Tuesday, February 3, 2026

नाभावो विद्यते सत: -2

 नाभावो विद्यते सतः - 2

       गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘काम’ की उत्पत्ति रजोगुण से हुई है ।

         काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव: ।

         महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ।। गीता - 3/37।।

अर्थात् रजोगुण से उत्पन्न यह ‘काम’ अर्थात् कामना ही पाप का कारण है । यह ‘काम’ ही क्रोध में परिणत होता है । यह बहुत अधिक खाने वाला और महापापी है । इस विषय में तू इसको ही वैरी जान ।

            इस प्रकार स्पष्ट है कि ‘काम’ की उत्पत्ति माया (प्रकृति) के ही एक गुण, रजोगुण से हुई है । मनुष्य जीवन का उद्देश्य माया से मुक्त होकर परमात्म-अवस्था को प्राप्त होना है । माया से मुक्त होने के लिए ‘काम’ पर नियंत्रण कर उसको जीतना आवश्यक है । यह ‘काम’ इतना प्रभावशाली है कि कोई भी व्यक्ति जीते-जी नहीं कह सकता कि उसने ‘काम’ को जीत लिया है । काम को जीतने का अर्थ है, जीवन में काम से निष्प्रभावी बने रहना ।

      रजोगुण से उत्पन्न ‘काम’ आपको संसार के साथ बाँधता है । इसी बंधन के कारण जीव संसार के आवागमन में पड़ा रहता है और मुक्त नहीं हो पाता । इसीलिए ‘काम’ को माया का अस्त्र कहा गया है, जिसका उपयोग करते हुए माया सृष्टि-चक्र को रूकने नहीं देती ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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