन के त्याग से जो सुख मिलता है, वह धन के संग्रह से नहीं मिलता । स्वामीजी कहते हैं कि किसी वस्तु के आकर्षण से जो सुख मिलता है, वह उस वस्तु के ज्ञान से नहीं मिलता - यह सिद्धांत है । धन के आकर्षण ( लोभ) से जो सुख मिलता है, वह धन के ज्ञान से नहीं मिलता ।
          वासनामय भूख जब विस्तार पाती है तो मन तक अपना फैलाव कर लेती है । शरीर जब किसी विषय विशेष के प्रति आसक्त होकर क्रिया को करने में असहाय हो जाता है तब व्यक्ति मन में उसी विषय से सुख भोगने के लिए क्रिया (चिन्तन) करने लगता है अर्थात् मन के माध्यम से वह उस क्रिया का सुख लेता रहता है । उस क्रिया से मानसिक सुख तो मिल सकता है परंतु भूख नहीं मिट सकती ।
           शारीरिक भोग की तरह ही मानसिक भोग से भी व्यक्ति कभी तृप्त नहीं हो सकता क्योंकि संसार की वस्तुएँ चाहे स्थूल रूप में हो अथवा काल्पनिक रूप में, भोग के लिए बनी ही नहीं है, वे तो केवल उपयोग के लिए है । जितनी आवश्यकता है, केवल उतनी का ही उपयोग करेंगे तो भूख कभी विस्तारित नहीं होगी ।
          शास्त्रों में शारीरिक भोग से भी मानसिक भोग को अधिक पतन करने वाला बताया है । शारीरिक रूप से तो किसी एक विषय का भोग कर आप कुछ समय के लिए शान्त हो जाते हैं परंतु मानसिक भोग को आप अनिश्चित काल तक सतत भोगते हुए अशान्त बने रहते हैं । शारीरिक भूख को मिटाने के लिए आप इंद्रियों के माध्यम से विषय-भोग करते हुए रस लेते हैं परन्तु मानसिक भूख में आपके सामने विषय नहीं होता, फिर भी आप उसका रस लेते रहते हैं । गीता में भगवान ने कहा है कि इंद्रियों को विषयों से हटाने वाले मनुष्य के विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता अर्थात् उसकी शरीर और संसार में रसबुद्धि बनी रहती है । (गीता-2/59) । इस प्रकार कहा जा सकता है कि शारीरिक भूख से मानसिक भूख अधिक उग्र और विनाशकारी होती है । 
     अब बात करते हैं, सामाजिक भूख की । भोग और संग्रह के पश्चात् बात आती है, सामाजिक मान-सम्मान की । भोग स्थूल शरीर की भूख है, संग्रह सूक्ष्म शरीर की भूख है और मान-सम्मान की चाह रखना सामाजिक भूख है । जब व्यक्ति के पास संग्रह अधिक हो जाता है, तब वह चाहता है कि समाज में उसकी प्रतिष्ठा हो, समाज से उसे मान-सम्मान मिले, समाज उसकी प्रशंसा करे । प्रतिष्ठा, मान-सम्मान और प्रशंसा की चाह रखना सबसे बड़ा और ख़तरनाक ज़हर है । सामाजिक भूख को शान्त करने के लिए व्यक्ति भोग और संग्रह से कभी भी मुक्त नहीं हो सकता क्योंकि ये एक दूसरे के पूरक हैं । सामाजिक स्तर पर इतनी अधिक प्रतिस्पर्धा है कि अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने के प्रयास में व्यक्ति कोल्हू का बैल बन जाता है ।
         इस प्रकार सांसारिक भूख के बारे में हमने अल्प रूप से चर्चा की । सांसारिक भूख कंचन, कामिनी और कीर्ति की भूख है । कंचन के संग्रह में लग जाना मानसिक भूख है । कामिनी को भोगने अर्थात् शरीर के सुख की कामना के कारण यह शारीरिक भूख है । कीर्ति की कामना रखना सामाजिक भूख है । कंचन, कामिनी और कीर्ति की भूख तब तक शान्त नहीं हो सकती जब तक हम इस संसार को महत्व देते रहेंगे । संसार दिखता अवश्य है परंतु वास्तव में वह है नहीं । इसी प्रकार कंचन, कामिनी और कीर्ति हमें आकर्षित करती अवश्य है परन्तु उनका अस्तित्व नहीं है, वे स्थाई नहीं है । कंचन अर्थात् धन आने-जाने वाला है, कामिनी का यौवन भी एक दिन ढल जाने वाला है और कीर्ति भी सदैव के लिए नहीं रहेगी ।
