ज्ञान - मुक्ति का मार्ग
‘ज्ञान - बंधन या मुक्ति’ लेख से स्पष्ट हो जाता है कि यदि ज्ञान का सदुपयोग किया जाए तो वह मुक्ति के द्वार खोल देता है । ज्ञान वह साधन है जो साधक को साध्य का अनुभव करा सकता है । मनुष्य की सबसे बड़ी विडम्बना है कि वह ज्ञान का सदुपयोग नहीं कर पा रहा है । प्रत्येक मनुष्य में ज्ञान जन्मजात होता है , बस वह केवल अज्ञान के नीचे दबा पड़ा रहता है । जिस प्रकार प्रत्येक पत्थर में मूर्ति छिपी रहती है और अवांछित पत्थर को हटा दिया जाये तो मूर्ति प्रकट हो जाती है वैसे ही अज्ञान से मुक्त होते ही ज्ञान प्रकाशित होने लगता है ।
अज्ञान के हटते ही भीतर ज्ञान का उदय हो जाता है । यह अज्ञान कैसे हटाया जा सकता है ? ज्ञान जाग्रत हो जाने से साधक जीवन्मुक्त हो जाता है ? क्या साधक के लिए केवल मुक्ति ही पर्याप्त है अथवा फिर भी कोई कमी शेष रह जाती है ? आइए! ऐसे ही ज्ञान से सम्बन्धित कुछ प्रश्नों के उत्तर जानते हुए भक्ति तक पहुंचने का प्रयास करते हैं ।
ज्ञान से भक्ति अथवा भक्ति से ज्ञान, दोनों कथन ही सही हैं । यह हमारे स्वभाव (प्रकृति) पर निर्भर करता है कि हम किस मार्ग के योग्य हैं । ज्ञान मुक्ति का दाता है जबकि भक्ति प्रेम की । मुक्ति शान्ति प्रदान कर सकती है परन्तु संतुष्टि तो प्रेम से ही मिलती है । हम इस लेख ‘मुक्ति अथवा भक्ति’ के माध्यम से यह जानने का प्रयास करेंगे कि ज्ञान और भक्ति, दोनों ही हमारे जीवन में कैसे उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं ?
ज्ञान से मुक्ति की अवस्था को प्राप्त हुआ जा सकता है, इस बात में किसी प्रकार का कोई संदेह नहीं है । क्या जीवन में मुक्त हो जाना ही पर्याप्त है अथवा उससे आगे भी कोई और यात्रा हो सकती है ? ज्ञान जीवन्मुक्त कर देता है क्योंकि ज्ञान अभाव को नष्ट कर देता है और भाव (सत् ) तक पहुंचा देता है । जीवन्मुक्त हो जाने के उपरान्त भी जिस बात की कमी शेष रह जाती है वह है, प्रेम । प्रेम को उपलब्ध होने के लिए ज्ञान को पीछे छोड़ते हुए उससे भी आगे बढ़ना पड़ता है । मैं तो यहाँ तक कहता हूँ की प्रेम के लिए तो अर्जित किए हुए समस्त ज्ञान को भूलकर ही आगे बढ़ना होता है । इसका अर्थ यह नहीं है कि ज्ञान की उपयोगिता नहीं है बल्कि इससे अर्थ है ज्ञानी होने के अहंकार को समाप्त करना । एक बार हुआ ज्ञान कभी विस्मृत नहीं होता । ज्ञान को विस्मृत कर देना तो अज्ञान में डूब जाना है ।
हमने ज्ञान से जो कुछ जाना है, वह जब उपयोग में लिया जाता है तब विवेक प्रकट होता है । विवेक ही जीवन में शान्ति और प्रेम की यात्रा करवाता है । ज्ञान से सबकुछ जानकर मुक्त तो हुआ जा सकता है परन्तु प्रेमरस से सरोबार होने के लिए उस ज्ञान को जीवन में उतारकर उसे अनुभव करना आवश्यक है ।
प्रसिद्ध कवि स्व. गया प्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ की एक कविता ‘स्वदेश’ है जिसमें वे कहते हैं -
जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं ।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं ।।
मनुष्य भावों से भरा है परन्तु सांसारिक उलझनों में घिर कर वह अभाव की स्थिति तक पहुंच गया है । पुनः भावपूर्ण स्थिति को प्राप्त करने के लिए उसे ज्ञान अर्जित करते हुए प्रेम की अवस्था तक पहुंचना ही होगा ।
विवेचन से स्पष्ट है कि ज्ञान का जब प्रेम में जाकर समापन होता है तभी व्यक्ति भावपूर्ण अवस्था को प्राप्त होता है । संसार में अनेकों जीव है, सभी सांसारिक पदार्थों की आसक्ति में आकण्ठ डूबे हुए है । अन्य जीवों की बात को तो छोड़ दें, मनुष्य जैसा विवेकवान जीव भी इन आसक्तियों से कहां मुक्त हो पाया है ? पदार्थों की आसक्तियों में डूबा मनुष्य बंधा हुआ है, संसार के साथ । इन सांसारिक बंधनों से मुक्त होने के लिए उसे अपने ज्ञान को सतह पर लाना होगा जो अभी अज्ञान की असंख्य पर्तों के नीचे दबा पड़ा है । जीवन में ज्ञान कैसे उतरेगा, जानने के लिए हमें एक दृष्टि अपने अज्ञान पर डालनी होगी ।
अज्ञान से ज्ञान प्राप्ति की यात्रा में आगे बढ़ने से पहले हमें अज्ञान को जानना चाहिए । अज्ञान का अर्थ ज्ञान की अनुपस्थिति मात्र नहीं है बल्कि जन्म-जन्मांतरों से चली आ रही मूढ़ता ही इस अज्ञान का कारण है । अज्ञान की दृढ़ता हो जाने से ज्ञान उसके नीचे दब जाता है । इसका कारण है- ‘देही को विस्मृत कर देह को ही सब कुछ समझ लेना ।’ यह जड़ देह एक पदार्थ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । वास्तव में देह की सत्ता है ही नहीं । देह तो जड़ है, इसे सुख-दुःख का अनुभव नहीं होता, परन्तु साथ ही यह भी सत्य है कि सुख -दुःख का अनुभव तो फिर होता है । प्रश्न है कि सुख-दुःख का अनुभव शरीर नहीं करता तो फिर कौन करता है ? देहाभिमानी जीवात्मा ही अविवेक के कारण सुखी-दुःखी होता है ।
जैसे घर का मालिक घर में रहते हुए विभिन्न प्रकार की चेष्टाएं करता है परन्तु उसका घर कुछ भी नहीं करता । उसी तरह शरीर में आसक्त होकर जीवात्मा ही विविध चेष्टाएं करता है, शरीर कुछ भी नहीं करता । शरीर तो इन चेष्टाओं को प्रकट रूप देने का माध्यम मात्र है । इन्हीं चेष्टाओं (कर्मों) के कारण जीवात्मा ही सुखी-दुःखी होता है । संसार को दुखालय कहा जाता है क्योंकि अनुभव किया गया प्रत्येक सुख भी अल्प समय पश्चात् दुःख में बदल जाता है । इस दुःख को स्वयं में अनुभव करने का कारण हमारा अज्ञान है । इस अज्ञान के कारण ही जीवात्मा कर्ता और भोक्ता बनता है अन्यथा मूलतः तो उसकी ‘न करोति न लिप्यते’ की अवस्था है ।
