नाभावो विद्यते सतः -9
पूर्णता का मंत्र ‘‘पूर्णमदः पूर्णमिदं…’ (बृहदारण्यक उपनिषद्) स्पष्ट करता है कि जहाँ पूर्णता है, वहाँ न कुछ जोड़ने की आवश्यकता है और न ही घटने का कोई भय । वहाँ अभाव का कोई स्थान ही ही नहीं है ।
असत् में ही इच्छा रहती है । गीता (3.37) में भगवान कहते हैं - ‘काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।’ यह काम (इच्छा) कहाँ से आता है ? यह आता है, रजोगुण से । रजोगुण अर्थात् संसार यानी असत् और इच्छा (काम) अर्थात् अभाव की अनुभूति ।
जरा अपने अनुभव से इस बात को समझिए । उदाहरण : नींद । गहरी नींद में न धन चाहिए, न मान-सम्मान चाहिए और न ही कोई संबंध । क्यों ? क्योंकि उस समय आप अपने सत् के समीप होते हैं । दूसरा उदाहरण : जीवन में संतोष । जो व्यक्ति भीतर से शांत है, संतुष्टि के कारण वह कम साधनों में भी पूर्णता देखता है । वस्तुएँ वही हैं, केवल दृष्टि बदल गई है ।
इसलिए शास्त्र निष्कर्ष देता है - ‘अभावो न वस्तुनि, किन्तु अविद्यायाम् ।’ अभाव वस्तु में नहीं, अज्ञान में है । जब हम असत् को सत् मान लेते हैं (अज्ञान), तभी अभाव जन्म लेता है । सार यह है कि सत् पूर्ण है, इसलिए उसमें अभाव असम्भव है । असत् अपूर्ण है, इसलिए वही अभाव का कारण है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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