          सांसारिक भूख के बाद बात करते हैं आध्यात्मिक भूख की । अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर  मनुष्य ने अहम् के कारण एक अलग संसार  बना लिया है, जिसमें आसक्त होकर उसमें फँस गया है । इससे मुक्त होने के लिए उसके भीतर जो छटपटाहट होती है, वह उसकी आध्यात्मिक भूख है । संसार अपरा प्रकृति है और जीव परा प्रकृति के अन्तर्गत है । संसार क्षर है, जीव अक्षर है । क्षर से मुक्त होने के लिए अक्षर अर्थात् जीव की प्रकृति (परा प्रकृति) का ज्ञान होना आवश्यक है । अध्यात्म का यही अर्थ है कि जीव अपने स्वभाव को जाने । अक्षर जीव उस अक्षर परमात्मा का अंश है जिसे उत्तम पुरुष कहा जाता है । स्वयं को जानने के लिए हमें संसार से अपने आपको अलग करना होगा । संसार से अलग होने के लिए अपने स्वभाव में परिवर्तन लाना होगा तभी हम अहम् से स्वरूप तक पहुंचेंगे । इस प्रकार मनुष्य जीवन की यह आध्यात्मिक भूख उसकी ‘स्वभाव से स्वरूप तक’ की यात्रा कराती है ।
            सांसारिक भूख और आध्यात्मिक भूख, दोनों ही भूख हैं, फिर इनमें अंतर क्या है ? सांसारिक भूख को जितना हम मिटाने की कोशिश करते हैं, वह उतनी ही अधिक भड़कती है । सांसारिक भूख के कारण जीवन अशांति से घिरा रहता है । आध्यात्मिक भूख का पहले तो जाग्रत होना कठिन है और जब जाग्रत हो जाती है तब जीवन में शांति का अवतरण होने लगता है । आध्यात्मिक भूख ऐसी भूख है जिसको मिटाने के प्रयास मात्र से ही जीवन में संतुष्टि का अनुभव होने लगता है । सांसारिक भूख के लिए कितने ही प्रयास कर लें वह आपको सदैव असंतुष्ट ही बनाए रखती है । सांसारिक भूख संसार के भोजन को चाहती है और आध्यात्मिक भूख परमात्मा के भजन को ।
             संसार की भूख के लिए “और, और, और अधिक” की चाह बढ़ती ही जाती है ।  कितना भी कर लो, इस ‘और’ का अन्त कभी नहीं आता । यह ‘और-और’ ही असंतुष्टि है । जीव जब इस ‘और-और’ की उपेक्षा करने लगता है, तब जाकर इस ‘और’ की लालसा धीरे-धीरे कम होने लगती है । जितनी सांसारिक भूख कम होगी उतनी ही आध्यात्मिकता की तरफ़ उन्मुखता होगी । इस प्रकार कहा जा सकता है कि सांसारिक भूख से विमुखता ही आध्यात्मिक भूख की जागृति का आधार है ।
          संसार की भटकन और अशांति से मुक्ति तभी मिल सकती है, जब इस बात की स्वीकारोक्ति हो जाए कि सांसारिक भूख कभी मिट नहीं सकती । इसी स्वीकारोक्ति के साथ ही व्यक्ति की आध्यात्मिक भूख जाग्रत हो जाती है । विषयों से एक बार का मिला सुख ही सांसारिक भूख के मूल में है । प्रत्येक विषय-सुख एक दिन आपको दुःखी करेगा ही, यह सत्य बात है । दुःखी होने पर हम फिर उसी सांसारिक सुख की चाहना करने लगते हैं, जिसकी परिणीति दुःख में हुई है । यही हमारी सबसे बड़ी भूल है । हमें यह समझना होगा कि जीवन में दुःख का आगमन होता ही इसीलिए है कि हम संसार से विमुख हो जाएं । जो इस रहस्य को जान जाता है वह संसार में रहते हुए भी वीतरागता को प्राप्त हो जाता है ।
