Friday, March 20, 2026

ज्ञान -13

 ज्ञान -13

           घर-संसार छोड़ देने से आत्म-ज्ञान हो ही जाएगा आवश्यक नहीं है परन्तु आत्म-ज्ञान हो जाने से घर-संसार स्वतः छूट जाएगा, यह पक्की बात है । इसका अर्थ है कि यदि गृहस्थ जीवन में रहते हुए ज्ञान का सदुपयोग किया जाए तो मुक्त हुआ जा सकता है । गृहस्थ जीवन में आसक्त होकर जीना ही बंधन है । प्राचीन समय में अनेकों ऋषि-मुनि भी गृहस्थ होते हुए भी अनासक्त होकर मुक्ति को उपलब्ध हुए हैं । गृहस्थ आश्रम केवल उन्हीं के लिए बन्धन है जो आपस में एक दूसरे से स्वार्थ के कारण बंधे हैं । जहां पर भी थोड़ी सी ठेस स्वार्थ की पूर्ति में लगती है कि परिस्थितियां बदल जाती है । इन परिस्थितियों के कारण ही जीवन-गाड़ी के दोनों पहिए आपसी संतुलन क़ायम नहीं रख पाते और गाड़ी लड़खड़ा जाती है ।

              प्रेम में समरसता होती है, स्वार्थ नहीं । जहां पर स्वार्थ आड़े आ जाता है, समरसता नहीं रह पाती और प्रेम खो जाता है । गृहस्थ जीवन में दोनों पक्षों की समरसता ही दोनों के भेद को समाप्त कर देती है जिससे उनके दो होने का अनुभव ही समाप्त हो जाता है । फिर वे दो होते हुए भी एक होना प्रतीत होते हैं । ऐसी समरसता तभी आ सकती है, जब जीवन में केवल किताबी ज्ञान को ही महत्व न मिले बल्कि उस ज्ञान के अनुसार अपना जीवन बना लें । ज्ञान को जीवन में उतार लेना ही विवेक है । विवेकपूर्ण जीवन ही व्यक्ति के कल्याण का मार्ग खोलता है । चाहे हम किसी भी आश्रम में यात्रा कर रहे हों, जीवन को विवेकपूर्ण ढंग से जीना ही आत्म-साक्षात्कार करा देता है ।             

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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