रेशम का कीड़ा अण्डे से बाहर निकलकर लार्वा बनता है और फिर प्यूपा की अवस्था में आते हुए अपनी लार से रेशम की डोर बनाकर अपने चारों ओर लपेट लेता है, जिसमें वह सुरक्षित रहकर पूर्ण रूप से विकसित होता है । इस प्रकार वह रेशम की डोर से निर्मित कोष में वह बन्धन को प्राप्त होता है । शरीर के पूर्ण रूप से विकसित होते ही डोर को काटकर उसे बाहर निकलना होता है परन्तु यह रेशम का बन्धन ही उसे मृत्यु की ओर ले जाता है । इसी प्रकार जीव भी रेशम के कीड़े की तरह शरीर के सुख की चाहना से विभिन्न बंधनों (घर, जन आदि) में बंध जाता है और जीवनभर छटपटाता रहता है । कितना ही प्रयास कर ले, वह इस बंधन से मुक्त नहीं हो पाता । इस बन्धन को मन से स्वीकार कर लेना ही हमारा अज्ञान है ।
परमात्मा ने जीवों की रचना ‘आनन्द’ को अनुभव करने के लिए की परन्तु जीव आनन्द की खोज में न लग कर सांसारिक पदार्थों से सुख प्राप्त करने की खोज में लग गया । सांसारिक सुख आनन्द की एक छद्म अनुभूति मात्र है, वह आनन्द नहीं है । पदार्थों से प्राप्त होने वाले सुख को जीवन का लक्ष्य बना लेना ही हमारा अज्ञान है ।
यह अज्ञान कैसे हमारे जीवन में धीरे-धीरे गहरे में उतरता जाता है ? इसका विवरण हमारे शास्त्रों में विस्तार से मिलता है । परमात्मा से चला जीव कैसे अज्ञान के अंधकार में डूबता जाता है, इसको समझने के लिए शास्त्रों में अज्ञान की सात अवस्थाएं/भूमिकायें बतलाई गई है ।
अज्ञान की कुल सात भूमिकाएं है जिसके आधार पर वह जीव में दृढ़ता से स्थित रहता है । ये सात भूमिकाएं (अवस्थाएं) हैं - बीज-जाग्रत, जाग्रत, महाजाग्रत, जाग्रत-स्वप्न, स्वप्न, स्वप्न-जाग्रत और सुषुप्ति । ये सात भूमिकाएं अज्ञान के सात भेद हैं अर्थात् इनको अज्ञान की सात अवस्थाएं भी कहा जा सकता है । ये सातों भेद एक- दूसरे से संयुक्त होकर अलग अलग अनेकों नाम धारण करते हैं ।
महासर्ग के आदि में परमात्मा से जो प्रथम व्यष्टि चेतन प्रकट होता है वह भविष्य में होने वाले ‘चित्त’ और ‘जीव’ अर्थों के रूप में एक होकर ‘जाग्रत’ अवस्था के बीज रूप में स्थित होता है क्योंकि वह महाप्रलय के समय भी परमात्मा में बीज रूप से ही था । इसलिए अज्ञान की इस अवस्था को बीज-जाग्रत अवस्था कहा जाता है । यह अज्ञान की प्रथम अवस्था है ।
यह नवजात बीज जब ‘यह देह मैं हूँ’, ‘यह देह मेरे लिए है’ और ‘ये संसार के सभी पदार्थ मेरे द्वारा भोगने के लिए बने हैं’, ऐसी जो भीतर प्रतीति होती है, वह अज्ञान की ‘जाग्रत’ अवस्था है । यह देह मैं हूँ, यह मेरे लिए है, सब भोग्य पदार्थ मेरे हैं, ऐसी प्रतीति उत्पन्न होने के पश्चात् कई जन्मों के अभ्यास से यह प्रतीति दृढ़ होती जाती है । यह दृढ़ प्रतीति जब स्फुरित होती है, तब यह अज्ञान की ‘महाजाग्रत’ अवस्था कहलाती है । जाग्रत पुरुष का जो जगत् के ही तुल्य मनोराज्य होता है, वह अज्ञान की ‘जाग्रत-स्वप्न’ अवस्था कहलाती है ।
