Tuesday, September 1, 2026

मौन -19

 मौन -19 

सार-संक्षेप 

     मनुष्य जीवन का लक्ष्य है- आत्म-स्वरूप तक पहुंचना जिसे सन्त परमात्मा को प्राप्त करना भी कहते हैं । सभी दार्शनिकों और सन्तजनों ने परमात्मा तक पहुँचने के भिन्न-भिन्न साधन बताए हैं । सभी साधन कुछ न कुछ करने पर आधारित हैं । करने के साथ सम्बन्ध जोड़े रखने पर ‘ न करना’ भी करने के अन्तर्गत आ जाता है । चुप साधन/मौन-साधना/मूक-सत्संग अक्रिय हो जाने पर आधारित है अर्थात् करने और न करने, दोनों को छोड़ना है । इसीलिए इस साधन को ध्यान-योग के अन्तर्गत लिया गया है ।

         योगवासिष्ठ में मौन-साधना के अन्तर्गत मौन के चार भेद बतलाए गए हैं । इन्हें पूर्ण मौन की अवस्था तक पहुंचने के सोपान भी कहे जा सकते हैं । संक्षेप में - वाक् मौन में वाणी का संयम किया जाता है । इंद्रिय मौन इंद्रियों का संयम है और काष्ठ मौन भौतिक शरीर की स्थिरता को व्यक्त करता है । अंतिम मौन है, सुषुप्ति मौन । सुषुप्ति मौन उस अवस्था का नाम है जिसमें जागृत रहते हुए गहरी निद्रा जैसी मानसिक शान्ति का अनुभव होता है । यह अवस्था साधक को आत्मस्वरूप की अनुभूति की ओर ले जाने वाली साधना का महत्वपूर्ण सोपान मानी जाती है ।

           सुषुप्ति मौन की अवस्था घटित हो जाने के पश्चात् व्यक्ति पूर्णतया मौन और निःशब्द हो जाता है । फिर न तो संसार का चिंतन रहता है और न ही परमात्मा का । मौन में हुई आत्मस्वरूप की अनुभूति उसे गहरे मौन में उतार देती है । इस अवस्था का वर्णन करने के लिए साधक के पास शब्दों का अभाव हो जाता है । भला वर्णनातीत का वर्णन भी कोई कर सकता है ! मौन साधना/मूक सत्संग का लक्ष्य आत्मस्वरूप की अनुभूति करना ही है, जो साधक को मौन और नि:शब्दता की अवस्था में ले जाता है ।

       संक्षेप में, चुप साधन/मूक सत्संग/मौन साधना वह साधन है, जिसमें बिना बोले, मौन की शक्ति से आत्मचिंतन करते हुए सत्य का अनुभव करने का प्रयास किया जाता है । अन्ततः सब चिंतन मिट जाते हैं और अचिन्त्य का अनुभव हो जाता है ।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल