ज्ञान उदय जब होत है …..6
कल जो कुछ मैंने लिखा था, उस पर कई प्रतिक्रियाएँ आई हैं, उनसे पता चलता है कि संभवतः वह बात कइयों के गले नहीं उतरी है । मैंने लिखा है - ‘प्रत्येक कर्म (क्रिया) का परिणाम तो लगभग हमारी सोच के अनुरूप मिल सकता है परन्तु उस कर्म की प्रतिक्रिया क्या होगी और उसका फल क्या मिलेगा, उससे हम सदैव अनभिज्ञ बने रहते हैं । यही कर्मों की गति है ।’
शंका उठनी स्वाभाविक है; क्योंकि हम कर्म को अपने को प्राप्त होने वाले फल तक ही सीमित मानकर बैठे हैं । यह सोच मृषा है । अपने लिए किए जाने वाले कर्म से (सकाम कर्म से) केवल कर्ता ही प्रभावित नहीं होता बल्कि सारी कायनात प्रभावित होती है । हम कर्म का फल पाकर सुखी-दुःखी हो सकते हैं परन्तु हमारे कर्म के परिणाम से कितने जीव सुखी-दुःखी हुए होंगे, इस बारे में हम सदैव अनभिज्ञ बने रहते हैं । हमारा कर्मफल केवल हमारे तक ही सीमित नहीं रहता वह दूसरों तक भी पहुँचता है । फिर उस कर्मफल की जो दूसरों में प्रतिक्रियाऐं होगी, उसका परिणाम भी हमें ही भुगतना होगा ।
आधुनिक विज्ञान भी कहता है कि छोटा सा एक जीव जैसे मधुमक्खी भी यदि हमारे कर्म के कारण तड़पती है तो उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप सुनामी तक आ सकती है । आज जो हम प्रकृति का विनाश करने पर उतारू हैं, उसकी प्रतिक्रिया में हमें अतिवृष्टि, भूकम्प, बाढ़, सूखा और न जाने कौन कौन से परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं और आगे भी न जाने कितने भुगतने होंगे । हमारे द्वारा किया गया प्रत्येक कर्म केवल एक फल ही देकर समाप्त नहीं होगा बल्कि उसकी प्रतिक्रिया का वह फल भी भुगतने के लिए भी तैयार रहना होगा, जिसका भविष्य में इस जन्म में नहीं तो आगे किसी जन्म में हमें मिलना निश्चित है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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