ज्ञान -3
ज्ञान कहीं से उधार नहीं लेना पड़ता । हमारे भीतर ज्ञान पर्याप्त मात्रा में है जो अज्ञान से ढककर भीतर कहीं गहरे दबा पड़ा है । हम ज्ञान के नाम पर अज्ञान में जी रहे हैं । उस अज्ञान को ज्ञान कह देने से वह ज्ञान नहीं हो जाता । जब तक हम सीखे और सुने हुए ज्ञान को केवल किताबी बातें मानते रहेंगे, तब तक हमारा कल्याण नहीं हो सकता । उस ज्ञान के भीतर डुबकी लगाने से ही हमारा जीवन सुधरेगा अन्यथा केवल लच्छेदार बातें लिखते, कहते और सुनते ही रहेंगे ।
कबीर कहते हैं -
ब्राह्मण है गुरु जगत का, साधु का गुरु नाहीं ।
उलझ उलझ कर मरि रह्या, चारिउ वेदा माहीं ।।
ब्राह्मण ने चारों वेदों को पढ़ा है, उन्हें रट भी लिया हैं परंतु उन अनुसार उसने अपना जीवन नहीं बनाया है । वह अपने ज्ञान से संसार को प्रभावित कर सकता है परन्तु किसी साधु को नहीं । साधु ने भले ही वेद नहीं पढ़े हों, फिर भी उसका सहज जीवन ब्राह्मण के ज्ञान से भी बहुत ऊँचा है । इसलिए ज्ञान को केवल पढ़ने और रट लेने से कुछ नहीं होना है । यह केवल शास्त्रों में उलझ कर रह जाना है, इससे तो मुक्त नहीं हुआ जा सकता । मुक्त होने के लिए तो ज्ञान को जीना होता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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