ज्ञान उदय जब होत है …..3
गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं-
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ।। 18/59 ।।
अर्थात् अहंकार का आश्रय लेकर तू जो ऐसा मान रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तेरा यह निश्चय मिथ्या है; क्योंकि तेरी क्षत्रिय प्रकृति तुझे युद्ध में लगा देगी ।
मनुष्य जब जन्म लेता है तब अपने साथ प्राकृतिक स्वभाव लेकर आता है । उस स्वभाव के अनुसार ही उसका किसी एक वर्ण में जन्म होता है । जीवन में उसी वर्ण के स्वभावानुसार उससे कर्म होते हैं । वह चाहकर भी उन कर्मों से दूर नहीं जा सकता । अर्जुन ने क्षत्रिय वर्ण में जन्म लिया था, उससे कर्म भी वैसे ही होने थे जैसा उसका वर्ण था अर्थात् राज्य की सुरक्षा और संसार के हित के लिए युद्ध जैसा घोर कर्म करना । भगवान यही तो कह रहे हैं कि तू युद्ध न करने वाला कौन होता है ? अगर तू युद्ध से एक बार के लिए पलायन कर भी जाएगा तो भी तेरी क्षात्र प्रकृति तुम्हें युद्धभूमि में आने को विवश कर देगी । फिर भी तू युद्ध नहीं करता तो उसका परिणाम भी तुम्हें अपकीर्ति और निंदा के रूप में इस जीवन में भी और उसके बाद भी कई सदियों तक भुगतना पड़ेगा ।
जन्म के पश्चात् स्वभावानुसार कर्म और फिर गुणों में आसक्त होकर किए जाने वाले नए कर्म, उन कर्मों का परिणाम भोगना, उस जीवन में कर्मफल न मिलने पर उन कर्मों से प्रारब्ध बन जाना और उन प्रारब्ध कर्मों से नया शरीर और एक नया स्वभाव । इस प्रकार संसार-चक्र निर्बाध गति से चलता रहता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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