Sunday, February 1, 2026

काम का त्याग

 काम का त्याग 

         विगत लेख पर एक सुधि पाठक का प्रश्न आया है कि काम (सुख प्राप्त करने की इच्छा) क्यों पैदा होता है और इसका त्याग कैसे हो सकता है ?

       ‘काम’ शब्द की व्याख्या करना बड़ा ही कठिन है क्योंकि इसके विविध रूप है । पाठक के प्रश्न तक सीमित रहते हुए इसे सरल भाषा में समझाने का प्रयत्न कर रहा हूँ ।

       जो प्रश्न आया है, वह ‘काम’ के उस रूप से संबंधित है जो हमें संसार में उलझा रहा है । उस ‘काम’ से मुक्त होने के लिए मनुष्य को सांसारिक पदार्थों को पाने की इच्छा का त्याग करना आवश्यक है । पिछले लेख “त्याग से शान्ति” में इसी बात को स्पष्ट किया गया था । 

         एक सिक्के की तरह ‘काम’ के भी दो पहलू हैं । ‘काम’ संसार से सुख मिलने की सम्भावना तलाशता है, जिसके कारण मनुष्य ममता और आसक्ति के जाल में उलझकर संसार के बियाबान में ताउम्र भटकता रहता है, फिर भी उसे सुख नहीं मिलता । यही ‘काम’ अगर प्रेम और आनंद की दिशा पकड़ लेता है तो मनुष्य को परमात्मा तक ले जा सकता है । यह निर्णय तो स्वयं मनुष्य को ही करना है कि वह संसार से सुख चाहता है अथवा परमात्मा का प्रेम । फिर ‘काम’ स्वतः ही अपनी दिशा उसी प्रकार निर्धारित कर लेगा । ‘काम’ वर्जनीय नहीं है, मनुष्य की मानसिकता ही उसे विकृत बना देती है । अतः ‘काम’ को राम की दिशा में लगा देना ही उचित है ।

             जीवन में किसी शारीरिक सुख के लिए अनुभव किए जाने वाले ‘अभाव’ की पूर्ति के लिए जिस काम की उत्पत्ति होती है, हमें उसी काम का त्याग करना है । चलिए ! काम के जनक उसी ‘अभाव’ को समझने का प्रयास करते हैं, ’नाभावो विद्यते सतः’ लेख के माध्यम से ।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल 

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