नींद के समय जो स्वप्न देखा गया है, जागने के पश्चात् अनुभव में आई हुई बातों के विषय में जो प्रतीति होती है, वह अज्ञान की ‘स्वप्न’ अवस्था है । स्वप्न को ही सत्य समझ लेना, हमारा अज्ञान नहीं तो और क्या है ? चिरकाल तक स्वप्न में डूबे रहने के बाद सुदृढ़ अभिनिवेश (मृत्यु से भय) या चिरस्थायित्व की कल्पना से पुष्ट हो जगत् भाव को प्राप्त हुआ स्वप्न महाजाग्रत की समता प्राप्त कर लेता है । प्रत्येक मनुष्य (जीव) अपने शरीर के मोह में इतना अधिक बंधा हुआ है कि वह शरीर के मरने को ही अपना मरना मानने लगता है । यही कारण है कि उसे सदैव मृत्यु का भय सताता रहता है । छोटे से छोटा जीव भी अपने शरीर की मृत्यु से बचना चाहता है ।
यह शरीर मरणधर्मा है । जिसने इस धरा पर शरीर धारण किया है, उसे एक न एक दिन यह शरीर छोड़ना ही होगा । मृत्यु का भय (अभिनिवेश) इस शरीर को बचाने की जुगत मात्र है । इस अवस्था को प्राप्त हुआ स्वप्न ‘स्वप्न- जाग्रत’ माना गया है । यह अज्ञान की छठी अवस्था है । अज्ञान की इन छः अवस्थाओं का परित्याग करने पर जीव की जो जड़ अवस्था (अपने आपको संसार का मान लेना) है, वही दुःखों का बोध कराने वाली अज्ञान से संपन्न ‘सुषुप्ति’ अवस्था कही गई है । इस अवस्था से मुक्त होने के लिए ज्ञान ही एकमात्र साधन है । अज्ञान की इन अवस्थाओं का विस्तार से वर्णन योगवासिष्ठ में मिलता है ।
जिस प्रकार योगवासिष्ठ के उत्पत्ति-प्रकरण में अज्ञान की सात भूमिकाएं बताई गई है उसी प्रकार निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) में ज्ञान की भी सात भूमिकाएं बतलाई गई हैं । ये सात भूमिकाएं है - शुभेच्छा, विचारणा, तनुमानसा, सत्वापत्ति, असंसक्ति, पदार्थाभावना और तुर्यगा । इनमें पहले की तीन भूमिकाएँ (शुभेच्छा, विचारणा और तनुमानसा) ज्ञान प्राप्ति से पहले की है जबकि अगली चार (सत्वापत्ति, असंसक्ति, पदार्थाभावना और तुर्यगा) जीवन्मुक्ति की अवस्थाएं हैं ।
योगवासिष्ठ में वसिष्ठ मुनि भगवान श्रीराम को उपदेश देते हुए कह रहे हैं -
शास्त्रसज्जनसम्पर्कै: प्रज्ञामादौ विवर्धयेत् ।
प्रथमा भूमिकैषोक्ता योगस्यैव च योगिन: ।।
विचारणाद्वितीया स्यातृतीयाऽसंगभावना ।
विलापनी चतुर्थी स्याद्वासनाविलयात्मिका ।।
शुद्धसंविन्मयानन्दरूपा भवति पञ्चमी ।
अर्धसुप्तप्रबुद्धाभो जीवनमुक्तोऽत्र तिष्ठति ।।
स्वसंवेदनरूपा च षष्ठी भवति भूमिका ।
आनन्दैकघनाकारा सुषुप्तसदृशस्थिति: ।।
तूर्यावस्थोपशान्ताथ मुक्तिरेवेह केवलम् ।
समता स्वच्छता सौम्या सप्तमी भूमिका भवेत् ।।
(योगवासिष्ठ - निर्वाण प्रकरण पूर्वार्ध - सर्ग 120/1-5 )
ज्ञान की ये सात भूमिकाएं (अवस्थाएं) आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग हैं, जो शुभेच्छा से प्रारंभ होकर तुर्यगा अर्थात् परम आनन्द की स्थिति तक जाती है ।
ज्ञान की जो सात भूमिकाएँ (शुभेच्छा, विचारणा, तनुमानसा, सत्वापत्ति, असंसक्ति, पदार्थाभावना और तुर्यगा) बताई गई हैं, वे ज्ञान प्राप्ति की सात अवस्थाएं अर्थात् सात सोपान है । प्रथम सोपान से उत्तरोत्तर आगे बढ़ता हुआ मनुष्य पूर्ण ज्ञान को प्राप्त होना होता है । आइए ! जानते हैं कि प्रत्येक अवस्था अपनी संपन्नता को कैसे प्राप्त होती है ?
