भोग, रोग और योग -9
आयुर्वेद में रोग को केवल शारीरिक विकार ही नहीं माना गया है बल्कि इसमें अंतःकरण की भूमिका को भी स्वीकार किया गया है । आयुर्वेद कहता है - प्रज्ञापराध एव रोगाणां मूलकारणम् । अर्थात् विवेक का नाश ही रोगों का मूल कारण है । जहां भोगों पर विवेक को वरीयता दी जाती है, वहां रोग टिक ही नहीं सकता । आज चिकित्सालयों में जो रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है उसका अर्थ यह नहीं है कि रोग बढ़े हैं । इसके लिए हमारी जीवन-शैली उत्तरदायी है । हम रोग के निदान की विफलता के लिए चिकित्सक को ज़िम्मेवार ठहरा देते हैं परन्तु हमने जीवन में जो त्रुटि की है उस ओर हमारी दृष्टि कभी नहीं जाती ।
यह रोग नहीं होकर हमारे लिए चेतावनी है कि हम प्रकृति के मार्ग (धर्म, ऋतु, स्वभाव आदि) से भटक रहे हैं । रोग केवल शारीरिक और मानसिक कमजोरी ही नहीं है बल्कि जीवन-शैली की चेतावनी है । रोग हमें बतलाता है कि हमने कहीं न कहीं प्रकृति के नियमों का उल्लंघन किया है । रोग को दण्ड न माने बल्कि आत्मा (स्वयं के भीतर) की पुकार मानें जो कह रही है - ‘ रुक जाओ, स्वयं की ओर लौट जाओ ।’ इस स्वयं की ओर लौटने की प्रक्रिया का नाम है - योग ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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