सम्भवामि युगे युगे -56
चित्रकुट । एक ही स्थान पर रहते हुए बारह वर्ष बीत गए हैं । वन में आने का एक उद्देश्य असुरों से मुक्ति दिलाते हुए ऋषियों को भययुक्त करना भी है । रास्ते में बाली को परास्त कर रघुवंश का राजमुकुट भी लेना है । मुख्य दृष्टि तो रावण-कुम्भकर्ण बने जय-विजय पर टिकी है । कैसे उनको एक बार फिर से मुक्त करें ? सीता के साथ मिलकर योजना बनाई गई । योजना परमात्मा की और उसके क्रियान्वयन की ज़िम्मेवारी प्रकृति पर । प्रकृति ने अपनी माया को सक्रिय किया ।
चित्रकूट को अब छोड़ना होगा । रास्ते में कई ऋषि-मुनि और भक्तजन उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं । चित्रकूट से आगे की यात्रा प्रारम्भ होती है । राम आगे चल रहे हैं, लक्ष्मण सबसे पीछे हैं और बीच में सीता चल रही है । मानस में तुलसी इसका वर्णन करते हुए लिखते हैं कि राम और लखन के मध्य सीता चलते हुए ऐसे शोभित हो रही है, जैसे ब्रह्म और जीव में बीच माया होती है । मनुष्य की विडंबना है कि उसके और ब्रह्म के बीच माया आ जाती है जिससे वह माया के आकर्षण में ही फँस कर रह जाता है, ब्रह्म की ओर दृष्टि तक नहीं जाती ।
चित्रकूट से निकलते समय अत्रि-अनुसईयाजी से उनके आश्रम में भेंट करते हैं । सीताजी को विविध प्रकार के आभूषणों की भेंट के साथ अनुसुइयाजी द्वारा पतिव्रत-धर्म का उपदेश दिया गया । आगे बढ़ते हुए वे दण्डकारण्य में प्रवेश करते हैं । वहां ऋषि-मुनि तपस्या और यज्ञ आदि कर रहे हैं, उनमें राक्षस बाधा डालते हैं ।
वहाँ की दशा देखकर भगवान प्रतिज्ञा करते हैं -“निसिचर हीन करउँ महि, भुज उठाइ पन कीन्ह ।” इस प्रकार उस क्षेत्र को राक्षसों से मुक्त कर सभी को निर्भय करते है । रास्ते में शरभंग ऋषि भी उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं, परमात्मा के सगुण रूप के दर्शन करने के लिए । दर्शन कर कृतार्थ हो जाते हैं और भेद-भक्ति का वरदान पाकर योगाग्नि से शरीर को त्यागते हुए आगे की यात्रा पर निकल जाते हैं ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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