Sunday, February 22, 2026

भोग, रोग और योग -3

 भोग, रोग और योग -3

              मनुष्य का स्वभाव कुछ ऐसा है कि वह सदैव सुख की खोज में ही लगा रहता है । उसकी यह खोज स्वाभाविक है क्योंकि वह स्वयं आनन्द स्वरूप है । जब यह सुख केवल इंद्रिय-तृप्ति तक ही सिमट कर रह जाता है, तब मनुष्य अपने जीवन के लक्ष्य तक पहुंच नहीं पाता । भारतीय दर्शन इसी को भोग कहता है । भोग अपने आप में बुरा नहीं है परंतु जब भोग विवेक से रहित होकर किया जाता है, तब वह रोग को जन्म देता है । शास्त्रों ने योग को ही इस समस्या का एकमात्र समाधान बताया है । 

            भोग का अर्थ है - इंद्रियों से मिलने वाला सुख । भोग का अर्थ केवल भोजन अथवा भौतिक वस्तुएं ही नहीं है । असंयमित रूप से बोलना, सोचना, देखना, चाहना आदि भी भोग के ही विभिन्न रूप हैं । सभी इन्द्रियाँ भोगों में ही लगी हुई हैं । भोगों से इन्द्रियाँ अल्प रूप से तृप्त होती है परन्तु यह तृप्ति कुछ समय के लिए ही सुख देती है । सुख मिलने के बाद भी संतुष्टि कहाँ मिल पाती है, क्योंकि सुख न तो पर्याप्त लगता है और न ही वह दीर्घ कल तक टिकता है । इसी कारण से भीतर सदैव एक प्रकार की रिक्तता बनी रहती है, अभाव बना रहता है । यह अभाव ही जीवन में अशान्ति व तनाव पैदा करता है जिससे व्यक्ति समता में नहीं रह पाता और जीवनभर दुःखी होता रहता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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