ज्ञान और कर्म
पिछले लेख ‘मुक्ति अथवा भक्ति’ से यही निष्कर्ष निकलकर आया कि आधुनिक काल में ज्ञान और कर्म के माध्यम से वैराग्य को उपलब्ध हो भक्ति की राह पकड़ शरणागत हो जाना ही सर्वोत्तम है । ज्ञान और कर्म तो प्राप्त तथा करने पड़ते हैं परन्तु भक्ति तो स्वतः होती है । हां, मनुष्य को भक्ति की अवस्था तक ले जाने में ज्ञान की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता ।
जीव का सारा संसार कर्म के इर्द-गिर्द ही घूमता है । बिना कर्म के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती । भक्ति की राह भी कर्म के माध्यम से भी निकलती है और भक्ति होने से कर्म भी अकर्म हो जाते हैं । कर्म के रहस्य को समझ पाना बहुत ही कठिन है । किस कर्म का परिणाम कब, कहाँ और कैसा मिलेगा यह कर्म करने के स्थान, समय और परिस्थिति पर निर्भर करता है । कर्म जब ज्ञानपूर्वक किया जाता है तो वह वैराग्य की ओर ले जाता है । वैराग्य हुआ तो संसार से मुक्ति मिल जाती है । वैराग्य होने से ही परमात्मा से/के प्रेम और भक्ति की राह निकलती है ।
प्रश्न है कि कर्म में ज्ञान की भूमिका कहां है ? कर्म को भक्ति तक ले जाने में ज्ञान की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है । जब तक जीव को ज्ञान नहीं होता तब तक वह कर्म-रहस्य को समझ ही नहीं पाएगा । एक बार कर्मों का स्वरूप समझ में आ गया तो कर्म-योग के माध्यम से संसार की सेवा होगी और ज्ञान-योग से वैराग्य का जन्म होगा ।
ज्ञान से कर्म कैसे प्रभावित होते हैं ? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए आइए, प्रवेश करते हैं आज से प्रारम्भ हो रही इस नई चर्चा में - ‘ज्ञान उदय जब होत है…..’ ।
।। हरिः शरणम् ।।
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
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