प्रथम अवस्था है - शुभेच्छा अर्थात् सद्भावना । इस अवस्था को उपलब्ध होने के लिए ‘श्रवण’ महत्वपूर्ण है । इस सोपान पर खड़े व्यक्ति को सबसे पहले शास्त्रों और संतों की संगति से अपनी बुद्धि शुद्ध और तीक्ष्ण करनी होती है । यह योगी के योग की पहली भूमिका है ।
दूसरी अवस्था है - विचारणा अर्थात् सही विचार । इस अवस्था को उपलब्ध होने के लिए सुने/पढ़े हुए पर ‘मनन’ करना होता है । इससे सच्चिदानन्द ब्रह्म के स्वरूप का निरंतर चिंतन होगा । संतों और शास्त्रों के सानिध्य से जो कुछ सुना है/पढ़ा है, उस पर मनन करना ।
तीसरी अवस्था है -तनुमानसा अर्थात् सूक्ष्म मन । इस अवस्था को उपलब्ध होने में ‘निदिध्यासन’ की भूमिका है । निदिध्यासन का अर्थ है - संसार से असंग होकर परमात्मा के ध्यान में नित्य स्थित रहना ।
उपरोक्त तीनों ज्ञान प्राप्ति से पूर्व की तैयारी की अवस्थाएं हैं । मनुष्य स्वयं को ज्ञान मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए तैयार कर रहा है । आगे की चार अवस्थाएं ज्ञान प्राप्ति में उत्तरोत्तर हो रही प्रगति को व्यक्त करती है ।
ज्ञान प्राप्त होने की निम्न चार अवस्थाएं (चौथी से सातवीं) हैं -
चौथी अवस्था है - सत्वापत्ति अर्थात् सत्व की प्राप्ति । इसको ‘विलापनी’ भी कहा जाता है । इस सोपान पर आते-आते वासना का अत्यन्त अभाव हो जाता है । इस चौथी भूमिका में ब्रह्म-साक्षात्कार से अज्ञान आदि सांसारिक प्रपञ्च की निवृत्ति हो जाती है ।
पांचवी अवस्था है - असंसक्ति अर्थात् आसक्ति रहित होना । आसक्ति रहित होने से पुरुष को समस्त संसार स्वप्नवत् प्रतीत होता है । इस अवस्था में जीवन्मुक्त पुरुष अर्द्धनिद्रा अर्थात् ‘आधा सोया और आधा जागा’ की अवस्था में रहता है । अर्धसुप्त पुरुष को संसार की जैसी प्रतीति होती है वैसी ही प्रतीति इस ‘ब्रह्मवित’ पुरुष को होती है । यह विशुद्ध चिन्मय आनन्दस्वरूप प्राप्ति की पांचवी भूमिका है ।
छठी अवस्था है - पदार्थ अभावना अर्थात् पदार्थों (संसार) का अभाव । इस सोपान पर पहुँचने पर पुरुष को एक विज्ञानानन्दघन परमात्मा का ही अनुभव रहता है, संसार का कुछ भी अनुभव नहीं रहता । इस अवस्था को ‘तुर्यावस्था’ भी कहा जाता है । यह शान्तिमय अवस्था है ।
सातवीं अवस्था है - तुर्यातीत अवस्था । यह विदेह-मुक्ति रूप अवस्था है । इस सोपान पर पहुंचकर पुरुष स्वयं अपनी देह को भी भूल जाता है । यह अवस्था समता, स्वच्छता और सौम्यतारूप है । इस भूमिका में स्थित योगी को ‘ब्रह्मविद् वरिष्ठ’ कहते हैं । यह गाढ सुषुप्ति की अवस्था है । इसमें संसार का अत्यन्त अभाव हो जाता है । छठी अवस्था (तुर्यावस्था) में तो योगी को दूसरे द्वारा जगाये जाने पर प्रबोध होता है किन्तु इस सातवीं भूमिका (तुर्यातीत/तुर्यगा) में स्थित योगी दूसरे के द्वारा जगाये जाने पर भी नहीं जागता क्योंकि वह जीता हुआ भी शव के समान है अर्थात् विदेह की अवस्था को उपलब्ध हो चुका है ।
प्रथम तीन अवस्थाएं ज्ञान प्राप्ति से पूर्व की अवस्थाएं है, इसलिए जगत् रूप ही है । चौथी अवस्था स्वप्नावस्था है क्योंकि उसमें जगत् स्वप्नवत् प्रतीत होता है । पांचवी अवस्था अर्ध-सुषुप्ति की अवस्था है । इस अवस्था में आनन्द के साथ एकात्मभाव रहता है । अन्य पदार्थों के ज्ञान से सर्वथा रहित हो जाने से छठी भूमिका को ‘तुर्य’ कहा जाता है । इससे आगे की अंतिम अवस्था (तुर्यातीत) है । यह अवस्था मन और वाणी से परे है तथा स्वप्रकाश परब्रह्मरूप ही है ।
