ज्ञान -1
ज्ञान और विवेक, दोनों पर्यायवाची शब्द कहे जाते हैं, जिनको समान अर्थ के रूप में लिया जाता है । सत्य तो यह है कि दो शब्द समान अर्थ से प्रतीत होते हुए भी समान नहीं हैं । शब्दों का एक समान अर्थ होते हुए भी स्थानानुसार अलग-अलग शब्द उपयोग में लिए जाते हैं । उदाहरणार्थ - पानी और जल समानार्थी हैं परंतु स्थान के अनुसार इनका अलग अलग उपयोग किया जाता है । जैसे पानी पिया जाता है और जल शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है । ज्ञान और विवेक भी ऐसे ही दो शब्द हैं । ज्ञान प्रत्येक को है परंतु विवेक किसी किसी में होता है । ज्ञान शास्त्र पढ़कर, उन्हें कंठस्थ कर व्यक्त किया जा सकता है परंतु उपयोग में लिए बिना ऐसा ज्ञान केवल तोता-रटन्त के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । ज्ञान का सदुपयोग करना विवेक कहलाता है । ज्ञान यदि कोरा और किताबी है तो वह बँधनकारी है । जो ज्ञान व्यक्ति को मुक्त करदे वही वास्तविक ज्ञान (विवेक) है ।
“सा विद्या या विमुक्तये - ज्ञान वही है जो मनुष्य को मुक्त कर दे ।” (विष्णु पुराण - 1/19/41)
जिसने ज्ञान का उपयोग नहीं किया वह बद्धज्ञानी है और जिसने इसका सदुपयोग कर लिया वह मुक्तज्ञानी है । बद्धज्ञानी बातें तो लम्बी लंबी करेगा लेकिन उसका मुक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं होगा । मुक्तज्ञानी अव्वल तो बोलेगा ही नहीं और यदि बोला भी तो उसकी वाणी ब्रह्मज्ञान तक ले जाने वाली होगी क्योंकि उसने ज्ञान को जीया है, रटा नहीं ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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