Wednesday, February 11, 2026

नाभावो विद्याते सत: -10

 नाभावो विद्यते सतः -10

     संस्कृत में एक सूत्र है। - ‘अभावोऽपि असतो धर्मः, न सतः।’ अर्थात् अभाव भी असत् का ही धर्म है, सत् का नहीं । एक अन्य सूत्र कहता है - ‘यत्र पूर्णता तत्र न किञ्चिदभावः।’ अर्थात् जहाँ पूर्णता है, वहाँ किसी प्रकार का अभाव नहीं हो सकता ।

        प्रश्न है कि “ज्ञान होने पर अभाव का अनुभव क्यों समाप्त हो जाता है ?” ज्ञान कहता है - ‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत: ।’ असत् की तो सत्ता नहीं है और सत् का अभाव नहीं है । सत् को जानते ही असत् का निषेध हो जाता है और इस प्रकार अभाव का अनुभव समाप्त हो जाता है । आइए ! इसे एकदम सीधी भाषा, बिना कठिन शब्दों के समझते हैं । 

            “अभाव सदैव असत् का ही होता है, सत् में कोई अभाव नहीं है।” सबसे पहले एक सरल प्रश्न - अभाव कब लगता है ? जब हमें ऐसा लगता है कि “कुछ चाहिए, जो मेरे पास नहीं है।” अब ध्यान दें — यह भावना किसमें होती है ? मन में ।

       . “सत्” क्या है — सरल अर्थ में, सत् का अर्थ है - जो हमेशा है, जो अपने-आप में पूरा है, जिसे किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं है । उपनिषद् इसे कहते हैं: पूर्ण । अब सोचिए, जो पूरा है, उसे किस चीज़ की कमी होगी ? किसी की नहीं। इसलिए सत् में कोई अभाव नहीं हो सकता ।

             “असत्” क्या है ? असत् वह है, जो बदलता रहता है, जो टिकता नहीं है, जो आज है, कल चला जाता है । जैसे: पैसा, शरीर, सम्बन्ध, मान-सम्मान आदि । इन सब में एक बात समान है - ये कभी पूरे नहीं लगते, सदैव अपर्याप्त ही लगते हैं । क्यों ? क्योंकि ये अस्थायी हैं ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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