Friday, February 27, 2026

भोग, रोग और योग -8

 भोग, रोग और योग -8

            आवश्यकता की पूर्ति करना प्रकृति का दायित्व है । जब मनुष्य प्रकृति के विरुद्ध चलता है जैसे अति भोजन, अति भोग, अति तनाव, अति सोशल मीडिया आदि, तब शरीर और मन दोनों ही विद्रोह कर देते हैं । जब मनुष्य के जीवन की गति प्रकृति के नियमों के विरुद्ध चलने लगती है, तब शरीर और मन दोनों ही संकेत देने लगते हैं । ये संकेत ही रोग कहलाते हैं । मानसिक संकेत (रोग) आधि और शारीरिक संकेत व्याधि कहलाते हैं । 

     रोग जब आता है तब समझें कि शरीर और मन रोग के माध्यम से हमसे संवाद कर रहे हैं । हमें कम से कम रोग-दशा में तो इनकी बात सुननी ही चाहिए । भोग जब विवेकरहित हो जाता है तब रोग को जन्म देता है । 

       भगवान श्री कृष्ण कहते हैं - 

ध्यायतो विषयान् पुंस: संगस्तेषूपजायते ।

संगात् संजायते काम: कामात् क्रोधोऽभिजायते ।। गीता - 2.62 ।।

विषयों का निरंतर होने वाला चिंतन आसक्ति पैदा करता है, आसक्ति से कामना पैदा होती है । कामना से क्रोध और क्रोध से मनुष्य का पतन आरम्भ होता है ।

 क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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