Wednesday, February 25, 2026

भोग, रोग और योग -6

 भोग, रोग और योग -6

        कठोपनिषद् के अनुसार -

           परांचि खानि व्यतृणत् स्वयम्भू:

                   तस्मात् परां पश्यति नान्तरात्मन् ।

           कश्चिद्धीर: प्रत्यगात्मानमैक्ष-

                         दावृत्तचक्षुमृतत्वमिच्छन् ।। (2.1.1)

          अर्थात् स्वयं प्रकट होने वाले परमेश्वर ने समस्त इंद्रियों के द्वार बाहर की ओर जाने वाले ही बनाए हैं; इसलिए वह बाहर की वस्तुओं को ही देखता है, अंतरात्मा को नहीं । किसी बुद्धिमान मनुष्य ने अमर पद को पाने की इच्छा करके चक्षु आदि इंद्रियों को बाह्य विषयों से लौटाई है, उसी ने अंतरात्मा को देखा है ।

          इंद्रियों के सभी विषय बाहर हैं । इन्द्रियाँ बनाई इसलिए है कि मनुष्य इंद्रियों के माध्यम से इन विषयों का ज्ञान करे और सुखमय जीवन बिताते हुए परमात्मा के द्वार तक पहुंचे । परन्तु दुर्भाग्य से मनुष्य ने इन विषयों के रस में डूब जाने को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया है । प्रत्येक विषय-रस का तो अनुभव होगा ही परन्तु उसको ही जीवन का सत्य मान लेना अनुचित है । रस में आसक्त होकर उसमें डूबना वासना है, इसे प्रेम नहीं कहा जा सकता । उस रस से बाहर निकल जाना ही वासना को प्रेम में परिवर्तित कर देता है । इसके लिए इन्द्रियों को बाह्य विषयों से लौटाना ही होगा ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

No comments:

Post a Comment