              संसार से हुआ वैराग्य ही आध्यात्मिकता की राह खोलता है । वैराग्य से संसार की भूख मिट जाती है और आध्यात्मिक भूख जग जाती है । संसार से हुआ वैराग्य पुनः राग में परिवर्तित नहीं हो जाए, इस बारे में सबको सदैव सचेत रहना आवश्यक है ।
          आध्यात्मिक भूख ज्ञान से मिटती है । इस भूख के मिटते ही संसार तिरोहित हो जाता है और केवल परमात्मा शेष रह जाते हैं । एक परमात्मा के अतिरिक्त यहाँ कुछ भी नहीं है । “वासुदेव सर्वम्” का बोध ही अध्यात्म का लक्ष्य है । आध्यात्मिक भूख की समाप्ति आत्म-बोध के साथ होती है । इस अवस्था को उपलब्ध होते ही व्यक्ति सच्चिदानन्द स्वरूप को पा लेता है ।
          सांसारिक भूख मिटती नहीं है, ऐसे में आध्यात्मिक भूख को जाग्रत कैसे किया जा सकता है ? उत्तर छोटा सा भी और सरल सा भी -  ' संसार से अलग होकर' । जब तक संसार के साथ सम्बन्ध है तब तक भोग और संग्रह से मुक्ति मिलनी असंभव है । इनके कारण षट् विकार (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर अर्थात् ईर्ष्या) उत्पन्न होते है जो व्यक्ति के जीवन को अव्यवस्थित कर देते हैं । संसार की ओर से दृष्टि हटाते ही विकार मिटने लगते हैं । इसके लिए या तो हमें संसार से सम्बन्ध तोड़ना है या परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ना है । एक काम करते ही दूसरा काम स्वतः हो जाता है ।
           हम संसार में आसक्त होकर अपने आप को भूल गए हैं । संसार दिखता अवश्य है पर वह स्थाई नहीं है । इसमें इतनी मन्द गति से परिवर्तन होता है कि हम इसको ही स्थाई मान बैठते हैं । जब तक हमें होश आता है, तब तक हमारे पास न तो समय रहता है और न ही शक्ति । सत्संग हमें इस बात का अनुभव कराता है, जिससे हम समय और शक्ति के शेष रहते संभल जायें । अतः जहां भी सत्संग मिले, उसका लाभ अवश्य ही लें ।
        आध्यात्मिक भूख जाग्रत करने के लिए हमें संसार से अलग होना होगा, इसका अर्थ यह नहीं है कि संसार छोड़ कर कहीं पलायन कर जायें । गीता में भगवान कहते हैं कि जैसे कमल के पत्ते, जल में रहते हुए भी जल से लिप्त नहीं होते (पद्मपत्रमिवाम्भसा-5/10), वैसे ही हमें संसार में रहते हुए उसमें लिप्त होकर प्रभावित नहीं होना है । इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए सतत स्वाध्याय और सत्संग करना चाहिए ।
          श्रीमद् भागवत महापुराण में नौ योगीश्वरों की कथा आती है । वसुदेवजी को यह कथा नारदजी सुना रहे हैं जिसमें राजा निमि और नौ योगीश्वरों का संवाद है । राजा निमि को आध्यात्मिक भूख है । निमि प्रश्न पूछते हैं कि परम कल्याण का स्वरूप क्या है ? और उसका साधन क्या है ? तब उनमें से एक योगीश्वर कविजी सांसारिक और आध्यात्मिक भूख की तुलना करते हुए इस प्रश्न का उत्तर देते हैं - 
भक्ति: परेशानुभवो विरक्ति-
        रन्यत्र चैष त्रिक एककाल: ।
प्रपद्यमानस्य यथाश्नत: स्यु-
        स्तुष्टि: पुष्टि: क्षुदपायोऽनुघासम् ।।भागवत - 11/2/42 ।।
अर्थात् जैसे भोजन करनेवाले को प्रत्येक ग्रास के साथ तुष्टि (तृप्ति अथवा सुख), पुष्टि (जीवनशक्ति का संचार) और क्षुधा- निवृत्ति - ये तीनों एक साथ होते जाते हैं, वैसे ही जो मनुष्य भगवान की शरण लेकर उनका भजन करने लगता है, उसे भजन के प्रत्येक क्षण में भगवान के प्रति प्रेम, अपने स्वरूप का अनुभव और सांसारिक वस्तुओं से वैराग्य - इन तीनों की एक साथ ही प्राप्ति होती जाती है ।
