Monday, October 5, 2026

सम्भवामि युगे युगे -33

 सम्भवामि युगे युगे -33

             भगवान लीला करते हैं, अपनी माया की सहायता लेकर । माया ने राजा जनक द्वारा जनकपुर में अपनी पुत्री सीता का स्वयंवर रचवा दिया । राम को ही सीता चाहिए इसलिए माया ने जनकजी से शिव-धनुष तोड़ने की कठिन शर्त रखवा दी । यह इतनी कठिन शर्त थी कि उस धनुष को तोड़ना किसी साधारण मनुष्य के वश की बात नहीं थी । धनुष का भारी अथवा हल्का होना, कठोर अथवा लचीला होना, प्रकृति के बल पर निर्भर करता है । किसी के लिए एक तिनका भी भारी हो सकता है और किसी के लिए गिरिराज भी हल्के । सब कुछ परमात्मा की इच्छानुसार माया रचती रही । जगदीश का धनुष भला जगतपिता के अतिरिक्त दूसरा कौन तोड़ सकता है ? अंततः धनुष-भंग हुआ और सीता ने राम को वर लिया । 

    स्वयंवर का पूर्ण हो जाने का अर्थ यह नहीं है कि सबकुछ शान्ति से सम्पन्न हो गया है । अभी भी भगवान को माया के माध्यम से कुछ लीला और करनी है । त्रेता के दूसरे अवतार प्रतीक्षा कर रहे हैं, त्रेता के प्रथम अवतार की । तभी परशुरामजी का आगमन हो जाता है । परशुरामजी, परमात्मा के अंशावतार । क्रोध तो जैसे सदा उनकी नाक पर ही बैठा रहता है । इक्कीस बार भूमि को क्षत्रिय विहीन कर चुके हैं, ब्राह्मणों के परम हितैषी । माया ने क्यों बुलाया ऐसे क्रोधी को, रंग में भंग डालने के लिए । भगवान की लीला इतनी शीघ्रता से समझ में आ जाए तो फिर माया ही क्या हुई ?

         समस्या थी कि परशुरामजी के पास भी शिव का एक धनुष था । संभावना बनती है कि यह धनुष कभी भी रावण को आशीर्वाद स्वरूप मिल सकता हैं । भविष्य में ऐसा न हो इसके लिए कैसे रोका जाए उनको ? यह कार्य माया के माध्यम से ही हो सकता था । माया ही परशुरामजी को धनुष-यज्ञ स्थल पर खींच लाई ।   

       अंशावतार होते हुए भी परशुरामजी परमात्मा को नहीं पहचान सके । लक्ष्मण के साथ बड़ा वाद-विवाद हुआ । अन्ततः राम को बीच में आना पड़ा । बड़े प्रभावित हुए परशुरामजी । ‘ अरे ! ये तो साक्षात् परम ब्रह्म हैं, कैसे पुष्टि करूँ?’ उनके द्वारा भगवान होने की केवल एक ही परीक्षा ली गई और परशुरामजी के हाथ का शिव-धनुष अपने आप राम के पास चला गया । शान्त भाव से परशुरामजी ने भगवान श्रीराम का अभिवादन किया और तपस्या करने वन में चले गए ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, October 4, 2026

सम्भवामि युगे युगे -32

 सम्भवामि युगे युगे -32

             गौतम पत्नी अहिल्या ने भगवान की स्तुति की - ‘प्रभु ! मैं तो आपके दर्शन कर कृतार्थ हो गई । भला हुआ, ऋषि गौतम ने मुझे श्राप दिया । उन्होंने क्रोध में रहते हुए भी मेरा भला ही चाहा, तभी आज आपके दर्शन हुए । मुझे इस बात का कोई दुःख नहीं है कि मेरे पति ने मेरी निर्दोषता पर विश्वास नहीं किया । मेरा तो उनके दिए शाप से भला ही हुआ है ।’ इस प्रकार एक निर्दोष नारी को शापमुक्त कर भगवान ने अपनी प्रेमाभक्ति का वरदान देते हुए अहिल्या को गौतम ऋषि के पास भेज दिया ।

