ज्ञान -11
याज्ञवल्क्य आगे कह रहे हैं - “सुनो गार्गी, प्रकृति और पुरुष की यह लीला उनके आपसी सच्चे प्रेम का प्रतिफल है । हम सभी उसी प्रकृति और पुरुष के निःस्वार्थ प्रेम से ही उत्पन्न हुए हैं, फिर सत्य को खोजने में कैसी बाधा ?”
इन उत्तरों को सुनकर गार्गी पूर्णतः संतुष्ट हो जाती है और कहती है, ‘मैं अपनी पराजय स्वीकार करती हूँ ।’ याज्ञवल्क्य कहते हैं “इसमें जय-पराजय की बात ही नहीं है गार्गी ! प्रश्न पूछने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए क्योंकि प्रश्न पूछे जाते हैं, तभी उत्तर सामने आते हैं, जिनसे यह संसार लाभान्वित होता है ।”
प्रत्येक संवाद (वाद-विवाद नहीं) का अच्छा परिणाम निकल कर सामने आता है । इस शास्त्रार्थ से भी गार्गी और याज्ञवल्क्यजी, दोनों को लाभ हुआ । गार्गी से हुए शास्त्रार्थ के पश्चात् याज्ञवल्क्य जी अपने आश्रम पहुँच जाते हैं । उन्हें पूर्ण वैराग्य हो जाता है और वे समस्त सम्पति को अपनी दोनों पत्नियों में आधी-आधी बांटकर वन में प्रस्थान करना चाहते हैं । याज्ञवल्क्यजी के दो पत्नियाँ थीं - मैत्रेयी और कात्यायनी । मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी, जिसने अपने पति के साथ बैठकर आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया था । मैत्रेयी ने सम्पति का मिला अपना आधा भाग भी कात्यायनी को दे दिया और कहा कि मैं भी वन में जाऊँगी क्योंकि वह जानती थी कि बृह्मविद्या के सामने भौतिक सुख-सम्पति सब तुच्छ है । वृहदारण्यक उपनिषद् में मैत्रेयी का अपने पति के साथ हुए रोचक संवाद का वर्णन भी मिलता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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