         इस प्रकार भागवतजी में भगवान की शरण में जाकर उनका भजन करने को सांसारिक भूख से निवृत्ति का सर्वश्रेष्ठ साधन बताया है ।
         भागवतजी के पूर्ववर्णित श्लोक में दोनों ही भूख (सांसारिक और आध्यात्मिक) की तुलना की गई है । भक्ति की तुलना तुष्टि (संतुष्टि) से की जा सकती है क्योंकि दोनों ही आनन्द की अवस्था तक ले जाती है । शरीर की भूख को भोजन मिलने से सुख मिलता है उसी प्रकार आध्यात्मिक भूख में भजन (भक्ति) से आनन्द का अनुभव होता है । ईश्वर का अनुभव और पुष्टि (पोषण) समकक्ष कहे जा सकते हैं, क्योंकि दोनों ही जीवन को पोषित करते हैं - भोजन शारीरिक जीवन को और परमात्मा का अनुभव आध्यात्मिक जीवन को ।
         अंत में विरक्ति और क्षुधा-निवृत्ति की तुलना की जा सकती है क्योंकि दोनों ही व्यक्ति को और अधिक पाने की इच्छा (लालसा) से मुक्त करते हैं । भोजन करते समय व्यक्ति न केवल अन्य कार्यों में रुचि खो देता है अर्थात् उनसे विमुख हो जाता है बल्कि तुष्टि के अनुसार उस भोजन के प्रति उसकी रुचि उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है इसी प्रकार जो व्यक्ति आनंदघन परमात्मा का अनुभव कर रहा होता है उसे अन्य सांसारिक वस्तुओं में रुचि नहीं रहती जिससे ईश्वर के प्रति उसका अनुराग बढ़ता ही जाता है । 
          विरक्ति शब्द बड़ा महत्वपूर्ण है । प्रायः हम विरक्ति और त्याग को समानार्थी ले लेते हैं परंतु ऐसा है नहीं । विरक्ति सांसारिक वस्तुओं से वैराग्य है जबकि त्याग में प्रत्येक आनंददायक वस्तु का उपयोग भगवान की सेवा में उचित रूप से किया जाता है ।
        अपने लिए जिस भी वस्तु/ व्यक्ति को स्वयं के लिए आनन्ददायक समझते हों, उसको भगवान की और भगवान के लिए मानकर उनको अर्पित करते हुए उनकी शरण में चले जाने का नाम ही भक्ति है । सांसारिक भूख मिटती नहीं है, यह सोचकर व्यथित नहीं होना है बल्कि परमात्मा की शरण लेकर संसार की सभी वस्तुओं को उन्हें अर्पित कर देना है । इससे भक्ति में तुष्टि, पुष्टि और क्षुधा-निवृत्ति; इन तीनों का एक साथ अनुभव हो जाता है । फिर संसार के प्रति आसक्ति ही परमात्मा के प्रति अनुरक्ति अर्थात् प्रेम में परिवर्तित हो जाती है । इससे आध्यात्मिक भूख बढ़ेगी, परन्तु वह भूख सांसारिक भूख की तरह हमें अशान्त नहीं करेगी ।
            सांसारिक भूख आसक्ति के कारण तीव्र से तीव्रतर होती जाती है जो जीवन में अशान्ति लाती है । आध्यात्मिक भूख में परमात्मा के भजन से उनके प्रति अनुरक्ति दिन प्रतिदिन बढ़ती जाती है, जिससे जीवन में शान्ति का आगमन होता है । 
       भागवतजी में शुकदेवजी महाराज परीक्षित को कहते है -
    अकाम: सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधी: ।
    तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुष परम् ।। 2/3/10 ।।
           जो बुद्धिमान पुरुष है - वह चाहे निष्काम हो, चाहे समस्त कामनाओं से युक्त हो अथवा केवल मोक्ष चाहता हो - उसे तीव्र भक्तियोग के द्वारा केवल पुरुषोत्तम भगवान की ही आराधना करनी चाहिए ।