सातवें सोपान तक पहुंचा पुरुष वासनारहित हो जाता है । वासनारहित बुद्धि से जो भी कर्म किए जाते हैं, वे कर्म भूने हुए बीज के सदृश होते हैं । वे फिर अंकुरित नहीं होते अर्थात् भावी जन्म देने वाले नहीं होते ।
जो पुरुष सातवीं अवस्था तक पहुँच जाता है, वह स्वयं ही ब्रह्म स्वरूप जो जाता है । भगवान गीता में अर्जुन को इस सोपान तक पहुँचे हुए पुरुष के बारे में कहते हैं -
ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति ।
सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ।। 18/54 ।।
वह ब्रह्मभूत बना हुआ प्रसन्न मन वाला न तो किसी के लिए शोक करता है और न ही किसी की इच्छा करता है । ऐसा सम्पूर्ण प्राणियों में समभाव वाला साधक मेरी पराभक्ति को प्राप्त हो जाता है ।
ब्रह्मभूत होने का अर्थ है, ब्रह्म के साथ तात्त्विक सम्बन्ध हो जाना । ब्रह्मभूत ब्रह्म तो नहीं होता परन्तु ब्रह्म के समान हो जाता है । ज्ञान की यह सर्वोच्च अवस्था है, जोकि मुक्ति की अवस्था भी है । भगवान गीता के सातवें अध्याय में ज्ञानी भक्त को सर्वश्रेष्ठ बताते हुए कहते हैं कि ‘ज्ञानीत्वात्मैव मे मतम्’ अर्थात् मेरे मत में ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है ।
अब तक हुए विवेचन से आपको भी अनुभव हुआ होगा कि ज्ञान मार्ग से ज्ञान की उच्चावस्था (परमात्मा) तक पहुंचने के लिए कितना तामझाम करना पड़ता है । ज्ञान-मार्ग सुगम नहीं है । यही कारण है कि साधक की बीच रास्ते ही इससे विमुख होने की सम्भावना रहती है । मानस में काकभुशुण्डिजी गरुड़ज़ी को कहते हैं -
ग्यान पंथ कृपान कै धारा । परत खगेस होइ नहीं बारा ।।
जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई । सो कैवल्य परम पद लहई ।। मानस -7/119/1।।
ज्ञान-मार्ग कृपाण की धार पर चलने के समान है । इससे गिरते देर नहीं लगती । जो इस पंथ को बिना किसी बाधा के निभा ले जाता है वही कैवल्य पद को प्राप्त कर लेता है । प्रायः इस मार्ग में बाधाएँ आती ही हैं क्योंकि जन्म-जन्मों के संस्कारों से मुक्त होना इतना सरल नहीं है । ज्ञान का अहंकार, देहाभिमान और संसार से पूर्ण रूप से विमुख न हो पाना इसमें सबसे बड़ी बाधायें हैं ।
ज्ञान हमें ज्ञानस्वरूप परमात्मा तक ले जाता है । इससे ज्ञानी मुक्त तो हो जाता है, परन्तु परमात्मा का प्रेम पाने के लिए उसे भक्ति में प्रवेश करना ही होगा । ज्ञान का मार्ग कठिन है, इसकी तुलना में भक्ति का मार्ग बड़ा सरल और सुगम है । सभी मार्गों में भक्ति-मार्ग सबसे सुगम मार्ग है । भक्ति में केवल परमात्मा के अतिरिक्त किसी अन्य के आश्रय और किसी प्रकार के परिश्रम की आवश्यकता ही नहीं है ।
भागवतजी में भक्त प्रह्लाद भक्ति के नौ भेद बताते हुए अपने पिताजी को कह रहे हैं -
श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पादसेवनम् ।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ।। भागवत - 7/5/23 ।।
भगवान की भक्ति के नौ भेद हैं - भगवान की गुण-लीला, नाम आदि का श्रवण, उन्हीं का कीर्तन, उनके रूप-नाम आदि का स्मरण, उनके चरणों की सेवा, पूजा-अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन ।
भक्त प्रह्लाद ने भक्ति के जो नौ भेद बताए है, उनमें से किसी एक को भी जीवन में सिद्ध कर लिया जाये तो भक्ति को उपलब्ध हुआ जा सकता है । इन नौ प्रकार की भक्ति को नवधा-भक्ति कहा जाता है ।
