भोग, रोग और योग -1
एक समान गति से एक ही दिशा में जा रहे दो वाहनों में बैठे व्यक्ति एक दूसरे के वाहन की गति का आकलन नहीं कर सकते, जबकि दोनों ही गतिमान हैं । दोनों में से किसी एक वाहन की गति में आया तनिक सा परिवर्तन दूसरे वाहन की गति में आए परिवर्तन को अनुभव कर लेता है परन्तु ऐसा अनुभव सत्य नहीं हो सकता । जैसे एक वाहन स्थिर है और दूसरा वाहन पास में से निकल रहा है तो दूसरे वाहन में बैठे व्यक्ति को पहले वाला वाहन विपरीत दिशा में जाता और स्वयं का वाहन स्थिर खड़ा प्रतीत होता है । रेलगाड़ी में बैठे हुए व्यक्ति को बाहर के पेड़ और पोल आदि पीछे भागते नज़र आयेंगे जबकि वास्तविकता यह है कि वह स्वयं गतिमान है और पेड़, पोल अपने स्थान पर स्थिर हैं । यही स्थिति इस संसार और शरीर की है ।
जगत् वह है जो सदैव गति करता रहता है, एक पल के लिए भी स्थिर नहीं रहता । गति का अर्थ है कि यह जगत् परिवर्तनशील है, इसमें प्रतिपल बदलाव हो रहा है और इस बदलाव की गति हमारे शरीर में हो रहे बदलाव के समान ही है । यही कारण है कि जगत् में हो रहे परिवर्तन को हमारा शरीर समझ नहीं पाता, उसका अनुभव नहीं कर पाता ।
स्वामीजी कहते हैं कि बहने वाले के लिए बहने वाला ही सत्य है क्योंकि बहनेवाला बहनेवाले को जान ही नहीं रहा है । बहनेवाले को तो रहनेवाला ही जान सकता है । शरीर और संसार बहनेवालों में हैं और हम स्वयं रहनेवाले हैं । जब इस बात का ज्ञान हो जाएगा उसी दिन यह संसार और शरीर असत्य हो जाएंगे । इंद्रियों का ज्ञान शरीर और संसार के सत्य होने का भ्रम जीवन भर बनाए रखता है । केवल विवेक ही हमारे इस भ्रम को तोड़ सकता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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