Monday, February 23, 2026

भोग, रोग और योग -4

 भोग, रोग और योग -4

              भगवान गीता में कहते हैं - ‘ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।’ (गीता -5/22) अर्थात् सभी भोग (सुख) इंद्रियों और विषयों के संयोग से पैदा होते हैं और दुःख के ही कारण हैं । 

          सभी सुख संयोगजन्य हैं और इंद्रिय स्पर्श से मिलते हैं । संयोग से जब किसी विषय का स्पर्श सम्बन्धित ज्ञानेंद्रिय से होता है, तब जीव एक प्रकार के सुख को अनुभव करता है । सुख का अनुभव करना ही भोग है । प्रत्येक इंद्रिय का एक विषय होता है, उस विषय से संपर्क होते ही मन को सुख का अनुभव होता है । जब विषय संपर्क बार-बार और असंयमित होता है, तब वही सुख दुःख में परिवर्तित होने लगता है । असंयमित भोग ही शारीरिक और मानसिक रोग का कारण बनते हैं । इन रोगों से शारीरिक और मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाता है, जिससे मनुष्य जीवन में अशान्त होकर दुःख का अनुभव करता है । जीवन में शान्ति के लिये इंद्रियों को भोगों की ओर भागने से रोकना होगा ।

           पांच इंद्रियों के पांच विषय - शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध । जो भी जीव इनमें आसक्त हो गया उनकी गति भी वैसी ही होती है जैसी मृग, हाथी, पतंगे, मछली और भंवरे की होती है । इन विषयों का आकर्षण जीव को शारीरिक और मानसिक रोगों के माध्यम से मृत्यु के द्वार तक पहुंचा देता है । ये सभी विषय विभिन्न वस्तुओं के रूप में हमारे आस-पास ही उपस्थित रहते हैं । उनमें आसक्त न होकर उनको बाहर ही छोड़ देना उचित है । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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