सम्भवामि युगे युगे -31
एक नारी जिसे अबला कहा जाता है किसी पुरुष के सामने कैसे विवश हो जाती है, अहिल्या के साथ हुआ अत्याचार इसका प्रमाण है । पाप इन्द्र ने किया परन्तु परिणाम अहिल्या को भी भोगना पड़ा । सूने आश्रम में केवल पाषाण बनी अहिल्या रह गई, पशु-पक्षियों तक ने वह स्थान छोड़ दिया । पाषाण बनी अहिल्या भगवान के आगमन की प्रतीक्षा करते हुए केवल राम-राम रटने लगी ।
भगवान अंतर्यामी भी है और सर्वत्र भी । उधर मिथिला में श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा कर रही है सीता । प्रकृति के बिना पुरुष अधूरा है । जब प्रकृति साथ होती है पुरुष के, तब कहीं जाकर वह पूर्णता को प्राप्त होता है । जाना तो है जनकपुरी परन्तु इधर उठ रही भक्त की पुकार को भगवान अनसुना भी तो नहीं कर सकते । विस्वामित्रजी की आज्ञा से राह बदल ली और पहुंच गये निर्जीव निःशब्द पड़े गौतम ऋषि के आश्रम में । पत्थर हो गई नारी को देखकर पूछ बैठे राम । विस्वामित्रजी ने सारी कथा सुना दी और बोले - ‘हे राम ! आपकी चरण-रज चाहती है, यह शापित नारी ।’
जिनका जन्म ही समाज में मर्यादा स्थापित करने के लिए हुआ हो, वह अपने पैरों से भला किसी नारी-मूर्ति को भी छूने की कल्पना कैसे कर सकता है ? ‘नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकता । हे माते ! इस कठिन समय में मेरी सहायता करो ।’ भला मायापति के आग्रह को माया कैसे ठुकरा सकती है ? कहा जाता है कि उसी समय वायु तीव्र गति से भगवान राम से शापित अहिल्या की तरफ़ बहने लगी । भूमि की विरल रज उड़ी और पाषाण हुई नारी को छू गई । तत्काल ही पाषाण हुई नारी में हलचल हुई और सुन्दर अहिल्या प्रकट हो गई । मर्यादा पुरुषोत्तम राम अपने अनुज सहित आगे बढ़े और दोनों ने नारी शक्ति को प्रणाम किया । बिना अपराध के मिली सजा से आज जाकर नारी मुक्त हुई है परन्तु इस मुक्ति के लिए भगवान को स्वयं आना पड़ा ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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