Friday, February 6, 2026

नाभावो विद्यते सतः -5

 नाभावो विद्यते सतः -5

          अभाव ही हमें सुखी- दुःखी करता है । जिस अभाव की पूर्ति के लिए हम इतनी भाग-दौड़ करते हैं, जब वह लगभग पूर्णता को प्राप्त होने की स्थिति में आता है, तभी फिर कोई न कोई अन्य अभाव अनुभव में आ जाता है । मनुष्य जैसा चाहता है, वैसा कभी हो नहीं पाता क्योंकि जब होने वाला होता है कि फिर उसी में कुछ कमी अनुभव होने लगती है । अभाव की पूर्ति के लिए प्रयास करना पागलपन कि सिवाय कुछ भी नहीं है क्योंकि जिसे हम कभी पूर्णता के साथ प्राप्त नहीं कर सकते फिर भी प्रयास करते रहते हैं तो इसे पागलपन नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे ?

          एक नेताजी पागलखाने का दौरा कर रहे थे । एक वार्ड में एक पागल बार-बार शबनम शबनम पुकार रहा था । नेताजी ने चिकित्साधिकारी से पूछा कि यह व्यक्ति कैसे पागल हुआ ? उत्तर मिला कि यह शबनम से बड़ा प्रेम करता था परन्तु उस लड़की की शादी इससे न हो सकी । इसलिए यह उसके अभाव में पागल हो गया  । आगे दूसरे वार्ड में भी एक व्यक्ति ठीक पहले व्यक्ति की तरह ही शबनम शबनम कर रहा था । नेताजी आश्चर्यचकित रह गए । बोले - क्या यह भी शबनम का कोई प्रेमी है, जिससे इसकी शादी नहीं हो सकी । चिकित्सक ने उत्तर दिया - ‘नहीं साहब, इसकी शादी शबनम से हो गई थी ।’

         पहला व्यक्ति शबनम को चाहता था, नहीं मिली इसलिए पागल हो गया । दूसरा व्यक्ति शबनम से कुछ चाहता था, वह उसे नहीं मिला इसलिए पागल हो गया । दोनों ही स्थिति में अभाव ही पागल होने का मुख्य कारण था, एक तो किसी व्यक्ति के अभाव में और दूसरा, किसी व्यक्ति से सुख के अभाव में । इस अभाव का ही दूसरा नाम काम है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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