भोग, रोग और योग -2
शरीर के मुख्य रूप से दो भाग हैं - स्थूल और सूक्ष्म । दोनों ही शरीर परिवर्तनशील हैं । स्थूल शरीर तो कुछ भी अनुभव नहीं करता, जो कुछ भी अनुभव करता है वह सूक्ष्म शरीर ही करता है । परन्तु सूक्ष्म शरीर द्वारा किया जाने वाला अनुभव भी सत्य नहीं होता । दोनों ही शरीरों में सदैव परिवर्तन होते रहते हैं । इधर जगत् भी परिवर्तनशील है । जो स्वयं बदल रहा वह दूसरे बदल रहे को बदलता हुआ अनुभव नहीं कर सकता । यही कारण है कि हमें सूक्ष्म शरीर के आधार पर स्वयं के साथ-साथ संसार भी सदैव रहनेवाला प्रतीत होता है । यह वैसे ही है जैसे एक ही दिशा में समान गति से चल रही दो रेलगाड़ियों में बैठे व्यक्ति एक दूसरे को स्थिर ही अनुभव करते हैं । लेकिन सूक्ष्म शरीर से होने वाला ऐसा अनुभव केवल भ्रम ही है, सत्य से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है ।
यह अनुभव जिसको हो रहा है, वह कौन है ? हम समझते हैं कि यह अनुभव हमारे शरीर को हो रहा है परंतु यह सत्य नहीं है, यह भी हमारा भ्रम है । जिसको संसार की परिवर्तनशीलता का अनुभव हो रहा है वह अपरिवर्तनशील है, जोकि हम स्वयं हैं और वही हमारा स्वरूप है । इसी प्रकार संसार में रहते हुए सांसारिक विषयों के भोग से जिस सुख का अनुभव हम करते हैं, वह सुख भी हमारा केवल भ्रम ही है । जब हम संसार और उसके विषयों से मिलने वाले सुख से स्वयं को अलग कर लेंगे, तत्काल ही योग को उपलब्ध हो जाएंगे अन्यथा भोगों का दुष्चक्र हमें शारीरिक रोगों में उलझाकर शेष जीवन में मिलने वाले अतिशय दुःख से मुक्त नहीं होने देगा ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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