ज्ञान उदय जब होत है …..7
चलिए, लेख को आगे बढ़ाते हैं । भगवान का यह कहना कि कर्म करने का अधिकार मनुष्य को है परन्तु फल पर नहीं इसका अर्थ है कि कर्म का फल उसकी इच्छा के अनुकूल ही मिलेगा, कहना सम्भव ही नहीं है । सब कुछ प्रकृति के गुणों के अधीन है । हम फल की कैसी इच्छा सोचकर कर्म करते हैं और परिणाम में हमें कैसा फल मिल जाता है, यह निर्भर करता है कर्म की गति पर । भगवान ने गीता में अकर्म और विकर्म के बारे में स्पष्ट किया है परन्तु हम इनके विस्तार में अभी नहीं जाना चाहेंगे क्योंकि इस लेख से उनका सीधा सम्बन्ध नहीं है । हम बात करेंगे कर्म (सकाम कर्म) की क्योंकि उसकी गति को समझना सबसे कठिन है । कर्मों की गति को समझना कैसे कठिन है, जानने के लिए चलते हैं, एक सन्त के आश्रम में ।
घने जंगल में एक तालाब था । तालाब के किनारे पर एक कुटिया थी । कुटिया में एक संत अपने शिष्य के साथ निवास करते थे । तालाब उनके लिए जल का एक मात्र स्रोत था । तालाब में मछलियाँ अठखेलियाँ करती रहती थी । यदा कदा दूर कहीं से भोजन की खोज करते करते कुछ बगुले उस तालाब की ओर चले आते थे । एक दिन संत तालाब के किनारे शान्त भाव से बैठे भगवद्चिंतन में लीन थे । बगुले के आने की आहट से उनका ध्यान भंग हो गया । उन्होंने देखा कि बगुला तालाब में उतर चुका है । वह बिना हिले-डुले एक मछली पर टकटकी लगाए खड़ा है । सन्त ने सोचा कि अब उस मछली का शिकार बनना निश्चित है । यह सोचकर उन्होंने तत्काल ही बगुले को वहाँ से उड़ा दिया । इस प्रकार एक मछली के प्राण बच गए । संत आश्वस्त थे कि आज उन्होंने एक मछली को मरने से बचा कर बड़ा पुण्य अर्जित कर लिया है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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