भागवतजी में ज्ञान और वैराग्य को भक्ति के पुत्र बताया गया है । भक्ति इन दोनों की मां है अर्थात् ज्ञान और वैराग्य का जन्म भक्ति की कोख से ही हुआ है । इसका अर्थ है कि जिसमें भक्ति का संचार हुआ है उसमें ज्ञान और वैराग्य का आगमन स्वतः ही हो जाता है । उसे अतिरिक्त परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं होती ।
ज्ञान से वैराग्य पैदा होता है और वैराग्य से कर्म-योग सिद्ध होता है । कर्म और ज्ञान-योग के सिद्ध होते ही जीव में भक्ति का उदय हो जाता है; परंतु इस मार्ग में परिश्रम और समय अधिक लगता है । परिश्रम के लिए शरीर और संसार का आश्रय लेना पड़ता है, जिससे मुक्ति के बाद भी आंशिक रूप से बंधन में बंधे रहने की संभावना बनी रहती है । इस बंधन का कारण होता है, ज्ञान का अहंकार, संसार में अन्यों से अपने आपको श्रेष्ठ मान लेने का अभिमान ।
भक्ति में ऐसा बिलकुल भी नहीं है । भक्ति में केवल परमात्मा का आश्रय लेना होता है जिससे संसार और शरीर से स्वतः मुक्ति हो जाती है । भक्ति में अहंकार का कोई स्थान नहीं रहता क्योंकि जब सब कुछ परमात्मा ही है तो कौन तो श्रेष्ठ है और वह किससे श्रेष्ठ होगा ? यही बात मुक्ति (ज्ञान) पर भक्ति को वरीयता प्रदान करती है ।
विवेचन की दृष्टि से मुक्ति पर भक्ति भारी पड़ती दिख रही है क्योंकि भक्ति में मुक्ति भी है और परमात्मा से/का प्रेम भी । ज्ञान का अंतिम लक्ष्य केवल संसार से मुक्त होकर परमात्मा में विलीन हो जाना है । इसलिए ज्ञान को मुक्ति का मार्ग तो कहा जाता है परंतु इसमें भगवान का प्रेम उपलब्ध नहीं होता । अद्वैत सिद्धांत को मानने वाले के लिए ज्ञान-मार्ग ही सही मार्ग है । परन्तु इसमें दो की उपस्थिति (एक ज्ञानी और दूसरा ज्ञेय) तब तक बनी रहती है, जब तक कि भौतिक शरीर गिर नहीं जाता । परमात्मा में विलीन होने के पश्चात् ही एक रहता है, उससे पहले नहीं ।
प्रेम करने/पाने के लिए दो का होना आवश्यक है - एक प्रेम करने वाला और दूसरा प्रेम पाने वाला । इसलिए द्वैत सिद्धान्त में विश्वास करने वालों के लिए भक्ति-मार्ग को श्रेष्ठ बताया गया है, एक भक्त और दूसरा भगवान । वास्तव में भक्ति-मार्ग अंततः अद्वैत को ही पुष्ट करता है क्योंकि भक्त की दृष्टि में एक भगवान के अतिरिक्त कोई दूसरा होता ही नहीं है । ऐसी भक्ति में आख़िर द्वैत कहाँ तक टिक पाएगा ?
भक्ति में जो एक होकर फिर से दो हुआ जाता है वह परमात्मा को प्रेम करने के लिए तथा उससे प्रेम पाने के लिए होता है न कि द्वैत सिद्धांत के अनुसार । चने के बीज की तरह, आधे-आधे दोनों भाग, एक दूसरे से अभिन्न, मूल स्थान से जुड़कर एकाकार हुए । भक्त और भगवान एक दूसरे से भिन्न प्रतीत होते हुए भी वास्तव में अभिन्न हैं ।
मेरी दृष्टि में आज के समय में ज्ञान को अधिक महत्व दिया जा रहा है इसलिए ज्ञान-मार्ग पर चलते हुए भक्ति को उपलब्ध होना ही श्रेष्ठ है । मेरा अनुभव यही कहता है कि बिना भक्ति के ज्ञान अकेला मूल्यहीन है ।
ज्ञान और भक्ति की इस चर्चा में कर्म विषय पर बात नहीं की जाए तो अपूर्णता रहेगी । गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने ज्ञान और कर्म-मार्ग में कुछ भी अंतर नहीं माना है । दोनों को ही लौकिक बताया है, जबकि भक्ति को अलौकिक । कर्म में ज्ञान और ज्ञान में कर्म, दोनों एक दूसरे के सहयोगी है और दोनों ही परमात्मा की ओर ले जाने वाले हैं ।