        भगवान की दृष्टि अब जनकपुरी पर है । भारत की उत्तर भूमि असुरों से लगभग रिक्त हो चुकी है । अब मुख्य प्रश्न था, रावण तक पहुंचने का । रावण का राज्य तो यहां से सुदूर दक्षिण में है । रावण को जीतना है, इसलिए माया का साथ चाहिए । माया सीता के रूप में मिथिला में है और मायापति से मिलने वाले आदेश की प्रतीक्षा भी कर रही है । भगवान का ज़नकपुरी जाने का मुख्य उद्देश्य यही है । 

          ऋषि विश्वामित्र के साथ राम और लखन जानकपुरी की ओर चल पड़े जहां सीता प्रतीक्षारत है । पुरुष और प्रकृति का मिलन ही पूर्णत्व को पुष्ट करता है । मिथिला के प्रवेशद्वार पर ही सतानन्दजी प्रतीक्षा कर रहे हैं । सतानन्दजी, मिथिला के राजपुरोहित और गौतम-अहिल्या के पुत्र । भगवान की अगवानी करते हुए प्रणाम करते हैं और बिना किसी औपचारिकता के पूछ लेते हैं कि क्या आपने मेरी मां का उद्धार कर दिया है ? भगवान इस प्रश्न के उत्तर में केवल मुस्कुरा देते हैं । भगवान भक्त को कृतार्थ करके ही मुस्कुरा सकते हैं । सतानन्दजी सब कुछ समझ जाते हैं । ऋषि सहित दोनों भाइयों को साथ लेकर सतानन्दजी राजा जनक के महल की ओर चल पड़े । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

Saturday, October 3, 2026

सम्भवामि युगे युगे -31

 सम्भवामि युगे युगे -31

       एक नारी जिसे अबला कहा जाता है किसी पुरुष के सामने कैसे विवश हो जाती है, अहिल्या के साथ हुआ अत्याचार इसका प्रमाण है । पाप इन्द्र ने किया परन्तु परिणाम अहिल्या को भी भोगना पड़ा । सूने आश्रम में केवल पाषाण बनी अहिल्या रह गई, पशु-पक्षियों तक ने वह स्थान छोड़ दिया । पाषाण बनी अहिल्या भगवान के आगमन की प्रतीक्षा करते हुए केवल राम-राम रटने लगी । 

           भगवान अंतर्यामी भी है और सर्वत्र भी । उधर मिथिला में श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा कर रही है सीता । प्रकृति के बिना पुरुष अधूरा है । जब प्रकृति साथ होती है पुरुष के, तब कहीं जाकर वह पूर्णता को प्राप्त होता है । जाना तो है जनकपुरी परन्तु इधर उठ रही भक्त की पुकार को भगवान अनसुना भी तो नहीं कर सकते । विस्वामित्रजी की आज्ञा से राह बदल ली और पहुंच गये निर्जीव निःशब्द पड़े गौतम ऋषि के आश्रम में । पत्थर हो गई नारी को देखकर पूछ बैठे राम । विस्वामित्रजी ने सारी कथा सुना दी और बोले - ‘हे राम ! आपकी चरण-रज चाहती है, यह शापित नारी ।’ 

           जिनका जन्म ही समाज में मर्यादा स्थापित करने के लिए हुआ हो, वह अपने पैरों से भला किसी नारी-मूर्ति को भी छूने की कल्पना कैसे कर सकता है ? ‘नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकता । हे माते ! इस कठिन समय में मेरी सहायता करो ।’ भला मायापति के आग्रह को माया कैसे ठुकरा सकती है ? कहा जाता है कि उसी समय वायु तीव्र गति से भगवान राम से शापित अहिल्या की तरफ़ बहने लगी । भूमि की विरल रज उड़ी और पाषाण हुई नारी को छू गई । तत्काल ही पाषाण हुई नारी में हलचल हुई और सुन्दर अहिल्या प्रकट हो गई । मर्यादा पुरुषोत्तम राम अपने अनुज सहित आगे बढ़े और दोनों ने नारी शक्ति को प्रणाम किया । बिना अपराध के मिली सजा से आज जाकर नारी मुक्त हुई है परन्तु इस मुक्ति के लिए भगवान को स्वयं आना पड़ा ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।