              हम सब प्रकृति और शरीर के अधीन है क्योंकि हम इन्हीं में स्थित है । हम स्वाधीन हैं ही नहीं । ‘स्व’ के अधीन होते ही शरीर और संसार गौण हो जाते हैं । स्वाधीन होने के लिए हमें अपने भीतर झांकना होगा । मेरी इस बात पर मेरे मित्र प्रश्न कर बैठते हैं कि स्वयं के भीतर झांकना कैसे होगा ? उत्तर बहुत ही सरल है परंतु वैसे कर पाना बहुत कठिन । हम दूसरों के घर के भीतर तो झांकते है पर अपना घर देखते नहीं है । इसलिए दूसरों के भीतर झांकना बन्द कर दें और स्वयं के भीतर प्रवेश करें । 
           गंभीरता से देखें तो हम सब अपने अंदर से ही संचालित हो रहे हैं । स्वयं के भीतर उचित-अनुचित, सत्य-असत्य, सुख-दुःख के मध्य सदैव ही एक प्रकार का युद्ध छिड़ा है । हम तो एक दोलक की भाँति द्वंद्व से घिरे एक पक्ष से दूसरे पक्ष के मध्य दोलन करते रहते हैं । यदि हम इनमें से किसी एक पर ठहर सकते हैं तो दोलन बंद हो सकता है । किसी एक पर रूकने से पूर्व ख़्याल रखें कि सुख की चाह और दुःख को दूर करने की इच्छा से किए जाने वाले कर्म का स्रोत बाहर है, आपके भीतर नहीं । इस बात को अनुभव करें और स्वयं को इस बाह्य स्रोत से अलग कर लें, आप स्वतः ही स्वयं के भीतर प्रवेश कर जाएंगे ।
           सांसारिक भूख बाहर की भूख है और यह भूख कभी समाप्त नहीं होगी । इसके शान्त होने की प्रतीक्षा करेंगे तो भ्रम में ही रहेंगे क्योंकि यह कभी भी शान्त होने वाली नहीं है । इस भूख की तो उपेक्षा ही करनी पड़ेगी तभी आध्यात्मिक भूख जगेगी अन्यथा नहीं । इसके लिए बाहर संसार की ओर देखना बन्द कर दें और स्वयं के भीतर प्रवेश करें, तभी शान्ति का अनुभव होगा ।
         सांसारिक भूख वासना की भूख है, जबकि आध्यात्मिक भूख व्यक्ति की मुमुक्षा है । जब व्यक्ति के भीतर मुमुक्षा जाग्रत होती है, तब वह सांसारिक भूख और प्यास सब कुछ भूल जाता है । शारीरिक भूख और प्यास इस अनित्य शरीर से सम्बंधित है, इस भौतिक शरीर से सम्बंधित है जबकि आत्मिक भूख यानि मुमुक्षा आत्म-कल्याण से सम्बंधित है । सांसारिक भूख और प्यास आसक्ति (वासना) के अंतर्गत आती है जबकि आध्यात्मिक भूख (मुमुक्षा) परमात्मा से प्रेम (अनुरक्ति) का मार्ग है  । 
         सांसारिक भूख और प्यास के शांत होने पर शारीरिक और मानसिक सुख मिलता है परन्तु समय पाकर यह भूख पुनः जाग्रत हो उठती है और व्यक्ति पुनः दौड़ पड़ता है, बाहर इस संसार में, इसको शांत करने के लिए । मुमुक्षा को शांत करने के लिए मनुष्य को संसार को त्यागकर स्वयं के भीतर प्रवेश करना पड़ता है । मुमुक्षा  के शांत हो जाने पर मनुष्य को अतुलनीय आनन्द प्राप्त होता है । 
       हमें भूख होनी चाहिए आत्म-कल्याण की, शारीरिक सुख की नहीं । शारीरिक भूख को वरियता देने वाला भगवान से वरदान में भौतिक सुख सुविधाएँ ही मांगता है जबकि आत्म-कल्याण के लिए भूखा व्यक्ति आत्म-ज्ञान प्राप्त करने का वर मांगता है । सदैव स्मरण रहे  - जिसकी जैसी मांग होती है, परमात्मा उसको उसी अनुरूप देता है ।  
           लेख का समापन करने से पहले एक बार स्वामीजी की कही वह बात उद्धृत करना चाहूँगा, जिसके आधार पर यह लेख लिखना सम्भव हुआ है । स्वामीजी कहते है कि हमें नित्य की भूख होनी चाहिए अनित्य की नहीं । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि जब तक हमें अनित्य की भूख है, तब तक नित्य की भूख जाग्रत नहीं हो सकती । अनित्य की भूख राग-द्वेष में उलझा देती है, जिससे वह शान्त होने के स्थान पर और अधिक उग्र हो जाती है । नित्य की भूख को जगाने के लिए हमें वीतरागी होना होगा । संसार से वैराग्य होने पर ही हमें नित्य का ज्ञान होगा ।
