Monday, October 19, 2026

सम्भवामि युगे युगे -47

 सम्भवामि युगे युगे -47

         हमारे में और केवट में कोई अंतर नहीं है । हम कभी धन में उलझ जाते हैं, कभी प्रियजनों की ममता में । उलझ गए हो तो भी सुलझने का प्रयास करते रहो, इस कछुए की तरह । सतयुग का कछुआ प्रभु चरणों के स्पर्श की चाह में आज त्रेता में गंगा तट पर केवट बनकर खड़ा है ।

          प्रभु की चाह भीतर हो तो प्रभु भी आपके पास चले आते हैं । तभी तो मैंने कहा है कि राम का वन गमन निरुद्देश्य नहीं है । किसी न किसी की चाह ने उनको वन में आने को विवश कर दिया है । प्रभु के चरणों की चाह अकेले केवट को ही नहीं है, इस यात्रा की राह में उनको ऐसे अनेक जन मिलेंगे जो जन्मजन्मांतरों से प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं । आज एक भक्त की चाह पूरी हो रही है, कल किसी ओर की होगी, ऐसे होते होते एक दिन अपना भी नंबर आ जाएगा । इसलिए चाह को बढ़ाते रहो, व्याकुलता के साथ । फिर देर होने का प्रश्न ही नहीं है । 

          प्रभु को तट पर आया देखकर आज केवट भी अकड़ रहा है । संसार सागर से पार जाना है, उससे पहले प्रभु को नदी पार करानी होगी । ‘प्रभु ! आपने आने में बहुत देर कर दी । अब थोड़ी प्रतीक्षा आपको मैं भी करवाऊँगा । बिना पैर धोए गंगा पार नहीं ले जाऊंगा ।’ बहाना भी कैसा, बिलकुल बाल सुलभ बहाना । ‘आपके पैरों की रज से पत्थर भी सुंदर स्त्री (अहिल्या) बन जाती है, मेरे पास तो जीवनयापन का सहारा एक मात्र यह नाव ही तो है, इसको किसी भी क़ीमत पर नारी बनाकर खोना नहीं चाहता । पैरों को पूर्ण रूप से रज-मुक्त किए बिना नाव में नहीं चढ़ाने वाला । आज चाहे रमा (सीता) बाधा बने, चाहे शेषजी (लखन) मुझ पर क्रोधित हों ।’

          लक्ष्मण बहुत कुछ बोलना चाहते हैं परन्तु भैया के सामने विवश हैं । सीता भी क्या करती जब पति ही केवट की बाल सुलभ हठ में रस ले रहे हों । भक्त की बात सुनकर भगवान भी भाव विभोर हो जाते हैं । केवट की बात सुनकर राम मुस्कुरा उठे । आज भक्त की ज़िद्द के आगे भगवान को झुकना पड़ रहा है । सूरज की बढ़ती तपिश को देखकर भगवान केवट को चरण धोने की आज्ञा दे देते हैं । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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