ज्ञान - बंधन या मुक्ति
ज्ञान एक ऐसा शब्द है जो अपनी उपस्थिति, अभिव्यक्ति तथा आचरण के अनुसार अपना अर्थ बदलता रहता है । यही कारण है कि अज्ञान का अर्थ ज्ञान की अनुपस्थिति नहीं है बल्कि विपरीत ज्ञान होने को अज्ञान कहा जाता है । अज्ञान का अस्तित्व ज्ञान पर ही टिका है अन्यथा अज्ञान का स्वयं का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है । यह ठीक ऐसे ही है जैसे अंधकार स्वयं का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है बल्कि उसका अस्तित्व प्रकाश पर टिका होता है ।
वास्तविक ज्ञान वह है, जो मुक्ति का साधन बनता है और वह साधन तभी बनता है जब उसको आचरण में लाते हुए जीवन को उसी अनुरूप बनाया जाए । आचरण में लाया ज्ञान स्वयं बोलता है, व्यक्ति को बोलने की ज़रूरत नहीं होती । बिना उपयोग में लाए ज्ञान को बोझ कहा गया है । उपयोग में लाया ज्ञान कहें अथवा ज्ञान का सदुपयोग करना कहें, दोनों एक ही बात है । ऐसा सदुपयोग किया ज्ञान ही विवेक कहलाता है ।
ज्ञान सभी जीवों में जन्मजात होता है फिर भी कुछ जीवनभर अज्ञानी बने रह जाते हैं और कोई कोई एक ज्ञानी हो जाता है । कल से इसी “ज्ञान” विषय पर चर्चा को आगे बढ़ाते हुए जानेंगे कि ज्ञान बंधन नहीं है बल्कि मुक्ति का साधन है । हम इस ज्ञान को विवेक बनाकर कैसे उपयोग में ले सकते हैं, यह हमारे ऊपर निर्भर है ।
।। हरिः शरणम् ।।
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
No comments:
Post a Comment