नाभावो विद्यते सतः -8
इतने विवेचन से स्पष्ट है कि अभाव वस्तु में नहीं, हमारी दृष्टि में है । दृष्टि सत् में स्थिर होते ही अभाव स्वतः समाप्त हो जाता है ।
“अभाव सदैव असत् का ही होता है, सत् में कोई अभाव नहीं है ।”
आइए ! पहले “सत्” और “असत्” को समझते हैं । सत् क्या है ? सत् वह है जो नित्य (हमेशा रहने वाला) है । सत् पूर्ण, अपरिवर्तनीय और स्वयं में पर्याप्त है । उपनिषद् कहता है — ‘सदेव सोम्य इदमग्र आसीत् ।’ (छान्दोग्य उपनिषद्) अर्थात् आरम्भ में और वास्तव में सिर्फ सत् ही है । जो सदा है, जो पूर्ण है, उसे भला किस चीज़ की कमी होगी ?
असत् क्या है ? असत् वह है जो बदलता रहता है, नश्वर है, आज है, कल नहीं रहेगा, सदैव अपूर्ण ही रहेगा । शरीर, धन, पद, संबंध, भोग सब असत् हैं । जहाँ परिवर्तन है, वहीं कमी/अभाव का अनुभव होता है ।
अभाव किसे कहते हैं ? अभाव का अर्थ है —“जो होना चाहिए, वह नहीं हो रहा है।” अब जरा सोचिए - जो पूर्ण है, उसमें “होना चाहिए” जैसा कुछ बचता है क्या ? नहीं बचता । जो अपूर्ण है, वही कहता है - मुझे और चाहिए, बहुत कुछ चाहिए । इसलिए अभाव केवल असत् में ही सम्भव है।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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