भोग, रोग और योग -7
जीवन में शरीर के संचालन के लिए कुछ पदार्थों की आवश्यकता रहती है । आवश्यकता की पूर्ति का विधान परमात्मा ने प्रकृति के माध्यम से किया है । समस्या तो तब पैदा होती है, जब आवश्यकता आसक्ति में बदल जाती है । यह आसक्ति ही वासना है । गीता में भगवान कहते हैं कि विषय-चिन्तन से आसक्ति पैदा होती है और आसक्ति से कामना । कामना के कारण ही क्रोध और मतिभ्रम पैदा होती है, जिससे मनुष्य पतन की ओर अग्रसर होता जाता है । आधुनिक जीवन में यह पतन असंतोष, तनाव और अशान्ति के रूप में प्रकट हो रहा है ।
ईशावास्योपनिषद कहती है -
ईशा वास्यमिदंसर्वं यत्किंच जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध: कस्य स्विद् धनम् ।। 1 ।।
अर्थात् अखिल ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी जड़-चेतन स्वरूप जगत् है, यह सारा ईश्वर से व्याप्त है । उस ईश्वर को साथ रखते हुए इसे त्यागपूर्वक भोगते रहो, इसमें आसक्त मत होओ क्योंकि धन आदि भोग्य पदार्थ किसका है ? अर्थात् किसी का नहीं है ।
सारांश है कि प्रारब्ध से मिल रहे भोगों को त्यागपूर्वक भोगें । भोग अर्थात् इंद्रिय-सुख को यदि त्याग पूर्वक और एक सीमा में रहते हुए भोग रहे हैं तो जीवन में अशान्ति का आगमन हो ही नहीं सकता । समस्या तो भोग को भोगने के बाद उसका त्याग न कर उसमें आसक्ति रखने से पैदा होती है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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