Tuesday, February 24, 2026

भोग, रोग और योग -5

 भोग, रोग और योग -5

           सृष्टिकर्ता ने इंद्रियों को बाहर की ओर प्रवृत किया है, इसलिए मनुष्य बाहर ही सुख खोजता है, भीतर नहीं । मनुष्य की दृष्टि सदैव बाहर की ओर ही जाती है, भीतर की ओर नहीं । बाहर संसार, उसके विषय और उनसे उत्पन्न होने वाली अशान्ति है, जबकि भीतर शान्त स्वरूप ।

      भगवान गीता में बाह्य वस्तुओं को (भोगों को) बाहर ही छोड़ने का कहते हैं - 

             स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रूवो: ।

             प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ।। (गीता - 5/27 )

        गीता का यह श्लोक (5.27) कहता है - बाहर के पदार्थों को बाहर ही छोड़कर और नेत्रों की दृष्टि को भौंहों के मध्य स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण तथा अपान वायु को सम करना । इतना सब करके इंद्रियों की बाह्य विचरण प्रवृत्ति को नियंत्रित किया जा सकता है । फिर इंद्रियाँ विषयों की ओर नहीं भागेंगी । 

         इंद्रियों का विषयों की ओर भागना ही भोग उपलब्ध कराता है । भोगों के लिए भागना कभी न समाप्त होने वाली एक दौड़ है । यह दौड़ एक वृत्त की परिधि पर दौड़ने के समान है, जो कहीं नहीं पहुंचाती और न ही कभी समाप्त होती है । इसे ही संसार-चक्र कहा गया है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः

 शरणम् ।।

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