Monday, April 27, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....8

 ज्ञान उदय जब होत है …..8

        समय पाकर संत का बुलावा आ गया । अब कुटिया में उनका शिष्य अकेला ही रह गया । अपने गुरु के चले जाने पर वह शिष्य ही सन्त हो गया । उस नए संत ने भी अपना एक शिष्य बना लिया । इस प्रकार उस कुटिया में संत और शिष्य, दोनों बड़े आराम से रहने लगे । कुटिया भी यथा स्थान थी और वह तालाब भी । तालाब में मछलियाँ और मछलियों का शिकार करने यदा कदा बगुलों का आ धमकना, पूर्व की भाँति चलता रहा । समय भले ही परिवर्तित हो गया हो, परन्तु उस स्थान पर वातावरण पूर्व की भाँति ही बना हुआ था । प्रकृति में बदलाव की गति धीमी होने के कारण तेज़ी से परिवर्तित होने वाला जीव उसी को स्थाई मान लेता है । 

          संत तो चले गए । किसी एक के चले जाने से जगत् की गति रुक नहीं जाती । हम अपने जीवन में सोचते हैं कि हमारे जाने से संसार में एक रिक्तता आ जाएगी परन्तु प्रकृति में परिवर्तन भले ही कितना ही हो जाए, उसमें रिक्तता आना असंभव है । परिवर्तन भी मात्र इतना ही होता है कि पिता के चले जाने पर पुत्र ही पिता बनकर उस रिक्तता को भर देता है, जैसे कि कुटिया से गुरु के चले जाने पर शिष्य ही गुरु बन गया था और उसके पास भी एक नया शिष्य आ गया था ।

            संसार का यही नियम है, इधर एक जाता है तो उधर दूसरा जन्म ले रहा होता है । इसी भांति संसार चक्र सतत गतिमान बना रहता है । हम सोचते हैं कि सब जा रहे हैं, मेरा अभी जाने का समय नहीं आया है । उसको यह पता नहीं है कि वह अभी ही नहीं बल्कि कभी भी जा सकता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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