नाभावो विद्यते सतः -4
जीवन में किसी अभाव का अनुभव और उस अभाव की पूर्ति के लिए उत्पन्न हुई इच्छा को ही ‘काम’ कहा गया है । ‘काम’ शब्द का अर्थ है - कामना, इच्छा अर्थात् इंद्रिय सुख की इच्छा । स्वामीजी कहते हैं कि ‘जैसा मैं चाहूँ, वैसा हो ज़ाय’ - यही काम है । किसी भी क्रिया, वस्तु और व्यक्ति का अच्छा लगना अथवा उससे कुछ भी सुख चाहना ‘काम’ है । जब भीतर किसी वस्तु अथवा व्यक्ति से इंद्रिय सुख पाने की चाहना होती है, तब कामना का जन्म होता है । उस कामना के कारण ही मनुष्य कर्म करने को विवश होता है । कर्म के फलस्वरूप इंद्रियों के माध्यम से व्यक्ति को सुख का अनुभव होता है ।
स्वामीजी काम को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि “काम अभाव में पैदा होता है।” इसका अर्थ है कि जब जीवन में किसी चीज़ की कमी या अभाव होता है, तभी मनुष्य उस अभाव की पूर्ति के लिए कुछ करने को प्रेरित होता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि आवश्यकता ही प्रयास, मेहनत और काम को जन्म देती है । यदि सब कुछ सुगमता से मिल जाए तो काम करने की इच्छा नहीं रहती । जो पाने में दुर्लभ है, जिसको प्राप्त करने के लिए कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, उसी का हम अधिक अभाव अनुभव करते हैं । इसी अभाव के कारण उसे पाने की कामना अधिक बलवती होती है । ऐसी कठिनाई, अभाव या आवश्यकता इंसान को सक्रिय बनाती है । उदाहरण: पैसे की कमी हो तो व्यक्ति मेहनत करके नौकरी या व्यवसाय करता है । संसाधन कम हों तो मस्तिष्क अधिक रचनात्मक समाधान खोजता है । आवश्यकता ही आविष्कार और परिश्रम की जननी है।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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