सम्भवामि युगे युगे -33
भगवान लीला करते हैं, अपनी माया की सहायता लेकर । माया ने राजा जनक द्वारा जनकपुर में अपनी पुत्री सीता का स्वयंवर रचवा दिया । राम को ही सीता चाहिए इसलिए माया ने जनकजी से शिव-धनुष तोड़ने की कठिन शर्त रखवा दी । यह इतनी कठिन शर्त थी कि उस धनुष को तोड़ना किसी साधारण मनुष्य के वश की बात नहीं थी । धनुष का भारी अथवा हल्का होना, कठोर अथवा लचीला होना, प्रकृति के बल पर निर्भर करता है । किसी के लिए एक तिनका भी भारी हो सकता है और किसी के लिए गिरिराज भी हल्के । सब कुछ परमात्मा की इच्छानुसार माया रचती रही । जगदीश का धनुष भला जगतपिता के अतिरिक्त दूसरा कौन तोड़ सकता है ? अंततः धनुष-भंग हुआ और सीता ने राम को वर लिया ।
स्वयंवर का पूर्ण हो जाने का अर्थ यह नहीं है कि सबकुछ शान्ति से सम्पन्न हो गया है । अभी भी भगवान को माया के माध्यम से कुछ लीला और करनी है । त्रेता के दूसरे अवतार प्रतीक्षा कर रहे हैं, त्रेता के प्रथम अवतार की । तभी परशुरामजी का आगमन हो जाता है । परशुरामजी, परमात्मा के अंशावतार । क्रोध तो जैसे सदा उनकी नाक पर ही बैठा रहता है । इक्कीस बार भूमि को क्षत्रिय विहीन कर चुके हैं, ब्राह्मणों के परम हितैषी । माया ने क्यों बुलाया ऐसे क्रोधी को, रंग में भंग डालने के लिए । भगवान की लीला इतनी शीघ्रता से समझ में आ जाए तो फिर माया ही क्या हुई ?
समस्या थी कि परशुरामजी के पास भी शिव का एक धनुष था । संभावना बनती है कि यह धनुष कभी भी रावण को आशीर्वाद स्वरूप मिल सकता हैं । भविष्य में ऐसा न हो इसके लिए कैसे रोका जाए उनको ? यह कार्य माया के माध्यम से ही हो सकता था । माया ही परशुरामजी को धनुष-यज्ञ स्थल पर खींच लाई ।
अंशावतार होते हुए भी परशुरामजी परमात्मा को नहीं पहचान सके । लक्ष्मण के साथ बड़ा वाद-विवाद हुआ । अन्ततः राम को बीच में आना पड़ा । बड़े प्रभावित हुए परशुरामजी । ‘ अरे ! ये तो साक्षात् परम ब्रह्म हैं, कैसे पुष्टि करूँ?’ उनके द्वारा भगवान होने की केवल एक ही परीक्षा ली गई और परशुरामजी के हाथ का शिव-धनुष अपने आप राम के पास चला गया । शान्त भाव से परशुरामजी ने भगवान श्रीराम का अभिवादन किया और तपस्या करने वन में चले गए ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।