Thursday, March 19, 2026

ज्ञान -12

 ज्ञान -12

        कात्यायनी तो एक सुशील गृहस्थ नारी थी, वह तो सम्पति पाकर संतुष्ट हो गई परंतु मैत्रेयी के भीतर संपत्ति और ब्रह्मज्ञान को लेकर बड़ा अंतर्द्वंद्व छिड़ गया । इस ऊहापोह में अटकी पत्नी को छोड़कर जब याज्ञवल्क्य वन को जाने लगे तो मैत्रेयी पूछ बैठी - ‘नाथ ! आपकी इस सम्पति की बात को छोड़ दीजिए, यदि मुझे सारे विश्व की सम्पति भी मिल जाए तो क्या मैं अमर हो सकती हूँ अर्थात् क्या मुझे उसको पाकर अमरता का अनुभव हो सकता है ?’ याज्ञवल्क्यजी का उत्तर था - ‘नहीं देवी, धन से अमरत्व प्राप्त नहीं होता ।’

            याज्ञवल्क्य कह रहे हैं - ‘पति, पत्नी, पुत्र, मित्र, धन आदि को हम इसलिए प्रिय मानते हैं क्योंकि उनसे हमें आत्मिक सुख मिलता है । जब हमें उनसे सुख मिलने की आशा समाप्त हो जाती है, उनसे प्रियता भी खो जाती है । इसका अर्थ है कि हम सर्वाधिक प्रेम स्वयं (आत्मा) से ही करते हैं । इसलिए केवल अपने आप (आत्मा) को ही जानने का प्रयास करो । आत्म-ज्ञान ही अमरत्व का एक मात्र मार्ग है । जब आत्मा का ज्ञान हो जाता है तो सब कुछ जान लिया जाता है । आत्म-ज्ञान से द्वैत भाव समाप्त हो जाता है, जैसे नमक जल में घुलकर अलग नहीं दिखता वैसे ही आत्मा ब्रह्म में एकाकार हो जाती है ।’

           मैत्रेयी इतना सब जानकार आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हो गई और भौतिक सम्पति को तुच्छ समझकर अपने पति के साथ वन में चली गई । इससे सिद्ध होता है कि गृहस्थ जीवन में भी आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हुआ जा सकता है । अतः गृहस्थ जीवन को बाधा न समझें बल्कि एक अच्छा अवसर जानें ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

हरिः शरणम् ।।

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