Monday, February 2, 2026

नाभावो विद्यते सत: -1

 नाभावो विद्यते सतः -1

ऋग्वेद (10.129.1) — नासदीय सूक्त में कहा गया है -

“नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम् नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् ।

किमावरीव: कुह कस्य शर्मन्नम्भ: किमासीद् गहनं गभीरम् ।।” 

अर्थात् प्रलय की दशा में न असत् था और न सत् ही था । उस समय न लोक थे और न अंतरिक्ष था, न कोई आवरण था और न ढकने योग्य कोई पदार्थ था । कहीं भी न कोई प्राणी था और न कोई सुख पहुंचाने वाला भोग ही था । उस समय गहन गंभीर जल भी नहीं था । 

         सृष्टि के अभ्युदय और प्राणियों की रचना के साथ ही सत् और असत् का भेद स्पष्ट होने लगा । संसार और शरीर असत् के अन्तर्गत हैं क्योंकि उनमें स्थायित्व नहीं है जबकि सत् अपरिवर्तनशील है । संसार के भोग पदार्थ प्राणी के जीवन को सुगमता पूर्वक संचालित करने के लिए आवश्यक हैं । उन पदार्थों के उपयोग से जो शारीरिक सुख जीव को मिला उसमें वह आसक्त होने लगा । उन पदार्थों, वस्तुओं आदि पर अपना अधिकार समझने लगा और उनका संग्रह करने लगा । इस प्रकार शारीरिक सुख की इच्छा पैदा होने से जीव संसार के साथ बंधता गया । शरीर के सुख को प्राप्त करने की की इच्छा ही ‘काम’ कहलाती है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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