           प्रश्न उठता है कि नित्य क्या है और अनित्य क्या है ? स्वामीजी उत्तर देते हुए कहते हैं कि जो भी परिवर्तनशील है, वह सब अनित्य है । शरीर का गर्भ के रूप में बनना शुरू होने के साथ ही उसका मरना प्रारम्भ हो जाता है । सब कहते हैं कि हम जी रहे है, जबकि सत्य है कि हम प्रतिक्षण मर रहे हैं । हमारा मरना नित्य हो रहा है । जो उत्पन्न हुआ है वह नष्ट होगा ही, यह निश्चित है । उत्पन्न होना अनित्य है और नष्ट होना नित्य है । पदार्थ और क्रिया उत्पन्न होते हैं और नष्ट होते हैं । उनका उत्पन्न होना अनित्य है जबकि नष्ट होना नित्य है । पदार्थ और विषयों का संयोग अनित्य है  क्योंकि इनका संयोग होगा ही, कहा नहीं जा सकता परंतु इनका वियोग होना नित्य है क्योंकि संयोग का वियोग होगा ही, यह निश्चित है । इसी प्रकार हमें बड़ाई, मान, सम्मान मिलेगा ही यह निश्चित नहीं है इसलिए ये सब भी अनित्य है ।
            हमारी कामना, कर्म, राग-द्वेष, बड़ाई, मान-सम्मान आदि सब अनित्य हैं । संसार मिटने वाला है, इसलिए यह अनित्य है, इसको नित्य न मानें । हम (स्वरूप) और परमात्मा सदा रहने वाले हैं, अतः केवल इनको ही नित्य मानें । अनित्य को अनित्य मानते ही उसकी भूख (सांसारिक भूख) मिट जाती है और नित्य की भूख (आध्यात्मिक भूख) जाग्रत हो जाती है ।
सार-संक्षेप 
              इंद्रिय के विषय-संयोग से जो स्पर्शजन्य सुख मिलता है उससे ही भूख पैदा होती है । यह अंतहीन भूख है, यह सांसारिक भूख है । इस अंतहीन भूख से जीवन में अशान्ति के अतिरिक्त कुछ भी नहीं मिलता । इस भूख से तो विमुख ही होना पड़ेगा, चाहे आज हो जाएं चाहे कल । इस विमुखता से भूख का स्वरूप परिवर्तित हो जाता है । अब यह भूख आध्यात्मिक भूख बन जाती है, स्वयं को जानने की भूख । यही भूख आपको परमात्मा के द्वार तक ले जाती है ।
         भूख चाहे सांसारिक हो अथवा आध्यात्मिक, दोनों ही प्रकार की भूख को भोजन की आवश्यकता होती है । सांसारिक भूख का भोजन है - संसार के पदार्थ । आध्यात्मिक भूख का भोजन है - परमात्मा का भजन, उसकी भक्ति । दोनों भूख में एक ही अंतर है कि सांसारिक भूख में सुख की इच्छा होने के कारण जीवनभर असंतुष्टि और अशान्ति बनी रहती है जबकि आध्यात्मिक भूख में सभी इच्छाओं के त्याग कर देने से वह भूख जीवन को संतुष्टि और शान्ति प्रदान करती है । इसी शान्ति का नाम आनन्द है । ऐसे आनन्द को उपलब्ध होने के लिए हमें प्रकृति में स्थित बने रहने से हटकर ‘स्व’ में स्थित होना होगा ।
            जब तक प्रकृति और शरीर में स्वयं को स्थित होना मानते रहेंगे, तब तक आध्यात्मिक भूख जाग्रत नहीं होगी और न ही सांसारिक भूख स्थाई रूप से कभी शान्त होगी । इसके लिए स्वयं को शरीरस्थ/प्रकृतिस्थ न मानकर ‘स्व’ में स्थित (स्वस्थ) मानें । ऐसा मानना तनिक कठिन लगे तो कम से कम संसार में रहते हुए संसार से दृष्टि हटाकर अपने स्वरूप पर दृष्टि जमाए रखें । इतने प्रयास से ही आप स्वरूप तक पहुँचकर ‘स्व’ में स्थित हो सकते है । इस अवस्था को स्वस्थ हो जाना कहते हैं । 
।। हरिः शरणम् ।।
डॉ. प्रकाश काछवाल

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