Sunday, February 8, 2026

नाभावो विद्यते सत: -7

 नाभावो विद्यते सतः -7

         अभाव का सम्बन्ध असत् से है । यहाँ सत् और असत् का भेद स्पष्ट है।असत् का अर्थ है — जो स्थिर नहीं, जो परिवर्तनशील है । परिवर्तनशील वस्तु में ही “कमी-पूर्ति” का चक्र चलता रहता है । इसलिए अभाव असत् का लक्षण है न कि सत् का । सत् में अभाव असम्भव है । बृहदारण्यक उपनिषद् (1.4.2) का प्रसिद्ध मन्त्र है -

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।। 

अर्थात् वह भी पूर्ण है, यह भी पूर्ण है । पूर्ण से पूर्ण उत्पन्न होता है, पूर्ण में से पूर्ण निकालने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है । जहाँ पूर्णता है, वहाँ न कमी है, न आवश्यकता है और न ही कोई अभाव ।

   अभाव, अज्ञान का परिणाम है । आदिशंकराचार्य अपने ग्रंथ ब्रह्म ज्ञानावली माला में कहते हैं -

“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।” अर्थात् ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या है । जीव और ब्रह्म में कोई अन्तर नहीं है। 

       जगत् (असत्) को सत्य मानने से ही इच्छा, अभाव और दुःख उत्पन्न होता है । सत् का अज्ञान ही अभाव की अनुभूति कराता है जबकि सत् का ज्ञान अभाव का लय करा देता है । इसी बात को उन्होंने विवेकचूड़ामणि ग्रंथ के 20 वें श्लोक में फिर से स्पष्ट किया है ।

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्येत्येवंरूपो विनिश्चय ।

सोऽयं नित्यानित्यवस्तुविवेक: समुदाहृत : ।।

अर्थात् ‘ब्रह्म सत्य है और जगत् मिथ्या है‘ ऐसा निश्चय है, यही ‘नित्यानित्यवस्तु-विवेक‘ कहलाता है।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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