नाभावो विद्यते सत: -6
‘अभाव का नाम ही काम है’, यह कथन दार्शनिक दृष्टि से बहुत गहरा है । “अभाव सदैव असत् का ही होता है, सत् में कोई अभाव नहीं है।” सत् वह है - जो वास्तव में है, नित्य है, पूर्ण है । असत् वह है जो अस्थायी है, अपूर्ण है, नश्वर है । इसलिए कहा गया है कि जहाँ पूर्णता है (सत् है), वहाँ किसी कमी अर्थात् अभाव की कल्पना ही नहीं की जा सकती ।
अभाव हमेशा उसी का होता है जो अपूर्ण (असत्) है ।
दार्शनिक व्याख्या (विशेषकर वेदांत में):
आत्मा/ब्रह्म = सत् → पूर्ण, अखंड, शाश्वत → कोई अभाव नहीं ।
शरीर, भोग, संसार = असत् → परिवर्तनशील → हमेशा कुछ न कुछ का अभाव ।
जो व्यक्ति भीतर से संतुष्ट है, उसे बाहर की कमी कभी परेशान नहीं करती । जो अस्थायी वस्तुओं पर निर्भर रहता है, वह हमेशा अभाव अनुभव करता है । कहने का अर्थ है कि अभाव मन (असत्) की अवस्था है, स्वरूप (सत्) की नहीं । सत् में स्थित होने पर अभाव स्वयं विलीन हो जाता है ।
सत् की परिभाषा — पूर्णता । सदेव सोम्य इदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् (छान्दोग्य उपनिषद् (6.2.1)
अर्थात् हे सोम्य ! प्रारम्भ में यह जगत् केवल सत् था — एक, अद्वितीय । यहाँ सत् को एक, अखंड और पूर्ण कहा गया है । जहाँ अद्वैत है, वहाँ किसी अन्य वस्तु का अभाव कैसे हो सकता है ?
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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