कर्म-योग में सेवा के लिए कर्म करते हुए राग अर्थात् आसक्ति को समाप्त करना होता है । ज्ञान में प्रकृति से सम्बन्ध विच्छेद करते हुए वैराग्य को उपलब्ध होना है । राग अर्थात् संसार और उसके पदार्थों से आसक्ति समाप्त होना ही वैराग्य है जिससे मनुष्य संसार से मुक्त हो जाता है । जब तक जीव को ज्ञान नहीं होता तब तक कर्म-रहस्य को वह समझ नहीं पाएगा । एक बार कर्मों का स्वरूप समझ में आ गया तो कर्म-योग के माध्यम से संसार की सेवा होगी और ज्ञान-योग से वैराग्य का जन्म होगा ।
मुख्य बात जो इस लेख में हुई विवेचना से निकल कर सामने आई है, वह यह है कि ज्ञान श्रेष्ठ है परन्तु यदि ज्ञान से भक्ति को उपलब्ध हो जाएं तो वह मार्ग सर्वश्रेष्ठ है । मुक्ति और भक्ति, दोनों में से किसी एक को चुनना हो तो मैं भक्ति को चुनूँगा परन्तु ज्ञान के रास्ते से होकर, जिससे मुक्ति के साथ-साथ परमात्मा से प्रेम भी हो जाए और साथ ही उनके प्रेम का कृपापात्र भी बन सकूं ।
सार-संक्षेप
गीता को मुख्य रूप से कर्म-योग का ग्रन्थ कहा गया है क्योंकि इसमें ज्ञान एक गृहस्थ (अर्जुन) को दिया गया है । गृहस्थ जीवन में अपना कर्तव्य निभाने और जीविकोपार्जन के लिए कर्म करने आवश्यक हैं । इन कर्मों को करते हुए भी परमात्मा से योग को उपलब्ध हुआ जा सकता है । कर्मों को करने में जब तक राग रहेगा तब तक योग की ओर जाना संभव नहीं है । वैराग्य ज्ञान से पैदा होता है । ज्ञानपूर्वक कर्म ही रागरहित हो सकते हैं, बिना ज्ञान के तो फलासक्ति सकाम कर्मों की ओर ही ले जाएगी ।
मनुष्य बिना किसी बन्धन के स्वतंत्र ही पैदा होता है परन्तु विभिन्न भोगों की आसक्तियों में फँसकर संसार के साथ बंध जाता है । कर्म और ज्ञान की रागरहित राह हमें इस संसार से मुक्त करती है । इसलिए कर्म और ज्ञान, दोनों ही रास्तों को लौकिक कहा गया है । लौकिक मार्गों में पराश्रय और परिश्रम की आवश्यकता रहती है । इन दोनों से भी मुक्त होना आवश्यक है । इसके लिए भक्ति की राह सर्वोत्तम है । भक्ति में केवल एक भगवान का ही आश्रय है और साथ ही विश्राम भी ।
सीधे परमात्मा की शरण ले लेना आज के युग में लगभग असंभव सा है क्योंकि मनुष्य परिश्रम करते हुए कर्म और ज्ञान के स्तर पर जाकर ही सब कुछ पाना चाहता है । वह परमात्मा के प्रति समर्पण को भी एक क्रिया मानने लगा है । परमात्मा की शरण में जाने को एक क्रिया मान लेने से कभी भी शरणागत नहीं हुआ जा सकता । अतः इस युग में ज्ञान और कर्म के माध्यम से वैराग्य को उपलब्ध हो भक्ति की राह पकड़ शरणागत हो जाना ही सर्वोत्तम मार्ग है ।
ज्ञान मुक्ति तो प्रदान करता है परन्तु परमात्मा से/के प्रेम के लिये भक्ति आवश्यक है । इसलिए साधना में लगे मनुष्य के लिए आवश्यक है कि गुरु के सानिध्य में ज्ञान प्राप्त करते हुए भक्ति की राह पर चले । गीता में भगवान ने भी कहा है - ‘ज्ञानी-भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय है । वह तो साक्षात् मेरा ही स्वरूप है ।’ इस विवेचन का सार है कि यदि मुक्ति के साथ-साथ परमात्मा का प्रेम भी चाहिए तो ज्ञानी-भक्त होने का प्रयास कीजिए अन्यथा ज्ञान से मुक्ति तो स्वतः सिद्ध है ।
इसी के साथ ‘मुक्ति अथवा भक्ति’ लेख के समापन की आज्ञा चाहूँगा । अन्त तक साथ बने रहने के लिए आपका आभार ।
।। हरिः शरणम् ।।
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
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