ज्ञान उदय जब होत है …..5
इतने विवेचन से स्पष्ट है कि प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में कर्म करने को विवश है । कर्म ही उसका भावी जन्म निश्चित करते हैं और उन्हीं कर्मों के आधार पर उसका स्वभाव बनता है । प्रश्न उठता है कि कर्म तो सभी करते हैं, फिर कोई तो मुक्त हो जाता है, कोई ऊंच-नीच योनियों में जन्म लेकर उनका फल पाता है, ऐसा क्यों और कैसे होना सम्भव होता है ?
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं -
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मण: ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति: ।।4/17 ।।
अर्थात् कर्म का तत्व भी जानना चाहिए और अकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिए तथा विकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिए; क्योंकि कर्मों की गति गहन है अर्थात् कर्मों की गति (फल) समझने में बड़ी कठिन है ।
प्रत्येक कर्म फल देता है, यह निश्चित है परन्तु जिस फल की आशा रखकर हम कर्म करते हैं, वैसा ही उसका परिणाम मिलेगा, सम्भव नहीं है । इसका कारण है, प्रतिक्रिया अर्थात् प्रत्येक क्रिया (कर्म) की प्रतिक्रिया अवश्य ही होती है । प्रत्येक कर्म (क्रिया) का परिणाम तो लगभग हमारी सोच के अनुरूप मिल सकता है परन्तु उस कर्म की प्रतिक्रिया क्या होगी और उसका फल क्या मिलेगा, उससे हम सदैव अनभिज्ञ बने रहते हैं। यही कर्मों की गति है । इस प्रकार स्पष्ट है कि कौन सा कर्म और उसकी प्रतिक्रिया कैसा फल देंगे, हम निश्चित नहीं कर सकते । तभी भगवान ने गीता में कहा है - कर्मण्यवाधिकारस्ते मा फ़लेषु कदाचन (2/47), कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, फल में नहीं ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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