ज्ञान उदय जब होत है …..4
प्रत्येक कर्म का जन्म और स्वभाव से सीधा सम्बन्ध है । इसी बात को भगवान श्रीकृष्ण ने भागवतजी में स्पष्ट किया है । वे कहते हैं -
कर्मणा जायते जन्तु: कर्मणैव विलीयते ।
सुखं दु:खं भयं क्षेमं कर्मणैवाभिपद्यते ।। 10/24/13।।
प्राणी अपने कर्म के अनुसार ही पैदा होता है और कर्म से ही मर जाता है । उसे उसके कर्म के अनुसार ही सुख-दुःख, भय और मंगल के निमित्तों ( माध्यमों) की प्राप्ति होती है ।
हमें अपने जीवन में मिलने वाले सुख-दुःख, होने वाले हानि-लाभ, मान-अपमान आदि के लिए हम स्वयं उत्तरदायी हैं, इसके लिए किसी दूसरे को दोष देना अनुचित है । हमारे कर्म ही हमारे भाग्य का निर्माण करते हैं , और तो और प्रत्येक जीवन की दशा और दिशा के निर्धारण में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है । मानस में तुलसी लिखते हैं -
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता ।
निज कर करम भोग सब भ्राता ।। 2/92/4 ।।
तथा
हानि लाभु जीवनु मरनु,
जसु अपजसु बिधि हाथ ।। 2/171 ।।
कर्म के प्रभाव से परमात्मा भी अछूते नहीं रह सकते । जब-जब शरीर धारण करते हैं तब-तब वे भी कर्म करने और फिर उन कर्मों का फल भोगने को विवश होते हैं । इसलिए स्पष्ट है कि कर्मों को करने और उनका फल भोगने से कोई भी बच नहीं सकता ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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