सम्भवामि युगे युगे -46
चलिये ! रथ के साथ चलते हैं । शृंगवेरपुर में निषादराज से भेंट, उससे राम का मित्रवत् व्यवहार कन्द, मूल और फल खाने वाले वनवासी को विवश कर देता है, साथ चलने के लिए । चलते-चलते गंगा नदी के तट पर पहुंचकर सुमंत्र को अवध के लिए विदा कर दिया जाता है । पवित्र नदी गंगा को प्रणाम कर पार उतरने के लिए केवट को बुलावा भेजा जाता है । जिसने दो ही पग में संपूर्ण जगत् नाप लिया हो (वामन अवतार), जिसने अथाह जल राशि में डूबी पृथ्वी को सुगमता से बाहर निकाल लिया हो (वराह अवतार), क्या वह अपने बल से गंगा पार नहीं कर सकता था ?
केवट भगवान को पहचान जाता है । उनके चरणों तक पहुंचने की युग-युगों की चाह संभवतः आज पूरी होने वाली है । और पूरी हो भी गई क्योंकि राम स्वयं चलकर आज केवट के पास आए हैं, वे कृपानिधान जो हैं । सतयुग - क्षीरसागर में शेषशैया पर विश्राम कर रहे हैं प्रभु और पांव दबा रही है रमा । उसी क्षीर सागर में तैर रहे कछुए की एक ही चाह, कैसे भी हों प्रभु के चरणों का स्पर्श कर लूं । सांसारिक चाह और प्रभु चरणों के स्पर्श की चाह, दोनों में बड़ा अंतर है । एक चाह संसार सागर में डूबो देने वाली है, जबकि दूसरी चाह पार करा देने वाली है ।
चाह पूरी तो हो सकती है पर रमा (धन सम्पत्ति) बाधा बन जाती है । कछुए को पास आते देख वह उसे दूर हटा देती है । प्रभु फिर भी उसकी चाह को बढ़ाते हैं और अपने पैर शेषशैया से बाहर निकाल लेते हैं । इस बार शेषजी (प्रियजन) को बुरा लगता है । अपनी पूंछ को ज़ोर से फटकारते हैं । डर जाता है बेचारा कछुआ, जान किसको प्यारी नहीं होती, हरि से दूर चला जाता है । बार-बार प्रयास करता है बेचारा जीव परमात्मा का आश्रय लेने का । युग पर युग बीतते चले जाते हैं परंतु कछुआ प्रभु के चरणों का आश्रय नहीं ले पाता ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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