ज्ञान -5
याज्ञवल्क्य की बात का प्रतिकार करने के लिए विदुषी गार्गी सामने आई । उसने उपस्थित सभी लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि मैं याज्ञवल्क्य जी से कुछ प्रश्न करूँगी । यदि उन्होंने उन प्रश्नों के उत्तर दे दिए तो फिर इस सभा में उपस्थित कोई भी इनको नहीं हरा सकेगा और वे इन गायों को लेने के अधिकारी होंगे ।
तत्पश्चात् गार्गी ने याज्ञवल्क्यजी से कई प्रश्न किए । इन प्रश्नोत्तरों का विस्तार से वर्णन बृहदारण्यक उपनिषद् में मिलता है । याज्ञवल्क्यजी से शास्त्रार्थ प्रारम्भ करते हुए गार्गी ने पूछा कि हे ऋषिवर ! क्या आप अपने को सबसे बड़ा ज्ञानी मानते हैं, जो आपने गायों को हांकने के लिए अपने शिष्यों को आदेश दे दिया ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर देते हुए कहा कि मां ! मैं स्वयं को ज्ञानी नहीं मानता क्योंकि ‘‘मैं सबसे बड़ा ज्ञानी हूँ” ऐसा कोई अज्ञानी ही कह सकता है । ये गौएँ सुबह से यहाँ खड़ी-खड़ी थककर परेशान हो गई हैं, इस कारण इन गायों को देखकर मेरे मन में मोह उत्पन्न हो गया है । उत्तर सुनकर गार्गी ने कहा कि आपको मोह हुआ, लेकिन इस पुरस्कार को प्राप्त करने के लिए यह तो कोई योग्य कारण नहीं है । सभी सभासदों की आज्ञा हो तो मैं आपसे कुछ प्रश्न पूछना चाहूंगी । यदि आप इनके संतोषजनक जवाब दे पाएंगे तो आप इन गायों को निश्चित ही ले जा सकते हैं ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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